Friday, April 20, 2018

विस्थापन का दंश नहीं विकास चाहते हैं ग्रामीण

  •   पदयात्रा से केन-बेतवा लिंक परियोजना की उजागर हुई हकीकत
  •   नदी जोड़ परियोजना से अनभिज्ञ हैं केन किनारे स्थित ग्रामों के लोग


पदयात्रा के दौरान तटवर्ती ग्रामीणों से चर्चा का दृश्य।

 अरुण सिंह,पन्ना। केन नदी के किनारे स्थित ग्रामों के रहवासी विस्थापन का दंश नहीं अपितु मूलभूत सुविधायें और विकास चाहते हैं। नदी जोड़ परियोजना के प्रस्तावित बांध स्थल के पास दोधन, पलकोहा, खरयारी समेत लगभग 10 गाँव पन्ना टाईगर रिजर्व के अन्दर हैं। इन ग्रामों में रहने वाले लोगों की मुसीबत यह है कि उन्हें विगत कई सालों से बांध विस्थापित बताया जा रहा है। जिसके कारण ग्रामवासियों को पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार व आवागमन जैसे मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा गया है। पूरे 33 दिनों में 600 किमी लम्बी दूरी तय करके केन परिक्रमा करने वाले सिद्धार्थ अग्रवाल व भीम ङ्क्षसह रावत ने बेहद चौंकाने वाले तथ्य उजागर किये हैं। आप लोगों ने बताया कि पन्ना से लेकर बांदा तक केन नदी के किनारे बसे अधिकांश ग्रामों के लोगों को केन-बेतवा लिंक परियोजना के संबंध में कोई भी जानकारी नहीं है। इन ग्रामीणों में नदी पर आश्रित किसान, मल्लाह, मछुआरे व पशुपालक शामिल हैं।
केन्द्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में तटवर्ती ग्रामों के लोग यह सोचते हैं कि केन का पानी बेतवा में और बेतवा का पानी केन में डाला जायेगा, जिससे बाढ़ नहीं आयेगी। बाढ़ की विभीषिका अनेकों बार झेल चुके लोग इस भ्रान्ति के चलते निङ्क्षश्चत थे कि नदी जोड़ योजना से उनके जीवन में कोई खलल नहीं पड़ेगा, अपितु बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति मिल जायेगी। जबकि वास्तव में इस योजना से केवल केन नदी का पानी बेतवा में डाला जायेगा, बेतवा का पानी केन में नहीं आयेगा। पदयात्रियों ने ग्रामीणों को जब इस तथ्य से अवगत कराया तो वे हैरान रह गये। हकीकत जान ग्रामीण अपने को अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और कहते हैं कि यदि ऐसा है तो नदी जोड़ परियोजना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि केन हमारी जिन्दगी है। पदयात्रा के दौरान यह भी पता चला कि योजना को अमल में लाने के लिये बरियारपुर बैराज के नीचे नया बैराज बनाया जायेगा। जिससे योजना के डूब क्षेत्र में आने वाले वन क्षेत्र और गाँवों की संख्या बढ़ जायेगी। किन्तु इस बात का योजना की पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन, जनसुनवाई और पर्यावरण आंकलन रिपोर्ट में उल्लेख नहीं किया गया है। योजना के लिये पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में 23 लाख से भी अधिक पेड़ों को काटा जायेगा, यह सुनकर भी ग्रामीण भौंचक्के रह गये। क्योंकि इन तथ्यों और जानकारियों से वे पूरी तरह अनजान हैं। अपने उद्गम स्थल से ही मानवीय हस्तक्षेप झेल रही केन नदी की हालत दयनीय और चिन्ताजनक हो गई है। केन किनारे के सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल यदि आज होते तो केन की यह दशा देख कितने व्यथित होते। श्री अग्रवाल अपनी एक कविता में लिखते हैं, मैं घूमूंगा केन किनारे, यों ही जैसे आज घूमता, लहर-लहर के साथ झूमता, संध के प्रिय अधर चूमता, दुनिया के दु:ख-द्वंद विसारे, मैं घूमूँगा  केन किनारे। लेकिन अब केन किनारे ऐसा कुछ भी नहीं बचा जहां घूमा जा सके, हर तरफ विनाशकारी उत्खनन और पानी के अविरल नैसर्गिक  प्रवाह को रोकने का काम हो रहा है।

नष्ट हो जायेगा बाघों का बसेरा


केन नदी के किनारे गजराज और वनराज साथ-साथ।
केन-बेतवा लिंक परियोजना पन्ना जिले के रहवासियों के लिये जहां विनाशकारी साबित होगी, वहीं पन्ना टाईगर रिजर्व के बाघों और विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके गिद्धों के जीवन में भी संकट पैदा करेगी। नदी जोड़ परियोजना में पन्ना टाईगर रिजर्व का जो हिस्सा डूब में आ रहा है वह बाघों व बल्चरों का प्रिय रहवास है। मौजूदा समय भी इस क्षेत्र में शावकों सहित एक बाघिन अपना बसेरा बनाये हुय है, वहीं नर बाघों का भी विचरण होता रहता है। पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र बाघों की बढ़ रही संख्या को देखते हुये छोटा पड़ रहा है, ऐसी स्थिति में बाघों के सर्वश्रेष्ठ रहवास के डूब में आ जाने से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान का पूरा ताना बाना ही बिगड़ जायेगा, जिसकी भरपाई हो पाना संभव नहीं है।

नहीं दिखेगा रनेहफाल का अनुपम सौन्दर्य


केन नदी के रनेहफाल का अद्भुत नजारा।

केन नदी का अविरल प्रवाह थम जाने पर रनेहफाल का अलौकिक और अनुपम सौन्दर्य देखने को नहीं मिलेगा। रंग-बिरंगी ग्रेनाइट की चट्टानों के बीच से जब केन की धार प्रवाहित होती है तो यह नजारा देख लोग मुत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह बेहद खूबसूरत फाल संकटग्रस्त घडिय़ाल प्रजाति का आश्रय स्थल भी है। जिसे केन घडिय़ाल राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के नाम से जाना जाता है। रनेहफाल और इस अभ्यारण्य के सुरक्षित भविष्य के लिये यह आवश्यक है कि केन नदी में बरियारपुर बांध से निरन्तर पानी छोड़ा जाये।
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Thursday, April 19, 2018

सदानीरा केन नदी का बिगड़ रहा है स्वास्थ्य

  •   स्वच्छ नदियों में शुमार केन बुन्देलखण्ड की है जीवन रेखा  

  •   427 किमी लम्बी केन नदी की दो युवकों ने की पदयात्रा

केन नदी की पदयात्रा करने वाले युवक अपना अनुभव साझा करते हुये।

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की जीवन रेखा कही जाने वाली देश की स्वच्छ नदियों में शुमार सदानीरा केन नदी का स्वास्थ्य अब बिगड़ रहा है। कुछ दशक पूर्व तक जिस नदी में अविरल जल प्रवाह देखने को मिलता था वह अप्रैल के महीने में ही जगह-जगह सूखी और बेजान नजर आ रही है। केन नदी को सदानीरा बनाने वाली उसकी अधिकांश सहायक नदियां मृतप्राय हो चुकी हैं। मानवीय दखल बढऩे, जलागम क्षेत्रों में बांधों का निर्माण होने, भारी भरकम मशीनों से अनियंत्रित उत्खनन, वनों की कटाई, शहरीकरण और बदलते भू-उपयोग के चलते ऐसे हालात निर्मित हुये हैं। यह बात 427 किमी लम्बी केन नदी की पदयात्रा पूरी करने के उपरान्त सिद्धार्थ अग्रवाल व भीम सिंह रावत ने अपने अनुभव साझा करते हुये पन्ना में पत्रकारों को बताई।

केन नदी की भौगोलिक संरचना और अनूठेपन से अत्यधिक प्रभावित सिद्धार्थ अग्रवाल आईआईटी खडग़पुर से उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, जबकि भीम सिंह रावत उत्तरांचल पोड़ी गढ़वाल के निवासी हैं। प्रकृति, पर्यावरण और नदियों के संबंध में इन दोनों ही युवकों में गहरी समझ है। आप लोगों ने पत्रकारों को बताया कि कठिन भौगोलिक क्षेत्र होने के चलते इस पदयात्रा को तीन चरणों में पूरा किया, जिसमें पूरे 33 दिन लगे। लगभग 600 किमी पैदल यात्रा के दौरान बांदा व पन्ना जिले में केन नदी के तटों पर स्थित सौ से अधिक ग्रामों से होकर गुजरे। इनमें 60 से भी अधिक ग्रामों में रुककर ग्रामवासियों से केन नदी के अतीत एवं वर्तमान स्थिति पर रूबरू चर्चा की। 

यात्रा के दौरान यह एहसास हुआ कि केन नदी का इतिहास अत्यधिक समृद्ध रहा है। नदी के किनारे जहां सैकड़ों छोटे-बड़े धार्मिक स्थल देखने को मिले वहीं पौराणिक एवं प्राचीन कालीन स्मारकों के अवशेष भी जहां-तहां बिखरे पड़े नजर आये। आप लोगों ने बताया कि वास्तव में प्राचीन संस्कृति, इतिहास और नदी का संबंध शोध का बड़ा विषय है। पदयात्रा से पता चला कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना, अजयगढ़, छतरपुर और बांदा जिले में केन नदी पेयजल और सिंचाई का मुख्य श्रोत है।

अविरल से बरसाती बन रही है केन नदी


दस्तावेजों के अनुसार केन नदी बारामासी है। परंतु 33 दिवसीय पदयात्रा के दौरान केन नदी में सतत प्रवाह का अभाव देखा गया। गैरमानसूनी महीनों में नदी अनेक स्थानों पर पूरी तरह सूखी दिखी। इस वर्ष अप्रैल में पण्डवन पुल, अमानगंज के पास नदी में पानी पूरी तरह सूख चुका है। पण्डवन पुल से ऊपर नदी की लम्बाई लगभग 150 किमी है जिसमें से नदी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सूखा देखने को मिला। सहायक नदियों के संगम पर जिसे दुनाव अथाव दोनाव बोलते हैं, पर नदी में ठहरे हुये पानी के तालाब समान बड़े जलकुण्ड पाये गये। 

केन-सोनार नदी दोनाव से नीचे और ऊपर नदी अमूमन सूखी मिली और पदयात्रा नदी के बीचोंबीच चलकर तय की। साथ में नदी तल अनेक स्थानों पर बहुत गहरा है जिसमें पानी भरा हुआ मिला। परंतु नदी अविरलता से निरंतर नहीं बह रही है जिसके लिये ग्रामीण बढ़ती ङ्क्षसचाई की माँग, घटते जंगल और वर्षा अभाव को वजह मानते हैं। गाँववालों ने बताया कि एक दशक पहले नदी में जल प्रवाह की बेहतर स्थिति थी, उनके अनुसार कुछ दशक पूर्व तो नदी पूरी तरह से सदानीरा थी।

अनोखी है केन की भौगोलिक संरचना


पन्ना नेशनल पार्क के भीतर प्रवाहित केन का दृश्य।

केन नदी की भौगोलिक संरचना बहुत अनोखी है। केन घडिय़ाल प्राणी उद्यान में स्थित प्रसिद्ध स्नेह झरना, अमेरिका के ग्राण्ड केनयन घाटी का प्रतिबिम्ब है। उसी तरह पण्डवन झरना भी मनोहारी है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के अन्दर स्थित गहरी घाटी झरना और खड़ी पहाडिय़ां भी अद्भुत हैं। इसके अलावा नदी के मध्यम भाग में ग्रेनाइट, डालोमाइट, क्वार्टजाइट, काग्लोमरेट पत्थरों से बनी चट्टानें और पत्थरों के टुकड़े देखने को मिले। नदी के अन्दर सहजर नामक  कीमती पत्थर भी देखा गया। केन नदी तल में अनेक स्थानों पर गहरे, लम्बे कुण्ड बने हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में डबरा, दहार, दौं आदि नामों से जाना जाता है। 

इन कुण्डों में सालभर पानी भरा रहता है जिससे ग्रामीणें के पीने, खेती, पशुपालन, नौकाचालन, मछली पकडऩे की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इसके अलावा झीरना, झीना केन नदी का विशेष गुण है। भू-जल के रिसरिसकर नदी तट अथवा तल पर आकर नदी में मिलने को ग्रामीण झीरना बोलते हैं। नदी के झीरने के गुण के कारण ही गहरे नदी तलों खासतौर पर दहार में वर्षभर ताजा पानी देखने को मिलता है। गाँववालों के अनुसार बढ़ते भू-जल दोहन से जलागम क्षेत्र में केन नदी का झिरना कम होता जा रहा है जिससे नदी जल्दी सूख जाती है।

तटवर्ती ग्रामों के सूख चुके 95 फीसदी कुँये


केन नदी के तटवर्ती 95 फीसदी गाँवों में कुँये सूख चुके हैं। गर्मियों के समय हैण्डपम्प भी बेकार होते जा रहे हैं। साथ में अनेकों स्थानों पर कुँओं, हैण्डपम्पों में समरसिबल लगाने का चलन बढ़ता देखा गया है। गाँवों में तालाब भी उपेक्षा का शिकार हैं। गाँववालों के अनुसार केन नदी में कालांतर में जल प्रवाह लगातार घटता जा रहा है। जिसकी वजह से गाँव के जल श्रोतों कुँये, तालाबों, हैण्डपम्पों पर बहुत बुरा असर हुआ है। केन नदी में पानी की मात्रा कम होने से सैकड़ों मछवारों, मल्लाहों, नदी तट-तल पर बारीतरी की खेती करने वाले किसानों पर बहुत बुरा असर हुआ है।

प्रदूषण से नष्ट हो रहा प्राकृतिक गुण



केन नदी के किनारे बेरहमी के साथ काटे गये वृक्ष का द्रश्य। 


केन नदी का म.प्र. की स्वच्छ नदियों में गिना जाता है। अनेक स्थानों पर ग्रामीण नदी का पानी पीते हैं। जिसका बहुत बड़ा श्रेय गहरे दहार और झीरने के प्राकृतिक गुण को जाता है। परंतु नदी तट पर बसे बांदा शहर उ.प्र., पन्ना शहर (किलकिला धारा के जरिये), अमानगंज तहसील (मिढ़ासन नदी के माध्यम से) और शाहनगर तहसील का गंदा पानी बिना उपचारित किये केन नदी में मिल रहा है। इन शहरों से बायोमेडिकल वेस्ट और विषैले अपशिष्ट केन नदी में बहाये जा रहे हैं जिससे नदी जल की गुणवत्ता के साथ-साथ नदी जैव विविधता पर भी विपरीत असर हो रहा है। जिस पर संबंधित विभागों और सरकार का ध्यान नहीं गया है।

संकट में है केन नदी की जैव विविधता


जैव विविधता की दृष्टि से केन नदी समृद्ध है। नदी के तटों पर यात्रा के दौरान 50 से अधिक पेड़ों, 30 से अधिक वनस्पतियों, 30 से अधिक स्तनधारी, सरीसृप, कीट पतंगों की प्रजातियां देखी गईं। नदी जल और तट पर 60 से अधिक प्रजाति के पक्षी देखने को मिले। साथ में 12 से अधिक प्रकार की मछलियों के नाम सुनने को मिले। इसके अलावा केन नदी में कई प्रकार और आकार की सीपियां भी देखने को मिलीं। 

कई स्थानों पर बिलकुत्ता (नदी झीगुर), केकड़ा और जुगनू भी देखने को मिले। पदयात्रा के दौरान नदी तटों पर अवांछित खरपतवार और पेड़ जैसे विलायती कीकर, लैन्टाना, गाजर घास आदि भी बहुत बड़े भू-भाग पर फैली हुई मिली। मछवारों के अनुसार नदी में महाशीर मछली की संख्या बहुत कम हो गई है। ग्रामीणों ने बताया कि केन नदी पर बनी बांधों, बैराजों की योजनाओं और अनियंत्रित शिकार से जलीय जीवों मछलियों, कछुओं, मगर, घडिय़ाल की संख्या भी बहुत कम होती जा रही है।

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अवैध हीरा खदानों में प्रशासनिक अधिकारियों का छापा


  •   रमखिरिया हीरा खदान क्षेत्र से 10 एलएनटी मशीनें हुईं जब्त
  •   छापामार कार्यवाही से हीरा खदान संचालकों में मचा हड़कम्प



हीरा खदानों में छापामार कार्यवाही के दौरान मौके पर मौजूद अधिकारी।

। अरुण सिंह 

पन्ना। बेशकीमती रत्न हीरों की उपलब्धता के लिये शहूर पन्ना जिले के बृजपुर क्षेत्र में अवैध रूप से चलने वाली उथली हीरा खदानों में दबिश देकर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बुधवार को सुबह छापामार कार्यवाही की गई। अचानक हुई इस कार्यवाही से हीरा खदान संचालकों में हड़कम्प मचा हुआ है। कलेक्टर पन्ना मनोज खत्री के निर्देशन में एसडीएम विनय द्विवेदी, थाना प्रभारी बृजपुर अवधेश प्रताप ङ्क्षसह बघेल व हीरा इन्स्पेक्टर द्वारा पुलिस बल की मौजूदगी में मौके से 10 एलएनटी मशीनें जब्त की गई हैं। इन भारी भरकम मशीनों द्वारा अवैध रूप से चलाई जा रही हीरा की खदानों में उत्खनन का कार्य किया जा रहा था।
मामले के संबंध में जानकारी देते हुये एसडीएम पन्ना विनय द्विवेदी ने चर्चा करते हुये बताया कि कलेक्टर के निर्देश पर आज सुबह 8 बजे से कार्यवाही शुरू की गई। बृजपुर से लगभग 1 किमी दूर रमखिरिया हीरा खदान क्षेत्र में बाघिन नदी के किनारे अमला स्थित खदानों से एलएनटी मशीनें जब्त की गई हैं। श्री द्विवेदी ने बताया कि यहां संचालित होने वाली अधिकांश खदानें निजी भूमि पर चल रही हैं, जिनके लिये हीरा कार्यालय से कोई पट्टा जारी नहीं हुआ। जाहिर है कि खदानें अवैध रूप से चलाई जा रही थीं। 
सूत्रों के मुताबिक इस क्षेत्र में उत्खनन के जितने पट्टे हीरा कार्यालय से जारी हुये हैं, उससे चार गुना से भी अधिक खदानें मौके पर चल रही हैं। इन सभी खदानों में उत्खनन के लिये जेसीबी व एलएनटी मशीनों का उपयोग किया जाता है। जिसके चलते स्थानीय मजदूरों को हीरा खदानों में कोई काम नहीं मिल पाता। चूंकि इलाके में चलने वाली अधिकांश खदानें बिना पट्टे के अवैध रूप से चलाई जा रही हैं, इसलिये यहां से जो भी हीरे निकलते हैं, उन्हीं हीरा कार्यालय में जमा कराने के बजाय चोरी छिपे विक्रय कर दिया जाता है। जिससे शासन को प्रति माह लाखों रू. के राजस्व की हानि भी होती है।

70 किमी. क्षेत्र में फैली है हीरा धारित पट्टी


 हीरा धारित क्षेत्र में चलने वाली उथली खदान का दृश्य।

पन्ना जिले में हीरा धारित पट्टी का विस्तार लगभग 70 किमी है, जो पहाड़ीखेरा से लेकर मझगवां तक फैली है। इस हीरा धारित पट्टी की चौड़ाई 30 किमी है। हीरे के प्राथमिक श्रोतों में मझगवां किम्बर लाइट पाईप एवं हिनौता किम्बर लाइट पाईप पन्ना जिले में ही स्थित है। यह हीरा उत्पादन का प्राथमिक श्रोत है, जो पन्ना शहर के दक्षिण-पश्चिम में 20 किमी की दूरी पर है। यहां अत्याधुनिक संयंत्र के माध्यम से हीरों के उत्खनन का कार्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) द्वारा संचालित किया जा रहा है। एनएमडीसी के अलावा पन्ना के आस-पास हीरा धारित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों द्वारा उथली हीरा खदानें चलाई जाती हैं।

सैकड़ों की संख्या में चल रहीं अवैध खदानें


खदान से निकली चाल में हीरों की तलाश करते मजदूर।

वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद से अधिकांश हीरा धारित क्षेत्र वन सीमा के भीतर आ जाने के कारण वहां पर वैधानिक रूप से हीरों का उत्खनन बन्द हो गया है। शासकीय राजस्व भूमि बहुत ही कम है जहां हीरों की उपलब्धता है। ऐसी स्थिति में निजी पट्टे की भूमि व वन क्षेत्र में ही अधिकांश खदानें संचालित हो रही हैं जिनमें ज्यादातर अवैध हैं। हीरा की उपलब्धता वाले प्रमुख क्षेत्रों में सकरिया, नरेन्द्रपुर, जनकपुर, खिन्नीघाट, पटी, राधापुर, महुआ टोला, पुखरी, हर्रा चौकी, इमला डाबर, रानीपुर, गोंदी करमटिया, विजयपुर, बाबूपुर, हजारा, मडफ़ा, मरका, रमखिरिया, सेहा सालिकपुर, सिरसा, द्वारी, थाड़ी पाथर, पतालिया, चांदा, जमुनहाई, डाबरी, व गऊघाट आदि हैं। इन इलाकों में सदियों से हीरों का उत्खनन हो रहा है, लेकिन हीरों की उपलब्धता के बावजूद यहां भीषण गरीबी है।

व्यापारी व तस्कर हो रहे मालामाल


 खदानों से प्राप्त अनगढ़ हीरे।
पन्ना की धरती से निकलने वाला हीरा विश्व में श्रेष्ठतम गुणवत्ता का माना जाता है, यही वजह है कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पन्ना की खदानों से निकलने वाले हीरों की सर्वाधिक माँग रहती है। लेकिन इस दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि बेशकीमती रत्न हीरा की उपलब्धता के बावजूद इसकी चमक यहां के गाँवों में कहीं दिखाई नहीं देती। अंचल के गरीब हरिजन आदिवासियों और ग्रामीणों से तस्कर व हीरों के व्यापारी बेशकीमती हीरे अत्यधिक कम कीमत पर हथिया लेते हैं, फलस्वरूप व्यापारी व तस्कर मालामाल हो रहे हैं और हीरों के मालिक आज भी फटेहाल और गरीब हैं। कुछ दशक पूर्व तक हीरा खदानों में मजदूरों को काम भी मिल जाता था लेकिन अब मजदूरों की जगह मशीनों ने ले ली है, जिससे हीरा खदानों के द्वारा मिलने वाला रोजगार भी ठप्प हो गया है।

चोरी छिपे होती है हीरों की बिक्री

जिले में चलने वाली उथली हीरा खदानों से निकलने वाले 90 फीसदी से भी अधिक हीरे चोरी छिपे विक्रय कर दिये जाते हैं। हीरा कार्यालय में सिर्फ नाम मात्र के ही हीरे जमा होते हैं। इन जमा होने वाले हीरों से शासन को इतना राजस्व भी नहीं मिल पाता कि हीरा कार्यालय का स्थापना व्यय निकल सके। मशीनों के उपयोग का चलन होने से अब उथली खदानें गहरी खदानों में तब्दील हो गई हैं, जिनकी लागत अधिक होने के चलते अब खदानों पर प्रभावशाली लोगों और दबंगों का ही बर्चस्व है। 
आर्थिक रूप से कमजोर गरीबों की पहुँच से हीरा खदानें दूर हो गई हैं। उनकी पट्टे की जमीनों पर भी दबंगों द्वारा ही खदानें चलाई जा रही हैं। जानकार बताते हैं कि मजदूरों की जगह मशीनों का उपयोग इसलिये किया जाता है क्योंकि मशीनों से कम समय में अधिक काम होता है तथा मजदूरों की तुलना में लागत भी कम आती है। यही वजह है कि हीरा धारित क्षेत्रों में हर तरफ जेसीबी व एलएनटी मशीनें धुंआधार उत्खनन करते नजर आती हैं।

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Wednesday, April 11, 2018

शातिर शिकारी को चीतल के बच्चे ने दे दी मात

  •   नदी में पानी पीने आये चीतलों के झुण्ड पर तेंदुआ ने किया था हमला
  •   माँ से पीछे छूट चुके बच्चे ने चकमा देकर बचाई अपनी जान



जंगल में चौकन्ना होकर खड़ा चीतलों का झुण्ड 

अरुण सिंह,पन्ना। जंगल की निराली दुनिया में नित नये और अचंभित कर देने वाले नजारे देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक हैरतअंगेज नजारा म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में 10 अप्रैल मंगलवार की सुबह डेढ़ दर्जन से भी अधिक पर्यटकों ने साँसें रोके हुये दिल थामकर देखा। जंगल के सबसे शातिर और चालाक शिकारी तेंदुआ ने केन नदी से पानी पीकर लौट रहे चीतलों के झुण्ड पर अचानक हमला बोल दिया। इस हमले में चीतल तो कुलांचे भरते हुये भाग निकले लेकिन तकरीबन डेढ़ माह का एक छोटा बच्चा माँ से पीछे रह गया। जैसे ही तेंदुये की नजर इस बच्चे पर पड़ी, तो वह उसे दबोचने के लिये दौड़ा, लेकिन इस बच्चे ने फुर्ती दिखाते हुये तेंदुये को ऐसा चकमा दिया कि शातिर शिकारी भी थककर हार मान बैठा।
उल्लेखनीय है कि बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व में प्रतिदिन भ्रमण के लिये बड़ी संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक आते हैं। मौजूदा समय यहां पर तीन दर्जन से भी अधिक बाघ जहां स्वच्छन्द रूप से विचरण करते हैं वहीं जंगल का राजकुमार कहे जाने वाले तेंदुओं की भी अच्छी खासी तादाद है। रोज की तरह मंगलवार की सुबह जिप्सियों में सवार पर्यटक मड़ला प्रवेश द्वार से टाईगर रिजर्व के भ्रमण हेतु निकले। चार जिप्सियां आगे-पीछे एक ही मार्ग पर चल रही थीं। मड़ला प्रवेश द्वार से लगभग 9 किमी दूर मड़ला वन परिक्षेत्र के मगर डबरी में केन नदी से पानी पीकर लौट रहे चीतलों के झुण्ड को जब पर्यटकों ने देखा तो जिप्सियों की रफ्तार थम गई। इस अद्भुत दृश्य को पर्यटक अपने कैमरों पर कैद करने लगे। उस समय किसी को भी यह आभास नहीं था कि कोई शातिर शिकारी पीछे पहाड़ी में छिपकर घात लगाये बैठा है।

तेंदुआ ने किया अचानक हमला


शातिर शिकारी तेंदुआ जिसका हमला नाकाम हुआ।

पन्ना टाईगर रिजर्व के टूरिस्ट गाईड पुनीत कुमार शर्मा ने बताया कि सुबह लगभग 7.20 बजे चीतलों के इस झुण्ड को जिप्सियों में सवार पर्यटक जब अपलक निहार रहे थे। उसी समय पीछे की पहाड़ी पर घात लगाये बैठा तेंदुआ आहिस्ता-आहिस्ता उतरा और जिप्सियों के ठीक बगल से निकलकर चीतलों के झुण्ड पर धावा बोल दिया। अचानक घटित इस वाकये को इतने निकट से देख कई पर्यटकों की तो चीख निकल गई। बेहद चौंकन्ने और सजग होकर चल रहे चीतलों के झुण्ड को जैसे ही खतरे का आभास हुआ वे कुलाचें भरते हुये अदृश्य हो गये, लेकिन एक छोटा बच्चा पीछे छूट गया।

नन्हे चीतल ने दिखाई गजब की फुर्ती


तकरीबन डेढ़ माह के नन्हे चीतल को अकेला देख शातिर शिकारी तेंदुआ उसकी ओर लपका, तब ऐसा लगा कि कुछ ही क्षणों में चीतल का यह बच्चा तेंदुये के जबड़े में होगा। लेकिन यह क्या इस नन्हे से चीतल ने संकट की इस घड़ी में गजब की फुर्ती दिखाई और इधर से उधर कुलाचें भरते हुये तेंदुये को ऐसा चकमा दिया कि तेंदुये ने भी हार मान ली और चीतल का बच्चा कुलाचें भरते हुये अपने कुनबे के बीच सुरक्षित जा पहुँचा। इस पूरे घटनाक्रम को देख रोमांच से भरे पर्यटक अत्यधिक प्रसन्न नजर आये। उन्होंने इस भ्रमण को अविस्मिरणीय बताते हुये कहा कि वनराज के दर्शन भले नहीं हुये लेकिन जंगल के राजकुमार व चीतलों ने रोमांचित कर आज के भ्रमण को सार्थक और यादगार बना दिया है।
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Monday, April 9, 2018

महुआ फूलों की गंध से महक रहा पन्ना का जंगल

  • ग्रामीण अंचलों में महुआ सीजन किसी उत्सव से कम नहीं
  • सुबह 5 बजे से ही महुआ बीनने निकल पड़ते हैंं ग्रामीण


 पेड़ के नीचे महुआ लिये प्रसन्न मुद्रा में खड़ी महिला।

। अरुण सिंह 

पन्ना। गर्मी के इस मौसम में पन्ना जिले का जंगल महुआ फूलों की गंध से महक रहा है। सुबह 5 बजे से ग्रामीण महुआ बीनने के लिये जंगल की ओर कूच कर जाते हैं। वन क्षेत्र के आस-पास रहने वाले आदिवासियों के लिये तो महुआ का सीजन किसी उत्सव से कम नहीं होता। सुबह के समय यहां शीतल हवाओं व सफेद रसभरे महुआ फूलों की महक से वातावरण में मादकता इस कदर घुल जाती है कि गहरी सांस लेने भर से मन प्रफुल्लित और मदहोश हो जाता है। कल्दा पठार में आदिवासी समाज के लिये महुआ के फूल रोजी-रोटी का जरिया है, इस मौसम में आदिवासियों का पूरा कुनबा महुआ फूल चुनने में लगा रहता है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के दक्षिण वन मण्डल के अन्तर्गत आने वाले कल्दा पठार के जंगल में महुआ वृक्षों की भरमार है। महुआ के अलावा भी यहां के जंगल में हर्र, बहेरा, आंवला, चिरौंजी का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है। गर्मी का यह मौसम मार्च से लेकर मई तक कल्दा पठार के आदिवासियों के लिये बहुत अहम होता है, क्यों कि इसी सीजन में महुआ के वृक्षों से सफेद रसभरे फूल टपकते हैं। इन महुआ फूलों को एकत्र कर आदिवासी सुखाते हैं, जिससे उन्हें इतनी आय हो जाती है कि पूरे वर्ष भर उनका गुजारा हो जाता है। 

जैव विविधता से परिपूर्ण कल्दा के जंगल में महुआ के वृक्ष बहुतायत से पाये जाते हैं, नतीजतन यह इलाका महुआ फूल व गोही के उत्पादन में अग्रणी है। इन दिनों सुबह 5 बजे से ही आदिवासी बांस की टोकरियां लेकर कुनबा सहित महुआ फूल चुनने के लिये जंगल में निकल जाते हैं और दिन ढलने तक वृक्षों से टपकने वाले महुआ फूलों का संग्रहण करते हैं। इस सीजन में पठार के आदिवासियों की यह दिनचर्या बन जाती है।

वनोपज है आदिवासियों के जीवन का आधार


महुआ फूल बीनते हुये महिला व बच्चे।
श्यामगिरी में महुआ फूल का संग्रहण कर रहे कुसुआ आदिवासी व तुलसी बाई ने बताया कि कल्दा पठार के श्यामगिरी सहित रामपुर, मैनहा, पिपरिया, जैतुपुरा, टोकुलपोंडी, भोपार, कुसमी, झिरिया व डोडी आदि में 50 ट्रक से भी अधिक महुआ फूल का संग्रहण हो जाता है। आदिवासियों ने बताया कि पेडों से इस कदर महुआ फूल टपकते हैं कि पूरे दिन चुनने के बाद भी पूरे फूल हम नहीं चुन पाते। इस सीजन की सबसे बड़ी खूबी और विशेषता यह भी होती है कि महुआ फूल आने पर बिछुड़े परिजनों का भी मिलन हो जाता है।

पठार के जो लोग रोजी रोटी की तलाश व अन्य कारणों से बाहर चले जाते हैं वे भी इस सीजन में वापस घर लौट आते हैं। पूरा कुनबा साथ मिलकर महुआ फूलों के संग्रहण में जुटता है ताकि पूरे साल के खर्च की व्यवस्था हो सके। कुसुआ आदिवासी ने बताया कि अमदरा, मैहर, पवई व सलेहा के व्यापारी यहां आकर आदिवासियों से महुआ खरीदकर ले जाते हैं। सीजन में यहां एक व्यक्ति 5 से 6 क्विंटल महुआ एकत्र कर लेता है जो 15 से 20 रू. प्रति किग्रा. की दर से बिकता है। हर्र, बहेरा, आंवला, चिरौंजी व शहद से भी पठार के आदिवासियों को आय हो जाती है। यहां के लोग खेती किसानी से कहीं ज्यादा वनोपज पर ही आश्रित रहते हैं, जंगल यहां के आदिवासियों के जीवन का आधार है।

भालुओं का हर समय रहता है खतरा


 महुआ लेकर जाती महिलायें।
पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र व कल्दा पठार के जंगल में जहां महुआ के पेड़ बहुतायत में हैं, वहां भालुओं का खतरा भी हर समय बना रहता है। महुआ फूल चूंकि भालुओं का प्रिय भोजन है, इसलिये महुआ फूल बीनने के लिये जंगल जाने वालों का आमना-सामना भालुओं से यदा-कदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी भालू हमला भी कर देते हैं। इस खतरे से बचने के लिये वन क्षेत्र के लोग आमतौर पर महुआ बीनने के लिये समूह में जंगल जाते हैं, वहीं हर समय सजग और चौकन्ने भी रहते हैं ताकि भालुओं द्वारा यकायक हमला करने की स्थिति में बचाव कर सकें। महुआ सीजन में भालुओं के हमले की सबसे ज्यादा घटनायें होती हैं। जानकारों के मुताबिक छोटे बच्चों वाली मादा भालू ज्यादा आक्रामक और हमलावर होती है। यदि धोखे से भी किसी ने उसके बच्चों की तरफ रुख किया तो मादा भालू बच्चों को असुरक्षित जान हमला बोल देती है।

पत्ते जलाने से भड़क जाती है आग

महुआ सीजन गर्मी के मौसम में आता है। तेज धूप और गर्मी पडऩे पर ही महुआ फूल नीचे टपकते हैं। चूंकि गर्मी में पतझड़ भी होता है जिससे महुआ वृक्ष के नीचे बड़ी मात्रा में पत्ते जमा हो जाते हैं जिसके चलते महुआ फूल इन पत्तों के बीच से बीनने पर काफी असुविधा होती है। इसे दूर करने के लिये लापरवाहीवश ग्रामीण पेड़ के नीचे सफाई करने के लिये पत्तों में आग लगा देते हैं, यह आग फैलकर कभी-कभी जंगल को ही अपनी चपेट में ले लेती है जिससे वन व वन्य प्राणियों को नुकसान होता है। महुआ फूल बीनने वालों को चाहिये कि वे पत्तों पर आग लगाने के बजाय पत्तों को वहां से हटाकर पेड़ के नीचे की सफाई करें ताकि जंगल की आग से सुरक्षा हो सके।

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