Thursday, September 20, 2018

औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों का पन्ना में अकूत भण्डार

  • हर्बल उद्योगों से रोजगार के नये अवसरों का हो सकता है सृजन
  • ऑवला उत्पादन के मामले में पन्ना जिला प्रदेश में अग्रणी



। अरुण सिंह 

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले को प्रकृति ने अनगिनत सौगातों से नवाजा है। यहां की रत्नगर्भा धरती में बेशकीमती रत्न हीरा ही नही अपितु दुर्लभ जड़ी बूटियों का भी अकूत भण्डार है। लेकिन प्रकृति प्रदत्त इन सौगातों का इस क्षेत्र के विकास व रोजगार के नये अवसरों को सृजित करने की दिशा में सार्थक उपयोग नहीं किया जा सका। जबकि पन्ना जिले में औषधि एवं हïर्बल उद्योगों के विकास की विपुल संभावनायें मौजूद हैं। यहां के समृद्ध वनों में औषधीय गुणों से सम्पन्न वनस्पतियों व वन औषधियों का भण्डार हैं। ऑवला उत्पादन के मामले में तो पन्ना जिला प्रदेश में अग्रणी है। यदि यहां पर वनौषधि उद्योग को बढ़ावा मिले तो इस पिछड़े जिले की भी तस्वीर बदल सकती है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के 50 फीसदी से भी अधिक क्षेत्र में आज भी जंगल है।उत्तर वन मण्डल में सारंगधर की पहाडिय़ों से लेकर कालींजर तक तथा पन्ना शहर के निकट स्थित मनोरम स्थल कउवा सेहा से लेकर देवगांव के पहाड़ों तक चारों तरफ वनौषधियों का अकूत भण्डार मौजूद है। जिले का दक्षिण कल्दा पठार जो पवई और शाहïनगर दो विकासखण्डों की सीमा को घेरता है, यहां के सघन वनों में प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। 

जानकारों का कहना है कि पठार में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों की तासीर हिïमालय में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों से मिलती जुलती हैं। वनौषधियों के मामले में यह वन क्षेत्र प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। बताया जाता है कि देश के 25 आयुर्वेदिक ऋषियों में 19 ऋषि इसी क्षेत्र में रहे हैं। प्राकृतिक ऑवले की उपलब्धता के मामले में तो इस जिले का कोई सानी नहीं है।

पन्ना जिले के ऑवले प्राकृतिक गुणों से भरपूर होते हैं, यही वजह है कि आयुर्वेद की फैक्ट्रियों में पन्ना के ऑवले की बहुत अधिक मांग रहïती है। यहां के ऑवले देश के विभिन्न हिस्सों व प्रान्तों में जाते हैं। जिले में प्राकृतिक रूप से ऑवले की प्रचुर उपलब्धता को देखते हुए डेढ़ दशक पूर्व प्रदेश के तत्कालीन वन मंत्री ने पन्ना को ऑवला जिला घोषित किया था। उस समय यहï योजना भी बनाई गई थी कि बिगड़े वनों की रिक्त पड़ी भूमि में ऑवला वृक्षों का रोपण किया जायेगा। अजयगढ़ की घाटी को ऑवला घाटी के रूप में विकसित किये जाने की भी बात कही गई थी। लेकिन सारी योजना धरी की धरी रह गई। ऑवला से बनने वाले उत्पादों के लिए यहां पर अभी तक कोई
बड़ा उद्योग स्थापित नहीं हो सका है। 

जंगलों की कटाई से उजड़ रही हैं वनौषधियां 

पन्ना के विकास तथा यहां के लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस व सार्थक प्रयास न होने से जिले के अधिसंख्य लोग उत्खनन और जंगल की अवैध कटाई में लिप्त हैं। तेजी के साथ यहां के जंगलों की अवैध कटाई होने के कारण प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी बूटियों का अद्भुत संसार भी उजड़ रही हैं। 
यदि प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली इन जड़ी-बूटियों के संरक्षण व संवर्धन हेतु प्रभावी पहल की जाये और वन क्षेत्रों के ग्रामों में इनकी वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जाये तो पन्ना जिला बहुमूल्य जड़ी-बूटियों का एक बहुत बड़ा स्त्रोत बन सकता है। ऐसा होने पर उद्योगविहीन इस जिले की बेरोजगारी की समस्या जहां दूर हो सकेगी, वहीं औषधि व हर्बल उद्योगों की स्थापना का भी मार्ग प्रशस्त होगा। 

इन जड़ी-बूटियों की है प्रचुर उपलब्धता 

ऑवले के अलावा पन्ना जिले के जंगलों व पहाड़ों में सफेद मूसली, तुलसी,अश्वगंधा, शतावर, नागरमोथा, अचार गुठली, शहद, महुआ गुठली, हर्र,बहेरा, काली मूसली, मुश्कदाना, लेमन ग्रास, कलिहारी, सर्पगंध, कांगनी,इमली, चिरौंटा, लटजीरा, जामुन, अर्जुन छाल, ब्राह्मी, बिहारीकंद,मुलहटी, गिलोय, गोखरू, शंखपुष्पी, पुनर्नवा, हर सिंगार, भटकटइया और ईसबगोल जैसी वनौषधियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं।

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दैनिक जागरण में छपी खबर

Monday, August 20, 2018

जर्जर हो चुकी धरोहरें बदल सकती हैं पन्ना जिले की तकदीर

  •   वास्तुशिल्प की दृष्टि से बेजोड़ है अजयगढ़ का किला
  •   अनगिनत खूबियां फिर भी नहीं  जीत पा रहा  पर्यटकों का मन
  •   सही  ढंग से सुनियोजित विकास हो तो किले बन सकते हैं आकर्षण का केन्द्र



पन्ना जिले के अजयगढ़ दुर्ग में स्थित रंगमहल का दृश्य। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। सदियों पुराने जर्जर और बदहाल हो  चुके किले पन्ना जिले की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकते  हैं। यदि इन प्राचीन धरोहरों का सही  ढंग से कायाकल्प कराकर सुनियोजित विकास किया जाए तो ये देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकते  हैं। इस जिले में भव्य और अनूठे मन्दिरों की पूरी श्रृंखला व प्राकृतिक मनोरम स्थलों की भरमार है , फिर भी पन्ना पर्यटन की दृष्टि से अपनी पहचान बना पाने में कामयाब नहीं हो सका है। पन्ना टाईगर रिजर्व की दम पर खजुराहो  में पर्यटन उद्योग खूब फल फूल रहा है और सब कुछ रहते हुए भी राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में पन्ना आज भी उपेक्षित और दीनहीन बना हुआ है।
किसी समय चन्देल राजाओं के शक्ति का केन्द्र रहा पन्ना जिले का ऐतिहासिक अजयगढ़ दुर्ग स्वाधीनता के बाद प्रशासनिक उपेक्षा के चलते खण्डहर में तब्दील होता जा रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी की दूरी पर विन्ध्यांचल की दुर्गम पर्वत श्रेणियों पर स्थित यह अजेय दुर्ग अपने जेहन में भले ही  वीरता की अनेकों गौरव गाथायें सहेजे है , लेकिन इसके बावजूद यहां  भूले भटके भी पर्यटक दिखाई नहीं  देते। चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित इस दुर्ग की वास्तुकला के अवशेषों का अवलोकन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि खजुराहो और कालींजर के विश्व प्रसिद्ध शिल्प के शिल्पियों के हांथ में इतनी पैनी छैनियां नहीं  थीं, जितनी की अजयगढ़ दुर्ग के वास्तुकारों के पास थीं। वास्तव में अजयगढ़ का किला वास्तु शिल्प की दृष्टि से अधिक कलात्मक, अनूठा और बेजोड़ है।
उल्लेखनीय है कि खजुराहो  शिल्प में यक्ष-यक्षिणी की मैथुन मुद्राओं को पाषाण पर उकेर कर जहाँ जीवंत रूप प्रदान किया गया है, वहीँ अजयगढ़ की शिल्पकला सत्यं शिवम सुन्दरम् की गरिमा से युक्त है। राजाओं और महाराजाओं के उत्थान एवं पतन के इतिहास को अपने जेहन में समेटे अजयगढ़ दुर्ग का प्राकृतिक सौन्दर्य चिरस्थायी है । पर्वत शिखरों से फूटते झरने, नागिन सी बल खाती घाटियां, मनोरम गुफायें, गहरी खाईयां, विशाल सरोवर व श्याम गौर चïट्टानें दर्शकों का मन मोह लेती  हैं। इसके बावजूद इस अनूठे दुर्ग की लगातार घोर उपेक्षा हुई है , जिससे यह अभी तक पर्यटन के मानचित्र से ओझल बना हुआ है । गौरतलब है  कि चन्देल राजाओं द्वारा निर्मित इस भव्य दुर्ग के निर्माण में पत्थरों का तो प्रयोग किया गया है  किन्तु उनको जोडऩे में कहीं  भी मसाले का प्रयोग नहीं  हुआ । जानकारों का कहना है  कि इसके निर्माण में गुरूत्वाकर्षण के सिद्धातों के आधार पर कोणीय संतुलन विधि का प्रयोग किया गया है । प्राकृतिक झंझावातों, प्रकोपों, मानवीय युद्धों के विध्वंशक प्रहारों तथा अभिशापों को झेलने वाला यह दुर्ग अपनी भव्यता, अद्वितीयता और सुदृढ़ता का परिचय दे रहा है , जो निश्चित ही  खजुराहों  तथा अन्य ऐतिहासिक स्थलों से किसी भी दृष्टि से कम नहीं है।

धरमसागर तालाब स्थित किले व मकबरे को जीर्णोद्धार की दरकार


धरमसागर तालाब के किनारे स्थित प्राचीन मकबरा । फोटो - अरुण सिंह 

मन्दिरों के शहर पन्ना में प्राचीन धरमसागर तालाब के किनारे जीर्ण-शीर्ण हालत में मौजूद किले व यहां आसपास स्थित प्राचीन मकबरों  को भी जीर्णोद्धार की दरकार है । इन प्राचीन धरोहरों  का संरक्षण व समुचित देखरेख न हो  पाने के कारण पेड़-पौधों और वनस्पतियों के उगने से यह क्षतिग्रस्त हो  रही हैं। यहाँ स्थित किले के आगे वाले हिस्से को यादवेन्द्र क्लब के नाम से जाना जाता है  जिसका निर्माण तत्कालीन पन्ना नरेशों ने कराया था। यदि जर्जर हो  चुके किला सहित यादवेन्द्र क्लब का जीर्णोद्धार कराकर यहाँ  का सुनियोजित विकास कराया जाए तो धरमसागर तालाब का सौन्दर्य जहां  कई गुना बढ़ जाएगा वहीं  यह स्थल पर्यटकों के पसंदीदा स्थलों में शुमार हो  सकता है। इसी तरह पन्ना जिले के आदर्श ग्राम महोबा में भी प्राचीन दुर्ग है जो उपेक्षा के चलते जीर्ण-शीर्ण और जर्जर हो  चुका है। इस दुर्ग को लेकर भी अनेकों गाथायें प्रचलित  हैं, लेकिन इस प्राचीन धरोहर को भी संरक्षित करने की दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।

धरमसागर तालाब के किनारे स्थित प्राचीन किला। फोटो - अरुण सिंह 

अजयगढ़ दुर्ग का हो विकास : के.पी. सिंह

अजयगढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ एक कला तीर्थ भी है , जिसका संरक्षण किया जाकर सुनियोजित विकास कराया जाना चाहिए। इस दुर्ग के विकास व जीर्णोद्धार के कार्य में विशेष रुचि रखने वाले अजयगढ़ निवासी के.पी. सिंह का कहïना है  कि धरातल से लगभग 600 फिट की ऊँचाई पर पहाड़ के ऊपर स्थित इस दुर्ग में प्रवेश के लिए सात द्वार थे जो अधिकांश अब जर्जर व धराशायी हो  चुके हैं । मौजूदा समय यहां  प्रवेश के लिए सिर्फ दो द्वार बचे हैं । जिनमें एक मुख्य दरवाजा तथा दूसरा तरौनी दरवाजा कहलाता है । अभी इस दुर्ग तक पहुंचने के लिए सीढिय़ों से जाना पड़ता है, यदि कालींजर किले की तर्ज पर यहां  भी सड़क मार्ग का निर्माण हो  जाए तो आवागमन सुगम हो  जाएगा और लोग इस अनूठे दुर्ग को देखने आने लगेंगे।
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Sunday, August 12, 2018

पन्ना में पर्यटन से रोजगार के नये अवसरों का होगा सृजन

  • प्रकृति व्याख्यान केन्द्र मड़ला में आयोजित हुई सलाहकार समिति की बैठक
  • पर्यावरण व वन्य प्राणी संरक्षण तथा पर्यटन विकास पर हुई चर्चा



। अरुण सिंह 

पन्ना। कर्णावती व्याख्यान केन्द्र मड़ला में सागर संभाग के कमिश्नर मनोहर दुबे की अध्यक्षता में शुक्रवार को सलाहकार समिति की बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में पर्यावरण व वन्य प्राणी संरक्षण सहित पर्यटन विकास से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। पर्यटन व्यवसाय का लाभ पन्ना टाईगर रिजर्व से लगे ग्रामों के रहवासियों को भी मिले, इस संबंध में भी विस्तृत विचार विमर्श हुआ तथा सदस्यों द्वारा कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये गये।

बैठक के प्रारंभ में क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया ने समिति के सदस्यों को बैठक के एजेण्डे से अवगत कराया, तदुपरान्त बिन्दुवार एजेण्डे में शामिल सभी विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। सभी सदस्यों ने इस बात पर सहमति जताई कि पन्ना टाईगर रिजर्व विकास का वाहक बने, इस दिशा में सार्थक और प्रभावी पहल की जानी चाहिये। 
टाईगर रिजर्व से लगे ग्रामों के लोगों को पर्यटन व्यवसाय का अधिक से अधिक लाभ मिले, इस बात पर विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है, ताकि ग्रामवासी पर्यावरण व वन्य प्राणियों के संरक्षण में रूचि लेने के लिये प्रेरित हो सकें। बिना जन भागीदारी के संरक्षण संभव नहीं है, ऐसी स्थिति में टाईगर रिजर्व से जब ग्रामवासियों को रोजी-रोजगार व आर्थिक लाभ होगा तो वे स्मवेव संरक्षण के लिये आगे आयेंगे।
स्थानीय सलाहकार समिति के सदस्य श्यामेन्द्र सिंह बिन्नी राजा ने पर्यटन को बढ़ावा देकर रोजगार के नये अवसरों के सृजन बावत महत्वपूर्ण सुझाव दिये, जिन पर गहन विचार विमर्श हुआ। बैठक में यह सुझाव भी दिया गया कि पन्ना टाईगर रिजर्व से लगे वे गाँव जो अत्यधिक पिछड़े और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिये चिह्नित किया जाये तथा पर्यटन व्यवसाय से होने वाली आय का उपयोग इन ग्रामों के विकास में किया जाये। पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर एरिया से कितनी दूरी पर व्यवसायिक व अन्य गतिविधि होनी चाहिये, इस संबंध में भी चर्चा हुई और सहमति बनी कि न्यूनतम 250 मीटर दूरी होनी चाहिये।

सलाहकार समिति की बैठक में सदस्यों ने पन्ना टाईगर रिजर्व में पर्यटन को बढ़ावा देने तथा देशी व विदेशी पर्यटकों को पार्क भ्रमण हेतु आकृष्ट करने के लिये उपयोगी सुझाव दिये गये। जिस पर कमिश्नर श्री दुबे व क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व श्री भदौरिया ने सहमति जताई और कहा कि खजुराहो के प्रमुख स्थलों पर होॄडग लगवाई जायेंगी। समिति के अध्यक्ष एवं कमिश्नर सागर संभाग मनोहर दुबे ने कहा कि पन्ना के प्राचीन भव्य मन्दिरों का भी प्रभावी ढंग से प्रचार-प्रसार होना चाहिये, इससे पर्यटकों का आकर्षण बढ़ेगा। आपने कहा कि पन्ना के आस-पास स्थिति ऐतिहासिक व प्राकृतिक महत्व के स्थलों का भी योजनाबद्ध तरीके से विकास होना चाहिये। 

पर्यटक वाहनों की संख्या का हुआ निर्धारण 

बैठक में पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर जोन में भ्रमण के लिये पर्यटक वाहनों की संख्या के संबंध में विचार विमर्श के साथ संख्या का निर्धारण हुआ। मालुम हो कि पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र 543 वर्ग किमी है, जिसके 20 प्रतिशत भाग पर पर्यटन की अनुमति है। इसके लिय दो प्रवेश द्वार मड़ला व हिनौता संचालित है। 
गत वर्ष पन्ना टाईगर रिजर्व में पर्यटकों के भ्रमण हेतु प्रतिदिन 70 वाहन धारण क्षमता निर्धारित थी। लेकिन अब राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण नई दिल्ली की गाइड लाइन के अनुसार पर्यटन वर्ष 2018-19 हेतु कुल 85 वाहन निर्धारित किया गया है। जिसमें प्रवेश द्वार मड़ला से प्रात:कालीन सफारी हेतु 35 वाहन तथा सायंकालीन सफारी हेतु 25 वाहन तथा हिनौता प्रवेश द्वार से प्रात: 15 वाहन एवं सायं 10 हवानों के प्रवेश की अनुमति प्रदान की गई।
  
बफर क्षेत्र में भ्रमण हेतु खुलेगा अकोला गेट 


पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में पर्यटकों के भ्रमण हेतु पर्यटन वर्ष 2018-19 से अकोला प्रवेश द्वार का शुभारंभ किया जायेगा। सलाहकार समिति की बैठक में चर्चा उपरान्त इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की गई। इस नवीन प्रवेश द्वार से प्रतिदिन 15 पर्यटक वाहन भ्रमण हेतु प्रवेश कर सकेगे, जिसमें सुबह 10 वाहन तथा सायंकालीन सफारी के लिये 5 वाहन निर्धारित किये गये हैं। बैठक में कमिश्नर सागर मनोहर दुबे, क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया, कलेक्टर मनोज खत्री, उप संचालक वासु कनौजिया, सहायक संचालक पन्ना व मड़ला सहित सलाहकार समिति के सदस्यगण मौजूद रहे।

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दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर 



दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी बनेगी पन्ना की वत्सला

  •  केरल के नीलांबुर फारेस्ट डिवीजन से मंगाया जायेगा जन्म का  रिकॉर्ड
  •  गिनीज बुक ऑफ  वर्ल्ड  रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने होगी पहल


पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन चुकी उम्रदराज हथिनी वत्सला। फोटो - अरुण सिंह 

अरुण सिंह,पन्ना।  म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व की धरोहर बन चुकी दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला का नाम गिनीज बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने के प्रयास शुरू हो गये हैं।हथिनी वत्सला के जन्म का पूरा  रिकॉर्ड केरल प्रान्त के नीलांबुर फारेस्ट डिवीजन से मगाया जायेगा। यह बात तीन दिवसीय दौरे पर पन्ना आये प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी शहवाज अहमद ने शनिवार को सायं चर्चा के दौरान कही। मालुम  हो कि केरल के नीलांबुर फारेस्ट डिवीजन में जन्मी व पली - बढ़ी यह हथिनी 1972 में वहाँ  से होशंगाबाद  के बोरी अभ्यारण्य में लाई गई थी। इसके बाद वहाँ से यह हथिनी वर्ष 1992 में पन्ना टाइगर रिजर्व पहुंची। तभी से यह यहाँ की शोभा बढ़ा रही है।
उल्लेखनीय है कि लगभग सौ वर्ष की उम्र पार कर चुकी हथिनी वत्सला का  उपयोग पन्ना टाइगर रिजर्व में पूरे डेढ़ दशक तक यहाँ आने वाले पर्यटकों को बाघों का दीदार कराने के लिये किया जाता रहा है। लेकिन अत्यधिक उम्रदराज होने के कारण इसे  आराम की जिंदगी गुजारने के लिये रिटायर कर दिया गया। रिटायरमेंट के बाद से हथिनी वत्सला की पूरी देखरेख की जा रही है। उम्र को देखते हुये वत्सला को जहाँ सुगमता से पचने वाला आहार दिया जाता है,वहीं नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण भी होता है। पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. एस.के. गुप्ता ने बताया कि टाइगर रिजर्व के ही एक नर हांथी ने वर्ष 2003 और 2008 में दो मर्तवे प्राण घातक हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। मदमस्त नर हांथी ने दांतों से प्रहार कर वत्सला का  पेट चीर दिया  था।लेकिन बेहतर उपचार और सेवा से इस बुजुर्ग हथिनी को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया गया। मौजूदा समय यह हथिनी देशी व विदेशी पर्यटकों  लिये जहाँ आकर्षण का केंद्र है,वहीं पन्ना टाइगर रिजर्व के लिये भी किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं है। पीसीसीएफ  श्री अहमद ने बताया कि वत्सला का जन्म रिकॉर्ड नीलांबुर से मंगाने के निर्देश उन्होंने दिये हैं। यदि जरूरत पड़ी तो पन्ना टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ संजीव गुप्ता को रिकॉर्ड लाने के लिये नीलांबुर भेजा जायेगा ताकि वत्सला की उम्र कितनी है,इसकी प्रामाणिक रूप से पुष्टि हो सके।वत्सला के शतायु होने का पन्ना में उत्सव मनाने के साथ ही गिनीज बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने की भी पहल की जायेगी ताकि वत्सला को दुनिया की सबसे बुजुर्ग हथिनी का गौरव हासिल हो सके।

हांथी की 50 से 70 वर्ष होती है औसत उम्र

पन्ना टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव गुप्ता  जो वत्सला की बीते 18 वर्षो से चिकित्सकीय देखरेख कर रहे हैं, उन्होंने बताया कि हांथी की औसत उम्र 50 से 70 वर्ष होती है। 70 वर्ष की उम्र तक हांथी के दांत गिर जाते हैं।आपके मुताबिक वर्ष 2000 में जब उन्होंने देखा था तो वत्सला के एक भी दांत नहीं थे। जबकि महावत का कहना था कि 1995 के बाद वत्सला दांतविहीन हो चुकी थी। दुनिया का सबसे अधिक उम्र का लिन वांग नाम का हांथी ताइवान के चिडिय़ाघर में था जिसकी 86 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो चुकी है। इस तरह से वत्सला जो 95 वर्ष से भी अधिक उम्र की है उसे सबसे उम्रदराज हथिनी कहा जा रहा है।
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Monday, July 30, 2018

बच्चों ने दीवार में चित्र बनाकर दिया बाघ संरक्षण का संदेश

  •   प्रकृति के विविध रूपों को ब्रश व पेंट की मदद से किया साकार
  •   छात्र-छात्राओं की सोच और कला का दीवार में हुआ प्रदर्शन
  •   बाघों को संकट से बचाने व संरक्षण की दिशा में अनूठी पहल


बाघ संरक्षण का सन्देश देने दीवाल पर प्रकृति के विविध रूपों का चित्रण करते स्कूली बच्चे। फोटो - अरुण सिंह 


  अरुण सिंह 

पन्ना। अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस को म.प्र. के पन्ना शहर में आज रविवार को बड़े ही अनूठे अंदाज में मनाया गया। राष्ट्रीय पशु बाघ को बचाने तथा उनके संरक्षण हेतु आम लोगों में जागरूकता पैदा करने के मकसद से शहर के मध्य में स्थित पॉलीटेक्निक कॉलिज की दीवार में चित्र उकेरकर पेंटिंग बनाने की प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस अनूठी प्रतियोगिता में विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं सहित कलाकारों ने बड़े ही उत्साह के साथ भाग लिया। वन विभाग व म.प्र. टाईगर फाउण्डेशन सोसायटी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित हुई इस पेंटिंग प्रतियोगिता को देखने बड़ी संख्या में लोग पहुँचे। निश्चित ही इस आयोजन से अपने वजूद को बचाने के लिये संघर्ष कर रहे संकट से घिरे बाघों के संरक्षण की महत्ता का संदेश आम जनता तक पहुँचेगा।

उल्लेखनीय है कि अवैध शिकार, तेजी से घटते वन क्षेत्र और विकास परियोजनाओं के कारण बाघों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। उनके विचरण क्षेत्र व प्राकृतिक रहवास नष्ट हो रहे हैं, जिसे देखते हुये पूरी दुनिया का ध्यान जंगल की शान कहे जाने वाले इस शानदार वन्य जीव को बचाने और उसे संरक्षित करने की ओर गया है। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व ने तो बाघों के वजूद को बचाने की दिशा में एक नई राह दिखाई है। बीते एक दशक पूर्व तक पन्ना के जंगल में बाघों की संतोषप्रद मौजूदगी थी, लेकिन अवैध शिकार और कुप्रबंध के चलते पन्ना के जंगलों से बाघों का वर्ष 2009 में पूरी तरह से सफाया हो गया। कभी बाघों के लिये प्रसिद्ध रहा पन्ना टाईगर रिजर्व बाघ विहीन होने के साथ ही एक शोक गीत में तब्दील हो गया।

बाघ पुनर्स्थापना  योजना को मिली कामयाबी





पूरी तरह से बाघ विहीन होने के बाद पन्ना टाईगर रिजर्व में बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर से आबाद करने के लिये बाघ पुनस्र्थापना योजना शुरू की गई। इस योजना के तहत पेंच टाईगर रिजर्व से एक नर बाघ तथा कान्हा व बान्धवगढ़ टाईगर रिजर्व से दो बाघिनों को प्रथम चरण में पन्ना लाया गया। टाईगर मैन के रूप में देश व दुनिया में प्रसिद्ध हो चुके आर. श्रीनिवास मूर्ति को प्रदेश सरकार ने पन्ना के पुनरूत्थान की जवाबदारी सौंपी। उन्होंने अपनी लगन, निष्ठा और ईमानदारी की मिशाल कायम करते हुये वन अधिकारियों व मैदानी कर्मचारियों में वह जज्बा भरा कि देखते ही देखते पन्ना टाईगर रिजर्व नन्हे शावकों की किलकारियों से गुलजार हो उठा। मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में जहां 30 से अधिक बाघ हैं, वहीं बफर व दूसरे वन क्षेत्रों में भी यहां के बाघ विचरण कर रहे हैं। पुनस्र्थापना योजना के बाद टाईगर रिजर्व में 70 से भी अधिक बाघ शावकों का जन्म हो चुका है।

पन्ना ने दिखाई बाघ संरक्षण की राह




बाघ पुनस्र्थापना योजना को मिली शानदार सफलता से बाघ विहीन पन्ना टाईगर रिजर्व जहां फिर से आबाद हुआ, वहीं पन्ना ने पूरी दुनिया को बाघ संरक्षण की नई राह भी दिखाई। पन्ना की इस कामयाबी से कई देश सबक सीखकर अपने यहां भी पन्ना की ही तर्ज पर बाघों की वंशवृद्धि के लिये प्रयास कर रहे हैं। लेकिन दुनिया को सीख देने और नई राह दिखाने वाले पन्ना के जंगलों में ही अब वन्य प्राणियों के शिकार की घटनायें फिर से होने लगी हैं। बीते दो माह के दौरान ही दो तेंदुआ व एक भालू का शिकार हो चुका है, जो चिन्ता की बात है। अंतर्राष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस पर स्कूली बच्चों ने अपनी सोच और कला का प्रदर्शन करते हुये जो संदेश दिया है, उसका आम जनमानस में असर होगा, यह उम्मीद की जा रही है।

ईको सिस्टम का पैमाना होता है बाघ




जिस इलाके के जंगल में बाघ की मौजूदगी होती है, वह इस बात का द्योतक है कि वहां का जंगल समृद्ध और स्वस्थ है। बाघ ईको सिस्टम का पैमाना होता है। मालुम हो कि खुले जंगल में स्वच्छन्द रूप से विचरण करने वाले बाघ और चिडिय़ाघर के बाघ में काफी अन्तर होता है। अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर चिडिय़ाघर या बाड़ों में कैद बाघों की नहीं अपितु खुले जंगल में बिंदास विचरण करने वाले बाघों की घटती संख्या व मंडराते संकट पर चर्चा होती है। क्योंकि पर्यावरण संरक्षण के लिये खुले जंगल में स्वच्छन्द रूप से विचरण करने वाले बाघों का संरक्षण जरूरी है।

मड़ला में बच्चों ने निकाली जागरूकता रैली


अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के मौके पर 29 जुलाई को मड़ला स्थित पन्ना टाईगर रिजर्व के प्रवेश द्वार से कर्णावती व्याख्यान केन्द्र तक जागरूकता रैली निकाली गई। इस रैली में विभिन्न स्कूलों के छात्र-छात्राओं ने उत्साह के साथ भाग लिया। जागरूकता रैली के उपरान्त कर्णावती व्याख्यान केन्द्र में क्विज प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें बच्चों से पर्यावरण व बाघ संरक्षण से संबंधित सवाल पूछे गये। जिन बच्चों ने सवालों का सही जवाब दिया उन्हें मंचासीन अतिथियों द्वारा सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में पन्ना टाईगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर आर.के. मिश्रा, डिप्टी डायरेक्टर बासु कनौजिया सहित वन अधिकारी, कर्मचारी व पत्रकार मौजूद रहे।

वन अधिकारियों ने बच्चों का बढ़ाया उत्साह




दीवार पर प्रकृति के विविध मनमोहक रूपों का चित्र उकेरकर संरक्षण का संदेश देने के लिये आयोजित इस अनूठी प्रतियोगिता में भागीदारी निभाने वाले स्कूली बच्चों का वन अधिकारियों ने मौके पर उपस्थित रहकर उत्साह वर्धन किया। बच्चों ने भी बड़े ही उत्साह के साथ इस प्रतियोगिता में अपनी भागीदारी निभाते हुये चित्र बनाये। कार्यक्रम में वन मण्डलाधिकारी उत्तर नरेश ङ्क्षसह यादव, दक्षिण श्रीमति मीना मिश्रा, जिला पंचायत सीईओ गिरीश मिश्रा, जिला पंचायत पन्ना के अध्यक्ष रविराज सिंह यादव, विश्रामगंज एसडीओ नरेन्द्र सिंह परिहार, पन्ना एसडीओ जाहिल गर्ग तथा हेमन्त यादव इस चित्रकला प्रतियोगिता के दौरान पूरे समय मौजूद रहे।
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Saturday, July 28, 2018

बारिश की बूंदों से निखरा जंगल का अप्रतिम सौंदर्य

  •  जीवंत हो उठे झरनों को देख मंत्र मुग्ध हो रहे पर्यटक
  •  पन्ना के जंगलों में झरनों व जल प्रपातों की है भरमार





अरुण सिंह,पन्ना। बारिश की बूंदों का संपर्क होने से पन्ना के हरे-भरे जंगल का सौंदर्य निखर उठा है। बीते कई दिनों से हो रही झमाझम बारिश के चलते पन्ना टाईगर रिज़र्व सहित आसपास की पहाडिय़ों से गिरने वाले झरने जीवंत हो उठे हैं। जंगल, पहाड़ व मैदान हर तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आ रही है। प्रकृति का यह अप्रतिम सौन्दर्य हर किसी को मोहित कर रहा है। मन्दिरों के शहर पन्ना के आसपास हरी-भरी पहाडिय़ों से गिरने वाले झरने ऐसा सौन्दर्य बिखेर रहे हैं, जिसे देख लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। प्रकृति के अल्हड़पन, खूबसूरती व सौन्दर्य का ऐसा नजारा बारिश के मौसम में ही नजर आता है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना में घने जंगलों के बीच से प्रवाहित होने वाली केन नदी का अप्रतिम सौन्दर्य इन दिनों देखने जैसा है। अपने जेहन में अनगिनत खूबियों को समेटे यह अनूठी नदी डग-डग पर सौन्दर्य की सृष्टि करती तथा पग-पग पर प्राकृतिक सुषमा को बिखेरती हुई प्रवाहित होती है। लेकिन किसी नदी का ऐसा अद्भुत सौन्दर्य शायद ही कहीं देखने को मिले जो रनेह फाल में नजर आता है। पन्ना टाइगर रिजर्व में आने वाला यह अनूठा स्थल खूबियों और विशेषताओं से भरा है। लाल रंग के ग्रेनाइट व काले पत्थरों के बीच से केन नदी की दर्जनों धारायें विविध मार्गों से प्रवाहित होकर जब नीचे गिरती हैं तो प्रकृति प्रेमी पर्यटक अपनी सुध-बुध खो देते हैं। बारिश के मौसम में जब केन नदी उफान पर होती है उस समय रनेह फाल के सौन्दर्य को निहारना कितना आनन्ददायी है, इसकी अनुभूति यहां पहुँचकर ही की जा सकती है। लगभग 30 मीटर की ऊंचाई से जल की धारा को नीचे गहराई पर गिरते हुए देख पर्यटक विष्मय विमुग्ध हो जाते हैं। विशेष गौरतलब बात यह है कि रनेह फाल को केन घडिय़ाल सेन्चुरी के रूप में विकसित किया गया है। यहां केन नदी के अथाह जल में दर्जनों की संख्या में घडिय़ाल अठखेलियां करते हैं। खूबसूरत नदी, रंग बिरंगी चट्टाने व घडिय़ालों का एक ही जगह पर समागम दुर्लभ और बेजोड़ है। इसीलिए हीरों की धरती के बारे में कहा जाता है कि इस धरा को प्रकृति ने अनुपम उपहारों से समृद्ध किया है। अकेले पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र में ही ऐसे अनेकों झरने व जल प्रपात हैं जो किसी को भी सम्मोहित करने की क्षमता रखते हैं। पन्ना से लगभग 12 किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग  के किनारे स्थित पाण्डव जल प्रपात व उसके पास ही भैरव घाटी से कैमासन फाल का अनुपम सौन्दर्य देखते ही बनता है। पन्ना टाइगर रिजर्व का पाण्डव जल प्रपात प्रकृति का एक ऐसा तोहफा है जिसे देखने व यहां की प्राकृतिक सुषमा के बीच कुछ क्षण बिताने के लिए लोग खिंचे चले आते हैं। इस जल प्रपात में भी लगभग 30 मीटर की ऊंचाई से पानी गिरता है। नीचे पानी का विशाल कुण्ड तथा आस-पास बनी प्राचीन गुफायें प्रपात की खूबसूरती में चार चांद लगा देती हैं। स्थानीय लोगों की ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के समय पाण्डवों ने इस प्रपात के किनारे बनी गुफाओं में कुछ समय व्यतीत किया था। इसी मान्यता के चलते इस प्रपात का नाम पाण्डव प्रपात पड़ा है। पन्ना जिले में मौजूद दर्जनों खूबसूरत प्रपातों के कारण ही इस जिले को हीरों, मन्दिरों व झरनों की भूमि कहा जाता है।

                        बृहस्पति कुण्ड का सौन्दर्य है बेमिशाल


पन्ना से लगभग 30 किमी दूर स्थित बृहस्पति कुण्ड का सौन्दर्य आज भी बेमिशाल है। इस कुण्ड में रत्नगर्भा बाघिन नदी ऊंचाई से गिरती है,फलस्वरूप इस नदी के प्रवाह क्षेत्र में बेशकीमती हीरे मिलते हैं। हीरों की खोज में सैकड़ों लोग यहां पर खदान लगाते हैं जिससे यहां की प्राकृतिक खूबी तिरोहित हो रही है। वन औषधियों व जड़ी-बूटियों से समृद्ध इस खूबसूरत स्थल का यदि सुनियोजित विकास करके यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य का संरक्षण किया जाय तो यह स्थल भी पाण्डव जल प्रपात की तरह देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है। लेकिन पर्यटन विकास की अनगिनत खूबियों के बावजूद यह मनोरम स्थल उपेक्षित है और अवैध खदानों के कारण यहां का सौन्दर्य उजड़ रहा है।
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Friday, July 13, 2018

जंगल के राजा को तब ढूंढना पड़ेगा नया बसेरा...

ढोढऩ बांध के निर्माण से डूब जायेगा खूबसूरत घना जंगल
पन्ना टाईगर रिजर्व के 14 लाख से भी अधिक वृक्षों का होगा सफाया


वनाच्छादित पहाड़ी के नीचे खड़े होकर अपने इलाके का जायजा लेते हुए वनराज

पन्ना 13 जुलाई 18 । म.प्र. के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में स्थित पन्ना टाईगर रिजर्व का वजूद संकट में है। केन-बेतवा लिक परियोजना के तहत ढोढऩ गाँव के पास केन नदी पर यदि प्रस्तावित बांध का निर्माण कराया गया तो पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र का खूबसूरत घने जंगल से आच्छादित एक बड़ा हिस्सा डूब जायेगा। डूब में आने वाला यह वन क्षेत्र राष्ट्रीय पशु बाघ व विलुप्ति की कगार में पहुँच चुके गिद्धों का प्रिय रहवास है। बांध बनने पर इस वन क्षेत्र के 14 लाख से भी अधिक वृक्षों का सफाया हो जायेगा, इन हालातों में अपने ही घर से बेदखल हो जाने पर जंगल के राजा को अपना वजूद बचाने के लिये नया बसेरा ढूँढऩा पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि देश की राजधारी दिल्ली में आवासीय योजना के लिये लगभग 17 हजार पेड़ों को काटने की योजना बनाई गई थी। लेकिन जैसे ही पेड़ काटे जाने की यह खबर दिल्ली वासियों तक पहुँची, तो पेड़ काटे जाने की इस योजना के विरोध में दिल्ली के लोग सड़कों पर उतर आये। पर्यावरण को भारी नुकसान होने का हवाला देते हुये हजारों लोगों ने हाँथों में तख्तियां लेकर पेड़ों को बचाने के लिये प्रदर्शन शुरू कर दिया। दिल्ली की यह घटना राष्ट्रीय मीडिया में भी छायी रही। राजधानी में 17हजार पेड़ काटे जाने की योजना पर इतना बड़ा हंगामा मचा, लेकिन इसी देश के बुन्देलखण्ड अंचल में स्थित विन्ध्यांचल की अति प्राचीन पर्वत श्रेणी के घने जंगल को उजाड़े जाने की योजना पर हंगामा तो दूर कोई हलचल भी नहीं सुनाई दे रही। इस परियोजना के मूर्त रूप लेने में दो से ढाई दशक लग जायेंगे और हजारों करोड़ रू. खर्च होंगे तब जाकर कथित रूप से खेतों में हरियाली आयेगी, लेकिन इस बीच पर्यावरण को कितना नुकसान होगा तथा केन नदी का नैसर्गिक प्रवाह थमने से नीचे के सैकड़ों ग्रामों के लोगों को किस तरह के दुष्परिणाम भोगने पड़ेगे, इस दिशा में सोचने-विचारने की जरूरत ही नहीं समझी जा रही। दिल्ली में यदि 17 हजार पेड़ कटे तो पर्यावरण को नुकसान और बुन्देलखण्ड क्षेत्र का खूबसूरत वन क्षेत्र जो बाघों सहित दर्जनों प्रजाति के वन्य प्राणियों और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, उसे उजाडऩे पर खुशहाली आयेगी, यह कैसा तर्क है?

टाईगर रिजर्व से होकर प्रवाहित होने वाली केन नदी जिसमें बांध बनना है।

पहले बसाया और अब उजाड़ने की तैयारी

सदियों से बाघों का प्रिय रहवास रहा पन्ना का जंगल वैसे भी बढ़ती आबादी के दबाव में तेजी से उजड़ रहा है। सिर्फ पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र जो 542 वर्ग किमी है, काफी हद तक सुरक्षित है, लेकिन इसे उजाडऩे की भी तैयारी की जा रही है। मालुम हो कि संपूर्ण विन्ध्यांचल क्षेत्र का क्षेत्रफल लगभग 1.5 लाख वर्ग किमी है जो कि पश्चिम दिशा में रणथम्भोर टाईगर रिजर्व एवं पूर्व दिशा में बांधवगढ़ टाईगर रिजर्व को छूता है। इन दोनों के बीच में विन्ध्य क्षेत्र के शुष्क बनों के एक मात्र बाघ का शोर्स पापुलेशन पन्ना टाईगर रिजर्व में विद्यमान है। वर्ष 2009 में यहां का जंगल बाघ विहीन हो गया था, फलस्वरूप बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर से बसाने के लिये पुनस्र्थापना योजना शुरू हुई। जिसे चमत्कारिक सफलता मिली और बाघ विहीन यह जंगल फिर से आबाद हो गया। मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में 30 से अधिक बाघ विचरण कर रहे हैं, बीते 7-8 वर्षों में यहां पर 70 से भी अधिक बाघ शावकों का जन्म हुआ है।

प्रस्तावित बांध का विरोध करते स्कूली बच्चे।
पन्ना मॉडल को अपना रहे दूसरे देश

बाघों को नये सिरे से बसाने के अभिनव प्रयोग को पन्ना में जिस तरह से चमत्कारिक सफलता मिली है, उसकी ख्याति देश की सीमाओं को पार करते हुये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैल गई है। पन्ना की इस अनूठी कामयाबी को देखने, समझने और अध्ययन करने के लिये भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों सहित दूसरे देशों के वन अधिकारी व वन्य प्राणी विशेषज्ञ यहां आने लगे हैं। पन्ना के बाघ पुनस्र्थापना की कामयाबी से कम्बोडिया इस कदर प्रभावित हुआ है कि अब वह अपने यहां पन्ना की ही तर्ज पर बाघों को आबाद करने की दिशा में अग्रसर हुआ है। मालुम हो कि पूर्व में पन्ना सिर्फ बेशकीमती हीरों के लिये जाना जाता था लेकिन अब वह पूरी दुनिया में बाघों के लिये भी जाना जाने लगा है। पन्ना टाईगर रिजर्व जो अतीत में पन्ना के विकास में सबसे बड़ी बाधा था, वह अब यहां के विकास का वाहक बनकर उभरा है। ऐसी स्थिति में दर्जनों बाघों, बल्चरों व विभिन्न प्रजाति के वन्य प्राणियों से गुलजार इस हरे-भरे इलाके को आखिर क्यों उजाड़ा जा रहा है? जबकि बांध बनने से हो रहे नुकसान की तुलना में पन्ना जिले को लाभ न के बराबर मिलना है। ढोढऩ बांध का निर्माण इस अंचल की आरण्यक संस्कृति को तहस-नहस करने वाला साबित होगा।

ढोढन बांध से जुड़े कुछ तथ्य
  • केन नदी की कुल लम्बाई 427 किमी है।
  • जहां बांध बन रहा है वहां से केन नदी की डाउन स्ट्रीम की लम्बाई 270 किमी है।
  • बांध की कुल लम्बाई 2031 मीटर जिसमें कांक्रीट डेम का हिस्सा 798 मीटर व मिट्टी के बांध की लम्बाई 1233 मीटर है। बांध की ऊँचाई 77 मीटर है।
  • ढोढऩ बांध से बेतवा नदी में पानी ले जाने वाली ङ्क्षलक कैनाल की लम्बाई 220.624 किमी होगी।
  • बांध का डूब क्षेत्र 9 हजार हेक्टेयर है, जिसका 90 फीसदी से भी अधिक क्षेत्र पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में निहित है।
  • 105 वर्ग किमी. का कोर क्षेत्र जो छतरपुर जिले में है, डूब क्षेत्र के कारण विभाजित हो जायेगा। इस प्रकार कुल 197 वर्ग किमी. से अधिक क्षेत्र डूब व विभाजन के कारण नष्ट हो जायेगा।
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दैनिक जागरण में छपि रिपोर्ट

Tuesday, June 5, 2018

किलकिला को पुनर्जीवित करने पन्ना के युवक बने भागीरथ

  •  आस्था के चलते किलकिला नदी को कहा जाता है प्रणामी सम्प्रदाय की गंगा
  •  पन्ना शहर के गन्दे नालों का पानी मिलने से विषाक्त हो चुकी यह प्यारी नदी


गंदे नाले में तब्दील हो चुकी किलकिला नदी से मलबा निकालती पोकलेन मशीन। 

। अरुण सिंह 

पन्ना। किलकिला नदी को पुनर्जीवित करने के लिये पन्ना शहर के उत्साही युवकों की टीम ने भागीरथ बनकर जो बीड़ा उठाया है उसकी हर कोई सराहना कर रहा है। युवकों के उत्साह और रचनात्मक पहल को देखते हुये बड़ी संख्या में लोग अब मदद के लिये भी स्वप्रेरणा से आगे आने लगे हैं। आम जनता के सहयोग से इस नदी को पुनर्जीवित कर उसके प्राचीन स्वरूप में वापस लाने का कार्य तेजी से चल रहा है। 

पन्ना शहर के निकट से प्रवाहित होने वाली इस नदी को धार्मिक आस्था के चलते प्रणामी सम्प्रदाय की गंगा कहा जाता है। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता व अनदेखी के कारण पन्ना शहर के गन्दे नालों व गटर का पानी मिलने से यह नदी बुरी तरह से जहां दूषित और विषाक्त हो चुकी है, वहीं नदी के प्रवाह क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण होने से किलकिला नदी का वजूद ही संकट में पड़ गया है। ऐसी स्थिति में भागीरथ बनकर पन्ना परिवर्तन मंच से जुड़े युवाओं की टीम ने किलकिला नदी को साफ-स्वच्छ बनाने तथा उसे अतिक्रमण से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है। युवकों की इस अभिनव पहल को नगरवासियों की ओर से समर्थन व सहयोग भी मिल रहा है, जिससे नदी के पुनर्जीवन का कार्य जोर-शोर व उत्साह के साथ चल रहा है।

उल्लेखनीय है कि मन्दिरों के शहर पन्ना में राजाशाही जमाने से ही जल व पर्यावरण संरक्षण की परम्परा रही है। लेकिन समय गुजरने के साथ हमने अपने पुरखों की इस अनूठी परम्परा को भुला दिया। नतीजतन जंगलों के विनाश का सिलसिला जहां शुरू हो गया वहीं नदियों और प्राचीन तालाबों का वजूद भी मिटने लगा। अब शहर के शिक्षित और समाजसेवी युवकों में जागृति आई है और वे अपनी प्राचीन विरासत व धरोहरों के संरक्षण में रूचि ले रहे हैं, जिससे उम्मीद जागी है। दो वर्ष पूर्व पन्ना जीवन का आधार प्राचीन धरमसागर तालाब के जीर्णोद्धार का कार्य जन सहयोग से सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। अब उन्हीं युवकों द्वारा किलकिला नदी को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया गया है, उनके जुनून, जज्बे और उत्साह को देखकर नगरवासी आशान्वित हैं, कि किलकिला नदी एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप में दिखाई देगी।

छापर टेक पहाड़ी से निकली है यह नदी





किलकिला नदी का उद्गम बहेरा गाँव के निकट छापर टेक की पहाड़ी है। यहां से निकलकर किलकिला नदी तकरीबन 45 किमी लम्बा सफर तय करते हुये सलैया भापतपुर के मध्य केन नदी में विलीन हो जाती है। पन्ना शहर के निकट से गुजरते हुये किलकिला नदी घने जंगलों से होते हुये सैकड़ो फिट गहरे कौआ सेहा में गिरती है और वहां से आगे बढ़ते हुये केन में मिल जाती है। इस अनूठी नदी को लेकर अनेकों कहानियां और किवदंतियां भी प्रचलित हैं, जिन्हें लोग बड़े रूचि से सुनाते हैं। कहा जाता है कि पूर्व में किलकिला का पानी इतना जहरीला और विषाक्त था कि घोड़ा इस नदी का पानी पी लेता था तो घोड़े के साथ घुड़सवार की भी मौत हो जाती थी। ऐसी मान्यता है कि किलकिला नदी के विषैले जल को प्रणामी सम्प्रदाय के प्रणेता महामति श्री प्राणनाथ जी ने स्पर्श करके अमृत तुल्य कर दिया था। वह स्थान आज भी अमराई घाट के नाम से जाना जाता है, जो प्रणामी धर्मावलंबियों का पवित्र स्थल बन गया है।

वन्य प्राणियों की भी बुझती है प्यास


किलकिला नदी को पुनर्जीवित कर उसकी सूरत बदलने के अभियान में जुटे पूर्व नपा अध्यक्ष बृजेन्द्र सिंह बुन्देला बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण व जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिये किलकिला को साफ-सुथरा करना बेहद जरूरी है। मौजूदा समय इस नदी के जहरीले पानी का उपयोग सब्जियां उगाने में किया जा रहा है। यही दूषित सब्जियां बाजार में बिकती हैं जिससे लोग बीमार होते हैं। नदी के साफ-स्वच्छ होने पर इस समस्या का जहां निराकरण होगा, वहीं किलकिला का प्रवाह क्षेत्र मनोरम स्थल के रूप में भी विकसित किया जा सकेगा। श्री बुन्देला बताते हैं कि यह नदी जहां प्रणामी सम्प्रदाय की आस्था का केन्द्र है, वहीं इस नदी के पानी से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के बफर क्षेत्र के जंगल में वन्य प्राणियों की प्यास बुझती है।

किलकिला अभियान का दूसरा चरण पूर्णता की ओर


प्रणामी सम्प्रदाय के आस्था का केन्द्र किलकिला नदी को पुनर्जीवित कर उसके विरल प्रवाह को बनाये रखने के लिये विगत 7 मई से शुरू हुआ अभियान अनवरत् जारी है। पहले चरण में नदी को पूरी तरह से आच्छादित कर देने वाली जलकुम्भी को हटाया गया और अब दूसरे चरण में नदी की गाद निकालने तथा अतिक्रमण हटाकर नदी को उसके पुराने वास्तविक रूप में लाने का कार्य किया जा रहा है जो पूर्णता की ओर है। किलकिला नदी में मिलने वाले सीवर की गन्दगी से निजात पाने एसटीपी प्लान्ट लगाने की भी योजना है। जिसके लिये पन्ना कलेक्टर ने एनएमडीसी के द्वारा इस कार्य को पूरा कराने का आश्वासन दिया है।

अभियान को सफल बनाने इनका रहा योगदान



चल रहे सफाई अभियान का जायजा लेने नदी किनारे बैठी युवकों की टीम।

इस अनूठे रचनात्मक अभियान को सफलता की ओर अग्रसर करने में प्रमुख रूप से पूर्व नपा अध्यक्ष बृजेन्द्र सिंह  बुन्देला, राजमाता दिलहर कुमारी, नीलमराज शर्मा, अंकित शर्मा, लोकेन्द्र प्रताप सिंह  इटौरी, नृपेन्द्र सिंह , रेहान मोहम्मद, मनु सिंह  व एस.के. समेले प्रमुख हैं। इनके अलावा जिन लोगों ने किलकिला अभियान हेतु आर्थिक  सहयोग प्रदान किया है उनमें रविराज ङ्क्षसह यादव, मनीष अग्रवाल, राबिदा खातून, कमल किशोर, लक्ष्मीकान्त शर्मा, कुक्की सरकारजी, अरविन्द भदौरिया, ऋतभ खरे, आशा गुप्ता, के.पी. सिंह , बबलू यादव, अरविन्द जोशी, धीरज तिवारी, हनुमंत सिंह  रजऊ राजा, मनीष शर्मा छतरपुर, मोहित त्रिपाठी, अरविन्द खरे, गोपाल मिश्रा, चीटू दादा, हितेश तिवारी, बबलू चौहान, गोपाल लालवानी, सतेन्द्र जडिय़ा, पिन्कीराजा बमरी व अरविन्द सिंह  हैं।

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Thursday, May 17, 2018

पकने से पहले कच्चे आचार की हो रही तुड़ाई

  • वनोंपज के अवैज्ञानिक दोहन से होता है नुकसान 
  • अधाधुंध होने वाली तुड़ाई की होड़ पर अंकुश जरूरी 


जंगल से कच्चे अचार तोड़कर घर के बाहर सुखाती एक युवती। 

। अरुण सिंह 

पन्ना। वन सम्पदा से समृद्ध पन्ना जिले में वनोपज के संग्रहण की उचित प्रक्रिया न अपनाये जाने के चलते भारी नुकसान होता है। पकने से पहले अचार व आंवला जैसे वनोंपज को तोडऩे की होड़ से उत्पादन के साथ - साथ गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। फलस्वरूप वनोंपज की उचित कीमत नहीं मिल पाती।

उल्लेखनीय है कि विकास की दौड़ में पन्ना भले ही बहुत पीछे है पर प्राकृतिक रूप से पन्ना जिला बहुत समृद्ध है। प्रकृति ने पन्ना को कई अनुपम उपहार दिये हैं, जिनमें वनोपज भी शामिल है। कुल भू भाग के 47 फीसदी वनक्षेत्र वाले इस जिले में हर सीजन में प्रचुर मात्रा में वनोपज का उत्पादन होता है। वनों के आसपास स्थित सैकड़ों ग्रामों में लाखों परिवारों के लिए वनोपज संग्रहण आज भी अजीविका का मुख्य स्रोत है। तेंदूपत्ता और महुआ को छोड़ दें तो पिछले कुछ वर्षों में आंवला, अचार, तेंदू, हर्र तथा बहेरा आदि वनोपज के संग्रहण में वनवासियों को अब पहले जैसा लाभ नहीं मिल रहा है। जबकि आंवला, अचार, तेंदू, हर्र, बहेरा के मूल्य में लगातार वृद्धि हो रही है। 

वनोपज संग्रहण में अथक परिश्रम करने के बावजूद आपेक्षित लाभ न होने का मुख्य कारण वनोपज का अवैज्ञानिक विदोहन है। यानि कि अचार, तेंदू, आंवला के पकने से पहले उसकी तुड़ाई कर उसे संग्रहित किया जा रहा है। स्थिति यह है कि जिले में इन दिनों उत्तर वनमण्डल, दक्षिण वनमण्डल एवं टाईगर रिजर्व के बफर जोन एरिया में कच्चे अचार की तुड़ाई को लेकर होड़ मची हुई है। सुबह से बूढ़े, बच्चे, महिलायें और जवान हर कोई जंगल जाकर ज्यादा से ज्यादा अचार की तुड़ाई कर उसका संग्रहण करने में जुटें रहते हैं। आंख मूंदकर कच्चे अचार को तोडऩे की वृत्ति का मुख्य कारण यह है कि यदि अचार के पकने का इंतजार किया तो कोई दूसरा उसे तोड़ ले जायेगा। अचार के संग्रहण में एक - दूसरे से आगे निकलने की इसी होड़ के कारण हाल के वर्षों में अचार का अवैज्ञानिक विदोहन बढ़ा है। परिणामस्वरूप कच्चा अचार तोड़कर वनोपज संग्राहक अपना ही आर्थिक नुकसान कर रहे हैं। 

नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक वनवासी महिला ने बताया कि पिछले वर्ष उसने 100 रूपये किलो की दर से अचार बेंचा था। इस बार उसे समय से पहले अचार तोडऩा पड़ा है, क्योंकि अन्य लोगों ने अचार तोडऩा शुरू कर दिया था। अचार कच्चा होने से उसमें अच्छी तरह से चिंरौजी भी नहीं आ पाई है। इस महिला सहित अन्य संग्राहकों की मानें तो इस बार का अचार शायद ही कोई 20 रूपये किलो खरीदने के लिए कोई तैयार हो। चूंकि जो अचार तोड़ा जा रहा है उसमें से 80 फीसदी में चिंरौजी नहीं आ पाई है। वहीं अचार का आकार अभी छोटा है। संग्राहकों को यह भलीभांति पता है कि इस आग उगलती गर्मी में कठिन परिश्रम कर जंगल में वे जिस अचार को तोडऩे की होड़ में जुटे हैं उसकी बिक्री से उनकी मेहनत का वास्तविक मूल्य भी नहीं मिल पायेगा। पर विडम्बना यह है कि किसी में इतना धैर्य और संयम नहीं कि वह अचार सहित अन्य वनोपज की तुड़ाई के लिए उसके पकने तक का इंतजार करे। 

संग्राहकों के दिमाग में तो दिनरात एक ही बात चल रही है कि कैसे वे दूसरे से अधिक वनोपज की तुड़ाई कर उसका संग्रहण करने में सफल हों। इस अंधी होड़ में वनोपज संग्राहक अपना आर्थिक नुकसान करने के साथ - साथ जैव विविधता को तथा वनों को भी क्षति पहुंचा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि समय से पूर्व वनोजप की तुड़ाई कर उसका संग्रहण करना वनोपज (जैव विविधता का संरक्षण एवं पोषणीय कटाई) नियम 2005 के अंतर्गत प्रतिबंधित है। लेकिन प्रतिबंध प्रभावी तरीके से लागू न होने के कारण वनोपज संग्राहक इसका उल्लघन कर रहे हैं।
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Friday, April 20, 2018

विस्थापन का दंश नहीं विकास चाहते हैं ग्रामीण

  •   पदयात्रा से केन-बेतवा लिंक परियोजना की उजागर हुई हकीकत
  •   नदी जोड़ परियोजना से अनभिज्ञ हैं केन किनारे स्थित ग्रामों के लोग


पदयात्रा के दौरान तटवर्ती ग्रामीणों से चर्चा का दृश्य।

 अरुण सिंह,पन्ना। केन नदी के किनारे स्थित ग्रामों के रहवासी विस्थापन का दंश नहीं अपितु मूलभूत सुविधायें और विकास चाहते हैं। नदी जोड़ परियोजना के प्रस्तावित बांध स्थल के पास दोधन, पलकोहा, खरयारी समेत लगभग 10 गाँव पन्ना टाईगर रिजर्व के अन्दर हैं। इन ग्रामों में रहने वाले लोगों की मुसीबत यह है कि उन्हें विगत कई सालों से बांध विस्थापित बताया जा रहा है। जिसके कारण ग्रामवासियों को पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार व आवागमन जैसे मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा गया है। पूरे 33 दिनों में 600 किमी लम्बी दूरी तय करके केन परिक्रमा करने वाले सिद्धार्थ अग्रवाल व भीम ङ्क्षसह रावत ने बेहद चौंकाने वाले तथ्य उजागर किये हैं। आप लोगों ने बताया कि पन्ना से लेकर बांदा तक केन नदी के किनारे बसे अधिकांश ग्रामों के लोगों को केन-बेतवा लिंक परियोजना के संबंध में कोई भी जानकारी नहीं है। इन ग्रामीणों में नदी पर आश्रित किसान, मल्लाह, मछुआरे व पशुपालक शामिल हैं।
केन्द्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में तटवर्ती ग्रामों के लोग यह सोचते हैं कि केन का पानी बेतवा में और बेतवा का पानी केन में डाला जायेगा, जिससे बाढ़ नहीं आयेगी। बाढ़ की विभीषिका अनेकों बार झेल चुके लोग इस भ्रान्ति के चलते निङ्क्षश्चत थे कि नदी जोड़ योजना से उनके जीवन में कोई खलल नहीं पड़ेगा, अपितु बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति मिल जायेगी। जबकि वास्तव में इस योजना से केवल केन नदी का पानी बेतवा में डाला जायेगा, बेतवा का पानी केन में नहीं आयेगा। पदयात्रियों ने ग्रामीणों को जब इस तथ्य से अवगत कराया तो वे हैरान रह गये। हकीकत जान ग्रामीण अपने को अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और कहते हैं कि यदि ऐसा है तो नदी जोड़ परियोजना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि केन हमारी जिन्दगी है। पदयात्रा के दौरान यह भी पता चला कि योजना को अमल में लाने के लिये बरियारपुर बैराज के नीचे नया बैराज बनाया जायेगा। जिससे योजना के डूब क्षेत्र में आने वाले वन क्षेत्र और गाँवों की संख्या बढ़ जायेगी। किन्तु इस बात का योजना की पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन, जनसुनवाई और पर्यावरण आंकलन रिपोर्ट में उल्लेख नहीं किया गया है। योजना के लिये पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में 23 लाख से भी अधिक पेड़ों को काटा जायेगा, यह सुनकर भी ग्रामीण भौंचक्के रह गये। क्योंकि इन तथ्यों और जानकारियों से वे पूरी तरह अनजान हैं। अपने उद्गम स्थल से ही मानवीय हस्तक्षेप झेल रही केन नदी की हालत दयनीय और चिन्ताजनक हो गई है। केन किनारे के सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल यदि आज होते तो केन की यह दशा देख कितने व्यथित होते। श्री अग्रवाल अपनी एक कविता में लिखते हैं, मैं घूमूंगा केन किनारे, यों ही जैसे आज घूमता, लहर-लहर के साथ झूमता, संध के प्रिय अधर चूमता, दुनिया के दु:ख-द्वंद विसारे, मैं घूमूँगा  केन किनारे। लेकिन अब केन किनारे ऐसा कुछ भी नहीं बचा जहां घूमा जा सके, हर तरफ विनाशकारी उत्खनन और पानी के अविरल नैसर्गिक  प्रवाह को रोकने का काम हो रहा है।

नष्ट हो जायेगा बाघों का बसेरा


केन नदी के किनारे गजराज और वनराज साथ-साथ।
केन-बेतवा लिंक परियोजना पन्ना जिले के रहवासियों के लिये जहां विनाशकारी साबित होगी, वहीं पन्ना टाईगर रिजर्व के बाघों और विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके गिद्धों के जीवन में भी संकट पैदा करेगी। नदी जोड़ परियोजना में पन्ना टाईगर रिजर्व का जो हिस्सा डूब में आ रहा है वह बाघों व बल्चरों का प्रिय रहवास है। मौजूदा समय भी इस क्षेत्र में शावकों सहित एक बाघिन अपना बसेरा बनाये हुय है, वहीं नर बाघों का भी विचरण होता रहता है। पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र बाघों की बढ़ रही संख्या को देखते हुये छोटा पड़ रहा है, ऐसी स्थिति में बाघों के सर्वश्रेष्ठ रहवास के डूब में आ जाने से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान का पूरा ताना बाना ही बिगड़ जायेगा, जिसकी भरपाई हो पाना संभव नहीं है।

नहीं दिखेगा रनेहफाल का अनुपम सौन्दर्य


केन नदी के रनेहफाल का अद्भुत नजारा।

केन नदी का अविरल प्रवाह थम जाने पर रनेहफाल का अलौकिक और अनुपम सौन्दर्य देखने को नहीं मिलेगा। रंग-बिरंगी ग्रेनाइट की चट्टानों के बीच से जब केन की धार प्रवाहित होती है तो यह नजारा देख लोग मुत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह बेहद खूबसूरत फाल संकटग्रस्त घडिय़ाल प्रजाति का आश्रय स्थल भी है। जिसे केन घडिय़ाल राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के नाम से जाना जाता है। रनेहफाल और इस अभ्यारण्य के सुरक्षित भविष्य के लिये यह आवश्यक है कि केन नदी में बरियारपुर बांध से निरन्तर पानी छोड़ा जाये।
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