Monday, November 9, 2020

स्टीविया की खेती ने रामलगन की जिंदगी में घोली मिठास

  •  चार एकड़ के किसान ने खेती को बनाया लाभ का धंधा
  •  किसान के अभिनव प्रयोगों को देख कलेक्टर ने की सराहना

रामलगन के खेत में स्टीविया की फसल का अवलोकन करते कलेक्टर साथ में अन्य अधिकारी। 

अरुण सिंह,पन्ना।  मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में एक छोटे से गांव के किसान ने अपने 4 एकड़ के खेत में नई-नई फसलें उगा कर खेती को सही अर्थों में लाभ का धंधा बना दिया है। अजयगढ़ जनपद पंचायत के अनजाने से गांव गुठला के कृषक रामलगन पाल ने अपने खेत के एक हिस्से में वह फसल उगाई, जिसका गांव के लोग नाम तक नहीं जानते थे। उस फसल (स्टीविया) की खेती ने रामलगन की जिंदगी में मिठास घोलने का काम किया है। बड़ी लगन और मेहनत के साथ स्टीविया की खेती करने से अच्छा खासा मुनाफा होने पर उत्साहित इस किसान ने अन्य दूसरी औषधीय फसलों की खेती भी शुरू की, जिससे उसकी जिंदगी बदल गई है। इस छोटे से किसान के अभिनव प्रयोगों की जानकारी मिलने पर कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा 9 नवंबर सोमवार को गुठला गांव पहुंचकर रामलगन के खेत में लगी स्टीविया की फसल को देखा और उसके प्रयासों को सराहा। उन्होंने क्षेत्र के किसानों को स्टीविया सहित अन्य औषधीय फसलों की खेती करने के लिए प्रेरित भी किया।


एक बीघा खेत में लगी स्टीविया की फसल का द्रश्य। 

उल्लेखनीय है कि आधुनिक जीवन चर्या व खानपान से मधुमेह (शुगर) के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। मधुमेह की बीमारी इससे पीड़ित लोगों के लिए भले ही तनाव व परेशानी बढ़ाने वाली बात है, लेकिन किसानों के लिये यह आय बढ़ाने का एक अवसर बन सकती है। समझदार किसान इसी अवसर का लाभ उठाने के लिए स्टीविया की खेती करने लगे हैं।मालुम हो कि मधुमेह के उपचार हेतु मधुपत्र, मीठी तुलसी या स्टीविया की मांग बढ़ रही है। स्टीविया की पत्तियां अत्यधिक मीठी (शक्कर से कई गुना ज्यादा) होती हैं, इनमें प्रोटीन व फाइबर अधिक मात्रा में होता है। कैल्सियम व फास्फोरस से भरपूर होने के साथ स्टीविया की पत्तियों में कई तरह के खनिज भी होते हैं। इसलिए इनका उपयोग मधुमेह रोगियों के लिए किया जाता है। स्टीविया की पत्तियों को सुखाकर शुगर फ्री टेबलेट बनाने में किया जाता है। जो मधुमेह रोगियों के लिए चीनी का एक विकल्प है। कृषक रामलगन पाल ने बताया कि उद्यान विभाग के सहायक संचालक महेंद्र मोहन भट्ट ने उसे स्टीविया की खेती करने के लिए प्रेरित किया तथा तकनीकी मार्गदर्शन के साथ-साथ सहयोग भी किया। तीन वर्ष पूर्व उसने स्टीविया की खेती शुरू की जिसके उत्साहजनक परिणाम निकले। स्टीविया की पत्तियों को विक्रय करने की भी चिंता नहीं रहती क्योंकि व्यापारी घर से इसकी खरीदी कर लेते हैं।

मिर्च व टमाटर के साथ मशरूम की भी खेती

कृषक रामलगन पाल 

 अपने 4 एकड़ के खेत में कृषक रामलगन पाल सिर्फ एक ही फसल नहीं उगाते, बल्कि   कई फसल लेते हैं। मौजूदा समय उनके खेत में स्टीविया के अलावा धान, मिर्च व   टमाटर की फसल लगी हुई है। धान कटने को तैयार है, जबकि मिर्च की फसल से अब   तक उनके द्वारा 25 हजार रुपये कमाए जा चुके हैं। रामलगन ने बताया कि 10 आरे में   (एक बीघा से कम) मिर्च की फसल है, जिसमें मिर्च अभी भी लगे हैं। प्याज की फसल   इनके द्वारा ली जा चुकी है, इस वर्ष लगभग 30 कुंटल प्याज निकली थी जिसे उन्होंने   30 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा है। इसके अलावा खेत में सब्जी वाली अन्य फसलें   मेथी व मूली भी लगी हुई है। महज 4 एकड़ जमीन में इतनी फसलें लेने की वजह का खुलासा करते हुए रामलगन ने बताया कि यदि किन्हीं कारणों व रोग आदि से किसी फसल को नुकसान होता है तो उसकी भरपाई दूसरी फसल से हो जाता है। रामलगन ने बताया कि इस वर्ष उन्होंने मशरूम की भी खेती शुरू की है, इसके लिए जमीन की जरूरत नहीं, घर में ही मशरुम उगा रहे हैं। उन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ बताया कि पहले ही साल में वे कम से कम एक लाख रुपये का सूखा मशरूम बेचेंगे।

 खेत में लगे हैं आंवला के सौ से अधिक पेड़

 प्रयोगधर्मी इस छोटे से किसान की सोच व खेती करने का तरीका दूसरे किसानों से बिल्कुल अलहदा है। वह गेहूं और चना उगाने के बजाय खेत के छोटे-छोटे हिस्सों में विविध प्रकार की फसलें उगाना पसंद करता है। राम लगन की कामयाबी का राज भी यही है। उसके 4 एकड़ के खेत में उन्नत किस्म वाले 100 से भी अधिक आंवले के पेड़ लगे हैं। इस किसान ने बताया कि इन पेड़ों से हर साल 25 से 30 कुंटल आंवला निकलता है जिसे मुरब्बा बनाने वाले घर से ही खरीद कर ले जाते हैं। इससे लगभग 30 हजार रुपये की आय हो जाती है। रामलगन ने आंवले के पेड़ दिखाते हुए बताया कि इस वर्ष फसल कमजोर है। पेड़ों में बहुत ही कम आंवले लगे हैं। इसकी वजह बताते हुए कहा कि टिड्डी दल के कारण आंवले की फसल को भारी नुकसान हुआ है।

स्टीविया की खेती में मिलता है अनुदान : भट्ट

सहायक संचालक उद्यान महेन्द्र मोहन भट्ट ने बताया कि इस ग्राम में विगत 3 वर्षो से रामलगन पाल द्वारा स्टीविया की खेती की जा रही है। इनके द्वारा उत्पादित स्टीविया की फसल की सूखी पत्तियों को 70 से 85 रूपये किलो की दर से विक्रय किया गया है। यह फसल वर्ष में चार बार ली जाती है। जिससे एक एकड की फसल से साल में एक से डेढ लाख रूपये कमाया जा सकता है। स्टीविया की खेती करने पर किसान को भारत सरकार द्वारा एक हेक्टेयर पर 45 हजार रूपये अनुदान के साथ खेती करने की तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाता है। आपने बताया कि आगामी समय में 250 एकड भूमि पर जिले में स्टीविया की खेती कराये जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस खेती से उत्पादित स्टीविया की फसल को क्रय करने के लिए स्थानीय व्यापारियों के साथ जिले के बाहर से व्यापारियों को आमंत्रित किया जा रहा है। यह एक औषधीय फसल की खेती है जो मधुमेह रोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। वर्तमान में स्टीविया की मांग निरंतर बढ रही है। आगामी समय में किसानों के लिए यह एक लाभ की खेती के रूप में जाना जायेगा।  

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