Sunday, February 11, 2024

श्यामगिरि की वादियों में मौजूद है लुप्तप्राय मांसाहारी पौधा "ड्रोसेरा"

 

कल्दा पठार के जंगल में पाया गया कीटभक्षी पौधा ड्रोसेरा

।। अजय चौरसिया ।।

पन्ना। बुंदेलखंड क्षेत्र का पचमढ़ी कहे जाने वाले कल्दा पठार में घने जंगलों और प्राकृतिक जैवविविधता से समृद्ध श्यामगिरि की वादियों में वैसे तो औषधियों का  भंडार है, लेकिन यहां पर कुछ ऐसी प्रजातियों के पौधे भी पाए जाते हैं, जिन्हें अक्सर लोग किताबों में पढ़ते हैं या फिर टीवी पर ही देख पाते है। ऐसा ही एक कीटभक्षी पौधा ड्रोसेरा है जो कल्दा पठार के जंगल में पाया गया है। यह कीटभक्षी पौधा अपने भोजन की पूर्ति के लिए कीटपतंगों का शिकार करता है।

सुनने में भले ही अजीब लगे कि एक पौधा जीवित कीटों का शिकार कैसे कर सकता है लेकिन यह सच है। प्रकृति ने ड्रोसेरा की रचना कुछ इस तरह की है कि वह अपने भोजन की पूर्ति कीटों से करता है।इसके पत्तों पर अनेक रेशे निकले रहते हैं, जो एक चिपचिपा रस पैदा करते हैं। जो सूरज की रोशनी में ओस के कणों के समान चमकता है। इन चमकती बूँदों की ओर कीट आकर्षित होते हैं और स्पर्श करते ही चिपक जाते हैं। इसके पश्चात कीटों के छटपटाने से लम्बे रेशे सक्रिय हो जाते हैं और वे चारों तरफ से कीट को जकड़कर बंदी बना लेते हैं। इन रेशों से एक प्रकार का पाचक द्रव भी निकलता है, जो कीटों के पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेते हैं। पाचन पूर्ण होने पर पुनः सीधे हो जाते हैं और अगले शिकार की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

ड्रोसेरा प्राय: नदी नाले या तालाब के किनारे उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहां नाईट्रोजन की कमी होती है और वहां की जलवायु शुद्ध होती है। ड्रोसेरा जमीन से नाइट्रोजन प्राप्त करने में असमर्थ होता है इसलिए वह अपने शरीर में नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए कीट पतंगों का शिकार करता है। इस पौधे की पहचान दो दशक से प्रकृति संरक्षण कार्य कर रहे अजय चौरसिया ने कल्दा वन परिक्षेत्र के श्यामगिरि क्षेत्र में की है।  

प्रकृति रहस्यों से भरी पड़ी है। वनस्पतियों के इस विचित्र संसार में अनेक आश्चर्यजनक अजूबे भरे पड़े हैं। उन्हीं में से एक अजूबा है मांसाहारी पौधों का अद्भुत संसार। एक छोटे से नाले के किनारे बंजर मिट्टी में कुछ अजीब पौधे थे। उनके बारे में जानने की उत्सुकता में, मैंने उन गुलाबी पौधों को देखना शुरू किया उनकी तस्वीरें खींचीं। विस्तृत अवलोकन के बाद, मैं यह जानकर चौंक गया कि यह वही पौधा है जिसके बारे में हमने किताबों में पढा था। 

यह जानकर कि यह कीटभक्षी पौधा ड्रोसेरा है, मैं विस्मय और खुशी से अवाक रह गया। मैंने कुछ तस्वीरें लीं और अभी इसकी पारिस्थितिकी के बारे में अधिक विवरण तलाशने की जरूरत है। घटते प्राकृतिक आवास के कारण ड्रोसेरा विलुप्त होने के खतरे में है। इसकी उपलब्धता बहुत कम है और लुप्तप्राय होने के कारण इसे सहेजने की आवश्यकता है। जो जैवविविधता संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

 ड्रोसेरा का पौधा कीड़ों को कैसे खाता है?




मांसाहारी पौधे ड्रोसेरा को मक्खाजाली भी कहा जाता है। इस पौधे की गोलाई में करीब 25 पत्तियां होती है। जिसकी पत्येक पत्ती पर 200 से अधिक छोटे छोटे संवेदक बाल होते है। इन बालों की चोटी पर एक चमकीला पदार्थ होता है। जिसे कीट पतंगे मधु समझकर आकर्षित होते और पत्ते पर बैठ जाते है। जैसे ही कीट उस पर बैठता है और चिपक जाता है तभी पत्ती पर मौजूद बाल सक्रिय होकर मुड़ने लगते हैं और कीड़े को पकड़ना शुरू कर देते हैं। 

ड्रोसेरा के पत्तों पर लगे बाल जब कीट को खीचकर बीच में ले जाते हैं तब पत्ते से एक पाचक पदार्थ निकलता है। जो कीड़े के मांस को घोल देता है और पौधा उसे चूस लेता है। ड्रोसेरा का पौधा फंसे हुए शिकार को लगभग 15 मिनट में मार सकता है और इसे कुछ हफ्तों तक पचा सकता है।

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