Thursday, February 20, 2020

सिंगल यूज प्लास्टिक प्रतिबंध पर सरकारें बेसुध

  •  चूक सकता है 2022 का लक्ष्य, रिपोर्ट में हुआ खुलासा 
  •  महिलाओं के मुकाबले पुरुष प्लास्टिक बैग का ज्यादा करते हैं इस्तेमाल 



भारत में 28 ऐसे राज्य हैं जिन्होंने पूरी तरह से या फिर आंशिक तौर पर सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा रखा है। हालांकि यह प्रतिबंध काम नहीं कर रहा है और नियम-कायदे कागजों पर ही सिमटे हैं। गैर सरकारी संस्था टॉक्सिक लिंक के ऑनलाइन और ऑफलाइन सर्वे के मुताबिक 453 भागीदारों में 83 फीसदी ने कहा है कि वे प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि सर्वे में यह स्पष्ट नहीं है कि इस्तेमाल करने वाले लोग 50 माइक्रोन (हल्की थैलियां) से कम या फिर ज्यादा माइक्रोन वाली प्लास्टिक थैलियों को इस्तेमाल कर रहे हैं। प्लास्टिक थैलियों को प्राथमिक तौर पर प्रतिबंधित किया जाना था।

टॉक्सिक लिंक की ओर से जारी की गई रिपोर्ट का नाम है सिंगल यूज प्लास्टिक दृ द लास्ट स्ट्रॉ”। सर्वे और विश्लेषण वाली इस रिपोर्ट में प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल को लेकर 14 फीसदी लोगों ने कहा कि वे हर वक्त इसका इस्तेमाल करते हैं जबकि 17 फीसदी ने कहा कि वे प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल कभी नहीं करते हैं। इसी तरह 37 फीसदी ने कहा कि यदा-कदा प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करते हैं वहीं 32 फीसदी ने जवाब दिया कि वे लगातार प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करते हैं। सर्वे में यह बात भी सामने आई कि महिलाओं (15 फीसदी) के मुकाबले पुरुष ज्यादा (19 फीसदी) प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में लोग प्लास्टिक के खतरों को पहचानना शुरु कर चुके हैं हालांकि उनके बीच सिंगल यूज प्लास्टिल को लेकर तमाम भ्रांतियां भी मौजूद हैं। सर्वे में पाया गया कि अधिकांश लोग पानी की बोतलों और स्ट्रॉ को सिंगल यूज प्लास्टिक ही नहीं मानते। इसके अलावा जवाब देने वालों में केवल 57 फीसदी लोग ही ऐसे थे जो प्लास्टिक कैरी बैग को सिंगल यूज प्लास्टिक मानते थे। टॉक्सिक लिंक के मुताबिक महिला-पुरुष और विभिन्न आयु समूह के एक हजार से ज्यादा लोगों से फील्ड सर्वे में प्लास्टिक के इस्तेमाल से सबंधित जवाब जुटाए गए।
प्रदूषण का सबसे बड़े कारणों में एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक (सिंगल यूज प्लास्टिक) की पहचान हुई है। सिंगल यूज प्लास्टिक में 50 माइक्रोन से नीचे के प्लास्टिक बैग अत्यधिक चिंता का विषय हैं। क्योंकि काफी हल्के होने के कारण ये यत्र-तत्र मौजूद हैं और न तो इन्हें एकत्रित किया जाता है और न ही इनका रिसाइकल संभव है। यह ड्रेनेज को चोक करने से लेकर समुद्रों के प्रदूषण में बड़ी हिस्सेदारी निभा रहे हैं। हॉस्पिटल इंडस्ट्री, फूड बेवरेज इंडस्ट्री, आवासीय सुविधाएं, यात्रा और पर्यटन, एफएमसीजी, ई-कॉमर्स रिटेल, निकोटीन इंडस्ट्री, एल्कोहॉल बेवरेज इंडस्ट्री सिंगल यूज प्लास्टिक की प्रमुख स्रोत हैं। इनके विकल्प के तौर पर ग्लास, मेटल, जूट, कपड़े, पेपर, बांस, पत्तियां व अन्य विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, इनके भी खतरे हैं।
सीपीसीबी की 2018-19 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष करीब 36 लाख टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इसमें से महज 60 फीसदी ही रिसाइकल होता है। प्लास्टिक रेग्युलेशन को लेकर भी भारत में अमल काफी कम है। भले ही भारत में प्लास्टिक का उपभोग ज्यादा होता है लेकिन प्रति व्यक्ति प्लास्टिक उपभोग काफी कम है। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष प्लास्टिक उपभोग 11 किलोग्राम है जबकि अमेरिका में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष प्लास्टिक उपभोग 109 किलोग्राम है। यूरोप में 65 किलोग्राम, चीन में 38 किलोग्राम, ब्राजील में 35 किलोग्राम है। प्रतिबंध क्यों नहीं प्रभावी हैं इस पर टॉक्सिक लिंक की मुख्य कार्यक्रम समन्वयक प्रीति महेश कहती हैं कि नियमों को लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। प्रतिबंध नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की गई। प्लास्टिक थैली को हतोत्साहित किए जाने को लेकर पर्याप्त जागरुकता भी नहीं फैलाई गई।
प्लास्टिक थैलियां के विकल्प मौजूद हैं। इन्हें प्रोत्साहित करने के लिए भी कुछ नहीं किया गया। सर्वे के दौरान जवाब देने वालों में इनके प्रति रुझान भी दिखाई दिया। मसलन सर्वे में पाया गया कि प्लास्टिक थैलों के बजाए कपड़ों के थैलों और बायो-प्लास्टिक बैग को 59 फीसदी भागीदारों ने पसंद किया गया है। वहीं सर्वे में हिस्सेदारी करने वाले 95 फीसदी लोगों ने कहा कि वे सिंगल यूज वाले कटलरी पर प्रतिबंध चाहते हैं। वहीं, 32 फीसदी ने कहा कि वे पत्ती वाले कटलरी को वापस चाहते हैं। प्रीति महेश ने कहा कि सरकार के पास विकल्प है कि वह इस पर कदम बढ़ाए क्योंकि लोगों में सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्पों के प्रति रुझान है।
संस्था ने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष और सिफारिशों में कहा है कि रिसाइकलिंग भी बेहतर समाधान नहीं है। टिकरी कलां, गाजीपुर, नांगलोई और अन्य जगहों पर रिसाइकलिंग बाजार के सर्वे के बाद कहा कि स्थिति काफी खराब है। आर्थिक पहलू के चलते मल्टीलेयर पैकेजिंग के प्लास्टिक को कोई लेना नहीं चाहता। एफएमसीजी उत्पादों में मल्टीलेयर पैकेजिंग का इस्तेमाल होता है। बेहद पतली प्लास्टिक की कई लेयर उत्पादों के डिब्बों पर चिपकाई जाती है। वहीं, यह कचरा कहां रिसाइकल होगा इसके लिए भारत में अभी कोई तकनीकी नहीं है। ज्यादातर ऐसा कचरा लैंडफिल साइट्स और ड्रेनेज सिस्टम में पहुंचता है। वहीं, इस समस्या के समाधान को लेकर कंपनियां कोई शोध और तकनीकी पर काम करने के लिए भी नहीं तैयार है। ऐसे में सरकार को ही कोई रास्ता निकालना होगा।
टॉक्सिक लिंक के सहायक निदेशक सतीश सिन्हा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्तूबर, 2019 को कहा था कि सिंगल यूज प्लास्टिक को 2022 तक चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर देंगे। हालांकि जमीन पर प्रतिबंध संबंधी कानूनों के अमल की स्थिति देखकर यह लक्ष्य आसान नहीं दिखाई दे राह है। सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक को खत्म करने के लिए कोई खाका नहीं खीचा है।
@डाउन टू अर्थ से साभार 
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