Thursday, September 30, 2021

फसलों में कीटनाशकों के उपयोग से बाधित होती है भोजन श्रंखला

  • आधुनिक खेती के नाम पर कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग न सिर्फ घातक है अपितु इससे भोजन श्रंखला की प्राकृतिक व्यवस्था बाधित होती है, जिससे संतुलन बिगड़ता है। सह-अस्तित्व की अहमियत को समझते हुए जैविक खेती को अपनाना आज की जरूरत है।

देशी किस्म के अनाजों की पारम्परिक खेती के बारे में जानकारी देते हुए पद्मश्री बाबूलाल दाहिया। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना । खेत में लगे कीटों से परेशान मत होइये, वे तो मकड़ी के बच्चों के लिए प्रकृति का भेजा उपहार हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा जैव विविधता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कृषक बाबूलाल दहिया ने चर्चा के दौरान बताया कि फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग घातक है। इससे प्रकृति की भोजन श्रंखला तो बाधित होती ही है, मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

श्री दहिया बताते हैं कि पृथ्वी में न जाने कितने प्रकार की वनस्पतियां, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और पक्षी हैं। यह पृथ्वी इन सबका घर है, इसमें मानव भी शामिल है। लेकिन इस जीवंत और हरी-भरी पृथ्वी को मानव ने इतने गहरे जख्म दिए हैं कि प्रकृति का पूरा संतुलन ही डांवाडोल हो गया है। हमने अपनी महत्वाकांक्षा और निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु बड़ी बेरहमी के साथ धरती की हरियाली तथा प्राकृतिक चक्र को तहस-नहस किया है। नतीजतन न जाने कितने जीव-जंतु बेघर होकर विलुप्त हो चुके हैं। इस नासमझी पूर्ण बर्ताव का खामियाजा अब हमें ही भोगना पड़ रहा है। उनका कहना है कि अब कम से कम हम समझदारी दिखाएं और प्रकृति व पर्यावरण से खिलवाड़ बंद करें। हमें सह- अस्तित्व की अहमियत को समझना होगा।

धान के खेत में लगे मकड़ी के जालों का द्रश्य। 

सह-अस्तित्व की भावना और समझ कितना जरूरी है इसे समझाने के लिए श्री दहिया ने एक वाकया का जिक्र करते हुए बताया कि 22-23 सितंबर के आसपास मैंने देखा कि हमारे धान के खेत में हरे रंग और लंबे मुंह का एक कीट लग गया था। हमारे खेत से ही होकर गांव वालों के लिए मैदान की ओर जाने का रास्ता था। इसलिए फसल में लगे कीड़ों को देखकर लोगों ने कहा कि "दहिया जी इसमें कीटनाशक डालिए नहीं तो आपकी सारी धान यह गंधी मक्खी खा लेगी?" मैं उनका मान रखने के लिए हां कह दिया और दूसरे दिन भोपाल चला गया। जब वहां से लौटकर आया तो देखा कि सारे खेत में मकडय़िों ने जाल बुन रखा है, जिनमें उनके सैकड़ों बच्चे थे। मां के द्वारा बुने गए उस जाल में फंसे कीटों को बच्चे मजे से खा रहे थे। बाद में वे उतने ही बचे जितने प्रकृति को चाहिए थे।

सितंबर का महीना मकड़ियों का प्रजनन काल

बाबूलाल दहिया आगे बताते हैं कि जैसे ही सितंबर की 20 तारीख आती है, मकड़ी खेतों में खड़ी फसल व घरों में हर जगह अपना जाल फैलाने लगती है। उसका जाल बुनना जहां वर्षा ऋतु की समाप्ति का संकेतक है वहीं उनके प्रजनन का भी समय है। अपने बुने इसी जाल में एक-एक मकड़ी सैकड़ों अण्डे देती है, जिनसे बच्चे निकलते हैं। मकड़ी के ये बच्चे क्या फसल को चट करेंगे? श्री दहिया ने सवाल किया और फिर खुद ही जवाब देते हैं। वे बताते हैं नहीं, क्योंकि मकड़ी शाकाहारी नहीं अपितु मांसाहारी कीट है। वह अपनी वंश वृद्धि के लिए वही काम करना चाह रही है जो दायित्व उसे प्रकृति ने सौंपा है यानी मच्छर व मक्खियों का खात्मा।

जाल में नजर आ रहा मकड़ी का बच्चा कीटों का भक्षण करते हुए।

आप बताते हैं कि बरसात में अनुकूल वातावरण मिलने पर मक्खी व मच्छरों की तादाद बढ़ जाती है। यह मक्खी और मच्छर दूसरे जंतुओं के लिए सिरदर्द बन जाते हैं। वे आगे बताते हैं कि सितंबर का अंतिम सप्ताह मकड़ियों के लिए अनुकूल होता है। मकड़ी के एक-एक जाल में सैकड़ों की संख्या में पैदा हुए छोटे बच्चे बड़े होने तक क्या खाएंगे? इन्हीं बच्चों के लिए फसलों में लगने वाले कीट प्रकृति के भेजे हुए उपहार हैं। जिन्हें मकड़ी के बच्चे चट कर देते हैं। लेकिन अफसोस है कि प्रकृति की इस भोजन श्रृंखला को हम समझ ही नहीं पाते?

मोटे अनाजों की उपेक्षा का परिणाम है कुपोषण

पन्ना जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र कल्दा पठार से लगे सतना जिले के पिथौराबाद गाँव के निवासी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित बाबूलाल दहिया धान की देसी किस्मों तथा मोटे अनाजों के बीज को संरक्षित करने का भी अतुलनीय कार्य किया है। वे बताते हैं कि मोटे अनाजों की उपेक्षा का ही परिणाम आज कुपोषण, डायबिटीज व रक्तचाप जैसी बीमारियों के रूप में दिखने लगा है। श्री दहिया ने परंपरागत देसी धान की विसरा दी गई किस्मों को बड़े जतन के साथ सहेजने और संरक्षित करने का काम किया है। वहीं सावा, काकुन, कुटकी, कोदो, ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे मोटे अनाज अपने खेत में उगाकर खेती के परंपरागत ज्ञान की अलख जगाए हुए हैं।

वे बताते हैं कि हरित क्रांति आने के साथ ही किसानों का रुझान उन्नत किस्म के बीजों, रासायनिक खाद व सिंचाई की ओर बढ़ा। इसके साथ ही कीटनाशकों व  नीदानाशक का उपयोग भी बड़े पैमाने पर होने लगा। जिसके दुष्प्रभाव से प्रकृति के मित्र कीट भी खत्म होने लगे और भोजन श्रंखला बाधित हुई। इस तरह से कीटनाशकों का उपयोग और बढ़ता चला गया। पहले हमारे भोजन में स्वाभाविक रूप से 10-12 अनाजों की बहुलता थी लेकिन अब हमारा भोजन हरित क्रांति आने के बाद मात्र तीन अनाजों में ही सिमट गया है।

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कौव्वे इसलिए हमारे पुरखे..!

 - लोकविमर्श/जयराम शुक्ल



पितरपख जाने को है कौव्वे कहीं हेरे नहीं मिल रहे। इन पंद्रह दिनों में हमारे पितर कौव्वे बनके आते थे। अपने हिस्से का भोग लगाते थे। कौव्वे पितर बनके तर गए या फिर पितर ही कौव्वा बनकर आने से मना कर दिया। 

मैंने मित्र से पूछा--आखिर क्या वजह हो सकती है। मित्र बोले- पहले झूठ बोलने वाले काले कौव्वे के काटने से डरा करते थे, क्योंकि ये मानते थे कि कौव्वे हमारे पुरखों के प्रतिनिधि हैं, ऊपर जाके बता देंगे कि तुम्हारे नाती पोते कितने झुट्ठे हैंं। बदले जमाने में आदमी ही काँव-काँव करते एक दूसरे को काटने खाने दौड़ रहा है। चौतरफा काँव-काँव का इतना शोर मचा है कि कौव्वे आएं भी तो उसी शोर में गुम जाएं। 

मैंने कहा- आखिर कौव्वों का भी तो अपना चरित्र है तभी न भगवान् ने पितरों का प्रतिनिधि बनाया है। और फिर ये न्याय के देवता शनि महाराज के वाहक। लेकिन आप ठीक कहते हैं इस अन्यायी समाज में भला उनकी पैठार कहाँ?

कौव्वे और कुत्ते मनुष्य के अत्यंत समीप रहने वाले पक्षी पशु हैं। पर कौव्वा हठी होता है,जमीर का पक्का। कुत्ता को रोटी बोटी दिखाओ, तलवे चाटने लगता है, दुम हिलाने लगता है। कौव्वा ..जहाँ हक न मिले वहां लूट सही ..पर यकीन करने वाला। भगवान् के हाथ से भी अपना हिस्सा छीनने की जिसके पास हिम्मत है। ...रसखान बता गए ..काग के भाग बडो़ सजनी हरि हाँथ से लै गयो माखन रोटी।

दब्बुओं के हाथ की भाग्य रेखा कभी नहीं उभरती। कर्मठ अपनी भाग्यरेखा खुद खींचते हैं। युगों से कौव्वे आदमी के बीच रहते आए पर स्वाभिमानी इतने कि  कभी इन्हें कोई पाल नहीं सका। इनकी आजाद ख्याली और बिंदास जिंदगी अपने आप में एक संदेश है। एक सुभाषित श्लोक में कौव्वे को आदमी से श्रेष्ठ कहा गया है--

काक आह्वायते काकान् याचको न तु याचक:

काक याचक येन मध्ये वरं काको न याचक: ।।

आदमी पैदाइशी भिखारी है। जन्म के बाद एक बार जो मुट्ठी खुली फिर तो श्मशान तक हाथ पसारे जाता है। कितना भी अमीर हो जाऐ मिल बाँटकर नहीं खाता। हड़पो जितना हड़प सको। 

ये हडपनीति हडप्पाकाल से चली आ रही है। कौव्वे का समाजवाद देखिए,एक रूखी रोटी का टुकड़ा भी मिल जाए काँव-काँव करके पूरी बिरादरी को बुला लेता है। क्या अमीर क्या गरीब, क्या बलवान क्या निर्बल।

वैग्यानिक दृष्टि से भी पशु पक्षी हमारे पुरखे हैं। इसलिए इन्हें वेदपुराणों से लेकर हर तरह के साहित्य व संस्कृति में श्रेष्ठता मिली है। पशु पक्षियों को निकाल दीजिए, हमारी समूची लोकपरंपरा प्राणहीन हो जाएगी। 

गरूड के नाम से एक पुराण ही है। इस गरुण पुराण में ही हमारी पितर संस्कृति का बखान है। लेकिन गरुड को ग्यान मिला कौव्वे से। ये रामचरित के कागभुशुण्डि कौन हैं..। ये गरुड के गुरूबाबा हैं। आज हम जिस रामकथा का पारायण करते हैं। उज्ज्यिनी में इन्होंने ही गरुड को सुनाया था।

कागभुशुण्डि का चरित्र उन सब के लिए सबक है जो चौबीसों घंंटे अपने ग्यान के गुमान में बौराए रहते हैं। कथा है कि उज्ज्यिनी में एक ब्राह्मण संत रहते थे। उन्होंने अपने शिष्य को पढ़ालिखाकर प्रकांड विद्वान बना दिया। शिष्य को घमंड हो गया। वह गुरू की अवग्या,अपमान करते हुए ग्यान के घमण्ड में मस्त रहने लगा। शंकरजी को गुरू के इस तरह के अपमान पर क्रोध आ गया। उन्होंने शिष्य को श्राप दे दिया।  शिष्य को उसकी करनी का फल मिला..!

लेकिन गुरू से अपने शिष्य की यह गति देखी नहीं गई। वे शंकर जी के चरणों में लोट गए ...और शिवाजी की जो स्तुति की जिसके भाव को गोस्वामी जी ने प्रस्तुत किया वह अबतक की सर्वश्रेष्ठ स्तुति मानी जाती है--

नमामि शमीशान् निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदंस्वरूपं, निजं निर्गुणं निर्विकंल्पं नीरीहं...।

गुरु का शिष्य के लिए इतना उत्कट प्रेम। आज के गुरू हों तो शिष्य के समूचे करियर का सत्यानाश कर दें। हां तो जब शंकर जी प्रसन्न हुए तो गुरू के निवेदन पर सजा कम करते हुए निकृष्ट पक्षी कौव्वा बना दिया। यही कागभुशुण्डि हुए। 

एक निकृष्ट तिर्यक योनि पक्षी को भी कागभुशुण्डि ने पूज्य और सम्मानीय बना दिया। कागभुशुण्डि का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि नीचकुल में जन्मने वाला भी प्रतिष्ठित और सम्मानित हो सकता है।

कौव्वे हमारी लोकसंस्कृति में ऐसे घुलेमिले हैं कि कथा, कहानी,गीत,संगीत जीवन के दुख और सुख में शोक और उत्सव में। पर आज हमने उनसे रिश्ता तोड़ सा लिया है। आज वे हमारे घर की मुडेरों पर बैठकर शगुन संदेश नहीं देते। कौव्वे के जरिये शिक्षाप्रद कहानियां नहीं सुनने को मिलतीं।

 सदियों पहले पं.विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की कहानियां रचीं थी। जिसके हर प्रमुख पात्र पशु पक्षी ही थे। कौव्वे की चतुराई को उन्हीं ने ताड़ा था। विष्णु शर्मा ऐसे गुरू थे जिन्होंने अपने शिष्यों को नीतिशास्त्र की शिक्षा पशुपक्षियों के माध्यम से ही दी। इसलिए हमारे लोकाचार में प्रत्येक पशुपक्षी के लिए सम्मानित जगह है। 

आज हम उनके निर्वसन में जुटे हैं। आंगन से भी निकाल दिया और मन से भी। वे अब कर्मकाण्ड के प्रतीक मात्र रह गए। रिश्ता टूट सा गया। वे मनुष्य की जुबान नहीं बोल सकते, पर कभी महसूस करिए कि उन्हें यदि हमारी जुबान मिल जाए तो वे क्या कहेंगे..? याद रखिये पशु पक्षियों की अवहेलना पुरखों की अवहेलना है, और इसका फल मरने के बाद सरग या नरक में नहीं इसी लोक में मिलेगा।

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झुमक तरोई : यह है तुरुइया की एक प्रजाति

यह है तुरुइया की एक देशी प्रजाति झुमक तरोई। 

जी हां, यह झुमक तरोई है। आपने कई महिलाओं को कान में झुमका पहने देखा होगा।  60-70 के दशक में तो "झुमका गिरा रे बरेली के बजार मा " नामक झुमका पर एक फिल्मी गीत ही काफी पापुलर हो गया था। किन्तु उस झुमका को कान में पहनने लायक बनाने की स्वर्णकार  की परिकल्पना का श्रेय जाता है इस झुमक तरोई को, जो  4--5 के गुच्छे में फल देती है।

प्रकृति में जीव-जंतुओं व कीट-पतंगों की तरह बनस्पतियों का भी अनूठा संसार है। हर बनस्पति की अपनी खूबी व महत्व है। किसी में औषधीय गुण है तो किसी के फल पोषण से भरपूर होते हैं। ये बनस्पतियाँ भी भोजन श्रंखला का हिस्सा हैं, जिन पर न जाने कितने शाकाहारी जीव जन्तु पलते हैं। बनस्पतियों के इस संसार में एक बनस्पति झुमक तरोई भी है, जो तुरुइया की एक प्रजाति है। इसकी सब्जी हम सब बड़े चाव से खाते हैं।  


लेकिन यहाँ जिस झुमक तरोई की बात हो रही है, उसके फल अमूमन सब्जी बाजार में नजर नहीं आते। क्योंकि ज्यादातर कृषक सब्जी के हाइब्रिड बीज उगाते हैं ताकि अधिक उत्पादन लेकर ज्यादा लाभ कमा सकें। यही वजह है कि देशी अनाजों व सब्जियों की कई अनूठी प्रजातियां गुम हो गई हैं।     

यह तो गोल है, पर इसकी लम्बे फलों के गुच्छे वाली एक अन्य किस्म भी होती है। पकने पर इसका फल सूखकर चित्र की तरह सफेद हो जाता है। जिसके अन्दर खुरदरा रेशा निकलता है और उसका उपयोग महिलाए अपने सोने चाँदी के आभूषण चमकाने में करती हैं। इसकी तरकारी क्वार से अगहन तक खाई जाती है। पर अब तमाम सब्जिओं की हाईब्रीड किस्मे आजाने के कारण यह परम्परागत किस्म विलुप्तता के कगार पर है।

 @बाबूलाल दाहिया

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Wednesday, September 29, 2021

पन्ना टाइगर रिजर्व के 1 अक्टूबर से खुलेंगे द्वार,प्रबंधन ने की तैयारियां

  •  देशी व विदेशी पर्यटक कर सकेंगे जंगल की निराली दुनिया का दीदार 
  •  टाइगर रिजर्व के मंडला प्रवेश द्वार में होगा पर्यटकों का स्वागत 

पन्ना टाइगर रिजर्व का मंडला प्रवेश द्वार जो 1 अक्टूबर से पर्यटकों के भ्रमण हेतु खुलेगा। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बारिश में तीन माह तक पर्यटन गतिविधियों के लिए बंद रहने के उपरांत 1 अक्टूबर से मध्य प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व (पन्ना, बांधवगढ़, कान्हा, सतपुड़ा, पेंच व संजय डुबरी) पर्यटकों के भ्रमण हेतु खुल रहे हैं। वन विभाग द्वारा इसके लिए जहां व्यापक तैयारियां की जा रही हैं, वहीं पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग भी पर्यटकों को जंगल की निराली दुनिया का दीदार कराने व उनकी आवभगत की तैयारियों में जुटे हुए हैं।पर्यटक गाइड मनोज दुबे बताते हैं कि पन्ना टाइगर रिजर्व के मंडला प्रवेश द्वार को जहां सजाया और संवारा जा रहा है, वहीं होटल व रिसॉर्ट संचालकों में भी पर्यटन सीजन शुरू होने को लेकर भारी उत्साह है। कोरोना संक्रमण के चलते पर्यटन व्यवसाय लंबे अरसे से ठप्प पड़ा था, जिसके अब पटरी पर आने की उम्मीद जताई जा रही है। 

मालूम हो कि देश में कुल 52 टाइगर रिजर्व हैं, वर्ष 2019 में आई बाघों की गणना रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2967 बाघ हैं। सबसे अधिक 526 बाघ मध्यप्रदेश में पाए गए थे। जबकि दूसरा स्थान 524 बाघों के साथ कर्नाटक का है। प्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व जो कोर व बफर क्षेत्र को मिलाकर 1598 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, वहां 70 से भी अधिक बाघ स्वच्छंद रूप से विचरण करते हैं। यहां की खास पहचान विलुप्त प्राय दुर्लभ गिद्ध भी हैं, जिनकी 9 में से 7 प्रजातियां पन्ना टाइगर रिजर्व में पाई जाती हैं। अभी हाल ही में यहां दुर्लभ फिशिंग कैट भी पाई गई है, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहेगी।

पन्ना टाइगर रिजर्व की महिला गाइड मानसी शिवहरे बेहद खुश हैं। देशी व विदेशी पर्यटकों को टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में भ्रमण कराने के रोमांचक सफर की शुरुआत होने को लेकर वे बेहद उत्साहित हैं। मानसी ने बताया कि उन्हें दो बार गाइड की ट्रेनिंग दी गई है। क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा ने भी सभी महिला गाइडों को प्रशिक्षण दिया है। पूरे आत्मविश्वास के साथ वे बताती हैं कि उन्होंने वन्य प्राणियों के साथ-साथ पक्षियों व पेड़ पौधों के बारे में भी बहुत कुछ सीखा है। भ्रमण के दौरान वे पर्यटकों को बड़े ही रोचक ढंग से इन सब के बारे में बताएंगे। आपने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व में 5 महिला गाइड हैं। उनके अलावा साक्षी सिंह, पुष्पा सिंह गोंड, नीलम सिंह गोंड़ व आरती रैकवार हैं, जिन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया है। हम पांचों महिला गाइड 1 अक्टूबर को पर्यटन गेट मंडला में पर्यटकों को भ्रमण में ले जाने से पहले उनका स्वागत करेंगी।

पन्ना को पर्यटन व रोजगार से जोड़ा जाएगा : मुख्यमंत्री 

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत 24 सितंबर को पन्ना दौरे में इस बात का ऐलान किया है कि पर्यटन विकास की विपुल संभावनाओं वाले जिले पन्ना को पर्यटन व रोजगार से जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि पन्ना टाइगर रिजर्व में रोजगार के अवसर कैसे बढ़े, इस दिशा में अभिनव पहल की जा रही है। आपने बताया कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व के समीप 66 हेक्टेयर जमीन चिन्हित की गई है। यहां एडवेंचर गतिविधियों का विराट केंपस स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पन्ना में मंदिरों के गौरवशाली इतिहास को देखते हुए यहां "टेंपल वॉक" बनेगा ताकि जो पर्यटक खजुराहो आयें वे पन्ना भी आकर मंदिरों के दर्शन कर सकें। मुख्यमंत्री ने कहा कि पन्ना की पुरानी सकरिया हवाई पट्टी को फिर से शुरू किया जाएगा ताकि यहां पर विमान उतर सकें। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

पन्ना के जंगलों में मौजूद है मानव सभ्यता का इतिहास 


जरधोवा के जंगल में पहाड़ के शेल्टर में अंकित शैल चित्र।

पन्ना टाइगर रिज़र्व का जंगल सिर्फ बाघों का ही घर नहीं है अपितु यहाँ पर मानव सभ्यता का इतिहास भी पहाड़ियों की विशालकाय चट्टानों व गुफाओं में अंकित है। जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 18 किमी. दूर ग्राम जरधोवा के निकट पन्ना नेशनल पार्क के बियावान जंगल में स्थित गुफाओं व ऊँचे पहाड़ों की चट्टानों पर प्राचीन भित्त चित्र हैं। हजारों वर्ष पूर्व आदिमानवों द्वारा पहाड़ों व गुफाओं में ये चित्र बनाये गये हैं, जो आज भी दृष्टिगोचर हो रहे हैं। पन्ना के जंगलों में दुर्गम पहाड़ों और गुफाओं में नजर आने वाली यह रॉक पेंटिंग कितनी प्राचीन है, इसका पता लगाने के लिए जानकारों व विषय विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए ताकि यहाँ  के प्राचीन भित्त चित्रों का संरक्षण हो सके।

उल्लेखनीय है कि पन्ना नेशनल पार्क के घने जंगलों में दर्जनों की संख्या में ऐसी गुफायें मौजूद हैं जहाँ  हजारों वर्ष पूर्व आदिमानव निवास करते रहे हैं। उस समय चूंकि खेती शुरू नहीं  हुई थी, इसलिए आदिमानव पूरी तरह से जंगल व वन्यजीवों पर ही आश्रित रहते थे। वन्यजीवों का शिकार करके वे अपनी भूख मिटाते थे। यहाँ  की गुफाओं व पहाड़ों की शेल्टर वाली चट्टानों पर उस समय के आदिमानवों की जीवनचर्या का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है। भित्त चित्रों में वन्यजीवों के साथ-साथ शिकार करने के दृश्य भी दिखाये गये हैं। वन्य जीवों का शिकार करने के लिए आदिमानवों द्वारा तीर कमान का उपयोग किया गया है। चित्रों से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता कि तीर की नोक लोहा की है या फिर नुकीले पत्थर अथवा हड्डी से उसे तैयार किया गया है। यदि तीर  की नोक लोहा से निर्मित नहीं है तो भित्त चित्र पाषाण काल के हो सकते हैं। पन्ना नेशनल पार्क के अलावा भी जिले के अन्य वन क्षेत्रों में भी इस तरह के भित्त चित्र पाये गए हैं। अकोला बफर क्षेत्र में बराछ की पहाड़ी, बृहस्पति कुण्ड की गुफाओं व सारंग की पहाड़ी में भी कई स्थानों पर आदिमानवों द्वारा बनाई गई रॉक पेंटिंग मौजूद हैं।

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Monday, September 27, 2021

धरती का कार्बन-चक्र और कार्बन सिंक्स

  • आज मनुष्यता उस सीमा रेखा पर आ खड़ी हुई है जहां उसे अपनी सारी भूलों को या तो सुधारना होगा या स्वयं के लिए जागतिक आत्मघात को गले लगाना होगा। चुनाव हमारा है और उससे जन्म लेने वाला भविष्य भी हमारा है।


धरती पर जीवन के लिए कार्बन एक अनिवार्य तत्व है। यह हमारे डीएनए में है, हमारे भोजन में हैं और उस हवा में है जिसमें हम सांस लेते हैं। इस धरती पर कार्बन की मात्रा कभी नहीं बदलती लेकिन इस तथ्य से अंतर पड़ता है कि वह कार्बन कहां है। कार्बन का अपना एक चक्र है जिसमें यह प्राणियों और वातावरण में घूमता रहता है। वह सब जो कार्बन छोड़ते हैं कार्बन के स्रोत कहलाते हैं - जैसे खनिज द का जलना और ज्वालामुखी का फटना। और वह सब जो छोडऩे से अधिक कार्बन को अपने में समाहित रखते हैं कार्बन सिंक कहलाते हैं।

ज्वालामुखी तो धरती पर लाखों वर्षों से समय-समय पर फ़टकर कार्बन छोड़ते आए हैं लेकिन धरती के कार्बन सिंक उसे रोककर कार्बन की मात्रा को संतुलन में रखते हैं। लेकिन अब हमारे क्रियाकलापों से कार्बन का यह चक्र भयावह रूप से असंतुलित हो चला है।

अब हम धरती पर सोखने की जगह अधिक से अधिक कार्बन अपने वातावरण में फेंकने लगे हैं। धरती के नैसर्गिक कार्बन सिंक इसे रोकने में असमर्थ होने लगे हैं। इस ग्रह पर तीन प्रमुख कार्बन सिंक हैं -  महासागर, धरती की मिट्टी और हमारे वन।

 महासागर

हमारे महासागर धरती के वातावरण में फेंकी जाने वाली कार्बन को सोखने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। वायुमंडल में प्रवेश करने वाली कार्बन का एक तिहाई भाग इन समंदरों द्वारा सोख लिया जाता है। यह महासागर सदा से कार्बन सिंक नहीं थे लेकिन आधुनिक सभ्यता द्वारा उत्पन्न हुए प्रदूषण के साथ-साथ यह कार्बन सिंक में परिवर्तित हो गए। 

सबसे पहले कार्बन सागर की सतह पर समाती है और फिर लहरों के उठने-गिरने के साथ यह उसकी गहराई में जाने लगती है और परिवर्तित होती चली जाती है।कार्बन को परिवर्तित करने में सागरों में पनपने वाली वनस्पति, फाईटो-प्लैंकटन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह समुद्री पौधे कार्बन को अपने में सोख लेते हैं और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से इसे ऊर्जा और ऑक्सीजन में परिवर्तित कर देते हैं। इस प्रक्रिया में पैदा हुई ऊर्जा उन्हें जीवन देती है और उत्पन्न हुई ऑक्सीजन हमें जीवन देती है। पिछले कुछ दशकों में समुद्री तटों पर हुए निर्माण ने तटीय वनस्पति को भयानक नुकसान पहुंचाया है। समुद्रों में फेंका गया प्लास्टिक उनके फाइटो-प्लैंकटन को समाप्त कर रहा है। कार्बन को सोखने वाले यह नैसर्गिक जल भंडार प्लास्टिक के तैरते हुए पहाड़ों से पटे जा रहे हैं। कार्बन का नैसर्गिक चक्र तेजी से बिगड़ रहा है। समुद्री फाईटो-प्लैंकटन अति सूक्ष्म जीव हैं, इनका आकार इतना छोटा है कि एक बूंद पानी में लाखों समा जाएं, लेकिन यह लगातार अनगिनत टन ऑक्सीजन हमारे वायुमंडल में छोड़ते रहते हैं। इनके स्वास्थ्य पर ही समुद्र के अन्य प्राणियों का स्वास्थ्य टिका है और इन्हीं के स्वास्थ्य पर हमारा जीवन टिका है। लेकिन मनुष्य स्वयं इनका वजूद ही मिटाने पर टिका है। प्रत्येक मनुष्य प्रतिवर्ष लगभग 9.5 टन हवा का उपयोग करता है जो कार्बन डाइऑक्साइड में बदलकर निकलती है। यह फाइटो-प्लैंकटन प्रतिवर्ष कार्बन को सोख कर लगभग 330 अरब टन हवा पैदा करते हैं।

पिछले दो दशकों में जागतिक ऊष्मा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और इसके साथ ही इन समुद्री प्लैंकटन की मात्रा भी पहले से 57 प्रतिशत बढ़ गई है। जिसके कारण हमारे महासागर पहले से कहीं अधिक कार्बन सोख रहे हैं। लेकिन हमारी प्रदूषण फैलाने की रफ्तार उनसे कहीं बहुत अधिक है। इसके साथ ही इतनी मात्रा में कार्बन सोखने के कारण सागरों का जल एसिड से भरने लगा है। यह बढ़ते हुए प्लैंकटन प्रकृति की चेतावनी है कि भविष्य में धरती पर बड़े परिवर्तन आने वाले हैं जो इसके जीवन के लिए अशुभ संकेत हैं। 

वर्षा - वन

इस धरती के सबसे बड़े कार्बन सिंक हैं हमारे वर्षा - वन। यह जितना कार्बन छोड़ते हैं उससे दोगुना अपने में सोख लेते हैं। प्रतिवर्ष इस धरती पर पैदा हुई 7.6 खरब मैट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड इन वनों में समा जाती है। लेकिन ऐसा वह वन ही कर पाते हैं जिनमें लहलहाते वृक्ष खड़े हों या उग रहे हों। जिन वनों को काट दिया जाता है उनसे कार्बन डाइऑक्साइड निकलने लगती है, जैसा कि आज धरती के लगभग सारे वनों के साथ हो रहा है। अमेजन के वर्षावन जो कभी पृथ्वी के सबसे बड़े कार्बन सिंक हुआ करते थे आज भी कार्बन सोखते हैं लेकिन अब वह कार्बन फेंकने वाले वनों में परिवर्तित होने की दहलीज पर खड़े है। कॉगों के वर्षा-वन आज एक मात्र सबसे बड़े कार्बन सिंक हैं जो आज भी अपना कार्य कर रहे हैं। 

यदि हमने अपने वनों की रक्षा नहीं की और नए वृक्ष नहीं उगाए तो हम एक अंधकार मय भविष्य में प्रवेश कर जाएंगे।

धरती की मिट्टी

जहां हमारे वायुमंडल में 800 अरब टन और प्राणियों में 560 अरब टन कार्बन है, वहीं इस धरती की मिट्टी में 2500 अरब टन कार्बन समाई है। लेकिन कृषि के आधुनिक तरीकों और अंधाधुंद रासायनिक खादों के उपयोग से अब मिट्टी की परत कार्बन विहीन होती जा रही है और सारी कार्बन वातावरण में शामिल हो रही है।

आज मनुष्यता उस सीमा रेखा पर आ खड़ी हुई है जहां उसे अपनी सारी भूलों को या तो सुधारना होगा या स्वयं के लिए जागतिक आत्मघात को गले लगाना होगा। चुनाव हमारा है और उससे जन्म लेने वाला भविष्य भी हमारा है।

@अनिल सरस्वती (यैस ओशो पत्रिका से साभार)

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Sunday, September 26, 2021

लैंगिक बदलाव, पोषण एवं शारीरिक स्वच्छता पर प्रशिक्षण

  • दो दिवसीय कार्यशाला के विषयों पर विस्तार पूर्वक हुई चर्चा 
  • किशोरियों को जागरूक करने विकास संवाद समिति की पहल 

दो दिवसीय आवसीय प्रशिक्षण में भागीदारी निभाने वाली किशोरियां। 

पन्ना। पन्ना जनपद की दस्तक परियोजना के 25 ग्रामों की 50 किशोरियों का दो दिवसीय आवसीय प्रशिक्षण आयोजित हुआ। इस प्रशिक्षण में प्रत्येक ग्राम स्तरीय गठित दस्तक किशोरी समूह की दो-दो किशोरियों द्वारा भागीदारी की गई। यह प्रशिक्षण किशोरियों में शारीरिक, मानसिक, विकास बहुत तेजी से होता है। इस अवस्था में किशोरियां अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति बहुत ही संवेदनशील होती है। 

यह एक ऐसी अवस्था है जब किशोरियों का व्यहार एक महत्त्व पूर्ण आकार लेता है। जिसका प्रभाव भविष्य में उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। किशोरियों में सबसे बड़ी समस्या खून की कमी होती है। परियोजना के कार्यक्षेत्र में भी किशोरियां इस समस्या से ग्रस्त है। इसी उम्र में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है और इस अवस्था में सही पोषण न मिलने की वजह से उनमे खून की कमी हो जाती है। इस समस्या के परिणाम स्वरूप एवं कम उम्र में विवाह होने से महिलाओं एवं किशोरियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और जब गर्भ धारण करती है। तो जच्चा एवं बच्चा की मृत्यु की संभावनाएं बढ़ जाती है। इस सब पर किशोरियों को जागरूक करने हेतु विकास संवाद समिति पन्ना द्वारा कार्यशाला आयोजित की गई। यह कार्यशाला संकल्प गार्डन पन्ना में आयोजित की गई। कार्यशाला की शुरुआत, हम होंगे कामयाब, प्रेरणा गीत से हुई।दस्तक परियोजना के जिला समन्वयक रविकांत पाठक द्वारा सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए दो दिवसीय कार्यशाला के बिषयों पर विस्तार पूर्वक चर्चा की गई। इसके साथ ही कार्यशाला के उद्देश्य से सभी प्रतिभागियों को अवगत कराया गया।


प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षिका मंजू चटर्जी द्वारा किशोरियों को जेंडर समस्या को कम करने, किशोर अवस्था में होने वाले दुतियक लेंगिक बदलाव से भयभीत नहीं होने के साथ ही मानसिक रूप से भयभीत नहीं होने की सलाह दी गई। यह भी बताया गया की किशोर अवस्था में मासिक चक्र के दौरान रक्तस्राव होता है जिससे शरीर में खून की कमी होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। खून की कमी से बचने के लिए आयरन फोलिक, कैल्शियम और पोष्टिक आहार खाना चाहिए।खाने में प्रति दिन मौसमी सब्जियों, फलों के साथ ही दाल एवं दूध लेना चाहिए। इस कार्यशाला के आयोजन एवं प्रबंधन में समीना युसूफ, रामऔतार तिवारी, छत्रसाल पटेल, रामविशाल, बबली,वैशाली, कमलाकांत, दीपा, समीर खान की महत्त्व पूर्ण सहयोग प्रदान किया गया।

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Saturday, September 25, 2021

कांग्रेस ने धरना प्रदर्शन कर मंहगाई एवं बेरोजगारी पर सरकार को घेरा

  • राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन, निजीकरण बंद करने कृषि कानून वापिस लेने की मांग
  • किसानो, पिछडों, गरीबों और युवाओं के साथ खड़ी है कांग्रेस, डरें नहीं : शारदा पाठक

पन्ना जिला मुख्यालय स्थित गांधी चौक में धरना प्रदर्शन करते हुये कांग्रेसजन। 

पन्ना। पूरे प्रदेश के साथ आज बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले में भी कांग्रेस पार्टी द्वारा मंहगाई, बेरोजगारी, कृषि कानूनों सहित विभिन्न मुद्दों को लेकर  जिला कांग्रेस कमेटी पन्ना की अध्यक्ष श्रीमती शारदा पाठक के नेतृत्व में जिला मुख्यालय स्थित गांधीचौक में धरना प्रदर्शन करते हुये रैली निकाली गई और राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा गया। कांग्रेस पार्टी द्वारा जिला मुख्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में जिले के विभिन्न विकासखण्डों से कांग्रेस पार्टी के नेतागण, ब्लाक पदाधिकारी सहित मोर्चा संगठनों, युवक कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवादल, भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन, जिला कांग्रेस कमेटी पिछड़ा वर्ग विभाग, अनुसूचित जाति विभाग तथा अल्पसंख्यक विभाग के पदाधिकारीगण सहित बड़ी संख्या में पार्टी के कार्यकर्ता शामिल रहे। 

गांधी चौक में आयोजित धरना प्रदर्शन कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस के नेताओं द्वारा गत दिवस प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा पन्ना में आयोजित कार्यक्रम में गरीबों के लिये अपमानजनक शब्दावली का उपयोग किये जाने पर नाराजगी जाहिर की तथा कहा कि कानून व्यवस्था पूरी तरह से खराब हो चुकी है।  महिलाएं, बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। जिले में ही ऐसी कई घटनाएं घटित हो रही हैं जो कि न केवल दुखद हैं बल्कि घटनाओं से साफ जाहिर है कि गरीबों, पिछड़ो, कमजोर वर्ग के लोगो पर सरकारी संरक्षण में अत्याचार हो रहे हैं। इतना ही नहीं इन घटनाओं को दबाने की कोशिश भी की जा रही है। पवई तहसील क्षेत्रान्तर्गत एक युवती के साथ हुई हैवानियत भरी घटना को लेकर कांग्रेस के नेताओं द्वारा नाराजगी जाहिर की गई तथा कहा गया कि पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिये कांग्रेस जब सामनें आई तब प्रशासन एवं सरकार जागी और आरोपियों के विरूद्ध कार्यवाही हुई। परंतु अभी भी पीडि़ता और उसके परिवार को सुरक्षा मुहैया नहीं करवाई गई और न ही कोई सहायता दी गई।  जिससे पीडि़त एवं गरीबों में भय व्याप्त है। 


आयोजित कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री झूठी घोषणाएं करते हैं, तीन साल पहले पन्ना जिले के लिये जो घोषणाएं की गई थीं उनमें से अब तक कोई काम नहीं किया गया और वहीं घोषणाएं फिर से इस बार भी मुख्यमंत्री द्वारा की गई हैं। वक्ताओं के उद्बोधन के अंत में कांग्रेस पार्टी की जिलाध्यक्ष श्रीमती शारदा पाठक ने कहा कि पन्ना जिले में कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता गरीबों एवं पिछड़ो, युवाओं, किसानों तथा शोषित पीडि़तों की लड़ाई लडऩे के लिये तैयार है, किसी को भी डरने की जरूरत नही है। केन्द्र और प्रदेश में बैठी दोनो सरकारों से जनता ऊब चुकी है और जिन्होने जनता के साथ अन्याय किया है उसका बदला हम जरूर लेंगे। 

धरना प्रदर्शन के उपरांत गांधी चौक से कटरा बाजार होते हुये अजयगढ़ चौराहे तक रैली निकाली गई और अजयगढ़ चौराहे में पहुंचे सैकड़ो की संख्या में कांग्रेसियों द्वारा कलेक्टर प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित नायब तहसीलदार ममता मिश्रा को राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा गया।  जिसमें कोविड से हुई मौत के मामलें में परिजनों को मुआवजा देने, कांग्रेस के न्याय योजना के तहत सभी परिवार को 7500 रूपये प्रति माह दिये जाने, कृषि कानून समाप्त किये जाने, डीजल, पेट्रोल से एक्साईज ड्यूटी कम कर जनता को राहत देने, देश की संपत्तियों, कंपनियों को निजी हाथों में नही सौंपे जाने, मनरेगा में 200 दिन की गांरटी दिये जाने, पैगासस जासूसी मामलें की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में करवाये जाने, सूक्ष्य एवं मध्यम उद्योगो को आर्थिक पैकेज दिये जाने की मांग की गई है। इसके साथ ही साथ जिले की स्थानीय मांगो में कोरोना काल में कोविड से हुई मौत का प्रमाण पत्र देने एवं मुआवजा देने, अघोषित बिजली कटौती को बंद करने, सिंहपुर रामनगर मार्ग का कार्य गुणवत्तापूर्वक कराये जाने, स्मार्ट सिटी योजना में हुई भ्रष्टाचार की जांच करने एवं बुंदेलखण्ड पैकेज में हुये भ्रष्टाचार की जांच किये जाने की मांग की गई है।

प्रर्दशन में ये रहे शामिल

कांग्रेस कमेटी के उक्त प्रर्दशन में मुख्य रूप से विधायक शिवदयाल बागरी, पूर्व विधायक फुंदर चौधरी, जनपद अध्यक्ष भरत मिलन पाण्डेय, पूर्व प्रत्याशी शिवजीत सिंह भैयाराजा, प्रदेश कांग्रेस सचिव वीरेन्द्र द्विवेदी, रावेन्द्र प्रताप सिंह मुन्नाराजा, भुवन विक्रम ंिसंह केशु राजा, पुष्पेन्द्र सिंह परमार, मनीष मिश्रा, अरूण पाल सिंह, हीरा सिंह, मुरारीलाल थापक, पंडित उमाशंकर चौबे, मार्तन्डदेव बुंदेला, रामप्रसाद यादव, बृजमोहन यादव, सेवालाल पटेल, जीवन लाल सिद्धार्थ, मनोज केशरवानी, डीके दुबे, पवन जैन, इंदु तिवारी, अक्षय तिवारी, रेहान मोहम्मद, आस्था तिवारी, प्रमोद श्रीवास्तव, सुनील अवस्थी, हेतराम शर्मा, धीरेन्द्र लटौरिया, अजय श्रीवास्तव, हक्कुन दहायत, ज्ञान प्रकाश तिवारी, अंकित शर्मा, केशरी अहिरवार, गोले कु शवाहा, बीएन जोशी, सुरेश सोनी, श्रीराम पाठक, मोहम्मद मेहबूब, ब्लाक अध्यक्षगण अनीस खान, आनंद शुक्ला, अशोक जैन, माखन पटेल, शंकर प्रसाद द्विवेदी, जयनरेश द्विवेदी, आजाद शहिद खान, मोर्चा संगठन अध्यक्ष लक्ष्मी दहायत, रामबहादुर द्विवेदी, जीतेन्द्र जाटव, कदीर खान, राजबहादुर पटेल, शशिकांत दीक्षित, आशीष बागरी, पुरूषोत्तम जडिय़ा, वैभव थापक, जयराम यादव, शिवप्रकाश दीक्षित, ऋतुराज दीक्षित, सौरभ पटेरिया, मनोज सेन, अरविंद सोनी, धूराम अहिरवार, पुरूषोत्तम पीढि़हा, सौरभ गौतम, अशोक मिश्रा, धीरेन्द्र मिश्रा, रामकरण पाण्डेय, नथ्थू सेन, सुरेन्द्र सेन, तुलसीदास उरमलिया, हीरालाल विश्वकर्मा सहित सैकड़ो की संख्या में कांग्रेसजन उपस्थित रहे। कांग्रेस का सफल संचालन पूर्व युवक कांग्रेस अध्यक्ष दीपक तिवारी ने किया।

प्रदर्शन में ली कांग्रेस की सदस्यता

प्रदर्शन के दौरान धरमपुर क्षेत्र के दो दर्जन लोगो ने जिला कांग्रेस अध्यक्ष शारदा पाठक के हाथो कांग्रेस की सदस्यता ली गई, जिनमें वीरेन्द्र लोधी, रामनिवास लोधी, संजय तिवारी, मुकेश सोनी, रूद्र प्रताप, राजकुमार प्रजापति, रामबहोरी लोधी, शाीतल शुक्ला सहित अन्य लोगो ने कांग्रेस की सदस्य ग्रहण की।

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मनुष्य और पानी : ढेकली से सबमर्सिबल तक


 ।। बाबूलाल दाहिया ।।

पानी के बिना किसी जीवधारी की कल्पना ही नही की जा सकती। यह अलग बात है कि उसके ग्रहण करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। जैसे साँप, छिपकली आदि कुछ जीवों को वह भोजन के साथ ही मिल जाता है। पर मनुष्य और पशुओं को भोजन अलग और पानी अलग ग्रहण करना पड़ता है।        

 मनुष्य का पानी से काफी प्राचीनतम रिस्ता रहा है। शायद तभी से जब वह नर बानर के रूप में आदिम अवस्था में था और पेड़ो तथा गुफाओं में रहता रहा होगा। क्यों कि हर जीव को अपने शरीर के तापमान को 37 डिग्री सेल्सियस बनाये रखने के लिए पानी की जरूरत प्रकृति प्रदत्त अनिवार्यता है। वर्ना अधिक ताप को शरीर के बर्दास्त न करने से मृत्यु अवश्यम्भावी है।  इसलिए नर बानरों का समूह भी पानी के लिए मौका देख अपने परम्परागत पत्थर, लकड़ी के आयुध हाथ में लेकर बार- बार नदी झील झरनों में जाता रहा होगा।

किन्तु प्रकृति के "जीवहि जीवश्य भोजनम " से भला वह कैसे बच सकता था? इसलिए हिंसक पशु शेर, चीते, भेड़िये भी इसी ताक में रहते रहे होंगे कि - "कब यह पेड़ से उतरे और कब हम इसके सुस्वाद नमकीन कोमल मांस का निबाला बनाले।"

फिर मनुष्य के दो अदद फुर्सत के हाथ और एक अदद बिलक्षण बुद्धि ने जोर मारा होगा। उसे जंगल में कहीं लौकी के बड़े - बड़े फल दिखे होंगे। उसने उन सूखे फलों में छेद कर रस्सी से उसे बांध अपने पानी लाने का पुख्ता साधन बनाया होगा। ताकि वह बार - बार पेड़ से उतर कर पानी पीने के बजाय कुछ समय के लिए उसे संचित कर सके।

किन्तु इसमें एक समस्या यह थी कि पानी शीघ्र ही गर्म हो जाता रहा होगा। इधर वह तब तक जानवरों से अपनी शुरक्षा के लिए अब गोफना, गुलेल से होते हुए मोगदर और हिरन के सींग में लाठी डाल भाले तक की यात्रा पूरी करली थी। इसलिए गुफा और पेड़ के बजाय अब नदियों के किनारे झोपडी बनाकर रहने लगा था। जिससे जानवर भी उस दो पाये से डरने लगे थे।

कालांतर में जंगल में लगी आग से दीमक की बनाई बॉबी को पककर मजबूत शक्ल में ढलते  देख उसकी अक्ल ने जोर मारा होगा और उसने पानी रखने के लिए मिट्टी के बर्तन बनाये होंगे। इसमे तुम्बे के बजाय उसे अधिक ठंडा पानी मिलने लगा होगा।

यह रही पानी की मनुष्य की आदिम यात्रा। जिसके अवशेष आजादी के पहले तक कई आदिवासी समुदायों के घरो में तुम्बे, तुम्बी के रूप में मौजूद थे। पर जब लौह आयस्क की खोज के बाद मनुष्य ने मैदान में कुँआ खोद वहां बस्ती बसाया तो जंगल से तरकारियाँ लाने के बजाय सब्जी उगाने की ओर भी मनुष्य का ध्यान गया ।

उसने दो भुजाओं बाले मोटे लट्ठे को कुंए के पास गाड़ एक हाँथ डेढ़ हाँथ की लकड़ी से कुंए की गहराई के बराबर की लम्बी लकड़ी को जोडा और ढेकली नामक एक यंत्र बना डाला। फिर उसमे रस्सी बांध मरके से पानी खीच सिचाई करने लगा। पर उसके फिदरती दिमाग को फिर भी चैन कहा? उसने तरसा, रहट आदि उपकरण बना अब सब्जियों के साथ- साथ अनाजों की भी सिचाई करनी शुरू कर दी।

तुम्बी से लेकर रहट तक की पानी की यह यात्रा तो ठीक ही थी। क्योंकि इसमें प्रकृति के ऊपर कोई खास विपरीत असर नहीं पड़ता था। किन्तु अब यह इक्कीसवी सदी की जो पम्प और सबमर्सिवल पम्प की यात्रा हुई, वह कुछ वर्षों में ही सत्यानासी सिद्ध होने लगी। क्योंकि इससे अब 1000 फीट तक का पानी खीच धरती को निपान किया जाने लगा है।

अब तो यह मनुष्य की करतूत हमे उन पंचतंत्र के ऋषि की याद दिला रही है जिनके बारे मे कहा गया है कि -- "एक ऋषि को जन्तुओं को जीवित कर लेने का मंत्र ज्ञात था। उन्हें शरारत सूझी और साथियों के रोकने के बाद भी उनने एक बाघ के अस्थि पंजर में हाड मांस चमड़ा आदि लगाने के बाद  प्राण भी डाल दिया। फिर क्या था ? वह बाघ उठा और ऋषि को तो खाया ही उनके कुछ मूर्ख  साथियों को भी खा गया, जो पेड़ में नही चढ़े थे।"

आज वह बिकास रूपी बाघ वैश्विक तपन और जलवायु परिवर्तन के रूप में मुँह बाए खड़ा है। किन्तु पता नही मनुष्य रूपी इस ऋषि को कब तक में अपनी इस विनाश का रूप धारण कर रही तथा कथित विकास रूपी मूर्खता का अहसास होगा।

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पन्ना जिले में खुलेंगे 159 सीएम राइज स्कूल : मुख्यमंत्री

  • सीएम ने विभिन्न विकास कार्यो का किया शिलान्यास, भूमिपूजन एवं लोकार्पण
  • पन्ना की सकरिया हवाई पट्टी का होगा निर्माण, यहाँ पर फिर से उतरेंगे विमान  

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पन्ना में जनसभा को सम्बोधित करते हुए। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बच्चों को बेहतर और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रदेश के सभी जिलों में सीएम राइज स्कूल खुलेंगे। पन्ना जिले में तीन चरणों में 159 स्कूल खोले जायेंगे। यह बात प्रदेश के मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार 24 सितम्बर को पन्ना में विशाल आम सभा को सम्बोधित करते हुए कही। उन्होंने पन्ना सहित सागर संभाग के जिलों को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में 119 करोड़ 83 लाख 66 हजार के 38 कार्यो की सौगात भी दी। 

मुख्यमंत्री ने पन्ना जिले को पवित्र और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व अद्भुत बताया और कहा कि पन्ना जिले को पर्यटन और रोजगार से जोड़कर प्रदेश का एक नम्बर का जिला बनाया जायेगा। मुख्यमंत्री श्री चौहान पन्ना के शासकीय पॉलीटेक्निक कॉलेज के प्रांगण में जनकल्याण और सुराज अभियान कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित जनसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं उप स्वास्थ्य केन्द्रों के उन्नयन तथा विकास कार्यो का शिलान्यास, भूमिपूजन एवं लोकार्पण भी किया। कार्यक्रम में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा,खनिज साधन एवं श्रम मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी, प्रभारी मंत्री श्री कावरे सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

सीएम ने विभिन्न कार्यों का लोकार्पण एवं भूमि पूजन करने के साथ-साथ सौगातों की झड़ी लगाई। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को पन्ना में 120 करोड़ रुपए के कार्यों का लोकार्पण एवं भूमि पूजन करने के साथ-साथ सौगातों की झड़ी लगा दी। उन्होंने कहा कि पन्ना की पुरानी सकरिया हवाई पट्टी को फिर से चालू किया जाएगा ताकि पर्यटक यहां आकर पन्ना के भव्य मंदिरों के साथ-साथ वनराज का भी दीदार कर सकें। हवाई पट्टी शुरू होने से यहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि मौजूदा दौर में टाइगर भी रोजगार का बड़ा साधन है। पन्ना टाइगर रिजर्व से रोजगार के नए अवसर कैसे पैदा हों, इस दिशा में कदम उठाए जाएंगे। पॉलिटेक्निक मैदान में आयोजित विशाल सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पढ़ाई- लिखाई, दवाई तथा रोटी, कपड़ा और मकान का इंतजाम करना सरकार की प्राथमिकता है। प्रदेश में किसी भी व्यक्ति को बिना इलाज के नहीं रहने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि गरीबों का राशन उन्हें मिलना चाहिए यदि किसी ने गड़बड़ी की तो हथकड़ी लगवा दूंगा।

 पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर कटाक्ष करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उन्होंने पन्ना के हक पर डाका डालकर कृषि महाविद्यालय छिंदवाड़ा ले गए थे। मैं आज पन्ना को कृषि महाविद्यालय की सौगात दे रहा हूँ। अब पन्ना के हक पर डाका नहीं डालने दिया जाएगा। एक जिला एक उद्योग के तहत पन्ना में आंवला आधारित प्रसंस्करण केंद्र शुरू किए जाएंगे। पन्ना शहर की पेयजल समस्या के संबंध में मुख्यमंत्री ने कहा कि पन्ना प्यासा नहीं रहेगा। इसके लिए चाहे केन नदी से पानी लाना पड़े या बांध से शीघ्र पहल की जाएगी। आपने कहा कि प्रदेश में एक साल के भीतर एक लाख सरकारी नौकरी में भर्ती की जाएगी। 

मंदिरों के दर्शन हेतु पन्ना में बनेगा "टेम्पल वॉक"

उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि पन्ना जिला अस्पताल के लिए आज सिटी स्कैन मशीन का लोकार्पण हो रहा है। पन्ना जिले में स्वास्थ्य सेवाओं  में कोई कमी नहीं रहने दी जायेगी। 200 बिस्तर के जिला अस्पताल को 300 बिस्तरीय किया जायेगा। उन्होंने कहा कि पन्ना में मंदिरों के गौरवशाली इतिहास को देखते हुये यहां "टेम्पल वॉक" बनेगा, ताकि जो पर्यटक खजुराहो आये वो पन्ना भी आकर मंदिरों के दर्शन कर सकें। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। श्री चौहान ने कहा कि पन्ना जिले में हवाई पट्टी बनेंगी। जिले के गॉवों को होम स्टे योजना में शामिल करने की भी मुख्यमंत्री ने घोषणा की। उन्होंने बताया कि हीरों के लिये प्रसिद्ध पन्ना जिले में डायमंड पार्क की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हो गयी है। श्री चौहान ने शासकीय पॉलीटेक्निक कॉलेज में व्यवसाय से जुड़े नये ट्रेड और इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने का आश्वासन भी दिया। उन्होंने कहां कि एक जिला एक उत्पाद के तहत ऑवला के लिये चयनित पन्ना में ऑवला आधारित प्र-संस्करण केन्द्र स्थापित किया जायेगा। 

बंगालियों के 150 परिवारों को पट्टा दिलाये जाने के निर्देश

जिले के पट्टा विहीन बंगाली समाज के 150 परिवारों को तत्काल पट्टा दिलाये जाने के निर्देश भी मुख्यमंत्री ने दिये। उन्होंने कहा कि किसी भी गरीब को पट्टा विहीन नहीं रहने दिया जायेगा। गरीबों को रहने के लिये जमीन का पट्टा देकर मालिक बनाया जायेगा। जिसके पास पट्टे नहीं हेैं उन्हें भूखण्ड दिये जायेंगे। ऐसे गरीब जिनके पास पट्टे हैं, उनके लिये चरणबद्ध तरीके से मकान बना कर दिये जायेंगे। उन्होंने कहा कि प्रदेश में विभिन्न चरणों में सीएम राइज स्कूल खोले जायेंगे। इस साल 300 स्कूल खुलेंगे। जहां बच्चों को गणित, अंग्रेजी, विज्ञान की शिक्षा मिलेगी। स्कूल के निर्माण पर 18 से 24 करोड़ खर्च होंगे तथा आस-पास के 20-25 गांव लाभांवित होंगे। पन्ना जिले में 3 चरण में 159 स्कूल खुलेंगे। उन्होंने कहा कि पोषण आहार बनाने का काम ठेकेदारों से लेकर महिलाओं के स्व-सहायता समूहों को दिया जायेगा। उन्होंने निर्देश कि महिलाओं के स्व-सहायता समूहों को विद्यार्थियों के गणवेश सिलने का काम भी सौंपा जाये।

पन्ना जिला अब पिछड़ा नहीं रहेगा : शर्मा 

कार्यक्रम में मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने पन्ना के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुये इसको रोजगार और पर्यटन से जोड़ने का अनुरोध किया। उन्होंने पन्ना व अजयगढ़ क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट कराते हुए खनिज मंत्री व क्षेत्रीय विधायक श्री सिंह ने भरोसा जताया कि प्रदेश के मुखिया क्षेत्र के लोगों को समस्याओं से निजात दिलायेंगे। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व सांसद विष्णु दत्त शर्मा ने कहा कि बुन्देलखण्ड का पन्ना जिला अब पिछड़ा नहीं रहेगा। उन्होंने बताया कि हीरा के कारण पूरे विश्व के लोग यहां आना चाहते हैं। पन्ना को शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन किसी भी क्षेत्र में पिछड़ने नहीं देंगे। खजुराहो के जरिये पन्ना को पर्यटन से जोड़ने के प्रयास किये जा रहे हैं। जिले की पेयजल और सिंचाई समस्या को भी दूर किया जा रहा है।

पन्ना में मुख्यमंत्री की प्रमुख घोषणाएं-




0 पन्ना की पुरानी सकरिया हवाई पट्टी को पुन: चालू किया जाएगा। हवाई पट्टी बनने से पर्यटक आएंगे जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

0 पन्ना जिले के गांवों को होम स्टे योजना में शामिल करने की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हीरों के लिए प्रसिद्ध पन्ना में डायमंड पार्क भी बनाया जाएगा। 

0 शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज में व्यवसाय से जुड़े नए ट्रेड और इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने का भी आश्वासन दिया।

0 एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत आंवला के लिए चयनित पन्ना में आंवला आधारित प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया जाएगा।

0 पन्ना में अनेकों भव्य व प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें देखते हुए यहां "टेंपल वॉक" बनेगा ताकि जो पर्यटक खजुराहो आयें वे पन्ना भी आकर मंदिरों के दर्शन कर सकें।

0 पन्ना के लिए पूर्व में स्वीकृत कृषि महाविद्यालय जिसे छिंदवाड़ा ले जाया गया है, पुन: वापस दिलाया जाएगा। 0 पन्ना टाइगर रिजर्व के माध्यम से रोजगार के नए अवसर सुलभ कराए जाएंगे।

0 पन्ना धार्मिक व पवित्र नगरी है जिसे पर्यटन और रोजगार से जोड़कर प्रदेश का एक नंबर का जिला बनाया जाएगा।

0 गरीब के बच्चे को बेहतर शिक्षा मिले, इसके लिए सीएम राइज स्कूल खुलेंगे। वर्ष 2021 में ही 300 सीएम राइज स्कूल खुल जाएंगे, जिसमें गांव के बच्चे पढऩे के लिए बस से स्कूल आएंगे। 

0 पन्ना जिले में 3 चरणों में 159 सीएम राइज स्कूल खोले जाएंगे। इन स्कूलों में बच्चे अंग्रेजी के साथ ही अन्य विषयों की बेहतर शिक्षा हासिल कर सकेंगे।

0 किलकिला फीडर कैनाल को फिर से बनाया जाएगा तथा खोरा तालाब का निर्माण 7 करोड़ 73 लाख रुपए की लागत से किया जाएगा।

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Thursday, September 23, 2021

नीलामी में नहीं बिका 14.09 कैरेट का सबसे बड़ा हीरा

  • नीलामी में कुल 105 नग हीरे 1 करोड़ 87 लाख 11493 रुपये में बिके 
  • शासन को नीलामी से 21,51882 रूपये राजस्व के रूप में प्राप्त हुए 


।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की उथली हीरा खदानों से प्राप्त हीरों की तीन दिनों तक चली नीलामी आज ख़त्म हो गई। नीलामी में 155 नग हीरे जिनका बजन 206.68 कैरेट था, बिक्री के लिए रखे गये थे। इन हीरों की अनुमानित कीमत 1,6700945 रूपये आंकी गई थी।

हीरा अधिकारी 

हीरा अधिकारी रवि पटेल ने बताया कि कलेक्टर संजय कुमार मिश्र की अध्यक्षता में 21 सितम्बर से 23 सितम्बर तक जिले की उथली खदानों से प्राप्त हीरों की नीलामी की गई। सम्पन्न हुई नीलामी में कुल 105 नग हीरे जिनका बजन 141.32 कैरेट था वे 1,8711493 रूपये में विक्रय किये गये हैं। इस नीलामी से शासन को 21,51882 रूपये राजस्व के रूप में प्राप्त हुये।  

हीरा अधिकारी ने बताया कि नीलामी में रखा गया 14.09 कैरेट वजन का सबसे बड़ा हीरा इस बार भी नहीं बिका। पिछली नीलामी में भी इस हीरे की अपेक्षित बोली न लगने के कारण पेंडिंग में डाल दिया गया था। पूरे 6 माह बाद हुई हीरों की इस नीलामी में इसके अच्छी कीमत में बिकने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन निराशा हुई। 

मालुम हो कि 14.09 कैरेट वजन वाला जेम क्वालिटी का यह हीरा विगत 8 माह पूर्व फरवरी माह में पन्ना के एनएमडीसी कॉलोनी नया पुरवा निवासी रामप्यारे विश्वकर्मा को कृष्णा कल्याणपुर की पटी हीरा खदान में मिला था। हीरा धारक रामप्यारे विश्वकर्मा नीलामी शुरू होने पर बेहद उत्साहित था कि अब उसकी तंगहाली दूर हो जाएगी। लेकिन हीरा न बिकने से वह निराश है, उसे अब अगली होने वाली नीलामी तक इंतजार करना पड़ेगा। 

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एसिड अटैक : युवती को जबरन घर से ले गए और आंखों में डाला जहरीला घोल

  • शांति का टापू कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में पवई थाना क्षेत्र के गांव बराहों की दिल दहला देने वाली इस घटना ने हर किसी को विचलित कर दिया है। मामले के दोनों आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

जिला चिकित्सालय पन्ना में पीड़िता से जानकारी लेते पुलिस अधीक्षक धर्मराज मीणा। 

पन्ना । मुझे जबरदस्ती घर से पकड़ कर जंगल में ले गए, खूब मारा और जबरन दोनों आंखों में दवाई (एसिड) डार दई। एसिड अटैक का शिकार हुई 21 वर्षीय युवती रोशनी (बदला हुआ नाम) ने जिला अस्पताल पन्ना में बुधवार 22 सितंबर को अपनी आपबीती सुनाई। मामला जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 70 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत सुनवारी के छोटे से गांव बराहों का है। पीड़िता की मां बचपन में ही गुजर गई है तथा पिता भी छोड़ कर कहीं चले गए हैं। ऐसी स्थिति में युवती व उसके छोटे भाई को परिवार के अन्य लोगों ने पाल पोशकर बड़ा किया है।

घटना दिनांक 21 सितंबर की उस ख़ौफ़नाक सुबह को याद कर पीड़िता सिहर उठती है। घटना के दूसरे दिन जब उसे गंभीर हालत में पवई के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से पन्ना जिला अस्पताल लाया गया, तो मामला प्रकाश में आते ही हड़कंप मच गया। पीड़िता ने बताया कि वारदात को अंजाम गांव के ही सुमेर राजा व इनके रिश्तेदार गोल्डी राजा ने दिया है। पिछड़े वर्ग व गरीब परिवार की इस युवती ने बताया कि उसका छोटा भाई दिल्ली में मजदूरी करता है तथा वह गांव में छोटी सी दुकान चलाती है। घटना के बाद से रोशनी की जिंदगी में अंधेरा छा गया है। उसकी आंखें झुलस गई हैं तथा उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है।

इस खौफनाक वारदात के पीछे की असल वजह क्या है ? इस संबंध में पीड़िता ने पत्रकारों को बताया कि विगत 4 माह पूर्व आरोपियों के परिवार की एक लड़की कहीं चली गई है। तभी से आरोपी उसे प्रताड़ित करते आ रहे हैं। आरोपियों का गांव में दबदबा है, उनके खिलाफ कुछ कहने और बोलने की कोई हिम्मत नहीं करता। पीड़िता ने बताया कि आरोपियों को यह शक था कि उनके परिवार की जो लड़की लापता हुई है उसकी जानकारी मुझे है। मैं उन्हें बताती रही कि मुझे कुछ भी नहीं पता फिर भी उन्होंने एक नहीं सुनी। मेरे छोटे भाई को दिल्ली से जबरन ले आए और मंगलवार को मुझे घर से जबरदस्ती उठाकर जंगल ले गए। वहां मेरे भाई व मुझे खूब मारा और फिर मुझे लिटाकर दोनों आंखों में कोई जहरीला घोल डाल दिया। मेरा भाई कहां है यह मुझे नहीं पता।

एसिड अटैक की घटना से स्तब्ध हैं लोग

पन्ना जिले में एसिड अटैक की यह पहली घटना है, यही वजह है कि घटना के बाद से लोग स्तब्ध व ख़ौफ़ज़दा हैं। बताया गया है कि 21 सितंबर को वारदात के बाद आरोपी ने ही मोटरसाइकिल से पीड़िता को दोपहर में उसके घर छोड़ा था। इसके बाद परिजनों ने 100 डायल की मदद से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पवई ले गए और वहां भर्ती कराया। युवती की गंभीर हालत को देखते हुए उसे जिला चिकित्सालय के लिए रेफर कर दिया गया। मामले पर विभिन्न संगठनों ने चिंता जाहिर करते हुए आक्रोश जताया है। जिला कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष श्रीमती शारदा पाठक पीड़िता से जिला अस्पताल में मिलीं और इस अमानवीय घटना को शर्मसार करने वाली बताया। उन्होंने कानून व्यवस्था की स्थिति पर भी चिंता जाहिर की है। श्रीमती पाठक का कहना है कि एसिड अटैक का शिकार न तो मर पाता है और न ही जी पाता है। एसिड से उसका शरीर ही नहीं आत्मा भी झुलस जाती है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 24 को दौरे पर आ रहे पन्ना

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 24 सितम्बर को दौरे पर पन्ना आ रहे हैं। पूरा प्रशासन जब मुख्यमंत्री के दौरे की तैयारियों में जुटा हुआ है उस समय यह घटना होने पर प्रशासन की धड़कने भी बढ़ी हुई हैं। जिले के प्रशासनिक मुखिया संजय कुमार मिश्र व पुलिस कप्तान धर्मराज मीणा आनन-फानन जिला अस्पताल पहुंचकर घटना पर मलहम लगाने का प्रयास किया है। उन्होंने पीड़िता की हरसंभव मदद व आरोपियों की शीघ्र गिरफ़्तारी कर उनके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही का भरोसा दिलाया है। जिला चिकित्सालय पन्ना के सिविल सर्जन डॉक्टर एल.के. तिवारी ने बताया कि सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट के आई हॉस्पिटल चित्रकूट के डायरेक्टर डॉ. वी.के. जैन से उनकी बात हो गई है, उन्होंने समुचित इलाज का भरोसा दिया है। आंखों के बेहतर इलाज हेतु एंबुलेंस के माध्यम से पीड़िता को चित्रकूट भेजा गया है। उन्होंने कहा कि इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी, इलाज की संपूर्ण व्यवस्था प्रशासन करेगा।

घटना के दूसरे दिन दोनों आरोपी हुए गिरफ्तार

युवती के चेहरे व आंखों पर जहरीला पदार्थ डालकर आशय पूर्वक प्राणघातक हमला एवं  मारपीट करने जैसे घिनौने और सनसनीखेज अपराध के दो आरोपियों को पन्ना पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। साइबर सेल पन्ना ने जारी विज्ञप्ति में बताया कि थाना पवई के सनसनीखेज अपराध जिसमें आरोपियों ने नवयुवती के आंख में विषैला व तरल रासायनिक अम्लीय/ क्षारीय पदार्थ डालकर जान से खत्म  करने की नीयत से मारपीट कर उसका जीवन संकट में डाला था, उन अपराधियों को जिला पन्ना की पुलिस टीम ने पुलिस धर्मराज मीना के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में कुछ घंटे के अंदर ही आरोपियों को पकडऩे में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। गिरफ़्तारी के बाद 22 सितम्बर की शाम आरोपियों को शहर की सड़कों से पैदल कोतवाली तक ले जाकर यह संदेश दिया गया है कि मध्य प्रदेश पुलिस एवं पन्ना जिले की पुलिस महिलाओं की स्वतंत्रता व सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु गंभीर एवं सदैव तत्पर है।

पीड़िता की स्थिति पहले से बेहतर : गृह मंत्री 

मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का भी इस मामले में बयान आया है। उन्होंने कहा है कि पन्ना मामले के आरोपियों को बख्शा नही जाएगा। दोनों आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है और उन पर कानून के अनुसार सख्त से सख्त कार्रवाई की जा रही है। पीड़िता डॉक्टरों की निगरानी में है और उसकी स्थिति पहले से बेहतर है। मिली जानकारी के मुताबिक पन्ना के बराहों गांव की एसिड अटैक पीड़िता का इलाज चित्रकूट के श्री सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय में चल रहा है। यहाँ के डायरेक्टर डॉ वी.के. जैन एवं डॉ ईलेश जैन ने बताया आंखों की नेत्र ज्योति नहीं जाएगी यानी युवती अंधा होने से बच गई है। एक आंख अधिक डैमेज है, जिसको रिकवर करने में समय लगेगा। डॉ ईलेश जैन का कहना है की पन्ना जिले के प्रशासन, पुलिस एवं स्वास्थ्य अधिकारी संपर्क में है। स्वास्थ्य का अपडेट ले रहे हैं। हमारी टीम को पूरा विश्वास है कि किशोरी की नेत्र ज्योति सुरक्षित रहेगी। कुछ दिनों तक अस्पताल में ही भर्ती रखना पड़ेगा। आंख में जो बर्न है उसको ठीक होने में समय लगेगा। ऐसी ही जानकारी सिविल सर्जन डॉ एल.के. तिवारी ने दी है।

मामले में गृह मंत्री का बयांन -  


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Wednesday, September 22, 2021

युवती पर एसिड अटैक की घटना ने पन्ना को दहलाया

  •  पवई थाना क्षेत्र के ग्राम बराहो की है यह खौफनाक घटना
  •  पीड़ित युवती को जिला चिकित्सालय में कराया गया भर्ती

पीड़िता से बातचीत करते कलेक्टर संजय कुमार मिश्र। 

।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में पवई थाना क्षेत्र के ग्राम बराहो में युवती पर हुए एसिड अटैक की घटना ने सबको दहला दिया है। घटना मंगलवार 21 सितम्बर की है। युवती को गंभीर हालत में इलाज के लिए जिला चिकित्सालय पन्ना में भर्ती कराया गया है। गांव के दबंगों द्वारा बेखौफ अंदाज में जिस तरह से घटना को अंजाम दिया गया है, उससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। आरोपी दो युवकों की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही है। एसिड अटैक का शिकार हुई किशोरी से जिला अस्पताल में मिलने कलेक्टर संजय कुमार मिश्र व पुलिस अधीक्षक धर्मराज मीणा पहुंचे। उन्होंने मामले में सख्त कार्यवाही का भरोसा दिलाया है।  

पीड़िता का कहना है कि गांव के ही सुमेर सिंह और गोल्डी राजा पहले उसको पकड़ कर जंगल की तरफ ले गए, इसके बाद बदसलूकी करने पर जब मैंने विरोध किया तो आंखों में कोई दवाई (तेजाब) डाल दिया। युवती के मुताबिक उसके भाई को भी आरोपी पकडे हुए हैं, जिसका अभी तक पता नहीं है। पुलिस ने पवई अस्पताल में पीड़िता के बयान लिए हैं। थाना पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक आरोपीगण के विरुद्ध थाना पवई में  अपराध क्र. 319/21 धारा 294, 323 ,324 ,506 ,34 ,ता.हि. के तहत अपराध पंजीबध्द किया गया। विवेचना के दौरान धारा 326 का इजाफा किया गया है। पुलिस अधीक्षक पन्ना धर्मराज मीना ने पुलिस टीमें गठित कर आरोपियों की शीघ्र गिरफ़्तारी करने के निर्देश दिए हैं।   

पीड़िता से मिलने पहुंची कांग्रेस जिलाध्यक्ष

जिले की पवई तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम कृष्णगढ़ के समीपी ग्राम बराहो में  20 वर्षीय युवती के साथ दबंगों द्वारा छेड़छाड़ करने एवं उसका विरोध करने पर आंखों में एसिड डालकर गंभीर रूप से घायल कर देने की घटना की जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष श्रीमती शारदा पाठक ने कड़े शब्दों में निंदा की है।  घटना की जानकारी प्राप्त होते ही वे कांग्रेसी नेताओं के साथ जिला चिकित्सालय पहुंची और युवती के साथ मौजूद परिजनों से घटना की विस्तार से जानकारी ली। उन्होंने कहा कि युवती के साथ इस घिनौना कृत्य करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने के लिए जिस स्तर की लड़ाई लड़नी होगी वह लड़ी जाएगी। जिला चिकित्सालय के बाद श्रीमती पाठक सीधे पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंची, जहां पर उन्होंने एसपी धर्मराज मीणा से  मुलाकात करते हुए अपराधियों को तत्काल गिरफ्तार किए जाने की मांग की।

मुख्यमंत्री को दौरे पर आना है पन्ना 

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह दो दिन बाद ही दौरे पर 24 सितम्बर को पन्ना आ रहे हैं। पूरा प्रशासन जब मुख्यमंत्री के दौरे की तैयारियों में जुटा हुआ है उस समय ऐसी खौफनाक घटना होने पर प्रशासन की धड़कने भी बढ़ी हुई हैं। जिले के प्रशासनिक मुखिया संजय कुमार मिश्र व  पुलिस कप्तान धर्मराज मीणा आनन-फानन जिला अस्पताल पहुंचकर घटना पर मलहम लगाने का प्रयास किया है। उन्होंने पीड़िता की हरसंभव मदद व आरोपियों की शीघ्र गिरफ़्तारी कर उनके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही का भरोसा दिलाया है। बताया गया है कि पीड़िता की दोनों आँखों में एसिड पड़ने से उसको दिखाई नहीं दे रहा। जिला चिकित्सालय पन्ना के सिविल सर्जन डॉक्टर एल.के. तिवारी ने बताया कि सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट के आई हॉस्पिटल चित्रकूट के डायरेक्टर डॉ. वी.के. जैन से मेरी बात हो गई है, उन्होंने समुचित इलाज का भरोसा दिया है। आंखों के बेहतर इलाज हेतु एंबुलेंस के माध्यम से पीड़िता को चित्रकूट भेज रहे हैं। उन्होंने कहा कि इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी, इलाज की संपूर्ण व्यवस्था प्रशासन करेगा।   

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नीलामी में 8.22 कैरेट वजन का हीरा 37 लाख में बिका

  •  नवीन कलेक्ट्रेट पन्ना में 21 सितम्बर से चल रही है नीलामी 
  •  पहले दिन 83.63 कैरेट वजन के हीरे 1 करोड़ 27 लाख में बिके

नवीन कलेक्ट्रेट में आयोजित हीरों की नीलामी में हीरा अधिकारी पन्ना। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में उथली खदानों से प्राप्त हीरों की खुली नीलामी मंगलवार 21 सितंबर से शुरू है। नीलामी के पहले दिन हीरापुर टपरियन की खदान में इसी माह एक गरीब मजदूर को मिला 8.22 कैरेट वजन का हीरा 37 लाख 7 हजार 220 रुपये में बिका है। इस हीरे की अनुमानित कीमत लगभग 40 लाख रुपये आंकी गई थी। 

हीरा अधिकारी पन्ना रवि पटेल ने बताया कि नवीन कलेक्ट्रेट में 21 सितंबर से हीरों की नीलामी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुरू हुई है। इस नीलामी में उज्जवल, मटमैले व औद्योगिक किस्म के 155 नग हीरे जिनका वजन 206.68 कैरेट है, रखा गया है। नीलामी के पहले ही दिन 61 नग हीरे वजन 83.63 कैरेट 1 करोड़ 27 लाख 71 हजार रुपए में बिके हैं। इसमें 8.22 कैरेट वजन वाला उज्जवल किस्म का हीरा भी शामिल है। पन्ना में चल रही हीरों की इस नीलामी में स्थानीय हीरा व्यापारियों के साथ-साथ अन्य दूसरे प्रांतों के हीरा व्यापारी भी भाग ले रहे हैं।

हीरा पारखी अनुपम सिंह ने बताया कि इस नीलामी में 14.09 कैरेट वजन का कीमती हीरा भी रखा गया है, जो जेम क्वालिटी (उज्जवल किस्म) का है। नीलामी में रखे गए हीरों में यह सबसे बड़ा है, जाहिर है कि यह हीरा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। नीलामी में भाग ले रहे व्यापारी इस नायाब हीरे की कितनी कीमत लगाते हैं, सबकी निगाहें इस पर टिकी हुई हैं। हीरो की इस नीलामी में सबसे छोटा हीरा 0.16 सेंट का था, जो महज 2 हजार रुपये में नीलाम हुआ।

नीलामी का वीडियो -



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Tuesday, September 21, 2021

बारिश का यह फल मलेरिया बुखार की अनोखी दवा

 अनोखी औषधि पचगुड्डू, जिसका उपयोग मलेरिया बुखार में किया जाता था। 

 ।। अरुण सिंह ।।      

पन्ना। प्रकृति में कोई भी बनस्पति अनुपयोगी व बेकार नहीं है। हर बनस्पति व जीव - जन्तु का महत्व और उसकी उपयोगिता है, भले ही हम उससे अनजान हों। आज यदि किसी को साधारण सर्दी-जुखाम भी हुआ तो वह सीधे किसी डॉक्टर के पास पहुचता है। लेकिन प्राचीन समय में लोग गांव के आस-पास पाई जाने वाली अनेक जड़ी बूटियों से ही अपना उपचार कर लेते थे। जिस तरह गांव में किसानों के सहयोगी अन्य उद्द्यमी गांव में ही बसकर अपनी आजीविका चला लेते थे, उसी तरह एकाध चुटुक वैदिया में रूचि रखने वाले बैद्य भी होते थे। जिनका चिकित्सीय ज्ञान गुरु शिष्य परम्परा में चलता रहता था। 

लेकिन यह पारम्परिक ज्ञान अब धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। हमारे आस-पास औषधियों का खजाना है लेकिन हम उससे अनभिज्ञ हैं। ऐसी ही एक बनस्पति है जो बारिश के मौसम में अपने आप जहाँ-तहाँ दिखने लगती है। इसकी लतर में बेर के आकार वाले फल प्रचुर संख्या में लगते हैं, यह पचगुड्डू है जिसका उपयोग पुराने ज़माने में मलेरिया बुखार से निजात पाने के लिए औषधि के रूप में किया जाता रहा है। 

जैव विविधता व जैविक खेती को बढ़ावा देने के महती कार्य में दशकों से संलग्न पद्मश्री बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि पचगुड्डू अनोखी औषधि है। इसके 5 हरे कोमल फल एक साथ खाने का प्रावधान था। इसे आयुर्वेद में शिवलिंगी कहा जाता है।जब तक  गाँव मे चिकित्सा की आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं, तब तक यह मलेरिया बुखार की मुफीत दवा मानी जाती थी। मुझे याद है तब इसके पाँच फलों में नमक की छोटी - छोटी डली डाल आग में भून कर खा लेने से मलेरिया बुखार समाप्त हो जाता था।


पचगुड्डू की बेल जो बारिश के मौसम में हर जगह फ़ैल जाती है। 

एक दवा इसके कच्चे पके फलों सहित बेल को सुखा और कूट कर चूर्ण के रूप में भी बनती थी, जिससे तिजारी चौथिया बना मलेरिया भी ठीक हो जाता था। क्यो कि इसका सर्वांग कड़बा होता है। प्रकृति का समन्वय देखिए कि मलेरिया अमूमन भादों क्वार के महीने में होता था और मलेरिया बुखार की यह मुफीत दबा पचगुड्डू भी उसी समय अपने आप बाड़ में जम कर फल जाती थी।

क्योंकि शुरू-शुरू में बारिश तेज होती है तब गर्म धरती और बहते पानी में मलेरिया उत्पन्न करने वाले मच्छर अपने अंडे नहीं देते ? वह तब अंडे देते हैं जब बातावरण में नमी और गड्ढो में पानी भर जाता है। पर आज यह बेल पूरी तरह उपेक्षित है। क्योंकि इसका उपयोग अब पूरी तरह समाप्त है। बेचारी नई पीढ़ी भला क्या जाने कि इसके हमारे पुरखो के ऊपर क्या उपकार रहे हैं ?

श्री दाहिया बताते हैं कि यह भर नहीं हर जीव के कुछ सहयोगी हैं तो कुछ नियन्त्रक भी । इसलिए स्वच्छ और स्वस्थ धरती के लिए हर प्रकार की जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है। क्योंकि सभी जीव धारी और वनस्पतियां जाने अनजाने एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

गाँव का बिलुप्त होता चिकित्सकीय ज्ञान

 पुराने ज़माने में हर गांव में वैद्य होते थे जिनका चिकित्सकीय ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी सतत चलता रहता था। लेकिन अब यह ज्ञान विलुप्त होता जा रहा है। गांव के बैद्य साधारण ज्वर बुखार से लेकर साँप बिच्छू और पागल कुत्ते के काटने तक का उपचार करते थे। उनके उपयोग में आने वाली यह दवाई पचगुड्डू, शिवलिंगी, नारी दमदमी ,सतावर, मूसली, अकोड़ा, घमिरा आदि साधारण जड़ी-बूटी तो आम पहचान की थी, पर साँप और कुत्ते के काटने से सम्बंधित जड़ी बूटियों को अति गोपनीय रखा जाता था।

 उन औषधियों को बैद्य इतना गोपनीय रखता कि मरने के कुछ पहले ही किसी परिवार के व्यक्ति या जिज्ञाशु शिष्य को बताता था। किन्तु  कुछ साधरण औषधीय ज्ञान गांव की कहावतों में भी सूत्र बद्ध  हो चुका था, जो लोककंठ में बस कर लोगो के लिए उपयोगी था। उन दिनों गाँव में लोगों को बिच्छू का काटना आम घटना हुआ करती थी। इसलिए बिच्छू काटने की चिकित्सा पर कहावत  होना स्वाभाविक था।

 लहसुन दूध मदार का दूनव साथ मिलाय ।

 बिच्छू काटे मा धरे बिख तुरन्त उड़जाय ।।  

लोगों का मानना था कि अगर त्रिफला यानी हर्र, बहेरा, आंवला  तीनों के फल को पानी में भिगोकर उससे सर धोया जाय, तो बाल सफेद नहीं होते। यथा-

बाल सफेद न ओकर होय।

त्रिफला से आपन सिर धोय ।। 

किन्तु इनमे  कुछ कहावते  अतिशयोक्ति पूर्ण भी रच दी गई  है । पर इतना तो सत्य है  ही कि सेवन करने वाला ब्यक्ति  ताकतवर अवश्य बनेगा । यथा-

हर्र, बहेरा,आंवला, घी शक्कर संघ खाय ।

हाथी बगल दबाय के पाँच कदम उड़ जाय।।

एक कहावत में हर्र और नीम के गुणों की तुलना की गई है यथा-

हर्र गुण तीस, नीम गुण छत्तीश । 

इस तरह गाँव के आस पास उगने वाले अनेक पेड़-पौधे, बनस्पतियों एवं जड़ी-बूटियों का बहुत बड़ा ज्ञान बैद्यो के पास तो था ही कुछ ज्ञान लोक कहावतों में भी वर्णित पाया जाता है।

( नोट - वर्णित औषधियों का उपयोग जानकर वैद्यों से परामर्श के उपरान्त ही करें। )

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Sunday, September 19, 2021

जंगलों की रक्षा करने वालों को ही जंगलों से दूर किया जा रहा

  • राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ शाह का मनाया गया बलिदान दिवस
  • पन्ना जिले के आदिवासी क्षेत्र कल्दा पठार के पौढ़ीकलां में आयोजित हुआ कार्यक्रम
  • वक्ताओं ने आदिवासी समाज के राजनैतिक एवं सामाजिक अधिकारों पर दिया जोर 

आदिवासी बहुल कल्दा पठार के पौढ़ीकलां ग्राम में आयोजित कार्यक्रम में मंचासीन अतिथिगण।  

पन्ना। अमर शहीद गौणवाना सम्राज्य के शासक राजा शंकरशाह पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह मरावी का 164 वां बलिदान दिवस शनिवार 18 सितम्बर को पन्ना जिले के दुर्गम क्षेत्र कल्दा पठार के पौढ़ीकलां ग्राम में समारोह पूर्वक मनाया गया। बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सेवा निवृत उप पुलिस अधीक्षक  फूल सिंह टेकाम तथा अधिवक्ता कमल सिंह मरकाम उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता ग्राम पंचायत पौढ़ीकला की सरपंच श्रीमती खिलाफ बाई मरकाम ने की। आयोजित कार्यक्रम में मुख्यवक्ता के रूप में समाजसेवी जयराम यादव एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में आदिवासी नेता महिपाल सिंह मरावी, मुन्ना सिंह मरकाम तथा त्रिलोक सिंह यादव उपस्थित रहे। 

दीप प्रज्जवलन के साथ मुख्य अतिथि सहित अतिथिगणों द्वारा राजा शंकर शाह एवं उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह की प्रतिमाओं पर हल्दी और चावल से तिलक वंदन किया गया। आयोजित कार्यक्रम के दौरान उपस्थित वक्ताओं द्वारा गौणवाना समाज के महान शासक के 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका तथा आजादी के लिये उनके बलिदान को याद करते हुये आदिवासी समाज की सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति पर विचार रखे गये। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता समाजसेवी जयराम यादव ने कहा कि गौणवाना समाज के महान शासक का बलिदान आदिवासी समाज ही नही बल्कि पूरे देश के लोगों के लिये गौरव का विषय है। आदिवासी समाज भारतीय महाद्वीप के सबसे पुराने वाशिंदे हैं। ईमानदारी और मेहनत के साथ काम करते हैं। परंतु इसके बावजूद आदिवासी समाज राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में आज भी सबसे पिछड़ा है। जब तक समाज के अंदर शिक्षा, सामाजिक चेतना एवं अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करने की शक्ति नहीं होगी तब तक यही स्थिति रहेगी। 

समारोह में उमड़ी आदिवासियों की भीड़ का नजारा। 

जल, जंगल, जमीन से आदिवासियों का मालिकाना हक लंबे समय से लगातार छीना जा रहा है। उनकी जमीन पर दूसरे लोग काबिज हो चुके हैं और सबसे ज्यादा शोषण भी हो रहा है। आयोजित कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज के नेता महिपाल सिंह ने कहा कि आदिवासी समाज बरसों से पर्यावरण को सुरक्षित करने का काम कर रहा है। हमारे रीती रिवाज और परम्पराओं में वृक्षो की पूजा शामिल है परंतु जंगलों की रक्षा करने वाले लोगों को ही जंगलों से दूर करने का काम चल रहा है। बड़े-बड़े औद्योगिक कल कारखानों के लिये हमारे जंगलों, पेड़-पौधों की बली चढ़ रही है, जो कि न केवल हमारे अस्तित्व के लिये खतरा है बल्कि पूरी दुनिया के लिये बड़ा खतरा बना हुआ है। 

कार्यक्रम में मुन्ना सिंह मरकाम ने समाज में व्याप्त कुरूतियों के संबंध में चर्चा की तथा नशा मुक्ति एवं शिक्षा पर बल दिया गया। आयोजित कार्यक्रम के संरक्षक शिक्षक दरयाब सिंह द्वारा कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों सहित बड़ी संख्या में पहुंचे आदिवासी समाज सहित विभिन्न वर्गो के लोगों के प्रति आभार प्रकट किया गया। कार्यक्रम में आदिवासी समाज के धर्माचार्य राजभान सिंह पेन्ड्रो का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। मंचीय उद्बोधन के साथ ही बच्चों द्वारा देशभक्ति एवं आदिवासी की सांस्कृतिक परम्पराओं की शानदार प्रस्तुतियां गायन, नृत्य आदि विधाओं के माध्यम से दी गई। इस अवसर पर मुख्य रूप से गजराज सिंह पेन्ड्रों, नरेश सिंह मरावी, हनुमत प्रसाद पटेल, पुरूषोत्तम सिंह आदि मुख्यरूप से उपस्थित रहे।

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कीट पतंगों को कैसे हो जाता है खतरे का अग्रिम अहसास ?

आंवले की इस पतली टहनी में लगा था मधुमक्खी का छत्ता। 

।। बाबूलाल दाहिया ।।

यह हमारे आँगन में लगा आंवला का पेड़ है। इसकी एक पतली सी डाल में पिछले वर्ष मधुमक्खियों ने  छोटा सा छत्ता बनाया था। उस समय उस समूह में बहुत कम मक्खियां थीं। उसी आंगन में समर्सिबल पम्प लगा था एवं  पीछे एक बगिया भी थी, जिसके फूलों का मधु मक्खियों ने भरपूर लाभ उठाया और  देखते ही देखते उनका बहुत बड़ा छत्ता हो गया।

यदि यह छत्ता किसी दूसरे के आंगन में होता तो पिछले 11 माह में वह दो तीन बार उस छत्ते से मधु रस निकाल चुका होता। किन्तु जैव विविधता संरक्षक हमारा परिवार मधु मक्खियों को अपने आंवला में छत्ता बनाकर रहता देख ही प्रसन्न होता रहा। और उनसे जरा भी कभी छेड़छाड़ नहीं की। लेकिन अगस्त के अंतिम सप्ताह में मधु मक्खियां अपने अंडे बच्चे जिला पेड़ और छत्ता दोनो को छोड़ कर चली गईं । पहले तो हम इसका कारण नहीं समझ पाए कि आखिर मधु मक्खी हमसे क्यों रूठ गईं ? पर इन दिनों जब आंवला की फल से लदी डाल झुक कर टूटने की स्थिति में हैं तो उनकी दूरदर्षिता हमारे समझ मे आ गई।


टहनी में फल आने से पहले ही मधुमक्खियां छूमंतर हो गईं। 

दरअसल आवले में फूल तो मार्च में आते हैं, पर झरबेरी जैसे छोटे- छोटे फल अगस्त के प्रथम सप्ताह में दिखते हैं। जो मध्य सितम्बर में कुछ बड़े हो जाते हैं। किन्तु  इन मधुमक्खियों की समझदारी तो देखिए कि जो बात हमारे समझ में आज आ रही हैं, उसे वह एक माह पहले ही भाप गईं थी।

क्योंकि इस वर्ष आंवला में इतने फल आये हैं कि डाल की उस टहनी में भी आठ दश फल झूल रहे हैं। जिस पतली टहनी में उनका छत्ता लगा हुआ था।

बस यही तो उनकी समझदारी है कि जो मधु मक्खी जून में अंधड़ तूफान में भी टहनी छोड़कर नहीं भागी थीं, वह आंवले के अत्यधिक फल से डाल टूटने की  सम्भावना से अंतिम अगस्त में ही चली गईं। हमें विश्वास है कि आगामी फरवरी तक वह अवश्य लौट कर पुन: आ जाएगीं।

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Saturday, September 18, 2021

पन्ना में सागौन तस्करों पर संयुक्त कार्यवाही, 16 स्थानों पर छापे

  •  भारी मात्रा में सागौन लकड़ी सहित दो आरा मशीन व बारहसिंघा का सींग बरामद 
  •  सुबह 6:30 बजे से लेकर 10:30 बजे तक चली कार्रवाई, सागौन तस्करों में हड़कंप

छापामार कार्यवाई के दौरान जप्त लकड़ी वाहन में लदवाते वनकर्मी। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के जिला मुख्यालय पन्ना में आज सुबह डीएफओ उत्तर वन मंडल पन्ना गौरव शर्मा के नेतृत्व में वन विभाग ने प्रशासन और पुलिस के सहयोग से बड़ी छापामार कार्यवाही की है। अचानक हुई इस कार्यवाही से सागौन तस्करों में हड़कंप मचा हुआ है। अवैध फर्नीचर निर्माताओं सहित सागौन की तस्करी में लिप्त लोगों के ठिकानों में छापामारी के दौरान भारी मात्रा में सागौन लकड़ी सहित दो आरा मशीन व बारहसिंघा का सींग बरामद हुआ है। 

डीएफओ उत्तर वन मंडल पन्ना गौरव शर्मा ने  जानकारी देते हुए बताया कि शहर के धाम मोहल्ला और आगरा मोहल्ला में 16 स्थानों पर छापे मारे गए। कार्रवाई सुबह 6:30 बजे से लेकर 10:30 बजे तक चली। कार्रवाई में उत्तर वनमंडल पन्ना का 150 स्टाफ, पन्ना टाइगर रिजर्व से 25 स्टाफ, राजस्व की टीम से तहसीलदार सुधीर ‌और आर आई तथा पुलिस स्टाफ में एसआई यादव और 17 अन्य पुलिसकर्मी मौजूद थे। कार्रवाई में करीबन चार से पांच घन मीटर चिरान बरामद हुआ है। 


सफल कार्यवाई के बाद उत्तर वन मण्डल कार्यालय परिसर में मौजूद वनकर्मी साथ में डीएफओ श्री शर्मा।  

श्री शर्मा ने बताया कि कार्यवाही के दौरान  दो मशीनें भी बरामद की गई हैं। छापे में बारहसिंघा का सींग भी बरामद हुआ है, जिस पर आरोपी के विरुद्ध वन्य प्राणी कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। धाम मोहल्ला और आगरा मोहल्ला के जिन 16 स्थानों पर छापामार कार्रवाई की गई उनमें सबसे ज्यादा मात्रा में लकड़ी प्रेम शर्मा और सरवन यादव के यहां से मिली। जबकि मिठाई लाल के यहां से बारहसिंघा का सींग और लकड़ी दोनों बरामद हुई है। 

वनकर्मियों द्वारा बरामद किया गया बारहसिंघा का सींग।

वन मंडल अधिकारी उत्तर पन्ना ने बताया कि विभिन्न माध्यमों से उन्हें निरंतर शिकायतें मिल रही थीं कि शहर के धाम मोहल्ला पन्ना तथा आगरा मोहल्ला में अवैध सागौन लकड़ी का कारोबार चल रहा है। यहाँ बड़ी मात्रा में अवैध लकड़ी तस्करों द्वारा लाई जाती है, जिससे  फर्नीचर  तैयार कर बेचे जा रहे हैं। इसी आधार पर आज शनिवार को सुबह तड़के वन, राजस्व व पुलिस ने संयुक्त रूप से  छापामार कार्यवाही की है जिसमें विभाग को बहुत बड़ी सफलता मिली है।


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जो मचिया घरों की शान होती थी, अब हुई विलुप्तप्राय

 मचिया जो गाँव में घरों की शान हुआ करती थीं। 

कुछ दशक पूर्व तक चार पायों वाली जो मचिया गाँव में घरों की शान हुआ करती थीं, वे अब नजर नहीं आतीं। इन देशी मचियों की जगह प्लास्टिक की कुर्सियों ने ले लिया है। फलस्वरूप मचिया विलुप्तप्राय होकर पुरातात्विक महत्व की चीज बनकर रह गई हैं। 

चार पुरुष जे मुण्डय मुण्डा।
उनके कान म दण्डय डण्डा।।           

यह बघेल खण्ड  के किसी अपढ अनाम ब्यक्ति की रची हुई पहेली है, जो इस मचिया के चार पायों पर कितनी सटीक बैठती है ? पहेली के इन चारों मुंडे पुरुषों को बघेली में मचियां के पेरुआ कहा जाता है।

प्राचीन समय मे जब प्लास्टिक की कुर्सियों का प्रचलन नहीं था, तब मचियां हर घर की शान हुआ करती थीं। कहीं-कहीं तो वह सम्पन्नता की प्रतीक ही दिखाई पड़ती, जब बैठक खाने में कई-कई मचियां करीने से रखी रहतीं और दरबारी आते तो उन्ही में बैठते। यदि अधिक शौकीन परिवार होता तब सूमा के बजाय मचियां अम्बारी या सन की सुतली की बुनी हुआ करतीं।

यह बहुउद्देसीय मचियां धान दराई के समय महिलाओं के बैठने के लिए भी उपयोगी होतीं। यहां तक की छोटे किसानों के घर में भी कोई जाता, तो माता-पिता बच्चों को आवाज देते कि -

" फलनमा मचियां उचाय लाव ? तोर फलाने काका या बब्बा आये हैं?"

बघेली के कई लोकगीतों और लोक कथाओं में मचियां का उल्लेख है। एक लोक गीत में  तो एक पोता अपने मचियां मे बैठे  हुए दादा जी से अर्ज ही कर रहा है कि  "मेरे सिर की झालर बहुत बढ़ गईं हैं तो मेरा मुंडन करवा दो ?" यथा--

मचियन बइठे फलाने रामा नतिया अरज करय हो,

पर कुछ लोक कथाओं में मचिया में बैठी हुई रानियों को अपनी दासियों को भी बुलाते हुए दर्शाया गया है। क्योंकि घर के बैठने के लिए मचियां से उत्तम कोई वस्तु नही थी। जिसे भीतर, बाहर, आँगन,फरिक कोनइतहा घर हर जगह बगैर किसी अवरोध आसानी से ले जाया जा सकता था। किन्तु अब वह मचियां विलुप्तता का दंश झेलती पुरावशेष बनने की श्रेणी में है।

0-- बाबूलाल दाहिया

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Friday, September 17, 2021

बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रबंधन में मध्यप्रदेश फिर होगा टॉप पर - वनमंत्री


वन्य जीव संरक्षण क्षेत्रों के प्रबंधन और मूल्यांकन में मध्यप्रदेश अन्य प्रदेशों से बढ़त बनाये हुए है। कान्हा, सतपुड़ा, बांधवगढ और पन्ना को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली है। वनमंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने वन्य जीव प्रबंधन से जुड़े अमले को बधाई देते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मध्यप्रदेश जिस प्रकार अनेक क्षेत्रों में कामयाबी के शिखर पर पहुंचा है वैसे ही वन्य जीव संरक्षण में भी पूरे देश में गौरव प्राप्त करेगा।

वन मंत्री डॉ. शाह ने बताया कि कंजर्वेशन एश्योर्ड टाइगर स्टेण्डर्ड की अंतर्राष्ट्रीय समिति और डब्ल्यू डब्ल्यू एफ द्वारा संयुक्त रूप से संचालित 17 मुख्य मापदण्डों और उनसे जुड़े अन्य उप घटकों के आधार पर बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रबंधन स्तर के मूल्यांकन चार चरण में प्रक्रिया पूरी कर मान्यता दी जाती है।

उल्लेखनीय है कि इस समिति द्वारा पेंच टाइगर, बांधवगढ़ टाइगर और संजय टाइगर रिजर्व में तीन चरण पूर्ण किए जा चुके है। अब प्रदेश के टाइगर रिजर्व को CA/TS अनुसार प्रबंधन की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता मानदण्डों पर खरे उतरना है। इसके साथ ही मध्यप्रदेश बाघ संरक्षण क्षेत्रों के प्रबंधन में अन्य सभी राज्यों में शीर्ष स्थान पर होगा। सतपुड़ा और पन्ना टाइगर रिजर्व को यह अंतर्राष्ट्रीय मान्यता पहले ही मिल चुकी है। इस तरह प्रदेश के सभी 6 टाइगर रिजर्व अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता को पूर्ण करेंगे।

इससे पहले भी टाइगर रिज़र्व के प्रबंधन की प्रभावशीलता मूल्यांकन में पेंच टाइगर रिजर्व देश में सर्वोच्च रैंक हासिल कर चुका हैं। बांधवगढ़, कान्हा, संजय और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन वाले टाइगर रिजर्व माना गया है। इन राष्ट्रीय उद्यानों में अनुपम प्रबंधन योजनाओं और नवाचारी तरीकों को अपनाया गया है।

हरेक टाइगर रिजर्व की है यह विशेषता

वन्य जीव संरक्षण मामलों पर नीतिगत निर्णय लेने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा प्रभावी प्रबंधन के आकलन से संबंधित आंकडों की आवश्यकता होती है। ये आंकडे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र में रखे जाते हैं।

टाइगर रिजर्व की प्रबंधन शक्तियों का आकलन कई मापदण्डों पर होता है जैसे योजना, निगरानी, सतर्कता, निगरानी स्टाफिंग पैटर्न, उनका प्रशिक्षण, मानव,वन्य-जीव संघर्ष प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी, संरक्षण, सुरक्षा और अवैध शिकार निरोध के उपाय आदि।

पेंच टाइगर रिजर्व के प्रबंधन को देश में उत्कृष्ट माना गया है। फ्रंट-लाइन स्टाफ को उत्कृष्ट और ऊर्जावान पाया गया है। वन्य-जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत दर्ज सभी मामलों में पैरवी कर आरोपियों को दंडित करने में प्रभावी काम किया गया है। मानव-बाघ और बाघ-पशु संघर्ष के मामलों में पशु मालिकों को तत्काल वित्तीय राहत दी जा रही है। साथ ही उन्हें विश्व प्रकृति निधि भारत से भी सहयोग दिलवाया जा रहा है।


नियमित चरवाहा सम्मेलन आयोजित किये जा रहे है और चरवाहों के स्कूल जाने वाले बच्चों को शैक्षिक सामग्री वितरित की जा रही है। इसके अलावा, ग्राम स्तरीय समितियों, पर्यटकों के मार्गदर्शकों, वाहन मालिकों, रिसॉर्ट मालिकों और संबंधित विभागों और गैर सरकारी संगठनों के प्रबंधकों के प्रतिनिधियों की बैठकें भी होती हैं। पर्यटन से प्राप्त आय का एक तिहाई हिस्सा ग्राम समितियों को दिया जाता है। परिणामस्वरूप इन समितियों का बफर ज़ोन के निर्माण में पूरा सहयोग मिलता है। पर्यटन से प्राप्त आय पार्क विकास फंड में दी जाती हैं और इसका उपयोग बेहतर तरीके से किया जाता है।

इसी तरह, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ने बाघ पर्यटन द्वारा प्राप्त राशि का उपयोग कर ईको विकास समितियों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित किया गया है। वाटरहोल बनाने और घास के मैदानों के रखरखाव के लिए प्रभावी वन्य-जीव निवास स्थानों को रहने लायक बनाने का कार्यक्रम भी चलाया गया है। मानव, वन्य-जीव संघर्षों को ध्यान में रखते हुए, मवेशियों, एवं मानव मृत्यु और जख्मी होने के मामले में राहत एवं सहायता राशि के तत्काल भुगतान की व्यवस्था बनाई गई है।

कान्हा टाइगर रिजर्व ने अनूठी प्रबंधन रणनीतियों को अपनाया है। कान्हा, पेंच वन्य-जीव विचरण कारीडोर भारत का पहला ऐसा कारीडोर है। इस कारीडोर का प्रबंधन स्थानीय समुदायों, सरकारी विभागों, अनुसंधान संस्थानों, नागरिक संगठनों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है। पार्क प्रबंधन ने वन विभाग कार्यालय परिसर में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी स्थापित किया है, जो वन विभाग के कर्मचारियों और आसपास के क्षेत्र के ग्रामीणों के लिये लाभदायी सिद्ध हुआ है।

पन्ना टाइगर रिजर्व ने बाघों की आबादी बढ़ाने में पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। शून्य से शुरू होकर अब इसमें 60 से 65 बाघ हैं। यह भारत के वन्य-जीव संरक्षण इतिहास में एक अनूठा उदाहरण है। सतपुड़ा बाघ रिजर्व में सतपुड़ा नेशनल पार्क, पचमढ़ी और बोरी अभ्यारण्य से 42 गाँवों को सफलतापूर्वक दूसरे स्थान पर बसाया गया है। यहाँ सोलर पंप और सोलर लैंप का प्रभावी उपयोग किया जा रहा है।

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