Saturday, October 31, 2020

विषखोपड़ा के काटने से नहीं, भय से होती है मौत

  •  छिपकली प्रजाति के इस जीव में नहीं होता है कोई विष 
  •  अंधविश्वास और अज्ञानतावश हम बन गये हैं इनके दुश्मन

विषखोपड़ा (मॉनिटर लिजर्ड) की यह तस्वीर इंटरनेट से साभार। 


। अरुण सिंह 

पन्ना। जीव जंतुओं की निराली दुनिया कितनी रहस्य पूर्ण और अनजानी है, इसका अंदाजा लगा पाना भी कठिन है। अज्ञानता के चलते हम अनेकों जीव जंतुओं के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर उनके प्रति दुश्मनी का भाव रखते हुए उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। घर की दीवारों पर नजर आने वाली छिपकली हो या फिर इसी का बड़ा रूप विषखोपड़ा अथवा गोह, आमतौर पर हम इनको अत्यधिक जहरीला मानते हैं। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है, इन सरीसृपों में जहर होता ही नहीं है। लेकिन हमारा अंधविश्वास और इन जंतुओं के प्रति पूर्वाग्रह सच्चाई पर भारी पड़ता है।

आज के इस वैज्ञानिक युग में जब जीव जंतुओं के बारे में शोध पर जानकारी उपलब्ध है, उस समय भी हम पुरानी धारणाओं के अनुरूप ही व्यवहार करते हैं। विष खोपड़ा के बारे में यह आम धारणा है कि उसका काटा पानी भी नहीं मांग पाता, मौत निश्चित होती है। हमारी इसी अज्ञानता और अंधविश्वास के कारण उपजे भय से लोगों की मौत होती है न कि उसके जहरीले होने के कारण। क्योंकि विषखोपड़ा की खोपड़ी में जहर होता ही नहीं है। 

अंधविश्वास और पुरानी मान्यताओं का शिकार हुए विष खोपड़ा जिसे वैज्ञानिक भाषा में मॉनिटर लिजर्ड कहा जाता है उसके बारे में पर्यावरण व प्रकृति प्रेमी कबीर संजय ने बेहद ज्ञानवर्धक व रोचक जानकारी अपनी फेसबुक वॉल पर साझा की है। इस निर्दोष और शांतिप्रिय जीव के बारे में वे बताते हैं कि विषखोपड़ा एक प्रकार की बड़ी छिपकली है। जिसे विषखोपड़ा, गोहेरा, गोयरा, घ्योरा, गोह, बिचपड़ी आदि नामों से जाना जाता है। विशेषज्ञ इसे मानीटर लिजर्ड कहते हैं। इस प्रकार की छिपकलियों की यूं तो 70 के लगभग प्रजातियां दुनिया भर में पाई जाती है लेकिन हमारे देश में इनकी चार प्रजातियां मिलती हैं। ये हैं बंगाल मानीटर लिजर्ड, येलो मानीटर लिजर्ड, वाटर मानीटर लिजर्ड और डिजर्ट मानीटर लिजर्ड। इनमें से बंगाल मानीटर लिजर्ड सबसे ज्यादा दिखता है। 

आमतौर पर लोग विषखोपड़ा या गोह को बेहद जहरीला मानते हैं। लेकिन, इस प्राणी के पास बिलकुल भी जहर नहीं है। यह सरीसृप है। यानी ठंडे रक्त वाला। इसलिए इसे धूप सेंकने की जरूरत पड़ती है। इसके मुंह में विषदंत नहीं होते हैं और न ही विष की थैली। यह अपने शिकार को चबाकर नहीं बल्कि निगलकर खाता है। मनुष्यों के बीच घिर जाने पर भी इसकी कोशिश किसी तरह से निकल भागने की होती है। लेकिन, कई बार बहुत ज्यादा छेड़छाड़ करने पर यह काट भी सकती है। हालांकि, उसकी यह बाइट जहरीली नहीं है। पर उससे बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकते हैं। ऐसे जीवों के साथ कभी भी छेड़छाड़ नहीं करें। वे कहीं दिखें तो उन्हें निकलने का सुरक्षित रास्ता दें, ताकि वे अपने पर्यावास में जा सकें। अगर कभी जरूरत पड़े भी तो विशेषज्ञों की राय लें। खुद उन्हें पकडऩे की कोशिश करना ठीक नहीं।

हमारी अज्ञानता, अंधविश्वास और लालच के चलते भारत में पाई जाने वाली मानीटर लिजर्ड की चारों प्रजातियां खतरे में हैं। इनकी खाल का व्यापार किया जाता है। इनके खून और मांस का इस्तेमाल कामोत्तेजक दवाओं को बनाने में किया जाता है। नर विषखोपड़ा के जननांगों का कारोबार सबसे ज्यादा प्रमुख है। इस प्रकार का अंधविश्वास है कि इसके जननांगों को सुखाकर चांदी के डिब्बे में रखने से घर में लक्ष्मी आती है। यह अंधविश्वास लाखों मानीटर लिजर्ड की जान हर साल लेता है। 

इससे जुड़ा हुआ सबसे ज्यादा खौफनाक पहलू यह है कि जननांग निकालते समय गोह को जिंदा होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि सोची-समझी साजिश के तहत गोह या विषखोपड़ा को जहरीला बताया जाता है। ताकि, उनका आसानी से शिकार किया जाए और आम जनता उनसे घृणा करती रहे। तमाम लोगों के पास विषखोपड़ा के काटने के किस्से हैं और वे बिना ज्यादा छानबीन किए इन कहानियों को बेहद प्रामाणिक तरीके से सुनाते हैं। इनमें बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे लोग भी शामिल हैं।

स्तनपायी जीव और सरीसृपों में बहुत अंतर है। सरीसृप अंडे से पैदा होते हैं। उनके शरीर पर बाल नहीं होते हैं। वे ठंडे खून वाले होते हैं। उनके कान अंदर होते हैं। दुनिया के बारे में जानने समझने के लिए सांप जैसे सरीसृप अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालते रहते हैं। मानीटर लिजर्ड भी अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालकर दुनिया का अंदाजा लेती है। इसके चलते भी लोग उसे घृणा करते हैं और जहरीला समझते हैं। कहीं वो दिखे तो उसे मार देते हैं। 

माना जाता है कि इन तमाम बातों के चलते हर साल पांच लाख से ज्यादा गोह को मार दिया जाता है। जबकि, ये प्राणी खेतों से हजारों कीड़े-मकोड़े और जीवों को खाकर खेती किसानी में मदद करते हैं। वे मददगार प्राणी हैं, हमारे दुश्मन नहीं हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि हम उनके दुश्मन हैं...विषखोपड़ा की खोपड़ी में जहर नहीं है। जहर इंसान की खोपड़ी में ज्यादा है। 

बाघ की भांति गोह भी करता है इलाके का निर्धारण, होता है संघर्ष 

 


जंगल में अपने साम्राज्य (टेरीटोरी) का निर्धारण करने के लिए सिर्फ बाघों के बीच ही संघर्ष नहीं होता. जंगल के राजा की तर्ज पर अन्य दूसरे वन्य जीव भी अपना इलाका बनाते हैं और इसके लिए उनके बीच भीषण लड़ाई भी होती है। सरीसृप वर्ग के वन्य जीव गोह में भी बाघ की तरह अपनी टेरीटोरी बनाने तथा अधिक से अधिक मादाओं को अपने नियंत्रण में रखने की प्रवृत्ति पाई जाती है।

उल्लेखनीय है कि प्रकृति की गोद में हर वन्य प्रांणी के रहने तथा जीवन जीने का तरीका अनूठा और विचित्र होता है। छिपकली प्रजाति के वन्य जीव गोह जिसे मानीटर लिजार्ड भी कहते हैं, उसकी जीवन शैली बाघ की प्रकृति से मिलती जुलती प्रतीत होती है। लगभग ढाई से तीन फिट लम्बा तमाम खूबियों वाला यह विचित्र वन्य जीव बारिश के मौसम में ज्यादा नजर आता है। नर गोह बरसात प्रारंभ होते ही मैटिंग के लिए मादा गोहों की ओर आकर्षित होता है. इस दौरान नर गोह की टेरीटोरी में रहने वाली मादा गोहों के पास दूसरे नर गोह के आने पर दोनों नरों के बीच अस्तित्व कायम रखने के लिए भीषण संघर्ष होता है। शक्तिशाली नर गोह जो संघर्ष में जीत हासिल करता है, टेरीटोरी में उसी की हुकूमत चलती है तथा वही इस टेरीटोरी की मादाओं से मैटिंग करता है।

पन्ना टाइगर रिजर्व के सहायक संचालक रहे  एम.पी. ताम्रकार ने बताया कि गोह के पंजे अत्यधिक शक्तिशाली होते हैं तथा पेड़ या दीवाल में चिपक जाने पर इसे निकालना मुश्किल होता है। इस मांसाहारी वन्य जीव की जीभ काफी लम्बी और सांप की तरह दो भागों में बंटी होती है। राजाशाही जमाने में गोह का उपयोग ऊंचे स्थानों व किलों आदि में चढऩे के लिए सैनिक भी करते थे। श्री ताम्रकार ने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व में गोह प्रचुर संख्या में हैं तथा यहाँ  इनके बीच होने वाले संघर्ष के दुर्लभ नजारे यदा - कदा दिखाई दे जाते हैं। नर गोहों के बीच टेरीटोरी के लिए हुए संघर्ष का बेहद दुर्लभ नजारा  भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून के रिसर्चर रवि परमार ने कुछ वर्ष पूर्व अपने कैमरे में कैद किया था , जिसमें गोहों की जीवन शैली व प्रकृति की झलक मिलती है।

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