Thursday, November 17, 2022

ड्रिप के साथ मल्चिंग विधि से टमाटर, बैगन और मिर्च की खेती

  • खरपतवार का प्रकोप रोकने व उत्पादन बढ़ाने में यह विधि कारगर
  • मौसम परिवर्तन से पौधों को बचाने मल्चिंग एक बेहतर विकल्प  


पन्ना। ड्रिप के साथ मल्चिंग विधि का प्रयोग करके टमाटर, बैगन और मिर्च की खेती बेहतर तरीके से की जा सकती है। किसान भाई यह जानते हैं कि टमाटर, बैगन और मिर्च की खेती में खरपतवार का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है, जिससे फसल के उत्पादन पर असर पड़ता है। ऐसे में किसान खेत में ड्रिप के साथ मल्चिंग विधि का प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा मौसम परिवर्तन से पौधों को बचाने के लिए मल्चिंग एक बेहतर विकल्प है। इस तकनीक से फसल लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।

प्लास्टिक के अलावा सूखी घास से भी मल्चिंग कर सकते हैं। टमाटर, बैगन और मिर्च की खेती में मल्चिंग लगाने बावत वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी संजीत सिंह बागरी ने बताया कि किसान इस विधि से खेती कर अपनी फसलों का उत्पादन बढ़ा सकते हैं। मल्चिंग विधि क्या है इसकी जानकारी देते हुए आपने बताया कि इस विधि में रेस बेड को प्लास्टिक शीट से पूरी तरह कवर कर दिया जाता है, जिससे खेत में खरपतवार नहीं होती है। खेत में लगे पौधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक कवर द्वारा सही तरीके से ढकने को प्लास्टिक मल्चिंग कहते हैं। वहीं बेड पर बिछाई जाने वाली कवर को पलवार या मल्च कहते हैं।

मल्चिंग लगाने का क्या क्या  है लाभ



मिट्टी को धूप कम लगती है, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है। बीज का अंकुरण एवं पौधों की जड़ों का विकास अच्छे से होता है तथा तेज हवाओं एवं बारिश से पौधों का बचाव होता है। बारिश एवं तेज हवा के कारण मिट्टी का कटाव कम होता है। इस विधि का प्रयोग करने से फल जमीन की सतह से सट कर खराब नहीं होते हैं। खरपतवारों के पनपने की संभावना बहुत कम हो जाती है। प्लास्टिक मल्चिंग का प्रयोग करने से फसल के उपज में वृद्धि होती है। बारिश के दौरान पानी की बूंदें मल्चिंग शीट की निचली सतह पर इकठ्ठा होती हैं और पौधों को मिलती है। जिससे सिंचाई के समय पानी की बचत होती है। देसी विधि मे सूखी घास या पत्तो की मल्चिंग करने पर कुछ समय बाद यह सड़ कर खाद बन जाती है, जिससे मिट्टी अधिक उपजाऊ बनती है। इसके प्रयोग से खेत की मिट्टी कठोर नहीं होती है।

टमाटर बैंगन और मिर्च की खेती में मल्चिंग बिछाने का तरीका

सबसे पहले जिस खेत में फसल की खेती करनी है उसकी अच्छे से जुताई कर लें। अब इसमें १०० से १५० क्विंटल गोबर खाद का इस्तेमाल करें। अब खेत में उठी हुई क्यारीयां या मेड़ बना लें। इनके उपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा दें। अब २५ से ३० माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म को अच्छी तरह बिछाकर, फिल्म के दोनों किनारों को मिट्टी की परत से अच्छी तरह दबा दें। अब फिल्म पर गोलाई में पाइप से पौधों से पौधों की उचित दूरी तय कर छिद्र कर दें। अब इन किए हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पौध का रोपण का कार्य शाम के समय कर के ड्रिप सिंचाई विधि से पानी चला देना चाहिए। यदि लाइट ना हो तो डिब्बों या बाल्टी के माध्यम से प्रत्येक पौधे में सिंचाई अच्छी तरह से करना चाहिए। 

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Monday, November 14, 2022

पर्वत की गुफा में मिले साढ़े बारह हजार साल पुराने ग्रामोफोन के रिकार्ड जैसे पत्थरों का क्या है रहस्य ?


1937 में, तिब्बत और चीन के बीच बोकान पर्वत की एक गुफा में सात सौ सोलह पत्थर के रिकार्ड मिले हैं--पत्थर के। और वे हैं महावीर से दस हजार साल पुराने यानी आज से कोई साढ़े बारह हजार साल पुराने। बड़े आश्चर्य के हैं, क्योंकि वे रिकार्ड ठीक वैसे ही हैं जैसे ग्रामोफोन का रिकार्ड होता है। ठीक उनके बीच में एक छेद है, और पत्थर पर ग्रूव्ज हैं--जैसे कि ग्रामोफोन के रिकार्ड पर होते हैं। अब तक राज नहीं खोला जा सका है कि वे किस यंत्र पर बजाये जा सकेंगे। 

लेकिन एक बात तय हो गयी है--रूस के एक बड़े वैज्ञानिक डॉ. सर्जिएव ने वर्षों तक मेहनत करके यह प्रमाणित किया है कि वे हैं तो रिकार्ड ही। किस यंत्र पर और किस सुई के माध्यम से वे पुनरुज्जीवित हो सकेंगे, यह अभी तय नहीं हो सका। अगर एकाध पत्थर का टुकड़ा होता तो सांयोगिक भी हो सकता था। सात सौ सोलह हैं। सब एक जैसे, जिनमें बीच में छेद हैं। सब पर ग्रूव्ज हैं और उनकी पूरी तरह सफाई, धूल--धवांस जब अलग कर दी गयी और जब विद्युत यंत्रों से उनकी परीक्षा की गई तब बड़ी हैरानी हुई, उनसे प्रतिपल विद्युत की किरणें विकीर्णित हो रही हैं।

लेकिन क्या आदमी के पास आज से बारह हजार साल पहले ऐसी कोई व्यवस्था थी कि वह पत्थरों में कुछ रिकार्ड कर सके? तब तो हमें सारा इतिहास और ढंग से लिखना पड़ेगा।

जापान के एक पर्वत शिखर पर पच्चीस हजार वर्ष पुरानी मूर्तियों का एक समूह है। वे मूर्तियां "डोबू" कहलाती हैं। उन मूर्तियों ने बहुत हैरानी खड़ी कर दी, क्योंकि अब तक उन मूर्तियों को समझना संभव नहीं था--लेकिन अब संभव हुआ। जिस दिन हमारे यात्री अंतरिक्ष में गये उसी दिन डोबू मूर्तियों का रहस्थ खुल गया; क्योंकि डोबू मूर्तियां उसी तरह के वस्त्र पहने हुए हैं जैसे अंतरिक्ष का यात्री पहनता है। अंतरिक्ष में यात्रियों ने, रूसी या अमरीकी एस्ट्रोनाट्स ने जिन वस्तुओं का उपयोग किया है, वे ही उन मूर्तियों के ऊपर हैं, पत्थर में खुदे हुए। वे मूर्तियां पच्चीस हजार साल पुरानी हैं। और अब इसके सिवाय कोई उपाय नहीं है मानने का कि पच्चीस हजार साल पहले आदमी ने अंतरिक्ष की यात्रा की है या अंतरिक्ष के किन्हीं और ग्रहों से आदमी जमीन पर आता रहा है।

आदमी जो आज जानता है, वह पहली बार जान रहा है, ऐसी भूल में पड़ने का अब कोई कारण नहीं है। आदमी बहुत बार जान लेता है और भूल जाता है। बहुत बार शिखर छू लिये गये हैं और खो गये हैं। सभ्यतायें उठती हैं और आकाश को छूती हैं लहरों की तरह और विलीन हो जाती हैं। जब भी कोई लहर आकाश को छूती है तो सोचती है : उसके पहले किसी और लहर ने आकाश को नहीं छुआ होगा। 

0 ओशो, महावीर वाणी, भाग-01 --प्रवचन--01 

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Friday, November 11, 2022

मैडम क्यूरी : दो बार नोबेल पुरस्कार जीतने वाली दुनिया की पहली शख्सियत


पूरी दुनिया में ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे, जिन्होंने मैडम क्यूरी/मैरी क्यूरी का नाम नहीं सुना होगा. मैडम क्यूरी को न केवल अब तक की सबसे महत्वपूर्ण महिला वैज्ञानिक होने का दर्जा दिया जाता है, बल्कि उन्हें आइंस्टाइन, न्यूटन, फैराडे, डार्विन जैसे असाधारण प्रतिभासंपन्न सर्वकालिक वैज्ञानिकों की फ़ेहरिस्त में भी शुमार किया जाता है. वे डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली फ्रांस की पहली महिला थीं, और भौतिकी (फिजिक्स) में डॉक्टरेट की डिग्री पाने वाली विश्व की पहली महिला थीं. इसके अलावा पेरिस के सोरबोन यूनिवर्सिटी में लेक्चरर और प्रोफेसर के पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला थीं.

"रेडियोएक्टिविटी" शब्द का इस्तेमाल पहली बार उन्होंने ही किया था. उन्होंने रेडियम की खोज करके न्यूक्लियर फिजिक्स की राह बनाई और बाद में उनकी यह खोज कैंसर के इलाज में वरदान साबित हुई. वे दो बार नोबेल पुरस्कार जीतने वाली दुनिया की पहली शख्सियत थीं एवं रसायन विज्ञान (केमेस्ट्री) और भौतिकी दोनों ही क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाली अब तक इकलौती वैज्ञानिक हैं. वह पहली नोबेल विजेता मांं थीं, जिनकी बेटी को भी नोबेल पुरस्कार मिला.

ऊपर दिए गए असाधारण उपलब्धियों के ब्योरे से आपने इस बात का अंदाजा लगा ही लिया होगा कि आधुनिक भौतिकी की मां (मदर ऑफ मॉडर्न फिजिक्स) के नाम से जानी जाने वाली मैडम क्यूरी बहुत से मामलों में या तो सबसे पहली या इकलौती रहीं. आज हम मैडम क्यूरी की किस्मत को इन अद्वितीय उपलब्धियों के लिए सराहते हैं, लेकिन अगर हम उनके जीवन पर एक सरसरी निगाह भी डालें तो पता चल जाएगा कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें कितनी कठिनाइयों से जूझना पड़ा था. आज इन्हीं मैडम क्यूरी का जन्मदिन है. आइए, इस अवसर पर उनके बारे में संक्षेप में चर्चा करते हैं जो गरीबी, एकाकीपन और लैंगिक भेदभाव से लड़ते-लड़ते अंधेरे से प्रकाश की विरासत बन गईं.

मैडम क्यूरी का वास्तविक नाम मारिया सालोमिया स्कोलोडोव्स्का था. उनका जन्म 7  नवंबर, 1867 को पोलैंड के वारसॉ शहर में हुआ था. उनके पिता व्लादिस्लॉ स्कोलोडोव्स्की गणित और भौतिकी के अध्यापक थे और माँ ब्रोनिस्लावा लड़कियों के एक बोर्डिंग स्कूल में हेड मिस्ट्रेस थीं. वह अपने माता-पिता के पांच बच्चों में से सबसे छोटी थीं. मारिया को घर में प्यार से मान्या कहकर बुलाया जाता था. उनकी माँ ब्रोनिस्लावा ने मारिया का सही ढंग से पालन-पोषण करने के लिए बोर्डिंग स्कूल से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही देनी शुरू की. पिता वैज्ञानिक औजारों का इस्तेमाल सिखाने के साथ ही साहित्य और पॉपुलर साइंस की किताबें भी पढ़ कर सुनाए करते थे.

उन दिनों पोलैंड में रूस के शासक जार के अधीन था. जार पोलैंड के लोगों की संस्कृति, इतिहास और पोलिश भाषा को मिटाने की कोशिशों में पूरी शिद्दत से जुटा हुआ था. जार की दहशत इतनी ज्यादा थी कि स्कूल-कालेजों में पोलिश भाषा और पोलैंड का इतिहास भी नहीं पढ़ाया जाता था. यह सब करके जार उन पोल राष्ट्रवादियों और देशभक्तों को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देना चाहता था, जो रूसी शासन के चंगुल से आजाद होना चाहते थे. मान्या के पिता भी इन्हीं देशप्रेमियों में से थे. पोलैंड की आजादी का खुलकर समर्थन करने की वजह से उनके पिता व्लादिस्लॉ स्कोलोडोव्स्की को स्कूल की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. मजबूर होकर उन्हें एक के बाद एक निचले दर्जे के शिक्षण संबंधी काम करने पड़े.

मान्या की मां अक्सर बीमार रहती थीं. बाद में डॉक्टरों ने बताया की उन्हें टीबी हो गया है. आर्थिक तंगी की वजह से इलाज न करवा पाने और घर की तमाम मुश्किलों से जूझते हुए 1878  में सिर्फ 42 साल की उम्र में उनकी माँ का देहांत हो गया. तब मान्या की उम्र महज 10 साल थी. माँ का साया सर से उठ जाने के बाद आखिरकार मान्या को औपचारिक पढ़ाई-लिखाई के लिए स्कूल जाना पड़ा. स्कूली पढ़ाई में मान्या ने शानदार प्रदर्शन किया. मारिया जितनी मेहनती और कुशाग्रबुद्धि की छात्रा थी, उतनी ही बड़ी देशभक्त भी. 1881 में जब रूसी जार अलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या हुई, तब मान्या और उसकी दोस्त काजिया ने खुशी मनाने के लिए खूब नाचा-गाया.

मान्या हालांकि एक अच्छी छात्रा थीं, लेकिन अपनी पढ़ाई के शुरुआती दिनों में उसने विज्ञान की तरफ ऐसा कुछ खास रुझान नहीं दिखाया था, जिससे इसका अंदाजा लगाया जा सकता की वह भविष्य में दुनिया की सबसे मशहूर महिला वैज्ञानिक बनेगी. मैडम क्यूरी की बेटी ईव क्यूरी अपनी माँ के बारे में लिखती हैं कि, च्मारिया सालोमिया स्कोलोडोव्स्का का हृदय प्रेम से भरा था. उनके शिक्षकों के मुताबिक उनमें च्विशेष प्रतिभाज् थीं, लेकिन कुल मिलाकर उनमें अचंभित कर देने वाला ऐसा कोई भी अनूठापन नहीं था, जो उन्हें उनके साथ पले-बढ़े बच्चों से अलग करती हो.

1883 में मान्या ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी के साथ पास की. उसमें उसे गोल्ड मेडल भी मिला. मगर उसे इससे खुशी नहीं हुई क्योंकि इसके लिए उसे रूसी शिक्षा अधिकारी से हाथ मिलना पड़ा था. कहा जाता है कि हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मान्या डिप्रेशन की शिकार हो गई. पिता ने मान्या को गांव में अपने रिश्तेदारों के पास छुट्टियांं मनाने के लिए भेज दिया ताकि वहाँ वह प्रकृति की छाँव में रहकर मानसिक रूप से स्वास्थ लाभ प्राप्त कर सके. गांव के उन्मुक्त वातावरण एक साल बिताकर पूरी तरह से स्वस्थ्य होकर मान्या वारसॉ लौट आई.

मान्या आगे और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस समय पोलैंड के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता था. मान्या के भाई जोजेफ को तो वारसॉ यूनिवर्सिटी के मेडिकल इंस्टीट्यूट में दाखिला मिल गया लेकिन लड़की होने की वजह से मान्या और उसकी बहन ब्रोन्या को प्रवेश नहीं मिला. मान्या ने सोचा कि पैसे कमाकर वह और उसकी बहन यूरोप के दूसरे विश्वविद्यालयों में उच्च अध्ययन कर सकती हैं. इसलिए उसने वारसॉ से 100 किलोमीटर दूर एक गाँव के एक संपन्न परिवार में गर्वनेंस की नौकरी कर ली और उसी परिवार के एक लड़के से प्यार भी कर बैठी, लेकिन लड़के का परिवार इस रिश्ते के लिए राजी नहीं हुआ.

प्यार में नाकामयाब होने के बाद मान्या वारसॉ लौट आई. वह अपनी बहन ब्रोन्या को इस शर्त के साथ पढ़ने के लिए पेरिस भेज चुकी थी कि वह पैसे कमाकर ब्रोन्या की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा उठाएगी और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद ब्रोन्या पेरिस में मान्या के रहने व पढ़ाई का खर्चा उठाएगी. वारसॉ में काफी दौड़-धूप करने के बाद एक धनी व्यापारी के यहां मान्या को गर्वनेंस की दोबारा नौकरी मिल गई. आखिरकार मान्या की मेहनत रंग लाई ब्रोन्या ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और उसने मान्या को चिट्ठी लिखकर पेरिस आने को कहा.

नवंबर 1891 में मान्या पेरिस पहुंची. पेरिस में वह ब्रोन्या के घर रहने लगी. ब्रोन्या ने एक पोल राष्ट्रवादी काशीमीर डलुस्की से शादी कर ली थी. मान्या ने पेरिस के सोरबोन यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. साथ ही उसने अपना नाम भी बदलकर "मैरी स्कोलोडोव्स्का" रख लिया. चूंकि मैरी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद करीब 6 साल तक औपचारिक अध्ययन से दूर रहीं थीं इसलिए उनको पढ़ाई के लिए अन्य विद्यार्थियों से ज्यादा मेहनत करना पड़ रहा था. घोड़ागाड़ी से घर से यूनिवर्सिटी पहुँचने में मैरी को एक घंटा लग जाता था और ब्रोन्या-काशीमीर का घर उन पोल राष्ट्रवादियों का अड्डा बन चुका था, जो रात-दिन राजनीतिक बहस में मशगूल रहते थे. इससे मैरी की पढ़ाई में खलल पड़ती थी, इसलिए मैरी ने बहन का घर छोड़कर यूनिवर्सिटी के पास एक सस्ता, गंदा और खस्ताहाल कमरा किराए पर ले लिया, जिसमें छत की ढलान से सटा हुआ एक छेद ही रोशनी और हवा का जरिया थी.

मैरी इसी कमरे में एकाग्र होकर दिनभर पढ़ती और रात होते ही ठंड से बचने और रोशनी के लिए सेंट जेनेविए लाइब्रेरी की शरण ले लेतीं. आर्थिक तंगी के बीच मैरी ने अपने सपनों का पीछा करते हुए ब्रेड-बटर, चाय, फल, अंडे वगैरह से गुजारा करते हुए रात-दिन परिश्रम किया. 1893 में मैरी ने न सिर्फ भौतिकी में मास्टर की डिग्री हासिल की, बल्कि कक्षा में प्रथम स्थान भी हासिल किया. पोलैंड के दूरदराज़ इलाके से आई एक गरीब लड़की के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी.

मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद जब मैरी वारसॉ लौटीं तो उन्हें आशा थी कि उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार कोई बढ़िया काम मिल जाएगा. लेकिन मैरी की उम्मीदें धरीं-की-धरीं रह गई जब वारसॉ यूनिवर्सिटी ने उन्हें स्त्री होने की वजह से अध्यापन कार्य देने से इंकार कर दिया. इससे मैरी निराश हो गईं, लेकिन उन्हें जब उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाने के इच्छुक पोल छात्रों को मिलने वाली 600 रूबल की स्कॉलरशिप मिली, तो मानो उनके सपनों को नए पर लग गए. इस स्कॉलरशिप की मदद से मैरी ने पेरिस में दोबारा गहन अध्ययन शुरू किया और 1894 में उन्होंने गणित में मास्टर की डिग्री हासिल की. नौकरी मिलते ही मैरी ने स्कॉलरशिप स्वरूप मिली 600 रूबल की राशि को इस उद्देश्य से पोलैंड स्थित एनजीओ को वापस कर दी ताकि किसी अन्य पोल छात्र को उन्हीं की तरह उच्च अध्ययन का मौका मिल सके.

मैरी को पहला काम सोसाइटी फॉर एंकरेजमेंट ऑफ नेशनल इंडस्ट्री से अलग-अलग तरह के स्टील्स के केमिकल स्ट्रक्चर और मैग्नेटिक प्रॉपर्टीज़ का पता लगाने का मिला. इसी काम के सिलसिले में मैरी की मुलाक़ात प्रतिभाशाली भौतिक विज्ञानी पियरे क्यूरी से हुई. पियरे क्यूरी च्द सिटी ऑफ पेरिस इंडस्ट्रियल फिजिक्स एंड केमिस्ट्री हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशनज् की प्रयोगशाला के प्रमुख थे. पियरे और मैरी इसी प्रयोगशाला में एक साथ काम करने लगे. विज्ञान के प्रति दोनों के आपसी जुनून ने उन्हें करीब ला दिया और उनमें एक-दूसरे के लिए भावनाएँ विकसित होने लगीं. आखिरकार, पियरे ने शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन मैरी अपने देश, अपने पिता के पास पोलैंड वापस जाना चाहती थीं. मगर पियरे का प्यार मैरी को खींच लाया और उन दोनों ने जुलाई 1895 में शादी कर ली.

1896 में मैरी ने स्टील्स पर अपना शोध पूरा कर लिया. उसके बाद मैरी ने भौतिकी में डॉक्टरेट करने का फैसला किया. वे अपनी थीसिस के लिए एक ऐसे विषय की तलाश में थीं, जो एकदम नया हो क्योंकि विज्ञान में शोध करने के लिए यह जरूरी होता है कि शोधकर्ता उसी विषय में अन्य शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शोधों को भी उद्धारित करे. जाहिर है कि मैरी इस मामले में काफी सजग थीं. 1896 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक हेनरी बैकेरल ने भौतिकी के क्षेत्र में एक बेहद अप्रत्याशित खोज की थी, जिसे बाद में रेडियोएक्टिविटी कहा गया. इस खोज के माध्यम से बैकेरल ने यह बताया कि अंधरे में रखे यूरेनियम लवण (साल्ट्स) भी फोटोग्राफिक प्लेटों को कुहासा कर देने वाली किरणें छोड़ते हैं. इसे एक्स-रे की तर्ज पर च्यूरेनियम-रेज् का नाम दिया गया. मैरी क्यूरी ने अपनी थीसिस के विषय के लिए यूरेनियम-रे को चुना. चूंकि विषय नया था, इसलिए पुराने शोधों को उद्धरित करने की झंझट से उन्हें छुटकारा मिल गया. लिहाजा, वे तुरंत प्रयोग शुरू करने की स्थिति में थीं.

अपने प्रयोगों के जरिए मैरी ने जल्दी ही पता लगा लिया कि यूरेनियम के साथ-साथ थोरियम से भी ऐसी ही अदृश्य किरणें निकलती है. किसी पदार्थ से अदृश्य किरणें निकलने की इस विशेषता को उन्होंने च्रेडियोएक्टिविटीज् नाम दिया. कुछ और प्रयोगों के बाद मैरी इस नतीजे पर पहुंची कि यूरेनियम की कच्ची धातु पिचब्लेंड और चाल्कोसाइट से यूरेनियम और थोरियम से भी ज्यादा ताकतवर किरणें निकलती है. अब उनके पति पियरे क्यूरी को भी मैरी के शोधकार्यों में गहरी दिलचस्पी पैदा हो गई थी, इसलिए उन्होंने अपने बाकी सारे काम छोड़कर रेडियोएक्टिविटी पर मैरी के साथ शोध शुरू कर दिया. आखिरकार, क्यूरी दंपति ने बेहद कठिन परिस्थितियों में, बगैर सर्दी-गर्मी की परवाह किए, रात-दिन एक करके दो नए तत्वों की खोज कर डाली. पहले तत्व का नाम उन्होंने अपने मूल देश पोलैंड के नाम पर च्पोलोनियमज् और दूसरे का नाम च्रेडियमज् रखा.

दोनों के सामने अगली चुनौती थी पिचब्लेंड से पोलोनियम व रेडियम को शुद्ध रूप में प्राप्त करना. लगभग तीन साल की कड़ी मशक्कत और कई टन पिचब्लेंड अयस्क को संसाधित करने के बाद क्यूरी दंपति ने आखिरकार 0.1 मिलीग्राम रेडियम निकालकर उसके परमाणु भार का पता लगाया और यह साबित कर दिया कि रेडियम एक नया तत्व है. मैरी ने अपनी डॉक्टरेट थीसिस इसी विषय पर लिखकर 1903 में पीएचडी की डिग्री हासिल की और विश्व की पहली ऐसी महिला बन गईं जिसे यह गौरव प्राप्त हुआ था. मैरी की थीसिस के परीक्षकों के मुताबिक डॉक्टरेट पाने के लिए लिखे गए किसी थीसिस के जरिए विज्ञान के क्षेत्र में इतना बड़ा योगदान पहली बार दिया गया था. इसके कुछ महीने बाद रॉयल इंस्टीट्यूशन के बुलावे पर क्यूरी दंपति इंग्लैंड गई. उस समय इंग्लैंड में महिलाओं को वैज्ञानिक के रूप में बिलकुल भी तवज्जो नहीं दिया जाता था. इसी वजह से मैरी क्यूरी को किसी भी कान्फ्रेंस में बोलने की इजाजत नहीं दी गई. सभी व्याख्यान पियरे क्यूरी को ही देने पड़े.

उसी साल, मैरी व पियरे क्यूरी और हेनरी बैकेरल को संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया. लेकिन मैरी लिए विश्व की पहली महिला नोबेल विजेता बनने की राह कतई आसान नहीं रही थी. गौरतलब है कि महिला होने की वजह से 1903 में भौतिकी के नोबल के लिए नोमिनेटेड लोगों की लिस्ट में मैरी का नाम नहीं था. सिर्फ बैकेरल और पियरे क्यूरी को ही नोमिनेट किया गया था. जब स्वीडिश गणितज्ञ और वैज्ञानिक गोस्टा मिट्टाग-लेफ्लर ने मैरी और उनके योगदान का समर्थन करते हुए नोबेल कमेटी को चिट्ठी लिखी, तब कहीं जाकर नोमिनेटेड लोगों की लिस्ट में मैरी का नाम जोड़ा गया!

नोबेल मिलने के बाद न केवल क्यूरी दंपति की आर्थिक स्थिति सुधरी बल्कि उन्हें काफी लोकप्रियता भी हासिल हुई. अब मैरी क्यूरी को सम्मान से च्मैडम क्यूरीज् कहकर संबोधित किया जाने लगा था. हालांकि यह खुशी ज्यादा दिनों तक न टिकी नहीं और 1906 में एक सड़क दुर्घटना में पियरे क्यूरी की मौत हो गई. मैरी के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था. लेकिन साहसी मैरी ने हार न मानते हुए अपना और अपने पति के अधूरे शोध को आगे बढ़ाने का निश्चय किया.

सोरबोन यूनिवर्सिटी (पेरिस) के प्रशासकों ने सभी परम्पराओं को ताक पर रखते हुए पियरे की मौत से खाली हुए प्रोफेसर पद पर मैरी क्यूरी को नियुक्त कर दिया. कुछ लोगों को एक महिला को प्रोफेसर के पद पर बैठाने की बात रास नहीं आई और उन्होंने इसकी कड़वी आलोचना की. लेकिन पियरे की मौत के बाद अकेली पड़ गई मैरी अपने शोध में तन-मन से लगी रहीं. अथक परिश्रम की बदौलत उन्हें कई डेसीग्राम शुद्धतम रेडियम तैयार करने में सफलता मिली. रेडियोएक्टिविटी पर तमाम मौलिक अनुसंधानों के लिए मैडम क्यूरी को 1911 में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में दूसरी बार नोबेल पुरस्कार दिया गया.

लेकिन वो कहते हैं न कि शोहरत के कुछ अँधेरे पहलू भी होते हैं. एक महिला को दूसरी बार नोबेल देने पर कुछ लोगों ने नोबेल कमेटी के फैसले पर सवाल खड़े कर दिए. इसके अलावा पेरिस में वैज्ञानिक पॉल लैंगेवीन से कथित प्रेम प्रसंग को लेकर मैरी क्यूरी पर तरह-तरह के लांछन भी लगाए जा रहे थे. पेरिस में उनके परिवार का रहना दूभर हो गया था. यहां तक कि नोबेल कमेटी के एक सदस्य ने भी उन्हें कह दिया था कि वे पुरस्कार लेने के लिए स्वयं स्वीडन न आएं. लेकिन मैरी पुरस्कार ग्रहण करने स्वीडन गईं और अपने भाषण में इस नोबेल पुरस्कार को च्पियरे क्यूरी की यादों के प्रति एक श्रद्धांजलि कहाज्.

दो बार नोबेल पुरस्कार जीतने के बावजूद कभी भी उन्हें एकेडमी ऑफ साइंसेज का सदस्य नहीं चुना गया. मैडम क्यूरी ने अपने वैज्ञानिक खोजों का कभी भी पेटेंट नहीं करवाया और उनको मानव जाति की भलाई, विशेषकर चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए समर्पित कर दिया. लेकिन मैडम क्यूरी रेडियम के विकिरण (रेडिएशन) की मार से बच न सकीं. लंबे समय तक रेडिएशन के बीच काम करते रहने से मैरी को कैंसर हो गया. आखिरकार, कैंसर से लड़ते-लड़ते 4 जुलाई 1934 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. आज मैडम क्यूरी हमारे बीच न होकर भी उन लाखों महिलाओं की प्रेरणा की सबसे बड़ी स्रोत हैं, जो अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर पुरुषों के वर्चस्व वाली विज्ञान की दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहती हैं. अस्तु!

० 'विज्ञान विश्व' से साभार

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Tuesday, November 8, 2022

पन्ना में पृथ्वी परिक्रमा की रही धूम, अनूठी परम्परा जो देती है प्रकृति से प्रेम करने की सीख

  • प्रणामी धर्मावलम्बियों के सबसे बड़े तीर्थ पन्ना धाम में पिछले लगभग चार सौ सालों से पृथ्वी परिक्रमा करने की परंपरा चली आ रही है जो आज भी जारी है। शरद पूर्णिमा के ठीक एक माह बाद कार्तिक पूर्णिमा को पृथ्वी परिक्रमा होती है, जिसमें देश के विभिन्न प्रान्तों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।



।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। समूचे विश्व में भारत इकलौता देश है जहाँ सदियों पूर्व बसुधैव कुटुंबकम की उद्घोषणा की गई थी। यह इस देश की खूबसूरती है कि यहाँ पर विविध धर्मावलम्बियों की धार्मिक आस्थाओं व परम्पराओं को न सिर्फ पूरा सम्मान मिलता है अपितु उन्हें पल्लवित और पुष्पित होने का अवसर व अनुकूल वातावरण भी सहज उपलब्ध होता है। यही वजह है कि हमारे देश में हर धर्म और हर जाति के लोगों की अलग-अलग परंपराएं और मान्यताएं मौजूद हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना शहर में लगभग चार सौ सालों से चली आ रही है। प्राचीन भव्य मंदिरों के इस शहर पन्ना में प्रणामी धर्मावलम्बियों की आस्था का केंद्र श्री प्राणनाथ जी का मंदिर स्थित है, जो प्रणामी धर्म का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है।

इसी प्रणामी संप्रदाय के अनुयाई और श्रद्धालु शरद पूर्णिमा के ठीक एक माह बाद कार्तिक पूर्णिमा को देश के कोने कोने से यहां पहुंचते हैं। यहाँ किलकिला नदी के किनारे व पहाड़ियों के बीचों बीच बसे समूचे पन्ना नगर के चारों तरफ परिक्रमा लगाकर भगवान श्री कृष्ण के उस स्वरूप को खोजते हैं, जो कि शरद पूर्णिमा की रासलीला में उन्होंने देखा और अनुभव किया है। अंतर्ध्यान हो चुके प्रियतम प्राणनाथ को उनके प्रेमी सुन्दरसाथ भाव विभोर होकर नदी, नालों, पहाड़ों तथा घने जंगल में हर कहीं खोजते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा को प्रणामी धर्मावलम्बी पृथ्वी परिक्रमा कहते हैं।

मंदिरों की नगरी पन्ना में मंगलवार 8 नवम्बर को पृथ्वी परिक्रमा में भाग लेने के लिए देश के विभिन्न प्रांतों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु (सुन्दरसाथ) पन्ना पहुँचे, जिससे आज पूरे दिन मंदिरों के शहर पन्ना में पृथ्वी परिक्रमा की धूम रही। पूरे भक्ति भाव और उत्साह के साथ पन्ना पहुंचे ये श्रद्धालु परम्परानुसार पृथ्वी परिक्रमा में भाग लिया। चापा छत्तीसगढ़ से पन्ना धाम पहुंचीं कमला शर्मा (60 वर्ष) ने बताया कि पृथ्वी परिक्रमा में शामिल होने से जो शांति व सुकून मिलता है, उसे कह पाना कठिन है। वे बताती हैं कि चौथी बार पृथ्वी परिक्रमा में शामिल होने पन्ना आई हैं। यह अनूठी परम्परा हमें प्रकृति से प्रेम करने की सीख देती है।

हरकुंडी गांव गुजरात से पृथ्वी परिक्रमा में शामिल होने सपरिवार पन्ना आये रश्मि भाई भट्ट (67 वर्ष) बताते हैं कि पन्ना पुण्य भूमि है और इस भूमि की परिक्रमा करना सौभाग्य की बात है। नदी, नालों, पहाड़ों और घने जंगलों से होकर पूरे पन्ना धाम की परिक्रमा गाते-बजाते करना सुखद अनुभव है। कार्तिक पूर्णिमा को सुबह 6 बजे से ही सैकड़ों फिट गहरे कौआ सेहा से लेकर किलकिला नदी के प्रवाह क्षेत्र व चौपड़ा मंदिर हर कहीं प्राणनाथ प्यारे के जयकारे सुनाई देते हैं। रोमांचित कर देने वाले आस्था एवं श्रद्धा के इस सैलाब से पवित्र नगरी पन्ना का कण-कण प्रेम और आनंद से सराबोर हो उठता है।

मालुम हो कि प्रकृति के निकट रहने तथा विश्व कल्याण व साम्प्रदायिक सद्भाव की सीख देने वाली इस अनूठी परम्परा को प्रणामी संप्रदाय के प्रणेता महामति श्री प्राणनाथ जी ने आज से लगभग 398 साल पहले शुरू किया था, जो आज भी अनवरत् जारी है। इस परम्परा का अनुकरण करने वालों का मानना है कि पृथ्वी परिक्रमा से उनको सुखद अनुभूति तथा शान्ति मिलती है। महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर पन्ना के पुजारी देवकरण त्रिपाठी ने बताया कि पवित्र नगरी पन्ना में कार्तिक पूर्णिमा को हजारों की संख्या में देश के कोने-कोने से आये सुंदरसाथ व स्थानीय जनों द्वारा पृथ्वी परिक्रमा करने की परंपरा है, जिसका निर्वहन आज भी हो रहा है। उन्होंने बताया कि कार्तिक शुक्ल की पूर्णमासी पर प्रात: 6 बजे से चारों मंदिरों की परिक्रमा के साथ पृथ्वी परिक्रमा का शुभारम्भ होता है।

प्रणामी संप्रदाय की इस अनूठी परंपरा के बारे में पं. दीपक शर्मा (55 वर्ष) बताते हैं कि श्री प्राणनाथ जी मंदिर से पृथ्वी परिक्रमा की शुरुवात सुबह ६ बजे से हो जाती है जो देर रात्रि तक चलती रहती है। श्री त्रिपाठी बताते हैं कि सर्वप्रथम आये हुये श्रद्धालु पन्ना नगर में स्थित श्री प्राणनाथ जी मंदिर, गुम्मट जी मंदिर, श्री बंगला जी मंदिर, सद्गुरू धनी देवचन्द्र जी मंदिर, बाईजूराज राधिका मंदिर में पूरी श्रद्धा के साथ सिर नवाते हैं, तदुपरांत धूमधाम के साथ यात्रा शुरू करते हैं। पूरी परिक्रमा लगभग 30  किमी. की हो जाती है, जिसमें महिला, पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग भी बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं। मंदिर ट्रस्ट व नगरवासियों द्वारा परिक्रमा मार्ग पर जगह - जगह चाय, पानी व खाने का इंतजाम रहता है जिसे श्रद्धालु प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं। परिक्रमा में शामिल लोग रास्ते में बच्चों को टाफियां व मिठाई आदि भी बड़े प्रेम भाव से बांटते हैं तथा गरीबों को पैसा व सामग्री भेंट करते हैं।

प्रणामी संप्रदाय में श्रद्धालुओं को सुन्दरसाथ कहा जाता है

हजारों की संख्या में श्रद्धालु जिन्हे प्रणामी संप्रदाय में सुन्दरसाथ कहा जाता है वे नाचते गाते, झूमते और तरह - तरह के वाद्य यन्त्र बजाते हुए चलते हैं। जंगल के रास्ते से होते हुये श्रद्धालुओं की टोलियां जब प्राकृतिक व रमणीक स्थल चौपड़ा मंदिर पहुंचतीं तो यहां पर प्रकृति के साथ संबंध स्थापित करते हुये कुछ देर विश्राम कर प्रसाद आदि ग्रहण करतीं हैं और फिर अपनी अल्प थकान को मिटाकर आगे की यात्रा पर निकल पड़तीं हैं। पं. दीपक शर्मा बताते हैं कि इस साल पृथ्वी परिक्रमा में गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश के दमोह, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, इन्दौर व उज्जैन आदि जिलों से 15 से 20 हजार सुन्दरसाथ पन्ना पहुंचे हैं। पडोसी देश नेपाल से भी अनेकों सुन्दरसाथ पृथ्वी परिक्रमा में भाग लेने पन्ना धाम आये हैं।

नेपाल (ललितपुर) से पन्ना आये उद्धव खांडकर (60 वर्ष) ने  बताया कि उनकी पत्नी ईश्वरी खांडकर भी साथ में आई हैं। पृथ्वी परिक्रमा में शामिल होने का यह उनका दूसरा अवसर है, यहाँ आकर शांति और आनंद की अनुभूति होती है। श्री खांडकर बताते हैं कि इस वर्ष नेपाल से बड़ी संख्या में लोग आये हैं जबकि उनकी टोली में 33 लोग हैं।

 नदी, पहाड़ और गहरे सेहा से होकर गुजरते हैं श्रद्धालु


पृथ्वी परिक्रमा में नदी, पहाड़ और गहरे सेहा से श्रद्धालु जब जयकारे लगाते हुए गुजरते हैं, तब यह नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। कौआ सेहा की गहराई, चारो तरफ फैली हरीतिमा तथा जल प्रपात का कर्णप्रिय संगीत और जहाँ-तहाँ चट्टानों पर बैठकर विश्राम करती श्रद्धालुओं की टोली, सब कुछ बहुत ही मनभावन लगता है। जानकारों के मुताबिक इस परिक्रमा की दूरी करीब 27 से 30 किलोमीटर के आसपास होती है। पहाड़ी को पार करते हुये मदार साहब, धरमसागर व अघोर होकर यह विशाल कारवां खेजड़ा मंदिर पहुंचता है। यात्रा में रंग विरंगे कपड़े पहने मुस्कुराते बच्चे, सुन्दर परिधानों से सुसज्जित महिलायें, युवा, युवतियाँ व वृद्धजन अपने-अपने विशिष्ट अंदाज में दिखते हैं। खेजड़ा मंदिर पहुंचने पर वहां महाआरती व प्रसाद वितरण होता है। तत्पश्चात सभी सुन्दरसाथ उसी स्थान पर पहुंचते हैं जहां से परिक्रमा शुरू की गई थी।

देखने जैसा है कौवा सेहा का अप्रतिम सौंदर्य

पन्ना शहर से बमुश्किल तीन-चार किलोमीटर दूर स्थित कौवा सेहा का अप्रतिम सौंदर्य देखने जैसा है। यदि इस प्राकृतिक सेहा तक सुगम मार्ग व यहां सुरक्षा के जरूरी इंतजाम करा दिए जाएं तो मानसून सीजन के अलावा भी पूरे वर्ष भर यह स्थल पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। गुजरात से आये रश्मि भाई भट्ट बताते हैं कि प्रकृति की इस अद्भुत रचना के सौंदर्य को यहां जाकर ही अनुभव किया जा सकता है। किलकिला नदी का पानी इस गहरे सेहा में जब सुमधुर संगीत के साथ सैकड़ों फीट नीचे गिरता है, तो उसे सुनकर मन प्रफुल्लित हो जाता है। कौवा सेहा के चारों तरफ पृथ्वी परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं का हुजूम नजर आता है। राकेश शर्मा (58 वर्ष) निवासी पन्ना बताते हैं कि  सामान्य दिनों में यहां सन्नाटा पसरा रहता है और झरने के सुुुमधुर संगीत के बीच वृक्षों में कुल्हाड़ी चलने की आवाजें गूंजती हैं, जिससे यहां का माहौल बेहद डरावना प्रतीत होने लगता है। यदि यह स्थल विकसित हो जाए तो अवैध कटाई सहित अन्य गैरकानूनी गतिविधियों पर जहां रोक लग सकती है, वहीं उपेक्षा के चलते उजड़ रहा यह स्थल अप्रतिम सौंदर्य को पुन: प्राप्त हो सकता है।

किलकिला नदी को प्रणामी संप्रदाय की कहा जाता है गंगा

पन्ना शहर के निकट से प्रवाहित होने वाली किलकिला नदी जंगल से गुजर कर कौवा सेहा में गिरती है और आगे चलकर केन नदी में मिल जाती है। प्रणामी संप्रदाय में किलकिला नदी का वही महत्व है जो हिंदुओं के लिए गंगा नदी का है। यही वजह है कि किलकिला को प्रणामी संप्रदाय की गंगा कहा जाता है। लेकिन यह नदी इस कदर दूषित और विषाक्त है कि इसका पानी हाथ धोने के लायक भी नहीं है। पन्ना शहर की पूरी गंदगी इस नदी में पहुंचती है, जो इसे विषाक्त बनाए हुए है। नदी के प्रवाह क्षेत्र में दोनों तरफ कचरा और पॉलिथीन के ढेर जमा हैं। नदी किनारे स्थित वृक्षों के तने पॉलीथिन से पटे हुए हैं।

रश्मि भाई भट्ट कहते हैं कि पन्ना के विकास व सौंदर्यीकरण की बात करने वाले जनप्रतिनिधि व  अधिकारी यदि किलकिला नदी को साफ स्वच्छ बनाने व कौवा सेहा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में सार्थक पहल करें तो निश्चित ही यह पन्ना शहर पर न सिर्फ बहुत बड़ा उपकार होगा अपितु इससे रोजगार के नए अवसरों का सृजन व पर्यावरण का संरक्षण भी होगा।

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खजुराहो में बसेगी जनजातीय बस्ती, ताकि विदेशी हो सकें रूबरू

 


विदेशी पर्यटकों को मध्यप्रदेश की हजारों वर्ष पुरानी जनजातीय सभ्यता और संस्कृति से रूबरू कराने खजुराहो में संस्कृति विभाग द्वारा जनजातीय बस्ती बनाई जा रही है। मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी भोपाल द्वारा इस जनजातीय बस्ती को बसाया जा रहा है। 

यह बस्ती खजुराहो के सर्किट हाउस के पास आदिवर्त जनजातीय लोक कला संग्रहालय के परिसर से लगी जमीन पर बसाई जा रही है। जिसमे गौंड़, बैगा, कोरकू, भील, भारिया, सहरिया और कोल जनजातियों के रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, आभूषण का एक जगह होगा संगम इसके तहत प्रदेश की ७ प्रमुख जनजाति गौंड़, बैगा, कोरकू, भील, भारिया, सहरिया और कोल के पारंपरिक जनजातीय आवासों का संयोजन किया जा रहा है। 

यह परिकल्पना एक जनजातीय गांव की तरह परिकल्पित की जा रही है। इसमें जनजातियों के रहन-सहन, आवासों की अलंकारिकता, उपयोगी सामग्रियों को प्रदर्शित किया जायेगा। उसके बाद प्रदेश के पांचों लोकांचल बुंदेलखंड, निमाड़, मालवा, बघेलखंड और चंबल की जनपदीय संस्कृति के पारंपरिक आवासों को भी विस्तारित किया जाएगा।


बघेलखंड का पारंपरिक आवास के लिए सतना जिले के वरिष्ट साहित्यकार पर्यावरण विद पद्मश्री बाबूलाल दाहियां का सहयोग लिया जा रहा है । श्री दाहियां द्वारा बघेलखंड की पहचान पुरानी बघरी का कंप्यूटर थ्री डी ढांचा माडल बनवा लिया है। इसके साथ ही आगामी सप्ताह में स्थानीय जानकर श्रमिको को ले जाकर देखरेख में निर्माण करवाएगे।

इससे यह खजुराहो आने वाले पर्यटक जिन्होंने केवल किताबों या इतिहास में तो पढ़ा है पर देखा नहीं। उसे हम अपनी प्राचीन सभ्यता जिसमें जनजातियों के रहन सहन, खान पान, वेशभूषा, आभूषण एवं उनकी कला कृतियों को साक्षात मूल स्वरूप में दिखा सकेंगे।

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बुंदेलखण्ड स्तरीय दिवारी प्रतियोगिता का पन्ना जिले में हुआ भव्य आयोजन

  •  इस अनूठी प्रतियोगिता में बड़ोखर खुर्द ने जीता प्रथम पुरस्कार
  •  प्रतियोगिता में 16 टीमों ने लिया भाग, उमड़ा दर्शकों का सैलाब 


पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में 7 नवंबर 2022 को अजयगढ़ तहसील अंतर्गत ग्राम तरोनी के ठाकुर बाबा की तलैया में बुंदेलखंड स्तरीय दिवारी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। इस अनूठी प्रतियोगिता का आनंद लेने दर्शकों का सैलाब उमड़ पड़ा। प्रतियोगिता में क्षेत्रीय टीमों सहित जिले से लेकर नेशनल लेबल तक की टीमें शामिल हुईं। प्रतियोगिता में कुल 16 टीमों ने भाग लेकर दिवारी नृत्य, लाठी घाई एवं कुलांटी और शारीरिक करतबों की प्रस्तुतियां दीं। 

प्रतियोगिता में टीमों के द्वारा एक से बढ़कर एक करतब प्रस्तुत किए गए, जिसमें बांदा बड़ोखर खुर्द की टीम ने अजब-गजब करतबों का प्रदर्शन करते हुए प्रथम पुरस्कार चांदी की शील्ड एवं 21 हजार नगद इनाम प्राप्त किया। बिलाही अजयगढ़ टीम को द्वितीय पुरस्कार में 12100 रुपये नगद एवं शील्ड प्रदान किया गया।  इसी प्रकार कीरतपुर की टीम को तृतीय पुरस्कार 7100 रुपये नगद व शील्ड से नवाजा गया। अन्य टीमों को हनुमंत प्रताप सिंह उर्फ रजउ राजा के द्वारा ग्यारह-ग्यारह सौ रुपये प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई एवं कमेटी की ओर से मेडल से नवाजा गया। इस प्रतियोगिता में शारीरिक करतब का प्रदर्शन करने वालों को भी पुरस्कृत किया गया। पन्ना जिले में पहली बार आयोजित हुई इस अजब-गजब अनूठी प्रतियोगिता के 25 हजार से अधिक दर्शक शाक्षी बने। 


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने कार्यक्रम के साथ-साथ कार्यक्रम के संयोजक समाजसेवी एवं इंजी अजय तिवारी, आयोजक मण्डल और निर्णायक मण्डल की सराहना की। कार्यक्रम को लेकर प्रतिभागियों सहित दर्शकों में भी भारी उत्साह देखा गया। कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कार्यक्रम समापन के दौरान तरौनी से अजयगढ़ और सिंहपुर मार्ग काफी देर तक जाम रहा। सुरक्षा व्यवस्था के लिए अजयगढ़ थाना प्रभारी हरि सिंह ठाकुर और धरमपुर थाना प्रभारी सुधीर कुमार बेगी अपने बल के साथ उपस्थित रहे।

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