Thursday, March 23, 2023

गुण ना हेराने गुण ग्राहक हेराने हैं ?

  • लौह उपकरण बेचने वाले लोहगड़िया समुदाय के लोग जो अपना रिश्ता महाराणा प्रताप के सिसौदिया वंश से जोड़ते हैं। इस खानाबदोश समुदाय के लोग लोहे से निर्मित होने वाले औजारों को बनाने में निपुड होते हैं। लेकिन इस तकनीकी युग में इनके बनाये औजारों की मांग न के बराबर रह गई है जिससे यह खानाबदोश समुदाय अब संकट में है। 

खानाबदोश लोहगड़िया समुदाय के लोग इसी तरह बैलगाड़ी से एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा करते हैं। 


।। बाबूलाल दाहिया ।।

मित्रो ! यहां लौह उपकरण बेचने वाले एक लोहगड़िया के दो चित्र हैं। पहला तब का है जब वह बैलगाड़ी में अपने समूचे परिवार और गृहस्थी को लेकर आता था । लेकिन दूसरा  अब का है जब वह खेती के तमाम उपकरण बस में रख कर लाया है और पुराने स्थान में ही दुकान लगा कर बेचता है। पता नहीं समय क्यो इतनी तेजी से बदलता है कि पिछला सब कुछ तहस नहस करता आगे बढ़ जाता है ? लोहगड़िया नामक इस खानाबदोश समुदाय को हम बहुत पहले से देखते चले आ रहे हैं। यह राजस्थानी लोहगड़िया अपना रिश्ता महाराणा प्रताप के सिसौदिया वंश से जोड़ते हैं।

कहते हैं कि जब महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि "जब तक चित्तौड़ दोबारा न जीत लेंगे तब तक खाट में नही पड़ेगे ? सोने चाँदी के बर्तन में नहीं खायेंगे ? महल के बजाय तम्बू में ही रहेंगे।"  तो उस प्रतिज्ञा में यह समुदाय भी शमिल था। क्योकि शस्त्र आपूर्ति करने के कारण यह समुदाय उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ा था।

सम्भवतः 1953-54  में शुरू- शुरू में जब यह लोग यहां अपनी बैल गाड़ी में पहली बार  आए तो इनके सिर में कान के ऊपर अगल बगल दो और चोटी हुआ करती थी। क्योकि इनकी एक प्रतिज्ञा यह भी थी कि "जब तक अपना देश चित्तौड़ आजाद न करा लेगे तब तक इन चोटियों को नही मुड़वायेगे ?" यही कारण था कि तब इन्हें लोग (तिनचुटइहा) यानी कि तीन चोटी वाला कहते थे। पर बाद में इन्हें अहसास कराया गया कि "अब तुम्हारा चित्तौड़गढ़ भर नही सारा देश आजाद हो गया है।" तो फिर बाद में उनने अपनी दो चोटियां मुड़वा दी।


किमदन्तिया चाहे जो रही हों ? पर इतना तो सच है कि राजपूतों के तलवार, बरछी, भाले आदि की आपूर्ति इन्ही के बलिष्ठ भुजाओं पर टिकी थी। और उनकी विजय श्री के यह समान भागीदार भी थे। इस कार्य मे इनके छोटे- छोटे बच्चे, किशोर, किशोरियां और महिलाएं सभी की बराबर की भागीदारी होती थी।     इनकी ताकत और तकनीक से लोहा पानी -पानी होकर वह भाला, बरछी, तलवार, कटार जो आकार देना चाहते उसमें ही तब्दील हो जाता था। यह लोग कई पीढ़ियों बाद आज भी हर लौह की मुकम्मल जानकारी रखते हैं कि "कौन कच्चा, कौन पक्का और कौन गोबरा लौह है ?"

किन्तु जब अग्रेजों का राज्य आया और राजाओं के आपसी युद्ध खत्म हो गए, साथ ही भाला, बरछी, तलवारों का स्थान बंदूकों ने ले लिया तो समय की गति पहचान इनके कुछ कबीले वर्तमान मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में आ गए और खेती के उपकरण बनाने लगे। लेकिन कल्चर आज भी पूर्णतः राजस्थानी ही है ?

इनका अब स्थायी निवास सागर जिले का एक भूभाग है, जहां यह चार चौमासा बिताते हैं और बाद में अपनी बैल गाड़ी में जरूरी ग्रहस्ती का समान लेकर आठ माह की यात्रा में निकल पड़ते थे। क्योकि यह ऐसा समुदाय है जो बैल गाड़ी में ही पैदा होता, उसी में रहते पलता बढ़ता उसकी सगाई व विवाह होता और फिर उसी में शरीर भी त्याग देता। इनकी एक और विशेषता थी कि यह लौह उपकरण के साथ पशुओं का भी ब्यापार करते थे।


लोगों के पास कितने ही गरियार हल में न चलने वाले बैल होते तो उन्हें कम मूल्य में खरीद लेते और बाद में बैल गाड़ी में चला अच्छे दामों में बेच लेते। पर एक ओर तो ट्रेक्टर, हारबेस्टर आदि ने इनके हथियारों को सीमित कर दिया तो दूसरी ओर अब पशुओं का ब्यापार भी चौपट हो गया। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 15-20   साल पहले जो लोहगढ़िया कई  परिवार समूह में हमारे गाँव के मैदान में हप्तों का कैम्प लगाते और लौह उपकरण बनवाने वालों का इनके इर्दगिर्द ताता लगा रहता लेकिन अब बस से मात्र एक परिवार आया है, जिसके उपकरणों की दूकान तो लगी है पर सामान  की कोई पूछ परख नहीं  दिखती। आगे इस समुदाय की जिंदगी कैसे चलेगी? यह सोचनीय है।

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Saturday, March 18, 2023

कहीं आप भी तो नहीं खा रहे केमिकल युक्त जहरीली सब्जी व अनाज ?

  •  जहरीली सब्जियों से पोषण मिलने के बजाय बिगड़ रहा स्वास्थ्य 
  •  ताजी और हरी दिखने वाली सब्जियां हो सकती हैं खतरनाक  



ताजी और हरी सब्जियां सेहत के लिए लाभप्रद होती हैं लेकिन आजकल बाजार में जो सब्जियां आ रही हैं वे सेहतमंद हों यह जरूरी नहीं है। दरअसल अधिक पैदावार व लाभ कमाने की लालच में ज्यादातर लोग रसायन युक्त जहरीली खेती कर रहे हैं। जिससे सब्जियां व अनाज सब कुछ जहरीला हो रहा है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए न सिर्फ हानिकारक है बल्कि अनेकों खतरनाक बीमारियों का कारण भी बन रहा है। 

अगर आप बाजार से यह सोच कर हरी और ताजी सब्जियां खरीदते हैं कि यह आपके स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है तो आप गलत सोच रहे हैं। केमिकल युक्त हरी और चमकीली सब्जियां व भाजी आपके लिए जानलेवा हो सकती हैं। जहरीली सब्जियों का सेवन रोकने के लिए अनेकों किसान अब रसायन मुक्त प्राकृतिक खेती को अपनाने की ओर अग्रसर हुए हैं। इस दिशा में में कई स्वयं सेवी संस्थाएं जहाँ अच्छा काम कर रही हैं वहीं सरकार भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। 

मालूम हो कि जो जमीन हमारा भरण-पोषण करती है, उसमें अच्छी पैदावार के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों के रूप में लम्बे समय से जहर डाला  जा रहा है। इसलिए जो फसल हो रही है उसके दानों में जीवन कम जहर अधिक समा गया है। जो अन्न हम ग्रहण कर रहे हैं वह पोषण न देकर स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है। इसलिए जैविक या प्राकृतिक खेती पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा है। असल में अत्यधिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से आज खाद्य पदार्थ ही जहरीले हो गए हैं। इनके इस्तेमाल से कैंसर जैसी घातक बीमरियां फैल रही हैं। 

प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के हिमायती पद्मश्री बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि इस समय हम अपने खान पान के माबले में बड़े नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। कहां तो हमारा खान पान पहले 10-12 अनाजों का था, जिनसे शरीर को तरह- तरह के पोषक तत्व मिलते थे। कहां अब वही भोजन मात्र तीन अनाजों में ही सिमट कर रह गया है।

वैसे वह 10-12 प्रकार के अनाज हम जानबूझ कर नहीं बोते थे, बल्कि वह स्वतः ही हमारी खेती में शामिल हो जाते थे। क्योकि उस वर्षा आधारित खेती में हम वह अनाज बीज बोते थे जिसे हमारा खेत मांगता था। पर आज वह अनाज बोते हैं जो बाजार मांगता है। खेत द्वारा माँगे अनाज में हमें खाम खा ऊंचे खेतों  में सांवा कुटकी बोना पड़ता था और ऊंचे खेत में ज्वार। पर ज्वार के साथ मिलमा खेती में ही 4-5 अनाज हो जाते थे।

श्री दाहिया बताते हैं कि गेहूं चावल तो दुर्लभ अनाज थे, अस्तु गहरी भरायठ वाली जमीन में ही बोए जाते थे। पर बाकी जमीन में कोदो, मूग ,उड़द ,तिल, जौ ,मक्का, काकुन, अरहर, मसूर ,चना ,अलसी आदि भी बोए जाते थे। जब इतने प्रकार के अनाज बोए जाते तो वह उपयोग में भी लाए जाते। इनमें मोटे अनाज सांवा, काकुट, कुटकी, कोदो, ज्वार, मक्का ऐसे थे जिन्हें बगैर दो हिस्सा सब्जी दाल, दूध, मट्ठा या  दही के खाया ही नही जा सकता था। यही हाल जौ का था। अस्तु इन्हें खाने के लिए दाल, तरकारी को उगाना जरूरी होता था।  इससे हमारा भोजन स्वतः पोष्टिक हो जाता था।

यह सभी अनाज, सब्जी अपने घर के बीज, गोबर की खाद और खुद के श्रम से या फिर गांव के ही सब्जी उत्पादकों के होते थे, जिसमें किसी केमिकल की तो सम्भावना ही नहीं थी। अगर कीट लगकर कुछ भाग खा भी लेते तो हम उनका खाने का अधिकार मानते थे। देसी अनाजों का तना बड़ा होता तो नीदा नाशक की भी कभी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। क्योंकि एक बार की निराई में वह काफी बड़ा हो जाता था। यूँ  भी लोक मान्यता थी कि खुरपी के मुंह में अमृत होता है अस्तु एक निराई आवश्यक है। पर आज जिस प्रकार का घातक केमिकल अनाज, सब्जियों में डाला जाता है, तो देखकर आश्चर्य होता है कि हम अपने भोजन को अब किस प्रकार बना कर रख दिया ?

अनजाने में हम किस तरह की जहरीली सब्जियां खा रहे हैं, इस वीडियो क्लिप से समझें - 



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Monday, March 13, 2023

माधव नेशनल पार्क के लिए रवाना हुई पन्ना की बाघिन

  •  चंद्रनगर रेंज में बाघिन को किया गया ट्रैंक्युलाइज 
  •  रेस्क्यू वाहन से आज शाम 4 बजे बाघिन हुई रवाना 

पन्ना टाइगर रिज़र्व की युवा बाघिन जिसे आज माधव नेशनल पार्क भेजा गया। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व की लगभग दो-ढाई वर्ष की एक बाघिन को आज दोपहर में ट्रेंकुलाइज कर उसे रेस्क्यू वाहन से माधव नेशनल पार्क के लिए रवाना कर दिया गया है। पूर्व में जिस बाघिन को यहां भेजने हेतु चयनित किया गया था, उसको जख्म होने की वजह से विगत 10 मार्च को नहीं भेजा जा सका। ऐसी स्थिति में अब दूसरी युवा बाघिन को पूरे तीन दिन बाद भेजा गया है। 

क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिज़र्व ब्रजेन्द्र झा से मिली जानकारी के मुताबिक दो साल की बाघिन पी-141 (12) को आज दोपहर पन्ना टाइगर रिजर्व के चंद्रनगर रेंज के मोटा चौकन में ट्रेंकुलाइज किया गया। बाघिन का स्वास्थ परीक्षण करने के उपरांत पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ संजीव कुमार गुप्ता की निगरानी व देखरेख में बाघिन को रेस्क्यू वाहन से भेजा गया है। बाघिन को लेकर पन्ना टाइगर रिजर्व का रेस्क्यू वाहन शाम को लगभग 4 बजे चंद्रनगर रेंज से रवाना हुआ, जिसके रात्रि 12 बजे तक माधव नेशनल पार्क पहुंचने की संभावना है। रेस्क्यू वाहन के साथ वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता, परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना कोर राहुल पुरोहित के अलावा पन्ना टाइगर रिज़र्व का रेस्क्यू दल भी बाघिन के साथ माधव नेशनल पार्क शिवपुरी के लिए रवाना हुआ है। 

वह रेस्क्यू वाहन जिस पर सवार होकर बाघिन रवाना हुई। 

गौरतलब है कि पन्ना की बाघिन को निर्धारित तिथि के मुताबिक 10 मार्च को माधव नेशनल पार्क शिवपुरी भेजा जाना था, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ।  राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने विगत 10 मार्च को माधव नेशनल पार्क में एक नर व एक मादा बाघ को छोड़ा था। यहाँ पहले चरण में एक साथ तीन बाघ छोड़े जाने थे जिनमें पन्ना की बाघिन भी शामिल थी। लेकिन पन्ना से बाघिन जब नियत दिनांक को नहीं पहुंची तो राज्य के ही बांधवगढ़ और सतपुड़ा नेशनल पार्क से लाए गए एक मादा और एक नर बाघ को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा रिलीज किया गया। अब पूरे तीन दिन बाद पन्ना की युवा बाघिन भी माधव नेशनल पार्क के लिए रवाना हुई है जो वहां पहुंचकर अपने नए आशियाने में रानी बनकर न सिर्फ राज करेगी अपितु वहां बाघों के संसार को आबाद करने में भी अहम् भूमिका निभाएगी। 

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Friday, March 10, 2023

पकड़ में नहीं आ सकी पन्ना की बाघिन, आज पहुंचना था माधव नेशनल पार्क

  • बांधवगढ़, सतपुड़ा और पन्ना टाइगर रिजर्व से छोड़े जाने हैं तीन टाइगर
  • पूरे 27 साल बाद शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में गूंजेगी बाघों की दहाड़


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिज़र्व की युवा बाघिन को शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में ले जाने का मुहूर्त अभी नहीं बन सका है। यहाँ से ले जाने के लिए जिस बाघिन का चयन किया गया है उसकी उम्र दो-सवा दो साल के लगभग है। इस बाघिन को ट्रैंक्युलाइज करने का हरसंभव प्रयास किया गया लेकिन चंचल स्वभाव की यह बाघिन हांथी को देखकर दूर निकल जाती है जिससे उसको ट्रैंक्युलाइज नहीं किया जा सका। नतीजतन नियत समय पर इस बाघिन की पन्ना से माधव नेशनल पार्क के लिए रवानगी नहीं हो सकी। आज प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा 3 बाघों को माधव नेशनल पार्क में रिलीज करना था। लेकिन अब बांधवगढ़ से पहुंची बाघिन व सतपुड़ा के नर बाघ को ही आज छोड़ा जा सकेगा। पन्ना टाइगर रिजर्व से जिस बाघिन को शिफ्ट किया जाना है उसे पकड़ने के प्रयास जारी हैं।

उल्लेखनीय है कि शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में पूरे 27 साल बाद एक बार फिर से टाइगर की दहाड़ सुनाई देगी। माधव नेशनल पार्क में 1990-91 तक  काफी संख्या में टाइगर हुआ करते थे, लेकिन अंतिम बार1996 में यहां टाइगर देखा गया था। अब माधव नेशनल पार्क एक बार फिर से बाघों से आबाद होने जा रहा है। टाइगर प्रोजेक्ट के तहत यहां कुल पांच बाघों को बसाए जाने की योजना है। पहले चरण में यहां तीन बाघों को शिफ्ट किया जाना है। इसमें पन्ना, बांधवगढ़ से एक-एक मादा टाइगर और सतपुड़ा से एक नर टाइगर को माधव नेशनल पार्क भेजा जा रहा है। पन्ना टाइगर रिज़र्व से जिस बाघिन का चयन माधव नेशनल पार्क के लिए किया गया है वह बाघिन टी-6  की बेटी है। हर बार चार शावकों को जन्म देने वाली इस बाघिन की बेटी माधव नेशनल पार्क में बाघों की वंश वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी ऐसी संभावना जताई जा रही है। यदि यह बाघिन किन्ही कारणों से पकड़ में नहीं आई तो इसी उम्र वाली दूसरी बाघिन को माधव नेशनल पार्क भेजा जा सकता है। 



पन्ना टाइगर रिज़र्व के क्षेत्र संचालक ब्रजेन्द्र झा ने बताया कि बाघिन को ढूंढने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए हाथियों की मदद ली जा रही है। फिर भी अगर बाघिन नहीं मिली तो यहां से कोई दूसरी बाघिन को भेजेंगे। चूँकि पन्ना टाइगर रिजर्व से बाघिन को नहीं पकड़ा जा सका है इसलिए सीएम शिवराज और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आज सिर्फ एक नर और एक मादा बाघ को ही पहली खेप में रिलीज कर सकेंगे। कुल मिलाकर अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि माधव नेशनल पार्क में 10 मार्च की दोपहर सीएम शिवराज दो मादा और एक नर बाघ को छोड़ेंगे या फिर एक नर और एक मादा को ही बाड़े में छोड़ेंगे। माधव नेशनल पार्क के सीसीएफ उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि पार्क के बीच बलारपुर के कक्ष क्रमांक 112 में बाघों के लिए 4 हजार हेक्टेयर का बड़ा एनक्लोजर (बाड़ा) बनाया गया है। इस एनक्लोजर को तीन हिस्सों में बांटा गया है। बाड़े की ऊंचाई करीब 16 फीट है। तीनों बाघों के लिए अलग-अलग बाड़े बनाए गए हैं। बाड़ों के अंदर बाघों के लिए 6-6   हजार लीटर पानी की क्षमता वाले सोसर बनाए गए हैं। करीब एक महीने तक इनमें पानी भरकर टेस्टिंग की गई है। इनमें पानी भरने के लिए बाहर से ही पाइप का कनेक्शन दिया गया है।

बाघों की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम

सीसीएफ शर्मा ने बताया कि बाघों की सुरक्षा के लिए माधव नेशनल पार्क में पुख्ता इंतजाम हैं। तीनों बाघों को सैटेलाइट कॉलर बीएचपी सुविधा के साथ लाया जा रहा है। नेशनल पार्क में वायरलेस सिस्टम लगाया गया है। वायरलेस के 6 फिक्स्ड स्टेशन, 11 माउंटेन वाहन और 90 हैंडसेट के जरिए निगरानी की जाएगी। बाघों के बनाए गए एनक्लोजर के इर्द-गिर्द लगभग 6 मचान भी बनाए गए हैं। जिनके जरिए बाघों की निगरानी की जाएगी। विशेष रूप से तीन वाहनों व 18 स्टाफ को टाइगर ट्रेनिंग और मॉनिटरिंग का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इमरजेंसी में एक रेस्क्यू वाहन, एक डॉग स्क्वायड, उड़नदस्ता भी तैनात किया गया है। इसके लिए कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। तीनों बाघों को 10 से 15 दिनों तक निगरानी में रखा जाएगा। इसके बाद स्थिति सामान्य रही, तो उन्हें पार्क में खुला छोड़ दिया जाएगा।  

मुगल सम्राटों और महाराजाओं का रहा है शिकारगाह

माधव नेशनल पार्क शिवपुरी शहर के पास स्थित है और ऊपरी विंध्यन पहाड़ियों का एक हिस्सा है। यह मुगल सम्राटों और महाराजाओं का प्रसिद्ध शिकारगाह था। इसे 1958 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला। पार्क के लिए दो प्रवेश बिंदु हैं; एक एन. एच-25 (पुराना झाँसी रोड) पर स्थित है, जो शिवपुरी शहर से लगभग 5 किमी दूर है, जबकि दूसरा एन. एच.-3  (आगरा-मुंबई रोड) पर शिवपुरी से ग्वालियर की ओर 7  किमी की दूरी पर है। पार्क झीलों, जंगलों और घास के मैदानों से युक्त एक विविध पारिस्थितिकी तंत्र के साथ उपहार में है। जंगल में नीलगाय, चिंकारा और चौसिंगा और हिरण जैसे चीतल, सांभर और बार्किंग हिरण जैसे मृग रहते हैं। तेंदुए, भेड़िया, सियार, लोमड़ी, जंगली कुत्ता, जंगली सुअर, साही, अजगर आदि जानवर भी पार्क में देखे जाते हैं।

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