Monday, May 31, 2021

आंवला मुरब्बा से पन्ना जिले के छोटे से गांव को मिली नई पहचान

  • यह है एक विकलांग महिला के जुनून और जज्बे की कहानी, जिसने गांव की महिलाओं को पढ़ाया स्वावलंबन का पाठ
  • दहलान चौकी गांव के मुरब्बा की दूर-दूर तक पहुंची ख्याति, महामारी के दौर में भी बिका 15 क्विंटल मुरब्बा

दहलान चौकी गांव में सड़क किनारे टेबल पर बिक्री के लिए रखे आंवला उत्पाद व भगवती यादव । 

।। अरुण सिंह ।।   

पन्ना। हीरा, मंदिर और जंगल के लिए मशहूर मध्य प्रदेश का पन्ना जिला अब यहां निर्मित होने वाले जायकेदार लजीज आंवला मुरब्बा के लिए भी जाना जाता है। छोटे से गांव दहलान चौकी की विकलांग महिला भगवती यादव ने अपने हुनर और मेहनत से गांव के साथ-साथ जिले को भी एक नई पहचान दिलाई है। इस महिला की कामयाबी से गांव की अन्य दूसरी महिलाएं भी स्वावलंबी बनने की राह पर चलने के लिए प्रेरित हुई हैं। 

जिला मुख्यालय पन्ना से महज 10 किलोमीटर दूर पन्ना-अजयगढ़ मार्ग पर सड़क के किनारे दहलान चौकी गांव स्थित है। अब यह छोटा सा गांव आंवला मुरब्बा के लिए जाना जाता है। यहां निर्मित स्वादिष्ट और जायकेदार मुरब्बा को खरीदने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। सड़क किनारे "मां दुर्गा स्व सहायता समूह का बोर्ड" लगा है, जिसकी अध्यक्ष भगवती यादव हैं। एक पैर से विकलांग होने के बावजूद काम के प्रति इनकी लगन व मेहनत देखने काबिल है।

इस समूह में 10 महिलाएं हैं, लेकिन आंवला मुरब्बा व आंवला के अन्य उत्पादों के निर्माण में गांव की अन्य महिलाएं भी लगी रहती हैं। दहलान चौकी गांव में इस समूह ने आंवला मुरब्बा बनाने का काम विगत दो दशक पूर्व शुरू किया था। समूह को मिली कामयाबी से प्रेरित होकर गांव की अन्य महिलाएं भी इस राह पर चल पड़ीं। फलस्वरुप दहलान चौकी गांव आंवला मुरब्बा के लिए जाना जाने लगा। मौजूदा समय इस गांव में 10 महिला स्व सहायता समूह हैं, जो आंवला मुरब्बा व आंवले से बनने वाले अन्य उत्पाद बनाते हैं। इन समूहों में सौ से भी अधिक महिलाएं काम करती हैं।

आंवला मुरब्बा बनाने का कार्य करती गांव की महिलाएं। 

सड़क मार्ग के किनारे टेबल पर आंवला मुरब्बा के पैक डिब्बे रखकर उनकी बिक्री करते भगवती यादव अक्सर ही नजर आ जाती हैं। यहां से गुजरने वाले यात्री अपना वाहन रोककर आंवला मुरब्बा खरीदते हैं और अपने आगे के सफर पर निकल जाते हैं। घर के पास टेबल में सजी इस छोटी दुकान से ही कई क्विंटल मुरब्बा बिक जाता है। भगवती यादव बताती हैं कि "बड़ी-बड़ी मैडमें कार से आती हैं और यहां से मुरब्बा लेकर जाती हैं"।आपने बताया कि कोरोना महामारी के इस दौर में भी आंवला मुरब्बा की मांग घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है। लॉकडाउन के बावजूद उनके घर से 15 कुंतल मुरब्बा बिका है।

भगवती यादव के काम में हाथ बंटाने वाले उनके पति दशरथ यादव बताते हैं कि इस साल आंवले की फसल कमजोर थी। जंगल के आंवले लोग जल्दी तोड़ लेते हैं, जिनका उपयोग हम मुरब्बा बनाने में नहीं करते। किसानों के निजी आंवला बगीचों से आंवला खरीदते हैं। जिनकी तुड़ाई आंवला नवमी के बाद की जाती है।दशरथ यादव ने बताया कि अच्छे आंवला फलों की उपलब्धता पर निर्भर होता है कि कितना मुरब्बा बनेगा। हमारा समूह औसतन 30-40 क्विंटल मुरब्बा हर सीजन में तैयार करता है। मुरब्बा के अलावा आंवला  अचार, आंवला कैंडी, आंवला सुपारी, आंवला चूर्ण व आंवले का रस भी हम तैयार करते हैं। समूह ने भोपाल, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद व त्रिमूल (केरल) में आंवला उत्पाद का प्रदर्शन मेलों में किया है, जहां कई पुरस्कार भी मिले हैं। दशरथ यादव ने बताया कि आंवला मुरब्बा 150 से 160 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है।

सात समुंदर पार विदेशों में पहुंचेगा पन्ना का मुरब्बा

जिले के कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा ने बताया कि शासन की यह परिकल्पना है कि औषधीय गुण वाले आंवले से बने मुरब्बे व अन्य उत्पादों को देश के साथ-साथ सात समुंदर पार विदेशों में भी विक्रय के लिए भेजा जाये। श्री मिश्र ने कहा कि जिले में 45 प्रतिशत जंगल है, यह जंगल जिले की 11 लाख 26 हजार आबादी के लिए वरदान है। आपने कहा कि पन्ना जिले के जंगलों में आंवला बहुतायत से पाया जाता है। 

एक उत्पाद एक जिला के संबंध में कलेक्टर पन्ना का ट्वीट। 

आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश बनाने के लिए एक जिला एक उत्पाद योजना प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई है। इस योजना के तहत पन्ना जिले में आंवला उत्पाद को चुना गया है। कलेक्टर पन्ना श्री मिश्र ने कहा कि आंवला उत्पाद से पन्ना की पहचान पूरे देश में स्थापित हुई है। उन्होंने कहा कि आंवला उत्पाद की इकाइयां स्थापित करने वालों को जिला प्रशासन द्वारा हर संभव सहयोग प्रदान किया जाएगा।

किसानों को आंवला लगाने किया जा रहा प्रेरित

सहायक संचालक उद्यान महेंद्र मोहन भट्ट ने बताया कि किसानों को अपने खेतों व खाली पड़ी जगह पर आंवला के पौधे लगाने को प्रेरित किया जा रहा है। आपने बताया कि जंगल के अलावा निजी भूमि पर पांच सौ हेक्टेयर क्षेत्र में आंवला के बगीचे जिले में हैं। बड़ी संख्या में किसान अब खेतों में पौधरोपण भी कर रहे हैं। श्री भट्ट के मुताबिक आंवले से बनने वाली सामग्री का उत्पादन जिले में बड़े पैमाने पर प्रारंभ करने की योजना तैयार की गई है।     आपने बताया कि पन्ना जिले को सही अर्थों में आंवला जिला बनाने की दिशा में प्रयास शुरू किए गए हैं। श्री भट्ट ने बताया कि विभाग द्वारा महिलाओं को आंवला उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण भी दिलाया जा रहा है। प्रशिक्षण लेने वाली महिलाएं अपने घर में ही आंवला उत्पाद बनाकर आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकेंगी।

वीडियो का भी अवलोकन करें -



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अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा अगरिया समुदाय

  • इसी समुदाय ने की थी लौह अयस्क की खोज
  • कभी के माने हुए बैज्ञानिक आज बेचारे असहाय           


@ बाबूलाल दाहिया

 मित्रो, बीज बचाओ कृषि बचाओ यात्रा से एक अनुभव यह भी हुआ कि मण्डला, उमरिया, शहडोल वाला यह छत्तीशगढ़ से जुड़ा भूभाग अगर अपनी मौलिक और विशिष्ट शैली की खेती के लिए प्रसिद्ध है, तो एक विशिष्टता लौह अयस्क की खोज करने वाला दुनिया का पहला बैज्ञानिक अगरिया समुदाय भी वहां निवासरत है।

 दुनिया की 4 क्रांति मशहूर हैं, जिनने मनुष्य की जीवन शैली ही बदल कर रख दी है। इन्हें क्रमश: आग की खोज, पहिए की खोज, लौह अयस्क की खोज और कम्प्यूटर की खोज नाम से पहचाना जाता है। पर आज से लगभग 28 सौ वर्ष पहले जो लौह अयक्स की खोज हुई और उससे खेती तथा उद्योग में जो क्रान्ति हुई उसे धरती में लाने वाला यह अगरिया समाज ही है। अगरिया लोग जिस देवता की पूजा करते हैं, उन्हे लोहासुर कहा जाता है। भट्ठी चालू होने के पहले इस देवता की पूजा अर्चना जरूरी है।

अगरिया समुदाय को परख थी कि किस पत्थर से मजबूत और किससे कमजोर लोहा बनता है ? यहां तक कि दिल्ली में कुतुबमीनार के पास जो कभी जंग न लगने वाला एक लौह स्तम्भ गड़ा है, वह अगरिया लोगों द्वारा बनाये गए लोह का ही है।


अगरिया लोहा बनाने के लिए मिटटी की एक धमन भट्ठी बनाते थे। फिर उसको एक पोली नली के साथ चमड़े के खलैते से जोड़ देते थे। यह खलैता खड़े खड़े पैर से चलाया जाता था। उसके पहले स्वनिर्मित धमन भट्ठी में सरई वृक्ष की सूखी लकड़ी और लोह की धाऊ भर दी जाती थी। खलैते द्वारा पहुचाई गई हवा से सरई की लकड़ी की घनीभूत हुई आग की आंच से वह पत्थर रूपी लौह की धाऊ पिघल कर लौह पिंड का रूप ले लेता था, जिसे अगरिया हथौड़े से कूट - कूट कर औजार का रूप दे देते थे।

मध्य काल में जिस तरह के युद्ध लड़े जाते थे, उनमें तलवार और भाले प्रमुख थे। युद्ध में एक-एक राजा के साथ उनके हजारों सैनिक होते थे, जिनके लिए हथियारों की पूर्ति इन्ही कारीगरों द्वारा होती थी। साथ ही खेती के औजार भी। पर अब बड़ी- बड़ी फैक्ट्रियों ने इनका काम छीन कर उन्हें सड़क पर ला खड़ा कर दिया है। आज आदिवासी समुदाय में अगर किसी को अपना अस्तित्व बनाये रखने की चिंता है तो वह अगरिया समुदाय ही है।

पर कभी के माने हुए बैज्ञानिक आज बेचारे असहाय हैं। प्रकृति का सामंजस्व तो देखिये कि जहां लौह की धाऊ थी वहीं-वहीं उसे अपने तेज आंच से गला देने वाला सरई का वृक्ष भी था।

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Sunday, May 30, 2021

अनाथ बाघ शावक पार्क प्रबंधन को सिखा रहे नित नये पाठ

  •  कठिन परीक्षा और चुनौतियों से परिपूर्ण रहेंगे आने वाले चार माह 
  •  कम उम्र के शावक खुले जंगल में पल गए तो यह होगा एक चमत्कार


अनाथ बाघ शावकों में से एक चट्टान पर आराम फरमाते हुए। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना।  कम उम्र के बाघ शावक जो अभी अपनी सुरक्षा व भोजन की व्यवस्था करने में सक्षम नहीं हैं, उनको मां के सुरक्षा घेरे के बिना खुले जंगल में खतरों और चुनौतियों के बीच रखकर पालना निश्चित ही पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन का एक साहसिक निर्णय है। बाघिन पी 213-32 की विगत 15 मई को दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से असमय मौत होने पर उसके चार नन्हें शावक अनाथ हो गए थे। लेकिन चमत्कार जंगल में भी घटित होते हैं, जिसे देख दुनिया भर के वन्य जीव प्रेमी अचंभित हैं। बाघिन की मौत होने के बाद इन अनाथ शावकों का पिता नर बाघ पी243 मां की भूमिका निभा रहा है।

 उल्लेखनीय है कि बाघ पुनर्स्थापना योजना की सफलतम कहानी के बाद पन्ना टाईगर रिजर्व में अपनी तरह का यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें मां की असमय मौत होने पर चार नन्हें शावक अनाथ हुए हैं। लेकिन सबसे हैरतअंगेज बात तो यह है कि नर बाघ इन शावकों का सहारा बन गया है। जंगल की इस अनोखी घटना को देखकर ही पार्क प्रबंधन ने साहस दिखाते हुए अनाथ शावकों को जंगल में ही रखने का समझदारी से भरा निर्णय लिया। हालांकि इस निर्णय में जोखिम भी है, लेकिन शावकों के भविष्य, उनके प्राकृतिक जीवन तथा पार्क के हितों को देखते हुए यह जोखिम उठाने जैसा था। कम उम्र के अनाथ बाघ शावकों की खुले जंगल में परवरिश पार्क प्रबंधन को हर दिन कुछ न कुछ नया सिखा रहा है। जानकारों का कहना है कि आगामी 4-5 माह कठिन परीक्षा और चुनौतियों से परिपूर्ण रहेंगे। यदि शावक इस परीक्षा में पास हो गए तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

नर बाघ पी-243 जो शावकों की कर रहा है परवरिश।  

पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा बताते हैं कि नर बाघ पी243 का व्यवहार अनाथ शावकों के प्रति अच्छा बना हुआ है। श्री शर्मा बताते हैं कि विगत 21-22 मई को बाघ पी243 ने सांभर का शिकार वहीं पर किया जहां शावक रहते हैं। बाघ द्वारा शिकार किए गए इस सांभर के मांस को शावकों ने भी खाया है। उम्मीद जगाने और उत्साह से भरने वाले यह दृश्य कैमरा ट्रैप में भी कैद हुए हैं। निगरानी करने वाले हाथियों के दल ने भी किल के पास ही नर बाघ व चारों शावकों को आराम करते देखा है, जिनकी वीडियो बनाने के साथ फोटो भी ली गई है। इससे साफ संकेत मिलता है कि बाघ पी243 न सिर्फ शावकों की देखरेख कर रहा है, अपितु अपना शिकार भी उनके साथ बांटकर खाता है।

 शावकों को रेडियो कॉलर पहनाने के संबंध में पार्क प्रबंधन की सोच को साझा करते हुए क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने बताया कि कम उम्र के इन शावकों को कॉलर करने में कुछ तकनीकी रुकावटें हैं। चूंकि सभी शावक एक साथ रहते हैं तथा बाघ पी-243 भी उनके आसपास ही विचरण करता है। इन परिस्थितियों में किसी शावक को अलग करना कठिन है। इसके अलावा चूंकि शावक अभी छोटे हैं तथा उनका विकास तेजी से हो रहा है। ऐसी स्थिति में रेडियो कॉलर करने पर दो-चार माह के भीतर गर्दन का आकार बढऩे पर रेडियो कॉलर निकालना जरूरी हो जाएगा। इन सब कठिनाइयों को देखते हुए फिलहाल शावकों को रेडियो कॉलर पहनाना स्थगित कर दिया गया है।

 पूरे मामले पर प्रबंधन ने निकाला यह निष्कर्ष 

अनाथ हुए शावकों के इस बेहद संवेदनशील मामले पर पार्क प्रबंधन द्वारा चौकस नजर रखी जा रही है। विगत 15 मई से अब तक जो भी घटनाक्रम हुआ है, उसके आधार पर क्षेत्र संचालक श्री शर्मा का कहना है कि बाघ पी243 निरंतर उसी क्षेत्र में ही विचरण करता है, जहां शावक रहते हैं। मां की मौत के बाद चारों शावक पूर्णरूपेण स्वस्थ, सक्रिय और सुरक्षित हैं। सभी शावक बाघ पी243 के सुरक्षा घेरे में हैं। शावकों के प्रति बाघ का व्यवहार ऐसा देखने को नहीं मिला जिसे गलत कहा जा सके। बाघ के साथ शावक भी सहज व निर्भय नजर आते हैं। 

क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी भी साझा की है। आपने बताया कि नर बाघ पी-243 के इलाके में एक बाघिन की मौजूदगी भी दर्ज हुई है। आपने बताया कि सेटलाइट कॉलर से मिले संकेतों के आधार पर पता चला है कि 25 मई को रात लगभग 2 बजे नर बाघ पी243 व बाघिन पी213-63 गहदरा बीट के जंगल में एक दूसरे के निकट थे।

अब भविष्य की क्या होगी रणनीति?


उत्तम कुमार शर्मा क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिज़र्व। 

 क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व श्री शर्मा का कहना है कि अभी तक सब कुछ अनुकूल रहा है। शावकों को खुले जंगल में स्वाभाविक जिंदगी जीने के लिए पार्क प्रबंधन को किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना पड़ा। लेकिन आने वाले समय में शावकों को खुले जंगल में रखना पार्क प्रबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा। जिससे निपटने की रणनीति बनाकर सजगता से कार्य करना होगा। रणनीति के अहम बिंदुओं की श्री शर्मा ने चर्चा की है -

  •  मौजूदा समय शावकों की उम्र सात-आठ माह के लगभग है। बाघों के संबंध में जो जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक बाघ शावक सामान्यत: 12-13 माह  की उम्र में शिकार करना शुरू करते हैं। इस आधार पर आगामी चार-पांच माह तक शावकों की सघन मॉनिटरिंग व सुरक्षा जरूरी है। यह भी देखना होगा कि उन्हें पर्याप्त खाना मिल रहा है या नहीं। विपरीत परिस्थितियां बनने पर जरूरी कदम उठाना होगा। 
  •  शावकों के प्रति नर बाघ का व्यवहार कैसा है, इसकी मॉनिटरिंग चार-पांच माह तक निरंतर करना जरूरी है। यदि बाघ पी243 के व्यवहार में कोई तब्दीली दिखती है, जो शावकों की सुरक्षा व जीवन के लिए खतरनाक हो तो इस स्थिति से निपटने की हमारी तैयारी होनी चाहिए। 
  •  यदि नर बाघ पी243 इस दौरान किसी बाघिन के संपर्क में आ जाता है तो यह जरूरी होगा कि बाघ और बाघिन दोनों पर नजर रखी जाए कि उनका शावकों के प्रति कैसा व्यवहार है। यदि इनका व्यवहार ठीक न दिखे और बाघिन के साथ जोड़ा बनाने के बाद बाघ शावकों को छोड़ दें तो ऐसी स्थिति में प्रबंधन को जरूरी कदम उठाने की तैयारी रखनी होगी।
  •  अंतत: यदि सब कुछ अनुकूल रहा और शावक शिकार करने में सक्षम हो गए तो भी इनकी मॉनिटरिंग करते रहनी होगी। सूत्रों के मुताबिक अनाथ शावकों में दो या फिर तीन शावक मादा हैं। यदि ये सुरक्षित रहती हैं तो आने वाले समय में प्रजनन क्षमता वाली बाघिन बनेगीं और पार्क को बाघों से आबाद रखेंगी। मालूम हो कि सिर्फ दो बाघिनों टी-1 व टी-2 ने ही पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों के उजड़े संसार को आबाद किया है। इसलिए इन अनाथ शावकों का बचना पार्क के स्वर्णिम भविष्य के लिए जरूरी है।

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Friday, May 28, 2021

पन्ना जिले के अमानगंज क्षेत्र में प्याज की हुई बंपर पैदावार

  •  अब उद्यानिकी फसलों की ओर बढ़ रहा किसानों का रुझान 
  •   सुविधाएं व मार्गदर्शन मिले तो खेती बन सकता है लाभ का धंधा 

कृषक मंगल सिंह राजावत के खेत में लगा प्याज का ढ़ेर। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। खेती में जिन किसानों को अपनी लागत निकाल पाना भी मुश्किल होता था, इस साल प्याज की बंपर पैदावार होने तथा उपज की ठीक-ठाक कीमत मिलने से वे उत्साहित हैं। आमतौर पर रुलाने वाला प्याज इस बार किसानों के घरों में खुशियां बिखेर रहा है। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में अमानगंज क्षेत्र के किसान प्याज की अच्छी पैदावार होने से खुश हैं। अमानगंज के अलावा अजयगढ़ क्षेत्र में भी कुछ किसानों ने प्याज की खेती की थी और उनके खेतों में भी अच्छी पैदावार हुई है।

 अमानगंज क्षेत्र के ग्राम सिमरी निवासी प्रगतिशील कृषक व पूर्व सैनिक मंगल सिंह राजावत बताते हैं कि कोरोना संक्रमण के चलते जब बाहर काम करने वाले मजदूर वापस गांव लौटे तो उनके पास कोई काम नहीं था। यह देख उन्होंने खेती में नवाचार कर गांव के कुछ मजदूरों को काम देकर उनकी मदद करने की सोचा। सबसे पहले उन्होंने खेतों की फेंसिंग कराई, फिर प्याज और लहसुन सहित अन्य सब्जी वाली फसलों की खेती शुरू की। इस कार्य में पूरे साल 8-10 मजदूर निरंतर लगे रहे। आपने बताया कि उन्होंने तकरीबन ढाई - तीन एकड़ में प्याज लगवाई थी, जिसमें सवा सौ कुंतल के लगभग उत्पादन हुआ है।

 

खेत में जगह - जगह रोपे गए फलदार पौधों का द्रश्य। 

मंगल सिंह ने बताया कि खेती के साथ-साथ उन्होंने इस दौरान विभिन्न प्रजाति के लगभग 300 फलदार पौधों का भी रोपण कराया है। जिनमें अधिकांश पौधे न सिर्फ जीवित हैं अपितु उनकी अच्छी ग्रोथ भी हो रही है। मौजूदा दौर में जब हर तरफ ऑक्सीजन के लिए मारामारी मची हुई है तथा पर्यावरण संरक्षण की बातें हो रही हैं, उस समय इतने पौधों का रोपण कराकर और उनकी देखभाल करके मन में सुकून और शांति की अनुभूति होती है। आने वाले 3-4 वर्षों में बड़े होकर यह पौधे जब पेड़ बनेंगे, तो रसीले और मीठे फल देने के साथ-साथ पर्यावरण को बेहतर बनाने में भी अहम भूमिका निभाएंगे।

इटौरी के कृषक ने किया 15 सौ क्विंटल प्याज का उत्पादन 

सहायक संचालक उद्यान महेंद्र मोहन भट्ट ने जानकारी देते हुए बताया कि अमानगंज क्षेत्र के ही ग्राम इटोरी के कृषक राजेश कुशवाहा ने 6 एकड़ जमीन में 1500 कुंटल प्याज की बंपर पैदावार ली है। श्री भट्ट ने बताया कि अपनी उपज बेचने के लिए किसानों को भटकना भी नहीं पड़ रहा। व्यापारी गांव में जाकर सौदा कर रहे हैं। मौजूदा समय किसानों की प्याज खेत से ही 14-15 रुपये किलो के भाव से बिक रही है। इस भाव पर प्याज बिकने से किसान संतुष्ट हैं, क्योंकि उन्हें घाटा नहीं हो रहा। यह अलग बात है कि 14-15 रुपये प्रति किलो खरीदी गई यही प्याज कुछ महीने बाद लोगों को 40 से 50 रुपये प्रति किलो के भाव में मिलेगी। जाहिर है इसका लाभ किसानों के बजाय व्यापारियों को होगा। श्री भट्ट ने बताया कि उन्होंने प्याज उत्पादक किसानों को सलाह दिया है कि अपनी उपज की अच्छी कीमत पाने के लिए वह भंडार गृह में प्याज का भंडारण करायें। आप ने बताया कि भंडारग्रह के निर्माण हेतु विभाग द्वारा किसानों को अनुदान भी दिया जाता है।

 लाभ होने से सब्जी फलों की तरफ बढ़ा रुझान

 साल दर साल खेती में घाटा उठाने तथा कर्ज के बोझ से दबने वाले किसानों का रुझान अब उद्यानिकी फसलों की तरफ बढ़ा है। जो किसान गेहूं, चना, मसूर आदि फसलें उगाते थे, वे अब खेत के कुछ हिस्से में सब्जी वाली फसलें भी उगाने लगे हैं। इतना ही नहीं ज्यादातर किसान अपने खेतों में फलदार पौधों का भी रोपण कर रहे हैं, ताकि उनसे अतिरिक्त आय अर्जित की जा सके। ग्राम सिमरी निवासी मंगल सिंह राजावत  की पहल को देख इलाके के अन्य किसान भी प्रेरित हुए हैं। किसान अब अनाज के साथ-साथ फल व सब्जी भी उगा रहे हैं। इस तरह से किसान अब सिर्फ अन्नदाता ही नहीं अपितु वह प्रकृति और पर्यावरण को समृद्ध करने में भी अहम भूमिका निभा रहा है।

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पाँच माह बाद नवम्बर में मध्यप्रदेश आयेंगे अफ़्रीकी चीता

  • मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में इन्हे बसाने की हो रही तैयारी
  • राज्य वन्य-प्राणी बोर्ड की बैठक में वन मंत्री डॉ. शाह ने दी जानकारी 
  • मुख्यमंत्री ने कहा वन्य-प्राणी अपराधियों को शीघ्र मिलनी चाहिए सजा 


सात दशक पूर्व भारत के जंगलों से विलुप्त हो चुका धरती पर सबसे तेज दौडऩे वाला वन्य प्राणी चीता के फिर यहाँ बसने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है। मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में इन्हे बसाने की तैयारी को अंतिम रूप दिया जा रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में गुरुवार को आयोजित मध्य प्रदेश राज्य वन्य-प्राणी बोर्ड की बैठक में वन मंत्री डॉ. विजय शाह ने यह जानकारी दी। वन मंत्री ने बताया कि प्रदेश में नवम्बर माह में अफ्रीका से चीता आएगा। राज्य वन्य-प्राणी बोर्ड की बैठक में आपने बताया कि चम्बल अभयारण्य में घड़ियालों की संख्या बढ़कर 2176 तथा डाल्फिन की संख्या 82 हो गई है। गिद्धों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व एवं भेड़ाघाट को विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया है। वन मंत्री डॉ. विजय शाह ने कहा कि बाघों की गणना वर्ष 2022 में प्रारंभ होगी।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रदेश में वन क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए दी जाने वाली अनुमतियों में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाए कि विकास कार्यों से प्रदेश के वनों एवं वन्य-प्राणियों को कोई नुकसान न हो। वन्य-प्राणियों के विरूद्ध अपराध करने वालों के विरूद्ध न केवल तुरंत कार्रवाई हो, बल्कि उन्हें सजा मिलना भी सुनिश्चित किया जाए। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि जंगली जानवरों से जनता को कोई हानि न हो, इसके लिए भी पूरे प्रयास किए जाएँ। मुख्यमंत्री श्री चौहान मंत्रालय में मध्य प्रदेश राज्य वन्य-प्राणी बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। बैठक में वन मंत्री कुंवर डॉ. विजय शाह, मुख्य सचिव  इकबाल सिंह बैंस, प्रमुख सचिव वन अशोक वर्णवाल आदि उपस्थित थे।

बैठक में रातापानी अभयारण्य में राष्ट्रीय राजमार्ग-69 के 4 लेन चौड़ीकरण कार्य को स्वीकृति प्रदान की गई।  रातापानी अभयारण्य में दमोह-पटेरा जल समूह प्रदाय योजना, ओरछा अभयारण्य में निमाड़ी-पृथ्वीपुर जल समूह प्रदाय योजना तथा वीरांगना दुर्गावती अभयारण्य में जबेरा-तेन्दूखेड़ा समूह जल प्रदाय योजनाओं में भूमिगत पाइप लाइन डालने की अनुमति दी गई। विभिन्न क्षेत्रों में ऑप्टिकल फाइबर बिछाने की अनुमति भी दी गई। बैठक में संजय टाइगर रिजर्व में कटनी-सिंगरौली रेल लाइन दोहरीकरण एवं विद्युतीकरण कार्य को शर्तों के साथ अनुमति प्रदान की गई। इसे भारत सरकार को शर्तों के साथ भेजा जाएगा। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि सिंगरौली दूरस्थ क्षेत्र है। यहाँ रेल लाइन दोहरीकरण होना चाहिए।

सोनचिरैया पक्षी विलुप्ति की कगार पर

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा सोनचिरैया पक्षी के संबंध में घाटीगाँव अभयारण्य का सर्वे करवाया जाए। करेरा अभयारण्य में वर्ष 1994 से सोनचिरैया नहीं दिखने पर भारत सरकार द्वारा इसे डीनोटिफाई कर दिया गया है। मध्यप्रदेश में सोनचिरैया (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) पक्षी विलुप्ति की कगार पर है। उन्होंने कहा कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र में जंगली हाथियों द्वारा ग्रामीणों को नुकसान न हो, ऐसे प्रयास किए जाएँ। इसके लिए विशेषज्ञों का समूह बनाया जाए, जो देश-दुनिया के बचाव के उपायों का अध्ययन कर रिपोर्ट दे।

वन मंत्री कुंवर डॉ. विजय शाह ने बताया कि मध्यप्रदेश में वन्य-प्राणियों के उपचार की आधुनिकतम सुविधाएँ हैं। जबलपुर में सर्वसुविधायुक्त अस्पताल है। अब आधुनिकतम ऑपरेशन टेबिल और वेंटिलेटर भी आ गए हैं। अभी दो इन्क्यूबेटर स्वीकृत किए गए हैं। शीघ्र ही जबलपुर में अंतराष्ट्रीय वन्य-प्राणी संरक्षण कान्फ्रेंस भी आयोजित की जाएगी।

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Wednesday, May 26, 2021

बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष : बुद्ध का मनोविज्ञान परम जीवन का मनोविज्ञान है


प्रश्न: बुद्ध की मनोचिकित्सा और आज की पश्चिमी मनोचिकित्सा में क्या भेद है? आज का मनोविज्ञान क्या कभी धर्म की खोज में पहुंच पाएगा?

बड़ा भेद है। और बुनियादी भेद है। पश्चिम का मनोविज्ञान--कहें आज का मनोविज्ञान, क्योंकि पश्चिम का जो है वह आज का है, इस सदी का है, आधुनिक है--आधुनिक मनोविज्ञान मन की दृष्टि से जो रुग्ण लोग हैं उनकी चिकित्सा करता है। जो सामान्य नहीं हैं, अस्वस्थ हैं, उनकी चिकित्सा करता है। बुद्ध का मनोविज्ञान उनकी चिकित्सा करता है जो सामान्य हैं और स्वस्थ हैं।

कोई आदमी पागल हो गया, उसकी चिकित्सा करता है आधुनिक मनोविज्ञान। कोई आदमी जब तक पागल न हो जाए तब तक आधुनिक मनोविज्ञान से उसका कोई लेना-देना नहीं है। वह बीमार को ठीक करने का उपाय है। लेकिन बुद्ध के पास वे लोग जाते हैं जो पागल नहीं हैं, वरन अगर हम ठीक से समझें तो होश में भर गए हैं और अब पागल नहीं रहना चाहते, पागल नहीं होना चाहते। सामान्य हैं, स्वस्थ हैं। साधारण लोग भी उनकी दृष्टि से ज्यादा पागल हैं। जिनको जीवन का होश आ गया है, जिन्होंने जीवन की समझ पा ली है, अब वे बुद्ध से कहते हैं, अकेले स्वस्थ होने से क्या होगा, सत्य भी चाहिए। स्वस्थ होना काफी नहीं है। सत्य के बिना स्वास्थ्य का भी क्या करेंगे? तो स्वस्थ को और परम स्वास्थ्य की तरफ ले जाने की व्यवस्था है।

अगर तुम डांवाडोल हो गए हो सामान्य जीवन में, ठीक से दुकान नहीं कर पाते, ठीक से दफ्तर नहीं जा पाते, स्मृति कमजोर हो जाती है, चूक जाते हो, इस तरह की बातें अगर तुम्हारे जीवन में हैं, तो आधुनिक मनोविज्ञान सहयोगी है। लेकिन सब ठीक चल रहा है, कोई गड़बड़ नहीं है; और जब सब ठीक चलता है और कोई गड़बड़ नहीं मालूम होती, तभी अचानक तुम्हें पता चलता है, ये सब ठीक भी चलता रहा तो मौत में समाप्त हो जाएगा। ये सब ठीक भी चलता रहा तो जाऊंगा कहां, पहुंचूंगा कहां? ये सब ठीक भी है तो भी मौत आ रही है। ये सब ठीक भी है तो भी मैं मरा जा रहा हूं, मिटा जा रहा हूं। ये सब ठीक भी है, तो भी व्यर्थ और असार है।

जिस दिन तुम्हें सब ठीक होते हुए भी असार का बोध होता है, उस दिन तुम बुद्धपुरुषों के पास जाते हो पूछने, कि ऐसे सब ठीक है--धन है, पत्नी है, बच्चा है, मकान है, सब ठीक है--कहीं कोई अड़चन नहीं है, सुविधा से जी रहा हूं, और सुविधा से ही मर भी जाऊंगा, लेकिन क्या सुविधा से जीना और सुविधा से मर जाना ही मंजिले-मकसूद है? क्या यही लक्ष्य है जीवन का? इतना काफी है क्या कि सुविधा से जी लूं और सुविधा से मर जाऊं? सुविधा काफी है? तब बुद्ध के मनोविज्ञान की शुरुआत होती है। जिसको यह दिखायी पड़ने लगा--सुविधा सार नहीं है, सामान्य हो जाना कुछ भी मूल्य नहीं रखता, स्वस्थ हो जाने में भी कुछ नहीं है जब तक सत्य न मिल जाए।

जीसस के जीवन में उल्लेख है कि वे एक गांव में आए और उन्होंने एक आदमी को शराब पीए रास्ते के किनारे नाली में पड़े गालियां बकते देखा। तो वे उसके पास आए, करुणा से उसे हिलाया और उठाया, और कहा कि तू अपना जीवन शराब पी-पीकर क्यों बर्बाद कर रहा है? नाली में पड़ा है। उस आदमी ने आंखें खोलीं, जीसस को देखकर उसे होश आया। और उसने कहा कि मेरे प्रभु! मैं तो रुग्ण था, खाट भी नहीं छोड़ सकता था, तुम्हीं ने छूकर मुझे ठीक किया था। अब मैं ठीक हो गया, अब इस स्वास्थ्य का क्या करूं? मुझे तो बस शराब पीने के सिवाय कुछ सूझता नहीं। मैंने तो कभी पी भी न थी। मैं तो खाट पर पड़ा था, इस शराबघर तक भी नहीं आ सकता था। तुम्हारी ही कृपा से!

जीसस सोचने लगे कि मेरी कृपा का यह परिणाम हुआ है। वे उदास आगे बढ़े। उन्होंने एक आदमी को एक वेश्या के पीछे भागते देखा। उसे पकड़ा और कहा कि आंखें इसलिए नहीं परमात्मा ने दी हैं। यह क्यों वासना के पीछे भागा जा रहा है? किस पागलपन में दौड़ रहा है? उस आदमी ने गौर से रुककर देखा, उसने कहा, मेरे प्रभु--वह पैर पर गिर पड़ा--मैं तो अंधा था, तुमने ही छूकर मेरी आंखें ठीक की थीं। अब इन आंखों का मैं क्या करूं? मैं तो किसी वेश्या के पीछे न भागा था। मुझे तो रूप का पता ही न था, मैं तो जन्मांध था। तुम्हारी ही कृपा है कि तुमने आंखें दीं। अब इन आंखों का क्या करूं?

जीसस बहुत उदास हो गए। और वे गांव के बाहर निकल आए। और बड़े चिंतन में पड़ गए कि मेरी कृपा के ये परिणाम!

उन्होंने एक आदमी को फांसी लगाते देखा अपने को। रस्सी बांध रहा था वृक्ष से। वह भागे गए और कहा कि मेरे भाई, रुक! यह तू क्या कर रहा है? उसने कहा, अब मत रोको, बहुत हो गया। मैं मर गया था, तुम्हीं ने मुझे जिंदा किया था। अब जिंदगी का क्या करूं? यह तुम्हारी ही कृपा का कष्ट मैं भोग रहा हूं। अब बहुत हो गया, अब मत रोकना और मर जाऊं तो मुझे जिलाना मत। तुम कहां से आ गए और! मैं किसी तरह तो इंतजाम करके अपने मरने की व्यवस्था कर रहा हूं। पहले भी मर चुका था।

जिसको तुम स्वास्थ्य कहते हो उसका परिणाम क्या है? गंवाओगे उसे कहीं जिंदगी के रास्ते पर। किसी नाली में पड़ोगे। जिसे तुम आंखों की ज्योति कहते हो, उसका करोगे क्या? कहीं रूप में भरमाओगे। और जिसे तुम जीवन कहते हो, उसका भी क्या उपयोग है सिवाय आत्महत्या के? कोई धीरे-धीरे करता है, कोई जल्दी करता है। कोई एक ही छलांग में कर लेता है, कोई आत्महत्या करने में सत्तर साल लगाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे कुछ यह पता नहीं चलता कि तुममें और उस आत्महत्या करने वाले आदमी में कोई फर्क है। वह जरा हिम्मतवर रहा होगा, एक झटके में करना चाहता था; तुम कमजोर हो, धीरे-धीरे करते हो। रोज-रोज मरते हो। तुम कर क्या रहे हो यहां पृथ्वी पर, सिवाय मरने के?

बुद्ध का मनोविज्ञान वहां से शुरू होता है जहां तुम्हारे पास सब है, और प्रतीति होती है कि कुछ भी नहीं है। आज का मनोविज्ञान दीन और रुग्ण के लिए है। बुद्ध का मनोविज्ञान सम्राट और समर्थ के लिए है। जिसके पास सब है और अनुभव में आया, कुछ भी नहीं है, हाथ खाली हैं। ऐसे हाथ भरे हैं हीरे-जवाहरातों से, मगर हीरे-जवाहरात व्यर्थ हैं। जिसको भरी जिंदगी के बीच जिंदगी उजाड़ मालूम पड़ी, संपत्ति के बीच विपत्ति दिखायी पड़ी, स्वास्थ्य के बीच सिवाय रोगों के घर के और कुछ भी न मालूम पड़ा, और जिंदगी केवल मौत की तरफ यात्रा मालूम पड़ी, वह बुद्ध के पास जाता है।

बुद्ध का मनोविज्ञान परम जीवन का मनोविज्ञान है। उस जीवन का जिसका फिर कोई अंत नहीं। शाश्वत का, सनातन का। एस धम्मो सनंतनो। वे उस धर्म और नियम की बात करते हैं जिससे सनातन उपलब्ध हो जाए, शाश्वत उपलब्ध हो जाए।

पश्चिम का मनोविज्ञान धीरे-धीरे बुद्ध के मनोविज्ञान के करीब सरक रहा है। सरकना ही पड़ेगा। देखो, पश्चिम के चिकित्साशास्त्र का नाम है, मेडिकल साइंस। उसका मतलब होता है, औषधि-विज्ञान। पूरब में हमने जो औषधि-विज्ञान बनाया, उसको नाम दिया है, आयुर्वेद। औषधि का नाम नहीं दिया, आयु का विज्ञान। और विज्ञान भी नहीं, वेद! विधायक। औषधि तो नकारात्मक है। बीमारी हो तो औषधि का उपयोग है। बीमारी न भी हो तो भी आयुर्वेद का उपयोग है। क्योंकि वह केवल जीवन का विज्ञान है। वह सिर्फ बीमारी की फिकर नहीं करता कि बीमारी हो तो औषधि देकर मिटा दो। बीमारी न भी हो, तो जीवन को कैसे गुणनफल करो, जीवन को कैसे बढ़ाओ!

ओशो: एस धम्मो सनंतानो #6

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Tuesday, May 25, 2021

मध्यप्रदेश की धरती में फिर सुनाई देगी चीते की दहाड़

  •  कूनो राष्ट्रीय उद्यान में नजर आयेगा जंगल का यह राजकुमार 
  •  दक्षिण अफ्रीका से 10 चीतों को भारत लाने का रास्ता हुआ साफ 
  •  वर्ष 1952 में भारत से विलुप्त हो गया था यह सबसे तेज धावक 

धरती का सबसे तेज धावक चीता।    (फोटो इंटरनेट से साभार) 

।। अरुण सिंह ।।  

धरती पर सबसे तेज दौडऩे वाले स्तनधारी चीतों की दहाड़ अब मध्यप्रदेश की धरती में फिर से सुनाई देगी। वर्ष 1952 में चीते को भारत में विलुप्त घोषित कर दिया गया था। विलुप्त प्रजाति के इस बेहद खूबसूरत वन्य प्राणी को फिर से हिंदुस्तान में बसाने की तैयारी चल रही है। इसके लिए मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान को चुना गया है। यहां पर दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाया जाना है। जंगल के इन राजकुमारों का नया ठिकाना मध्यप्रदेश का कूनो राष्ट्रीय उद्यान होगा। इस तरह से तक़रीबन 74 साल बाद देश में विलुप्त हुए चीते की दहाड़ फिर से सुनाई देगी।  

उल्लेखनीय है कि देश में अंतिम धब्बेदार चीता वर्ष 1947 में अविभाजित मध्य प्रदेश के कोरिया इलाके में देखा गया था, जो अब छत्तीसगढ़ में आता है। बाद में वर्ष 1952 में इस वन्य प्राणी को देश में विलुप्त घोषित कर दिया गया था। मध्यप्रदेश के वन मंत्री विजय शाह ने बीते रोज इस आशय की जानकारी देते हुए बताया कि कूनो नेशनल पार्क में इन अफ्रीकी जानवरों को बसाया जायेगा। शाह ने बताया कि दक्षिण अफ्रीका से 10 चीतों को मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में लाया जाएगा। इनमें पांच नर एवं पांच मादा होंगी। हमने इनके लिए कूनो राष्ट्रीय उद्यान में बाड़ा बनाने का काम इस महीने से शुरू कर दिया है जो अगस्त में बनकर तैयार हो जाएगा।

प्रदेश के चंबल संभाग में आने वाला कूनो राष्ट्रीय उद्यान करीब 750 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। यह वन क्षेत्र चीते को फिर से बसाने के लिए देश के सबसे बेहतर पर्यावास में से एक है। इसमें चीतों के लिए अच्छा शिकार भी मौजूद है, क्योंकि यहां पर चौसिंगा हिरण, चिंकारा, नीलगाय, सांभर एवं चीतल बड़ी तादाद में पाए जाते हैं। वन मंत्री श्री शाह ने बताया कि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हमें चीतों को फिर से बसाने के लिए इस सप्ताह एक संभावित कार्यक्रम भेजा है। इसके अनुसार इस साल मई से अगस्त के बीच मध्य प्रदेश वन विभाग को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में इनके लिए बाड़ा तैयार करना है। इनको बसाने के लिए इस वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए 14 करोड़ रुपये का अनुमानित बजट मिलेगा। 

अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) जे.एस. चौहान ने बताया कि चीते को फिर से बसाने के लिए देश के सबसे बेहतर पर्यावास का पता लगाने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के विशेषज्ञों के एक दल ने पिछले साल मध्य प्रदेश के चार स्थानों का दौरा किया था। इनमें श्योपुर जिले के कूनो राष्ट्रीय उद्यान के अलावा सागर जिले स्थित नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य और नीमच एवं मंदसौर जिले की उत्तरी सीमा पर स्थित गांधी सागर अभयारण्य और शिवपुरी जिले के माधव राष्ट्रीय उद्यान शामिल थे। श्री चौहान ने कहा कि मध्य प्रदेश में पहले भी चीते रहते थे। राज्य में लंबे समय तक इनके संरक्षण का इतिहास रहा है। हमारे पास इनको बसाने के लिए बेहतर जगह है। उन्होंने कहा कि हम मध्य प्रदेश के पन्ना बाघ अभयारण्य में वर्ष 2009 में बाघों को फिर से बसाने में सफल हुए हैं। 

... वो आने वाला है: कबीर संजय 

प्रकृति, पर्यावरण और वन्य जीवों पर निरंतर लिखने वाले पर्यावरणविद व लेखक कबीर संजय ने एक बहुत ही उम्दा किताब "चीता: भारतीय जंगलों का गुम शहजादा" लिखी है। यह किताब पठनीय तो है ही संग्रहणीय भी है। जंगल के गुम हो चुके इस शहजादे को भारत में फिर से बसाने की अभिनव पहल का किताब के लेखक कबीर संजय ने स्वागत किया है। अपनी फेसबुक वॉल में कबीर संजय ने लिखा है -


उसके रास्ते की सारी बाधाएं दूर हो गई हैं। वो आने वाला है। बस इंतजार अब कुछ महीनों का है। पूरी उम्मीद है कि सितंबर महीने तक अफ्रीका से भारत में आठ चीते आएंगे। इन्हें मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बसाया जाएगा। दस-बारह सालों की लंबी प्रक्रिया के बाद अब ये वक्त करीब आ गया है। 

दुनिया में सबसे तेज दौड़ चीते की है। फर्राटा भरने में उसके जैसा कोई उस्ताद नहीं। एक जमाना था जब भारत भूमि पर चीते बड़ी संख्या में वास करते थे। उन्हें पालतू बनाने और उनके जरिए शिकार का शगल राजाओं और नवाबों को था। अंग्रेजों को उनका शिकार करने का शगल था। इसके चलते लगभग सत्तर साल पहले वे विलुप्त हो गए। एशियाई चीतों की पूरी प्रजाति ही अपने अंतिम दौर में है। गिनती के एशियाई चीते ईरान में बचे हैं। 

अब अफ्रीकी चीते को भारत में बसाने की तैयारी है। इंडेजर्ड वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट की एक टीम ने हाल ही में कूनो नेशनल पार्क का दौरा किया। उसने यहां के पर्यावास को चीते के लिए उपयुक्त पाया है। कुछ छोटे-मोटे सुधार करने को भी कहा है। इसके साथ ही चीतों के यहां आने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। पहली बार में आठ नर और तीन मादा चीते लाए जाने की संभावना है। 

पूरी दुनिया की निगाह इस ट्रांसलोकेशन पर होगी। भारत में भी यह पहली बार होगा जब किसी बड़ी बिल्ली को किसी अन्य देश से लाकर यहां पर बसाया जा रहा हो। हालांकि, कुछ छोटे-मोटे प्रयास हुए हैं। पूरी दुनिया इससे सबक लेगी और अगर चीतों के इस ट्रांसलोकेशन को सफलता मिलती है तो उनकी प्रजाति के बचे रहने का रास्ता कुछ हद तक साफ होगा। 

चीते कैसे भारतीय जन-जीवन में समाए हुए थे, कैसे वे विलुप्त हो गए, बिडालों के परिवार में और कौन-कौन सदस्य हैं, किन-किन पर और खतरा है, इस सबके बारे में जानने के लिए आप मेरी किताब चीता: भारतीय जंगलों का गुम शहजादा पढ़ सकते हैं। 

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"यास" चक्रवात के बीच आज से नौतपा शुरू

  • आने वाले दिनों में कई जगहों पर हो सकती है बारिश
  • बंगाल की खाड़ी में आए यास चक्रवात का होगा असर 

नौतपा की सांकेतिक फोटो इंटरनेट से साभार। 

"यास" चक्रवात के बीच आज से नौतपा शुरू हो रहा है। नौतपा के दौरान सामान्यतौर पर पूरे 9 दिनों तक तेज गर्मी पड़ती है। चूँकि सूर्य की किरणें नौतपा के दिनों में सीधी धरती पर पड़ती हैं, इसलिए ऐसा होता है। इस दौरान वृषभ राशि में चार ग्रहों की युति होने से गर्मी का असर ज्यादा होता है और तेज गर्म हवाएं चलती हैं। लेकिन इस वर्ष चूँकि नौतपा "यास" चक्रवात के बीच आया है, इसलिए नौतपा के तपने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मौसम विभाग के मुताबिक बंगाल की खाड़ी में आए "यास" चक्रवात की वजह से कई राज्यों में आने वाले दिनों में बारिश हो सकती है।

वैज्ञान‍िक दृष्टिकोण के अनुसार नौतपा के समय सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी पड़ती हैं। इसके चलते पृथ्वी पर तापमान बढ़ जाता है। नौतपा के दौरान अधिक गर्मी के चलते मैदानी क्षेत्रों में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है और समुद्र की लहरें आकर्षित होती हैं और इससे अच्‍छी बार‍िश होती है। इसी वजह से ऐसा माना जाता है कि जब नौतपा में अच्छी गर्मी नहीं पड़ती या नौतपा के दौरान बारिश हो जाती है तो उस साल अच्छी बारिश होने के आसार कम रहते हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने के कार्य में पूरी तरह समर्पित पद्मश्री बाबूलाल जी दाहिया नौतपा का बखान अपने अंदाज में करते हैं। उनका कहना है कि वैसे यह रोहणी नृक्षत्र है जिस के नौ दिन के समय को नौतपा कहा जाता है। इन नौ दिनो में सूर्य हमारे सिर के ठीक ऊपर होकर गुजरता है , इसलिए सबसे तेज गर्मी पड़ती है। आज हमारे पास गर्मी मापक यंत्र हैं, जिसके जरिये मालुम पड़ गया कि हमारे यहां 44 डिग्री सेल्सियस तापक्रम है। किंतु हमारे पुरखे अपने अनुभव जनित ज्ञान से ही ज्ञात कर लिए थे कि यह 9 दिन सर्बाधिक तपने वाले दिन हैं। आज हम कूलर, पंखे के बीच रह कर भी उमस महसूस करते हैं। किन्तु हमारे पुरखे इस तपन को झेल सुख की अनुभूति करते थे।

पहले अगर नौतपा 9 दिन खूब तपता तो किसान खुश होते कि इस वर्ष अच्छी बारिश होगी। पर अगर किसी साल प्री मानसून के बादल आकर एकाध दिन बूंदाबादी कर इसका मौसम बिगाड़ देते तो किसान निराश हो जाते कि,, इस वर्ष अच्छी बारिश न होगी ? क्योकि उनकी पूरी खेती वर्षा आधारित ही होती थी। नवतपा के बाद में तो प्राय: यूं ही मृगसिरा नृक्षत्र में हर साल  प्री मानसून बारिस होती है । पर नौतपा नौ दिन तपे तभी किसान खुश होते थे।हमारे यहां एक और कहावत कही जाती है कि 'आधा जेठ अषाढ़ कहावै' इसलिए यह नृक्षत्र यू ही किसानों के लिए खेती की तैयारी का होता था जिसमें घर के छान्ही छप्पर, खेतो में गोबर की खाद डालना , नये बैलों को हल में चलाने के लिए दमना, बंधी - बाधो के नाट मोघे बाधना आदि बहुत सारे काम होते थे।

 उधर कुम्हार समुदाय के लोग इसी पखबाड़े में घर के खपरे पाथ कर पकाते अस्तु प्रकृति से जुड़े तमाम लोगो को यह जान ही न पड़ता कि कब जेठ का यह महीना आया और बीत गया ? पर अब तो किसानों को न तो जेठ से मतलब न अषाढ़ और न ही मृगशिरा य नौतपा से। पानी नही गिरा तो ट्यूबबेल  से निकाल लेंगे और घूर कताहुर की भी फिक्र नही, लाकर रसायनिक खाद डाल देंगे । बैल की तो जैसे अब जरूरत ही नही रही ? क्योकि एक ट्रैक्टर आया तो यू ही 20 बैल बूचड़ खाने भेज देता है। उसी का परिणाम है घर - घर बीमारी , पानी का संकट कुंये, तालाब, बाबड़ी, नदी सब जल हींन। कुम्हारों का खपरा उद्दोग खत्म ,पर्यावरण का विनाश, पर आदमी जानते हुए यह विनाश  रूपी विकास अपनाये जा रहा है।

 मौसम विभाग का क्या है अनुमान ?

  • मध्य और उत्तर-पश्चिमी भारत में अगले 3 दिनों में अधिकतम तापमान 2 से 4 डिग्री बढ़ सकता है।
  • पूर्वी भारत के कई हिस्सों में अगले 3 दिनों में अधिकतम तापमान में 3 से 6 डिग्री गिर सकता है। उसके बाद 4 से 6 डिग्री बढ़ेगा।
  • अगले दो दिनों में गुजरात में अधिकतम तापमान में 2 से 3 डिग्री की बढ़ोतरी होगी। उसके बाद इतनी ही डिग्री की गिरावट होने की भी संभावना है।
  • महाराष्ट्र में भी अगले 3-4 दिनों में अधिकतम तापमान 2 से 4 डिग्री तक बढ़ सकता है।
  • देश के बाकी इलाकों में तापमान में कोई खास उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिलेगा।
  • 29 से 31 मई के बीच उत्तर-पूर्वी भारत के इलाकों में तेज आंधी-तूफान के साथ बारिश हो सकती है।
  • 29 से 31 मई के बीच ही पूर्वी भारत समेत पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत की कुछ जगहों पर हल्की बारिश हो सकती है।

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Monday, May 24, 2021

रणथम्बौर नेशनल पार्क में भी हुआ था पन्ना जैसा चमत्कार

  •  नर बाघ टी-25 ने की थी दो अनाथ मादा शावकों की परवरिश 
  •  दोनों बाघिन अब सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान में कर रही हैं राज

अनाथ बाघ शावक जिनकी परवरिश बाघिन पी-213 (32) की मौत के बाद नर बाघ पी-243 कर रहा है। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिज़र्व में चार अनाथ शावकों की परवरिश नर बाघ ( शावकों का जैविक पिता ) द्वारा किये जाने की खबर इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है। किसी नर बाघ के ऐसे अविश्वसनीय व्यवहार की दुर्लभ वीडियो पार्क प्रबंधन ने गत दिवस जब जारी की तो वन्य जीव प्रेमियों ने प्रशन्नता का इजहार करते हुए इसका खूब स्वागत किया है। लेकिन यह बात कम लोगों को ही पता होगी कि ठीक पन्ना टाइगर रिज़र्व जैसा ही चमत्कार राजस्थान के रणथम्बौर नेशनल पार्क में विगत एक दशक पूर्व घटित हुआ था। वहां के नर बाघ टी-25 ने दो अनाथ मादा शावकों की परवरिश विल्कुल मां की तरह की थी। नर बाघ की देखरेख और परवरिश से वयस्क हुई दोनों बाघिन अब सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान में राज कर रही हैं।  

उल्लेखनीय है कि पन्ना टाइगर रिज़र्व में गत 15 मई को बाघिन पी-213 (32) की अज्ञात कारणों के चलते असमय मौत हो गई थी। बाघिन की इस तरह अचानक मौत होने पर उसके चार नन्हे शावक अनाथ हो गए। इन शावकों की सुरक्षा व परवरिश को लेकर पार्क प्रबंधन से लेकर वन्य जीव प्रेमी सभी चिंतित थे। इसी बीच निगरानी के दौरान वन अमले ने शावकों के जैविक पिता नर बाघ पी-243 को शावकों के निकट देखा। नर बाघ का व्यवहार शावकों के प्रति बेहद सदभावना पूर्ण था। यह द्रश्य देख पार्क के अधिकारी हैरान हुए तथा नर बाघ के ऐसे रुख को देख एक उम्मीद भी जागी। बाघ पर सतत नजर रखने के लिए बिना देर किये उसको रेडियो कॉलर पहना दिया गया ताकि उसकी चौबीसो घण्टे निगरानी व शावकों के प्रति उसके बर्ताव पर नजर रखी जा सके।

 इस बीच गत 22 मई को जो वीडियो सामने आया उससे यह सुनिश्चित हो गया कि नर बाघ पी-243 शावकों की समुचित देखरेख कर रहा है। यह अनोखा और दुर्लभ द्रश्य खूब पसंद किया गया। ऐसा माना जा रहा था कि शायद अपनी तरह की यह पहली घटना है जब कोई नर बाघ किसी बाघिन की मौत होने पर उसके अनाथ हो चुके शावकों की परवरिश कर रहा है। लेकिन जंगल और जंगली जीवों की दुनिया बहुत ही निराली व रहस्यपूर्ण है, जिसके बारे में हमारी समझ और ज्ञान आज भी बहुत कम या कहें न के बराबर है। वन्य प्राणी किन परिस्थितियों में कैसा व्यवहार करेंगे इसकी सटीक भविष्यवांणी नहीं की जा सकती।  

राजस्थान के मुख्यमंत्री द्वारा गत वर्ष किये गए ट्वीट का स्क्रीन शॉट। 

जहाँ तक पन्ना के नर बाघ पी-243 का शावकों के प्रति अच्छे व्यवहार व उनकी परवरिश किये जाने की बात है तो ठीक इसी तरह का एक अन्य उदाहरण राजस्थान के रणथम्भौर नेशनल पार्क में भी देखा गया था। पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना के मुख्य सूत्रधार पूर्व क्षेत्र संचालक आर. श्रीनिवास मूर्ति ने पन्ना टाइगर रिज़र्व में नर बाघ पी-243 द्वारा अनाथ शावकों के प्रति जिस तरह का बर्ताव किया जा रहा है, उस पर प्रशन्नता जाहिर की है। आपने बताया कि ठीक ऐसा ही व्यवहार विगत एक दशक पूर्व राजस्थान के रणथम्बौर नेशनल पार्क में भी देखा गया था। 

इस बात की पुष्टि राज्य वन्य प्राणी बोर्ड के पूर्व सदस्य हनुमंत सिंह व बाघ विशेषज्ञ और वैज्ञानिक रघुनन्दन सिंह चुण्डावत ने भी की है। हनुमंत सिंह ने बताया कि वर्ष 2011 में एक बाघिन की मौत हो गई थी, जिसके दो मादा शावक थे। मां की असमय मौत होने के बाद इन अनाथ हो चुके शावकों की परवरिश नर बाघ टी-25 ने की थी। मौजूदा समय दोनों बाघिन सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान में राज कर रही हैं। मादा शावकों की परवरिश कर उन्हें नैसर्गिक जीवन जीने के लिए सक्षम बनाने वाले नर बाघ टी-25 की गत वर्ष मौत हो चुकी है। इस बाघ की मौत होने पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत द्वारा बाघ की फोटो के साथ ट्वीट भी किया था।

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Sunday, May 23, 2021

अनाथ हो चुके शावकों का रखवाला बना नर बाघ

  •  जो कहीं देखने को नहीं मिला वह पन्ना में हो रहा साकार 
  •  शावकों की मां बाघिन पी-213(32) की हो चुकी है मौत

नर बाघ पी-243 जो जंगल में नन्हे शावकों की कर रहा है परवरिश।  

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। जंगल की निराली दुनिया में ऐसा कुछ न कुछ घटित होता रहता है, जिसे देख लोग अचंभित होते हैं और हैरत में पड़ जाते हैं। टाइगर स्टेट कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिज़र्व में इन दिनों ऐसा ही कुछ दुर्लभ नजारा देखने को मिल रहा है, जिससे वन अधिकारी आश्चर्यचकित तो हैं ही उत्साहित और प्रसन्न भी हैं। दरअसल कम उम्र में ही अनाथ हो चुके चार शावकों की मां बाघिन  पी-213 (32) की गत 15 मई को जब असमय मौत हो गई तो नन्हे शावक बेसहारा हो गये। इन शावकों की सुरक्षा व उनके भविष्य को लेकर हर कोई चिंतित था। लेकिन बाघों के स्वभाव व आचरण से अलहदा इन शावकों का पिता नर बाघ पी-243 नन्हे शावकों की न सिर्फ रखवाली करता है अपितु उनका पालन-पोषण भी कर रहा है। आमतौर पर जो कहीं भी देखने और सुनने को नहीं मिला, वह पन्ना टाइगर रिजर्व में साकार हो रहा है। 

उल्लेखनीय है कि बाघ पुनर्स्थापना योजना की चमत्कारिक सफलता के साथ-साथ अभिनव और अनूठे प्रयोगों के लिए भी पन्ना टाइगर रिजर्व देश व दुनिया में जाना जाता है। यह वन क्षेत्र दुनिया भर के वन्यजीव प्रेमियों तथा वन अधिकारियों के लिए एक ऐसा केंद्र बन चुका है, जहां आकर वे यहां की कामयाबी व अनूठे प्रयोगों को न सिर्फ देखते और समझते हैं बल्कि अध्ययन भी करते हैं। अभी हाल ही में गत 15 मई को पन्ना टाइगर रिजर्व की 6 वर्षीय युवा बाघिन की अज्ञात कारणों के चलते मौत हो गई थी। इस बाघिन के चार नन्हे शावकों की जिंदगी में यह किसी वज्रपात से कम नहीं था। इन नन्हे शावकों की सुरक्षा, संरक्षण तथा उनके भविष्य को लेकर पार्क प्रबंधन ऊहापोह की स्थिति में था। प्रबंधन के सामने सिर्फ दो ही विकल्प थे, पहला यह कि उनका रेस्क्यू कर किसी सुरक्षित जगह में रखकर उनका पालन-पोषण हो। लेकिन यह उनके लिए किसी सजा से कम नहीं था क्योंकि चारों शावक स्वाभाविक प्राकृतिक जीवन से वंचित रह जाते। दूसरा विकल्प शावकों को जंगल में ही चुनौतियों के बीच संघर्ष करते हुए अपने आप को बचाने का अवसर प्रदान करना था, जो रिस्की और शावकों की जिंदगी के लिए खतरनाक था।

नर बाघ के व्यवहार को देख लिया गया साहसिक फैसला


चट्टान पर बैठे शावक तथा निकट ही मौजूद नर बाघ पी-243 

नर बाघ पी-243 जो शावकों का पिता है, उसके अप्रत्याशित और शावकों के प्रति सकारात्मक व्यवहार को देख पार्क प्रबंधन ने शावकों को रेस्क्यू कर उन्हें किसी जू में भेजने के बजाय खुले जंगल में ही रखने का बेहद साहसिक निर्णय लिया है। क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा बताते हैं कि बाघिन की मौत के बाद से नर बाघ उसी इलाके में हैं जहां चारों शावक हैं। नर बाघ यह एरिया छोड़कर कहीं भी अन्यत्र नहीं गया। सबसे ज्यादा हैरत वाली बात यह है कि शावक भी नर बाघ के साथ सहज रूप से चहल-कदमी कर रहे हैं तथा उसके पीछे-पीछे घूमते और टहलते हैं। नर बाघ न सिर्फ शावकों की देखरेख कर रहा है, बल्कि उनके लिए खाने का भी प्रबंध करता है। श्री शर्मा बताते हैं कि आमतौर पर नर बाघों में इस तरह का व्यवहार देखने को नहीं मिलता। बाघों की जीवन चर्या व खुले जंगल में उनके व्यवहार पर जो भी शोध व अध्ययन हुए हैं, कहीं भी यह बात निकलकर नहीं आई कि मां की मौत होने पर अनाथ शावकों की देखरेख नर बाघ करता हो। लेकिन पन्ना में यह चमत्कार देखने को मिल रहा है।

  बाघ पी-243 को पहनाया गया रेडियो कॉलर


जंगल में नर बाघ के पीछे विचरण करते चारो शावक। 

 बाघिन की मौत के बाद अनाथ हो चुके शावकों के प्रति नर बाघ का अच्छा व सहयोगात्मक व्यवहार देखकर पार्क प्रबंधन ने बाघ पी-243 को रेडियो कॉलर पहनाकर सूझबूझ का परिचय दिया है। ऐसा करने से न सिर्फ नर बाघ पी-243 की मॉनिटरिंग हो रही है, बल्कि उसके साथ रह रहे चारो शावकों पर भी नजर रखी जा रही है। यदि सब कुछ सामान्य रहा और आने वाले तीन-चार माह तक नर बाघ इसी तरह शावकों की देखरेख करता रहा, तो शावक एक वर्ष के होने पर खुद ही शिकार करने व स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जीने में सक्षम हो जाएंगे। पन्ना टाइगर रिजर्व का यह अभिनव प्रयोग यदि सफल रहा तो भविष्य में अनाथ शावकों के लिए यह एक मिसाल बनेगा। मालूम हो कि बाघिन की मौत के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि नर बाघ शावकों को मार सकता है, लेकिन फिलहाल यह आशंका निर्मूल साबित हुई है।

बाघ के साथ अठखेलियां करते शावकों का वीडियो जारी 

जंगल में नर बाघ पी-243 के साथ चहल-कदमी व अठखेलियाँ करते शावकों का एक दिलचस्प वीडियो पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन द्वारा जारी किया गया है। इस वीडियो को देखकर प्रतीत होता है कि चारों अनाथ शावक नर बाघ (पिता) के साथ सहज हैं। बाघ जंगल में जहां जाता है शावक भी उसके पीछे चलते हैं, जैसा मां के साथ चलते थे। बाघ के आसपास ही चारो शावक चट्टानों में बैठे नजर आते हैं। वन अधिकारियों ने बताया कि नर बाघ जब शिकार करता है तो वह इन शावकों को भी खिलाता है। अधिकारी बताते हैं कि नर बाघ व शावकों की सघन निगरानी की जा रही है। इसके लिए इलाके में दो प्रशिक्षित हाथियों सहित वन अमले को तैनात किया गया है।

वीडियो का अवलोकन करें -



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Saturday, May 22, 2021

सेहत भरी ज़िन्दगी का एक तरीका यह भी : अनिल नागर


दोस्तों, आज के इस कठिनाइयों से भरे समय में विशेषज्ञों द्वारा बेहतर सेहत के या फिर बीमारियों से निजात पाने के अलग अलग चिकित्सा पद्धतियों के तमाम तरीके सुझाए जा रहे हैं। इन सबसे जुदा एक तरीका और भी है अर्थात कोई भी दवा न लेना। आज भी कई ऐसे लोग मिल सकते हैं जो बिना कोई दवा लिए खुद को स्वस्थ रखे हुए हैं, अगर कुछ लेते भी हैं तो वो उनकी दिन प्रतिदिन की जीवनशैली जीने का हिस्सा रहा है।

मेरी याददाश्त में ऐसी एक शख्सियत है जिन्होंने इस लीक से हटकर तरीक़े को अपनाया हुआ था और वो थे मेरे दादा स्वर्गीय श्रीधर जी। दादा जी का खाना बहुत ही सीधा साधा सा था। जुवार की रोटी, दाल और लहसुन की चटनी। हमारी काकी पीतल के गोलाकार भड़ते में दाल पकाती फिर चूल्हे और मिट्टी के तवे पर जुवार की गर्म गर्म रोटियां सेक कर परोसती थी साथ ही लहसुन, लालमिर्च और खड़े नमक को अनुपात में मिला कर सिलबट्टे पर बांटकर चटनी भी बनाती थी। तब कोई डाइनिंग टेबल तो थी नहीं इसलिए जमीन पर ही आसन बिछाकर पाटले पर थाली परोसी जाती थी। थाली भी ऊंची किनार वाली और दाल के लिए कटोरे की जरूरत नहीं थी, बस थाली के नीचे कोयले या लकड़ी का छोटा टुकड़ा टिकाकर निचले हिस्से में दाल उड़ेल ली जाती थी और चटनी को भी दाल में घोल लिया जाता था। बस यही था दादा जी का लंच और डिनर मतलब दाल रोटी। कभी कभार बाड़े में लगी बेलदार सब्जियां जैसे लौकी, कद्दू या गिलकी बन जाती थी, जायके में बदलाव के लिए। हां बार त्योहार पर खीर, पूरी, भजिया और हलुवा आदि पकवान जरूर बनते थे।

रात को सोने के पहले दादा जी एक गिलास दूध के साथ त्रिफला चूरन की एक फंकी मार लेते थे। हरड़, बहेड़ा और आंवला बराबर बराबर मात्रा में मिलाकर इमामदस्ते में कूटने के बाद साफ कपड़े से छानकर डिबिया में भरा जाता था। यही था घर का बना त्रिफला, मैं तो इसे दादा जी के नियमित भोजन का हिस्सा ही मानता हूँ, आप चाहे तो इसे दवा कह सकते हैं।

मुझे याद नहीं दादा जी ने कभी और कोई दवा ली हो। मैंने कभी उनको बीमार भी नहीं देखा मगर सालभर हल्की खांसी जरूर चलती थी। यह खांसी की बीमारी मुझे विरासत में मिली है जो कभी ज्यादा तो कभी कम साल भर ही चलती रहती है। तमाम जांच करवाई तो मालूम हुआ कि यह एलर्जिक कफ है, जो मौसम के बदलाव के साथ कम - ज्यादा होती रहती है। दादा जी को भी शायद ऐसी ही एलर्जिक खांसी ही रही होगी क्योंकि इसके कारण उनके रोजमर्रा के कामकाज पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। एक दिन अचानक ही दादा जी को ब्रेन स्ट्रोक हुआ, पांच - छ: दिन इलाज चला फिर 1 जनवरी 1984 को चुपचाप 90 साल की उमर पूरी कर दुनिया को अलविदा कह गये।

मौत महामारी के रूप में नाम बदल बदल कर आदमी के दरवाजे पर दस्तक देती रही है और बहुत बड़ी आबादी को काल का ग्रास बनाती रही है। इसे हम प्लेग, हैजा, चेचक, स्पेनिश फ्लू आदि नामों से जानते आए हैं। अब एक और घातक नाम जुड़ चुका है...कोविड 19...जिससे आज सारी दुनिया परेशान है। अगर स्पेनिश फ्लू की बात की जाए तो उस समय दादा जी की उमर लगभग 20 साल रही होगी, उन्होंने उस दौर में भी इस महामारी से और अन्य बीमारियों से खुद को सुरक्षित रख कर सेहत से भरी पूरी ज़िन्दगी जी थी।

अगर आप भी अपने पारिवारिक वृक्ष की जड़ों को टटोलेंगे तो आपके कई बुजुर्गों ने भी मेरे दादा जी की तरह ही अपनी पूरी ज़िन्दगानी जी होगी, वह भी बिना किसी दवा के। शायद तब दवा उपलब्ध ही नहीं रही होगी और अगर रही भी होगी तो आसान पहुंच से बहुत दूर। हां यह बात जरूर है कि तब आबोहवा में प्रदूषण का जहर नहीं घुला था।

आज सोशल मीडिया महामारी से निजात पाने के अलग अलग तरीकों से पटा पड़ा है। चिकित्सा पद्धतियों में कमियां निकालने की होड़ लगी है और आम आदमी इस भूलभूलैया में घुसने के बाद भटकने पर मजबूर है। कठिनाइयों और मायूसियत के दौर में जरूरत है अफवाहों से दूर रहने की और प्राधिकृत/योग्यताप्राप्त चिकित्सकों/विशेषज्ञों के परामर्श अनुसार पूर्व सावधानियां बरतने, उपचार करवाने और टीकाकरण करवाने की।

फिर भी इन सबसे परे मेरे दादा जी के जीवन वृत्तांत के छोटे से अंश के माध्यम से मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगा कि "एक तरीका यह भी था सेहतमंद  ज़िन्दगी का।"

( इस आलेख के लेखक भारतीय वन सेवा के अधिकारी अनिल नागर जी हैं। पन्ना टाइगर रिज़र्व में आप उप संचालक के पद पर कार्यरत रहे हैं। प्रकृति,पर्यावरण और वन्य जीवों पर भी आप कुछ न कुछ लिखते रहते हैं जो बेहद अर्थपूर्ण और प्रेरणादायी होता है। यह आलेख उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। )

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मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में भी ब्लैक फंगस ने दी दस्तक

  • कोरोना की रफ़्तार कम होने पर अब ब्लैक फंगस ने बढ़ाई चिंता 
  • पन्ना निवासी पीड़ित मरीज का जबलपुर में चल रहा है इलाज 


।। अरुण सिंह ।।   

पन्ना। देश के कई राज्यों में म्यूकरमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस से संक्रमित मरीजों के मामले सामने आने के साथ ही मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में भी इस खतरनाक बीमारी ने दस्तक दे दी है। कोरोना संक्रमण की रफ़्तार में अंकुश लगने की ख़बरों से पन्ना जिले के लोगों ने राहत की साँस ली थी कि अब इस नये संकट ने लोगों को चिंता में डाल दिया है। पन्ना शहर के निवासी एक 45 वर्षीय व्यक्ति को ब्लैक फंगस ने अपनी चपेट में लिया है। जिसकी पुष्टि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी पन्ना डॉ. आर. एस. पाण्डेय ने की है। पीड़ित मरीज का जबलपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है। 

डॉ. पाण्डेय ने बताया कि पन्ना निवासी संक्रमित मरीज अमित श्रीवास्तव शुगर के मरीज हैं। बीते माह उनकी कोरोना जाँच हुई थी और रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। पॉजिटिव आने के बाद वे अपने घर में ही क्वारंटाइन थे। कोरोना संक्रमण के कुछ दिन बाद ही उनकी दाहिनी आँख में सूजन व लालिमा आने के साथ तबियत बिगड़ने पर पीड़ित के परिजन उपचार हेतु उसे जबलपुर ले गए। डॉ. पाण्डेय ने बताया कि ब्लैक फंगस का संक्रमण मरीज के मस्तिष्क तक फ़ैल चुका है। जबलपुर मेडिकल कॉलेज में भर्ती पीड़ित युवक ने अपना एक वीडियो जारी कर मदद की गुहार लगाई है। पीड़ित ने कहा है कि "मुझे ब्लैक फंगस हो गया है, मेरा इलाज करवाकर किसी तरह मुझे बचा लो"।    

आखिर क्या है यह ब्लैक फंगस 

 कोरोना के साथ लोगों को एक नई चिंता में डालने वाला यह ब्लैक फंगस आखिर क्या बला है? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की तरफ से जारी एडवाइजरी इसे समझने में आपके बेहद काम की हो सकती है। आइए जानते हैं कि ब्लैक फंगस क्या है, इसके लक्षण क्या हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है। म्यूकरमाइकिस यानी ब्लैक फंगस एक फंगल इन्फेक्शन है। यह उन लोगों को प्रभावित करता है, जिनका इम्यून सिस्टम किसी बीमारी या इसके इलाज की वजह से कमजोर हो जाता है। ये फंगस हवा में मौजूद होता है और ऐसे लोगों में पहुंचकर उनको संक्रमित करता है। इसका संक्रमण होने पर जो लक्षण प्रकट होते हैं उनमें प्रमुखत: आंख और नाक के आसपास दर्द या लालिमा,बुखार,सिर दर्द,खांसी,सांस लेने में परेशानी,उल्टी में खून,मेंटल कन्फ्यूजन होता है। 

इनको रहता है ज्यादा खतरा

म्यूकरमाइकिस यानी ब्लैक फंगस के संक्रमण का खतरा उनको अधिक रहता है जिनको अनकंट्रोल्ड डायबीटीज हो,स्टेरॉयड ले रहे हों तथा लंबे वक्त तक आईसीयू में रहे हों। इसके संक्रमण से बचने के लिए चिकित्सकों का सुझाव है कि धूल-मिट्टी भरी कंस्ट्रक्शन साइट पर जाएं तो मास्क जरूर पहनें। बागवानी या मिट्टी से जुड़ा काम करते वक्त जूते, फुल पैंट्स-शर्ट और दस्ताने पहनें। पर्सनल हाईजीन का ध्यान रखें। रोजाना अच्छी तरह नहाएं। यदि नाक जाम है या नाक से काला या खूनी पदार्थ निकले, गाल की हड्डी में दर्द हो, नाक/तालू के ऊपर कालापन आ जाए, दांत में दर्द हो, दांतों में ढीलापन लगे, जबड़े में दिक्कत हो, त्वचा में घाव, बुखार, दर्द या धुंधलापन दिखे, खून का थक्का जमे, छाती में दर्द हो, सांस लेने में दिक्कत हो तो इन लक्षणों को अनदेखा न करें। तुरंत चिकित्स्कीय परामर्श लें और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार करवाएं। 

 नोट : यह जानकारी स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार की तरफ से जारी की गई है।

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Thursday, May 20, 2021

पन्ना के नर बाघ पी-243 की हुई रेडियो कॉलरिंग

  • नर बाघ मृत हुई बाघिन पी-213 (32) का है जीवन साथी
  • रेडियो कॉलरिंग हो जाने से हर गतिविधि पर रहेगी नजर 

पन्ना टाइगर रिजर्व का नर बाघ पी-243 जिसका रेडियो कॉलर हुआ। 

पन्ना। मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में नर बाघ पी-243 की आज सफलतापूर्वक रेडियो कॉलरिंग की गई। यह बाघ अभी हाल ही में अज्ञात कारणों के चलते मृत हुई बाघिन पी-213 (32) का जीवन साथी है। मृत बाघिन के चार अनाथ शावक हैं, जिनके प्रति इस नर बाघ का बर्ताव सहयोगात्मक है। नर बाघ की हर गतिविधि को मॉनिटर किया जा सके, इस बात को ध्यान में रखकर इसे रेडियो कॉलर पहनाया गया है।

 क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि नर बाघ पी-243 को वन परिक्षेत्र गहरीघाट के बीट मझौली में सफलतापूर्वक सेटेलाइट जीपीएस कॉलर किया गया है। रेडियो कॉलरिंग उपरांत बाघ को स्वच्छंद विचरण हेतु विमुक्त किया गया। आपने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व के अंतर्गत केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत भारत सरकार द्वारा पन्ना लैंडस्केप के प्रबंध योजना हेतु 14 बाघों को रेडियो कॉलर की अनुमति प्रदान की गई है। रेडियो कॉलरिंग की समस्त कार्यवाही क्षेत्र संचालक तथा उप संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व के मार्गदर्शन में डॉ. संजीव कुमार गुप्ता वन्य प्राणी चिकित्सक एवं उनकी रेस्क्यू टीम के द्वारा सफलतापूर्वक संपन्न की गई।

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पन्ना जिले के आधा दर्जन ग्रामों में तेंदुए का आतंक

  •  बीते दो दिनों से भय और दहशत में जी रहे ग्रामवासी 
  •  आबादी क्षेत्र में आकर तेंदुए ने बछड़ों का किया शिकार 

वन्य प्राणी तेंदुआ जिसका इन दिनों कई गांवों में आतंक है।

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना । जंगल के आसपास स्थित पन्ना जिले के आधा दर्जन ग्रामों में बीते दो दिनों से तेंदुए का आतंक कायम है। आबादी क्षेत्र के निकट तेंदुए की मौजूदगी के चलते ग्रामवासी भय और दहशत के माहौल में जी रहे हैं। बीते दो दिनों में तेंदुए ने घर के बाड़े में बंधे तीन बछड़ों व एक पड़िया को जहां मार दिया है, वहीं एक बछड़े को घसीट कर जंगल की तरफ ले गया है। तेंदुए के डर से मनौर व जरुआपुर गांव के लोग घरों में कैद हैं।

 उल्लेखनीय है कि पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र व उत्तर वन मंडल के जंगल से लगे डेढ़ सैकड़ा से भी अधिक गांव हैं, जहां हिंसक वन्य प्राणियों का खतरा बना रहता है। इन ग्रामों में बाघ हुआ तेंदुआ अक्सर ही मवेशियों को अपना शिकार बना लेते हैं पन्ना शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर जरुआ पुर गांव में गुरुवार 20 मई को तड़के तकरीबन 3 बजे के लगभग तेंदुआ जंगल से आकर शंकर बंगाली के घर में घुस गया घर के जिस हिस्से में मवेशी बंधे थे वहां से इस तेंदुए ने एक बछड़े को दबोच कर उसे जंगल की तरफ घसीट ले गया घर के बाहर तेंदुए के पग मार्क वर्कर सीखने के निशान साफ बने हुए हैं। ग्रामीणों ने रास्ते में बने तेंदुआ के पग मार्क दिखाते हुए बताया कि बछड़े को यहीं से घसीटकर तेंदुआ ले गया है।


पीड़ित पशुपालक शंकर बंगाली घटना की जानकारी देते हुए।

इस घटना के पूर्व पास के ही मनौर गांव में मंगलवार की रात तेंदुए ने दबिश दी थी। गांव के पशुपालक राजेंद्र सिंह यादव के बाड़े में जहां मवेशी बंधे रहते हैं, वहां तेंदुआ पहुंचा और तीन बछड़ों व एक पडय़िा को बुरी तरह से जख्मी कर मार डाला। रात्रि में बारिश होने तथा बिजली गुल रहने के कारण पशुपालक को तेंदुआ के आने की भनक नहीं लगी। सुबह जब राजेंद्र सिंह यादव पशुओं के बाड़े में गए, तो वहां का नजारा देख हैरान रह गए। लहूलुहान बछड़े मृत पड़े थे तथा तेंदुए के पंजे के निशान आसपास मौजूद थे। जिससे यह ज्ञात हुआ कि तेंदुए के हमले से इन बछड़ों व पडिया की मौत हुई है। श्री यादव ने बताया कि जिन बछड़ों व पडय़िा की मौत हुई है, वे गांये व भैंस दूध देती थीं।

डर से काम पर नहीं जा रहे ग्रामीण


तेंदुआ के खौफ से जरुआपुर गांव के गोंडवाना टोला में पसरे सन्नाटा का नजारा।  

जंगल का राजकुमार कहे जाने वाले तेंदुआ के आबादी क्षेत्र में दस्तक देने से मनौर व जरुआपुर सहित आसपास के गांव बडौर, दरेरा व मडैयन में दहशत बनी हुई है। तेंदुए के डर से ग्रामीण काम पर भी नहीं जा रहे। गांव की महिलाएं व बच्चे घरों के भीतर कैद हैं। लोगों को डर है कि तेंदुआ आसपास ही मौजूद है, जो कभी भी हमला कर सकता है। जरुआपुर के भागवत गोंड़ ने बताया कि "हमाये गांव के बहुत जने हीरा खदान में मजूरी करन जात हैं, पै दो दिना से नहीं जा रहे। सबखां  तेंदुआ को डर सता रहो" । गांव के ही युवक सुनील गोंड़ ने बताया कि कोरोना के डर से ज्यादातर लोग गांव से बाहर नहीं जाते थे, कुछ लोग ही हीरा खदान जाते रहे हैं। लेकिन तेंदुआ की मौजूदगी के कारण अब कोई भी काम पर नहीं जा रहा। सुनील ने बताया कि गांव का राकेश गोंड़ हीरा खदान गया था, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि तेंदुआ बछड़ा उठाकर ले गया है वह भी वापस लौट आया है।

पीड़ित पशुपालकों को मिलेगा मुआवजा

मनौर व जरुआपुर गांव जहां तेंदुआ ने मवेशियों के बच्चों को मारा है, ये दोनों गांव उत्तर वन मंडल पन्ना के विश्रमगंज वन परिक्षेत्र में आते हैं। घटना के संबंध में जब उत्तर वनमंडल पन्ना के वन मंडलाधिकारी गौरव शर्मा से जानकारी ली गई, तो उन्होंने बताया कि अभी वे घटना से अनभिज्ञ हैं। रेंजर से जानकारी लेकर पीड़ित पशुपालकों को त्वरित मुआवजा राशि दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। श्री शर्मा ने बताया कि जंगली जानवरों से पशु हानि होने के प्रकरण चार-पांच दिन में निपटाने के प्रयास किए जाते हैं। आपने बताया कि दुधारू पशुओं, बछड़ों व बकरी आदि की क्षति होने पर अलग-अलग मुआवजा राशि निर्धारित है। उसी के अनुरूप पीड़ितों को राशि प्रदान की जाती है।

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भीषण आंधी और झमाझम बारिश ने पन्ना में मचाई तबाही

  •  सैकड़ों की संख्या में पेड़ हुए धरासायी, घंटों आवागमन रहा बाधित 
  •  आकाशीय बिजली ने भी ढाया कहर, मंदिर का गुम्मद क्षतिग्रस्त   



।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में ताऊते तूफान के कारण बुद्धवार की शाम लगभग 3 बजे आए आंधी तूफान ने जमकर उत्पात मचाया है। झमाझम तेज वारिश के साथ भीषण आंधी ने एक घण्टे से भी अधिक समय तक अपना रौद्र रूप दिखाया, जिसके चलते यहां सैकड़ों पेड़ जहाँ धराशायी हो गए वहीँ विद्युत व्यवस्था भी ठप्प हो गई। कई प्रमुख मार्गों पर पेड़ गिरने से यातायात अवरुद्ध रहा। तेज आंधी और बारिश ने जिले के ग्रामीण अंचलों में भी तबाही मचाई है, कई जगह पेड़ों के गिरने से नुकसान की खबर है। खरीदी केंद्रों में खुले में रखा हजारों क्विंटल गेहूं भीग गया है। 

उल्लेखनीय है कि दोपहर 2 बजे तक मौसम सामान्य था, आकाश में सिर्फ बादल नजर आ रहे थे। जिन्हे देखकर यह अनुमान लगा पाना मुश्किल था कि कुछ ही देर में भीषण तबाही मचने वाली है। देखते ही देखते बूंदाबांदी शुरू हुई तथा हवाएं भी चलने लगीं। लेकिन यह क्या हवाओं ने रौद्र रूप धारण कर लिया तथा बारिश  ने भी रफ़्तार पकड़ ली। भीषण आंधी और झमाझम बारिश ने ऐसा तांडव मचाया कि बड़े - बड़े पेड़ चरमराकर गिरने लगे, पानी लोगों के घरों में घुसने लगा। इस तांडव के बीच ही बिजली भी चली गई जिससे घुप्प अँधेरा छा गया। बारिश इतनी तेज थी कि शहर के निकट से गुजरने वाली किलकिला नदी जो रूखी - सूखी पड़ी थी उसमें जलधार प्रवाहित होने लगी है। तेज आंधी के कारण कई घरों के छप्पर उड़ गए, शायद ही कोई बड़ा और पुराना पेड़ सुरक्षित बचा हो जिसे क्षति न पहुंची हो। किसी की डाल टूटी तो कोई जड़मूल से ही धरासायी हो गया। पेड़ गिरने से बिजली की लाइनें भी क्षतिग्रस्त हो गईं। 



बुद्धवार की शाम आंधी और बारिश का ऐसा खतरनाक नजारा लोगों ने देखा जो इसके पहले शायद ही कभी देखा हो। यह तबाही पन्ना शहर के अलावा जिले के अजयगढ़,पवई, शाहनगर, गुनौर, देवेंद्रनगर, ककरहटी, अमानगंज सहित सभी जगह देखने को मिला। माकूल सुरक्षा इंतजाम न होने के कारण जिले के अधिकांश खरीदी केंद्रों में भी बर्बादी का मंजर दिखाई दिया। हजारों कुन्टल गेंहू बारिश में तर बतर हो गया। शहर में अजयगढ़ चौराहा से इन्द्रपुरी जाने वाले मार्ग में डॉ.एच.एन. शर्मा जी के क्लीनिक के बगल में पुराना विशालकाय पीपल का वृक्ष धरासायी हो गया जिससे बिजली की लाइन भी टूट गई। इसे सुधारने में घण्टों विजली कर्मचारियों को मशक्कत करनी पड़ी। रात 10 बजे के बाद इंद्रपुरी क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति हो पायी, तब तक यह क्षेत्र अँधेरे में डूबा रहा।  

जगह - जगह पेड़ गिरने से कई मार्गों पर आवागमन भी बाधित रहा। पन्ना - पहाड़ीखेरा मार्ग पर सड़कों में पेड़ गिरे नजर आये। पन्ना - अजयगढ़ मार्ग पर भी कई जगह पेड़ गिरे जिससे वाहनों की लम्बी कतारें लग गईं। घंटों की मशक्कत के बाद मार्गों पर आवागमन बहाल हो सका। जिले के कई इलाकों में आकाशीय बिजली का कहर भी दिखाई दिया। ककरहटी में मंदिर के ऊपर बिजली गिरी जिससे मंदिर का गुम्मद क्षतिग्रस्त हुआ है। इसी तरह पवई क्षेत्र के गुड़मनिया गांव में बिजली गिरने की जानकारी मिली है। यहाँ पर बिजली की चपेट में आकर गो वंशीय पशुओं के मरने की खबर है। आंधी से आम की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है, पेड़ों के नीचे आम बिछे नजर आये।  

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वन परिक्षेत्राधिकारी कल्दा के साथ ग्रामीणों ने की मारपीट

  •  महुआ फूल खरीदी की जांच करने पहुंचे थे ग्राम महुआ डोल
  •  अमानगंज के व्यापारी के उकसाने पर ग्रामीणों ने बोला हमला 


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में वन परीक्षेत्र अधिकारी सहित दो वन कर्मचारियों के ऊपर ग्रामीणों द्वारा हमला किए जाने का मामला प्रकाश में आया है। हमले की यह घटना दक्षिण वन मंडल पन्ना अंतर्गत कल्दा वन परिक्षेत्र के महुआ डोल गांव की है। हमले में रेंजर सहित दोनों वन कर्मियों के घायल होने की खबर है। हमलावरों के खिलाफ सलेहा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है।

 मामले की जानकारी देते हुए थाना प्रभारी सलेहा अभिषेक पांडे ने बताया कि मंगलवार 18 मई को सायं वनोपज महुआ फूल खरीदी की जांच करने के लिए वन परिक्षेत्राधिकारी एल.पी. सिंह ग्राम महुआ डोल गए हुए थे। उसी दौरान विवाद होने पर ग्रामीणों ने हमला बोल दिया। हमलावरों में पुरुष व महिलाएं भी शामिल थीं।  घटना की रिपोर्ट वन क्षेत्राधिकारी कल्दा द्वारा दर्ज कराई गई है। पुलिस द्वारा मामले की विवेचना की जा रही है।

 घटना के संबंध में वन परिक्षेत्राधिकारी कल्दा एल.पी. सिंह से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि शासन द्वारा वनोपज का समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया है। हमें यह जानकारी मिलने पर कि अमानगंज के व्यापारी द्वारा कल्दा पठार के गांव महुआ डोल में महुआ फूल की खरीदी की जा रही है। खरीदी किस दर पर की जा रही है, यह पता करने दो वन कर्मचारियों के. पी. अग्निहोत्री व वीरेंद्र पटेल को लेकर मैं इस गांव में पहुंचा। व्यापारी द्वारा महुआ फूल किस दर पर खरीदा जा रहा है, जब हमने इस संबंध में पूछताछ शुरू की उसी समय व्यापारी के उकसाने पर ग्रामीण भड़क उठे। मौके पर मौजूद डेढ़-दो सौ लोगों की भीड़ ने हमारे ऊपर हमला बोल दिया। किसी तरह जान बचाकर हम वहां से भाग कर आए हैं। वन परिक्षेत्राधिकारी ने बताया कि हमले में मुझे व दोनों वन कर्मचारियों को चोट आई है। घटना के बाद वनोपज की खरीदी करने वाला व्यापारी वहां से भाग निकला है।

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Tuesday, May 18, 2021

सक्षम रेन्जर को सौंपी गई गहरीघाट वन परिक्षेत्र की कमान

  •  निगरानी व्यवस्था को बेहतर बनाने पार्क प्रबंधन ने किया बदलाव 
  •  मृत बाघिन के चारों लापता शावक जंगल में अठखेलियां करते दिखे 

पन्ना टाइगर रिज़र्व के वनपरिक्षेत्र गहरीघाट का जंगल जहाँ शावक विचरण कर रहे। 

।। अरुण सिंह ।।

 पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघिन पी-213 (32) की असमय मौत के बाद गहरीघाट वन परिक्षेत्र की व्यवस्था को बेहतर बनाने तथा अनाथ बाघ शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पार्क प्रबंधन ने प्रशासनिक बदलाव किया है। गहरीघाट वन परिक्षेत्र की कमान अब सक्षम व सक्रिय वन अधिकारी अमर सिंह को सौंपी गई है। इस वन परिक्षेत्र में विगत कई वर्षों से बतौर रेन्ज ऑफिसर हबीचंद चौहान पदस्थ रहे हैं। क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने बताया कि इस आशय के आदेश सोमवार 17 मई को जारी कर दिए गए हैं। मालूम हो कि इस वन परिक्षेत्र में बाघिन पी-213(32) की संदिग्ध मौत हुई है। बीते कुछ सालों के दरमियान इस रेंज में विभिन्न कारणों से कई बाघों की मौत हो चुकी है। जिससे इस रेंज के प्रबंधन व निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए पार्क प्रबंधन ने यह जरूरी बदलाव किया है, ताकि व्यवस्था बेहतर हो सके। पिछले दो-तीन दिनों तक लापता रहे चारों शावक स्वस्थ और सुरक्षित हैं। उनकी तलाश में पिछले तीन दिनों से गहरीघाट वन परिक्षेत्र का चप्पा-चप्पा छानने में जुटे वन कर्मियों ने इन शावकों को अठखेलियां करते हुए देखा है। उनके सकुशल मिलने की खुशखबरी क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने दी है। अब इन नन्हे शावकों की वन अमले द्वारा सघन निगरानी की जा रही है।

उल्लेखनीय है कि शनिवार 15 मई को तकरीबन 6 वर्ष की युवा बाघिन की हुई संदिग्ध मौत के बाद से उसके चारों शावक लापता हो गए थे। लगभग 6 से 8 माह के इन शावकों की तभी से वन अमले तथा प्रशिक्षित हाथियों के दल द्वारा तलाश की जा रही थी। शावकों के लापता होने से पार्क प्रबंधन जहां तनाव में था, वहीं वन्य जीव प्रेमी भी चिंतित थे। सघन तलाशी अभियान के दौरान सोमवार को सायं चारो शावक कोनी बीट के जंगल में चहलकदमी करते नजर आए हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व के वन अमले ने इन शावकों को निकट से देखा है। यह खबर मिलते ही पार्क के अधिकारियों सहित वन्यजीव प्रेमियों ने राहत की सांस ली है।


नन्हे शावक को मुंह में दबाकर ले जाती बाघिन पी-213 (32) के जीवित अवस्था का द्रश्य।   ( फाइल फोटो )

 क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि चारों शावक स्वस्थ और सुरक्षित हैं। शावक जंगल में जिस तरह निश्चिंत होकर अठखेलियां करते नजर आए हैं, उससे यह प्रतीत होता है कि वह खुले जंगल की चुनौतियों और खतरों से मुकाबला करने का हुनर सीख रहे हैं। श्री शर्मा ने बताया कि शावक भूखे नहीं दिख रहे थे, जाहिर है कि उन्होंने कुछ न कुछ खाया होगा। आपने इस बात की संभावना जताई है कि हो न हो इन शावकों के पिता बाघ पी-243 ने इनका ध्यान रखा है। नर बाघ का शावकों के प्रति ऐसा बर्ताव शुभ संकेत है।

शावकों की हर गतिविधि पर रहेगी नजर 

लापता शावकों के सुरक्षित मिलने के बाद अब उनकी निगरानी चाक-चौबंद कर दी गई है। क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने बताया कि हम कुछ दिनों तक इन शावकों की गतिविधि और व्यवहार पर चौकस नजर रखेंगे। यदि सब कुछ सामान्य रहा और नर बाघ पी-243 का बर्ताव शावकों के प्रति सहानुभूति पूर्ण रहा तो उन्हें खुले जंगल में ही रखा जाएगा। यदि तीन-चार माह तक यह शावक खुले जंगल में चुनौतियों के बीच रहना सीख लिया, तो फिर वे इतना सक्षम हो जाएंगे कि खुद शिकार कर सकें। नर बाघ पी-243 का पुराना रिकॉर्ड भी अच्छा है, वह बच्चों को नुकसान नहीं पहुंचाता। इससे पार्क प्रबंधन आशान्वित है कि चारों शावक प्राकृतिक जीवन जीने में सक्षम हो पायेंगे।

 शावकों में दो मादा व दो नर 

सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार इन चार अनाथ शावकों में दो मादा व दो नर शावक हैं। पार्क प्रबंधन इन शावकों की सुरक्षा को लेकर इसलिए भी बेहद सजग व गंभीर है, क्योंकि मादा बाघ शावकों की सुरक्षा पन्ना टाइगर रिजर्व के बेहतर भविष्य के लिए बहुत जरूरी है। बाघिन पी-213(32) की असमय मौत से पार्क की जो अपूरणीय क्षति हुई है, उसकी भरपाई यह दोनों मादा शावक आने वाले वर्षों में बाघों की वंश वृद्धि में भूमिका निभाकर करेंगी।

 शावकों की निगरानी व सुरक्षा हेतु समय अनुकूल 

मौजूदा समय लॉकडाउन के चलते पर्यटकों के भ्रमण हेतु पार्क बंद है। पर्यटकों की आवाजाही न होने से पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगल में मानवीय गतिविधियां थमी हुई हैं। जिससे वन्यजीव सहज और स्वाभाविक जिंदगी जी रहे हैं। चूंकि मानसून सीजन आने वाला है, फल स्वरुप आगजनी की घटनाओं का दबाव भी खत्म हो जाएगा। इन सब कार्यों में लगा रहने वाला वन अमला भी खाली रहेगा। जिनका उपयोग शावकों की चौबीसों घंटे निगरानी व उनकी सुरक्षा में की जा सकेगी। क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा सहित पार्क के आला अधिकारी पिछले कुछ दिनों से जिस तरह फील्ड विजिट कर रहे हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव उपाय किए जा रहे हैं। 

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Monday, May 17, 2021

खुशखबरी : मृत बाघिन के चारों शावक स्वस्थ और सुरक्षित

  •  जंगल में अठखेलियां करते हुए नजर आए चारो शावक 
  •  क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व से मिली यह खुशखबरी 

पन्ना टाइगर रिज़र्व में चहल - कदमी करते बाघ शावक।  ( फाइल फोटो )

।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। बाघों से आबाद हो चुके मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व से राहत पहुंचाने वाली सुकून भरी खबर मिली है, मृत बाघिन के दो दिनों से लापता चारो शावक स्वस्थ और सुरक्षित हैं। मालुम हो कि गत 15 मई को आघात पहुंचाने वाली खबर मिली थी। प्रजनन क्षमता वाली एक युवा बाघिन जिसके चार शावक हैं, उसकी अचानक हुई मौत की खबर ने हर किसी को झकझोर दिया था। वन्यजीव प्रेमी व पार्क के अधिकारी बाघिन के अनाथ हो चुके चारों शावकों की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित थे। जंगल में शावकों की सरगर्मी के साथ तलाश की जा रही थी। बीते दो दिनों के अथक प्रयासों के बाद सोमवार को चारो नन्हें शावक अठखेलियां करते नजर आए हैं। शावकों के सुरक्षित होने की सुकून भरी इस खबर से सभी ने राहत की सांस ली है।

 उल्लेखनीय है कि गत 15 मई को पन्ना टाइगर रिजर्व की एक अति महत्वपूर्ण बाघिन पी-213 (32) की अज्ञात कारणों के चलते मौत हो गई थी। बाघिन की मौत के बाद उसके चार शावकों को जिनकी उम्र तकरीबन 6 से 8 माह है, उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता की जाने लगी। इन नन्हे शावकों की खोज में पार्क के मैदानी अमले को जहां लगाया गया, वहीं प्रशिक्षित हाथियों के दल को भी कोनी बीट के जंगल में शावकों की तलाश के लिए तैनात किया गया। दो दिनों तक हुई अनवरत खोज के बाद आज अपरान्ह यह खुशखबरी मिली कि चारों शावक सुरक्षित हैं।

 क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने यह खुशखबरी देते हुए बताया कि मौके पर मौजूद वन अमले ने शावकों को अठखेलियां करते हुए देखा है। आपने बताया कि चारों शावक स्वस्थ और सुरक्षित हैं। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह भूखे नहीं है, कुछ न कुछ खाया है। श्री शर्मा ने संभावना जताई कि हो सकता है कि नर बाघ पी-243 जो शावकों का पिता है, उसने इनकी मदद की हो। यदि ऐसा है तो निश्चित ही यह शुभ संकेत है।

 आपने बताया कि चारों शावकों की चौबीसों घंटे निगरानी की जाएगी तथा उनकी हर गतिविधि व लोकेशन पर नजर रखी जाएगी। श्री शर्मा ने बताया कि यदि प्राकृतिक रूप से जंगल में शावक अपने को बचाने में सक्षम होते हैं, तो इससे बढय़िा और कुछ नहीं हो सकता। कुछ दिन हम इन पर नजर रखेंगे फिर जिस तरह के हालात बनेंगे, उसी के अनुरूप निर्णय लिया जाएगा।

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अनाथ हो चुके बाघ शावकों का अब क्या होगा भविष्य?

  •   पिछले दो दिनों से शावकों की जंगल में हो रही सघन सर्चिंग
  •   तलाश में जुटे हैं एक सैकड़ा से ज्यादा वनकर्मी व प्रशिक्षित हाथी 

अपने चार नन्हे शावकों के साथ बाघिन।  (सांकेतिक फाइल फोटो) 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व की युवा बाघिन पी-213(32) की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई असमय मौत के बाद अब उसके चार नन्हे शावकों के भविष्य की चिंता वन्यजीव प्रेमियों को सताने लगी है। गत 15 मई को इस बाघिन का शव वन परिक्षेत्र गहरीघाट की कोनी बीट से गुजरने वाले कोनी नाले में मिला था। लेकिन इस बाघिन के चारो नन्हें शावक जो 6 से 8 माह के हैं, वे कहां और कैसे हैं इसका सुराग नहीं लग पाया। पिछले दो दिनों से एक सैकड़ा से भी अधिक वनकर्मी व प्रशिक्षित हाथियों का दल इलाके के जंगल का चप्पा चप्पा छान रहा है, फिर भी शावक 17 मई की दोपहर तक कहीं नजर नहीं आये। 

उल्लेखनीय है कि कोनी बीट के इस इलाके का जंगल अत्यधिक जटिल और दुरूह है। मैदानी क्षेत्र जैसी स्थितियां यहां नहीं हैं, जहां सुगमता से पहुंचा जा सके। यहां के जंगल में गहरे सेहा व जटिल पहाड़ी संरचनाएं हैं, जहां प्रशिक्षित हाथी भी नहीं पहुंच सकते। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि चारों शावक किसी सेहा व पहाड़ी की ओट में छुपे होंगे। यही वजह है कि सघन सर्चिंग के बावजूद अभी तक उनका सुराग नहीं मिल सका। जानकारों का यह भी कहना है कि बाघों के बच्चों में अत्यधिक अनुशासन होता है। बाघिन इन शावकों को जिस जगह पर छुपाकर गई होगी, शावक वहां तब तक बने रहेंगे जब तक उनकी मां नहीं आ जाती। बाघिन अपने शावकों को इस तरह का प्रशिक्षण शुरू से देती है, कई दिनों तक बच्चों से नहीं मिलती। आमतौर पर बाघ शावकों को प्रतिदिन दूध पिलाने के बजाय 3 से 5 दिन के अंतर में दूध पिलाती है। जाहिर है कि बाघ शावकों में बिना खाए पिए मां की गैरमौजूदगी में रहने की नैसर्गिक क्षमता होती है।


जंगल में सर्चिंग करता प्रशिक्षित हांथियों का दल।  ( फाइल फोटो ) 

क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि बाघिन की मौत के बाद अब हमारी प्राथमिकता चारो शावक हैं, जिनकी तलाश के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। शावकों की कॉलिंग सुनने की कोशिश के अलावा जल श्रोतों पर भी चौकस नजर रखी जा रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्दी ही शावकों को खोजने में सफलता मिलेगी। जब उनसे पूछा गया कि शावकों के मिलने पर उनको प्राकृतिक रूप से बचाने के लिए क्या योजना है? इस सवाल के जवाब में श्री शर्मा ने कहा कि हमारी पहली प्राथमिकता व चिंता उन्हें ढूंढ निकालने की है। इसके बाद दूसरा कदम रेस्क्यू करने व इसके बाद उनको कहां व कैसे रखना है इस पर निर्णय होगा। वन महकमे के उच्च अधिकारियों सहित एनटीसीए से भी मामले पर सतत मार्गदर्शन लिया जा रहा है।

बाघिन की मौत से उदास है उसका जीवनसाथी

 बाघिन पी-213(32) की असमय मौत से जहां उसके चार नन्हें शावक अनाथ हो गए हैं, वहीं इस बाघिन का जीवन साथी नर बाघ पी-243 भी अत्यधिक उदास और तनाव में है। क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने बताया कि नर बाघ पी-243 इलाके में असहज देखा गया है। निश्चित ही बाघिन की मौत से वह आहत हुआ है। मां की मौत होने पर क्या नर बाघ पिता की भूमिका निभाते हुए अनाथ शावकों की परवरिश कर सकता है? इस सवाल के जवाब में क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने कहा कि इसकी संभावना बहुत ही कम है। एक दो बार वह अपना किल शावकों के साथ शेयर कर सकता है, लेकिन दूसरी कोई बाघिन मिलने पर वह उसके साथ जोड़ा बनाकर चलता बनेगा। जबकि अभी कम से कम एक वर्ष होने तक शावकों को परवरिश की जरूरत पड़ेगी।

 बाघिन की मौत का रहस्य बरकरार 


कोनी नाले में इस अवस्था में मिला था बाघिन का शव। 

बाघिन पी-213 (32) की मौत कैसे हुई, इस रहस्य पर अभी भी पर्दा पड़ा हुआ है। पोस्टमार्टम में भी ऐसे कोई चिन्ह व प्रमाण नहीं मिले, जिससे मौत की वजह का अनुमान लगाया जा सके। बाघिन के सभी अंगों के सैंपल जांच हेतु लिए गए हैं, जिन्हें आज सोमवार को रवाना किया जा रहा है। जांच रिपोर्ट आने पर ही मौत के कारणों की असल वजह का खुलासा हो पाएगा। मालुम हो कि कोनी नाले में जिस जगह पर बाघिन का शव मिला है, वहां ग्रामीणों की भी आवाजाही रहती है। कोनी सेहा के बारे में कहा जाता है कि यहां ग्रामीण और बाघ एक ही जगह का पानी पीते हैं। कोनी गांव यहां से बमुश्किल एक किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसी स्थिति में असमय काल कवलित हुई बाघिन में वायरल अटैक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस रहस्य से पर्दा उठने के लिए हर किसी को जांच रिपोर्ट आने का बेसब्री से इंतजार है।

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