Wednesday, March 31, 2021

मुरली मुकुट छीन यशोदा के लाल को पहनाय दियो घाघरा चोली

  •   पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में कायम है अनूठी परम्परा
  •   वर्ष में एक बार चैत्र मास की तृतीया को होते हैं सखी वेष के दर्शन

सखी वेष में राधिका जी के संग श्री जुगल किशोर जी की मनोरम झाँकी। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश में मंदिरों के शहर पन्ना में हर तीज त्योहार बड़े ही अनूठे और निराले अंदाज में मनाया जाता है। रंगों के पर्व होली पर यहाँ के सुप्रसिद्ध भगवान श्री जुगल किशोर जी मंदिर की छटा देखते ही बनती है। चैत्र मास की तृतीया को यहां भगवान श्री जुगुल किशोर जी सखी वेष धारण करते हैं। भगवान के इस नयनाभिराम अलौकिक स्वरूप के दर्शन वर्ष में सिर्फ एक बार होली के बाद तृतीया को ही होते हैं। यही वजह है कि सखी वेष के दर्शन करने पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। मुरली मुकुट छीन पहनाय दियो घाघरा चोली, यशोदा के लाल को दुलैया सो सजायो है। कृष्ण की भक्ति में लीन महिलायें जब ढोलक की थाप पर इस तरह के होली गीत गाते हुये गुलाल उड़ाकर नृत्य करती हैं तो म.प्र. के पन्ना शहर में स्थित सुप्रसिद्ध श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में वृन्दावन जीवंत हो उठता है।

उल्लेखनीय है कि मन्दिरों के शहर पन्ना में स्थित श्री जुगुल किशोर जी का मन्दिर जन आस्था का केन्द्र है। इस भव्य और अनूठे मन्दिर में रंगों का पर्व होली वृन्दावन की तर्ज पर मनाया जाता है। कोरोना संक्रमण के चलते सोशल डिस्टेंसिंग सहित अन्य बंदिशों के बावजूद तृतीया के दिन आज बुद्धवार को इस मन्दिर की रंगत देखते ही बन रही थी। सुबह 5 बजे से ही महिला श्रद्धालुओं का सैलाब भगवान के सखी वेष को निहारने और उनके सानिद्ध में गुलाल की होली खेलने के लिये उमड़ पड़ा। ढोलक की थाप और मजीरों की सुमधुर ध्वनि के बीच महिला श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य की भक्ति और प्रेम में लीन होकर जब होली गीत और फाग गाया तो सभी के पाँव स्वमेव थिरकने लगे। फाग, नृत्य और गुलाल उड़ाने का यह सिलसिला सुबह 5 बजे से 11 बजे तक अनवरत चला। यह अनूठी परम्परा श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में साढ़े तीन सौ वर्ष से भी अधिक समय से चली आ रही है, जो आज भी कायम है। इस मन्दिर के प्रथम महन्त बाबा गोविन्ददास दीक्षित जी के वंशज देवी दीक्षित ने जानकारी देते हुये बताया कि सखी वेष के दर्शन की परम्परा प्रथम महन्त जी के समय ही शुरू हुई थी। ऐसी मान्यता है कि चार धामों की यात्रा श्री जुगुल किशोर जी के दर्शन बिना अधूरी है।

गुलाल का ही मिलता है प्रसाद

परम्परा के अनुसार पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में चैत्र मास की तृतीया को गुलाल का ही प्रसाद श्रद्धालुओं को मिलता है। सखी वेष में भगवान जुगुल किशोर व मुरली मुकुट धारण किये राधिका जी के अलौकिक स्वरूप को निहारने जब महिला श्रद्धालु मन्दिर पहुँचती हैं तो उनका सत्कार गुलाल से ही होता है। आज के दिन सुबह 5 बजे से 11 बजे तक मन्दिर के भीतर सिर्फ महिला श्रद्धालुओं को प्रवेश मिलता है, जहां महिलायें एक-दूसरे को गुलाल लगाकर पूरे भक्ति भाव के साथ फाग और होली गीत गाती हैं। पूरा मन्दिर आज गुलाल के रंग में सराबोर नजर आता है। यहां पर रंगों के पर्व होली की पूरे पाँच दिनों तक धूम रहती है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुु यह गीत गुनगुनाते हुये पन्ना के जुगुल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े हैं होली का उत्सव मनाते हैं।

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Tuesday, March 30, 2021

मामा, पेड़ कट जायेंगे तो हमें सांस लेने में दिक्कत होगी

  •  बच्चों, बूढ़ों और जवानों ने की प्रदेश के मुख्यमंत्री से मार्मिक अपील 
  •  केन-बेतवा प्रोजेक्ट को पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए बताया अभिशाप 

हाँथ में पोस्टर लिए मामा जी से मार्मिक अपील करता मासूम बालक। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। विश्व जल दिवस के मौके पर 22 मार्च को केन बेतवा लिंक परियोजना के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एमओए पर हस्ताक्षर किये थे। बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए डेथ वारंट जारी करने के छठवें दिन ही प्रदेश के मुखिया शिवराज जी रंगों के पर्व होली पर परिवार सहित एकांतवास के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व की वादियों में आ पहुंचे। यहां उन्होंने अकोला बफर के जंगल में बाघों का दीदार भी किया और दीर्घजीवी बृक्ष बरगद के पौधे का रोपण भी किया। चूंकि उनका यह निजी और एकांत प्रवास था, इसलिए वे न तो स्थानीय लोगों से मिले और न ही उनकी समस्याएं सुनीं। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री जी के पन्ना प्रवास के दौरान ही होली पर्व पर पन्नावासियों ने कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए अनूठे अंदाज में मुख्यमंत्री का ध्यान केंद्र बेतवा लिंक परियोजना तथा उसके विनाशकारी परिणाम की ओर आकृष्ट किया जो राष्ट्रीय स्तर पर अब चर्चा का विषय बन चुका है।

वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री जी परिवार सहित जब पन्ना टाइगर रिज़र्व में आये थे, उस समय की तस्वीर। 

अपने हाथों में स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर बूढ़े, बच्चे और जवान जो जहां था वहीं से ही प्रदेश के मुखिया शिवराज जी को होली पर्व की शुभकामनाएं देते हुए उनसे मार्मिक अपील की। पन्नावासियों ने मुख्यमंत्री जी से अनुरोध किया कि कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को दृष्टिगत रखते हुए जिस वनक्षेत्र में आपने परिवार सहित शांति और सुकून के पल बिताये हैं, उस खूबसूरत वनक्षेत्र को कृपा कर उजडऩे से बचायें। विकास के नाम पर बीते 73 सालों में पन्ना को कुछ नहीं मिला, अब कम से कम उसकी प्राकृतिक संपदा को तो सुरक्षित रहने दें। केन नदी न सिर्फ पन्ना टाइगर रिजर्व अपितु बुंदेलखंड क्षेत्र की जीवन रेखा है, जिससे जीव-जंतु, वनस्पतियां, पेड़-पौधे और मानव सभी जीवन पाते हैं। ऐसी जीवनदायी नदी के नैसर्गिक प्रवाह को थाम कर इस अंचल के लोगों की सांसो को अवरुद्ध करने का अपराध मत करें। यहां के लोग आपसे प्यार करते हैं और बच्चे आपको मामा कहते हैं। उनके प्रेम और विश्वास को कायम रखें ताकि आने वाली पीढय़िां भी आपके प्रति सम्मान का भाव रख सकें।


 पन्ना जिले की धरती न सिर्फ रतनगर्भा है अपितु यह ऋषि-मुनियों और साधकों की तपोस्थली भी रही है। यहां का जंगल सुतीक्षण मुनि व अगस्त्य मुनि जैसे ऋषि यों का ठिकाना रहा है, जहां वनवास के समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम भी आशीर्वाद लेने पहुंचे थे। इस धरा की यह तासीर रही है कि यहां के लोग सिर्फ प्रेम और सद्भाव जानते हैं तथा समूचे प्रदेश, राष्ट्र व विश्व की मंगल कामना करते हैं। ऐसे प्रेम पूर्ण और सहज, सरल व प्राकृतिक जीवन जीने वाले लोगों की शांतिपूर्ण जिंदगी में कृपया खलल पैदा न करें। कम से कम इस मासूम बच्चे की अपील पर गौर करें, जो बड़े प्यार से आपको मामा कहते हुए अनुरोध कर रहा है कि प्यारे मामा, इतने पेड़ कट जाएंगे फिर हम लोगों को सांस लेने में दिक्कत होगी न। पन्ना के युवक अपनी भावनाओं का इजहार करते हुए कह रहे हैं कि केन बेतवा प्रोजेक्ट पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए अभिशाप है, कृपा करके इसे रोकें।

 नदी के प्रवाह को रोकने के बजाय धरा को पानीदार बनायें



 नदी के नैसर्गिक प्रवाह को रोकने, लाखों पेड़ पौधों को काटने और एक आबाद व जीवंत वन क्षेत्र को उजाडऩे से किसी का कोई भला नहीं हो सकता। बल्कि इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भोगना पड़ेगा। नदी को हमने नहीं बनाया, यह तो प्रकृति का सृजन है, तो फिर हमें यह अधिकार कहां से मिल गया कि हम मनचाहे तरीके से उसके प्रवाह को बाधित करें। हमारी नासमझी से केन की ही एक सहायक मिढ़ासन नदी मृतप्राय हो चुकी है। इस नदी को पुनर्जीवित करने के लिए आपने एक दशक पूर्व अभियान छेड़ा था, जिसमें 20 करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि भी खर्च हो चुकी है। लेकिन इस नदी की क्या हालत है, कृपया एक बार आकर जरूर देखें।  मिढ़ासन नदी आज भी सुखी और मृत पड़ी है, सिर्फ बारिश में यह नदी बहती नजर आती है। केन की ही सहायक नदी पतने के भी बुरे हाल हैं। इन हालातों में पन्ना टाइगर रिजर्व को जीवन देने वाली केन नदी को बांधना व यहां के खूबसूरत जंगल को उजाडऩा घातक होगा। हमें इस तरह की विनाशकारी परियोजनाओं के जरिए खुशहाली लाने की कथित सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए और इस वसुंधरा को हरा-भरा एवं पानीदार बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिये।

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Sunday, March 28, 2021

प्रकृति भी बाघों का बसेरा उजाडऩे के खिलाफ

  •  बीते तीन माह में ही पीटीआर में जन्मे 13 बाघ शावक 
  •  प्रकृति से मिल रहे संकेतों का सरकार को करना चाहिए सम्मान

बाघों के घर पन्ना टाइगर रिज़र्व के बीच से प्रवाहित होने वाली केन नदी।

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। विंध्य पर्वत श्रेणी में स्थित मध्य प्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व इन दिनों विवादित केन बेतवा लिंक परियोजना को लेकर चर्चा में हैं। परियोजना के अंतर्गत इस रिजर्व के कोर क्षेत्र में 73.40 मीटर ऊंचा और 14 68 मीटर लंबा बांध बनाया जाना है। इस बांध के पानी को 231.45 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए बेतवा नदी तक पहुंचाया जायेगा। शासन की इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना से लोगों को कितना लाभ होगा, यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन इससे पन्ना टाइगर रिजर्व का वजूद जरूर खत्म हो जायेगा। 

उल्लेखनीय है कि पन्ना टाइगर रिजर्व की भौगोलिक संरचना अनूठी है। यहां के घने खूबसूरत जंगलों में राष्ट्रीय पशु बाघ सहित जंगल का राजकुमार कहा जाने वाला तेंदुआ, भालू ,नीलगाय, चिंकारा, चीतल, चौसिंगा, सांभर व सेही जैसे सैकड़ों प्रजाति के जीव जंतुओं सहित 200 से भी अधिक प्रजाति के पक्षी रहते हैं। यहां विलुप्त प्राय गिद्धों की सात प्रजातियां भी निवास करती हैं तथा पन्ना टाइगर रिजर्व के मध्य से प्रवाहित होने वाली केन नदी जो यहां की जीवन रेखा है उसमें घडय़िाल और मगरमच्छ भी पाये जाते हैं। जैव विविधता से परिपूर्ण ऐसे समृद्ध वन क्षेत्र को डुबाकर उसे नष्ट किए जाने की योजना से प्रकृति भी नाखुश दिखाई देती है। पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों का कुनबा जिस गति से बढ़ा है तथा इसके साथ ही शाकाहारी वन्य जीवों की संख्या में इजाफा हुआ है, उससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि प्रकृति इस समृद्ध और खूबसूरत वन क्षेत्र को उजाडऩे के पक्ष में नहीं है। बीते 3 माह के दौरान ही यहां पर 13 बाघ शावकों का जन्म हुआ है। प्रकृति से मिल रहे इन संकेतों को हम कैसे अनदेखा कर रहे हैं ? क्या हम इतने संवेदनहीन और स्वार्थी हो चुके हैं कि प्रकृति की इच्छा का सम्मान करना ही भूल गये हैं। यूनेस्को ने जिस वन क्षेत्र को मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम के तहत बायोस्फीयर रिजर्व की वैश्विक सूची में शामिल किया है, उस अनमोल धरोहर को नष्ट करने की योजना भला कैसे हितकारी साबित होगी ?


पन्ना की यह बाघिन शायद यही कह रही है कि इन जीवनदायी पेड़ों को मत काटो। 

मालुम हो कि हमारे वन, पर्वत और नदियां इस धरती की अमूल्य निधियां और उपहार हैं, जो हमारे जीवन को प्रेम, उत्साह और शक्ति से भरते हैं। ये बिना किसी अपेक्षा के अनवरत रूप से हमें शुद्ध वायु, जल व स्वास्थ्यवर्धक आबोहवा नि:शुल्क प्रदान करते हैं। फिर भी हम अपने निहित स्वार्थों व तात्कालिक लाभ के लिए प्रकृति प्रदत्त इन अनमोल उपहारों का आदर करने के बजाय उनका विनाश करने पर तुले हुए हैं। आखिर यह कैसी बुद्धिमत्ता और समझदारी है ? जिन प्राकृतिक संरचनाओं को हम सृजित नहीं कर सकते उन्हें नष्ट करने का अधिकार हमें कैसे और कहां से मिल गया ? समझदारी तो इसी में है कि हम प्रकृति के इन उपहारों का आदर करें, इनकी सुरक्षा करें, इनके सानिध्य में रहें ताकि स्वस्थ, तनावमुक्त और खुशहाल जीवन जी सकें।

 पूर्व मंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेत्री सुश्री महदेले ने उठाए सवाल 



पर्यावरणविदों ने केन - बेतवा लिंक परियोजना का शुरुआती दौर से ही विरोध किया है तथा इसे प्रकृति और पर्यावरण के लिए घातक बताया है। स्थानीय लोग भी लंबे समय से इस विवादित परियोजना का विरोध करते आ रहे हैं। लेकिन किसी वरिष्ठ भाजपा नेता ने पहली मर्तबे केन-बेतवा लिंक परियोजना पर खुलकर विरोध दर्ज किया है। यह हौसला पन्ना जिले की कद्दावर नेता पूर्व कैबिनेट मंत्री सुश्री कुसुम सिंह महदेले ने दिखाया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए इसे पन्ना जिले के लिए घातक बताया है। सुश्री महदेले ने ट्वीट कर कहा है कि केन - बेतवा नदियों को जोडऩे से पन्ना टाइगर रिजर्व पूरी तरह से उजड़ जायेगा तथा बाघों का रहवास खत्म हो जायेगा। पन्ना में पर्यटन व्यवसाय की संभावनाएं भी क्षीण हो जायेंगी। सुश्री महदेले के इस हौसले और साहसिक पहल की आम जनमानस के बीच जहां सराहना हो रही है, वहीं राजनीतिक हलकों में भी इस परियोजना को लेकर नये सिरे से विचार मंथन शुरू हो गया है।

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Saturday, March 27, 2021

चार शावकों से फिर गुलजार हुआ पन्ना टाइगर रिजर्व

  •  पन्ना की सबसे सुंदर बाघिन टी-6 ने दिया शावकों को जन्म
  •  अपनी मां के साथ चहल-कदमी करते हुए दिखे चारों शावक

लम्बी घास के बीच अपने नन्हे शावकों के साथ बाघिन टी-6 

।। अरुण सिंह ।।  

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व से फिर खुशखबरी मिली है। यहां बाघिन टी-6 ने अपने छठवें लिटर में 4 शावकों को जन्म दिया है। चारों शावक अपनी मां के साथ जंगल में चहल-कदमी करते हुए देखे गये हैं। क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने जानकारी देते हुए आज बताया कि शावकों के साथ बाघिन टी-6 की पहली फोटो शुक्रवार 26 मार्च को प्राप्त हुई है। शावकों की उम्र लगभग 2 से 3 माह की है, जो पूरी तरह से स्वस्थ हैं।

 उल्लेखनीय है कि बाघ पुनर्स्थापना योजना के द्वितीय चरण में पेंच टाइगर रिजर्व की बाघिन टी-6 को 22 जनवरी 2014 में पन्ना लाया गया था। लाइट कलर (गोरे रंग) वाली इस बाघिन को पन्ना टाइगर रिजर्व में सबसे सुंदर बाघिन का रुतबा हासिल है। लगभग 10 वर्ष की हो चुकी इस खूबसूरत बाघिन ने पन्ना टाइगर रिजर्व में आकर यहां बाघों की वंश वृद्धि में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस बाघिन ने यहां अब तक 17 बाघ शावकों को जन्म दिया है। वर्ष 2014 में जब टी-6 को पन्ना लाया गया था तो उसे बाघों के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल व प्रिय इलाके बलैया सेहा में छोड़ा गया था। लेकिन बाद में इस बाघिन ने पन्ना टाइगर रिजर्व के प्राकृतिक रूप से सबसे सुंदर क्षेत्र गहरीघाट रेंज को अपना ठिकाना बना लिया। मौजूदा समय बिना कॉलर वाली यह बाघिन इसी सुरक्षित वन क्षेत्र में अपने शावकों के साथ विचरण कर रही है। 

तीन माह में हुआ 13 शावकों का जन्म 

क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने चार नन्हे शावकों के जन्म पर खुशी का इजहार करते हुए बताया कि बीते 3 माह में यहां पर 13 शावकों का जन्म हुआ है, जो निश्चित ही पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए गर्व और खुशी की बात है। आपने कहा कि आने वाले दिनों में यहां अन्य दूसरी बाघिन भी शावकों को जन्म देने वाली हैं। श्री शर्मा ने बताया कि इन चार शावकों के जन्म से पन्ना में बाघों का कुनबा 70 के पार जा पहुंचा है। मौजूदा समय पन्ना टाइगर रिज़र्व में वयस्क और शावकों सहित 75 के लगभग बाघ हैं। नन्हे शावकों के जन्म से पन्ना टाइगर रिजर्व में खुशी का माहौल है।

अपनी मां के साथ चहल - कदमी करते नन्हे शावकों का वीडियो -


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Friday, March 26, 2021

खनिज समृद्ध राज्यों में मध्यप्रदेश अग्रणी - बृजेन्द्र प्रताप सिंह

  •  हीरा उत्पादन के मामले में प्रदेश को प्राप्त है एकाधिकार 
  •  वित्तीय वर्ष में 5 हजार 156 करोड़ रूपये राजस्व हासिल 

खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना । प्रदेश के खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि भारत के आठ खनिज समृद्ध राज्यों में मध्यप्रदेश अग्रणी राज्य है। हीरा उत्पादन के मामले में प्रदेश को एकाधिकार प्राप्त है। इसके साथ ही ताम्र अयस्क, मैग्नीज उत्पादन में भी अन्य राज्यों से आगे है। रॉक फास्फेट और चूना पत्थर उत्पादन में दूसरे एवं कोयला उत्पादन के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर चैथे स्थान पर है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में खनिज विभाग ने कोरोना जैसी महामारी के दौर में प्रभावी कार्यवाही से इस वित्तीय वर्ष में अब तक 05 हजार 156 करोड़ रूपये से ज्यादा राजस्व हासिल किया है।

प्रदेश में एक वर्ष में अवैध उत्खनन के 973, अवैध परिवहन के 7952 और अवैध भण्डारण के 662 इस प्रकार कुल 9 हजार 587 प्रकरण दर्ज किये गये। इन दर्ज प्रकरणों में निराकृत किये गये 7466 प्रकरणों से विभाग को 30 करोड़ 70 लाख रूपये की राशि अर्थदण्ड के रूप में प्राप्त हुई। इनमें से अवैध उत्खनन से 3 करोड़ 85 लाख, अवैध परिवहन से 24 करोड़ 04 लाख और अवैध भण्डारण की कार्रवाई से 02 करोड़ 81 लाख रूपये की रिकार्ड वसूली हुई।

गौण खनिज नियम में हुए बदलाव से सृजित होंगे रोजगार के अवसर 

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान के सख्त निदेश के परिप्रेक्ष्य में खनिज विभाग ने गौण खनिज नियम 1996 में इसी साल जनवरी माह में बदलाव किया है। इस बदलाव से स्थानीय लोगों को रोजगार के ज्यादा अवसर सृजित होंगे। पट्टाधारी खदानों में प्रदेश के ही 75 प्रतिशत मजदूरों को रोजगार देना जरूरी किया गया है। इसके अलावा नियमों में बदलाव से राजस्व प्राप्ति में भी इजाफा हो सकेगा। गौण खनिज नियम में किये गये बदलाव से निजी और सरकारी भूमि पर गौण खनिज की खदानों की मंजूरी दी जायेगी।

इस संशोधन के पहले के सभी उत्खनन पट्टा और पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति के आवेदन को 22 जनवरी 2021 से निरस्त किये जा चुके हैं। राज्य के बाहर से परिवहन होकर आने वाले गौण खनिजों पर 25 रूपये घन मीटर की दर से विनिमय शुल्क लिया जायेगा। 31 गौण खनिजों की रायल्टी और डेडरेंट की दरें भी पुनरीक्षित हुई है। रेत-बजरी की रायल्टी 125 रूपये प्रति घन मीटर और यांत्रिक क्रिया द्वारा पत्थर से बनाई जाने वाली रेत की रायल्टी 50 रूपये प्रति घन मीटर तय की गई है।

सभी गौण खनिजों के उत्खननपट्टों में पट्टाधारियों को देय रायल्टी के अलावा उसकी 10 प्रतिशत समतुल्य राशि जिला खनिज प्रतिष्ठान मद में लिये जाने का प्रावधान किया गया है। इस राशि का उपयोग खनन प्रभावी क्षेत्रों के विकास में किया जायेगा। संशोधन के फलस्वरूप प्रदेश में अब तक गौण खनिजों से रूपये 07 करोड़ डी.एम.एफ. मद में प्राप्त हो चुके हैं। उत्खननपट्टा आवेदन शुल्क से 5 करोड़ 50 लाख रूपये की राशि प्राप्त हुई है। राज्य के बाहर से आने वाले खनिज वाहनों पर 12 लाख रूपये की राशि राजस्व के रूप में प्राप्त हुई है।

नयी रेत नीति से मिलेगा 1400 करोड़ का वार्षिक राजस्व

प्रदेश में नयी रेत नीति में जिलेवार रेत खदान के समूह बनाकर ई-टेण्डर प्रक्रिया लागू कर दी गई है। इस व्यवस्था से रेत खनन वाले 43 जिलों में से 42 जिलों से राज्य शासन को 01 हजार 400 करोड़ रूपये का सालाना राजस्व अर्जित हो सकेगा।

नर्मदा नदी में मशीनों से रेत खनन पर पूर्णत: प्रतिबंध

प्रदेश की जीवन - रेखा नर्मदा नदी में रेत खनिज का उत्खनन मशीनों से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। अन्य नदियों में रेत खनन में मशीनों का उपयोग करने की अनुमति पर्यावरण स्वीकृति के आधार पर दिये जाने का प्रावधान नयी रेत नीति में किया गया है।

ई-खनिज पोर्टल पर होगा खनिज परिवहन का रजिस्ट्रेशन

विभाग की गतिविधियों को ऑनलाईन करने के लिए वेब पोर्टल ई-खनिज बनाया गया है। इस पोर्टल को परिवहन विभाग से लिंक किया गया है। खनिज परिवहन के लिए पट्टेदार /ट्रांसपोर्टर द्वारा वाहन का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया है।

विभागीय भवनों का निर्माण

खनिज प्रशासन के और अधिक सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से जिला स्तर पर 49 जिलों में खनिज भवन का निर्माण पूर्णं हो चुका है। खनिज नमूनों के रासायनिक विश्लेषण के लिए क्षेत्रीय कार्यालय, जबलपुर में स्थापित प्रयोगशाला में आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध कराये गये हैं।

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Thursday, March 25, 2021

प्राचीन तालाबों से आज भी बुझ रही पन्नावासियों की प्यास

  •  आजादी के 73 सालों में नहीं हो सकी पेयजल की स्थाई व्यवस्था
  •  जीवन के आधार प्राचीन जलाशयों का वजूद भी अब संकट में 

पन्ना शहर के जीवंन का आधार प्राचीन धरमसागर तालाब।  

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। भव्य विशाल मंदिरों और राजाशाही जमाने में निर्मित प्राचीन तालाबों के शहर पन्ना में आबादी बढऩे के साथ ही गर्मी के दिनों में पेयजल संकट गंभीर होने लगा है। आज भी पन्ना शहर के लोग पेयजल के लिए धर्मसागर, लोकपाल सागर व निरपत सागर तालाब के पानी पर ही आश्रित हैं। आजादी के बीते 73 सालों में यहां के जनप्रतिनिधियों ने शहर की पेयजल समस्या का स्थाई समाधान खोजने में कोई रुचि नहीं ली, नतीजतन यही तीन प्राचीन तालाब पन्ना के जीवन का आधार बने हुए हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि इन प्राचीन जलाशयों की सुरक्षा, संरक्षण व सौंदर्यीकरण की सिर्फ चर्चाएं होती रहीं, इस दिशा में ठोस पहल व प्रयास नहीं हुए। फलस्वरुप इन जीवनदायी तालाबों का वजूद ही अब संकट में पड़ गया है।

उल्लेखनीय है कि जीवन के लिए बेहद जरूरी हवा, पानी और पर्यावरण के प्रति हमारा रवैया सम्मानजनक नहीं रहा। हमारी इसी सोच का फायदा दूसरे जिलों व प्रांतों के लोग उठाने का भरसक प्रयास अतीत में भी करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना इसका जीवंत उदाहरण है। बीते 73 सालों में हम 18 किलोमीटर दूर से केन नदी का स्वच्छ जल पन्नावासियों की प्यास बुझाने के लिए नहीं ला सके और केन का पानी 200 किलोमीटर से भी अधिक दूर बेतवा में ले जाने की योजना बना ली गई। इस बहुचर्चित और विवादित परियोजना से पन्ना जिले को क्या लाभ होगा यह तो अभी नहीं पता लेकिन इतना सुनिश्चित है कि इससे पन्ना की अनमोल प्राकृतिक धरोहर नष्ट हो जायेगी। लाखों की संख्या में पेड़ कटेंगे, जिससे राष्ट्रीय पशु बाघ सहित अन्य दूसरे प्राणियों का जीवन संकट में पड़ जायेगा। इसका परिणाम यह होगा कि पन्ना में पर्यटन विकास की जो उम्मीदें जागी हैं, वे भी खत्म हो जायेंगी। जंगल कटने से पर्यावरण को भारी नुकसान होगा और यहां का तापमान जो इतने जंगल के रहते गर्मियों में 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचता है, वह यदि 50 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचे तो कोई आश्चर्य नहीं है। इन हालातों में मंदिरों के शहर पन्ना में जीवन दुश्वार हो जायेगा।

अतिक्रमण का शिकार हो रहे प्राचीन तालाब 


चौतरफा अतिक्रमण की गिरफ्त में आ चुके लोकपाल सागर तालाब का द्रश्य। 

पन्ना शहर के तीनों जीवनदायी तालाबों का वजूद अतिक्रमण के चलते संकट में है। पन्ना-पहाड़ीखेरा मार्ग पर शहर के निकट 492 एकड़ क्षेत्र में लोकपाल सागर तालाब का निर्माण तत्कालीन पन्ना नरेश महाराजा लोकपाल सिंह द्वारा कराया गया था। उस समय यह तालाब कम बारिश में भी लबालब भर जाता था, जिससे शहर में पेयजल की आपूर्ति के साथ-साथ इस क्षेत्र में फसलों की सिंचाई भी हो जाती थी। लेकिन सतत उपेक्षा के चलते इस तालाब के कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण होता गया, फलस्वरूप अब यह तालाब भर ही नहीं पाता। तालाब न भर पाने से किसानों को जहां पर्याप्त पानी नहीं मिलता, वहीं पेयजल संकट से भी जूझना पड़ता है। कमोबेश यही हालत शहर के प्राचीन धर्मसागर तालाब व निरपत सागर तालाब की भी है। प्रशासनिक अनदेखी के चलते अतिक्रमण का जाल फैलने से इन उपयोगी जीवनदायी तालाबों का मूल स्वरूप ही तहस-नहस हो गया है।

अधर में लटका किलकिला फीडर का कार्य 

शहर के धर्मसागर व लोकपाल सागर तालाब को बारिश के पानी से लबालब भरने के लिए किलकिला फीडर नहर का पूर्व में निर्माण कराया गया था। जिससे दोनों तालाब अल्प वर्षा होने पर भी भर जाते थे। लेकिन अनदेखी व लापरवाही के कारण यह नहर पूरी तरह अतिक्रमण की चपेट में आ गई, जिससे किलकिला फीडर से तालाबों को भरने की व्यवस्था बाधित हो गई। नगरवासियों की मांग पर शासन द्वारा किलकिला फीडर नहर को पुन: चालू करने के लिए 6 करोड रुपए की राशि स्वीकृत की गई थी। फलस्वरुप बीते साल किलकिला फीडर का कार्य शुरू हुआ लेकिन कुछ माह बाद ही इसका काम जो रुका तो अभी तक चालू नहीं हो सका है। यदि यही रवैया रहा तो आने वाली बारिश में भी तालाब खाली रह जाएंगे। क्योंकि राशि स्वीकृत होने के बावजूद किलकिला फीडर का काम अधर में लटका हुआ है।

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Tuesday, March 23, 2021

बाघों का घर डुबाने वाली परियोजना पर हुआ समझौता

  •  पन्ना की खुशहाली, विकास और हितों को क्यों किया जा रहा नजरअंदाज 
  •  समझौता होने पर लोग पूछ रहे, जब उजाडऩा ही था तो फिर बसाया क्यों ? 


पन्ना टाईगर रिजर्व के बीच से गुजरने वाली केन नदी जिस पर बांध बनना है। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बुंदेलखंड क्षेत्र के सबसे पिछड़े और उपेक्षित पन्ना जिले के हितों तथा यहां के लोगों की खुशहाली को हमेशा क्यों नजरअंदाज किया जाता है ? अंग्रेजों के जमाने में यहां केन नदी पर बने बरियारपुर डैम का पानी पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पहुंचता रहा और पन्ना जिले के किसान सिर्फ सूखे की विभीषिका से जूझने को विवश रहे। अब तो इस जिले की प्राकृतिक संपदा जो यहां के जीवन का आधार है, उसे भी नष्ट करने का जतन किया जा रहा है। विश्व जल दिवस पर सोमवार 22 मार्च को केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए (एमओए) मेमोरेंडम आफ एग्रीमेंट पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस समझौते के साथ ही पन्ना टाइगर रिजर्व के बाघों, जीव-जंतुओं के आशियाना को डुबोने तथा लाखों पेड़ पौधों को नष्ट करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इतनी बड़ी कुर्बानी देने के बाद पन्ना जिले के लोगों को क्या मिलेगा, यह बताने वाला कोई नहीं है।

उल्लेखनीय है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत ढोंढन गाँव के पास केन नदी पर प्रस्तावित बांध का यदि निर्माण कराया गया तो पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र का बड़ा हिस्सा डूब जायेगा। डूब में आने वाला घने जंगल से आच्छादित यह वन क्षेत्र राष्ट्रीय पशु बाघ व विलुप्ति की कगार में पहुँच चुके गिद्धों का प्रिय रहवास है। बांध बनने पर इस वन क्षेत्र के तक़रीबन 25 लाख से भी अधिक वृक्षों का सफाया हो जायेगा। इस परियोजना के मूर्त रूप लेने में दो से ढाई दशक लगेंगे जिसमें हजारों करोड़ रू. जहां खर्च होंगे वहीं भारी भरकम मशीनों का जहां उपयोग होगा वहीं हजारों मजदूर भी वन्य प्राणियों के इस रहवास में कार्य करेंगे। इन हालातों में यहां नैसर्गिक  जीवन जीने वाले वन्य प्राणी कैसे रह पायेंगे ? इस बीच पर्यावरण को कितना नुकसान होगा तथा केन नदी का नैसर्गिक  प्रवाह थमने से नीचे के सैकड़ो ग्रामों के लोगों को किस तरह के दुष्परिणाम भोगने पडेंग़े, इस बात का अंदाजा लगा पाना फ़िलहाल मुश्किल है। 


मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर व बफर क्षेत्र में 60 से भी अधिक बाघ स्वच्छन्द रूप से विचरण कर रहे हैं।  समूचे बुन्देलखण्ड में एक मात्र बाघों का शोर्स पापुलेशन पन्ना टाईगर रिजर्व में विद्यमान है। वर्ष 2009 में यहां का जंगल बाघ विहीन हो गया था फलस्वरूप बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर से बसाने के लिये बाघ पुनर्स्थापना  योजना शुरू की गई। जिसे उल्लेखनीय सफलता मिली और बाघ विहीन यह जंगल फिर से आबाद हो गया। मालुम हो कि बढ़ती आबादी के दबाव में पन्ना जिले का सामान्य वन क्षेत्र तेजी से उजड़ रहा है। सिर्फ पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र जो 542 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है काफी हद तक सुरक्षित है। लेकिन इसे भी उजाडऩे की तैयारी की जा रही है जो पर्यावरणीय दृष्टि से दुर्भाग्यपूर्ण है। समझौता होने पर लोग पूछ रहे हैं कि पन्ना टाइगर रिज़र्व में बाघों के उजड़ चुके संसार को अथक मेहनत और करोङों रुपये खर्च कर जब आबाद कर दिया गया और पर्यटन विकास की उम्मीद जागी तब फिर उसे क्यों उजाड़ा जा रहा है। जब उजाडऩा ही था तो फिर बसाया क्यों ? 

नदी जोड़ परियोजना से अनभिज्ञ हैं केन किनारे स्थित ग्रामों के लोग

केन नदी के किनारे स्थित ग्रामों के रहवासी विस्थापन का दंश नहीं अपितु मूलभूत सुविधायें और विकास चाहते हैं। पूरे 33 दिनों में 600 किमी लम्बी दूरी तय करके केन परिक्रमा करने वाले सिद्धार्थ अग्रवाल व भीम सिंह रावत ने बेहद चौंकाने वाले तथ्य उजागर किये हैं। आप लोगों ने बताया कि पन्ना से लेकर बांदा तक केन नदी के किनारे बसे अधिकांश ग्रामों के लोगों को केन-बेतवा लिंक परियोजना के संबंध में कोई भी जानकारी नहीं है। इन ग्रामीणों में नदी पर आश्रित किसान, मल्लाह, मछुआरे व पशुपालक शामिल हैं।

 केन्द्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में तटवर्ती ग्रामों के लोग यह सोचते हैं कि केन का पानी बेतवा में और बेतवा का पानी केन में डाला जायेगा, जिससे बाढ़ नहीं आयेगी। बाढ़ की विभीषिका अनेकों बार झेल चुके लोग इस भ्रान्ति के चलते निश्चिंत थे कि नदी जोड़ योजना से उनके जीवन में कोई खलल नहीं पड़ेगा, अपितु बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति मिल जायेगी। जबकि वास्तव में इस योजना से केवल केन नदी का पानी बेतवा में डाला जायेगा, बेतवा का पानी केन में नहीं आयेगा। पदयात्रियों ने ग्रामीणों को जब इस तथ्य से अवगत कराया तो वे हैरान रह गये। हकीकत जान ग्रामीण अपने को अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और कहते हैं कि यदि ऐसा है तो नदी जोड़ परियोजना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि केन हमारी जिन्दगी है। 

केन-बेतवा समझौते से बर्बाद होगा पन्ना टाइगर रिजर्व : जयराम रमेश

 


केन व बेतवा नदियों को जोडऩे वाली परियोजना के सम्बंध में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने से पहले ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि पुनरुद्धार और विकास की इस कहानी को लिखे जाने के दौरान मध्यप्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोमवार को ट्वीट कर कहा कि केन और बेतवा नदी को लेकर उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों के बीच होने वाला समझौता हस्ताक्षर भले ही विकास की गाथा नहीं लिखे लेकिन इससे पन्ना टाइगर रिजर्व ध्वस्त हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि रिलोकेशन और पुनरुद्धार की इस योजना के विकल्प के तौर पर दस साल पहले भी उन्होंने उपाय सुझाये थे, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया है। 

शिवराज सरकार ने दबाव में प्रदेश के हितो के साथ समझौता किया : कमलनाथ 

वर्षों से लंबित केन-बेतवा लिंक परियोजना का एमओयू हस्ताक्षर होना स्वागत योग्य , इस परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र का विकास होगा लेकिन केन्द्र की मोदी सरकार के दबाव में शिवराज सरकार ने अनुबंध की शर्तों के विपरीत कई मुद्दों पर झुककर प्रदेश के हितो के साथ समझौता किया है। इस योजना की शुरुआत वर्ष 2005 से हुई थी , 2008 में इसका खाका तैयार हुआ था , वर्षों से यह परियोजना लंबित थी , वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस परियोजना के अमल को लेकर केंद्र सरकार को निर्देश दिए थे।

इस परियोजना में तय अनुबंध  की शर्तों के विपरीत मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में पानी के बंटवारे लेकर मुख्य विवाद था। मध्यप्रदेश रबी सीजन के लिए  700 एमसीएम पानी उत्तप्रदेश को देने पर सहमत था लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा अधिक मात्रा में  पानी देने का दबाव बनाया जा रहा था ,जबकि इस परियोजना से हमारे प्रदेश के कई गाँव , जंगल डूब रहे है , डूबत क्षेत्र के कई गाँवो का विस्थापन हमें करना पड़ेगा ,पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र की 5500 हेक्टेयर जमीन सहित करीब 9 हज़ार हेक्टेयर जमीन डूब में आ रही है , हमारा बड़ा क्षेत्र डूब रहा है ,कुछ पर्यावरण आपत्तियाँ भी थी , इस परियोजना से उत्तरप्रदेश को मध्यप्रदेश के मुक़ाबले अधिक लाभ होना है , इसलिये वर्षों से कई मुद्दों पर हमारी आपत्ति थी, लेकिन शिवराज सरकार ने मोदी सरकार के दबाव में कई मुद्दों पर झुककर प्रदेश के हितो के साथ समझौता किया है , प्रदेश हित के मुद्दों की अनदेखी की है। शिवराज सरकार को इस परियोजना को लेकर प्रारंभ में तय अनुबंधों की शर्तों , विवाद के प्रमुख बिंदुओ , इस परियोजना में मध्यप्रदेश के हितो की अनदेखी , नुक़सान पर ली गयी आपत्तियों व वर्तमान एमओयू में तय शर्तों की जानकारी सार्वजनिक कर प्रदेश की जनता को वास्तविकता बताना चाहिये।

लिंक परियोजना से जुड़े कुछ तथ्य

0  बुन्देलखण्ड क्षेत्र की जीवनदायिनी केन नदी की कुल लम्बाई 427 किमी है।

0  जहां बांध बन रहा है वहां से केन नदी की डाउन स्ट्रीम की लम्बाई 270 किमी है।

0  बांध की कुल लम्बाई 2031 मीटर जिसमें कांक्रीट डेम का हिस्सा 798 मीटर

व मिट्टी के बांध की लम्बाई 1233 मीटर है। बांध की ऊँचाई 77 मीटर है।

0  ढोढऩ बांध से बेतवा नदी में पानी ले जाने वाली लिंक कैनाल की लम्बाई 220.624 किमी होगी।

0  बांध का डूब क्षेत्र 9 हजार हेक्टेयर है, जिसका 90 फीसदी से भी अधिक क्षेत्र पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में निहित है।

0  105 वर्ग किमी. का कोर क्षेत्र जो छतरपुर जिले में है, डूब क्षेत्र के कारण विभाजित हो जायेगा। इस प्रकार कुल 197 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र डूब व विभाजन के कारण नष्ट हो जायेगा।

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Saturday, March 20, 2021

विश्व गौरैया दिवस : आओ, नन्ही चिडिय़ा को बचाने लें संकल्प

  • घर आँगन से गायब हो रही है खूबसूरत चिडिय़ा गौरैया
  • देकर थोड़ा दाना-पानी गौरैया को प्यार से बुलाना होगा
  • हमारी छोटी सी कोशिश दे सकती है गौरैया को जीवनदान 

हमारे घर आँगन की पहचान व रौनक नन्हीं चिडिय़ा गौरैया। 

।। अरुण सिंह ।।  

पन्ना।  आज 20 मार्च है, यह  घर-आंगन में दिन उगने के साथ ही इधर - उधर फुदकने वाली नन्हीं चिडिय़ा गौरैया का दिन है। डेढ़ दो दशक पहले तक घरों के आसपास बहुलता से नजर आने वाली नन्हीं चिडिय़ा गौरैया की चहचहाहट अब गुम हो रही है। गौरैया की घटती संख्या को देखते हुए ही इसके संरक्षण के लिए "विश्व गौरैया दिवस" पहली बार वर्ष 2010 में मनाया गया। आबादी के भीतर हमारे बीच रहने वाला यह खूबसूरत पक्षी आखिर अब कम क्यों नजर आ रहा है, गौरैया का कम होना कहीं बिगड़ते प्राकृतिक संतुलन की ओर इशारा तो नहीं है।

 हमें इन मिलते इशारों से समय रहते सबक लेकर गौरैया पक्षी के संरक्षण व उसे बचाने की दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिये ताकि घर-आंगन की रौनक बनी रहे। आज विश्व गौरैया दिवस है जिसके बहाने गौरैया से जुड़ी यादें सोशल मीडिया पर भी लोग बड़े ही भावनात्मक अंदाज में साझा कर रहे हैं जो इस बात का संकेत है कि इस नन्ही चिडिय़ा का लोगों से कितना जुड़ाव है। यह जुड़ाव महज औपचारिक न रहे बल्कि इसे हम मिलकर सार्थकता प्रदान करें, तभी गौरैया दिवस मनाने का उद्देश्य पूरा होगा।  




उल्लेखनीय है कि 20 मार्च को हर वर्ष विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। तेजी के साथ गुम हो रहे इस पक्षी के संरक्षण व इसे बचाने के लिये लोगों में जागरूकता लाने के मकसद से यह पहल शुरू की गई है, लेकिन अभी भी अधिसंख्य लोग इस रचनात्मक पहल के प्रति गंभीर व संवेदनशील नहीं हैं। जरा सोचिये यदि हमारे घर व आंगन में हर समय फुदक - फुदक  कर दाना चुगने व चहचहाने वाली गौरैया गुम हो जाये तो हमें कैसा लगेगा? इस नन्हें परिंदे की गैर मौजूदगी के क्या मायने होंगे तथा उसका हमारे जीवन और पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा? इन सारे पहलुओं पर चिंतन जरूरी हो गया है ताकि समय रहते वे सारे उपाय किये जा सकें जिससे गायब होती गौरैया को बचाया जा सके।

मौजूदा समय गौरैया पक्षी अपने अस्तित्व को बचाने के लिये मनुष्यों और अपने आस-पास के वातावरण से जद्दोजहद कर रही है। ऐसे समय में हमें इन पक्षियों के लिये वातावरण को इनके अनुकूल बनाने में सहायता प्रदान करनी चाहिये ताकि इनकी चहचहाहट कायम रहे। गौरैया का कम होना एक तरह का इशारा है कि हमारी आबोहवा, हमारे भोजन और हमारी जमीन में कितना प्रदूषण फैल गया है। कीटनाशकों का अधाधुंध प्रयोग होने से पक्षियों पर क्या असर हो रहा है, इसकी कोई चिन्ता और फिक्र नहीं की जा रही है। पहले तो पेड़ कटते थे, लेकिन अब जंगल कट रहे हैं। पेडों की जगह बिजली के खम्भों, मोबाइल टावर्स तथा बहुमंजिली इमारतों ने ले ली है। इंसान ने बढ़ती आबादी के लिये तो जगह बनाई लेकिन न जाने कितने पशु - पक्षी इसके चलते बेघर हो रहे हैं, उनका दाना-पानी छिन रहा है। 

विचारणीय बात यह है कि आये दिन राजनैतिक, धार्मिक व सामाजिक मुद्दों पर गर्मा गरम बहस होती है, लेकिन प्रकृति, पर्यावरण तथा जीवन से जुड़े अहम् मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती। इसी से पता चलता है कि हमारी प्राथमिकतायें क्या हैं। आज पूरी मनुष्यता जिस तरह के संकट का सामना कर रही है, उसके पीछे कहीं न कहीं प्रकृति से हमारे प्रेम भाव और तादात्म का कम हो जाना है। हमेशा झुण्ड में आबादी के अन्दर रहने वाले गौरैया पक्षी की तेजी के साथ घटती संख्या को हर कोई महसूस करता है लेकिन गौरैया को बचाने तथा उसके लिये अनुकूल वातावरण व आबोहवा तैयार करने के लिये बहुत ही कम लोग आगे आ रहे हैं। 

कहा जाता है कि किसी भी प्रजाति को यदि खत्म करना हो तो उसके आवास और उसके भोजन को खत्म कर दो। कहीं गौरैया पक्षी के साथ भी यही तो नहीं हो रहा। घास के बीज, अनाज के दाने और कीडे-मकोडे गौरैया का मुख्य भोजन है, जो पहले उसे घरों में मिल जाता था, लेकिन अब शायद ऐसा नहीं है। गौरैया चिडिय़ा बहुत ही संवेदनशील पक्षी है, मोबाइल फोन तथा उनके टावर्स से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन से भी उनकी आबादी पर असर पड़ रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण से हो रहे खिलवाड़ के बावजूद प्रकृति ने हर जीव को विपरीत परिस्थितियों में जिन्दा रहने की क्षमता प्रदान की है, यही वजह है कि गौरैया की चहक आज भी हम सुन पा रहे हैं। लेकिन यह चहक हमेशा बनी रहे इसके लिये सजगता और संवेदशीनता जरूरी है।

हरियाली और जंगल इन्हीं चिडिय़ों की देन

परिंदे प्रकृति की अनुपम सौगात हैं, इनके बिना यह जग सूना और बेरौनक हो जायेगा। हरियाली और जंगल इन्हीं चिडिय़ों की देन है, ये परिंदे ही जंगल बनाते हैं। तमाम प्रजातियों के वृक्ष तो तभी उगते हैं जब कोई परिंदा इन वृक्षों के बीजों को खाता है और वह बीज उस पक्षी की आहारनाल से पाचन की प्रक्रिया से गुजरकर जब कहीं गिरता है तभी उसमें अंकुरण होता है। फलों को खाकर धरती पर इधर - उधर बिखेरना और परागण की प्रक्रिया में सहयोग देना इन्हीं परिन्दों का अप्रत्यक्ष योगदान है। कीट पतंगों की तादाद पर यही परिंदे नियंत्रण करते हैं। विश्व गौरैया दिवस पर आईये हम सब इस खूबसूरत चिडिय़ा को बचाने की शपथ लें। यह नन्ही चिडिय़ा कहीं गई नहीं है बस रूठ गई है। हमें उसे मनाना होगा देकर थोड़ा दाना-पानी प्यार से बुलाना होगा।

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Friday, March 19, 2021

पन्ना के जंगलों में रहते थे आदिमानव

  •  पहाड़ों की गुफाओं व चट्टानों में आखेट के दुर्लभ भित्त चित्र मौजूद
  •  प्राचीन धरोहरों से समृद्ध जंगल बन सकते हैं पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

पन्ना जिले के घने जंगल जहाँ की पहाड़ियों व कंदराओं में रहते थे आदिमानव। 

।। अरुण सिंह ।।   

 पन्ना।  मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में स्थित घने जंगलों और पहाड़ों की कंदराओं में हजारों वर्ष पूर्व आदिमानव निवास करते रहे हैं। यहां के पहाड़ों व घने जंगलों के बीच स्थित गुफाओं में मिले आखेट के दुर्लभ चित्रों से यह साबित होता है कि हजारों साल पहले भी यहां पर मानव आबादी थी। जिनके द्वारा चट्टानों और कंदराओं में प्राकृतिक रंगों से आखेट के ऐसे चित्र बनाये गये हैं। 

जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 18 किलोमीटर दूर पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगल में जरधोआ गांव के निकट पहाड़ों की चट्टानों व गुफाओं में प्राचीन भित्ति चित्र आज भी मौजूद हैं। भित्ति चित्र (रॉक पेंटिंग) कितने प्राचीन हैं, इसका पता लगाने के लिए जानकारों व विषय विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए। ताकि यहां के दुर्लभ प्राचीन भित्ति चित्रों का संरक्षण हो सके। पन्ना टाइगर रिजर्व के घने जंगलों में दर्जनों की संख्या में ऐसी गुफाएं मौजूद हैं, जहां हजारों वर्ष पूर्व आदिमानव निवास करते रहे हैं। यहां की गुफाओं व पहाड़ों की शेल्टर वाली चट्टानों पर उस समय के आदिमानवों की जीवनचर्या का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है। भित्ति चित्रों में वन्यजीवों के साथ-साथ शिकार करने के दृश्य भी दिखाये गये हैं।

जरधोआ गांव के निकट जंगल की पहाड़ी में चट्टानों पर बने प्राचीन भित्ति चित्र। 

 यहां नजर आने वाले भित्ति चित्रों में वन्यजीवों का शिकार करने के लिए आदि मानव द्वारा तीर कमान का उपयोग किया गया है। चित्रों से यह स्पष्ट नहीं होता कि तीर की नोक लोहे की है या फिर इनको नुकीले पत्थर अथवा हड्डी से तैयार किया गया है। यदि तीर के नोक लोहे से निर्मित नहीं हैं, तो भित्ति चित्र पाषाण काल के हो सकते हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व के अलावा जिले के अन्य क्षेत्रों में भी इस तरह के भित्तिचित्र मिले हैं। 

जानकारी के मुताबिक बराछ की पहाड़ी, बृहस्पति कुंड की गुफाओं तथा सारंग की पहाड़ी में भी कई स्थानों पर आदिमानवों द्वारा बनाई गई पेंटिंग मौजूद हैं। लेकिन दुर्भाग्य से अभी तक शासन व प्रशासन का ध्यान इन प्राचीन धरोहरों के संरक्षण की ओर नहीं गया, जिससे इन अमूल्य धरोहरों के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। वन व पर्यावरण का संरक्षण करने के साथ-साथ यदि इन दुर्लभ भित्ति चित्रों को भी संरक्षित किया जाय तो इन प्राचीन धरोहरों से समृद्ध पन्ना के जंगल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।

दुर्लभ भित्त चित्रों का संरक्षण जरूरी

पर्यावरण संरक्षण के हिमायती व वन्य जीव प्रेमी हनुमंत सिंह का कहना है कि पन्ना के जंगलों में मिले भित्ति चित्र हजारों वर्ष पुराने हैं। इन भित्ति चित्रों का हर हाल में संरक्षण होना चाहिए। क्योंकि इन दुर्लभ धरोहरों से मानव विकास के इतिहास का ज्ञान होता है। आने वाले समय में इन भित्ति चित्रों का पर्यटन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहेगा।

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Tuesday, March 16, 2021

पन्ना के सकरिया हवाई पट्टी में उतरते थे इंडियन एयरलाइंस के विमान

  •  तत्कालीन पन्ना नरेश महाराजा यादवेंद्र सिंह जूदेव ने वर्ष 1929 में कराया था सकरिया हवाई पट्टी का निर्माण 
  •  पन्ना जिले की पूर्व कलेक्टर दीपाली रस्तोगी के प्रयासों से 13 वर्ष पूर्व फिर यहां पर एयरपोर्ट के निर्माण की हुई थी पहल
  •  नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों ने हेलीकॉप्टर से सकरिया पहुंचकर हवाई पट्टी का किया था निरीक्षण

हेलीकॉप्टर से जब सकरिया हवाई पट्टी का निरीक्षण करने पहुंचे नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारी। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बेशकीमती हीरा की खदानों, घने जंगलों और भव्य प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में आजादी से पहले इंडियन एयरलाइंस के विमान उतरते रहे हैं। जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 12 किलोमीटर दूर पन्ना-सतना मुख्य सड़क मार्ग के किनारे स्थित सकरिया हवाई पट्टी में उतरने वाले विमानों से विदेशी पर्यटक आते थे और फिर यहां से बस में सवार होकर खजुराहो जाते थे। बाद में जब खजुराहो में एयरपोर्ट का निर्माण हो गया तो पन्ना जिले के सकरिया हवाई पट्टी का उपयोग बंद हो गया। लेकिन 13 वर्ष पूर्व तत्कालीन पन्ना कलेक्टर दीपाली रस्तोगी की पहल व प्रयासों से एक बार फिर सकरिया में एयरपोर्ट के निर्माण की उम्मीद जगी थी। उस समय नागरिक उड्डयन विभाग के आला अधिकारी हेलीकॉप्टर से यहां आकर सकरिया हवाई पट्टी का निरीक्षण भी किया था। लेकिन दीपाली रस्तोगी का स्थानांतरण होने के बाद पन्ना जिले के विकास से जुड़ा यह महत्वपूर्ण मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया, फिर किसी ने भी इस मामले की खोज खबर नहीं ली।

 

मौके पर नक्शा देखकर हवाई पट्टी की भूमि का आकलन करते अधिकारी। (फाइल फोटो -अरुण सिंह) 

उल्लेखनीय है कि विश्व धरोहरों की श्रेणी में आने वाले खजुराहो के चंदेल कालीन मंदिरों की सुरक्षा व उनके संरक्षण को दृष्टिगत रखते हुए खजुराहो एयरपोर्ट को आसपास कहीं अन्यत्र शिफ्ट किए जाने की जब बात हो रही थी। उस समय तत्कालीन पन्ना कलेक्टर दीपाली रस्तोगी ने पन्ना जिले की सकरिया हवाई पट्टी जहां पूर्व में विमान उतरते रहे हैं, उसे इसके लिए सबसे उपयुक्त बताते हुए यहां पर एयरपोर्ट के निर्माण की वकालत की थी। उन्होंने नागरिक उड्डयन विभाग को इस आशय का प्रस्ताव दिया था कि खजुराहो एयरपोर्ट का सबसे बेहतर विकल्प पन्ना शहर के निकट स्थित सकरिया हवाई पट्टी है, जहां अत्याधुनिक एयरपोर्ट का निर्माण बिना किसी बाधा के किया जा सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित होने के कारण पर्यटकों को भी यहां से खजुराहो जाने में कोई असुविधा नहीं होगी। महज एक घंटे में सकरिया से खजुराहो पहुंचा जा सकता है।

 सकरिया हवाई पट्टी के आधिपत्य में है 34 हेक्टेयर भूमि 


तत्कालीन पन्ना कलेक्टर दीपाली रस्तोगी। 

सकरिया हवाई पट्टी के निरीक्षण हेतु मार्च 2007 में जब नागरिक उड्डयन विभाग के आला अधिकारी यहां आये थे, उस समय पूरा रिकॉर्ड खंगाला गया था। कलेक्टर दीपाली रस्तोगी ने नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों को बताया था कि सकरिया हवाई पट्टी के आधिपत्य में लगभग 34 हेक्टेयर भूमि है तथा इससे लगी वन भूमि है, जिसका जरूरत के अनुरूप अधिग्रहण किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में एक अत्याधुनिक और सर्व सुविधा युक्त एयरपोर्ट के निर्माण हेतु जितनी भूमि व एरिया की जरूरत होगी, वह यहां पर मौजूद है। स्थल का लोकेशन भी एयरपोर्ट के लिहाज से अति उत्तम है।

सिर्फ 60 रुपये था दिल्ली से पन्ना तक विमान का किराया

 राजाशाही जमाने में निर्मित सकरिया हवाई पट्टी में वर्ष 1962 तक इंडियन एयरलाइंस के विमान उतरते रहे हैं। खजुराहो भ्रमण के लिए आने वाले पर्यटक उस समय हवाई जहाज से सकरिया उतरते थे और फिर यहां से सड़क मार्ग द्वारा खजुराहो जाते थे। जानकारों का यह कहना है कि उस जमाने में दिल्ली से पन्ना तक हवाई जहाज का किराया सिर्फ 60 रुपये हुआ करता था। सकरिया हवाई पट्टी का निर्माण कब व किसके द्वारा कराया गया, इसकी खोजबीन किए जाने पर पन्ना राज परिवार के वरिष्ठ सदस्य पूर्व सांसद स्वर्गीय लोकेंद्र सिंह जी ने बताया था कि सकरिया हवाई पट्टी का निर्माण महाराजा यादवेंद्र सिंह जूदेव ने वर्ष 1929 में कराया था।

 सकरिया एयरपोर्ट का भवन खंडहर में तब्दील

 

पन्ना जिला मुख्यालय के निकट स्थित सकरिया हवाई पट्टी का खण्डहर हो चुके भवन का द्रश्य। 

पन्ना जिले के सकरिया एयरपोर्ट में जब विमान उतरते थे, उस समय यहां पर एक शानदार भवन और कार्यालय भी था। जो देखरेख के अभाव में अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। हवाई पट्टी में अब उस भवन के सिर्फ अवशेष बचे हैं। बताते हैं कि हवाई पट्टी का निर्माण होने के बाद आजादी से पूर्व यहां पर अंग्रेज अधिकारी व विभिन्न रियासतों के राजा हवाई जहाज से आते थे। 

जयपुर के महाराज मानसिंह तो अक्सर ही शिकार खेलने के लिए यहां आते थे। आजादी के बाद जब राजाशाही खत्म हो गई, उस समय भी इस हवाई पट्टी का उपयोग होता रहा है। लेकिन बीते 60 वर्षों से यह हवाई पट्टी उपेक्षित पड़ी हुई है। यदि क्षेत्रीय सांसद बीडी शर्मा इस ओर ध्यान दें और सकरिया में एयरपोर्ट के निर्माण हेतु सार्थक पहल व प्रयास करें तो पर्यटन के विकास की असीम संभावनाओं वाले पन्ना जिले का भाग्योदय हो सकता है।

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Monday, March 15, 2021

हीरों की नीलामी में पहले दिन बिके 36 लाख के हीरे

नीलामी में रखे हीरों का अवलोकन करते हीरा व्यवसाई। 

अरुण सिंह,पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की उथली खदानों से प्राप्त हीरों की नीलामी सुरक्षा व्यवस्था के बीच आज से कलेक्टर संजय कुमार मिश्र की उपस्थिति में प्रारंभ हुई। पहले ही दिन नीलामी में 65.81 कैरेट वजन के 65 हीरे 35 लाख 89 हजार रुपये में बिके हैं।  

 पहले दिन की नीलामी के बाद हीरा कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार आज की नीलामी में 141 थान हीरे रखे गये थे। जिनका वजन 129.11 कैरेट है। नीलामी में रखे गये इन हीरों में 65 नग हीरों की बिक्री 35 लाख 89 हजार रुपये में हुई है। मालुम हो कि  हीरा कार्यालय में उथली खदानों से प्राप्त अब तक 255 थान हीरे जमा हुए हैं। जिनका वजन 253.06 कैरेट है। इन हीरों की अनुमानित कीमत एक करोड 42 लाख 95 हजार 48 रूपये है। हीरों की इस नीलामी में हाल ही में मिले तीन कीमती हीरों को भी रखा गया है, इन हीरों पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। हीरा अधिकारी रवि कुमार पटेल ने बताया कि नीलामी की प्रक्रिया कुल हीरा नीलाम होने तक संचालित की जायेगी, जिसके बुद्धवार 17 मार्च तक चलने की सम्भावना है। 

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Sunday, March 14, 2021

बाघिन जिसने बचाया पन्ना के बाघों की मूल नस्ल

  •  इसीलिए टी-2 को कहते हैं पन्ना की सफलतम रानी 
  •  हवाई मार्ग से मार्च 2009 में पहुंची थी कान्हा से पन्ना 
  •  ब्रीडिंग बाघिनों में सर्वाधिक शावकों को दिया है जन्म
  •  पन्ना को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में रहा अहम योगदान 

पन्ना की सफलतम बाघिन टी-2 अपने शावकों के साथ। 
।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। मध्यप्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व जिसे वर्ष 2009 में बाघ विहीन घोषित किया गया था, वहां टी-2 इकलौती बाघिन है जिसने पन्ना के बाघों की मूल नस्ल को बचाने में कामयाब हुई है। इसलिए यह बाघिन पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए खास महत्व रखती है। पन्ना टाइगर रिजर्व को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में भी इस बाघिन का सबसे महत्वपूर्ण और अहम योगदान रहा है। यही वजह है कि इस बाघिन को पन्ना की सफलतम रानी कहा जाता है। बाघ पुनर्स्थापना योजना के तहत वायु सेना के हेलीकॉप्टर से इस बाघिन को 9 मार्च 2009 में कान्हा से पन्ना लाया गया था। पन्ना में कामयाबी का पताका फहराने वाली इस बाघिन ने यहां अन्य दूसरी ब्रीडिंग बाघिनों की तुलना में सर्वाधिक शावकों को जन्म दिया है।  

बाघिन टी-2 के शावक अपनी मां के साथ जल विहार का आनंद लेते हुए। 

 उल्लेखनीय है कि पन्ना की सफलतम रानी बाघिन टी-2 ने अपने 7 लिटर में 21 शावकों को जन्म दिया है, यह संख्या पन्ना टाइगर रिजर्व की ब्रीडिंग बाघिनों में सर्वाधिक है। टी-2 ने पहली बार अक्टूबर 2010 में चार शावकों को जन्म दिया था, जिनमें दो नर व दो मादा शावक थे। इस बाघिन ने अपने सातवें लिटर जुलाई 19 में तीन शावकों को जन्म दिया, जिसमें एक नर व दो मादा हैं। बाघिन टी-2 के मादा शावक भी बड़े होकर वंश वृद्धि कर रहे हैं। जिनमें पी-213 ने अब तक 11 शावक, पी-222 ने भी 11 शावक, पी-234 ने 8 शावक,  पी-234 (23) ने 3 शावक तथा पी-213(32) ने 8 शावकों को जन्म दिया है। बाघिन टी-2 की मौजूदा समय पन्ना टाइगर रिजर्व में चार पीढय़िां हैं। 

पन्ना टाइगर रिजर्व के अलावा इस बाघिन की वंश बेल सतना जिले के चित्रकूट, सतपुरा टाइगर रिजर्व व संजय टाइगर रिजर्व तक फैली है। वर्ष 2016 में पन्ना टाइगर रिजर्व से निकलकर चित्रकूट के जंगल को अपना नया आशियाना बनाने वाली बाघिन पी-213(22) ने वहां अब तक 11 शावकों को जन्म दे चुकी है। इस तरह से यदि बाघिन टी-2 के पूरे कुनबे को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा 73 तक जा पहुंचता है। इस आंकड़े से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इकलौती एक बाघिन टी-2 ने बाघों की वंश वृद्धि में कितना अहम और महत्वपूर्ण रोल निभाया है।

खत्म नहीं हुई पन्ना के बाघों की मूल नस्ल 


पन्ना के बाघों की मूल नस्ल को बचाने वाली बाघिन टी-2 का एक अंदाज यह भी। 

इस तथ्य से अभी भी ज्यादातर लोग अनजान हैं कि पन्ना के बाघों की मूल नस्ल समाप्त नहीं हुई है। पन्ना टाइगर रिजर्व को बाघ विहीन घोषित किए जाने के 4 वर्ष बाद ऐसे आनुवांशिक प्रमाण सामने आये थे जो इस ओर संकेत करते हैं कि पन्ना में बाघ पूरी तरह विलुप्त नहीं हुए थे। मालूम हो कि बाघिन टी-2 द्वारा अक्टूबर 2010 में जन्म दिए गये 4 शावकों के डीएनए टेस्ट परिणाम से पता चला था कि उनका प्रजनन पेंच टाइगर रिजर्व से लाये गये नर बाघ टी-3 द्वारा नहीं किया गया। 

जाहिर तौर पर इससे साफ संकेत मिलता है कि बाघिन टी-2 के प्रथम 4 शावकों (दो नर व दो मादा) का जन्म पन्ना के ही मूल बाघों के द्वारा हुआ था। यह परीक्षण हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एण्ड  मौलिक्युलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) द्वारा वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया के कहने पर किया गया था।

 इस तरह देखा जाए तो बाघ पुनर्स्थापना योजना को सफलता की नई ऊंचाई प्रदान करने तथा पन्ना टाइगर रिजर्व का गौरव बढ़ाने वाली कान्हा की बाघिन टी-2 सही अर्थों में पन्ना की रानी साबित हुई है। इस बाघिन ने न सिर्फ पन्ना के बाघों की मूल नस्ल को संरक्षित किया है बल्कि वंश वृद्धि करके पन्ना टाइगर रिजर्व को बाघों से आबाद भी किया है। मौजूदा समय लगभग 16 वर्ष की हो चुकी बाघिन टी-2 की चार पीढय़िां पन्ना टाइगर रिजर्व की शोभा बढ़ा रही हैं।

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Saturday, March 13, 2021

पन्ना में अंत्तर्राज्यीय चोर गिरोह के 03 आरोपी गिरफ्तार

  •  आरोपियों के कब्जे से सोने चांदी के जेवरात, 2 मोटरसाइकल व 3 मोबाईल जप्त 
  •  मामले के फरार तीन अन्य आरोपियों की पुलिस कर रही सरगर्मी के साथ तलाश 

 पुलिस अधीक्षक पन्ना धर्मराज मीना प्रेस वार्ता में पत्रकारों को जानकारी देते हुए। 

अरुण सिंह,पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की पुलिस ने अंत्तर्राज्यीय चोर गिरोह के 03 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियो के कब्जे से सोने चांदी के जेवरात कीमती करीब 3 लाख 68000 रुपये, 2 मोटरसाइकल एवं तीन मोबाईल जप्त किये गये हैं। तीन अन्य आरोपी फरार हैं, जिनकी पुलिस द्वारा सरगर्मी से तलाश की जा रही है। 

 पुलिस अधीक्षक पन्ना धर्मराज मीना ने जानकारी देते हुए आज बताया कि जिले के धरमपुर थाना क्षेत्र में पिछले कुछ समय से लगातार रात्रि के समय में अज्ञात व्यक्तियों द्वारा घरों का ताला तोडकर कीमती गहने एवं पैसे चोरी होने की घटनाये सामने आ रही थीं। थाना क्षेत्र में अलग-अलग समय पर अलग-अलग घरों में अज्ञात आरोपियों द्वारा चोरी की वारदातों को अंजाम दिया जा रहा था। आवेदको की रिपोर्ट पर थाना धरमपुर में अज्ञात आरोपियों के विरूद्ध चोरी के प्रकरण दर्ज किये जाकर विवेचना में लिया गया। 

 धरमपुर थाना क्षेत्र में लगातार हो रही चोरियों को पुलिस अधीक्षक पन्ना ने गंभीरता से लेते हुये अज्ञात आरोपियों की गिरफ्तारी हेतु पुलिस टीम का गठन किया गया। उक्त पुलिस टीम द्वारा पुलिस अधीक्षक पन्ना द्वारा दिये गये निर्देशो का पालन करते हुये अज्ञात आरोपियो की गिरफ्तारी हेतु लगातार प्रयास किये गये एवं थाना धरमपुर क्षेत्र के आसपास निवासरत ऐसे व्यक्तियों की जानकारी एकत्रित की गई जिनके द्वारा पूर्व में चोरी की वारदातों को अंजाम दिया जा चुका था। पुलिस द्वारा लगातार ऐसे व्यक्तियों को निगरानी में रखा गया एवं मुखबिर तैनात किये गये। शुक्रवार 12 मार्च 21 को चौकी प्रभारी नरदहा  रामफल शर्मा को मुखविर द्वारा सूचना प्राप्त हुयी कि चोरियों के संदेही कालिंजर से मकरी की तरफ मोटरसाइकल से जा रहे हैं। तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना से अवगत कराते हुये पुलिस टीम मुखबिर के बताये स्थान पर पहुँची, पुलिस को देखकर 3 संदेही वहां से अचानक भागने लगे। जिन्हे पुलिस टीम  द्वारा घेराबंदी कर पकड लिया गया। संदिग्धों से धरमपुर थाना क्षेत्र में हुयी चोरियों के संबंध में पूँछताछ किये जाने पर उन्होंने थाना क्षेत्र के ग्राम मौकछ, सलैया, हीरापुर, नवस्ता, नारायणपुर एवं मकरी में चोरी की घटनाओ को करना स्वीकार किया। उक्त चोरी की वारदातो में 03 अन्य आरोपियो के शामिल होने की बात को कबूल किया जो  फरार चल रहे हैं। पुलिस अधीक्षक ने बताया कि उक्त आरोपी आसपास के क्षेत्रो में रात्रि के समय में जाकर घरो में लगे तालों  को तोडकर घर के अन्दर से कीमती जेवरात एवं रूपयों की चोरी करते थे। आरोपियों से पूँछताछ जारी है जिससे चोरी के अन्य मामलों के खुलासा होने की संभावना है। प्रकरण में गिरफ्तार आरोपियों को न्यायालय पेश किया जा रहा हैं।

इनका रहा सराहनीय योगदान 

उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही में थाना प्रभारी कोतवाली पन्ना निरीक्षक अरुण सोनी, थाना प्रभारी धरमपुर उप निरी सुधीर कुमार बैगी, चौकी प्रभारी नरदहा सउनि रामफल शर्मा, सउनि मनमोहन सिंह सोलंकी, सउनि रावेन्द्र सिंह, सउनि अर्जुन सिंह, प्र.आर. चन्द्रेशखर पाण्डेय, आर. प्रदीप हरदेनिया, रोहित शिवहरे, विजय सिंह, भूपाल सिंह, अरुण सिंह, प्रमोद पटेल, धीरेन्द्र सेंगर, प्रेमनारायण प्रजापति , शुभम शुक्ला, अमित यादव, अमर बागरी, इन्द्रपाल अहिरवार व महिला आर. पुष्पा अहिरवार, बंदना दोहरे, आर. चालक रवि खरे तथा टेक्निकल टीम से नीरज रैकवार, राहुल बघेल, आशीष अवस्थी, धर्मेन्द्र सिंह राजावत, राहुल पाण्डेय का विशेष योगदान रहा हैं। पुलिस अधीक्षक पन्ना द्वारा उक्त पुलिस टीम को पाँच हजार रुपये नगद इनाम से पुरस्कृत किये जाने की घोषणा की गई है ।

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अब निखरेगा पन्ना का ऐतिहासिक नजरबाग ग्राउंड

  •  खनिज मंत्री के प्रयासों से बनेगा बेहतरीन स्टेडियम
  •  विकास व निर्माण कार्य हेतु स्वीकृत हुए 318 लाख रुपये
  •  होनहार खिलाडय़िों को मिलेगा आगे बढऩे का अवसर 

पन्ना में विकास और निर्माण कार्यों की शिला पट्टिका का अनावरण करते खनिज मंत्री श्री सिंह। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में खेल सुविधाओं के विकास हेतु पन्ना नगर के ऐतिहासिक नजरबाग ग्राउंड को आकर्षक और उपयोगी बनाया जायेगा। स्थानीय विधायक व प्रदेश के खनिज मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह के प्रयासों से नजरबाग ग्राउंड के विकास व निर्माण कार्य हेतु 318.01 लाख रुपये स्वीकृत हुए हैं। इस खूबसूरत मैदान में स्टेडियम बन जाने से जहां मैदान की खूबसूरती और बढ़ जाएगी वहीं जिले की खेल प्रतिभाओं व बच्चों को अपनी प्रतिभा निखारने व आगे बढऩे का भी अवसर मिलेगा।

 उल्लेखनीय है कि शहर के प्राचीन झीलनुमा जलाशय  धर्मसागर के ठीक बगल में स्थित नजरबाग खेल मैदान का ऐतिहासिक महत्व व खूबियां हैं। राजाशाही जमाने में भी इस खेल मैदान में फुटबॉल और क्रिकेट के मैच होते रहे हैं। तालाब की तलहटी में स्थित होने के कारण नजरबाग मैदान की खूबसूरती देखते ही बनती है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि गर्मी के दिनों में भी इस मैदान पर हरियाली नजर आती है। फुटबॉल के लिए तो इसे आदर्श ग्राउंड कहा जाता है। इस मैदान ने पन्ना जिले को कई नामचीन फुटबॉल खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने अपनी खेल प्रतिभा से जिले का नाम रोशन किया है।

 खनिज मंत्री के प्रयासों की हो रही सराहना 


पन्ना नगर के नजरबाग मैदान में हो रहे फुटबॉल मैच का द्रश्य। (फाइल फोटो)

नजरबाग मैदान में उपयोगी व सर्व सुविधायुक्त स्टेडियम की मांग लंबे समय से खेल प्रेमियों द्वारा की जाती रही है। इस दिशा में पूर्व नपा अध्यक्ष स्व. बृजेंद्र सिंह बुंदेला ने पहल व प्रयास भी किये थे। लेकिन उनके असमयिक निधन से इन प्रयासों पर विराम सा लग गया। अब पन्ना विधायक व प्रदेश शासन के मंत्री जो खुद खिलाड़ी हैं, उन्होंने नजरबाग मैदान के कायाकल्प हेतु सार्थक पहल की है। जिससे इस ऐतिहासिक खेल मैदान के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। खनिज मंत्री के इन प्रयासों की खेल प्रेमियों, खिलाडय़िों व नगर वासियों द्वारा भूरि-भूरि सराहना की जा रही है।

मिली अधिकृत जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री शहरी अधोसंरचना विकास के तृतीय चरण में पन्ना नगर को नजरबाग खेल मैदान में स्टेडियम निर्माण के लिए 318.01 लाख रूपये की स्वीकृति प्राप्त की गयी है। यह नगर के लिए एक बहुत बडी उपलब्धि है। स्टेडियम बन जाने से स्थानीय बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्राप्त होगा। इस मैदान में खेलकर वे राज्य स्तर, राष्ट्र स्तर एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक जिले का नाम रोशन करेंगे।

स्टेडियम निर्माण के संबंध में प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार स्टेडियम में पाथ वे 47.07 लाख, प्रवेश द्वार का निर्माण 10.54 लाख, स्टेडियम में बिल्डिंग कार्य के लिए 125.12 लाख, पेवेलियन (02 यूनिट) निर्माण के लिए 86.50 लाख तथा सीसी रोड निर्माण कार्य के लिए 14.6 लाख रूपये एवं 12 प्रतिशत जीएसटी 34.07 लाख रूपये की लागत से कार्य किया जायेगा।

नगर को स्वच्छ व सुन्दर बनाना हम सबका दायित्व - मंत्री 


खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह 

प्रदेश के खनिज साधन एवं श्रम विभाग मंत्री  बृजेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा पन्ना विधानसभा क्षेत्र एवं पन्ना नगर के विकास के लिए निरंतर प्रयास किये जा रहे हैं। उसी क्रम में उन्होंने बेनीसागर तालाब के मध्य स्थित बगान में मुख्य मार्ग से बगान तक पहुंचने के लिए सीसी रोड चैडीकरण तथा रिटर्निंग बाल का भूमिपूजन वैदिक रीति से किया। यह निर्माण कार्य 9.94 लाख रूपये की लागत से कराया जाएगा। इसी प्रकार डायमण्ड म्यूजियम के सामने 8.27 लाख रूपये की लागत से बनने वाले पन्ना व्यू-प्वाइंट का भूमिपूजन के साथ स्थानीय छत्रसाल पार्क में कवर्ड नाला का भूमिपूजन किया गया। कवर्ड नाला का निर्माण कार्य 8.27 लाख रूपये की लागत से कराया जायेगा। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि नगर को स्वच्छ और सुन्दर बनाना हम सभी का दायित्व है। नगर के विकास के लिए मेरे द्वारा हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि पन्ना को लोग हीरों, मंदिरों और तालाबों की नगरी के नाम से जानते हैं। इन सबका जब तक व्यवस्थित ढंग से समुचित विकास नहीं किया जायेगा तब तक इनकी ओर आकर्षण नहीं बढेगा। उन्होंने कहा कि मेरा प्रयास है कि नगर का समुचित विकास कर नगर को साफ-सुथरा और सुन्दर बनाया जाए। जिससे खजुराहो आने वाले पर्यटक पन्ना आयें। लोगों को रोजगार, व्यवसाय मिल सके। उन्होंने कहा कि नेशनल पार्क के रमपुरा गेट को प्रारंभ कराए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह सब होने के बाद नगर में पर्यटकों का निरंतर आवागमन होगा और क्षेत्र का विकास भी होगा।

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Thursday, March 11, 2021

अज्ञात वाहन की टक्कर से नर तेंदुआ की मौत

  •  राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 39 में खिला चौकी के पास की घटना 
  •  तेज रफ़्तार वाहनों से आये दिन वन्य प्राणियों की हो रही मौत 

सड़क हादसे का शिकार हुए नर तेंदुए का क्षत - विक्षत शव। 

अरुण सिंह,पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में अज्ञात वाहन से टक्कर होने पर आज एक नर तेंदुए की मौत हो गई। घटना राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 39 में पन्ना - छतरपुर मार्ग पर वन परीक्षेत्र मंडला के बीट खिला चौकी के पास की है। मामले में अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ वन अपराध कायम कर विवेचना की जा रही है। मालुम हो कि तेज रफ़्तार की चपेट में आकर आये दिन निरीह वन्य प्राणियों असमय काल कवलित हो रहे हैं, जिस कोई अंकुश नहीं लग पा रहा। सड़क हादसे की सर्वाधिक घटनायें पन्ना - छतरपुर व पन्ना - अमानगंज मार्ग पर घटित होती हैं, क्योंकि दोनों ही मार्ग पन्ना टाइगर रिज़र्व से होकर गुजरते हैं।    

हादसे के संबंध में क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व कार्यालय से दी गई जानकारी के मुताबिक मृत नर तेंदुआ की उम्र 13-14 वर्ष के लगभग है। तेंदुए के शव को जानवर सड़क मार्ग से घसीट कर वन क्षेत्र में ले गये थे। गश्ती दल को आज गश्त के दौरान तेंदुए का शव दिखा, फल स्वरुप गश्ती दल के वन कर्मियों ने मामले की जानकारी आला अधिकारियों को दी। सूचना मिलते ही उपसंचालक पन्ना टाइगर रिजर्व, सहायक संचालक मंडला, वन्य प्राणी चिकित्सक व परिक्षेत्र अधिकारी मंडला मौके पर पहुंचे। वन्य प्राणी चिकित्सक द्वारा मृत तेंदुए का पोस्टमार्टम किया गया। पोस्टमार्टम के उपरांत मुख्य वन संरक्षक छतरपुर सहित अन्य वन अधिकारियों की मौजूदगी में तेंदुए का दाह संस्कार कर दिया गया है।

दीपावली के दिन हुई थी युवा बाघिन की मौत 

विगत कुछ माह पूर्व ही पन्ना-अमानगंज सड़क मार्ग पर अकोला पर्यटन गेट से लगभग 500 मीटर आगे अकोला बफर वृत्त के बीट अमझिरिया में कक्ष क्रमांक 399 एवं 400 की सीमा पर गर्रोहा नाला की पुलिया पर किसी तेज रफ्तार वाहन की टक्कर से एक वर्षीय बाघिन की घटनास्थल पर ही दर्दनाक मौत  हुई थी। वाहन ने बाघिन के सिर को बुरी तरह से कुचल दिया था। इस हादसे को हुए चार माह होने को हैं लेकिन अभी तक आरोपी पकडे नहीं जा सके हैं। परिणाम स्वरुप वन क्षेत्र में तेज रफ़्तार वाहन चलाने वाले लोग बेखौफ हैं और आये दिन वन्य प्राणियों को रौंद रहे हैं। 

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अनोखा है पन्ना जिले का प्राचीन चौमुखनाथ मंदिर

  •  विलक्षण है यहाँ स्थापित शिव के चार मुंख वाली प्रतिमा 
  •  इस प्रतिमा के हर मुंख से प्रकट होते है अलग-अलग भाव 

चौमुखनाथ मंदिर में प्रतिष्ठित चार मुख वाली विलक्षण शिव प्रतिमा।  

।। अरुण सिंह ।।    

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में धार्मिक, ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के स्थलों की भरमार है। लेकिन उनकी समुचित देखरेख, विकास और प्रचार - प्रसार न होने के कारण उन्हें वह हक़ नहीं मिल सका, जिसके कि वे हक़दार हैं। आज चूँकि शिवरात्रि का पर्व है इसलिए हम जिले के दो अति प्राचीन और अनूठे मंदिरों का जिक्र करेंगे जिनका महत्व खजुराहो के मंदिरों से कम नहीं है।  बल्कि प्राचीनता की द्रष्टि से पन्ना जिले के ये मंदिर खजुराहो के मंदिरों से भी अधिक प्राचीन हैं। 

पहले बात करते हैं जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 50 किमी. दूर सलेहा के निकट स्थित चौमुखनाथ मंदिर की, जो छठी शताब्दी का बताया जाता है। इस अनूठे मंदिर में स्थापित शिव प्रतिमा रहस्यों से परिपूर्ण और विलक्षण है। एक ही पत्थर पर निर्मित इस अदभुत प्रतिमा के चार चेहरे हैं। बायां चेहरा विषग्रहण को चित्रित करता है जबकि दायां चेहरा शांत भाव को प्रदर्शित करता है। सामने वाले चेहरे पर दूल्हे की छवि दिखती है और चौथे चेहरे पर अर्धनारीश्वर की छवि प्रकट होती है। यह शिवलिंग आज से कोई 1500 वर्ष से ज़्यादा पुराना है। अद्भुत, अकल्पनीय वास्तुकला और संस्कृति का अप्रतिम उदाहरण है यह मंदिर तथा इसके गर्भगृह में प्रतिष्ठित शिव प्रतिमा। एक ही मूर्ति में दूल्हा, अर्धनारीश्वर और विष पान करते व समाधि में लीन शिव के दर्शन होते हैं। 

वैसे तो अपनी-अपनी जगह सभी शिव मंदिरों का महत्व है लेकिन सलेहा क्षेत्र के नचने का चौमुख नाथ महादेव मंदिर कई द्रष्टि से अनूठा है, जिसका अनुभव यहाँ पहुंचकर ही किया जा सकता है। यहां हर समय स्थानीय श्रद्धालु आते हैं, लेकिन शिवरात्रि पर्व व सावन के महीने में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। इसी मंदिर परिसर में पार्वती मंदिर है जो दुनिया के सबसे प्राचीनतम मंदिरों में से है। यह मंदिर गुप्त कालीन पांचवीं सदी का माना जाता है। कहा जाता है कि  जब इंसान मंदिरों के निर्माण की कला सीख रहा था तब इस मंदिर का निर्माण कराया गया। यह केंद्र संरक्षित स्मारक है। 

गुडने नदी के किनारे स्थित पन्ना जिले का प्राचीन सिद्धनाथ मन्दिर। 

चौमुखनाथ महादेव मंदिर के आलावा इसी क्षेत्र में अति प्राचीन सिद्धनाथ मन्दिर है। जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 60 किमी. दूर स्थित यह अनूठा स्थल अगस्त मुनि आश्रम के नाम से विख्यात है। इस पूरे परिक्षेत्र में प्राचीन मन्दिरों व दुर्लभ प्रतिमाओं के अवशेष जहां - तहां बिखरे पड़े हैं, जिन्हें संरक्षित करने के लिए आज तक कोई पहल नहीं हुई। पन्ना जिले के सिद्धनाथ मन्दिर की शिल्प कला देखने योग्य है, ऊंची पहाडिय़ों से घिरे गुडने नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर कभी मन्दिरों की पूरी श्रंखला रही होगी। मन्दिरों के दूर - दूर तक बिखरे पड़े अवशेष तथा बेजोड़ नक्कासी से अलंकृत शिलायें, यहां हर तरफ दिखाई देती हैं। जिससे प्रतीत होता है कि यहां कभी विशाल मन्दिर रहे होंगे। 

मौजूदा समय उस काल का यहां पर सिर्फ एक मन्दिर मौजूद है जिसे सिद्धनाथ मन्दिर के नाम से जाना जाता है। पुराविदों का कहना है कि सलेहा के आसपास लगभग 15 किमी. के दायरे वाला क्षेत्र पुरातात्विक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।  जानकारों का कहना है कि सिद्धनाथ मन्दिर नचने के चौमुखनाथ मन्दिर के समय का है। चौमुखनाथ मन्दिर छठवीें शताब्दी का है जो खजुराहो के मन्दिरों से तीन सौ वर्ष अधिक प्राचीन है। मन्दिर के पुजारी का कहना है कि इस परिसर के चारो ओर 108 कुटी मन्दिर बने हुए थे, जहां ऋषि - मुनि निवासकर साधना में रत रहते थे। 

समुचित देखरेख न होने के कारण अधिकांश कुटी मन्दिर ढेर हो चुके हैं। आश्चर्य की बात यह है कि पुरातात्विक व धार्मिक महत्व के इस स्थल तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। इस प्राचीन स्थल मेें भगवान श्रीराम के वनवासी रूप की दुर्लभ पाषाण प्रतिमा मिली है. पुराविदों का यह दावा है कि देश में अब तक प्राप्त भगवान राम की पाषाण प्रतिमाओं में यह सबसे प्राचीन है। 

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Monday, March 8, 2021

बाघ टी-3 को क्यों कहा जाता है फादर ऑफ़ द पन्ना टाइगर रिज़र्व

  •  पन्ना में उजड़ चुके बाघों के संसार को आबाद कर बनाई वैश्विक पहचान
  •  अठारह वर्ष की उम्र का हो चुका है पन्ना का यह चहेता उम्रदराज बाघ 

पन्ना टाइगर रिज़र्व को आबाद करने वाला सबसे उम्रदराज बाघ टी-3.  

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। अपनी विशिष्ट नैसर्गिक पहचान के चलते पर्यटकों व वन्यजीव प्रेमियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय रहा कान्हा के चहेता बाघ मुन्ना का ही समकालीन एक उम्रदराज बाघ पन्ना में भी है। जिसने यहां बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर से आबाद किया है। पन्ना टाइगर रिज़र्व में कई वर्षों तक एकछत्र राज करने वाले इस बाघ ने पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना को चमत्कारिक सफलता दिलाकर अपनी वैश्विक पहचान भी बनाई है। पन्ना को फिर से आबाद करने में इसके योगदान को देखते हुए ही उसे "फादर ऑफ दि पन्ना" भी कहा जाता है।

उल्लेखनीय है कि कान्हा के बाघ मुन्ना ने 19 वर्ष की आयु पूरी करके अपने जीवन को अलविदा कहा है, जबकि पन्ना का बाघ टी-3 अपने जीवन के 18 वर्ष पूरे कर चुका है और अभी भी खुले जंगल में चुनौतियों के बीच स्वच्छंद रूप से विचरण कर रहा है। पन्ना के इस बाघ की जीवन गाथा अत्यधिक रोचक और रोमांच से परिपूर्ण है। 

वर्ष 2009 में पन्ना टाइगर रिजर्व से जब बाघों का नामोनिशान मिट गया था और यहां के जंगल शोक गीत में तब्दील हो चुके थे, उस समय यहां पर बाघों की दुनिया को फिर से आबाद करने के लिए टी-3 को पेंच से 7 नवंबर 2009 को पन्ना लाया गया था। 

मालूम हो कि बाघ टी-3 को पन्ना लाने से पूर्व कान्हा व बांधवगढ़ से दो बाघिन को पन्ना लाया गया था ताकि नर बाघ टी-3 के संपर्क में आकर दोनों बाघिन वंश वृद्धि कर सकें। लेकिन नर बाघ से इन बाघिनों की मुलाकात नहीं हो सकी और 27 नवंबर 2009 को यह बाघ अपने घर पेंच की तरफ कूच कर गया। कड़ाके की ठंड में पूरे 30 दिनों तक यह बाघ अनवरत यात्रा करते हुए 442 किलोमीटर की दूरी तय कर डाली। इसे 25 दिसंबर को पकड़ा गया और 26 दिसंबर को दोबारा पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगल में लाकर छोड़ दिया गया।

बाघ टी-3 के 30 दिनों की यात्रा का स्मरण करते हुए तत्कालीन क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व आर. श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि वे दिन हमारे लिए बेहद चुनौतीपूर्ण और महत्व के थे। क्योंकि इसी नर बाघ पर पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना का भविष्य टिका हुआ था। 

श्री मूर्ति के मुताबिक इन 30 दिनों में इस बाघ ने हमें बाघों के जीवन, रहन-सहन, व्यवहार और आवास के संबंध में बहुत कुछ सिखाया। इस बाघ ने ही बिखरी हुई पन्ना की टीम को एकजुट किया तथा प्रबंधन को बेहतर बनाने की भी सीख दी। 

अधिकारियों व मैदानी कर्मचारियों की कड़ी मेहनत, सतत निगरानी व स्थानीय लोगों के सहयोग से वह दिन भी आ गया, जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। नर बाघ टी-3 के संपर्क में आकर बाघिन टी-1 ने 16 अप्रैल 2010 को चार नन्हे शावकों को जन्म देकर पन्ना टाइगर रिजर्व को फिर से गुलजार कर दिया। नन्हे शावकों के जन्म का यह सिलसिला अनवरत जारी है। मौजूदा समय पन्ना टाइगर रिजर्व व आसपास के जंगल में 60 से भी अधिक बाघ हैं।

जंगल में बाघ की औसत उम्र होती है 12 से 14 वर्ष

खुले जंगल में आमतौर पर बाघ की औसत उम्र अधिकतम 12 से 14 वर्ष होती है, जिसे पन्ना का यह बाघ 4 वर्ष पूर्व ही पूरी कर चुका है। यह उम्र जंगल के बाघों की औसत उम्र से बहुत ज्यादा है। खुले जंगल में चुनौतियों के बीच स्वच्छन्द रूप से विचरण करते हुये इतने उम्रदराज बाघ को देखना किसी अजूबा से कम नहीं है।

 वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता ने बाघ टी-3 के संबंध में जानकारी देते हुये बताया कि इसके दांत घिस गये हैं तथा यह अब कोर क्षेत्र से बाहर पेरीफेरी में रह रहा है। उम्रदराज होने के कारण शारीरिक रूप से कमजोर हो चुका यह बाघ अब कोर क्षेत्र में अपना साम्राज्य कायम रखने की स्थिति में नहीं है। फलस्वरूप अपनी ही सन्तानों से बचने के लिये यह कोर क्षेत्र को अवलिदा कह बफर क्षेत्र में मवेशियों का शिकार करके अपना जीवन गुजार रहा है।

डेढ़ वर्ष पूर्व आपसी संघर्ष में हुआ था घायल 

पन्ना का यह उम्रदराज बाघ यहां पर 7 - 8 वर्षों तक एकछत्र राज किया है। अधिक उम्र हो जाने के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व के इस किंग ने अब अपने साम्राज्य के विस्तार को कम कर सीमित इलाके में ही विचरण कर रहा है। विगत डेढ़ वर्ष पूर्व इस बुजुर्ग बाघ की पन्ना में ही जन्मे नर बाघ पी-213(31) से भिड़ंत हो गई थी, जिसमें यह घायल हो गया था। घायल होने पर बाघ टी-3 बलैया सेहा वाला इलाका छोड़कर रमपुरा के जंगल में पहुंच गया था। वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ संजीव कुमार गुप्ता ने बताया कि इस बुजुर्ग बाघ के दांत घिस चुके हैं तथा यह अब ज्यादातर कोर क्षेत्र से बाहर वाले इलाकों में रह रहा है। 

बुजुर्ग बाघ का निकाल दिया गया है रेडियो कॉलर 


ढाई माह पूर्व बाघ टी-3 का जब रेडियो कॉलर निकाला गया, उसी समय का चित्र।  

पन्ना टाइगर रिजर्व को आबाद करने वाले इस उम्र दराज बाघ के गले में बंधा रेडियो कॉलर अत्यधिक टाइट हो गया था, जिससे गले में घाव भी हो गये थे। कैमरा ट्रैप से इस बाघ की फोटो मिलने पर पार्क प्रबंधन को जब इस बुजुर्ग बाघ की परेशानी के बारे में पता चला तो उसका रेडियो कॉलर निकाल दिया गया। विगत ढाई माह पूर्व 18 दिसंबर 20 को वन परिक्षेत्र चंद्रनगर कोर के बीट भुसौर में टी-3 को बेहोश कर उसका रेडियो कॉलर निकाला गया तथा गले के घाव की शल्य क्रिया करके उपचार भी किया गया। तब से यह बुजुर्ग बाघ बिना रेडियो कॉलर के ही खुले जंगल में विचरण कर रहा है। वन्य जीव प्रेमी व पर्यटक जंगल में जब कभी इस बाघ को देखते हैं, तो वे खुशी से झूम उठते हैं।

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