- बीज एवं खाद्य विविधता मेले में पारंपरिक व्यंजनों की दिखी झलक
- स्थानीय खाद्य ज्ञान को सुरक्षित रखने प्रकाशित होगी रेसिपी पुस्तक
पन्ना। भारतीय भोजन आत्मविश्वास और प्रामाणिकता के साथ अपने मूल स्वरूप में लौट रहा है, जहां स्वाद, परंपरा और स्थानीय सामग्री प्रमुख भूमिका निभाएंगे। देशी एवं पारंपरिक भोजन हमारी समृद्ध संस्कृति, स्वास्थ्य और स्थानीय मौसम का प्रतीक है। ताज़ा मसालों, मौसमी सब्जियों और प्राकृतिक रूप से पकाया गया यह भोजन पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है, जो पोषण और स्वाद का बेहतरीन संतुलन प्रदान करता है। यह हमारे आस-पास आसानी से उपलब्ध मौसमी सब्जियों और अनाजों से बनता है, जो शरीर की तासीर के अनुकूल होते हैं।
देशी एवं पारम्परिक भोजन के प्रति जनमानस में जागरूकता लाने व अभिरुचि पैदा करने की मंशा से समर्थन संस्था द्वारा रिवाइटलाइजिंग रेनफेड एग्रीकल्चर (RRA) नेटवर्क एवं वासान (WASSAN), स्थानीय संस्था पृथ्वी ट्रस्ट व रिलायंस फाउन्डेसन के सहयोग से बीज एवं खाद्य विविधता मेले का आयोजन किया गया। इस मेले का उद्देश्य पारंपरिक किस्मों से बने स्थानीय व्यंजनों को पुनर्जीवित करना, उनका संरक्षण करना तथा उनका दस्तावेजीकरण करना था।
इस मेले में दो विकासखंडों के 12 गांवों से उत्साहपूर्वक सहभागिता देखने को मिली। प्रतिभागियों द्वारा लगभग 40 पारंपरिक व्यंजन प्रदर्शित किए गए, जिन्हें स्थानीय पारंपरिक फसल किस्मों से तैयार किया गया था। विशेष रूप से महिलाओं एवं ग्रामीण समुदायों ने अपने घरों से पारंपरिक भोजन तैयार कर लाकर क्षेत्र की समृद्ध खाद्य संस्कृति और कृषि परंपरा को प्रस्तुत किया। मेंले में कृवि केन्द्र के वैज्ञानिक प्रमुख डा. पी.एन त्रिपाठी, रीतेश बगोरा, रिलायंस फाउन्डेसन के जिला कार्यक्रम प्रबंधक मुकेश कुमार सेगर, प्रदीप तिवारी, राज्य ग्रमीण आजिविका मिशन के जिला प्रबंधक प्रमोद शुक्ला, पृथ्वी ट्रस्ट की निदेशक समीना युसुफ बेग, आर.आर.ए नेटवर्क के शुभदीप ने अपने वक्तव्य रखे ।
शुभ दीप ने कहा सभी जिलो एवं राज्य के जलवायु के अनुरूप खाद्य परम्परा बनी है, उसके अनुरूप ही भोजन अच्छा माना गया है। प्रमोद शुक्ला ने कहा कि दीदी लोग आजिविका मिशन से जुड़ कर अपनी आय में वृद्धि कर सकती हैं। परम्परागत भोजन एवं पकवान जिले में एवं कई फूड मेंलो में रखा जा सकता है और आमदनी का जरिया हो सकता है। वैज्ञानिक प्रमुख ने कहा कि देशी बीज एवं परम्परागत खाद्य हमारे सस्कृति एवं व्यावहार में शामिल है। मुकेश कुमार सेंगर ने कहा कि संस्था स्थानीय एवं देशी खाद्य श्रृखला पर काम कर रही है, जिले में इसके परिणाम भी देखने को मिल रहे है।
मेले का मुख्य उद्देश्य कृषि और भोजन के बीच के संबंध को पुनर्स्थापित करना तथा पारंपरिक फसल किस्मों के पोषण, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व को उजागर करना था। मेले में विभिन्न देशी बीजों एवं खाद्य पदार्थों का प्रदर्शन भी किया गया, जिससे किसानों और स्थानीय समुदायों में पारंपरिक फसलों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ी। मेले में प्रस्तुत सभी पारंपरिक किस्मों एवं व्यंजनों का विधिवत दस्तावेजीकरण किया गया। इस दस्तावेजीकरण के आधार पर भविष्य में एक पारंपरिक रेसिपी पुस्तक प्रकाशित की जाएगी, ताकि स्थानीय खाद्य ज्ञान और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा जा सके।
यह मेला किसानों के बीच संवाद, बीज आदान-प्रदान और अनुभव साझा करने का भी एक महत्वपूर्ण मंच बना, जिसने जैव विविधता संरक्षण और सतत कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समर्थन के ज्ञानेन्द्र तिवारी एवं दिवाकर वागरी ने कहा की हमें कुपोषण दूर करने के लिये इस प्रकार के मेंले लगाना बहुत जरूरी है। कार्यक्रम में समर्थन के सभी विस्तार कार्यकर्ताओं ने सहयोग प्रदान किया।
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