Friday, October 16, 2026

चिता आंदोलन का 35वाँ दिन : मिट्टी और पेड़ के पत्ते शरीर पर लगाकर किया जल सत्याग्रह

  • जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनूठा प्रदर्शन 
  • 20 दिन से आमरण अनशन कर रहे अमित भटनागर का बिगड़ रहा स्वास्थ्य 


पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में केन-बेतवा, मझगाय व रूँझ सिंचाई परियोजना में पर्यावरणीय विनाश के साथ प्रभावित परिवारों के मुआवजे, पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े सवालों को लेकर जारी चिता आंदोलन शुक्रवार को 35वें दिन में प्रवेश कर गया। आंदोलन के दौरान आदिवासी किसानों और महिलाओं ने अपने जल, जंगल, जमीन तथा संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनूठे तरीके से विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने अपने शरीर पर मिट्टी लगाई, पेड़ों के पत्ते बांधे और पानी में उतरकर जल सत्याग्रह किया। चिता और फांसी के प्रतीकात्मक विरोध के साथ जल सत्याग्रह भी जारी रहा।

आंदोलनकारियों का यह प्रदर्शन अपनी जमीन, जंगल और जीवन से जुड़ाव के साथ-साथ विस्थापन के संकट को सामने लाने का प्रयास था। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर प्रभावित परिवारों के अधिकारों, आजीविका और भविष्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। प्रभावित परिवार मुआवजे और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों के समाधान की मांग कर रहे हैं।

प्रदर्शन के दौरान आदिवासी, किसानों और महिलाओं ने अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर तथा पेड़ों के पत्ते बांधकर यह संदेश देने का प्रयास किया कि जल, जंगल और जमीन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उनके जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं। पानी में उतरकर किए गए जल सत्याग्रह के माध्यम से आंदोलनकारियों ने अपनी मांगों की ओर शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।आंदोलन में महिलाओं और आदिवासी परिवारों की भागीदारी लगातार बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और न्याय की मांग को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे।

सरकार के प्रति बढ़ रहा है असंतोष

आंदोलनकारियों के बीच सरकार और प्रशासन के प्रति असंतोष बढ़ने की बात सामने आ रही है। प्रभावित परिवारों की प्रमुख मांग है कि विस्थापन से पहले पात्र परिवारों को नियमानुसार पूरा मुआवजा और पुनर्वास का अधिकार सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि प्रभावित लोगों की समस्याओं का समयबद्ध समाधान होना चाहिए, ताकि उन्हें अपने घर, खेत और आजीविका से जुड़े संकटों का सामना न करना पड़े। आंदोलनकारियों ने मांग की है कि उनकी समस्याओं पर गंभीरता से सुनवाई कर ठोस कार्रवाई की जाए। लंबे समय से जारी विरोध प्रदर्शन के बीच अब समाधान को लेकर उनकी अपेक्षाएं और सवाल दोनों तेज हो रहे हैं।

अमित भटनागर के स्वास्थ्य में गिरावट

दूसरी ओर इस आंदोलन के मुख्य सूत्रधार जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर का आमरण अनशन अभी भी जारी है। आंदोलन के 35वें दिन उनके अनशन का 20वाँ दिन है। लगातार अनशन के बीच उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आने लगी है, जिससे आंदोलन से जुड़े लोगों और प्रभावित परिवारों की चिंता बढ़ रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मांगों का समाधान जल्द किया जाना चाहिए, ताकि प्रभावित परिवारों को न्याय मिल सके और आंदोलन की स्थिति में आगे कोई गंभीर संकट पैदा न हो।

00000

Wednesday, October 14, 2026

सहभागी शिक्षण केन्द्र एवं मान संस्था ने पन्ना जिले में किया शैक्षणिक भ्रमण

  • सहभागी विकास की अवधारण से किये गये जल संरक्षण के कार्य को सराहा 
  • फुलवारी एवं निमहा ग्राम में जल शुशासन के मांडल से टीम हुई प्रभावित


पन्ना। झारखण्ड राज्य में कार्य कर रही स्वयं सेवी संस्था सहभागी शिक्षण केन्द्र एवं मान संस्था के 8 सदस्यीय दल ने अपने तीन दिवसीय प्रवास के दौरान पन्ना जिले के विभिन्न ग्रामों का भ्रमण किया। अजयगढ़ जनपद की ग्राम पंचायत मोहना के ग्राम निमहा में पेयजल एवं जल संरक्षण रिचार्ज पिट के कार्य जन सहभागिता से पंचायत के साथ जनता की भागीदारी से कराये गये है। पंचायत आत्मनिभरता की ओर आगे बढ़ रही है। 

ग्राम पंचायत सरपंच,सचिव रामकुमार एवं पंचायत मित्र ने ग्राम विकास की सहभागी अवधारणा को समझाया। ग्राम निमहा,बनहरीखुर्द अजयगढ़, पल्थरा, उड़की, फुलवारी का भ्रमण कर जलसंरक्षण एवं पेयजल के कार्यो का अवलोकन किया। महाराजसागर तलाब में टीम ने श्रमदान किया एवं स्वैच्छिक संगठनो एवं प्रशासन एवं आम जनता की भागदारी से तलाब जीर्णोद्धार  कार्य की सराहना की।


बनहरी खुर्द में दो वर्ष के पौधारोपण, जैव विविधता पार्क को देखा एवं कहा कि कम समय में इतना बड़ा पौधा देखना सरजू प्रसाद कोदर की मेंहनत एवं ग्राम पंचायत के सहयोग से ही संभव हुआ है। गोविन्द मंडल की एकीकृत खेती देखकर काफी प्रभावित हुए। फुलवारी मांडल छतो के पानी को जमीन में उतारा गया जो बहुत ही सरहनीय कार्य है। ग्रामीणो ने बताया कि पानी गर्मी आने के पहले ही सूख जाता था, अब नही सूखता है। खारापन की समस्या भी कम हो रही है। पल्थरा मांडल भी आदिवासी बहुल्य क्षेत्र में देखने को मिला, जो सामुदाय की सहभागिता को दिखाता है।

समर्थन संस्था ने जो सहभागी नियोजन एवं सहभागी विकास के मांडल खड़े कर रहा है वह आसान नही है। जनभागीदारी के साथ ग्राम पंचायत एवं प्रशासन के सहयोग के बिना संभव नही है। समुदाय आधारित पेयजल प्रबंधन के मांडल एवं ग्रेवाटर एवं रूफवांटर के मांडल विरले ही देखने को मिलते है। ग्राम विकास के क्षेत्र में कार्य कर रहे टीम सदस्यो ने कहा कि हमारे यहां से यहां की ग्राम पंचायत अच्छा कार्य कर रही है। हम अपने यहां से प्रतिनिधियो को लाकर यहां के काम को दिखायेगे। सदस्यों में अखिलेश कुमार निदेशक मांन संस्था, अतीश कुमार पिगुआ कार्यक्रम प्रबंधक सहभागी शिक्षण केन्द्र ,आीशीष, निरंजन, बबलू सिंह, वारसेल मुण्डा, सकीलाल, राजीव रंजन शामिल रहे। 

समर्थन टीम से ज्ञानेन्द्र, विकास, आरती, एसपाल कपूर सिंह ने सहजकर्ता की भूमिका निभाई। सहभागी विकास की प्रक्रिया एवं पंचायतराज एवं ग्राम स्वाराज की मंशानुरूप कार्य करने की चुनौतियो से भी अवगत कराया। ग्राम पंचायत मोहना की पानी समितियो ने अपने कार्ययोजना निगरानी,जीपीडीपी एवं कार्यो के प्रभाव पर टीम को जाकनारी साझा की।

00000 

Sunday, October 11, 2026

पीपल का पेड़ : एक जीता-जागता चमत्कार

 

खजरी-कुड़ार गांव में स्थित पीपल के विशालकाय पेड़ का अद्भुत द्रश्य। 


।। अरुण सिंह।।

पेड़-पौधों की दुनिया में पीपल के वृक्ष की अपनी एक अलग ही शान है। भारत में हर कहीं शहर हो या गांव पीपल के विशालकाय वृक्ष नजर आ जाते हैं, जो सहज ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कुछ माह पूर्व फील्ड रिपोर्टिंग के लिए मेरा एक आदिवासी बहुल गांव खजरी-कुडार जाना हुआ। यह गांव मध्य प्रदेश के पन्ना जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव के चारो तरफ जंगल है, जाहिर है कि यहां के आदिवासियों का जीवन काफी हद तक जंगल पर ही निर्भर है।

खजरी-कुड़ार गांव के भीतर जाने पर रास्ते में एक विशाल पीपल का पेड़ मिला। यह इतना विशाल और असाधारण नजर आ रहा था कि मैं वहां ठिठक  गया। पेड़ की मोटी और लम्बी शाखाएं दूर-दूर तक फैली हुई थीं तथा इस पेड़ की ऊंचाई भी सामान्य पेड़ों से काफी अधिक थी। गर्मी और धूप में बाइक से जब मैं इस गांव में पेड़ के पास पहुंचा, तो उसकी घनी और शीतल छाँव में जो शांति और सुकून मिला, वह अकथनीय है। प्यारी और सुकूनभरी इस अनुभूति को और घनीभूत करने की मंशा से वृक्ष के नीचे बने विशाल चबूतरे में चुपचाप बैठ गया।

दोपहर का वक्त था, इसलिए वृक्ष की छांव में गांव के अनेकों लोग बैठे हुए थे और छोटे बच्चे खेल रहे थे। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद इस पेड़ के बारे में मेरे मन में उत्सुकता जगी और मैं ग्रामीणों से बातचीत करने लगा। चबूतरे में विश्राम कर रहे गांव के बुजुर्गों ने बताया कि इस पेड़ को हमने बचपन से ही इसी तरह देखा है। इसकी उम्र कितनी होगी बता पाना कठिन है। ग्रामीणों ने बताया कि गर्मी के दिनों में दोपहर का हमारा वक्त इसी पेड़ के नीचे गुजरता है, यहां गर्मी का एहसास बिल्कुल नहीं होता। यह पेड़ हम लोगों के लिए किसी वरदान से काम नहीं, देव तुल्य है। इसके नीचे गांव के लोग तो विश्राम करते ही हैं, सैकड़ों की संख्या में पक्षी भी इस पेड़ पर आश्रय पाते हैं। पीपल के इस पेड़ की अपनी एक अलग ही दुनिया है, जो हर किसी को शांति और सुकून मुफ्त में ही प्रदान करती है।


इसकी घनी छांव के नीचे बैठकर एक गहन प्रतीति यह हुई कि पीपल का पेड़ एक जीता-जागता चमत्कार है। पर्यावरण की दृष्टि से भी इस पेड़ की महत्ता कहीं ज्यादा है, क्योंकि यह अन्य दूसरे पेड़ों के मुकाबले कार्बन डाइऑक्साइड ज्यादा अवशोषित करता है। इस विशालकाय वृक्ष के बीज राई के दाने से भी छोटे होते हैं। छोटे से बीज में इतने विशाल वृक्ष के प्रकट होने की संभावना छिपी रहती है। यह बात मन को विस्मय विमुग्ध कर देती है कि आखिर यह सब कैसे संभव होता है।

इससे बड़ा चमत्कार भला और क्या हो सकता है। पीपल के पत्ते भी अत्यधिक सुंदर, कोमल और चंचल होते हैं जो हर समय सक्रिय रहते हैं। इस पेड़ के फूल गुप्त रहते हैं, इसलिए इसे "गुह्यपुष्पक" भी कहा जाता है। हिंदुओं की मान्यताएं पीपल के प्रति बहुत ही पवित्र हैं, यही वजह है कि हिंदू न सिर्फ इस वृक्ष की पूजा करते हैं बल्कि इसे देवतुल्य समझते हैं। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, इसलिए पीपल को "बोधिवृक्ष" भी कहा जाता है।

00000

Saturday, October 3, 2026

पन्ना को इस मुकाम तक पहुंचाने में संस्थापक बाघों का अहम् योगदान

  • प्रेरणादायी स्मृतियों को याद रखने संस्थापक बाघों के सम्मान में भी हो रचनात्मक पहल
  • वत्सला की तरह पन्ना को आबाद करने वाले बाघों की प्रतिमाओं का कराया जाय सृजन

संस्थापक बाघ टी-3 जिसकी पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना की सफलता में अहम् योगदान रहा। 


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। वन प्राणी संरक्षण सप्ताह के मौके पर यह बताया जाना जरूरी है कि मध्य प्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसमें यहां के संस्थापक बाघों का अहम योगदान रहा है। उनकी इस अनूठे योगदान की स्मृतियां तरोताजा रहें, इसके लिए इन बाघों की प्रतिमाओं का निर्माण हथिनी वत्सला की तरह कराया जाना चाहिए। ताकि आने वाली नई पीढ़ियां भी पन्ना के संस्थापक बाघों की चमत्कृत करने वाली रोचक और प्रेरणादाई कहानियों से रूबरू हो सकें।

उल्लेखनीय है कि बीते माह पन्ना की शान रही विश्व की सबसे बुजुर्ग हथिनी वत्सला की विशाल स्टेच्यू का अनावरण पन्ना टाइगर रिजर्व के अकोला गेट पर मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने किया था। वत्सला की पावन स्मृति में की गई इस अभिनव पहल की खूब सराहना हुई है। इसी तर्ज पर पन्ना के सभी संस्थापक बाघों की प्रतिमाओं का भी यदि निर्माण कराया जाए, तो पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना की रोचक दास्तान हमेशा लोगों के जेहन में कौंधती रहेगी। बाघों के संरक्षण हेतु आने वाली पीढ़ियां भी प्रेरणा लेंगी।

यहां यह बताना जरूरी है कि पन्ना के जंगल आदिकाल से ही वन्य जीवों और बाघों से आबाद रहे हैं। लेकिन डेढ़ दशक पूर्व कुछ ऐसे हालात बने कि पन्ना का जंगल वर्ष 2009 में बाघ विहीन हो गया। पन्ना टाइगर रिजर्व के उजड़ चुके बाघों के संसार को फिर से आबाद करने के लिए यहां पर बाघ पुनर्स्थापना योजना शुरू की गई। जिसके तहत कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच टाइगर रिजर्व से नर व मादा बाघों को पन्ना लाया गया। इन्हीं संस्थापक बाघों ने पन्ना को फिर से आबाद किया फलस्वरूप मौजूदा समय पन्ना लैंडस्केप में सौ से भी अधिक बाघ स्वच्छंद रूप से विचरण कर रहे हैं।

पन्ना टाइगर रिज़र्व की संस्थापक बाघिन टी-1 अपने शावकों के साथ।  ( फाइल फोटो )

पन्ना के संस्थापक बाघों में टी-1 से लेकर टी-7 तक सभी नर व मादा बाघ हैं। टी-1, टी-2 और टी-6 मादा बाघ हैं, जबकि टी-4 और टी-5 अर्द्धजंगली बाघिनें थीं, जिन्हें सफलता पूर्वक जंगली बनाया गया। नर बाघों में टी-3 और टी-7 हैं, लेकिन टी-3 का बाघ पुनर्स्थापना योजना को कामयाब बनाने में सबसे महत्वपूर्ण और अहम् योगदान रहा है। कई वर्षों तक पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगल में एकछत्र राज करने वाले बाघ टी-3 ने पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना को चमत्कारिक सफलता दिलाकर अपनी वैश्विक पहचान बनाई थी। इस नर बाघ के योगदान को देखते हुए ही उसे 'फादर ऑफ़ द पन्ना' कहा जाता है।

काबिले गौर है कि मध्य प्रदेश के पेंच टाइगर रिजर्व ने बीते साल विश्व की सबसे बड़ी टाइगर प्रतिमा का निर्माण कराकर अनूठी मिसाल कायम की है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस विशाल प्रतिमा का अनावरण किया था। यदि हम भी अपने संस्थापक बाघों की स्मृति में उनकी प्रतिमाओं का निर्माण पन्ना टाइगर रिजर्व में करा दें, तो निश्चित ही यह अनूठी पहल होगी। यह स्थल पर्यटकों के आकर्षण का जहां केंद्र बनेगा, वहीं बाघ संरक्षण की महत्ता को भी परिभाषित करेगा।

00000

Friday, October 2, 2026

चिता आंदोलन 21वें दिन भी जारी, 43 परिवारों के लिए 3.22 करोड़ की राशि स्वीकृत

  •  अमित भटनागर, दिव्या अहिरवार सहित सभी साथियों की रिहाई की मांग 
  •  कार्रवाई के बजाय प्रभावित परिवारों की समस्याओं का समाधान किया जाए


पन्ना। मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना से प्रभावित विस्थापित परिवारों के पूर्ण मुआवजा, उचित पुनर्वास और हक-अधिकारों की मांग को लेकर चल रहा चिता आंदोलन अमित भटनागर की गिरफ्तारी के बाद भी 21वें दिन जारी है। आंदोलन के बीच प्रशासन की ओर से मझगांय परियोजना से प्रभावित 43 परिवारों के लिए पुनर्वास अनुदान की अंतर राशि के भुगतान की अनुमति दी गई है। 

जल संसाधन विभाग द्वारा मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना अंतर्गत बांध निर्माण के डूब क्षेत्र में प्रभावित परिवारों को एकमुश्त पुनर्वास अनुदान अंतर राशि प्रति परिवार के मान से 7 लाख 50 हजार रूपए कुल 17 करोड़ 17 लाख 50 हजार रूपए स्वीकृत की गई है। इस क्रम में कलेक्टर ऊषा परमार ने आदेश जारी कर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व व भू-अर्जन अधिकारी के प्रस्ताव पर 43 परिवारों को कुल 3 करोड़ 22 लाख 50 हजार रूपए की राशि भुगतान करने की अनुमति प्रदान की है। 

इनमें राजू अहिरवार अमला अहिरवार, मुल्ली, कुंजी कोंदर, सरजू कोंदर रेखा कोंदर, लच्छी कोंदर, रमा कोंदर मुन्नी कोंदर, हल्के यादव सियारानी यादव, लेखराम यादव गेंदा रानी यादव, कमलेश यादव रामदेवी यादव, ईश्वरदीन यादव प्यारी बाई, हेतराम यादव शिववती यादव, विक्रम यादव गोरा यादव, भगवतदीन यादव मुन्नी यादव, इन्द्रकुमार यादव सुनीता यादव, हनुमान यादव हक्की बाई यादव, यश कुमारी यादव सुरेश कुमार, कुतली यादव, देवीदीन यादव केशरदेवी यादव, जगप्रसाद यादव कुश्मा यादव, कामता प्रसाद यादव ज्योति यादव, लक्ष्मीप्रसाद यादव मालती यादव, बलवान यादव चुनु बाई यादव, रोशनी अहिरवार, छेदीलाल अहिरवार सीमा अहिरवार, हरदीन कोंदर चिरारो कोंदर, बेटालाल फूला बसोर, रामरूप अहिरवार लक्ष्मी अहिरवार, जयराम यादव रामदेवी यादव, रामनरेश यादव भूरी यादव, सुशीला, केदार सिंह सविता सिंह, कपूर सिंह इन्द्रकुंवर सिंह यादव, भानसिंह यादव केशकुंवर, बामु पाल गीता पाल, रामदश पाल रीना पाल, सुरेश कुमार पाल रामदेवी पाल, राजू पाल केशकली पाल, सुनीता पाल, पुष्पेन्द्र पाल विनीता देवी पाल, जयपाल पाल राजकुमारी पाल, श्री पाल कुसुम पाल, रानीबहु पाल एवं कल्याण सिंह केशकुवर शामिल हैं। 

आंदोलनकारियों ने इसे प्रभावित परिवारों की मांगों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है, लेकिन उनका कहना है कि अभी सभी प्रभावित परिवारों को उनका पूरा अधिकार मिलना बाकी है। इधर, आंदोलनकारियों के अनुसार अमित भटनागर का जेल में भी आमरण अनशन आज पांचवें दिन जारी है। आंदोलनकारियों का कहना है कि अमित भटनागर, दिव्या अहिरवार सहित आंदोलन से जुड़े जिन साथियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है, उन्हें रिहा किया जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि जब तक सभी पात्र प्रभावित परिवारों के नाम सूची में शामिल नहीं किए जाते, सभी को पूर्ण मुआवजा और पुनर्वास का लाभ नहीं मिलता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। आंदोलनकारियों ने कहा कि 43 परिवारों के लिए राशि स्वीकृत होना महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन उनकी मांग केवल कुछ परिवारों तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि मझगांय डैम से प्रभावित हर पात्र परिवार को उसका पूरा मुआवजा, पुनर्वास और अधिकार मिलना चाहिए। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि आंदोलनकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय प्रभावित परिवारों की शेष समस्याओं का समाधान किया जाए और अमित भटनागर, दिव्या अहिरवार सहित गिरफ्तार सभी साथियों की रिहाई सुनिश्चित की जाए।

00000 

Thursday, October 1, 2026

पन्ना टाइगर रिजर्व के खुले प्रवेश द्वार, पर्यटकों में दिखा भारी उत्साह

 


पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिज़र्व का प्रवेश द्वार आज 01 अक्टूबर से पर्यटकों के भ्रमण हेतु खुल गया है। देशी और विदेशी पर्यटक अब यहाँ वन्य प्राणियों का दीदार करने के साथ ही खूबसूरत जंगल व हरी-भरी वादियों का लुत्फ़ ले सकेंगे। 

नया पर्यटन सत्र शुरू होने पर आज सुबह टाइगर रेिजर्व के मंडला गेट पर पर्यटकों के स्वागत की विशेष तैयारी की गई थी। फील्ड डायरेक्टर बृजेंद्र श्रीवास्तव और डिप्टी डायरेक्टर बी. के. पटेल की मौजूदगी में गेट को फूलों से सजाया गया था। उत्साह पूर्ण माहौल में फीता काट कर प्रवेश द्वार खोले गए और गाइड, जिप्सी चालक व सैलानियों का फूल मालाओं से स्वागत किया गया। 

मौके पर मौजूद अधिकारियों ने हरी झंडी दिखाकर गेट से जिप्सियों को सफारी के लिए रवाना किया। आज पर्यटन सत्र के पहले दिन ही बड़ी संख्या में पर्यटक पार्क भ्रमण के लिए मंडला प्रवेश द्वार पर पहुंचे। पर्यटकों में वन्य प्राणियों खासकर बाघ का दीदार करने को लेकर भारी उत्साह दिखाई दे रहा था।

00000

Wednesday, September 30, 2026

दमन से नहीं रुकेगा आंदोलन, जेल में भी जारी रहेगा : अमित भटनागर

 


पन्ना। न्याय और अपने हक़ के लिए शांति पूर्ण तरीके से आवाज उठाना क्या अब सचमुच गुनाह हो गया है ? मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना से प्रभावित आदिवासियों और किसानों के चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस बल को जिस तरह से उतारा गया और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लोगों को गिरफ्तार किया गया, उसे देखकर तो यही प्रतीत होता है कि मौजूदा दौर में अपने हक़ और न्याय की आवाज उठाना नासमझी है। यह नासमझी मझगांय बांध के प्रभावितों ने की है। यही वजह है कि उन्हें पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।  

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के अजयगढ़ क्षेत्र में मझगांय बांध के प्रभावितों का पिछले एक पखवाड़े से भी अधिक समय से आंदोलन चल रहा है। प्रभावितों की मांगों पर सहृदयता पूर्वक विचार करने के बजाय प्रशासन ने जिस तरह से पुलिस बल के जरिए आंदोलन को जबरन ख़त्म करने का रास्ता अख्तियार किया है, उससे जनाक्रोश और बढ़ता जा रहा है। बताया तो यह भी जा रहा है कि आंदोलन को कुचलने के लिए बीते 28 सितम्बर को पुलिस बल के साथ सिविल ड्रेस में  कुछ लठैत भी शामिल थे। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक दल भी आंदोलनकारियों के समर्थन में सक्रिय हो गए हैं। जिला कांग्रेस कमेटी ने तो बकायदा पुलिस अधीक्षक पन्ना को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि चिता आंदोलन के दौरान ग्रामीणों एवं आंदोलनकारियों के साथ हुई मारपीट एवं पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

इधर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे समाजसेवी अमित भटनागर ने आज सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा है कि पन्ना जिले में अपने हक अधिकार उचित मुआवजा, पुर्नवास और पर्यावरण की रक्षा के लिए चिता आंदोलन कर रहे महिलाओं सहित सत्याग्रहियों पर भाजपा सरकार में पुलिस और गुंडों की दम पर लगातार 3 दिन से जिस तरह से लाठीचार्ज, अभद्रता और अमर्यादित व्यवहार किया जा रहा है, यह लोकतंत्र की हत्या है। मैं इसके खिलाफ अपने साथियों के साथ गिरफ्तारी की घोषणा करता हूं। दमन से नहीं रुकेगा आंदोलन, जेल में भी जारी रहेगा आमरण अनशन। उन्होंने कहा कि ये सिर्फ सिर्फ इनके साथ अन्याय नहीं ये लोकतंत्र की हत्या है, इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन होना चाहिए।

 वीडियो :


00000

Tuesday, September 22, 2026

चिता आंदोलन के 11वें दिन सैकड़ों लोग गहरे पानी में उतरे

  • घर, खेत और गांव संकट में, लेकिन प्रभावितों को अभी तक न्यायपूर्ण मुआवजा नहीं
  • केन-बेतवा, मझगाय, रुंझ सहित विभिन्न परियोजनाओं के प्रभावितों ने उठाई आवाज


पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में मझगाय बांध प्रभावितों का चिता आंदोलन 11वें दिन और तेज हो गया। सैकड़ों महिला-पुरुष गहरे पानी में उतरकर जल सत्याग्रह में शामिल हुए। आंदोलनकारियों ने कमर से लेकर छाती तक पानी में खड़े होकर शरीर पर मिट्टी लगाई और विरोध दर्ज कराया। सुबह शुरू हुआ प्रदर्शन देर रात तक जारी रहा। आंदोलनकारियों का कहना है कि सांकेतिक जल सत्याग्रह अब धीरे-धीरे वास्तविक जल सत्याग्रह में बदल रहा है।

चिता सत्याग्रह के साथ मिट्टी सत्याग्रह और फांसी सत्याग्रह के बाद अब जल सत्याग्रह ने आंदोलन को नया स्वरूप दिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि बढ़ते पानी के बीच घर, खेत और गांव संकट में हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों को अभी तक न्यायपूर्ण मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिला है। जय किसान संगठन के नेता एवं आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर ने बिना किसी जनप्रतिनिधि का नाम लिए कहा, “घर डूब रहे हैं, गांव डूब रहे हैं और जिंदगियां डूब रही हैं, लेकिन जवाबदेह और जिम्मेदार लोगों की बेशर्मी तैर रही है।”

उन्होंने कहा कि मझगाय के साथ रुंझ परियोजना, केन-बेतवा लिंक परियोजना, सिंगरौली-ललितपुर रेल मार्ग सहित विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित लोग लंबे समय से विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास की समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनका कहना है कि कई मामलों में वर्षों तक संघर्ष के बाद मुआवजा बढ़ाया जाता है और फिर इसका श्रेय लेने की कोशिश होती है, जबकि प्रभावित परिवार तब तक अपना घर, जमीन और आजीविका खो चुके होते हैं।

भटनागर ने आरोप लगाया कि किसानों की सिंचित जमीन को असिंचित मानने, खड़ी फसलों पर जेसीबी चलाने तथा निर्माण कार्यों में अनियमितताओं से ग्रामीणों को नुकसान हुआ है। उन्होंने परियोजनाओं से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मनमानी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल मुआवजे और पुनर्वास का नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा का भी संघर्ष है। विकास के नाम पर विस्थापन हो, लेकिन पर्यावरणीय नुकसान, जंगलों और जैव विविधता की अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती।

भटनागर ने कहा कि आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि अन्याय, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक मनमानी, विस्थापन और पर्यावरणीय क्षति के खिलाफ है। प्रभावितों को न्यायपूर्ण मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित होने तक सत्याग्रह जारी रहेगा।

00000

Tuesday, September 15, 2026

मझगाय बांध के डूब क्षेत्र में चौथे दिन भी जारी रहा चिता आंदोलन

  • विस्थापित आंदोलनकारियों  का नारा “न्याय दो या मार दो” 
  • पानी में चिताओं पर लेटकर प्रभावित करा रहे विरोध दर्ज 


पन्ना। केन-बेतवा लिंक परियोजना सहित मझगाय बांध, रुंझ बांध और सिंगरौली–ललितपुर रेलवे लाइन से प्रभावित विस्थापितों का चिता आंदोलन आज चौथे दिन भीषण गर्मी के बीच जारी रहा। आंदोलन में प्रभावित परिवारों के साथ बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं अपने बच्चों को लेकर शामिल हुईं। डूबते गांवों और बढ़ते जलस्तर के बीच प्रभावित लोग पानी में चिताओं पर लेटकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा कि जब इन परियोजनाओं की शुरुआत हुई थी, तब प्रभावित लोगों ने विकास का विरोध नहीं किया था। उन्होंने केवल ग्रामसभा, पारदर्शिता, कानून के पालन, उचित मुआवजे और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग की थी। लेकिन प्रभावितों का आरोप है कि उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज किया गया और कई मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना उनकी जमीन और संपत्तियों पर कार्रवाई की गई।

अमित भटनागर ने कहा कि जब प्रभावित लोगों ने धरना-प्रदर्शन शुरू किया तो धारा 144 और वर्तमान में लागू धारा 163 जैसी निषेधात्मक कार्रवाइयों के माध्यम से आंदोलन को रोकने का प्रयास किया गया। आंदोलन तेज होने पर आंदोलनकारियों पर मुकदमे लगाए गए। इसके बावजूद प्रभावित परिवार अपनी मांगों को लेकर लगातार लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करते रहे।

उन्होंने कहा कि आज स्थिति बेहद गंभीर है विकास के नाम पर विस्थापित आदिवासी किसानों के घर और गांव पुलिसिया दमन के माध्यम से बुलडोज कर दिए गए, उनके घर पानी में डूब चुके हैं, कई गांवों में पानी पहुंच चुका है और कुछ घर लगातार गिर रहे हैं, लेकिन अनेक प्रभावित परिवारों को अभी तक उनका मुआवजा नहीं मिला है। उनका कहना है कि बिना उचित मुआवजा और पुनर्वास के लोगों के घरों और गांवों को डुबाना गंभीर मानवीय और कानूनी सवाल खड़ा करता है।

5 लाख से 12.50 लाख रु. के पुनर्वास पैकेज तक, फिर भी भुगतान का इंतजार

आंदोलनकारियों के अनुसार पहले प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास पैकेज ₹5 लाख था। जुलाई में हुए चिता आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री द्वारा कैबिनेट में प्रभावित परिवारों के लिए ₹12.50 लाख के पैकेज का निर्णय घोषित किए जाने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद आंदोलनकारियों का आरोप है कि अभी तक कई परिवारों को बढ़ा हुआ पैकेज तो दूर, पहले निर्धारित ₹5 लाख की राशि भी नहीं मिली है। प्रभावित किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी जमीनों के रिकॉर्ड में सिंचित भूमि को असिंचित कर दिया गया, जिससे मुआवजे की राशि प्रभावित हुई, लेकिन इस अंतर की राशि भी उन्हें नहीं दी गई। कई परिवारों के मकान और जमीन का मुआवजा भी लंबित बताया जा रहा है।

अमित भटनागर ने कहा, “एक तरफ सरकार परियोजना का काम आगे बढ़ा रही है और दूसरी तरफ प्रभावित परिवारों के घर पानी में डूब रहे हैं। जिन लोगों को पहले मुआवजा और पुनर्वास मिलना चाहिए था, वे आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह केवल मुआवजे का सवाल नहीं है, बल्कि संविधान, कानून, जीवन, गरिमा और न्याय के अधिकारों का सवाल है।”

कई परियोजनाओं के प्रभावित एक मंच पर

चिता आंदोलन में केवल केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित लोग ही नहीं, बल्कि मझगाय बांध, रुंझ बांध और सिंगरौली–ललितपुर रेलवे लाइन से प्रभावित लोग भी शामिल हुए। प्रभावितों ने अपनी समस्याएं साझा करते हुए कहा कि परियोजनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास से जुड़ी उनकी पीड़ा समान है। आंदोलनकारियों ने कहा कि विकास के नाम पर उनकी जल, जंगल, जमीन और जीवन छीना जा रहा है, लेकिन उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की जा रही है।

उन्होंने कहा “पहले जल–जंगल–जमीन छीनी गई, फिर घर और गांव डुबो दिए गए। जब लोग न्याय मांगने सड़क पर आए तो निषेधाज्ञा और मुकदमों का सामना करना पड़ा और अब बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी रोकी जा रही हैं। आखिर यह कैसा विकास है?” अमित भटनागर ने कहा कि चिता आंदोलन का नारा “न्याय दो या मार दो” विस्थापित परिवारों की बेबसी और आक्रोश को व्यक्त करता है।

उन्होंने कहा, “हम सरकार से पूछ रहे हैं कि अगर हमें न्याय नहीं देना है तो क्या सरकार ने यह तय कर लिया है कि हमें मार दिया जाए? इस तरह घर, जमीन, गांव और जड़ों से उखाड़कर दर-दर भटकाने से अच्छा है कि सरकार हमारी पीड़ा को समझे और न्याय दे। हम मौत नहीं मांग रहे हैं, हम न्याय मांग रहे हैं। हमें उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और हमारे संवैधानिक व कानूनी अधिकार चाहिए।”

दिव्या अहिरवार और हिसाबी राजपूत ने कहा कि “हम महिलाएं अपने बच्चों के साथ इस आंदोलन में इसलिए बैठी हैं क्योंकि अब हमारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं बचा है। हमारे घर डूब रहे हैं, जमीन जा रही है और कई परिवारों को अभी तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। अमित ने कहा कि जब राज्य ही अपने बनाए कानूनों और संविधान की भावना का पालन नहीं करता, तब संघर्ष और आंदोलन ही हमारे पास लोकतांत्रिक रास्ता रह जाता है। बिजली और पानी रोककर हमारी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। सरकार को दमन की जगह विस्थापितों की पीड़ा सुननी होगी और उन्हें न्याय, मुआवजा तथा सम्मानजनक पुनर्वास देना होगा।”

उन्होंने कहा कि चिता आंदोलन किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। यह अन्याय, प्रशासनिक मनमानी और प्रभावित लोगों के अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष है। उन्होंने सरकार से मांग की कि डूब क्षेत्र के प्रत्येक प्रभावित परिवार का तत्काल सत्यापन कराया जाए, लंबित मुआवजा दिया जाए, सिंचित-असिंचित भूमि के मूल्यांकन की शिकायतों का निराकरण किया जाए, मकान एवं अन्य परिसंपत्तियों का उचित मूल्यांकन किया जाए तथा घोषित पुनर्वास पैकेज और सभी वैधानिक अधिकार तत्काल दिए जाएं। जब तक विस्थापितों को न्याय नहीं मिलता, चिता आंदोलन जारी रहेगा। यह लड़ाई केवल कुछ गांवों की नहीं है। यह जल–जंगल–जमीन–जीवन, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई है।



00000 

Sunday, September 13, 2026

विश्व की सबसे बुजुर्ग हथिनी वत्सला की स्टेच्यू का पन्ना टाइगर रिजर्व के अकोला गेट पर हुआ अनावरण

 


पन्ना। गणेश चतुर्थी पर्व की पूर्व संध्या पर मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व के अकोला गेट पर विश्व की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला की स्मृति में उनके स्टेच्यू का भव्य अनावरण किया गया। इस गरिमामयी समारोह में मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, पन्ना जिले के प्रभारी मंत्री इन्दर सिंह परमार, पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह सहित अन्य गणमान्य नागरिक एवं वरिष्ठजन उपस्थित रहे। वन विभाग की ओर से पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक, वन मंडलाधिकारी दक्षिण पन्ना, उप संचालक, सहायक संचालक पन्ना, परिक्षेत्र अधिकारी सहित वन अमला इस अवसर पर मौजूद रहा।

वत्सला के इस स्टेचू की स्थापना और अनावरण में जे.के. सीमेंट अमानगंज की विशेष और महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसके अधिकारीगण भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। अनावरण करते हुए विस अध्यक्ष श्री तोमर द्वारा विधि-विधान से वत्सला की पूजा-अर्चना की गई और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए याद किया गया तथा उनकी प्रतिमा को अकोला गेट पर स्थापित किया गया। 

उल्लेखनीय है कि वत्सला विश्व की सबसे बुजुर्ग  हथिनी मानी जाती थी। उनका जन्म लगभग वर्ष 1917 के आसपास केरल के नीलांबुर जंगलों में हुआ था। इसके पश्चात वे पन्ना आईं और पन्ना की भौगोलिक परिस्थितियों एवं उबड़-खाबड़ स्थानों में उन्होंने अपना एक लंबा जीवन व्यतीत किया। वत्सला ने अपने सम्पूर्ण जीवन में किसी नर हाथी के साथ मेटिंग नहीं की। इसके साथ ही उन्होंने दूसरी हथिनियों के बच्चों का लालन-पालन अत्यंत स्नेह और वात्सल्य के साथ किया। उनके इसी प्रेमपूर्ण और वात्सल्यमयी स्वभाव के कारण आसपास के वन्यजीव प्रेमी और पन्ना के स्थानीय लोग उन्हें आदर और स्नेह से दादी मां कहकर पुकारते थे। वत्सला दादी मां की इन्हीं स्मृतियों को चिरस्थायी बनाने के लिए अकोला गेट पर इस स्टेच्यू को स्थापित किया गया है।

गौरतलब है कि दुनिया की सबसे उम्रदराज कही जाने वाली हथिनी वत्सला की तमाम खूबियों में से एक खूबी उसके शारीरिक बनावट को लेकर भी है। जिससे हाथियों के झुंड में भी वत्सला को आसानी से पहचाना जा सकता था। दरअसल वत्सला की सूंड दूसरे अन्य हांथियों के मुकाबले अधिक लंबी रही है। सूंड की लंबाई इतनी अधिक थी कि वत्सला जब खड़ी होती थी तो दो से तीन फिट सूंड को जमीन के ऊपर मोड़ कर रखना पड़ता था। उसकी इस खूबी के कारण वन्यजीव प्रेमी वत्सला को पांच पैर वाली हथिनी भी कहते रहे हैं। वत्सला की सूंड इतनी लंबी कैसे हुई, इस बाबत वन्य प्राणी चिकित्सक डॉक्टर संजीव कुमार गुप्ता का कहना है कि शुरुआती दिनों में हथिनी वत्सला के द्वारा लकड़ी की बोगियों को उठाने व रखने का कार्य किया जाता रहा है। यही वजह है कि उम्र बढ़ने के साथ ही वत्सला की सूंड भी लंबी हो गई। वत्सला भौतिक रूप से भले ही अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन दुनिया भर के वन्य जीव प्रेमियों के जेहन में उसकी स्मृतियाँ हमेशा जीवित रहेंगी। 

00000