- अमित भटनागर बोले, घर तोड़ने और गांव उजाड़ने में तत्परता, हक देने में मौन क्यों है सरकार ?
- वन स्वीकृति पत्र में प्रावधान के बावजूद 13 हजार प्रभावितों के 650 करोड़ रु. नहीं दिया जा रहा
पन्ना। केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित पन्ना और छतरपुर जिले के लगभग 13,000 लोगों के अधिकारों और पुनर्वास से जुड़ी राशि को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने आरोप लगाया है कि वन स्वीकृति पत्र में प्रावधान होने के बावजूद प्रभावितों को उनका वैधानिक लाभ नहीं दिया जा रहा। अमित भटनागर का दावा है कि करीब 650 करोड़ रु. की राशि प्रभावितों तक नहीं पहुंची है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब लोगों के घर तोड़ने और गांव उजाड़ने में सरकार तथा प्रशासन तत्परता दिखा रहे हैं, तो उनके हक देने के समय खामोशी क्यों छा जाती है ?
उल्लेखनीय है कि चिता आंदोलन 38वें दिन में प्रवेश कर चुका है और अमित भटनागर का आमरण अनशन 23वें दिन भी जारी है। आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रभावित आदिवासी और किसान परिवारों पर अपने घर खाली करने, सामान समेटने और दूसरी जगह जाने का दबाव बनाया जा रहा है। अधिकारी-कर्मचारी गांवों में पहुंचकर विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों को मिलने वाले मुआवजे, पुनर्वास और अन्य वैधानिक लाभों की स्थिति पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा।
अमित भटनागर ने सवाल उठाया, “घर तोड़ने और गांव उजाड़ने में तत्परता, लेकिन हक देने में मौन क्यों है सरकार? क्या विकास के नाम पर लोगों को उनकी जमीन से हटाना ही सरकार की जिम्मेदारी है, या उनके अधिकारों की रक्षा करना भी सरकार का कर्तव्य है ?” वन स्वीकृति पत्र में दर्ज शर्तें, फिर प्रभावितों के हक पर चुप्पी क्यों ? केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 3 अक्टूबर 2023 को जारी वन स्वीकृति पत्र क्रमांक 8-49/2016-FC में पुनर्वास और विस्थापित परिवारों से संबंधित महत्वपूर्ण शर्तें दर्ज हैं। शर्त क्रमांक 22 में स्वीकृत पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना को समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है।
वहीं, शर्त क्रमांक 23 के अनुसार, विस्थापित परिवारों को गैर-वन भूमि पर वास्तव में बसाने को सुनिश्चित करने के साथ पात्र वयस्क सदस्यों को कम-से-कम पांच वर्षों तक, प्रति वर्ष 200 कार्य दिवस के लिए अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी की दर से वार्षिकी देने का प्रावधान है। यह वार्षिकी अन्य पुनर्वास लाभों के अतिरिक्त है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि इन प्रावधानों के बावजूद बड़ी संख्या में प्रभावितों को उनके अधिकारों का लाभ नहीं मिला है। उनका दावा है कि लगभग 13,000 प्रभावित लोगों के लिए करीब ₹650 करोड़ की राशि का सवाल है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस राशि की गणना का आधार, पात्र लाभार्थियों की संख्या, भुगतान की स्थिति और लंबित राशि का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
अमित भटनागर का कहना है कि आंदोलन विकास के विरोध में नहीं, बल्कि प्रभावित आदिवासी और किसान परिवारों के अधिकारों की अनदेखी के खिलाफ है। भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत जहां कानून लागू होता है, वहां मुआवजे और पुनर्वास से संबंधित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।आंदोलनकारियों की मांग है कि प्रभावित परिवारों की पात्रता सूची सार्वजनिक की जाए, गांववार मुआवजे और पुनर्वास की स्थिति बताई जाए, लंबित लाभों का भुगतान किया जाए और वन स्वीकृति की शर्तों के अनुपालन पर जवाबदेही तय की जाए। उनका कहना है कि परिवारों को हटाने से पहले उनके अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े सवालों का पारदर्शी समाधान होना चाहिए।
वीडियो में अमित भटनागर ने क्या कहा, आप भी सुने -
00000


.jpeg)











