- केन-बेतवा लिंक परियोजना के विस्थापित आदिवासी से मांगी गई थी रिश्वत
- आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला हुआ दर्ज
पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में लोकायुक्त पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए गुरुवार को 47 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पटवारी संतोष चिकवा को रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।आरोपी पटवारी द्वारा रिश्वत की रकम केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित दयाराम आदिवासी से पटवारी प्रतिवेदन बनाने के एवज में मांगी गई थी।
डीएसपी लोकायुक्त सागर ने जानकारी देते हुए बताया कि केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत विस्थापित हुए दयाराम आदिवासी निवासी खजुरी कुड़ार से आरोपी पटवारी ने मुआवजे और जमीन से जुड़े कार्य के बदले 47 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। पीड़ित दयाराम आदिवासी की शिकायत पर लोकायुक्त सागर की 10 सदस्यीय टीम ने योजनाबद्ध तरीके से ट्रैप रचा और पटवारी को रिश्वत की राशि स्वीकार करते ही जिला चिकित्सालय पन्ना के गेट पर रंगे हांथ धर दबोचा। लोकायुक्त पुलिस द्वारा आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। विस्थापित आदिवासियों के हक पर डाका डालने वाले पटवारी पर हुई इस कार्रवाई से राजस्व महकमें में हड़कंप मचा हुआ है।
छोटी मछली नहीं, पूरे नेटवर्क तक पहुँचे जांच : अमित भटनागर
पन्ना जिले की केन-बेतवा लिंक परियोजना के नाम पर प्रभावित किसानों, आदिवासियों और ग्रामीणों के साथ लंबे समय से सामने आ रही कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच लोकायुक्त की कार्रवाई ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सागर लोकायुक्त की टीम द्वारा गुरुवार को जनवार-गहदरा पटवारी संतोष चिकवा को 47 हजार रु. की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े जाने की कार्रवाई ने उन आशंकाओं को और गंभीर बना दिया है, जिन्हें हम लंबे समय से उठाते आ रहे हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े आदिवासियों के मुद्दों को लम्बे समय से उठाते आ रहे जय किसान संगठन के नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि हम लगातार कह रहे हैं कि केन-बेतवा परियोजना में प्रभावित आदिवासियों और किसानों की अशिक्षा, सरलता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी के अभाव का लाभ उठाकर बड़े स्तर पर अनियमितताएं की जा रही हैं। आज लोकायुक्त की कार्रवाई ने कम से कम यह बता दिया कि आखिर जमीन और मुआवजे से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार का नेटवर्क कितना गहरा है ?
अमित भटनागर ने कहा कि संतोष चिकवा यदि रिश्वतखोरी की एक कड़ी है, तो जांच केवल उसी कड़ी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पटवारी को पकड़ लेना कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसे अंत नहीं माना जा सकता। यह पता लगाना जरूरी है कि रिश्वत की मांग किसके कहने पर हुई ? किसके संरक्षण में हुई ? किसे इसका लाभ मिलना था ? और जमीन, सर्वे, मुआवजा तथा पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया में ऊपर तक कौन-कौन लोग जुड़े हैं ? उन्होंने कहा कि प्रभावित आदिवासी और किसान लंबे समय से मुआवजा, जमीन के सर्वे, परिसंपत्तियों के मूल्यांकन और पुनर्वास को लेकर गंभीर शिकायतें उठा रहे हैं। ऐसे में एक कर्मचारी की गिरफ्तारी को पूरे तंत्र की जांच का प्रवेश-बिंदु बनाया जाना चाहिए।
अमित भटनागर ने मांग की है कि इस मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तथा जांच का दायरा केवल पटवारी या किसी एक कर्मचारी तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने कहा कि अगर निष्पक्ष जांच होती है तो यह सामने आ सकता है कि भ्रष्टाचार की कड़ियां कहां से शुरू होती हैं, और कहां तक जाती हैं। हमें आशंका है कि यह मामला केवल एक पटवारी की रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं हो सकता। इसलिए बड़े अधिकारियों, संबंधित कर्मचारियों और यदि किसी राजनीतिक व्यक्ति की भूमिका के संबंध में कोई साक्ष्य सामने आता है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने जांच एजेंसियों से मांग की कि मुआवजा प्रकरणों, जमीन के रिकॉर्ड, सर्वे रिपोर्ट, मूल्यांकन, नामांतरण, सहमति/ग्रामसभा से जुड़े दस्तावेजों और प्रभावित परिवारों की शिकायतों को आपस में जोड़कर जांच की जाए। आदिवासी की मजबूरी को भ्रष्टाचार का अवसर न बनाया जाए। आपने कहा कि विकास परियोजना के नाम पर विस्थापित होने वाले गरीब किसान और आदिवासी प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलताओं से अक्सर अनजान होते हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई कर्मचारी या अधिकारी उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर रिश्वत मांगता है तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि कमजोर और विस्थापित नागरिक के अधिकारों पर हमला है।
उन्होंने कहा कि हम विकास के विरोधी नहीं हैं। हमारी लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें कानून और अधिकारों को दरकिनार करके गरीब, किसान और आदिवासी को उसके ही अधिकारों के लिए भटकना पड़े। लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पूरी व्यवस्था की जांच कराए।
जय किसान संगठन की मुख्य मांगें -
- संतोष चिकवा रिश्वत प्रकरण की जांच को व्यापक किया जाए
- रिश्वतखोरी की पूरी कड़ी और संभावित लाभार्थियों की जांच हो
- संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जाए
- यदि जांच में किसी राजनीतिक व्यक्ति की भूमिका के साक्ष्य मिलते हैं तो उसकी भी निष्पक्ष जांच हो
- केन-बेतवा परियोजना के प्रभावित गांवों में मुआवजा, सर्वे, परिसंपत्ति मूल्यांकन और पुनर्वास प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए
- आदिवासी और किसान परिवारों की शिकायतों की स्वतंत्र सुनवाई कर उनका निराकरण किया जाए
अमित भटनागर ने कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पारदर्शिता, कानून और प्रभावित लोगों के अधिकारों के लिए है। एक पटवारी पकड़ा गया है तो जांच यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। अगर भ्रष्टाचार की जड़ें ऊपर तक हैं, तो उन्हें भी सामने लाना होगा। छोटी मछली पकड़कर बड़े भ्रष्टाचार को बचाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।












