Friday, February 13, 2026

प्राकृतिक खेती से कृषि लागत में आ सकती है कमी

  •  मौसम परिवर्तन के प्रभाव की रोकथाम के साथ प्राकृतिक खेती अपनाने से जलवायु एवं पर्यावरण भी रहेगा सुरक्षित


पन्ना। मौसम परिवर्तन (Climate Change) से फसल उत्पादन में कमी, अनिश्चित बारिश और कीटों का प्रकोप बढ़ा है। प्राकृतिक खेती मृदा स्वास्थ्य को सुधारकर, जल संरक्षण कर और कार्बन सोखकर (Carbon Sequestration) जलवायु अनुकूल लचीलापन प्रदान करती है। यह रसायनों का उपयोग कम कर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में भी मदद करती है, जिससे यह टिकाऊ कृषि का एक प्रमुख समाधान है। प्राकृतिक खेती न केवल जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करती है, बल्कि यह किसानों के लिए कम लागत में टिकाऊ आय का साधन भी बन रही है। 

हमारा देश कृषि प्रधान देश है। जलवायु में आ रहे परिवर्तन से किसान प्रभावित न हो इसके लिये जिले के जनकपुर में स्थिति केवीके के वैज्ञानिक लगातार सलाह दे रहे है। डा.पी.एन.त्रिपाठी,डा. आरके जायसवाल,डा.आरपी त्रिपाठी एवं रितेश बगोरा ने तकनीकी सलाह एवं किसान भाईयो को कम लागत से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की सलाह भी दे रहे हैं। जिले की कई संस्थाये प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।

मौसम में आ रहे परिवर्तन से फसल पर प्रभाव न पड़े इसके लिये किसान गेंहू एवं चने में पुष्प अवस्था में तापमान से राहत एवं नुकशान से बचने के लिये फसल को जीवन चक्र पूरा करने के लिये 05234 एवं वोरान का घोल बनाकर छिड़काव कर दें, ताकि पोषक तत्व  एवं पोषण मिले। वोरान पोषक तत्व है, फसल के जड़ो तक पहचेगा तो फसल उत्पादन अच्छा होगा। बोरान एवं 05234 का घोल गेहू एवं चना में डालने से फायदा होगा।

टमाटर एवं सब्जी के उत्पादन में जैविक खाद एवं कीटनाशक का उपयोग करें ताकि मानव जाति स्वास्थ्य रहे एवं किसान की लगात को कम किया जा सके।

प्राकृतिक खेती से उत्पादित सब्जियां न सिर्फ स्वास्थ्य को बेहतर रखती हैं अपितु इन सब्जियों का स्वाद भी रुचिकर होता है। प्राकृतिक खेती अपनाने से कृषि लागत में जहाँ कमी आयेगी वहीं पर्यावरण भी सुरक्षित होगा।

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