Thursday, April 19, 2018

सदानीरा केन नदी का बिगड़ रहा है स्वास्थ्य

  •   स्वच्छ नदियों में शुमार केन बुन्देलखण्ड की है जीवन रेखा  

  •   427 किमी लम्बी केन नदी की दो युवकों ने की पदयात्रा

केन नदी की पदयात्रा करने वाले युवक अपना अनुभव साझा करते हुये।

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की जीवन रेखा कही जाने वाली देश की स्वच्छ नदियों में शुमार सदानीरा केन नदी का स्वास्थ्य अब बिगड़ रहा है। कुछ दशक पूर्व तक जिस नदी में अविरल जल प्रवाह देखने को मिलता था वह अप्रैल के महीने में ही जगह-जगह सूखी और बेजान नजर आ रही है। केन नदी को सदानीरा बनाने वाली उसकी अधिकांश सहायक नदियां मृतप्राय हो चुकी हैं। मानवीय दखल बढऩे, जलागम क्षेत्रों में बांधों का निर्माण होने, भारी भरकम मशीनों से अनियंत्रित उत्खनन, वनों की कटाई, शहरीकरण और बदलते भू-उपयोग के चलते ऐसे हालात निर्मित हुये हैं। यह बात 427 किमी लम्बी केन नदी की पदयात्रा पूरी करने के उपरान्त सिद्धार्थ अग्रवाल व भीम सिंह रावत ने अपने अनुभव साझा करते हुये पन्ना में पत्रकारों को बताई।

केन नदी की भौगोलिक संरचना और अनूठेपन से अत्यधिक प्रभावित सिद्धार्थ अग्रवाल आईआईटी खडग़पुर से उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, जबकि भीम सिंह रावत उत्तरांचल पोड़ी गढ़वाल के निवासी हैं। प्रकृति, पर्यावरण और नदियों के संबंध में इन दोनों ही युवकों में गहरी समझ है। आप लोगों ने पत्रकारों को बताया कि कठिन भौगोलिक क्षेत्र होने के चलते इस पदयात्रा को तीन चरणों में पूरा किया, जिसमें पूरे 33 दिन लगे। लगभग 600 किमी पैदल यात्रा के दौरान बांदा व पन्ना जिले में केन नदी के तटों पर स्थित सौ से अधिक ग्रामों से होकर गुजरे। इनमें 60 से भी अधिक ग्रामों में रुककर ग्रामवासियों से केन नदी के अतीत एवं वर्तमान स्थिति पर रूबरू चर्चा की। 

यात्रा के दौरान यह एहसास हुआ कि केन नदी का इतिहास अत्यधिक समृद्ध रहा है। नदी के किनारे जहां सैकड़ों छोटे-बड़े धार्मिक स्थल देखने को मिले वहीं पौराणिक एवं प्राचीन कालीन स्मारकों के अवशेष भी जहां-तहां बिखरे पड़े नजर आये। आप लोगों ने बताया कि वास्तव में प्राचीन संस्कृति, इतिहास और नदी का संबंध शोध का बड़ा विषय है। पदयात्रा से पता चला कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना, अजयगढ़, छतरपुर और बांदा जिले में केन नदी पेयजल और सिंचाई का मुख्य श्रोत है।

अविरल से बरसाती बन रही है केन नदी


दस्तावेजों के अनुसार केन नदी बारामासी है। परंतु 33 दिवसीय पदयात्रा के दौरान केन नदी में सतत प्रवाह का अभाव देखा गया। गैरमानसूनी महीनों में नदी अनेक स्थानों पर पूरी तरह सूखी दिखी। इस वर्ष अप्रैल में पण्डवन पुल, अमानगंज के पास नदी में पानी पूरी तरह सूख चुका है। पण्डवन पुल से ऊपर नदी की लम्बाई लगभग 150 किमी है जिसमें से नदी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सूखा देखने को मिला। सहायक नदियों के संगम पर जिसे दुनाव अथाव दोनाव बोलते हैं, पर नदी में ठहरे हुये पानी के तालाब समान बड़े जलकुण्ड पाये गये। 

केन-सोनार नदी दोनाव से नीचे और ऊपर नदी अमूमन सूखी मिली और पदयात्रा नदी के बीचोंबीच चलकर तय की। साथ में नदी तल अनेक स्थानों पर बहुत गहरा है जिसमें पानी भरा हुआ मिला। परंतु नदी अविरलता से निरंतर नहीं बह रही है जिसके लिये ग्रामीण बढ़ती ङ्क्षसचाई की माँग, घटते जंगल और वर्षा अभाव को वजह मानते हैं। गाँववालों ने बताया कि एक दशक पहले नदी में जल प्रवाह की बेहतर स्थिति थी, उनके अनुसार कुछ दशक पूर्व तो नदी पूरी तरह से सदानीरा थी।

अनोखी है केन की भौगोलिक संरचना


पन्ना नेशनल पार्क के भीतर प्रवाहित केन का दृश्य।

केन नदी की भौगोलिक संरचना बहुत अनोखी है। केन घडिय़ाल प्राणी उद्यान में स्थित प्रसिद्ध स्नेह झरना, अमेरिका के ग्राण्ड केनयन घाटी का प्रतिबिम्ब है। उसी तरह पण्डवन झरना भी मनोहारी है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के अन्दर स्थित गहरी घाटी झरना और खड़ी पहाडिय़ां भी अद्भुत हैं। इसके अलावा नदी के मध्यम भाग में ग्रेनाइट, डालोमाइट, क्वार्टजाइट, काग्लोमरेट पत्थरों से बनी चट्टानें और पत्थरों के टुकड़े देखने को मिले। नदी के अन्दर सहजर नामक  कीमती पत्थर भी देखा गया। केन नदी तल में अनेक स्थानों पर गहरे, लम्बे कुण्ड बने हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में डबरा, दहार, दौं आदि नामों से जाना जाता है। 

इन कुण्डों में सालभर पानी भरा रहता है जिससे ग्रामीणें के पीने, खेती, पशुपालन, नौकाचालन, मछली पकडऩे की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इसके अलावा झीरना, झीना केन नदी का विशेष गुण है। भू-जल के रिसरिसकर नदी तट अथवा तल पर आकर नदी में मिलने को ग्रामीण झीरना बोलते हैं। नदी के झीरने के गुण के कारण ही गहरे नदी तलों खासतौर पर दहार में वर्षभर ताजा पानी देखने को मिलता है। गाँववालों के अनुसार बढ़ते भू-जल दोहन से जलागम क्षेत्र में केन नदी का झिरना कम होता जा रहा है जिससे नदी जल्दी सूख जाती है।

तटवर्ती ग्रामों के सूख चुके 95 फीसदी कुँये


केन नदी के तटवर्ती 95 फीसदी गाँवों में कुँये सूख चुके हैं। गर्मियों के समय हैण्डपम्प भी बेकार होते जा रहे हैं। साथ में अनेकों स्थानों पर कुँओं, हैण्डपम्पों में समरसिबल लगाने का चलन बढ़ता देखा गया है। गाँवों में तालाब भी उपेक्षा का शिकार हैं। गाँववालों के अनुसार केन नदी में कालांतर में जल प्रवाह लगातार घटता जा रहा है। जिसकी वजह से गाँव के जल श्रोतों कुँये, तालाबों, हैण्डपम्पों पर बहुत बुरा असर हुआ है। केन नदी में पानी की मात्रा कम होने से सैकड़ों मछवारों, मल्लाहों, नदी तट-तल पर बारीतरी की खेती करने वाले किसानों पर बहुत बुरा असर हुआ है।

प्रदूषण से नष्ट हो रहा प्राकृतिक गुण



केन नदी के किनारे बेरहमी के साथ काटे गये वृक्ष का द्रश्य। 


केन नदी का म.प्र. की स्वच्छ नदियों में गिना जाता है। अनेक स्थानों पर ग्रामीण नदी का पानी पीते हैं। जिसका बहुत बड़ा श्रेय गहरे दहार और झीरने के प्राकृतिक गुण को जाता है। परंतु नदी तट पर बसे बांदा शहर उ.प्र., पन्ना शहर (किलकिला धारा के जरिये), अमानगंज तहसील (मिढ़ासन नदी के माध्यम से) और शाहनगर तहसील का गंदा पानी बिना उपचारित किये केन नदी में मिल रहा है। इन शहरों से बायोमेडिकल वेस्ट और विषैले अपशिष्ट केन नदी में बहाये जा रहे हैं जिससे नदी जल की गुणवत्ता के साथ-साथ नदी जैव विविधता पर भी विपरीत असर हो रहा है। जिस पर संबंधित विभागों और सरकार का ध्यान नहीं गया है।

संकट में है केन नदी की जैव विविधता


जैव विविधता की दृष्टि से केन नदी समृद्ध है। नदी के तटों पर यात्रा के दौरान 50 से अधिक पेड़ों, 30 से अधिक वनस्पतियों, 30 से अधिक स्तनधारी, सरीसृप, कीट पतंगों की प्रजातियां देखी गईं। नदी जल और तट पर 60 से अधिक प्रजाति के पक्षी देखने को मिले। साथ में 12 से अधिक प्रकार की मछलियों के नाम सुनने को मिले। इसके अलावा केन नदी में कई प्रकार और आकार की सीपियां भी देखने को मिलीं। 

कई स्थानों पर बिलकुत्ता (नदी झीगुर), केकड़ा और जुगनू भी देखने को मिले। पदयात्रा के दौरान नदी तटों पर अवांछित खरपतवार और पेड़ जैसे विलायती कीकर, लैन्टाना, गाजर घास आदि भी बहुत बड़े भू-भाग पर फैली हुई मिली। मछवारों के अनुसार नदी में महाशीर मछली की संख्या बहुत कम हो गई है। ग्रामीणों ने बताया कि केन नदी पर बनी बांधों, बैराजों की योजनाओं और अनियंत्रित शिकार से जलीय जीवों मछलियों, कछुओं, मगर, घडिय़ाल की संख्या भी बहुत कम होती जा रही है।

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