Thursday, December 20, 2018

ढाई सौ एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि में तैयार कराया जंगल

  • पुराने टाईगर कॉरीडोर को विकसित करने अनूठी पहल 
  • पर्यावरण संरक्षण के साथ हो रही लाखों रुपए की कमाई 



खेत में तैयार जंगल के बीच खड़े केशव प्रताप सिंह व श्रीमती दिव्यारानी। फोटो - अरुण सिंह 

अरुण सिंह,पन्ना। कथाओं से भरे इस देश में एक कथा बाघ भी है। आज बाघों को अखबारों में छपने के लिए जगह तो खूब मिल रही है लेकिन छिपने के लिए ओट नहीं मिलती। वनों के प्रबंध में जनता की भागीदारी न होने से इंशान और वन्य जीवों के बीच संघर्ष बढ़ते जा रहे हैं। विकासवादी पर्यावरण के महत्व को दरकिनार करके सबको कार सबको मोबाइल का नारा लगाते हैं और पर्यावरणवादी वापस गुफाओं में लौट जाने की जिद करते दिखाई दे रहे हैं। दोनों ही मार्ग सर्वमान्य और सुखद नहीं हो सकते, जाहिर है कि हमें बीच का रास्ता अपनाना होगा। विकास ऐसा हो जो लोगों को प्रकृति से जोड़े रखे वही लम्बे समय तक चल पायेगा।
बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले में पर्यावरण संरक्षण और विकास को लेकर विगत लम्बे समय से तीखी बहश व तनातनी चली आ रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि इस जिले की भौगोलिक स्थिति व विशाल वन क्षेत्र को देखते हुए यहां का औद्योगिक विकास तो हो नहीं सका लेकिन नैसर्गिक विकास की जो संभावनायें थीं वे भी फलीभूत नहीं हो सकीं। ऐसे समय पर पन्ना शहर के एक बेहद प्रतिष्ठित और सुशिक्षित परिवार ने जिलावासियों को नई राह दिखाई है। कुंवर केशव प्रताप सिंह तथा उनकी पत्नी श्रीमती दिव्यारानी सिंह ने पर्यावरण संरक्षण व विकास के बीच तालमेल बैठाते हुए अपनी उपजाऊ कृषि भूमि में प्लान्टेशन कराने का निर्णय लिया है। अब तक इन्होंने तकरीबन ढाई सौ एकड़ भूमि में क्लोन प्रजाति के यूकेलिप्टस लगवाये हैं, फलस्वरूप इस भूमि में घने जंगल जैसा दृश्य नजर आने लगा है। केशव प्रताप सिंह के मुताबिक इस पहल से जहां पर्यावरण में सुधार व पर्यावरण का संरक्षण होगा वहीं कृषि उत्पादन के ही समतुल्य यूकेलिप्टस के इस जंगल से मोटी आय भी होगी।
पर्यावरण एवं वन्य जीवों पर खासी रूचि रखने वाले केशव प्रताप सिंह ने बताया कि उन्हें अपने बड़े बुजुर्गों तथा पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक रह चुके आर श्रीनिवास मूर्ति से यह पता चला कि दशकों पूर्व पन्ना से बांधवगढ़ तक जंगल का भरा पूरा गलियारा था, जहां से होकर बाघों का आना जाना होता रहता था। लेकिन आबादी बढऩे के साथ - साथ तेजी से जंगल कटने पर बाघों का यह पुराना गलियारा (कॉरीडोर) नष्ट हो गया। जिसके चलते बाघों का नैसर्गिक जीवन प्रभावित हुआ और यहां के जंगलों से बाघ विलुप्त हो गये। आपका कहना है कि बाघों को सुरक्षा व संरक्षण के साथ - साथ उस पूरे तंत्र को भी बचाया जाना जरूरी है, जहां बाघों को जीवन के अनुकूल जगह मिल सके। यह बात हमारे जेहन में जब आई तो हमने यह निश्चय किया कि किसी भी तरह दशकों पुराने बाघ कॉरीडोर को फिर विकसित किया जाय। इस काम में दूसरे लोग आगे आयें, इससे पूर्व शुरूआत हमने की और उसके बड़े ही सार्थक व उत्साह जनक परिणाम भी आने लगे हैं। केन नदी के किनारे कृषि भूमि में घना जंगल तैयार होने से अन्य दूसरे लोग भी पौध रोपण करने के लिए प्रेरित हुए हैं जिससे कॉरीडोर विकसित किये जाने के प्रयासों को बल मिला है। केशव प्रताप सिंह बताते हैं कि श्यामेन्द्र सिंह बिन्नी राजा, शेखर व हेमराज से भी उन्हें टाइगर कॉरीडोर के बारे में जानकारी मिली फलस्वरूप तीन - चार साल पूर्व तक जहां एक भी पेड़ नहीं थे वहां अब जंगल लहलहाने लगा है।

बाघ पन्ना 212 ने भी की थी कॉरीडोर की खोज 



कॉरीडोर से होकर गुजरता बाघ पन्ना 212

पन्ना टाइगर रिजर्व के युवा बाघ पी - 212 ने भी पन्ना - बांधवगढ़ तथा संजय टाइगर रिजर्व के खोये हुए पुराने कॉरीडोर को खोज निकालने में सफलता हासिल की थी। विगत वर्ष मार्च के महीने में इस बाघ ने तमाम तरह की कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करते हुए केन से सोन तक का लम्बा फासला तय किया और अपने नये ठिकाने तक जा पहुंचा। अपनी इस यात्रा के दौरान पी - 212 ने यह सीख भी दी कि मानव जीवन के लिए प्रकृति के साथ संतुलन बेहद जरूरी है। राजाशाही जमाने के पुराने जानकार यह बताते हैं कि पण्डवन से लेकर कल्दा पहाड़ तक अच्छा जंगल था, यहां से होकर हमेशा बाघ व तेंदुआ गुजरते रहे हैं। बाघों का यह सदियों पुराना रास्ता है जिसे फिर से विकसित किये जाने के प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय हैं।

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