Friday, March 20, 2026

पेड़ों व घरों के बाहर पक्षियों को आश्रय देने लटका रहे कृत्रिम घोंसले

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सेवानिवृत्त सहायक महानिर्देशक डा.सदाचारी सिंह तोमर ने की पहल 
  • पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने कहा कि वर्तमान में बड़े संकट में हैं हमारे सहचर पक्षी, इनका संरक्षण जरुरी  


नवरात्रि में जहां लोग तरह तरह के सेवा के कार्य शुरू करते है वहीं मध्यप्रदेश के सतना जिले में उचेहरा क्षेत्र के डुडहा गांव के भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सेवानिवृत्त सहायक महानिर्देशक डा.सदाचारी सिंह तोमर द्वारा पक्षियों के लिए पहल करते हुए घोंसले बनाकर पेड़ों व घरों के बाहर लटकाने का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पद्मश्री बाबूलाल दाहिया व अध्यक्षता चंद्रिका तोमर कोल माइंस (टेक्निकल प्रबंधक) छत्तीसगढ़ रहे। इस दौरान घोंसले बनाकर घर के अलग-अलग जगह पेड़ों पर टांगे गए है। 

पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने कहा कि वर्तमान में हमारे सहचर पक्षी बड़े संकट में हैं। चिड़ियों से मनुष्य की प्राचीन समय से ही समीपता रही हैं। धार्मिक साहित्यिक कोई भी ग्रंथ हों, किसी भी देश काल या वहां की भाषा में हों लेकिन पक्षियों का वर्णन उनमें अवश्य मिलता है। हमारे बघेली में तो अनेक गीत, मुहावरे, लोकोक्तियां, पहेलियां और लोक कथाएं ही चड़ियों पर आधारित हैं। प्राचीन समय में जब आज जैसे यातायात के साधन नही थे और लोग पैदल ही यात्राएं करते तब अक्सर कहते कि "भइया चुहचुहिया बोलत हामी चल देय क है?" क्योंकि पेड़ों में आराम फरमाती चिड़ियां चार बजे भोर से ही चूं चूं बोलने लगती थीं। 

भले ही गौरेया चिड़िया मुर्गे मुर्गी की तरह मनुष्य की गुलामी स्वीकार न करते हुए हमेशा एक दूरी बनाकर ही रही हो परंतु वह वहीं पाई जाती है जहां - जहां मनुष्य की बस्ती है और मनुष्य के आंगन का दाना ही चुगती है। प्राचीन समय में जब गांव घने जंगलों के बीच हुआ करते थे तो लोगों को यदि गौरेया दिख जाएं तो समझ जाते थे कि "आस पास ही कोई गांव होगा। यही हाल गलरी, पेंगा आदि कुछ मैना प्रजाति की अन्य चिड़ियों का भी है जो किसानों के खेतों ,बागानों आदि में लगने वाले कीड़ों को खाकर ही अपना जीवन यापन करती हैं। प्राचीन समय में एक लोक मान्यता ही हुआ करती थी कि "अगर गौरेया किसी गांव को छोड़ कर चली जाय तो उसका अर्थ था कि गांव में हैजा आदि कोई महामारी आने वाली है।"


गर्मी में पानी की कमी तो हर वर्ष आती ही है और बहुत से दयालु लोग घड़े के अर्ध भाग को फोड़ किसी छायादार पेड़ की डालियों में बांध पानी का प्रबंध भी कर देते हैं। लेकिन सबसे अधिक संकट उनके वंश परिवर्धन का है। मैना, दर्जिन आदि चिड़ियों के घोंसले तो सर्व विदित हैं। पर कुछ पक्षी अपने अंडे पेड़ के कोटर में रखते थे। लेकिन अब जब कहीं बड़े पेड़ बचे ही नहीं तो वे बेचारे कहां अंडे रखें ? एक छोटी सी फुदकैली चिड़ियां घरों के पास उगी सघन झाड़ियों के बीच अपनी छोटी सी पाल बनाकर अंडे रखती थी, जिससे कौए की नजर से बचाकर वे अंडे बच्चे पाल सके। किन्तु अब हर जगह कंक्रीट पुत जाने के कारण ऐसी झाड़ियां ही नहीं बची।  

गौरेया बिल्ली और कौआ की नजर बचा कच्चे मकानों के अंदर किसी छेंद, झोपड़ी की ठाठ अथवा घर के आस पास बने घोंपा छतुरा आदि में अंडे रखती थी। लेकिन आज न तो कच्चे मकान झोपड़ी आदि बचे न ही घोंपा छतुरा ही। और यदि पक्के मकानों में कहीं छिद्र भी हैं तो उनमें इतना ताप बढ़ जाता है जिससे अंडों से बच्चे ही नही बन पाते। इसलिए एक मुश्किल बात यह भी आ रही है कि मनुष्य के फसलों की रक्षा करने वाले उसके यह सहचर पक्षी कैसे अपना वंश परिवर्धन करें ? इतना ही नहीं कुछ पक्षी तो मौसम के परिचायक होते हैं। टिटिहरी उपना अंडा नालों के बीच बालू में रखती है पर वह तभी वहां अंडे रखेगी जब मौसम 10-12 दिन का सूखा रहने की संभावना हो।

इसी तरह जिस वर्ष बया घने पत्तों के नीचे घोषला बनाए उसका अर्ध है कि उस वर्ष अधिक वर्षा होगी। चंद्रिका तोमर ने कहा कि मौजूदा समय में पेयजल की किल्लत गहराती जा रही है। ऐसे में कई बार पक्षियों को पानी नहीं मिल पाता। इसके साथ ही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के चलते पक्षी अपना घोंसला भी नहीं लगा पाती। ऐसे में पक्षियों को बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी आगे आएं। 

श्री तोमर ने कहा कि यह घोंसले डिब्बे नुमा होते हैं, जिसमें चिड़ियों के जाने के लिए एक छेंद रहता है। और उसमें वे तिनके आदि रख कर आसानी से अपनी सुरक्षित पाल बना सकती हैं। शुरू में एक घोषला जो उनने परीक्षण के लिए लगाया था, उसमें एक चिड़िया ने अपने अंडे रख भी लिया है। यही कारण है कि उनने अब दर्जनों उसी तरह के घोंसले बनवा कर लटकवा रहे हैं। अगर दो चार किस्म की चिड़ियों ने उसे अपना लिया तो वे इस तरह के कुछ और अभिनव प्रयोग करेंगे और लोगों को प्रेरित करने के लिए अब जागरूकता अभियान भी करेंगे। 

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