- यदि न चेते तो विषाक्त होती धरती में जीवन कठिन हो जायेगा
- सह-अस्तित्व की भावना को मजबूती दें व प्रकृति का श्रंगार करें
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पन्ना जिले में सलेहा के निकट स्थित पहाड़ी जो उजड़ चुकी थी, रचनात्मक प्रयासों से अब वह हरी-भरी है। |
पन्ना। हर साल 21 मार्च को दुनिया भर के लोग विश्व वानिकी दिवस मनाते हैं, यह दिन हमारे ग्रह और उसके निवासियों के लिए वनों के अत्यधिक महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। वन हमारे ग्रह की जीवन रेखा हैं, जो लाखों लोगों को ऑक्सीजन, भोजन, दवा और आजीविका प्रदान करते हैं। यहाँ यह विचारणीय है कि मौजूदा समय हम जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान की लगातार बढ़ती चुनौतियों से जूझ रहे हैं। वन इन मुद्दों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह पृथ्वी हमारे सौरमंडल का सबसे ज्यादा जीवंत और सुंदर ग्रह है। यह खूबसूरत है क्योंकि पृथ्वी में न जाने कितने प्रकार की वनस्पतियां, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और पक्षी हैं। यह पृथ्वी इन सब का घर है, इसमें मानव भी शामिल है। लेकिन इस जीवंत और हरे-भरे ग्रह को मानव ने इतने गहरे जख्म दिये हैं कि प्रकृति का पूरा संतुलन ही डांवाडोल हो गया है। हमने अपनी महत्वाकांक्षा और निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु बड़ी बेरहमी के साथ धरती की हरियाली को उजाड़ा है। जिससे न जाने कितने जीव जंतु बेघर होकर विलुप्त हो चुके हैं। हमारी नासमझी पूर्ण बर्ताव का खामियाजा अब हमें ही भोगना पड़ रहा है।
हमारी धरती दिनों दिन इस कदर विषाक्त होती जा रही है कि भविष्य में यहां जीवन कठिन हो जायेगा। हमने अभी तक पृथ्वी से सिर्फ लिया है, उसका भरपूर दोहन किया है उसे वापस कुछ भी नहीं लौटाया, जिससे प्रकृति का संतुलन तहस-नहस हो गया है। प्रकृति और पर्यावरण की बिना परवाह किये हम जंगलों को उजाड़ रहे हैं, नदियों के नैसर्गिक स्वरूप को बिगाड़ कर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि अब मौसम का क्रम बदलने लगा है और जंगल कटने से ऑक्सीजन की कमी के कारण फेफड़ों की बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। मनुष्य अपनी भौतिक उपलब्धियों से इस कदर बौराया हुआ है कि अपने को वह सर्वोपरि मानने लगा है। वह प्रकृति के शाश्वत नियमों की अनदेखी कर रहा है, जो अत्यधिक खतरनाक और विनाशकारी है।
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पन्ना के खूबसूरत जंगल जिन्हे सहेजकर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। |
अब यह निहायत जरूरी हो गया है कि हम समझदारी दिखायें और प्रकृति व पर्यावरण से खिलवाड़ बंद करें। यह पृथ्वी जितनी हमारी है उतनी ही पेड़-पौधों, वनस्पतियों, जीव-जंतु और पक्षियों की भी है। हमें सह- अस्तित्व की अहमियत को समझना होगा, क्योंकि गहरे में सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी की भी कमी पूरे प्राकृतिक चक्र व संतुलन को प्रभावित करती है। अभी तक हम जिस सोच और समझ के साथ जिए हैं वह रास्ता विनाश की ओर जाता प्रतीत होता है। लेकिन हम विनाश की आ रही आहट को अनसुना कर रहे हैं और अपने को श्रेष्ठ साबित करने तर्क भी गढ़ लेते हैं।
मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई चीज जब नष्ट की जाती है तो उसे बर्बरता कहा जाता है, लेकिन हम प्रकृति द्वारा सृजित किसी चीज को जब नष्ट करते हैं तो हम इसे प्रगति और विकास कहते हैं। इस तरह के दोहरे मापदंड प्रकृति, पर्यावरण व समूची पृथ्वी के अस्तित्व के लिए घातक है। इसलिए समझदारी इसी में है कि हम पृथ्वी का सम्मान करते हुए सह-अस्तित्व की भावना को मजबूती प्रदान करें तथा प्रकृति और पर्यावरण के साथ अत्याचार पर रोक लगाते हुए प्रकृति का श्रंगार करें।
बेहतर पर्यावरण के लिए जंगल कितना होना चाहिए
बेहतर पर्यावरण के लिए जंगल की मात्रा एक महत्वपूर्ण सवाल है। विशेषज्ञों और नीतियों के अनुसार, किसी देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 33% हिस्सा जंगलों से आच्छादित होना चाहिए ताकि पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। यह आंकड़ा भारत की "राष्ट्रीय वन नीति" (1952, संशोधित 1988) में भी निर्धारित किया गया है, जो यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है कि वन क्षेत्र जलवायु स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण, मिट्टी संरक्षण और वायु शुद्धिकरण में योगदान दे सके।
अब भारत की स्थिति की बात करें: नवीनतम "भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023" (ISFR 2023) के अनुसार, भारत का वन और वृक्ष आवरण कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। इसमें से 21.76% वन आवरण (forest cover) और 3.41% वृक्ष आवरण (tree cover) है। यानी कुल मिलाकर 8,27,357 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वनों और वृक्षों से ढका है। यह 33% के लक्ष्य से अभी भी कम है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें वृद्धि देखी गई है। उदाहरण के लिए, 2021 की तुलना में 2023 में वन और वृक्ष आवरण में मामूली बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि, केवल प्रतिशत ही पूरी कहानी नहीं बताता। वनों की गुणवत्ता, घनत्व, और जैव विविधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारत में कई क्षेत्रों में वनों की कटाई, शहरीकरण, और औद्योगीकरण के कारण चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन वृक्षारोपण और संरक्षण प्रयासों से स्थिति सुधर रही है। फिर भी, 33% के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत है, जैसे कि पुनर्वनीकरण (reforestation), अवैध कटाई पर रोक, और स्थानीय समुदायों को शामिल करना।
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