Friday, April 4, 2025

पानी की तलाश में भटके चीतल का आवारा कुत्तों ने किया शिकार

आवारा कुत्तों के हमले में असमय काल कवलित हुए चीतल का हुआ दाह संस्कार। 

पन्ना। गर्मी के इस मौसम में पानी न मिलने पर जंगली जानवर आबादी क्षेत्रों की ओर रुख करने लगे हैं। पानी की तलाश में भटकते हुए जानवरों का आबादी क्षेत्र में आना उनके लिये जानलेवा साबित हो रहा है। पन्ना टाइगर रिज़र्व के पन्ना बफ़र क्षेत्र में गत सायं एक मादा चीतल पानी के तलाश में झिन्ना स्थित गौशाला के निकट पहुँच गई। वहां मौजूद आवारा कुत्तों ने इस मादा चीतल पर हमला बोल दिया, फ़लस्वरूप चीतल की मौत हो गई।  

वन परिक्षेत्राधिकारी पन्ना बफर अमर सिंह बताया कि गुरुवार को शाम के समय मादा चीतल झिन्ना स्थित गौशाला के पास पहुँच गया था। यहाँ पर आवारा कुत्तों ने चीतल को घेरकर हमला कर दिया। कुत्तों के हमले में जख्मी हो चुके चीतल की मौत हो गई। मृत चीतल का पोस्ट मॉर्टम आज वन परिक्षेत्राधिकारी पन्ना बफर कार्यालय खजरी कुडार में वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता द्वारा किया गया। पोस्ट मॉर्टम के उपरांत मृत चीतल के शव को  कार्यालय परिसर के निकट ही जला दिया गया है। इस मौके पर एनटीसीए के प्रतिनिधि, सरपंच व वन अधिकारी मौजूद रहे। 


उल्लेखनीय है कि गर्मी के मौसम में इस तरह की घटनायें अब आये दिन सुनने को मिल रही हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये वन विभाग को जंगल में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना चाहिए ताकि प्यास से व्याकुल वन्य प्रांणी मजबूरन आबादी क्षेत्र में आकर असमय काल कवलित न हों। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये जो भी प्रयास हुए हैं, वे नाकाफी हैं। ज्यादातर वन क्षेत्रों में पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। नदी नाले जहां वन्य प्रांणी पानी पीते रहे हैं, वे सूख चुके हैं। ऐसी स्थिति में पानी की तलाश में वन्य प्रांणी जंगल से आबादी क्षेत्र के आस-पास स्थित जल श्रोतों की तरफ आने लगे हैं। जिसके कारण वन्य प्रांणी जहां कुत्तों के हमले का शिकार हो रहे हैं, वहीं शिकारियों का भी निशाना बन रहे हैं। 

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Saturday, March 29, 2025

पन्ना में डायमंड पार्क के निर्माण से रोजगार के नये अवसरों का होगा सृजन

  • पन्ना के निकट जनकपुर में 11 हेक्टेयर भूमि हुई आरक्षित 
  • इस हेतु 1265.46 लाख रु. की मिली है प्रशासकीय स्वीकृति
  • बहुप्रतीक्षित मांग पूरी होने पर प्रशन्न हैं पन्ना के व्यवसाई 

डायमंड पार्क की यह खूबसूरत इमेज AI द्वारा जनरेट की गई है। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बेशकीमती हीरों के लिये प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना शहर के निकट जनकपुर में शीघ्र ही डायमंड पार्क की स्थापना का कार्य शुरू होगा। खजुराहो सांसद वी.डी.शर्मा के प्रयासों से डायमंड पार्क जनकपुर की स्थापना के लिए 1265.46 लाख रूपए की प्रशासकीय स्वीकृति मिली है। पार्क के लिए जनकपुर में 11 हेक्टेयर भूमि आरक्षित की जा चुकी थी। पूर्व में एमएसएमई विभाग द्वारा डायमंड पार्क की स्थापना की सैद्धांतिक स्वीकृति भी प्रदान की गई थी।

पन्ना के जनकपुर में डायमंड पार्क की स्थापना से पर्यटन को जहाँ बढ़ावा मिलेगा, वहीं रोजगार के भी नये अवसरों का सृजन होगा। बाहर से आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को डायमंड पार्क में हीरे के संबंध में हर तरह की जानकारी आसानी से प्राप्त हो सकेगी। उल्लेखनीय है कि हीरा की खदानों के लिये अपनी एक अलग पहचान रखने वाले पन्ना शहर में डायमंड पार्क की स्थापना हेतु विगत डेढ़ - दो दशक से हीरा कारोबारी व नगर के लोग मांग करते आ रहे हैं। इस दिशा में पहल और प्रयास भी हुये, लेकिन डायमंड पार्क मूर्त रूप नहीं ले सका। लम्बी प्रतीक्षा के बाद पन्ना में डायमंड पार्क बनने का मार्ग प्रशस्त होने से पन्ना जिले के लोगों में जहां भारी प्रशन्नता है, वहीं हीरा व्यवसाई भी खासा उत्साहित हैं।

अधिकृत जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश शासन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विभाग द्वारा अब जारी की गई राशि से बिटूमन रोड, आरसीसी, नाली, ह्यूम पाईप कल्वर्ट, विद्युतीकरण, ट्यूबवेल, जल प्रदाय लाइन, ओवर हेड, अंडर ग्राउंड वाटर टैंक, वॉटर हार्वेस्टिंग एवं साइन बोर्ड इत्यादि का कार्य प्रारंभ किया जाएगा। सांसद श्री शर्मा ने इस सौगात के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं सूक्ष्म, लद्यु एवं मध्यम उद्यम मंत्री चैतन्य कुमार कश्यप का आभार ज्ञापित किया है। उद्योग से जुडे़ व्यापारियों ने भी इस सौगात के लिए हर्ष जताया।

सर्वश्रेष्ठ है पन्ना के हीरों की गुणवत्ता 

रत्नगर्भा पन्ना की धरती से निकलने वाले हीरों की गुणवत्ता सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। जेम क्वालिटी वाले यहां के हीरे जहां बेशकीमती होते हैं वहीं हीरा के शौखीन लोगों की भी यह तमन्ना रहती है कि उन्हें पन्ना की खदान का हीरा मिल जाये। मालुम हो कि पन्ना में अत्याधुनिक तकनीक से संचालित होने वाली जहां एनएमडीसी हीरा खदान है, वहीं सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोगों द्वारा उथली खदानें भी चलाई जाती हैं। इन खदानों से प्रति वर्ष अरबों रुपये के हीरे निकलते हैं। डायमंड पार्क की स्थापना होने से पन्ना में हीरा व्यवसाय को जहां पंख लगेंगे, वहीं हीरों की चोरी छिपे बिक्री व स्मगलिंग पर भी रोक लगेगी।  

हीरा कार्यालय में रिक्त पदों की हो पूर्ति 

बहुप्रतीक्षित डायमंड पार्क के निर्माण हेतु राशि की स्वीकृति पन्ना के लिए बड़ी खुशखबरी है। कलेक्ट्रेट परिसर स्थित खनिज कार्यालय पन्ना के ठीक सामने स्थित शासकीय भूमि पर नवीन हीरा कार्यालय भवन का भी निर्माण प्रगति पर है। अब उम्मीद यह की जाती है कि नवीन हीरा कार्यालय भवन का निर्माण होने के साथ ही इस कार्यालय में वर्षों से रिक्त पड़े पदों को भी शीघ्र भरा जायेगा ताकि हीरा कार्यालय का कार्य ठीक ढंग से संपादित हो सके। 

मालूम हो कि पन्ना स्थित देश के इकलौते हीरा कार्यालय में हीरा अधिकारी सहित हीरा पारखी एक सीनियर व तीन जूनियर, इंस्पेक्टर के तीन पद, ऑफिस सुपरिटेंडेंट एक पद, लिपिक चार पद, हवलदार तीन पद, सिपाही तीस पद, मेठ तीन पद, क्षेत्रीय सहायक एक पद, ड्राइवर एक पद, चौकीदार दो पद तथा भृत्य के दो पद स्वीकृत हैं। लेकिन मौजूदा समय इस ऑफिस में हीरा पारखी सहित कुल चार-पांच कर्मचारी ही बचे हैं, जिससे हीरा कार्यालय का कार्य बेहतर तरीके से नहीं चल पा रहा।  

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Thursday, March 27, 2025

पन्ना पुलिस ने सायबर अपराध में लिप्त गिरोह का किया पर्दाफाश, तीन आरोपी गिरफ्तार

  • आरोपियो द्वारा 40 म्यूल बैंक खातो के माध्यम से लगभग 02 करोड़ रूपये की राशि का किया गया लेन-देन
  • ग्रामीण क्षेत्र के भोले-भाले लोगों को पैसों का लालच देकर शातिर आरोपी खाता खुलवाने के लिए करते थे राजी 

आयोजित प्रेस वार्ता में पत्रकारों को जानकारी देते हुए पुलिस अधीक्षक पन्ना साई कृष्ण एस. थोटा। 

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की पुलिस ने सायबर अपराध में लिप्त गिरोह के तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियो द्वारा पन्ना जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न लोगों के नाम पर खुलवाये गये करीब 40 म्यूल बैंक खातो के माध्यम से लगभग 02 करोड़ रूपये की राशि का लेन-देन किया गया है। मामले में पुलिस टीम द्वारा आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त 02 मोबाइल कीमती करीब 40 हजार रूपये के जप्त किये गये हैं।

पुलिस अधीक्षक पन्ना साई कृष्ण एस. थोटा ने आज सायं आयोजित प्रेस वार्ता में पत्रकारों को बताया कि ग्रामीण अंचल में निवासरत भोले-भाले लोगों के नाम पर बैंक खाते खुलवाकर उन खातों का उपयोग साइबर अपराधों में करने वाले आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार आरोपियों को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के तहत जेल भेज दिया गया है। 

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि आरोपियों ने फरियादी राजीलाल गौड़ पिता देवीदीन गौड़ 35 वर्ष, निवासी ग्राम रमखिरिया के नाम पर बैंक ऑफ महाराष्ट्र, पन्ना में एक खाता खुलवाया। दो दिन बाद बैंक से उसे खाता संख्या 60513341259 की पासबुक और एटीएम कार्ड प्राप्त हुए, लेकिन आरोपियों ने उसका बैंक खाता में दर्ज सिम कार्ड सहित चेकबुक एवं एटीएम कार्ड अपने पास रख लिया। फरियादी की रिपोर्ट पर थाना बृजपुर में आरोपियों के विरुद्ध अप.क्र. 21/25 धारा 318(4) बीएनएस का पंजीबद्ध कर प्रकरण विवेचना में लिया गया है।

आरोपियों द्वारा बृजपुर थाना क्षेत्र में अन्य व्यक्तियों के नाम पर भी इसी तरह से बैंक खाते खुलवाए गए हैं। जिन लोगों के बैंक खता खुलवाए गए हैं, उनमें बीरन गौड़ के नाम पर 6 बैंक खाते, 6 एटीएम कार्ड और नया सिम कार्ड, सुरोमन गौड़ के नाम पर 3 बैंक खाते, 3 एटीएम कार्ड और 2 नए सिम कार्ड, दिनेश गौड़ के नाम पर 1 बैंक खाता, 1 एटीएम कार्ड और 1 सिम कार्ड तथा सुंदरलाल गौड़ एवं संतोष गौड़ के नाम पर भी खाते खुलवाकर उनके एटीएम कार्ड और सिम कार्ड आरोपियों ने अपने पास ही रखे। 

इसके अलावा जनकपुर और पन्ना के कुछ अन्य लोगों के नाम पर भी आरोपियों द्वारा इसी तरह बैंक खाता खुलवाये जाने की जानकारी प्राप्त हुई है। आरोपियों द्वारा उक्त बैंक खातों का उपयोग करके अवैधानिक रूप से कई लोगों के साथ सायबर धोखाधड़ी की जाकर वित्तीय लेन-देन किया गया है।

पुलिस सायबर सेल टीम पन्ना से मिली जानकारी एवं मुखबिर सूचना के आधार पर पुलिस टीम द्वारा मामले में 02 आरोपियों को पूर्व में बस स्टैण्ड से गिरफ्तार किया चुका है। जबकि मामले में फरार 01 आरोपी को गत  26 मार्च को राजस्थान में अजमेर-ब्यावर हाइवे से पुलिस अभिरक्षा में लिया जाकर पूँछताछ की गई, जिसके द्वारा अपराध कारित किया जाना स्वीकार किया गया। मामले की विवेचना के आधार पर फरार अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही है, जिन्हे जल्द ही गिरफ्तार किया जावेगा।

 पुलिस द्वारा गिरफ्तार किये गए आरोपियों में अरबाज खान पिता नूरू खान उम्र 21 वर्ष निवासी ग्राम बेला थाना सीकरी जिला डींग राजस्थान, असगर खान उर्फ राजू पिता आमीन खान उम्र 22 वर्ष निवासी सगौड़ी थाना लक्ष्मणगढ़ तथा अय्यूब खान उर्फ अय्यान पिता हनीफ खान उम्र 34 वर्ष निवासी जालकटी डीगर थाना अल्मोड़ा राजस्थान शामिल हैं। पुलिस अधीक्षक पन्ना द्वारा सायबर अपराध के इस मामले का पर्दाफास करने वाली पुलिस टीम को पुरुस्कृत किये जाने की घोषणा की गई है।

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घर-आंगन गौरैयों की चहचहाहट से हुआ गुलजार

अपने आशियाने से बाहर की तरफ झांकती गौरैया। 

इन दिनों हमारे घर का आंगन नन्ही सी चिड़िया गौरैया की चहचहाहट से गुलजार है। पिछले दिनों आंगन में ऊपर दीवार पर गौरैया के लिए एक छोटा सा आशियाना बनाकर कील में टांग दिया था। कुछ दिन यह आशियाना सूना पड़ा रहा, लेकिन जल्दी ही दो  गौरैयों को यह पसंद आ गया। अब तीन-चार दिनों से इस आशियाने को घास फूस से दोनों सजाने और संवारने में जुटी हुई हैं।

सुबह से इन नन्ही चिड़ियों का आँगन में लगे आशियाने पर घास-फूस चोंच में लेकर आने और फिर से वही प्रक्रिया करने का शिलशिला शुरू हो जाता है। उनका यह कार्य पूरे दिन तक़रीबन 4 बजे तक चलता है। उनके श्रम को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आशियाने को उन्हें जल्द से जल्द सजा संवारकर तैयार करना है। सुबह चाय पीते हुए आँगन में इन पक्षियों की धमाचौकड़ी देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है। 

मालुम हो कि हर साल 20 मार्च को घर-आंगन में दिन उगने के साथ ही इधर - उधर फुदकने वाली नन्हीं चिडिय़ा गौरैया के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए गौरैया दिवस मनाया जाता है। क्योंकि डेढ़ दो दशक पहले तक घरों के आसपास बहुलता से नजर आने वाली नन्हीं चिडिय़ा गौरैया की चहचहाहट अब गुम सी हो रही है। गौरैया की घटती संख्या को देखते हुए ही इसके संरक्षण के लिए "विश्व गौरैया दिवस" पहली बार वर्ष 2010 में मनाया गया। 

बीते 20 मार्च विश्व गौरैया दिवस के मौके पर फेसबुक में मैंने एक पोस्ट लिखी, इस पोस्ट को पढ़कर मेरी पत्नी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सिर्फ लिखने भर से गौरैया वापस आने वाली नहीं है। इसके लिए कुछ सार्थक पहल और प्रयास करते हुए गुम हो रही गौरैयों को प्रेम से बुलाना होगा। पत्नी की यह बात जमी और मैंने उसी दिन गत्ते का एक छोटा सा आशियांना बड़े जतन से बनाया और ऊसे आँगन की दीवार में ऊपर सुरक्षित जगह पर कील के  सहारे टांग दिया। 

कई दिन यह टंगा रहा, लेकिन चार-पांच दिन पूर्व गौरैयों का एक जोड़ा आया और जायजा लेकर चला गया। फिर क्या दूसरे ही दिन से इस आशियाने को अपने अनुकूल बनाने का सिलसिला इन्होने शुरू कर दिया जो अभी भी जारी है। मैं अत्यधिक खुश और संतुष्ट हूँ की मेरा छोटा सा प्रयास व प्रेमपूर्ण आमंत्रण सार्थक हुआ। गौरैयों ने आमंत्रण को स्वीकार कर लिया है।


गौरैया चिडिय़ा बहुत ही संवेदनशील पक्षी है, मोबाइल फोन तथा उनके टावर्स से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन से भी उनकी आबादी पर असर पड़ रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण से हो रहे खिलवाड़ के बावजूद प्रकृति ने हर जीव को विपरीत परिस्थितियों में जिन्दा रहने की क्षमता प्रदान की है, यही वजह है कि गौरैया की चहक आज भी हम सुन पा रहे हैं। लेकिन यह चहक हमेशा बनी रहे इसके लिये सजगता और संवेदशीनता जरूरी है।



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Tuesday, March 25, 2025

पन्ना से मड़ला एलिवेटेड रोड का सपना जल्द होगा साकार

  •   इस कार्य को वार्षिक योजना 2025-26 में शामिल किया जाएगा  
  •   सांसद वीडी शर्मा ने केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी से की मुलाकात 

केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से चर्चा करते हुए खजुराहो सांसद वी.डी. शर्मा। 

पन्ना। बहुप्रतीक्षित पन्ना से मड़ला एलिवेटेड रोड का सपना अब जल्द ही साकार होने के आसार दिखने लगे हैं। खजुराहो सांसद वी.डी. शर्मा ने मंगलवार को केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से पन्ना-मड़ला 21 किलोमीटर एलिवेटेड रोड निर्माण के संबंध में पुनः भेंट की। इस संबंध में सांसद द्वारा गत 24 जुलाई को केन्द्रीय मंत्री को पत्र के माध्यम से एलिवेटेड रोड निर्माण के बारे में अवगत कराया गया था। यह रोड एनएच 39 बमीठा-सतना खंड का हिस्सा है और इसके डीपीआर का कार्य प्रगति पर है। वर्तमान में वन विभाग के परामर्श से संरेखण कार्य निश्चित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त इस कार्य को वार्षिक योजना 2025-26 में भी शामिल करने की प्रक्रिया जारी है। 

उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में यह दूसरा एलिवेटेड रोड बनने जा रहा है, जो क्षेत्र के लिए बहुत बड़ी सौगात होगी। इस मार्ग के बन जाने से पन्ना-टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणियों का स्वछंद विचरण भी होता रहेगा तथा राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्बाध आवागमन भी होगा। वर्तमान में पन्ना से मड़ला रोड की मड़ला घाटी में अक्सर जाम की स्थिति बनी रहती है तथा पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर एरिया होने के कारण वन्य प्राणियों के स्वछंद विचरण में भी बाधा उत्पन्न होती थी। इसके अतिरिक्त दो पहिया वाहनों में यात्रा करने वाले लोगों को वन्य प्राणियों से खतरा भी बना रहता है। केन्द्रीय परिवहन मंत्री के द्वारा प्रदत्त इस महत्वाकांक्षी सौगात के लिए सांसद वी.डी. शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का समस्त क्षेत्रवासियों की ओर से  धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया है।

सांसद श्री शर्मा ने क्षेत्र की अन्य महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण के लिए भी केन्द्रीय मंत्री को अवगत कराया है, जिसके तहत कालिंजर-अजयगढ-पन्ना-अमानगंज-सिमरिया-हटा एवं दमोह-जबेरा-जबलपुर 279 कि.मी. राजकीय राजमार्ग क्र. 55 को राष्ट्रीय राजमार्ग में शामिल करने की मांग की गई है। मध्यप्रदेश राजपत्र दिनांक 15 सितम्बर 2017 के द्वारा इस राज्य राजमार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग में शामिल किए जाने की सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में उन्नयन होकर निर्मित हो जाने से अमानगंज स्थित जे.के. सीमेन्ट प्लांट के बडे़ वाहनों का निर्बाध आवागमन भी हो सकेगा। 

इसके अलावा जबलपुर महानगर से व्हाया दमोह, हटा, पन्ना होते हुये सीधे उत्तर प्रदेश के बडे़ नगरों से सीधा संपर्क हो सकेगा। सांसद ने पन्ना जिले की कुछ महात्पवूर्ण सड़कों को केन्द्रीय सड़क निधि से स्वीकृत करने का अनुरोध किया है। इनमें एन.एच. 39 देवेन्द्रनगर से एन.एच. 943 सलेहा तक 23 कि.मी. रोड, एन.एच. 943 सलेहा से चौमुखनाथ भितरी मुटमुरू होते हुये सिद्धनाथ तक 15 कि.मी. रोड, अमानगंज-गुनौर-सुवंशा (कटन)-गिरवारा-सिमरी मार्ग एन.एच. 94 तक 57 कि.मी. रोड तथा बिसानी-श्यामगिरी-कल्दा-सलेहा व्हाया मेन्हा मार्ग 75 कि.मी. शामिल है।  केन्द्रीय सड़क निधि के माध्यम से सड़क के विकास से प्रमुख पर्यटक एवं धार्मिक आस्था के स्थलों को चौडे़ मार्ग के जरिए राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़ा जाएगा।

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Monday, March 24, 2025

वह जमाना जब मंदिर के घण्टे की ध्वनि से होता था समय का बोध !

  • मध्य प्रदेश के पन्ना शहर में स्थित प्रणामी धर्मवलंबियों की आस्था के केंद्र महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर में घंटा बजाने की अनूठी परंपरा साढ़े तीन सौ सालों से चली आ रही है। घंटे की तेज ध्वनि से पुराने जमाने में लोगों को जहां समय का बोध होता था, वहीं इसके पीछे धार्मिक व सांस्कृतिक कारण भी रहे हैं।

महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर का वह घंटा जो  वर्ष 1864 में लंदन से आया था।  (फोटो : राकेश शर्मा) 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मंदिरों का शहर पन्ना अपनी अनूठी परपरम्पराओं और रीति रिवाजों के लिए भी जाना जाता है। पुराने ज़माने में जब अधिकांश लोगों के पास घड़ियां व समय मापने के अन्य कोई उपकरण उपलब्ध नहीं थे, उस दौर में समय का बोध लोगों को पन्ना शहर में स्थित महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर के ऊपर गुम्मद में टंगे विशाल घण्टे की ध्वनि से होता रहा है। इसके अलावा उस ज़माने में बड़े बुजुर्ग सूर्य की किरणों व उसकी छाया से प्रहर और समय का अंदाजा लगा लिया करते थे। कितना समय हुआ इससे अवगत होने के लिए मंदिर के घण्टे की ध्वनि की उपयोगिता अब से तक़रीबन चार दशक पूर्व तक रही है। लेकिन अब यह उपयोगिता नहीं रही, क्योंकि अब ज्यादातर लोगों के पास घडी व मोबाइल है। 

उल्लेखनीय है कि श्री प्राणनाथ जी मंदिर में ऊपर एक विशाल घंटा लगा था, जिसे हर घंटे नियम से बजाने के लिए व्यक्ति तैनात रहता था। इस घण्टे के ध्वनि की  गूंज पूरे पन्ना शहर में सुनाई देती थी। रात्रि के सन्नाटे में तो पन्ना से लगे हुए आसपास के गांवों तक घण्टे की आवाज सुनाई देती थी। इस घण्टे की ध्वनि से ही पन्ना शहर व आसपास ग्रामीण क्षेत्र के निवासियों को समय का पता चलता था और उसी के अनुरूप उनकी दिनचर्या संचालित होती थी। लेकिन अब वह पुराना जमाना सिर्फ स्मृतियों में शेष है, अब तो सबके पास घड़ी या मोबाइल उपलब्ध है। लेकिन श्री प्राणनाथ जी मंदिर में सदियों से चली आ रही घंटा बजाने की परंपरा का निर्वहन अभी भी अनवरत रूप से हो रहा है।  

बीते रोज सपत्नीक मंदिर दर्शन करने आए ग्वालियर निवासी रिटायर जज अवधेश श्रीवास्तव ने अपनी पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि चार दशक पूर्व 1982 से 1984 तक जब वे पन्ना जिला न्यायालय में जज थे, उस समय हमारे पास घड़ी नहीं होती थी। तब हम लोग प्राणनाथ जी मंदिर के घंटे को सुनकर अपनी दिनचर्या शुरू करते थे। उनकी पत्नी श्रीमती गिरिजा श्रीवास्तव ने भी बताया कि मंदिर के घंटे से ही समय का पता चलता था और पूरे दिन की दिनचर्या इसी हिसाब से चलती थी। उन्होंने पुरानी स्मृतियों को याद करते हुए बताया कि जब कहीं जाना होता था तो मंदिर के ही घंटे की आवाज का इंतजार रहता था कि कितना बजा है। 

प्रणामी समाज के प्रतिष्ठित साहित्यकार अश्वनी दुबे बताते हैं कि श्री प्राणनाथ जी मंदिर के अलावा देश के अन्य मंदिरों खासकर दक्षिण भारत में मंदिरों के गुंबद में ऊपर बड़ा घंटा लगाने तथा हर घंटे में उसे बजाने की प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है। यह परंपरा कई सदियों से चली आ रही है, इसके पीछे कई धार्मिक और सांस्कृतिक कारण भी हैं। दक्षिण भारत में मुख्य रूप से तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इस परंपरा के अनुसार मंदिर के गुंबद पर एक बड़ा घंटा लगाया जाता है, जिसे हर घंटे में बजाया जाता है। 

प्रणामी धर्मावलम्बियों की आस्था का केन्द्र पन्ना स्थित महामति श्री प्राणनाथ जी का मंदिर। 

श्री दुबे बताते हैं कि श्री प्राणनाथ जी मंदिर में बजने वाले घंटे से प्रहर का भी बोध होता रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार 24 घंटे को 8 प्रहर में बांटा जाता है तथा प्रत्येक प्रहर 3 घंटे का होता है। पहला प्रहर सूर्योदय से 3 घंटे बाद तक रहता है, इस तरह हर तीन घंटे में प्रहर बदलता है। प्रहर बदलने पर मंदिर का घंटा डबल बजता है।  

गुम्मद में ऊपर लगे घंटे की ध्वनि जहाँ पूरे शहर में गूंजती है, वहीं मंदिर में जो घंटी लगी होती है उसकी ध्वनि सिर्फ मंदिर व आसपास ही सुनाई देती है। कोई व्यक्ति जब मंदिर जाता है तो प्रवेश करने से पहले घंटी बजाता है। घंटी की ध्वनि से मन में चलने वाले विचारों की श्रंखला टूट जाती है, इस विचार शून्यता की भाव दशा में जब पूजा होती है तो शांति और आनंद की अनुभूति होती है। मंदिरों में घंटी लगाने की परम्परा के पीछे यह खास वजह है। इतना ही नहीं घंटी की आवाज़ शांति और एकता का प्रतीक भी मानी जाती है, इससे शांति और सौहार्द की भावना बढ़ती है।  

1864 में लंदन से आया था विशाल घंटा

श्री प्राणनाथ जी मंदिर ट्रस्ट के सचिव राकेश कुमार शर्मा बताते हैं कि अष्टधातु से निर्मित कई विशाल घण्टे वर्ष 1864 में लंदन से भारत लाये गए थे। इन्ही अति विशिष्ट घण्टों में से एक पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर में आया था, जिसे उस समय मंदिर के ऊपर गुम्मट में टंगवाया गया था। लंदन में बने घंटे का उपयोग कई दशकों तक लोगों को समय की जानकारी देने हेतु किया जाता रहा, लेकिन कुछ वर्ष पूर्व इस घंटे में दरार आने से इसकी आवाज में बदलाव हो गया था। तब इस घंटे को भारत के प्रमुख शहरों में ले जाकर उसकी मरम्मत कराने का भरपूर प्रयास हुआ लेकिन वह पूर्व की तरह ठीक नहीं हो पाया। ऐसी स्थिति में मंदिर ट्रस्ट द्वारा भारत में ही निर्मित एक विशाल घंटा लाकर मंदिर में लगवाया गया। जिसका उपयोग अनवरत जारी है। 



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Sunday, March 23, 2025

पन्ना के जंगल में भड़की आग को बुझाने के प्रयास में तीन श्रमिक झुलसे

उत्तर वन मंडल अंतर्गत आने वाले झलाई प्लांटेशन में भड़की आग को बुझाने का प्रयास करते सुरक्षा श्रमिक। 

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में गर्मी के शुरुआती दौर में ही जंगलों में आग लगने का सिलसिला शुरू हो गया है। आज जंगल में आग भड़कने का यह मामला उत्तर वन मंडल अंतर्गत आने वाले झलाई प्लांटेशन का है, जहां अज्ञात कारणों के चलते आग लग गई। आग के भयावह रूप लेने पर वन विभाग का अमला जब आग को काबू करने का प्रयास कर रहा था, उसी दौरान तीन सुरक्षा श्रमिक आग में झुलस गए। इन झुलसे सुरक्षा श्रमिकों को उपचार के लिए जिला चिकित्सालय पन्ना में भर्ती करवाया गया है। 

घटना के संबंध में वन विभाग के सूत्रों ने बताया कि उत्तर वन मंडल अंतर्गत आने वाले झलाई प्लांटेशन में अज्ञात कारणों के चलते आग लगी है, जिसे बुझाने के प्रयास में सुरक्षा श्रमिक कपूर सिंह यादव, हरि सिंह यादव एवं राजेंद्र सिंह यादव झुलस गए हैं। मामले की जानकारी लगने के बाद मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम द्वारा घायलों को उपचार के लिए जिला चिकित्सालय पन्ना में भर्ती करवाया गया, जहां उनका उपचार जारी है। जंगल में लगी आग को बुझाने का प्रयास किया जा रहा है। 

मालूम हो कि गर्मी के मौसम में महुआ सीजन आता है। तेज धूप और गर्मी पडऩे पर ही महुआ फूल नीचे टपकते हैं। चूंकि गर्मी में पतझड़ भी होता है जिससे महुआ वृक्ष के नीचे बड़ी मात्रा में पत्ते जमा हो जाते हैं, जिसके चलते महुआ फूल इन पत्तों के बीच से बीनने पर काफी असुविधा होती है। इसे दूर करने के लिये लापरवाहीवश ग्रामीण पेड़ के नीचे सफाई करने के लिये पत्तों में आग लगा देते हैं, यह आग फैलकर कभी-कभी जंगल को ही अपनी चपेट में ले लेती है, जिससे वन व वन्य प्राणियों को नुकसान होता है।

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Friday, March 21, 2025

विकास के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण से खिलवाड़ बंद हो !

  • यदि न चेते तो विषाक्त होती धरती में जीवन कठिन हो जायेगा
  • सह-अस्तित्व की भावना को मजबूती दें व प्रकृति का श्रंगार करें

पन्ना जिले में सलेहा के निकट स्थित पहाड़ी जो उजड़ चुकी थी, रचनात्मक प्रयासों से अब वह हरी-भरी है।  

पन्ना। हर साल 21 मार्च को दुनिया भर के लोग विश्व वानिकी दिवस मनाते हैं, यह दिन हमारे ग्रह और उसके निवासियों के लिए वनों के अत्यधिक महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। वन हमारे ग्रह की जीवन रेखा हैं, जो लाखों लोगों को ऑक्सीजन, भोजन, दवा और आजीविका प्रदान करते हैं। यहाँ यह विचारणीय है कि मौजूदा समय हम जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान की लगातार बढ़ती चुनौतियों से जूझ रहे हैं। वन इन मुद्दों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

यह पृथ्वी हमारे सौरमंडल का सबसे ज्यादा जीवंत और सुंदर ग्रह है। यह खूबसूरत है क्योंकि पृथ्वी में न जाने कितने प्रकार की वनस्पतियां, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और पक्षी हैं। यह पृथ्वी इन सब का घर है, इसमें मानव भी शामिल है। लेकिन इस जीवंत और हरे-भरे ग्रह को मानव ने इतने गहरे जख्म दिये हैं कि प्रकृति का पूरा संतुलन ही डांवाडोल हो गया है। हमने अपनी महत्वाकांक्षा और निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु बड़ी बेरहमी के साथ धरती की हरियाली को उजाड़ा है। जिससे न जाने कितने जीव जंतु बेघर होकर विलुप्त हो चुके हैं। हमारी नासमझी पूर्ण बर्ताव का खामियाजा अब हमें ही भोगना पड़ रहा है।

हमारी धरती दिनों दिन इस कदर विषाक्त होती जा रही है कि भविष्य में यहां जीवन कठिन हो जायेगा। हमने अभी तक पृथ्वी से सिर्फ लिया है, उसका भरपूर दोहन किया है उसे वापस कुछ भी नहीं लौटाया, जिससे प्रकृति का संतुलन तहस-नहस हो गया है। प्रकृति और पर्यावरण की बिना परवाह किये हम जंगलों को उजाड़ रहे हैं, नदियों के नैसर्गिक स्वरूप को बिगाड़ कर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि अब मौसम का क्रम बदलने लगा है और जंगल कटने से ऑक्सीजन की कमी के कारण फेफड़ों की बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। मनुष्य अपनी भौतिक उपलब्धियों से इस कदर बौराया हुआ है कि अपने को वह सर्वोपरि मानने लगा है। वह प्रकृति के शाश्वत नियमों की अनदेखी कर रहा है, जो अत्यधिक खतरनाक और विनाशकारी है।

पन्ना के खूबसूरत जंगल जिन्हे सहेजकर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। 

अब यह निहायत जरूरी हो गया है कि हम समझदारी दिखायें और प्रकृति व पर्यावरण से खिलवाड़ बंद करें। यह पृथ्वी जितनी हमारी है उतनी ही पेड़-पौधों, वनस्पतियों, जीव-जंतु और पक्षियों की भी है। हमें सह- अस्तित्व की अहमियत को समझना होगा, क्योंकि गहरे में सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी की भी कमी पूरे प्राकृतिक चक्र व संतुलन को प्रभावित करती है। अभी तक हम जिस सोच और समझ के साथ जिए हैं वह रास्ता विनाश की ओर जाता प्रतीत होता है। लेकिन हम विनाश की आ रही आहट को अनसुना कर रहे हैं और अपने को श्रेष्ठ साबित करने तर्क भी गढ़ लेते हैं। 

मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई चीज जब नष्ट की जाती है तो उसे बर्बरता कहा जाता है, लेकिन हम प्रकृति द्वारा सृजित किसी चीज को जब नष्ट करते हैं तो हम इसे प्रगति और विकास कहते हैं। इस तरह के दोहरे मापदंड प्रकृति, पर्यावरण व समूची पृथ्वी के अस्तित्व के लिए घातक है। इसलिए समझदारी इसी में है कि हम पृथ्वी का सम्मान करते हुए सह-अस्तित्व की भावना को मजबूती प्रदान करें तथा प्रकृति और पर्यावरण के साथ अत्याचार पर रोक लगाते हुए प्रकृति का श्रंगार करें।

बेहतर पर्यावरण के लिए जंगल कितना होना चाहिए

बेहतर पर्यावरण के लिए जंगल की मात्रा एक महत्वपूर्ण सवाल है। विशेषज्ञों और नीतियों के अनुसार, किसी देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 33% हिस्सा जंगलों से आच्छादित होना चाहिए ताकि पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। यह आंकड़ा भारत की "राष्ट्रीय वन नीति" (1952, संशोधित 1988) में भी निर्धारित किया गया है, जो यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है कि वन क्षेत्र जलवायु स्थिरता, जैव विविधता संरक्षण, मिट्टी संरक्षण और वायु शुद्धिकरण में योगदान दे सके।

अब भारत की स्थिति की बात करें: नवीनतम "भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023" (ISFR 2023) के अनुसार, भारत का वन और वृक्ष आवरण कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। इसमें से 21.76% वन आवरण (forest cover) और 3.41% वृक्ष आवरण (tree cover) है। यानी कुल मिलाकर 8,27,357 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वनों और वृक्षों से ढका है। यह 33% के लक्ष्य से अभी भी कम है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें वृद्धि देखी गई है। उदाहरण के लिए, 2021 की तुलना में 2023 में वन और वृक्ष आवरण में मामूली बढ़ोतरी हुई है।

हालांकि, केवल प्रतिशत ही पूरी कहानी नहीं बताता। वनों की गुणवत्ता, घनत्व, और जैव विविधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारत में कई क्षेत्रों में वनों की कटाई, शहरीकरण, और औद्योगीकरण के कारण चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन वृक्षारोपण और संरक्षण प्रयासों से स्थिति सुधर रही है। फिर भी, 33% के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत है, जैसे कि पुनर्वनीकरण (reforestation), अवैध कटाई पर रोक, और स्थानीय समुदायों को शामिल करना।

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Thursday, March 20, 2025

विश्व गौरेया दिवस : प्रधान जिला न्यायाधीश ने पक्षियों के लिए लगाए सकोरे

  • ग्राीष्मकाल में जल स्त्रोतों की कमी से प्यासे पक्षियों के लिए इस तरह के छोटे प्रयास उनकी प्यास बुझाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगे। हम सभी की यह जिम्मेदारी भी है कि अपने घरों, छतों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करें।

पन्ना जिला न्यायालय परिसर में पक्षियों के लिए पानी के सकोरे लगाते न्यायाधीश 

पन्ना। विश्व गौरेया दिवस के अवसर पर गुरूवार को मध्यप्रदेश के पन्ना जिला न्यायालय परिसर में पक्षियों के लिए पानी के सकोरे लगाए गए। प्रधान जिला न्यायाधीश एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष राजाराम भारतीय की अध्यक्षता में एवं सचिव राजकुमार गौंड़ की उपस्थिति में न्यायालय परिसर में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रधान जिला न्यायाधीश ने पक्षियों के लिए सकोरे लगवाए। 

उन्होंने इस मौके पर कहा कि गौरेया एवं अन्य पक्षी हमारे पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा हैं। इनकी संख्या में कमी चिंतनीय है। ग्राीष्मकाल में जल स्त्रोतों की कमी से प्यासे पक्षियों के लिए इस तरह के छोटे प्रयास उनकी प्यास बुझाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगे। हम सभी की यह जिम्मेदारी भी है कि अपने घरों, छतों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करें। 

उन्होंने कहा कि मोबाइल का अधिक उपयोग एवं रेडिएशन भी पक्षियों के जीवन को नुकसान पहुंचा रहा है। कार्यक्रम में समस्त न्यायाधीश, अधिवक्ता एवं कर्मचारीगण तथा पक्षकारों से पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूकता एवं पक्षियों के संरक्षण में भागीदारी निभाने के साथ सार्वजनिक स्थानों एवं घरों में पक्षियों के लिए सकोरे लगाने के लिए प्रेरित करने की अपील भी की।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने कहा कि प्रकृति और जीव संरक्षण के लिए हरसंभव प्रयास करना हम सभी का नैतिक कर्त्तव्य है। गर्मी के मौसम में सकोरे स्थापित करने के प्रयास से नन्हें जीवों की जीवन रक्षा होगी। इस अवसर पर विशेष न्यायाधीश जयशंकर श्रीवास्तव, प्रधान न्यायाधीश रूपेश शर्मा, जिला न्यायाधीश अरविन्द शर्मा एवं सुरेन्द्र मेश्राम, न्यायिक मजिस्ट्रेट इकरा मिनिहाज, प्रीतम शाह, श्वेता आर्य, तनिष्का वैष्णव, जिला विधिक सहायता अधिकारी देवेन्द्र सिंह परस्ते, लीगल एड डिफेंस काउंसिल चीफ आनंद त्रिपाठी भी उपस्थित रहे।

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Wednesday, March 19, 2025

भविष्य बचाना है तो जंगल, नदी और पहाड़ तीनो बचाने होंगे !

  • जिस गति से आज प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है, तो न तो उससे अब जंगल बचेगा और न ही पहाड़ बच पाएंगे। और जब यह दोनों न रहेंगे तो पानी को कोई माई का लाल नहीं बचा पाएगा।                     



।। बाबूलाल दाहिया ।।

म भग्यशाली हैं कि भारत का ह्रदय स्थल समझे जानेवाले मध्य प्रदेश में रहते हैं। एक तो यह तमाम जैव विविधताओं से परिपूर्ण यूं ही बहुत बड़ा प्रदेश है, दूसरा तमाम प्रदेशों की सीमाओं से जुड़े होने के कारण इसकी सांस्कृतिक विविधता में भी और चार चांद  लग जाते हैं। बैज्ञानिकों का कथन है कि हमारी सेहत के लिए 30 प्रतिशत वन चाहिए। तो वह इतनी मात्रा में भले न हो, फिर भी सरकारी और निजी भूमि को मिला कर 20-22 प्रतिशत तो होगा ही ? इसका जीता जागता उदाहरण है, हमारे यहां आदिवासी समुदाय की बाहुलता। क्योंकि अभी तक यही देखा गया है कि "जहां- जहां घने जंगल, वहां - वहां आदिवासी। और जहां- जहां आदिवासियों का निवास वहां- वहां घना जंगल भी। किन्तु जहां अन्य समुदायों का पदार्पण हुआ, जंगल पहाड़ साफ। 

लेकिन जिस गति से आज प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है, तो न तो उससे अब जंगल बचेगा और न ही पहाड़ बच पाएंगे। और जब यह दोनों न रहेंगे तो पानी को कोई माई का लाल नहीं बचा पाएगा। हमारे राज्य की सीमा में उत्तर प्रदेश है, यहाँ की नदियां हिमनद हैं। पानी गिरे न गिरे हिमालय की बर्फ पिघलती है और नदियों से प्रवाहित हो वहां का जल स्तर सामान्य रखती हैं। किन्तु यहां की नदियां हिमनद या हिमपुत्री नहीं वनपुत्री हैं। हमारी पवित्र नदी नर्मदा का ही रेवा, नर्मदा के साथ-साथ मेकलसुता आदि नाम भी हैं। 

अकेले नर्मदा भर नही यहां की समस्त नदियां वनजा ही हैं और इन वन जाइयों का अस्तित्व भी वन से ही है। वन रहेगा तो पानी रहेगा और पानी रहेगा तभी वन भी। क्यों कि जब वन नहीं रहता और समुद्र से आ रहे बादलों को धरती से नमी नहीं मिलती तो धरती का ताप या कार्बन डाइऑक्साइड उन्हें और ऊंचा उठा देती है। फलस्वरूप  वह बगैर बरसे ही उड़ते हुए निकल जाते हैं। इसलिए पेड़ों को बचाने के लिए हमें पहाड़ के भी बचाने की जरूरत है।

क्योंकि जब कोई पत्थर हजारों वर्ष सूर्य की गर्मी से तपता है, वर्षा से गलता है तो उसमें क्षरण होता है। वह क्षरण पत्थरों के सन्धि स्थल में एकत्र होता रहता है। फिर उसी में पेड़ों के पत्ते झड़ और सड़ कर एक पर्त सी चढ़ा देते हैं, जिससे सड़े पत्ते और क्षरण मिल कर उपजाऊ मिटटी बन जाते हैं। 


कालांतर में उसी उपजाऊ मिट्टी बने क्षरण में कोई पेड़ चिड़ियों, हवा या किसी अन्य माध्यम से अपना बीज पहुँचा देता है जो बढ़ कर उसी सन्धि स्थल में पेड़ का रूप ग्रहण कर लेता है। और हमारा हवा, पानी तथा फल का प्रदाता भी बन जाता है। परन्तु जब किसी पहाड़ या डोंगरी के पत्थर को गृह या सड़क निर्माण आदि के लिए निकाल लिया जाता है, तो पहली बरसात में ही वह सारी जमा हुई मिट्टी और पत्ते की लेयर बह जाती है। एवं वह डोंगरी हजारों वर्षों के लिए बांझ सी हो जाती है। 

हमारा गांव पहाड़ के ठीक नीचे ही बसा है, तो पहले हमने पत्थर पेड़ युक्त हरी भरी डोगरी भी देखे हैं। और अब घुटे सिर की शक्ल की भी देख रहे हैं। इसलिए पर्यावरण और भविष्य बचाने के लिए हमें जंगल, नदी और पहाड़ तीनों को बचाने की जरूरत है।

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