Tuesday, August 4, 2026

बेहतरीन शिक्षक, प्रकृति प्रेमी व कर्मयोगी देवीदत्त चतुर्वेदी नहीं रहे !

 


जीवन के हर आयाम को गहराई से समझने वाले बेहतरीन शिक्षक देवीदत्त चतुर्वेदी अब हमारे बीच नहीं रहे। वे अपनी भौतिक काया में भले ही अब नजर नहीं आएंगे, लेकिन उनका तकरीबन 84 साल का अर्थपूर्ण जीवन हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में आपके रचनात्मक योगदान को पन्नावासी कभी भुला नहीं पाएंगे।

अनगिनत खूबियों से लबरेज श्री चतुर्वेदी जी ने शिक्षक के दायित्व को बड़ी खूबसूरती से निभाया। उनकी सरलता ऐसी थी कि वे बच्चों के साथ बच्चा बन जाते थे, यही वजह थी कि बच्चे उनके सानिध्य में बहुत ही सहज रहते थे। खेल-खेल में वे बच्चों को गूढ़ और जटिल विषय सुगमता से समझा देते थे। उनके इस कौशल व शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

एक बेहतरीन शिक्षक होने के साथ आपके भीतर प्रकृति के प्रति गहरा जुड़ाव रहा है। यही वजह है कि अधिक उम्र होने के बावजूद भी वे प्रकृति के बीच जाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे। प्रकृति से इसी अनुराग के चलते श्री चतुर्वेदी पन्ना टाइगर रिजर्व के तत्कालीन क्षेत्र संचालक आर. श्रीनिवास मूर्ति के संपर्क में आये और अपने गुरु स्वर्गीय श्री अंबिका प्रसाद खरे के साथ मिलकर पन्ना नेचर कैंप में सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया।

श्री मूर्ति कहते थे कि हवा, पानी व भोजन यह सब हमें जंगल से मिलता है, इसकी समझ नई पीढ़ी में आनी चाहिए ताकि वे जंगल को धरोहर की तरह संरक्षित करने के लिए प्रेरित हो सके। इसी सोच को मूर्त रूप देने की मंशा से वर्ष 2010 में पन्ना नेचर कैंप की शुरुआत हुई। इस नेचर कैंप के माध्यम से श्री अंबिका प्रसाद खरे व श्रीदेवीदत्त चतुर्वेदी जी ने प्रकृति की पाठशाला में बच्चों को प्रकृति प्रेम का पाठ पढ़ाया। इनके द्वारा शुरू हुई यह अभिनव पहल अनवरत जारी है। प्रकृति की इस पाठशाला में हजारों स्कूली बच्चों ने प्रकृति के विविध रूपों व उसके अनुपम सौंदर्य को न सिर्फ आत्मसात किया अपितु प्रकृति, पर्यावरण और वन्य जीवों की अहमियत को भी समझा।

पन्ना नेचर कैंप के मुख्य किरदार रहे दोनों शिक्षकों स्वर्गीय अंबिका प्रसाद खरे व देवीदत्त चतुर्वेदी जी को वर्ष 2017 में सेंचुरी एशिया से ग्रीन टीचर अवार्ड भी मिला, जिसके निश्चित ही वे हकदार थे। श्री चतुर्वेदी कहा करते थे कि प्रकृति के मूल्य पर विकास की अंधी दौड़ मनुष्यता के लिए खतरनाक है। बेहतर व सुकून से भरे जीवन के लिए प्रकृति का संरक्षण बेहद जरूरी है। उनकी यह देशना मौजूदा दौर में निश्चित ही विचारणीय है। शिक्षा, समाज, प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए श्री चतुर्वेदी जी का योगदान अतुलनीय है, जो अविस्मरणीय रहेगा। 

ऐसे कर्मयोगी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि!

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