Tuesday, September 15, 2026

मझगाय बांध के डूब क्षेत्र में चौथे दिन भी जारी रहा चिता आंदोलन

  • विस्थापित आंदोलनकारियों  का नारा “न्याय दो या मार दो” 
  • पानी में चिताओं पर लेटकर प्रभावित करा रहे विरोध दर्ज 


पन्ना। केन-बेतवा लिंक परियोजना सहित मझगाय बांध, रुंझ बांध और सिंगरौली–ललितपुर रेलवे लाइन से प्रभावित विस्थापितों का चिता आंदोलन आज चौथे दिन भीषण गर्मी के बीच जारी रहा। आंदोलन में प्रभावित परिवारों के साथ बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं अपने बच्चों को लेकर शामिल हुईं। डूबते गांवों और बढ़ते जलस्तर के बीच प्रभावित लोग पानी में चिताओं पर लेटकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा कि जब इन परियोजनाओं की शुरुआत हुई थी, तब प्रभावित लोगों ने विकास का विरोध नहीं किया था। उन्होंने केवल ग्रामसभा, पारदर्शिता, कानून के पालन, उचित मुआवजे और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग की थी। लेकिन प्रभावितों का आरोप है कि उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज किया गया और कई मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना उनकी जमीन और संपत्तियों पर कार्रवाई की गई।

अमित भटनागर ने कहा कि जब प्रभावित लोगों ने धरना-प्रदर्शन शुरू किया तो धारा 144 और वर्तमान में लागू धारा 163 जैसी निषेधात्मक कार्रवाइयों के माध्यम से आंदोलन को रोकने का प्रयास किया गया। आंदोलन तेज होने पर आंदोलनकारियों पर मुकदमे लगाए गए। इसके बावजूद प्रभावित परिवार अपनी मांगों को लेकर लगातार लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करते रहे।

उन्होंने कहा कि आज स्थिति बेहद गंभीर है विकास के नाम पर विस्थापित आदिवासी किसानों के घर और गांव पुलिसिया दमन के माध्यम से बुलडोज कर दिए गए, उनके घर पानी में डूब चुके हैं, कई गांवों में पानी पहुंच चुका है और कुछ घर लगातार गिर रहे हैं, लेकिन अनेक प्रभावित परिवारों को अभी तक उनका मुआवजा नहीं मिला है। उनका कहना है कि बिना उचित मुआवजा और पुनर्वास के लोगों के घरों और गांवों को डुबाना गंभीर मानवीय और कानूनी सवाल खड़ा करता है।

5 लाख से 12.50 लाख रु. के पुनर्वास पैकेज तक, फिर भी भुगतान का इंतजार

आंदोलनकारियों के अनुसार पहले प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास पैकेज ₹5 लाख था। जुलाई में हुए चिता आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री द्वारा कैबिनेट में प्रभावित परिवारों के लिए ₹12.50 लाख के पैकेज का निर्णय घोषित किए जाने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद आंदोलनकारियों का आरोप है कि अभी तक कई परिवारों को बढ़ा हुआ पैकेज तो दूर, पहले निर्धारित ₹5 लाख की राशि भी नहीं मिली है। प्रभावित किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी जमीनों के रिकॉर्ड में सिंचित भूमि को असिंचित कर दिया गया, जिससे मुआवजे की राशि प्रभावित हुई, लेकिन इस अंतर की राशि भी उन्हें नहीं दी गई। कई परिवारों के मकान और जमीन का मुआवजा भी लंबित बताया जा रहा है।

अमित भटनागर ने कहा, “एक तरफ सरकार परियोजना का काम आगे बढ़ा रही है और दूसरी तरफ प्रभावित परिवारों के घर पानी में डूब रहे हैं। जिन लोगों को पहले मुआवजा और पुनर्वास मिलना चाहिए था, वे आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह केवल मुआवजे का सवाल नहीं है, बल्कि संविधान, कानून, जीवन, गरिमा और न्याय के अधिकारों का सवाल है।”

कई परियोजनाओं के प्रभावित एक मंच पर

चिता आंदोलन में केवल केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित लोग ही नहीं, बल्कि मझगाय बांध, रुंझ बांध और सिंगरौली–ललितपुर रेलवे लाइन से प्रभावित लोग भी शामिल हुए। प्रभावितों ने अपनी समस्याएं साझा करते हुए कहा कि परियोजनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास से जुड़ी उनकी पीड़ा समान है। आंदोलनकारियों ने कहा कि विकास के नाम पर उनकी जल, जंगल, जमीन और जीवन छीना जा रहा है, लेकिन उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की जा रही है।

उन्होंने कहा “पहले जल–जंगल–जमीन छीनी गई, फिर घर और गांव डुबो दिए गए। जब लोग न्याय मांगने सड़क पर आए तो निषेधाज्ञा और मुकदमों का सामना करना पड़ा और अब बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी रोकी जा रही हैं। आखिर यह कैसा विकास है?” अमित भटनागर ने कहा कि चिता आंदोलन का नारा “न्याय दो या मार दो” विस्थापित परिवारों की बेबसी और आक्रोश को व्यक्त करता है।

उन्होंने कहा, “हम सरकार से पूछ रहे हैं कि अगर हमें न्याय नहीं देना है तो क्या सरकार ने यह तय कर लिया है कि हमें मार दिया जाए? इस तरह घर, जमीन, गांव और जड़ों से उखाड़कर दर-दर भटकाने से अच्छा है कि सरकार हमारी पीड़ा को समझे और न्याय दे। हम मौत नहीं मांग रहे हैं, हम न्याय मांग रहे हैं। हमें उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और हमारे संवैधानिक व कानूनी अधिकार चाहिए।”

दिव्या अहिरवार और हिसाबी राजपूत ने कहा कि “हम महिलाएं अपने बच्चों के साथ इस आंदोलन में इसलिए बैठी हैं क्योंकि अब हमारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं बचा है। हमारे घर डूब रहे हैं, जमीन जा रही है और कई परिवारों को अभी तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। अमित ने कहा कि जब राज्य ही अपने बनाए कानूनों और संविधान की भावना का पालन नहीं करता, तब संघर्ष और आंदोलन ही हमारे पास लोकतांत्रिक रास्ता रह जाता है। बिजली और पानी रोककर हमारी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। सरकार को दमन की जगह विस्थापितों की पीड़ा सुननी होगी और उन्हें न्याय, मुआवजा तथा सम्मानजनक पुनर्वास देना होगा।”

उन्होंने कहा कि चिता आंदोलन किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। यह अन्याय, प्रशासनिक मनमानी और प्रभावित लोगों के अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष है। उन्होंने सरकार से मांग की कि डूब क्षेत्र के प्रत्येक प्रभावित परिवार का तत्काल सत्यापन कराया जाए, लंबित मुआवजा दिया जाए, सिंचित-असिंचित भूमि के मूल्यांकन की शिकायतों का निराकरण किया जाए, मकान एवं अन्य परिसंपत्तियों का उचित मूल्यांकन किया जाए तथा घोषित पुनर्वास पैकेज और सभी वैधानिक अधिकार तत्काल दिए जाएं। जब तक विस्थापितों को न्याय नहीं मिलता, चिता आंदोलन जारी रहेगा। यह लड़ाई केवल कुछ गांवों की नहीं है। यह जल–जंगल–जमीन–जीवन, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई है।



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