Saturday, June 17, 2017

सड़क मार्ग पर वनराज ने की चहल कदमी

  •   पूरे एक घण्टे तक थमा रहा वाहनों का आवागमन
  •   अद्भुत नजारे को देख रोमांचित हुये यात्री



अरुण सिंह,पन्ना। जंगल के राजा बाघ को घने जंगल में विचरण करते हुये तो अनेकों लोगों ने देखा होगा, लेकिन जंगल में रहने वाले बाघ को डामर रोड पर चहल कदमी करते हुये देखने का अवसर विरले लोगों को ही मिला होगा। ऐसा ही अद्भुत और रोमांचकारी नजारा गत सायं पन्ना-अमानगंज मार्ग पर अकोला-अमझिरिया के पास यहां से गुजरने वाले यात्रियों ने न सिर्फ देखा अपितु वनराज को सड़क मार्ग पर चहल कदमी करते हुये अपने कैमरे में भी कैद कर लिया। इस रोमांचकारी दृश्य को देखने वाले यात्रियों तथा वाहन चालकों ने बताया कि बेखौफ होकर शान के साथ सड़क  मार्ग से गुजरते बाघ को निकट से देखना उनके जीवन की अविस्मरणीय घटना है, जिसे कभी नहीं भूलेंगे।
उल्लेखनीय है कि बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व में बाघों का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2009 में पन्ना टाईगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था, लेकिन बाघ पुनस्र्थापना योजना को मिली शानदार सफलता के उपरान्त एक बार फिर यहां के जंगल में वनराज की दहाड़ गूँजने लगी है। वन्यजीवों का दीदार करने के लिये दूर-दूर से पार्क भ्रमण के लिये यहां आने वाले पर्यटकों व वन्यजीव प्रेमियों को अब पन्ना टाईगर रिजर्व में आये दिन बाघ दर्शन होते हैं, जिससे यहां पर पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बाघों की संख्या बढऩे से युवा होते बाघ अपनी टेरोटेरी बनाने के लिये नये इलाके की खोज में कोर क्षेत्र से बाहर भी निकल रहे हैं। पन्ना टाईगर रिजर्व में जन्मा एक बाघ कोर क्षेत्र से बाहर निकलकर सैकड़ों किमी. की यात्रा करते हुए बांधवगढ़ के जंगल तक जा पहुँचा है, जिसकी अभी हाल ही में पहचान हुई है। जिससे पता चलता है कि पन्ना के बाघ कोर क्षेत्र के जंगल से बाहर निकलकर दूर-दूर तक विचरण कर रहे हैं। पन्ना-अमानगंज मार्ग पर तो अक्सर ही सड़क पार करते हुये बाघ दिखाई दे जाते हैं। यह सड़क मार्ग पार पन्ना टाईगर रिजर्व क्षेत्र के किनारे से होकर गुजरता है, ऐसी स्थिति में सुबह तड़के व शाम के समय इस सड़क मार्ग पर दूसरे वन्य प्राणियों के अलावा यदा-कदा बाघ भी नजर आ जाता है। गत सायं इस मार्ग पर चहल कदमी करते हुये जब बाघ दिखा तो सड़क मार्ग के दोनों ओर वाहनों का आवागमन थम गया। यात्रियों ने सांस थामकर शान्ति से इस दुर्लभ दृश्य को देखा। जब वनराज सड़क पार करके घने जंंगल में दूर निकल गया, तब इस मार्ग पर आवागमन बहाल हुआ।
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Thursday, June 15, 2017

पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में नाइट सफारी शुरू



  •   टूर ऑपरेटरों व पर्यटकों की माँग पर पार्क प्रबंधन ने लिया निर्णय
  •   पर्यटक अब रात्रि में भी लेंगे जंगल की निराली दुनिया का लुत्फ



अरुण सिंह,पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में कोर क्षेत्र से लगे बफरजोन क्षेत्र के जंगल में पर्यटक अब रात्रि के समय भी जंगल की रोमांचक और निराली दुनिया का लुत्फ उठा सकेंगे। टूर ऑपरेटरों एवं पर्यटकों की माँग पर पार्क प्रबन्धन ने बफरजोन क्षेत्र के जंगल में नाइट सफारी शुरू करने का निर्णय लिया है। क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने आज आयोजित प्रेसवार्ता में बताया कि ईको विकास समिति झिन्ना से प्राप्त प्रस्ताव अनुसार बफरजोन क्षेत्र में ग्राम झिन्ना, सलैया, सब्दुआ एवं बनहरी के समिति सदस्यों के साथ पर्यटकों को रात्रि पेट्रोलिंग कराने की अनुमति प्रदान की गई है।
उल्लेखनीय है कि बफरजोन क्षेत्र में नाइट सफारी की माँग लम्बे समय से टूर ऑपरेटरों व पर्यटकों द्वारा की जाती रही है। चूंकि बारिश के मौसम में 15 जून के बाद मानसूनी बारिश शुरू होने के साथ ही कोर क्षेत्र में पर्यटकों के भ्रमण पर रोक लग जाती है। ऐसी स्थिति में बारिश के पूरे चार माह तक पर्यटन व्यवसाय ठप्प हो जाता है। पार्क प्रबन्धन के इस निर्णय से अब बारिश के मौसम में भी पर्र्यटक कोर क्षेत्र से लगे पन्ना टाईगर रिजर्व के बफरजोन के जंगल में भ्रमण कर वन्यजीवों का दीदार कर सकेंगे। क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने बताया कि रात्रि में पेट्रोलिंग करने वाले पर्यटकों के साथ ईको विकास समिति का एक सदस्य साथ में जावेगा। इस नाइट पेट्रोलिंग से जहां पार्क विकास निधि की आय में वृद्धि होगी, वहीं दूसरी ओर ईको विकास समिति के सदस्यों एवं जिप्सी मालिकों को रोजगार भी उपलब्ध होगा। श्री जैन ने कहा कि पन्ना के आस-पास के क्षेत्रों में पर्यटकों के अधिक दिन विश्राम करने पर पर्यटन से जुड़े हुये लोगों को रोजगार के नये अवसर भी उपलब्ध होंगे।

पूरे तीन घण्टे की होगी नाइट सफारी

क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व ने पत्रकारों द्वारा पूछे गये सवालों के जवाब में बताया कि देशी व विदेशी पर्यटक शाम 7 बजे से रात्रि 10 बजे तक नाइट सफारी का आनंद ले सकेंगे। इसके लिए पर्यटकों को 5सौ रू. प्रति वाहन प्रति राउण्ड के हिसाब से भ्रमण शुल्क देना होगा। आपने बताया कि बफरजोन क्षेत्र के कक्ष क्र. 285, 287, 288 एवं 289 में नाइट पेट्रोलिंग की अनुमति दी गई है। यहां पर्यटकों को तेंदुआ, भालू, सेही, चीतल, सांभर व नीलगाय जैसे वन्यजीवों के दीदार हो सकेंगे। क्षेत्र संचालक श्री जैन ने बताया कि मानसूनी बारिश शुरू होने पर टाईगर रिजर्व के प्रवेश द्वार पर्यटकों के भ्रमण हेतु बंद हो जायेंगे। इस स्थिति में यहां मानसून पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बफरजोन क्षेत्र में दिन के समय भी पर्यटकों को भ्रमण की अनुमति दी जायेगी। अभी तक बारिश के मौसम में सिर्फ पाण्डव फाल व रनेह फाल पर्यटकों के लिए खुले रहते थे, लेकिन अब पर्यटक बफरजोन क्षेत्र के जंगल में भी भ्रमण कर सकेंगे।

पर्यटकों की संख्या में हुआ है इजाफा

पन्ना टाईगर रिजर्व में बाघों की आबादी बढऩे के साथ ही यहां पर वनराज के दर्शन सहजता से हो रहे हैं, नतीजतन पर्यटकों की संख्या भी निरन्तर बढ़ रही है। पूर्व में जब पन्ना टाईगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था, उस समय यहां का आकर्षण कम होने के चलते पर्यटकों की संख्या में जबरदस्त गिरावट आई थी। लेकिन अब बाघों की दुनिया आबाद हो जाने के उपरान्त यहां की ख्याति व आकर्षण बढ़ा है और बड़ी संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक पन्ना टाईगर ररिजर्व के भ्रमण हेतु आ रहे हैं। श्री जैन ने बताया कि गत वर्ष अक्टूबर से अप्रैल तक यहां 33 हजार पर्यटक आये थे, लेकिन इस वर्ष इसी पीरियड में 35 हजार 3 सौ पर्यटकों ने यहां आकर पार्क भ्रमण किया है।
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Wednesday, April 19, 2017

बंधुआ जिंदगी जी रहे बेलडावर गांव के आदिवासी

  • पवई विकासखण्ड के इस गांव में चलती है  खनन माफियाओं की हुकूमत
  • बिना इजाजत यहाँ  के आदिवासी अन्यत्र कहीं  नहीं  कर सकते कोई काम
  • पत्थर खदानों में ही  जिन्दगी खपाना इन गरीबों की नियति बनी


 पवई विकासखण्ड का आदिवासी गांव बेलडावर।

। अरुण सिंह 

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले में एक गांव ऐसा है जहाँ के गरीब आदिवासी ताउम्र बंधुआ बनकर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। पवई विकासखण्ड के अंतर्गत आने वाले इस गांव में पत्थर खनन माफियाओं की हुकूमत चलती है। इनकी मर्जी और इजाजत के बिना गांव के आदिवासी अपनी इच्छा से अन्यत्र कहीं  कोई दूसरा काम नहीं  कर सकते। गांव के निकट ही  कोठी-कुटरहिया पहाड़ में वर्षों से चल रही एक दर्जन से भी अधिक पत्थर खदानों में हाड़तोड़ मेहनत करना इनकी नियति बन चुकी है। 

खनन माफियाओं द्वारा गांव के आदिवासियों से तब तक खदानों में काम कराया जाता है  जब तक वे शारीरिक रूप से अक्षम या फिर किसी गंभीर बीमारी की गिरफ्त में नहीं आ जाते। इस तरह से पत्थर खदानों में छेनी, हथौड़ा और घन चलाते  इस गांव के आदिवासियों की जिंदगी खत्म हो  जाती है । यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा  है ,जिस पर विराम की दूर-दूर तक कहीं  कोई गुंजाइस नजर नहीं आती।

जिला मुख्यालय पन्ना से तकरीबन 85 किमी दूर घने जंगल के बीच स्थित है  बेलडावर गांव, जहां  शत प्रतिशत आदिवासी रहते हैं । आज के इस तकनीकी युग में जब कैशलेस व्यवस्था की बात की जा रही  है, उस समय इस गांव तक पहुंचने के लिए सुगम मार्ग तक नहीं है । ऊबड़-खाबड़ और पथरीले जंगली रास्ते से होकर ही यहाँ  पहुँचा जा सकता है । लगभग ढाई सौ की आबादी वाले बेलडावर गांव के आदिवासी दो दशक पूर्व तक जंगल की लकड़ी बेंचकर अपना जीवनयापन करते थे। लेकिन जब से कोठी-कुटरहिया पहाड़ में पत्थर खदानों का सिलसिला शुरू हुआ, बेलडावर गांव के आदिवासियों की जिंदगी की दिशा ही  बदल गई। 

खदानों में पूरे दिन पत्थर काटना और तोडऩा तथा दिन ढलने के बाद ठेकेदार द्वारा दिये गये पैसों से शराब पीकर धुत हो  जाना, दिनचर्या बन चुकी है । जिंदगी जीने के इस तरीके ने गांव के आदिवासियों को पहाड़ की तरह ही  खोखला और छलनी कर दिया है । पत्थर खदान में 8 से 10 वर्ष तक काम करने के बाद मजदूर शारीरिक रूप से कमजोर और अक्षम हो  जाते हैं।  ज्यादातर मजदूर पत्थर खदानों की खतरनाक डस्ट के कारण जानलेवा बीमारी सिलीकोसिस की गिरफ्त में आ जाते हैं , जिससे उनकी मौत हो जाती है ।

 गांव के आदिवासी पत्रकारों से अपनी व्यथा सुनाते हुए ।

विकास की रोशनी से कोसों दूर पवई विकासखण्ड के बेलडावर गांव में जब जिला मुख्यालय से पत्रकारों का एक दल पहुँचा तो यहाँ  के हालात देख सहसा विश्वास नहीं  हुआ कि आज भी लोग इस तरह से शोषण का शिकार होकर नारकीय जिंदगी जीने को विवश हैं । पत्रकारों के अचानक गांव में पहुँचने पर इस गांव के कुछ बुजुर्ग जो किन्ही कारणों से खदान में काम करने नहीं  गये थे व महिलायें एकत्रित हो गईं। जब उन्हें यह बताया गया कि हम लोग पन्ना से आये हैं और यह चाहते हैं कि आप लोगों को शासन की योजनाओं का लाभ मिले ताकि आप भी बेहतर जिंदगी जी सकें। 

यह सुनकर बेलडावर गांव के गोटी आदिवासी ने आश्चर्य के साथ पत्रकारों को घूरते हुए कहा कि कौन सी योजना और कौन सा लाभ, यहाँ तो पूरा गांव पत्थर खदान ठेकेदारों का गुलाम है। खदानों में पत्थर तोड़ते हुए जवान लड़के खत्म हो गये, गांव में बहुयें विधवा घूम रही हैं। बीमार पडऩे पर ठेकेदार इलाज कराने के नाम पर कर्जदार बना लेते हैं  और फिर जीवन पर्यन्त पत्थर तुड़वाते हैं। पत्थर खदानों में काम करने वाले मजदूरों को ठेकेदार शराब भी देते हैं और शराब का पैसा मजदूरी से काट लेते हैं ।

शासकीय कार्य करने की भी इजाजत नहीं 


कुटरहिया पहाड़ की खदान जहाँ  आदिवासी करते हैं  काम।

गांव के आदिवासियों से यह पूछे जाने पर कि आप लोग पत्थर खदान में काम करने के बजाय मनरेगा व शासन द्वारा चलाये जा रहे  निर्माण कार्यों में काम क्यों नहीं  करते ? इसके जवाब में गोटी आदिवासी व चन्ना आदिवासी ने बताया कि पत्थर खदान ठेकेदार कहीं  दूसरी जगह काम करने नहीं  जाने देते। खदान में ही  काम करने को मजबूर करते हैं, क्योंकि गांव के अधिकांश लोग बीमारी आदि कारणों के चलते कर्जदार हो चुके हैं। 

यदि किसी पर 5-10 हïजार रू. का कर्ज चढ़ गया तो फिर कभी उतर नहीं पाता, ऐसी स्थिति में पत्थर खदान में काम करना मजबूरी बन जाती है। गोटी आदिवासी ने बताया कि पत्थर खदान में 8-10 साल काम करने से भितरहटी (फेफेड़ा) खत्म हो जाती है। बेड़ीलाल पिता लटोरा आदिवासी ने बताया कि ठेकेदार एक चीप निकालने का 25 रू. देते हैं , जिसे वे 100 रू. या इससे भी ज्यादा कीमत में बेंचते हैं ।

कम उम्र में ही  कई बहुयें  हुईं विधवा


बेलडावर गांव की सबसे बड़ी त्राशदी यह  है  कि बीते 5 सालों के दौरान ही  पत्थर खदानों में काम करने वाले एक दर्र्जन से भी अधिक युवकों की मौत हो  चुकी है । असमय काल कवलित होने  वाले इन युवाओं की उम्र 30 से 40 वर्ष के बीच थी। ऐसी स्थिति में गांव के कम उम्र की विधवा हो  चुकी बहुओं  की भरमार है  जो पति की मौत के बाद अभिशप्त जीवन जी रही हैं। 

प्रीतम आदिवासी ने अपनी याददाश्त पर जोर देते हुए बताया कि पिछले पांच सालों के दरम्यान प्रताप आदिवासी 35 वर्ष, तम्मा आदिवासी 30 वर्ष, रामस्वरूप आदिवासी 30 वर्ष, रमेश आदिवासी 36 वर्ष, हरि आदिवासी 35 वर्ष, महेश आदिवासी 35 वर्ष, मिलन आदिवासी 34 वर्ष सहित इसी आयु वर्ग के लग्गा आदिवासी, कुमती आदिवासी, परसू आदिवासी, भाई लाल, श्यामलिया, प्यारे तथा मंगलिया आदिवासी की मौत हो  चुकी है। 

प्रीतम आदिवासी ने बताया कि पत्थर खदानों में 8-10 साल लगातार काम करने से फेफड़े खराब हो जाते हैं , जिससे सांस फूलने लगती है। सही ढंग से इलाज न होने पर पीडि़त की मौत हो  जाती है। इस बीमारी को सिलीकोसिस कहा जाता है , जिसके उपचार की पन्ना जिला अस्पताल में भी कोई माकूल व्यवस्था नहीं  है । जाहिर है कि पीडि़त मजदूर असहाय होकर सिर्फ मौत का इंतजार करता है ।

उचित मूल्य की दुकान गांव से 10 किमी दूर


घने जंगल के बीच स्थित इस गांव तक जाने वाला मार्ग।

गांव में मूलभूत और बुनियादी सुविधायें कैसी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बेलडावर गांव के आदिवासियों को सस्ता खाद्यान्न लेने के लिए पैदल 10 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। उचित मूल्य की दुकान ग्राम पंचायत कढऩा में है, जहाँ खाद्यान्न लेने के लिए जाने का मतलब पूरा दिन खराब करना है। इस सुविधा के नाम पर कोई गारंटी नहीं कि खाद्यान्न मिल ही जाये। 

चिकित्सा सुविधा के नाम पर बेलडावर गांव से 22 किमी दूर मोहन्द्रा स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। यदि गांव में कोई बीमार होता है तो इलाज के लिए मोहन्द्रा जाना पड़ता है। जिले में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थिति कैसी है यह सर्व विदित है, ज्यादातर केन्द्र चिकित्सक विहीन हैं। इन हालातों में गरीब आदिवासियों को बीमार पडऩे पर कैसी-कैसी मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं , इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

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Thursday, April 6, 2017

दशकों से उपेक्षित पड़ी है पन्ना की सबसे खूबसूरत घाटी

  • घाटी में घना जंगल के साथ दिखते हैं प्रकृति के अदभुत नज़ारे 
  • जीर्णोद्धार होने पर एक दर्जन से अधिक गांव होंगे लाभान्वित



खजरीकुडार - बनहरी सड़क मार्ग जो विगत कई दशकों से बंद पड़ा है। फोटो - अरुण सिंह 


। अरुण सिंह 

पन्ना। तीन दशक पूर्व तक पन्ना जिले की जिस खूबसूरत घाटी से वाहनों का आवागमन होता रहा है, वह अब उपेक्षित पड़ी है. घने जंगलों व प्रकृति के अद्भुत नजारों के बीच से गुजरने वाली इस घाटी के मार्ग का जीर्णोद्धार न होने से आवागमन ठप्प हो गया है. जिससे एक दर्जन से अधिक ग्रामों के रहवासियों को जिला मुख्यालय आने के लिए 30 से 40 किमी. की दूरी अधिक तय करनी पड़ती है. यदि घाटी के 7 किमी. लम्बे पुराने मार्ग का जीर्णोद्धार हो जाय तो ग्रामीणों को जिला मुख्यालय आने के लिए अनावश्यक चक्कर नहीं काटना पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि लोक निर्माण विभाग के विलुप्त हो चुके इस अति महत्वपूर्ण सड़क मार्ग की ओर  शासन व प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया गया है। पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से उपेक्षित पड़े इस मार्ग की हकीकत जानने के लिए पत्रकार  जब यहां पहुंचकर  घने जंगलों के बीच से निकले तो इस सडक मार्ग को देख  आश्चर्य चकित रह गये। इस मार्ग पर कुछ किमी. पैदल चलने पर प्रकृति के जहां अद्भुत नजारे देखने को मिले, वहीं यह अहसास भी हुआ कि यदि इस मनोरम घाटी का निर्माण हो जाता है तो यह पन्ना की सबसे खूबसूरत घाटी होगी। 

मालुम हो कि पन्ना जिला मुख्यालय से महज 10 किमी. की दूरी पर आदिवासी बहुत ग्राम खजरी कुड़ार स्थित है. यहीं से यह मार्ग शुरू होता है जो बनहरी गांव तक जाता है। खजरीकुडार से बनहरी तक लगभग 7 किमी. लम्बा मार्ग बन जाने से तकरीबन एक दर्जन गांव जहां जिला मुख्यालय से सीधे जुड़ जायेंगे, वहीं बरियारपुर डेम की दूरी पन्ना से 20 किमी. हो जायेगी। अभी यहां पहुंचने के लिए अजयगढ़ होकर जाना पड़ता है जिसकी दूरी 50 किमी. से अधिक है।  

चूंकि यह सड़क मार्ग कुछ दशक पूर्व तक अस्तित्व में रहा है तथा इस मार्ग से वाहनों व ट्रकों की आवाजाही भी होती रही है. इसलिए बहुत ही कम लागत में यह मार्ग बेहतर ढंग से बन सकता है। इस  मार्ग के बन जाने से खजरी कुडार, बनहरी, कुंवरपुर, छोटी बनहरी, रायपुर, पाठा, भापतपुर, झिन्ना, बरियारपुर, देवरा भापतपुर, पडरहा, गुमानगंज व बिलाही आदि ग्रामों के लोगों को लाभ होगा।

सड़क बनने से जंगल की होगी सुरक्षा- 



मार्ग पर ही बिखरी पड़ी सागौन सिल्लियों की छीलन। 

उपेक्षित पड़े इस सड़क मार्ग का निर्माण हो जाने से इस इलाके का जंगल भी सुरक्षित हो जायेगा। मौजूदा समय उत्तर वन मण्डल क्षेत्र के खजरी कुडार बेल्ट में सागौन के बेशकीमती वृक्षों की सर्वाधिक कटाई होती है। इस क्षेत्र में खूबसूरत जंगल है, लेकिन जंगल की अवैध कटाई भी यहां सर्वाधिक होती है। सागौन वृक्षों से लदी यहां की पहाडियों में हर समय कुल्हाडियों की आवाजें गूंजती हैं। लकड़ी तस्कर सागौन की मोटी बोगिया घाटी से बंद पड़े सड़क मार्ग तक लाते हैं, यहां पर लकड़ी की सिल्लियां बनती हैं जिन्हें बाहर भेज दिया जाता है। 

अवैध सागौन वृक्षों की कटाई व लकड़ी की तस्करी का यह गोधरधंधा दशकों से चल रहा है, जिस पर वन अमले का कोई अंकुश नहीं है। यदि यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले कुछ सालों में यहां का हरा भरा खूबसूरत जंगल उजड़ जायेगा। जानकारों का कहना है कि बंद पड़ी यह घाटी यदि बन जाती है और इस मार्ग पर आवागमन शुरू हो जाता है तो अवैध कटाई पर काफी हद तक अंकुश लग सकता है. वर्तमान में इस बंद पड़े मार्ग का उपयोग सिर्फ लकड़ी चोर कर रहे हैं, मार्ग का नजारा देख इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, क्यों कि पूरे मार्ग पर सागौन लकड़ी के छिलके बिखरे पड़े हैं। मार्ग पर आवागमन होने पर ऐसा संभव नहीं होगा।

विकसित होंगे कई पर्यटन स्थल

खजरी कुड़ार की मनोरम घाटी का जीर्णोद्धार हो जाने के बाद इस क्षेत्र में स्थित अनेको प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण मनोरम स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकते हैं। इन स्थलों का विकास होने पर इस क्षेत्र में जहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा वहीं रोजी रोजगार के नये अवसरों का भी सृजन होगा। ईको टूरिज्म की दृष्टि से भी यह क्षेत्र उपयुक्त हैं, यहां पर वे सारी खूबियां मौजूद हैं जो प्रकृति प्रेमी पर्यटकों को पसंद होती हैं। अंग्रेजों के जमाने में बना बरियारपुर डेम तक पहुंचना भी आसान और सुगम हो जायेगा. पर्यटक प्रकृति के अद्भुत नजारों को देखते हुए डेम में वाटर स्पोर्टस का भी पूरा लुत्फ उठा सकेंगे।

दस्यु गिरोहों पर भी लग सकेगी रोक


इलाके में घना जंगल व घाटियां होने के कारण यह पूरा क्षेत्र दस्यु गिराहों के लिए सुरक्षित शरण स्थली बन जाता है। डकैतों की मौजूदगी से तमाम तरह के अपराध घटित होते हैं तथा अपराधों को बढ़ावा भी मिलता है। यदि घाटी व मार्ग दुरूस्त हो जाता है और इस मार्ग पर आवागमन होने लगता है तो दस्यु गिरोहों की सक्रियता पर जहां अंकुश लगेगा वहीं डकैत यहां के जंगल को अपना ठिकाना भी नहीं बना सकेंगे। इस तरह से यदि देखा जाय तो खजरी कुडार की पुरानी घाटी का जीर्णोद्धार कराना जनहित व विकास के हित में होगा. इसके लिए प्रशासन व लोक निर्माण विभाग को प्रभावी कदम उठाना चाहिए तथा वन विभाग को भी इस कार्य में मदद करनी चाहिए।
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Saturday, February 18, 2017

प्राथमिक शाला जहां 7 बच्चे दर्ज, उपस्थित सिर्फ एक

  •   यह है शाहनगर जनपद के प्राथमिक शाला चहकना की स्थिति
  •   जिले में 20 से कम बच्चों वाली शालाओं की संख्या डेढ़ सौ से अधिक



शासकीय प्राथमिक शाला चहकना का भवन। फोटो - अरुण सिंह 

 अरुण सिंह,पन्ना। बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले ताकि सब पढ़े सब बढ़े का नारा हकीकत बन सके। लेकिन शासन की यह मंशा पन्ना जिले के ग्रामीण अंचलों में पूरी होती नजर नहीं आ रही। गांव-गांव स्कूल जरूर खुल गये हैं तथा शिक्षक भी पदस्थ हैं लेकिन इन स्कूलों से पढऩे वाले बच्चे नदारद हैं। लाखों रू. की लागत से बनवाये गये ज्यादातर स्कूल भवनों में सन्नाटा पसरा रहता है। ऐसा क्यों है तथा इसके लिए कौन जिम्मेदार है, इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा, फलस्वरूप ग्रामीण अंचलों की शैक्षणिक व्यवस्था बेहतर होने के बजाय बेहद चिंताजनक स्थिति में जा पहुँची है।
यहां हम बात कर रहे हैं शाहनगर जनपद क्षेत्र की शासकीय प्राथमिक शाला चहकना की, जहां पर कक्षा-1 से लेकर 5वीं तक स्कूल में सिर्फ 7 बच्चे दर्ज हैं। गत 15 फरवरी को यह प्रतिनिधि अचानक जब इस छोटे से गांव की शाला पहुँचा तो वहां के हालात देख दंग रह गया। दोपहर के 12:30 बज रहे थे, स्कूल में अतिथि शिक्षक कोमल प्रजापति अकेले ही कुर्सी में बैठे कुछ गुनगुना रहे थे। स्कूल के कमरे में एक बस्ता रखा हुआ था, अचानक इस प्रतिनिधि के पहुँचने पर अतिथि शिक्षक उठकर खड़े हो गये। उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के यह बताया कि यहां 7 बच्चे दर्ज हैं और आज सिर्फ एक बालक ही पढऩे के लिए स्कूल आया है जो कुछ देर पूर्व ही पानी पीने के लिए पास के हैण्डपम्प में गया है। उपस्थिति रजिस्टर मांगने पर अतिथि शिक्षक ने तुरंत उपलब्ध कराया, जिसमें 7 बच्चों के नाम दर्ज थे जिनमें दो बालक व पांच बालिकायें हैं। मजे की बात यह है कि चार कक्षाओं में सिर्फ एक-एक बच्चे हैं जबकि कक्षा 3 में चार बच्चे हैं। यह पूछने पर कि बच्चे स्कूल क्यों नहीं आते तो अतिथि शिक्षक ने बताया कि कभी-कभी चार से पांच बच्चे आ जाते हैं। चहकना गांव के रन्जोर सिंह से पूछने पर कि गांव के बच्चे पढऩे के लिए स्कूल क्यों नहीं आते? तो उन्होंने बताया कि सभी बच्चों के स्कूल में नाम नहीं लिखे, जिनके लिखे हैं वे भी कभी आते हैं और कभी नहीं आते। जाहिर है कि बच्चों के अभिभावक भी इस ओर ध्यान नहीं देते जितना कि उन्हें देना चाहिए। बच्चों की इतनी कम संख्या के बावजूद शाला में मध्याह्न भोजन बनता है। दोपहर 1 बजे मध्याह्न भोजन लेकर जब एक बुजुर्ग महिला आई उसी समय तीसरी कक्षा में पढऩे वाला एक दूसरा बालक राजभान यादव भी आ गया। इस तरह पूर्व से उपस्थित छात्र बृजेन्द्र सिंह यादव के साथ इस नवागन्तुक छात्र ने मध्याह्न भोजन की रोटी-सब्जी खाई और अपनी कटोरी लेकर फिर वापस घर चला गया। शासकीय प्राथमिक शाला चहकना तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसी शालाओं की पन्ना जिले में भरमार है, जहां हर माह शासन का पैसा तो खर्च हो रहा है लेकिन उसका कोई लाभ किसी को नहीं मिल रहा। लाखों रू. की लागत से गांव-गांव बनवाये गये शाला भवन अनुपयोगी पड़े हुये हैं, आखिर जब बच्चे ही नहीं हैं तो इन शाला भवनों के निर्माण का औचित्य ही क्या है?

शाला में कम से कम होने चाहिए 20 बच्चे


शाला में उपस्थित एक मात्र छात्र बृजेन्द्र सिंह यादव।

शालाओं में बच्चों की कम उपस्थिति व चहकना प्राथमिक शाला के संबंध में जिला समन्वयक सर्व शिक्षा अभियान बी.के. त्रिपाठी से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि शासन के नियमों और निर्धारित मापदण्डों के मुताबिक प्रत्येक प्राथमिक शाला में कक्षा 1 से लेकर 5वीं तक कम से कम 20 बच्चे दर्ज होने चाहिए। इससे कम छात्र संख्या पर स्कूल के संचालन की अनुमति नियमानुसार नहीं दी जा सकती। आपने यह स्वीकार किया कि जिले में तकरीबन डेढ़ सौ से भी अधिक ऐसी शालायें हैं जहां बच्चों की संख्या कम है। यदि माध्यमिक शालाओं को भी जोड़ दिया जाये तो यह आंकड़ा दो सौ के करीब पहुँच जायेगा। इस स्थिति को श्री त्रिपाठी ने चिन्तनीय बताया और कहा कि क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के दवाब से जगह-जगह स्कूल भवन बनवा दिये गये हैं लेकिन उन स्कूलों में अपेक्षित छात्र संख्या नहीं है।

Tuesday, February 7, 2017

जंगल भी नहीं बचा अब कैसे हो गुजारा

  • रमपुरा गांव के हरिजन आदिवासियों की जिन्दगी हुई दुश्वार 
  • 12 किमी. दूर सारंग के जंगल से महिलाएं लाती हैं लकड़ी 




अरुण सिंह, पन्ना। जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 30 किमी. दूर स्थित रमपुरा गांव के हरिजन आदिवासियों की जिन्दगी मुसीबतों और कठिनाईयों से भरी हुई है. पन्ना जनपद की ग्राम पंचायत मुटवांकला के अन्तर्गत आने वाले इस हरिजन आदिवासी बहुल गांव में सुविधाओं के नाम पर आवागमन के लिए सुगम मार्ग तक नहीं है. लगभग 600 की आबादी वाले इस गांव में 320 मतदाता हैं, लेकिन इनकी सुध न तो अधिकारी लेते हैं और न ही जनप्रतिनिधि, फलस्वरूप ये आज भी बुनियादी और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं.
ऊबड़ - खाबड़ जंगली रास्तों से होकर भारी मशक्कत के बाद पन्ना से पत्रकारों का दल गत शनिवार को जब इस दुर्गम गांव में पहुंचा, तो गांव के हरिजन आदिवासी हैरत में पड़ गये. ग्राम पंचायत के सरपंच भानुप्रताप त्रिपाठी ने जब ग्रामीणों को यह बताया कि पन्ना से पत्रकार आप लोगों की समस्याओं को देखने आये हैं, जिसे अखबार में छापेंगे. इससे शासन व प्रशासन का ध्यान इस गांव की तरफ भी जायेगा और समस्याओं का निराकरण होगा. यह सुनकर कुछ ही क्षणों में पूरा का पूरा गांव उमड़ पड़ा और पेड़ की छांव में बैठकर उन्होंने पत्रकारों के सामने दिल खोलकर अपनी पीड़ा और तकलीफों का बखान किया. हिसाबी लाल चौधरी, कृपाल चौधरी व कन्छेदी आदिवासी ने बताया कि गांव में सिंचाई के कोई साधन नहीं है, इसलिए यहां सिर्फ खरीफ की फसल होती है. इस साल सूखा पड़ जाने से खरीफ की फसल भी नहीं हुई. गांव में पिछले दो साल से कोई भी सरकारी काम नहीं हुआ, जिससे अब मजदूरी भी नहीं मिलती. पूर्व में मेड़ बंधान व कपिलधारा कूप के जो काम हुए हैं, उनकी मजदूरी अभी तक नहीं मिली. ऐसी स्थिति में सौ से भी अधिक लोग रोजी रोजगार की तलाश में पलायन कर चुके हैं.
सहोला चौधरी व भूपत आदिवासी ने बताया कि पहले जंगल से गुजर बसर हो जाता था, लेकिन अब 10 - 15 किमी. के दायरे में कहीं जंगल नहीं बचा. खेती हो नहीं पाती, ऐसी स्थिति में हम लोगों का गुजारा कैसे हो? अपने घर परिवार का भरण पोषण करने के लिए गांव की महिलाऐं 10 से 15 किमी. दूर सारंग व बिलखुरा के जंगल से लकड़ी का गट्ठर सिर में लादकर लाती हैं. दूसरे दिन यह लकड़ी बेंचने के लिए रमपुरा से 15 किमी. दूर देवेन्द्रनगर जाती हैं जहां मुश्किल से सौ या अधिकतम डेढ़ सौ में लकड़ी का गट्ठा बिकता है. इसी पैसे से पूरे घर का गुजारा होता है. बिलसी बाई, भगवतिया आदिवासी व रतिया आदिवासी ने बताया कि सुबह 4 बजे गांव से लकड़ी का गट्ठा लेकर जब निकलते हैं तब कहीं जाकर 9 - 10 देवेन्द्रनगर पहुंचते हैं. सबसे बुरी स्थिति तो तब होती है जब गांव में कोई बीमार पड़ता है. सड़क मार्ग व आवागमन की सुविधा न होने से बीमार व्यक्ति को साईकिल से या पीठ में लादकर इलाज के लिए देवेन्द्रनगर ले जाना पड़ता है. यहां के गरीब हरिजन आदिवासियों को उचित मूल्य का राशन लेने के लिए भी 10 कि.मी. की दूरी तय करनी पड़ती है. उचित मूल्य दुकान मुटवांकला में है.
गांव में प्राथमिक व माध्यमिक स्कूल है, लेकिन बहुत ही कम बच्चे स्कूल जाते हैं. पत्रकारों के रमपुरा पहुंचने पर जब ग्रामवासी पेड़ के नीचे एकत्रित हुए तो वहां काफी संख्या में बच्चे भी थे. उनसे जब पूंछा गया कि आप लोग स्कूल क्यों नहीं गये, वहां तो खाना भी मिलता है. तो ग्रामीणों ने कहा कि यदि भरपेट खाना मिलता तो गांव में एक भी बच्चा नजर नहीं आता, अरे साहब यदि जानवरों को खाना दें तो वह देहरी नहीं छोंड़ता. यह पूंछे जाने पर कि गांव में ऐसा कोई व्यक्ति है जो नौकरी करता हो? इस सवाल के जवाब में ग्रामीणों ने बताया कि सिर्फ एक लड़का श्रीनिवास है जो संविदा शिक्षक बन गया है. इसकी वजह का खुलासा भी ग्रामीणों ने किया और बताया कि यह लड़का अपनी बहन के पास सतना चला गया था. वहीं रहकर पढ़ लिख गया और बी.ए. पास करने के बाद संविदा शिक्षक बन गया. रमपुरा गांव का यह पहला लड़का है जिसने बी.ए. तक की पढ़ाई की है और अब सरकारी नौकरी भी कर रहा है. गांव में ऐसे कई बुजुर्ग भी हैं जिनका कोई सहारा नहीं है. इन बुजुर्गों को पात्रता के बावजूद भी वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल रही. जिन्हें मिलती है उन्हें भी पेंशन के लिए भटकना पड़ता है. पछीता, नन्दू, भूपत, रामस्वरूप तथा सुकमरिया ने बताया कि अषाढ़ के महीने से उन्हें पेंशन नहीं मिली, तीन बार देवेन्द्रनगर जाकर वापस लौटे हैं.

रमपुरा में नहीं है आंगनवाड़ी केन्द्र 




हर तरह की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हरिजन आदिवासी बहुल रमपुरा गांव में आंगनवाड़ी केन्द्र भी नहीं है. ग्राम पंचायत के सरपंच की मौजूदगी में ग्रामीणों ने बताया कि चूंकि रमपुरा में सिर्फ हरिजन आदिवासी रहते हंै, इसीलिए इस गांव की कोई सुध नहीं लेता. गांव में शून्य से पांच साल तक के तकरीबन सौ बच्चे हैं, फिर भी यहां आंगनवाड़ी केन्द्र नहीं खोला गया. यहां कई ऐसे बच्चे भी हैं जो कुपोषण के शिकार हैं, लेकिन कोई देखने वाला नहीं है. ग्रामीणों ने बताया कि गांव में अधिकारी तो कभी आते नहीं, जनप्रतिनिधि भी सिर्फ चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं. क्षेत्रीय विधायक महेन्द्र बागरी के संबंध में ग्रामीणों ने बताया कि वे चुनाव के समय आये थे, इसके बाद फिर कभी उनके दर्शन नहीं हुए.

गांव के वजूद पर मंडरा रहा संकट 


इस दुर्गम हरिजन आदिवासी बहुल रमपुरा गांव के वजूद पर भी संकट मंडरा रहा है. ग्रामवासियों ने बताया कि 1975 के पूर्व तक इसकी पहचान रमपुरा ग्राम के रूप में थी. इसके बाद इसे बसई ग्राम का मजरा बना दिया गया. अब तो रमपुरा गांव को खत्म कर बसई में ही मिला दिया गया है जबकि बसई गांव की दूरी 5 किमी. है. सहोला चौधरी व भूपत आदिवासी ने बताया कि विकास के नाम पर जो भी पैसा शासन से आता है उसे बसई में ही खर्च कर दिया जाता है. रमपुरा गांव में एक धेले का भी कोई काम नहीं कराया जाता. ग्रामीणों के मुताबिक इसकी वजह भी यही है कि रमपुरा में सिर्फ गरीब हरिजन आदिवासी निवास करते हैं, जबकि बसई में पैसे वाले बड़े लोग करते हैं.


Friday, December 30, 2016

सारस पक्षी को भा रहा केन नदी का किनारा

  • पन्ना टाइगर रिजर्व में दिख रहा सारस का जोड़ा 
  • उड़ान भरने वाला धरती का यह सबसे बड़ा पक्षी 




अरुण सिंह, पन्ना। उड़ान भरने वाला धरती का सबसे बड़ा पक्षी सारस पन्ना टाइगर रिजर्व से होकर प्रवाहित होने वाली केन नदी के किनारे नजर आ रहे हैं. सारस पक्षी का एक जोड़ा पिछले कई दिनों से इस इलाके में डेरा डाले हुए है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि केन किनारे की आबोहवा व जलवायु इस विशालकाय पक्षी को भा रही है. मालुम हो कि सारस को उ.प्र. के राज्य पक्षी का दर्जा प्राप्त है.
उल्लेखनीय है कि सारस पक्षी के जोड़े को दाम्पत्य प्रेम का प्रतीत माना जाता है. सारस पक्षी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अपने जीवन काल में यह सिर्फ एक बार जोड़ा बनाता है और जोड़ा बनाने के बाद जीवन भर साथ रहता है. यदि किसी कारण से एक साथी मर या बिछड़ जाता है तो दूसरा भी उसके वियोग में अपने प्रांण त्याग देता है. सारस को किसानों का मित्र पक्षी भी कहा जाता है, क्यों कि यह फसलों में लगने वाले कीड़ों को खाकर फसलों को नष्ट होने से बचाता है. दलदली व नमी वाले स्थान इसे प्रिय हैं, इसकी आवाज काफी दूर तक सुनाई देती है. जानकारों के मुताबिक विश्व में सबसे अधिक सारस पक्षी भारत में ही पाये जाते हैं. यहां इनकी कुल संख्या 8 से 10 हजार के बीच बताई जाती है.




सारस पक्षियों में मनुष्य की ही तरह प्रेम भाव होता है, ये ज्यादातर दलदली भूमि, बाढ़ वाले स्थान, तालाब, झील और खेतों में देखे जा सकते हैं. अपना घोसला ये छिछले पानी के आसपास ही बनाना पसंद करते हैं. जहां हरे - भरे खेत, पेड़ - पौधे, झाडिय़ां तथा घास हो. नर और मादा देखने में एक जैसे ही लगते हैं, दोनों में बहुत ही कम अन्तर पाया जाता है. लेकिन जब दोनों एक साथ हों तो छोटे शरीर के कारण मादा सारस को आसानी से पहचाना जा सकता है. मादा सारस एक बार में दो से तीन अण्डे देती है. अण्डों से बच्चों को बाहर निकले में 25 से 30 दिन का समय लगता है. सारस पक्षी का औसत वजन 7.3 किग्रा. तथा लम्बाई 173 सेमी. होती है. पूरे विश्व में सारस पक्षी की कुल 8 प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से चार प्रजातियां भारत में मिलती हैं. अब इन पक्षियों की संख्या तेजी से घट रही है, जिससे पक्षी प्रेमी व पर्यावरण के हिमायती काफी चिन्तित हैं. फसल उत्पादन के तरीके में हुए बदलाव यानी परम्परागत अनाज के बदले नगदी फसल उगाने के कारण सारस के भरण पोषण पर भी असर पड़ा है. औद्योगीकरण और आधुनिक कृषि से सारस के आवास को खतरा है. केन नदी के किनारे सारस के जोड़े की मौजूदगी से इन पक्षियों की ओर पर्यटकों का भी आकर्षण बढ़ रहा है. पन्ना टाइगर रिजर्व में आने वाले पर्यटक सारस पक्षी के इस जोडे को भी बड़े कौतूहल से निहारते हैं और उनकी छवि को अपने कैमरे में कैद करते हैं.

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Friday, December 9, 2016

विश्रामगंज रेन्ज में हजारों सागौन वृक्षों की हुई अवैध कटाई

  •   जंगल में हर तरफ नजर आ रहा  हैं सागौन वृक्षों के ताजे ठूँठ
  •   सुनियोजित ढंग से होती रही  कटाई और वन विभाग को नहीं  लगी भनक
  •  खुलासा होने  पर मचा हड़कम्प, हो  रहा  नुकसानी का आंकलन
  •   सैकड़ों की संख्या में जंगल से सागौन की कटी बोगियां बरामद

जंगल  से बरामद की गई सागौन की कटी बोगियों का दृश्य। फोटो - अरुण सिंह 

अरुण सिंह,पन्ना। प्रकृति ने पन्ना जिले को अनगिनत सौगातों से नवाजा है । यहां  के घने जंगल, जहां  तक नजर जाये वहां  तक हरियाली ही  हरियाली, यह अद्भुत नजारा देख हर किसी का मन प्रफुल्लित हो  जाता है । लेकिन अब पन्ना जिले के समृद्ध और हरे-भरे जंगलों पर खतरे के बादल मंडरा रहे  हैं । आबादी बढऩे के साथ जंगलों पर अत्यधिक दबाव होने के चलते जंगल में अवैध कटाई बढ़ी है , लेकिन अब तो सुनियोजित तरीके से व्यापक पैमाने पर सागौन वृक्षों की वन माफियाओं द्वारा जिस तरह से कटाई कराई जा रही  है  उससे सागौन प्रजाति के पेड़ तेजी के साथ गायब हो  रहे  हैं । पन्ना जिले के उत्तर वन मण्डल अंतर्गत विश्रामगंज रेन्ज में हाल  ही  में हजारों की संख्या में सागौन वृक्षों का कत्लेआम हुआ  है । लगभग 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस वन परिक्षेत्र में बेहतरीन  किस्म का सागौन जंगल था, जिसे वन माफियाओं ने तहस-नहस कर दिया है । जंगल में जिस तरफ भी नजर दौड़ाई जाए उसी तरफ सागौन वृक्षों के ताजे ठूंठ दिखाई दे रहे  हैं ।

सागौन का ताजा ठूंठ  व पास खड़े वन परिक्षेत्राधिकारी।

सागौन वृक्षों के अवैध कटाई का मामला प्रकाश में आने पर बुधवार 7 दिसम्बर को जिला मुख्यालय पन्ना से पत्रकारों का एक दल जब मौके पर पहुँचा तो यहां  का नजारा देख दंग रह गया। विश्रामगंज रेन्ज के बीट मांझा व कौआ सेहा  के जंगल में जहां  बीते माह बड़ी बेरहमी के सागौन वृक्षों की कटाई हुई है , वहां  से बमुश्किल ढाई-तीन सौ मीटर की दूरी पर वन विभाग की चौकी है , जहां  पर बीटगार्ड की तैनाती रहती है । पेट्रोलिंग कैम्प छापर जिसे अब पटार चौकी के नाम से जाना जाता है , उसके ठीक सामने के जंगल में हजारों की संख्या में न सिर्फ सागौन वृक्षों को काटा गया बल्कि वहीं  जंगल में ही  मोटे तने वाले सागौन की सिल्लियां बनाकर उन्हें  ले भी जाया गया। इतना सब होने पर भी वनों की सुरक्षा का दावा करने वाले वन विभाग को अवैध कटाई की भनक तक नहीं  लगी, यह आश्चर्यजनक बात है । वन चौकी और इस जंगल के बीच एक पहाड़ी नाला गुजरता है , इस नाले के पार सागौन का जंगल है , जहां  वन माफियाओं ने बेखौफ होकर सागौन के वृक्षों को कटवाया है । जंगल में घूमकर देखने से यह पता चला कि वृक्षों की कटाई करने वाले लोग दर्जनों की संख्या में रहे  होंगे, जिन्होंने छांट-छांटकर मोटे और सीधे तने वाले सागौन वृक्षों को काटा है ।

जंगल में कटे पड़े वृक्ष की छटाई करता मजदूर।

सागौन के इस घने जंगल में इतने व्यापक पैमाने पर कटाई हुई  है  कि वन माफिया काटी गई सागौन की पूरी बोगियां ले जाने में कामयाब नहीं  हो  पाये। फिर भी मौके का जायजा लेने पर यह आभास होता है  कि 60 से 70 फीसदी सागौन चला गया है । शेष बची बोगियां अभी भी जंगल में जहाँ - तहाँ  पड़ी हुई  हैं । वन विभाग के अमले द्वारा पिछले एक सप्ताह से जंगल में बिखरी पड़ी सागौन की बोगियों को ढूँढ़कर पटार चौकी के सामने एकत्रित किया गया है । मौजूदा समय इस वन चौकी के सामने तकरीबन 600 सागौन की बोगियां एकत्रित हो  चुकी हैं  जबकि जंगल में कटी पड़ीं सागौन बोगियों के मिलने का सिलसिला अभी बन्दनहीं  हुआ है । इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है  कि कितने व्यापक स्तर पर बड़े ही  सुनियोजित ढंग से सागौन वृक्षों की कटाई हुई  है । अवैध कटाई के इस मामले ने जंगल की सुरक्षा व वन अमले की सक्रियता एवं चौकसी पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए हैं । यदि यही  आलम रहा  तो आने वाले कुछ सालों में ही  पन्ना के जंगलों का सफाया हो  जाएगा तथा सागौन के वृक्ष कहीं  ढूँढ़े भी नहीं   मिलेंगे।

सीसीएफ छतरपुर को सबसे पहले मिली जानकारी


सागौन की बोगियों को जंगल से ढोकर लाते श्रमिक।

उत्तर वन मण्डल पन्ना के विश्रामगंज रेन्ज में हुई अवैध कटाई की जानकारी सबसे पहïले सीसीएफ छतरपुर विश्राम सागर शर्मा को हुई। पन्ना में वन मण्डलाधिकारी सहित वन अमले को इसकी भनक तक नहीं  लगी। मौके पर मौजूद वन परिक्षेत्राधिकारी आर.के. गोनेकर ने भी यह स्वीकार किया कि इतने व्यापक स्तर पर अवैध कटाई होने की जानकारी उन्हें  भी नहीं  थी। ऊपर से खबर आने पर जब जंगल का जायजा लिया गया तो वन अधिकारियों के होश उड़ गए। मिली जानकारी के अनुसार किसी अज्ञात व्यक्ति ने मोबाइल फोन पर सीसीएफ छतरपुर को वन कटाई की घटना से अवगत कराया था। इससे सवाल यह उठता है  कि आखिर पन्ना में बैठे वन महकमे के आला अफसरों को उस व्यक्ति ने जानकारी क्यों नहीं  दी ? क्या उसे यहां  के अधिकारियों पर भरोसा नहीं  था, या अन्य कोई वजह है , जो भी हो  लेकिन इतना तय है  कि उत्तर वन मण्डल की स्थिति ठीक नहीं  है । जंगल की सुरक्षा में तैनात अमला अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं  कर रहा  और जिम्मेदार अधिकारी भी बेपरवाह हैं ।

बफरजोन का जंगल भी सुरक्षित नहीं 





विश्रामगंज वन परिक्षेत्र के जिस इलाके में बेतहाशा कटाई हुई  है , उसी से लगा पन्ना टाईगर रिजर्व का बफरजोन भी है । बफरजोन के इस जंगल में कितने सागौन वृक्ष कटे हैं , अभी इसकी पुष्टि नहीं  हो  पाई है , लेकिन निकट ही  दहलान चौकी का जंगल जो बफरजोन में है  वहां  बड़ी संख्या में सागौन वृक्षों की कटाई हुई है । इस संबंध में पूछे जाने पर पन्ना टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक विवेक जैन ने बताया कि दहलान चौकी वन क्षेत्र में कटाई होने की जानकारी मिलते ही  त्वरित कार्यवाही  की गई है  तथा इस मामले में दो बीट गार्डों को निलंबित भी किया गया है । श्री जैन ने बताया कि विश्रामगंज बफरजोन में कटाई होने का अभी तक कोई भी तथ्य प्रकाश में नहीं  आया फिर भी वन क्षेत्र में चौकसी बढ़ाई गई है ।

अवैध कटाई से बाघों को भी खतरा


 सागौन का ठूंठ व कटी पड़ी बोगी।

जंगल में मानवीय हस्तक्षेप बढऩे तथा बड़े पैमाने पर हो  रही  अवैध कटाई से वन्य प्राणियों विशेषकर बाघों के लिए भी खतरा उत्पन्न हो  गया है । मालुम हो  कि बाघ पुनस्र्थापना योजना के बाद पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर एरिया में बाघों का कुनबा बढ़ा है । यहां  जन्मे कई बाघ बड़े होकर इलाके की तलाश में कोर क्षेत्र से बाहर निकलकर बफर व सामान्य वन क्षेत्र में विचरण कर रहे  हैं । यहां  पर विचरण कर रहे  बाघों को कोर क्षेत्र जैसी सुरक्षा नहीं  मिल रही , ऐसी स्थिति में जहां  वन माफियाओं की हुकूमत चलती है  वहां  के जंगल में बाघों की मौजूदगी होने पर वे कितने सुरक्षित रहेंगे, यह एक अहम सवाल है  जिस पर जिम्मेदार आला वन अधिकारियों को गौर करना होगा। अभी हाल ही  में उत्तर वन मण्डल के जंगल में एक तेंदुए की संदिग्ध मौत हुई है , इसके अलावा शिकार की घटनायें भी बढ़ी हैं । जिसे देखते हुए  पन्ना के बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समय रहते जरूरी कदम उठाये जाने चाहिए ताकि कोर एरिया के बाहर विचरण कर रहे  बाघ सलामत रहें ।
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Monday, May 30, 2016

अपराधों से मुक्त है पन्ना जिले का कुडरा गांव

  • यहां ग्रामीणों के बीच एकता और आपसी भाईचारा बेमिशाल 
  • आज तक थाने नहीं पहुंचा इस गांव का कोई भी विवाद 




। अरुण सिंह, पन्ना 

आर्थिक विकास की अंधी दौड़ और प्रतिस्पर्धा के इस माहौल में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले में एक छोटा सा गांव ऐसा भी है जो अपराधों और विवादों से पूरी तरह मुक्त है. इस गांव के वाशिंदों में एकता, आपसी प्रेम और भाईचारा इतना प्रगाढ़ है कि आज तक गांव का कोई भी विवाद थाने तक नहीं पहुंचा. गांव के बड़े बुजुर्ग गर्व के साथ बताते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पूंजी यही है कि हम सब मिल जुलकर रहते हैं. हमारे बीच किसी भी तरह का कोई जातिगत भेदभाव और ऊंचनीच नहीं है.

उल्लेखनीय है कि जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 52 किमी. दूर उ.प्र. की सीमा से लगा हुआ कुडऱा गांव जंगल और पहाड़ों के बीच बसा है. अजयगढ़ जनपद क्षेत्र की ग्राम पंचायत धरमपुर के इस गांव तक विकास की किरणें भले नहीं पहुंची, लेकिन यहां आपसी प्रेम और भाईचारे की रोशनी भरपूर है. अपनी इसी खूबी की दम पर कुडरा गांव के लोग अनगिनत चुनौतियां और अभावों के बीच भी खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं. 

इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि आजादी के गुजर चुके 67 सालों में कुडरा गांव को मूलभूत और बुनियादी सुविधायें भी मयस्सर नहीं हो सकी हैं और तो और इस गांव तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग तक नहीं है. ग्राम पंचायत धरमपुर तक सड़क मार्ग तथा आवागमन के साधन हैं, लेकिन धरमपुर से कुडरा तक 7 किमी. बीहड़ और जंगल है. ग्रामवासियों को अपनी छोटी - मोटी जरूरतों की पूर्ति के लिए इस कठिन मार्ग से होते हुए पैदल ही धरमपुर आना पड़ता है. सात किमी. लम्बे इस मार्ग पर सात पहाड़ी नाले पड़ते हैं, फलस्वरूप बारिश के चार महीने कुडरा गांव के लोगों के लिए मुसीबतों से भरे होते हैं.
कुडरा गांव के 75 वर्षीय गोरेलाल लोध ने बताया कि हमारे गांव में लोधी, पाल, ब्राम्हण, प्रजापति, कुशवाहा, गोंड व बसोर जाति के लोग हैं, लेकिन सभी मिल जुलकर रहते हैं. जात - पात व छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई का भी इस गांव में कोई वजूद नहीं है. यही वजह है कि गांव में ग्रामीणों के बीच किसी भी तरह के कोई मतभेद और मनभेद नहीं हैं. यदि कभी कभार कोई बात होती भी है तो गांव में ही हम मिल बैठकर उसे सुलझा लेते हैं, कभी थाने जाने की नौबत नहीं आती. कुडरा गांव में आपसी प्रेम और भाईचारे की कई दशकों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा आज भी कायम है और नई पीढ़ी के लोग भी बड़े बुजुर्गों की इस परंपरा का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं. गांव के लोगों को दंश इस बात का है कि कुडरा गांव आता तो पन्ना जिले में है लेकिन वह जिले से अलग - थलग है. इस गांव की कभी कोई खोज खबर नहीं ली जाती, आज तक यहां कोई मंत्री, विधायक व कलेक्टर नहीं आया.

थाने में नहीं दर्ज कोई भी रिपोर्ट

धरमपुर थाना क्षेत्र के ग्राम कुडरा में कभी कोई अपराध घटित हुआ है या नहीं, इस बात का सत्यापन करने के लिए जब थाने में संपर्क किया गया तो कुडरा गांव के वाशिंदों की बात सच निकली. थाना प्रभारी धरमपुर एच.पी. अवस्थी व थाने में पदस्थ पुलिस कर्मियों ने बताया कि पिछले 40 वर्षों के रिकार्ड में आज तक कभी कुडरा गांव की रिपोर्ट थाने में नहीं दर्ज हुई. थाना पुलिस के मुताबिक इस गांव में कभी कोई अपराध घटित नहीं होते, गांव की छुटमुट समस्याओं को ग्रामीण आपस में ही सुलझा लेते हैं. थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने की कभी नौबत नहीं आने पाती. महिला उत्पीडऩ व दुष्कृत्य और छेडख़ानी आदि की भी कभी कोई शिकायत कुडरा गांव से नहीं आई. 
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Saturday, May 28, 2016

चुनौतियों से जूझना खेहा गांव के लोगों की बनी नियति

  • इस दुर्गम गांव तक गर्मी के मौसम में भी पहुंचना कठिन 
  • बारिश में केन नदी और कमधा नाला से घिर जाता है गांव 




। अरुण सिंह,पन्ना  

जिले के पवई जनपद क्षेत्र में एक गांव ऐसा भी है जहां के रहवासियों को बिना कोई जुर्म के काला पानी जैसी सजा भुगतने को मजबूर होना पड़ रहा है. जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 87 किमी. दूर पवई जनपद की ग्राम पंचायत पिपरियादोन के खेहा गांव की भौगोलिक स्थिति आज भी कुछ ऐसी है कि गर्मी के इस मौसम में भी इस गांव तक पहुंच पाना आसान नहीं है. बारिश के मौसम में तो यह गांव पूरी तरह से टापू में तब्दील हो जाता है. केन नदी व कमधा नाला से यह गांव इस तरह घिर जाता है कि पूरे चार माह तक इस गांव के वाशिंदे कैदियों की तरह जिन्दगी जीने को विवश हो जाते हैं.

नौतपा के तीसरे दिन प्रचण्ड गर्मी में पन्ना से पत्रकारों का एक दल इस दुर्गम इलाके में स्थित ग्राम खेहा में केन नदी को पैदल पार करके टेढ़े - मेढ़े जंगली रास्तों से होकर जब पहुंचे तो गांव के लोग भी हैरत में पड़ गये. गांव की एक महिला जो अपने मवेशियों को भूसा डाल रही थी, उसने जब इतने लोगों को गांव में आते देखा तो उत्सुकतावश घर से बाहर निकलकर पूंछा कि गांव में सड़क बननी है क्या ? पत्रकारों ने जब अपना परिचय दिया और यहां आने की वजह बताई तो उस महिला ने गांव के बीच खड़े नीम के बड़े वृक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहां जायें, गांव के सभी लोग वहां मिल जायेंगे. 

पत्रकारों के वहां पहुंचने पर अपने आप गांव के लोग जुड़ गये और हांथ में डायरी व कैमरा देख वे बिना कुछ बताये यह भी समझ गये कि गांव में कौन लोग आये हैं. इतने पत्रकारों को एक साथ अपने गांव में पाकर ग्रामवासी अत्यधिक प्रशन्न हुए और अपनी समस्याओं व रोजमर्रा की जिन्दगी में आने वाली चुनौतियों को एक - एक करके बताने लगे.
खेहा गांव के कुछ पढ़े - लिखे और समझदार से दिखने वाले रामकिशोर शर्मा ने बताया कि हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस गांव तक आवागमन के कोई साधन नहीं है. गांव में यदि कोई बीमार हो जाय तो 25 किमी. दूर पवई के अलावा इलाज की कहीं कोई सुविधा नहीं है. सबसे बड़ी मुसीबत तो यह है कि गांव से पिपरियादोन तक जाने के लिए पैदल चलने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है. ऐसी स्थिति में बीमार व्यक्ति को चारपाई पर चार लोग कंधे में रखकर ले जाते हैं. 

बारिश के मौसम में केन नदी जब बढ़ जाती है और कमधा नाला में भी पानी आ जाता है तो पैदल रास्ता भी बंद हो जाता है. इन विकट हालातों में भी गांव के लोग अपनी जान जोखिम में डालकर बीमार व्यक्ति को पवई तक ले जाने की हर संभव कोशिश करते हैं. बंदी यादव बताते हैं कि नदी में यदि गले तक पानी रहता है तो हम चारपाई कंधे में रखकर किसी तरह मरीज को पिपरियादोन तक ले जाते हैं, लेकिन यदि पानी गले से ऊपर होता है तो गांव में ही मरने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाता. बीमार पडऩे पर यहीं गांव में ही बिना इलाज के मरना हमारी नियति बन चुकी है. खेहा गांव के लोगों को केन नदी दो बार पार करना पड़ता है.

इस पहुंचविहीन और दुर्गम गांव में ब्राम्हण, यादव तथा कुछ आदिवासी निवास करते हैं. लगभग दो सौ की आबादी वाले इस गांव में सिर्फ 70 मतदाता हैं, शायद इसीलिए जनप्रतिनिधियों ने भी इस गांव की कोई सुध नहीं ली. गांव में बुनियादी सुविधा के नाम पर न तो बिजली है और न ही सड़क. छोटा सा स्कूल जरूर है लेकिन आंगनवाड़ी केन्द्र नहीं है. उचित मूल्य की दुकान पिपरियादोन में है, इसलिए खाद्यान्न व मिट्टी तेल लेने के लिए ग्राम वासियों को सर्दी, गर्मी व बारिश हर मौसम में पैदल ही जाना पड़ता है. 

जंगल, पहाड़ तथा नदी और नाले से घिरे इस गांव में रोजगार के कोई साधन नहीं है, पंचायत से भी आवश्यकता के अनुरूप काम नहीं मिल पाता. ऐसी स्थिति में खेती - बाड़ी ही जीविका का मुख्य आधार है. चूंकि यहां कृषि भूमि भी ऊंची - नीची है तथा सिंचाई के कोई साधन नहीं है. इसलिए खेती भी बहुत अच्छी नहीं होती. गांव के गुमान यादव, सुरेश यादव, गोपाल यादव, सुकुवा आदिवासी तथा कुंजी आदिवासी ने कहा कि यदि कमधा नाला में पुल बन जाय तो खेहा गांव तक बारहमासी आवागमन की सुविधा बन सकती है.

पेयजल की नहीं है कोई परेशानी 



अनगिनत समस्याओं से जूझ रहे खेहा ग्राम के निवासियों से जब पेयजल समस्या के संबंध में पूंछा गया तो उन्होंने बताया कि पीने के पानी की हमें कोई दिक्कत नहीं है. गांव में चार हैण्डपम्प लगे हैं और चारो ही चालू हालत में हैं, उनसे पर्याप्त पानी निकलता है. खेहा गांव में हैण्डपम्प कैसे लगे तथा यहां तक मशीन कैसे पहुंची, इस संबंध में रामकिशोर शर्मा ने बताया कि बोरिंग मशीन झालर की तरफ से लाई गई तथा गांव तक मशीन को लाने के लिए ग्रामवासियों ने मिलकर रास्ता बनाया, तब जाकर यहां हैण्डपम्प लग पाये हैं. हैण्डपम्पों के लगने से ग्रामवासियों को पेयजल समस्या से निजात मिल गई है.

घैरी, कछार व बन्डोरा गांव भी समस्या ग्रसित 


इसी इलाके में स्थित घैरी, कछार व बन्डोरा गांव में भी कमोवेश खेहा की ही तरह समस्याओं का अम्बार है. घैरी गांव खेहा के ही पास है और बारिश के मौसम में यह भी टापू बन जाता है. जबकि कछार और बन्डोरा गांव की समस्यायें जहां से कुछ अलहदा हैं. इन ग्रामों तक आवागमन की समस्या उतनी जटिल नहीं है फिर भी यहां के वाशिंदों को भारी मुसीबत झेलनी पड़ती है. ये दोनों गांव ग्राम पंचायत बछौन के अन्तर्गत आते हैं और पंचायत की इन ग्रामों से दूरी तकरीबन 25 किमी. है. 

जंगली रास्तों व पहाड़ से होकर राशन व खाद्य सामग्री लेने के लिए ग्राम वासियों को पैदल बछौन जाना पड़ता है. आदिवासी गांव कछार के महाबली, भूरे सिंह आदिवासी तथा बेनी आदिवासी ने बताया कि बछौन स्थित उचित मूल्य की दुकान में 25 किमी. पैदल चलकर जाने के बाद भी कभी - कभी उन्हें खाद्यान्न नहीं मिल पाता.
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