Wednesday, October 26, 2022

मंदिरों के शहर पन्ना में बुंदेलखंड क्षेत्र के प्रसिद्ध दिवारी नृत्य की रही धूम

  • ग्वालो के हैरतंगेज करतबों ने लोगों को किया मंत्रमुग्ध
  • ग्वाले आज भी निभाते हैं दिवारी नृत्य की यह परंपरा 


पन्ना । मंदिरों के शहर पन्ना में आज पूरे दिन दिवारी नृत्य की धूम रही। समूचे बुंदेलखंड क्षेत्र से ग्वाले विशेष वेशभूषा व हाथों में मोर पंख लिए यहां पहुंचते हैं और यहां के प्रसिद्ध मंदिरों में माथा टेककर दिवारी नृत्य करते हैं। पन्ना में दिवारी नृत्य की यह अनूठी परंपरा लगभग ३०० वर्षों से चली आ रही है, जो आज भी उसी तरह जारी है। श्री जुगल किशोरजी मंदिर के अलावा पन्ना शहर के अन्य प्रमुख मंदिरों श्री राम जानकी, श्री बलदाऊ जी मंदिर, श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर व श्री प्राणनाथ जी मंदिर में जाकर वहां भी तरह-तरह के करतब दिखाते हुए ग्वाले दिवारी नृत्य करते हैं। यह अद्भुत नजारा देखने लोगों की भीड़ उमड़ती है।

मालूम हो कि बुंदेलखंड क्षेत्र में दिवारी नृत्य की यह अनूठी प्राचीन परंपरा यहाँ तीन सौ वर्षों से चली आ रही है। दीपावली के दूसरे दिन परीवा को यहाँ उत्तरप्रदेश के बाँदा जिले से बड़ी संख्या में ग्वालों की टोलियां आती हैं जबकि मध्यप्रदेश के छतरपुर, दमोह, टीकमगढ़ आदि जिलों के ग्रामीण इलाकों से ग्वाले यहाँ आते हैं और यहां के प्रसिद्ध मंदिरों में नृत्य कर अपने को धन्य समझते हैं।  पन्ना सहित पड़ोसी जिलों के ग्रामीण अंचलों से सैकड़ों की संख्या में ग्वालों की टोलियां यहाँ रात्रि १२ बजे से ही पहुंचने लगती हैं। प्रथमा को सुबह ५ बजे से भगवान जुगल किशोर जी के दरबार में माथा टेकने के साथ ही दिवारी नृत्य का सिलसिला शुरू हो जाता है जो पूरे दिन चलता है।  ग्वालों की टोलियां नगर के अन्य मंदिरों के प्रांगण में भी दिवारी नृत्य का हैरतांगेज करतब का प्रदर्शन करते हैं। 

परम्परा का निर्वहन आज भी करते हैं ग्वाले

इस वर्ष ग्रहण की वजह से दीपावली के एक दिन बाद बुधवार को सुबह से ही हांथों मे मोर पंख लिए तथा रंग बिरंगी पोशाक पहने ग्वालों की टोलियों का जुगल किशोर जी, प्राणनाथ जी, बलदाऊ जी, श्रीराम जानकी  आदि मंदिरों में आने का सिलसिला शुरू हो गया था। ग्वाले पूरे भक्ति भाव के साथ भगवान की नयनाभिराम छवि के दर्शन करने के उपरांत पूरी मस्ती के साथ नगडिय़ा, ढोलक और मजीरों की धुन में दिवारी नृत्य व रोमांचकारी लाठी बाजी का प्रदर्शन करते हैं जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग यहां खिंचे चले आते हैं। मालूम हो कि पन्ना नगर के सुप्रसिद्ध मंदिरों में दिवारी नृत्य प्रस्तुत करने की पौराणिक परम्परा है, जिसका निर्वाहन बुन्देलखण्ड के ग्वाले आज भी करते हैं। यहां आने वाली ग्वालों की टोलियों में कुछ ग्वाले कठिन मौन व्रत भी करते हैं इन ग्वालों को मौनी कहा जाता है।

भगवान श्री कृष्ण को बताते हैं अपना सखा

दिवारी नृत्य का प्रदर्शन करने वाले पूरे अधिकार के साथ भगवान श्री कृष्ण को अपना बाल सखा मानते हैं। इसी आत्मीय भाव को लेकर ग्वाले तपोभूमि पन्ना में आकर मंदिरों में माथा टेकते हैं तो उनमें असीम ऊर्जा का संचार हो जाता है। इसी भाव दशा में ग्वाले सुध बुध खोकर जब दिवारी नृत्य करते हैं तो उन्हें इस बात की अनुभूति होती है मानो बालसखा कृष्ण स्वयं उनके साथ दिवारी नृत्य कर रहे हैं। ग्वालों की टोली के एक सदस्य ने बताया कि उनकी टोली में कई मौनी हैं। हम लोग दीपावली को चित्रकूट में थे और आज सुबह भगवान श्री जुगल किशोर जी के दरबार में आकर माथा टेका है। यहाँ दिवारी खेलने का अलग ही महत्व है। यहां दिवारी नृत्य करते समय जिस आनंद का अनुभव होता है उसे कह पाना कठिन है। मौनियों की टोली जब पूरी मस्ती में दिवारी नृत्य करती है तो दर्शकों के पांव भी थिरकने लगते हैं।

बुन्देलखण्ड अंचल में प्रसिद्ध है ग्वाल बाल का दिवारी नृत्य

समूचे बुन्देलखण्ड अंचल में कार्तिक कृष्ण अमावस्या से प्रथमा को ग्वाल बाल दिवारी नृत्य करते हैं और विभिन्न प्रकार के करतब भी दिखाते हैं, जो दीपावली के अवसर पर गांव-गांव में होता है। दिवारी नृत्य की टोलियों में शामिल ग्वालों को मौनी कहा जाता है। मौनियों की टोली जब पूरी मस्ती में दिवारी नृत्य करती है तो दर्शकों के पांव भी थिरकने लगते हैं। दीपावली के दूसरे दिन पन्ना शहर में दिवारी नृत्य की धूम देखते ही बनती है। समूचा शहर नगडिय़ों, ढोलक व मजीरों की विशेष धुन से गुंजायमान रहता है। दिवारी नृत्य करने वाली ग्वालों की टोलियों में शामिल मौनी अपने विशेष वेशभूषा में नृत्य करते हैं। वे सिर पर मोर पंख व कमर में घुंघरूओं का पट्टा बांधते हैं, मोर पंख का पूरा एक गठ्ठा मौनी अपने हांथ में भी थामे रहते हैं तथा इसी गठ्ठर को उछालकर नृत्य करते हैं।

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Wednesday, October 19, 2022

पन्ना में हीरों की नीलामी पर मंदी का असर, दो दिन में बिके सिर्फ १९ नग हीरे


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में स्थित उथली हीरा खदानों से प्राप्त हीरों की चल रही नीलामी में वैश्विक आर्थिक मंदी का असर साफ दिखाई दे रहा है। नीलामी के दूसरे दिन २३.४३ कैरेट वजन के सिर्फ ७ नग हीरे बिके हैं। मालुम हो कि यहाँ संयुक्त कलेक्ट्रेट भवन पन्ना में भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हीरों की नीलामी गत १८ अक्टूबर को शुरू हुई थी। हीरों की इस नीलामी में उज्जवल, मटमैले, एवं औद्योगिक किस्म के कुल ३५५.९६ कैरेट वजन के २०४ नग हीरे रखे गए हैं। इन हीरों की अनुमानित कीमत ४ करोड़ ९ लाख रुपये के लगभग निर्धारित की गई है। 

हीरा अधिकारी रवि पटेल ने दूसरे दिन की नीलामी के बाद आज सायं बताया कि आर्थिक मंदी के चलते हीरों की निर्धारित कीमत नहीं मिल रही। यही वजह है कि उम्मीद के मुताबिक इस बार की नीलामी में हीरे नहीं बिक रहे। श्री पटेल ने बताया कि पहले दिन की नीलामी में ६८ नग हीरे कुल ८२.३८ कैरेट के रखे गए थे। जिसमें १४.७० कैरेट वजन के १२ नग हीरे २४ लाख ७ हजार ५२६ रुपये में नीलाम हुए। जबकि दूसरे दिन १९ अक्टूबर की नीलामी में १२६.७६ कैरेट वजन के ६९ नग हीरे बिक्री के लिए रखे गए थे। जिनमें २३.४३ कैरेट वजन के सिर्फ ७ नग हीरे ४९ लाख ३७ हजार ८३४ रुपये में बिके हैं। दो दिन की नीलामी में कुल ३८.१३ कैरेट वजन के १९ नग हीरे ७३ लाख ४५ हजार ३६० रुपये में बिक्री हुए हैं। हीरों की यह नीलामी २० अक्टूबर तक चलनी है, जाहिर है कि नीलामी का कल अंतिम दिन है। 

हीरा कार्यालय पन्ना के हीरा पारखी अनुपम सिंह ने बताया कि नीलामी के दूसरे दिन जेम क्वालिटी का ६.८१ कैरेट वजन का हीरा ३ लाख ८१ हजार रुपये प्रति कैरेट की दर से २५ लाख ९४ हजार ६१० रुपये में बिका है जिसे मदर जेम्स ने ख़रीदा है। दो दिनों की नीलामी में किसी एक हीरे की यह सबसे अधिक कीमत है। आपने बताया कि नीलामी के अंतिम दिन जेम क्वालिटी वाले कई बड़े हीरों के बिकने की उम्मीद है।

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Monday, October 10, 2022

शरदपूर्णिमा की रात श्री प्राणनाथ मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु

  • पूनम की चांदनी रात भक्ति भाव में डूबे श्रद्धालुओं के जयकारों से गूँजा पन्ना
  • महामति श्री प्राणनाथ मंदिर में पंचमी तक चलेंगी जागिनी रास की लीलायें

  


पन्ना। प्रणामी सम्प्रदाय के प्रमुख तीर्थ पद्मावतीपुरी धाम पन्ना में अन्तर्राष्ट्रीय शरदपूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े। महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरदपूर्णिमा की रात भक्ति भाव में डूबे श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाते हुए खूब नृत्य किया।  हजारों सुन्दरसाथ व नगरवासियों ने श्री जी को निहारकर अपने नैनों को तृप्त किया। जैसे ही मध्य रात्रि में बंगला जी दरबार साहब से श्री जी की सवारी रासमण्डल के लिये निकली, वैसे ही रास के रचइया की, श्री प्राणनाथ प्यारे के जयकारों से पन्ना नगरी गूंज उठी।

उल्लेखनीय है कि श्री प्राणनाथ जी ने सुन्दरसाथ जी को श्री राज जी-श्यामा जी की अलौकिक अखण्ड रासलीला, जागिनी रास का दर्शन कराया था। प्रणामी धर्म का सबसे पवित्र धाम श्री गुम्बट जी मन्दिर जिसका प्रांगण बृह्म चबूतरा कहा जाता है। यहीं पर श्री प्राणनाथ जी ने अपने परम स्नेही सुन्दरसाथ जी को श्री राज जी-श्यामा जी की अलौकिक अखण्ड रासलीला, जागिनी रास का दर्शन कराया था। इसीलिये इसे जागिनी लीला भी कहा जाता है। उसी समय से अन्तर्राष्ट्रीय शरदपूर्णिमा महोत्सव का यहां पर बड़े ही धूमधाम और भक्ति भाव के साथ आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु यहां विराजमान साक्षात अक्षरातीत पूर्णबृह्म के अलौकिक रास के आनंद में सराबोर होते हैं। रविवार पूनम की रात जैसे ही श्रीजी की भव्य सवारी बंगला जी दरबार साहब से रासमण्डल में आई तो वहां उपस्थित हजारों सुन्दरसाथ अपने पिया के साथ प्रेम रंग में डूब गये। यह अखण्ड रास का आयोजन पांच दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय शरदपूर्णिमा उत्सव के रूप में रात-दिन चलेगा।

श्री राज जी महाराज के दिव्य शोभा यात्रा को मन्दिर के पुजारियों द्वारा अपने कंधों पर पूर्ण भाव के साथ रास मंडल लाई गई। इस महोत्सव में प्रणामी धर्म के सभी गादीपति, धर्मगुरू व संतगण उपस्थित रहकर कार्यक्रम में शामिल होते हैं। सर्वप्रथम श्री बंगला जी मन्दिर में सेवा, पूजा व आरती हुई। तत्पश्चात श्री राज जी महाराज के दिव्य सिंहासन को मन्दिर के पुजारियों द्वारा अपने कंधों पर लेकर श्री प्राणनाथ जी के जयघोष के साथ शोभयात्रा रात्रि ठीक १२ बजे निकली। शोभायात्रा निकलते ही उपस्थित हजारों की संख्या में प्रणामी धर्मावलम्बी सुन्दरसाथ की भावनायें व उत्साह कुछ ऐसा दिखा जैसे कि श्री प्राणनाथ जी स्वयं पालकी में विराजमान हों। शोभायात्रा बृह्म चबूतरे पर ही स्थित रासमण्डल में पधराई गई। श्री राज जी की शोभयात्रा की एक झलक पाने के लिये  सुन्दरसाथ बेताब दिखे। देश के कोने-कोने से आये सुन्दरसाथ पारम्परिक वेशभूषा में सुसज्जित अपनी-अपनी बोलियों में भजन-कीर्तन करते नजर आये।



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Sunday, October 9, 2022

पन्ना में दस दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव की धूम

  • सुप्रसिद्ध महामति श्री प्राणनाथ मंदिर में स्वर्ण कलश का हुआ अनावरण 
  • समारोह में पूरे भक्ति भाव से आयोजित हो रहे विविध धार्मिक कार्यक्रम



।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना।  प्रणामी संप्रदाय के सबसे बड़े तीर्थ पद्मावतीपुरी धाम पन्ना में दस दिवसीय शरद पूर्णिमा महोत्सव भक्ति भाव के साथ शुरु हो गया है। इस अनूठे आयोजन में शामिल होने तथा प्रेम के रस में डूबने के लिए समूचे देश से संतो सहित हजारों की संख्या में सुन्दरसाथ पद्मावतीपुरी धाम पन्ना पहुंच चुके हैं। शनिवार 8 अक्टूबर को श्री प्राणनाथ जी मंदिर में स्वर्ण कलश अनावरण सुबह 11 बजे सम्पन्न हुआ। इस शुभ अवसर पर संत शिरोमणि सदानंद महाराज जी व संत श्री मोहन प्रियाचार्य जी व श्री प्राणनाथ मंदिर ट्रस्ट बोर्ड के चेयरमैन महेश भाई पटेल के साथ समस्त न्यासी गण व महाप्रबंधक देश भूषण शर्मा के साथ समस्त पुजारीगण, संत समाज व सुंदरसाथ मौजूद रहे।

संतों के सानिध्य में हुआ स्वर्ण कलश का अनावरण

स्वर्ण कलश अनावरण कार्यक्रम में संतों ने डोरी खींच कर अनावरण किया। इसके बाद संतों नें कलश की आरती उतारी। इस मौके पर मौजूद श्रद्धालुओं (सुन्दरसाथ) ने  प्राणनाथ प्यारे के जयकारे लगाये। इस कार्यक्रम की एक झलक देखने के लिए हजारों की संख्या में सुंदरसाथ ब्रम्ह चबूतरे में एकजुट हुए थे।

अनवरत चल रहे संगीतमय कार्यक्रम 

पद्मावतीपुरी धाम पन्ना जी में  दशहरा के बाद से मंदिर में लगातार संगीतमयी कार्यक्रम के साथ प्रवचन चल रहे हैं।  मंदिर ट्रस्ट ने सुन्दरसाथ के लिए सारी व्यवस्था की है। मंदिर महाप्रबंधक डी.बी.शर्मा ने बताया कि मंदिर में सुन्दरसाथ जी के लिए सारी व्यवस्था हमारी ट्रस्ट व्दारा की गई है। संतो का लगातार आगमन हो रहा है। सुन्दरसाथ जी के लिए भोजन एवं ठहरने की व्यवस्था की गई है। संत समाज द्वारा लगातार धर्म चर्चा की जा रही है।  सभी मंदिरो में पूजा-अर्चना के साथ अन्य कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं।

शरद पूर्णिमा को होगा मुख्य समारोह


रविवार 9 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव का भव्यता के साथ आयोजन होने जा रहा है। मंदिर ट्रस्ट से आयोजन की सारी व्यवस्था की जा चुकी है। सुबह से मंदिर में प्रवचन के साथ रंगमंचीय कार्यक्रम आयोजित होंगे। रात 11 बजे रास के रमैया की जयकारों के साथ श्री जी की सवारी बंगला जी से रास मंडल जाएगी। विशाल सुन्दरसाथ जी के समूह के साथ श्रीजी की सवारी का भव्य स्वागत होगा जिसकी एक झलक पाने के लिए श्रद्धालु लालायित रहते हैं। प्राणनाथ प्यारे के जयकारों के साथ पन्ना नगरी गुंजाएमान होगी।

 प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवाल

प्राणनाथ मंदिर ट्रस्ट व्दारा आयोजित किए जा रहे अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव की सारी तैयारी की गई है, लेकिन देश विदेश से आए सुन्दरसाथ के लिए सुरक्षा के नाम पर पुलिस प्रशासन व्दारा माकूल व्यवस्था नहीं की गई है। समारोह में हजारों की तादाद में देश के विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालु पन्ना पहुंचे हैं। लेकिन सुरक्षा के इंतजाम ठीक न होने के चलते   जेब कटने व समान चोरी होने की घटनाएं भी हो रही है। मंदिर प्रबंधन नें पुलिस प्रशासन से सुन्दरसाथ की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए  व्यवस्था चुस्त करने की मांग की है।

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Friday, October 7, 2022

आखिर क्यों बनती जा रही है खेती अब घाटे का सौदा ?

 


।।  मंगल सिंह राजावत ।। 

आज 7अक्टूबर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वर्षा ऋतु अपने पूरे शबाब पर है। उर्द, सोयाबीन , अतिवृष्टि के कारण खराब हो गए हैं तो तिल की भी कब्रगाह बन गई है। बुंदेलखंड के छतरपुर टीकमगढ़ सहित अनेक जिलों में मूंगफली पर भी संकट के बादल गहराते जा रहे हैं। महंगे डीजल, महंगा बीज, एमआरपी से लगभग दोगुने रेट में मिलने वाला खतपरवार एवं कीटनाशक आदि आदि परिस्थितियों ने लघु एवं सीमांत किसानों की कमर तोड़ दी है। 

दरअसल हमें प्रकृति की नैसर्गिकता को समझते हुए मौसम एवं फसलों में तालमेल बैठाना होगा, वरना खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है। मध्य भारत में मुख्यतः तीन ऋतुऐ होती हैं, प्रत्येक ऋतु 120 दिन की होती है इसी के आधार पर फसल चक्र सदियों से निर्धारित किया गया है। 

किसान भाइयों कहने की जरूरत नहीं है विगत ग्रीष्म ऋतु  इतिहास की सबसे गर्म ऋतु रही है। स्पष्ट था प्रकृति संतुलन बनाती है, इसलिए वर्षा भी रिकॉर्ड बनाने वाली थी। हुआ भी यही किसान भाइयों ने पिछले वर्षों की तरह जल्दबाजी करते हुए जून अंत जुलाई फर्स्ट में उड़द, सोयाबीन, तिल की बोनी कर दी। 

 यद्यपि 15 जून से 15 अक्टूबर 120 दिन वर्षा काल के होते हैं, उपरोक्त फसलें सही समय पर 60 से 75 दिन के बीच में पक कर तैयार हो गई परिणाम अतिवृष्टि के कारण नष्ट हो गई। हम इसके लिए प्रकृति को उत्तरदाई नहीं ठहरा सकते। 


मैं खेती ठेका या बटाई पर देता रहा हूं किंतु इस वर्ष मैंने स्वयं खेती कराई है। मैं जान गया था कि इस वर्ष अतिवृष्टि होगी इसलिए मैंने धान रोपाई नहीं बल्कि सीधे छिडकवा दी थी इससे आने वाली लागत से बच गया था। अरहर सहित होने वाली लगभग सभी फसलें थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बुवाई, परिणाम खेती को घाटे का सौदा होने से बचा लिया। किसान भाइयों अक्टूबर में जारी बरसात को देखते हुए पूरी-पूरी संभावना है, आने वाली रबी की फसल ऋतु चक्र को देखते हुए बोनी होगी, वरना परिणाम गंभीर होंगे। 

अर्थात यह कि हमें कोई एक अल्पकालीन आयुवाली फसल के स्थान पर प्राचीनकालीन परंपरागत खेती करते हुए संतुलन बनाना होगा। तभी हम विपत्तियों से बच सकते हैं। 

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हाथी बरखे तीन गे उरदा तिली कपास, हाथी बरखे तीन भे साली, शक्कर, मास

 


।। बाबूलाल दाहिया ।।

बघेली बोली में यदि सबसे अधिक कहावतें हैं तो हस्त नृक्षत्र पर। क्योंकि कि यह ऐसा नृक्षत्र है जो खरीफ और रबी के संधिकाल में होने के कारण दोनों को प्रभावित करता है। यही कारण है कि इसमें वर्षा होने से कुछ लोगो मे खुसी होती है, तो कुछ लोगो के घरों में आफत भी ला देता है। इसे बघेली में हाथी य हथिया नृक्षत्र कहा जाता है।

यह नृक्षत्र अमूमन २५ सितम्बर के आस-पास लगता है और ९-१०  अक्टूबर तक समाप्त हो जाता है। पर  २० से २५ सितम्बर का समय यहां से वर्षा ऋतु समाप्ति का भी होता है। यह अलग बात है कि कभी- कभी कम दबाव का क्षेत्र बन जाने के कारण  बंगाल की खाड़ी बाले बादल यहां ४-५ दिन की झड़ी लगा बरस जाते हैं। 

तब क्वार माह होता है । अस्तु एक कहावत क्वार मास पर भी है कि--

  कुमार कय बरखा।

  आधेगाँव अनमन,

   आधे गाँव हरखा।।

क्योंकि जिनने खेत मे तिल, मूग, उड़द आदि नहीं बोया था उनको खुसी होती है कि खेतों में नमी संचित होने के कारण इस वर्ष गेहूं और गन्ने की भरपूर पैदावार होगी। परन्तु जिनने तिल, मूग, उड़द बोया हुआ था वहाँ तो यह वर्षा आफत ही लेकर आती है। कपास में भी फली छेदक सूडी ( इल्ली ) लग जाती है। यही कारण है कि एक कहावत तो और ही फेमस है जिसमें कहा गया है कि--

हथिया बरखे चित मेंड़राय।

घर बैठे किसान रेरियाय।।

इसीलिए इस मिले जुले आनन्द और दुख को उजागर करती यह कहावत भी कही गई है कि--

हाथी बरखे तीन गे उरदा तिली कपास।

हाथी बरखे तीन भे,साली शक्कर मास।।

यानी अगर उड़द, तिल, कपास नष्ट हुए तो धान, गन्ना और गेहूं के भरपूर उपज की संभावना भी बढ़ जाती है। इस नृक्षत्र में बारिश समाप्त हो चुकने पर जहां अलसी की बुबाई होती है वहीं एक कहावत सरसो, राई और मूली बोने की भी है कि--

      आधे हथिया मूर मुराई।

      आधे हथिया सरसो राई।।

हाथी के बाद चित्रा नृक्षत्र लगता है, जो चना मसूर बोने का नृक्षत्र होता है। हमारे पिता जी बताया करते थे कि " एक बार अश्वलेखा नृक्षत्र से बादल ऐसे रूठे की हस्त तक दुर्लभ से हो गए, जिससे समस्त खरीफ की फसल सूख गई।"

वर्षा आधारित खेती का जमाना था, जब कोई सिंचाई के साधन नहीं हुआ करते थे। अस्तु मजदूरों की कौंन कहे किसान तक परदेश कमाने मालबा, गुजरात चले गए। पर अचानक बंगाल की खाड़ी में हलचल हुई और स्वाती नृक्षत्र में इतनी बारिश होने लगी जितनी इन दिनों ३ दिन से दशहरा के समय हो रही है। फिर क्या था? प्रकृति ने कोदो को तो अकाल दुकाल के लिए बनाया ही था ? अस्तु उसके तने में कुछ जीवन शेष था । फिर नए किल्ले फूटे और शीघ्र ही बालियां आकर अगहन में दाने भी पक गए। जिसे काट मीज लोग भोजन में उपयोग किए और अकाल को अंगूठा दिया, जिससे उससे एक और कहावत ने जन्म ले लिया कि--

उत्तरा गए निखत्तरा, हाथी के मुह बोर।

बाढ़य बपुरी चित्रा,जउन लाई लोक बहोर।।

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Tuesday, October 4, 2022

हमारा पारिस्थितिकी तंत्र कैसे करता है काम, ऐसे समझें !

 

फ़ोटो में येलोस्टोन पार्क के जीवनदायिनी भेड़िये

- सिद्धार्थ ताबिश 

अगर आपको ये समझना है कि एको सिस्टम यानि हमारी प्रकृति का पारिस्थितिकी तंत्र कैसे काम करता है, तो आपको अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क के उदाहरण से इसे समझना चाहिए..चूँकि हमारा एको सिस्टम एक जटिल कार्यप्रणाली है, जिसे आप अपनी आखों से देखकर कभी समझ नहीं सकते हैं। आप ये कभी नहीं समझ पायेंगे कि जंगल, मैदान, नदी, पेड़ पौधे और जानवर कैसे मिलकर हमारे पारिस्थितकी तंत्र का निर्माण करते हैं। इसलिए इसे आपको इस उदाहरण से समझना होगा। 

अमेरिका का येलोस्टोन नेशनल पार्क दुनिया का सबसे बड़ा संरक्षित वन्य जीवन का स्थान है। लगभग नौ हज़ार स्क्वायर किलोमीटर के दायरे में फैला ये वन्य जीवन क्षेत्र पच्चीस साल पहले तक अपने जर्जर होते पारिस्थितिकी तंत्र से जूझ रहा था। अमेरिका में बर्फ़ में रहने वाले सफ़ेद भेड़ियों के शिकार पर कोई रोक नहीं थी, इसलिए लोगों ने इन भेड़ियों को मार-मार के लगभग ख़त्म कर डाला। 

येलोस्टोन नेशनल पार्क से भेड़ियों समेत तमाम प्रजातियाँ धीरे धीरे समाप्ति के कगार पर पहुँच रही थीं। तभी वहां की जनता की तमाम मांग और विरोध पर अमेरिकी सरकार ने भेड़ियों को संरक्षित प्राणी की सूची में सम्मिलित किया। और फिर 1995 में कनाडा से महज़ 31 भेड़िये येलो स्टोन नेशनल पार्क में ला कर छोड़े गए। सरकार ने ये सोचकर भेड़ियों को वहां छोड़ा ताकि अपनी जनता को दिखा सकें कि वो भेड़ियों को दुबारा बसा रहे हैं। मगर इन भेड़ियों की वजह से पार्क में जो कुछ भी हुआ उससे प्रकृति वैज्ञानिकों की आखें खुली की खुली रह गईं। 

भेड़िये दुनिया के सबसे समझदार शिकारियों में से एक माने जाते हैं। भेड़ियों ने पार्क में आते ही अपना काम शुरू कर दिया। बेतहाशा बढ़ चुकी "शाकाहारी" प्रजातियों के लिए भेड़िये एक मुसीबत की तरह आये। येलोस्टोन में बारहसिंघों की आबादी इतनी ज्यादा हो चुकी थी कि उसकी वजह से तमाम अन्य जीवों के लिए भोजन की उपलब्धता में भारी कमी हो गयी थी। इन भेड़ियों ने पहले  बीमार, और कुपोषित बारहसिंघों को मारना शुरू किया। क्यूंकि ये आसानी से उपलब्ध थे। 

भेड़िये इतने समझदार जीव होते हैं कि सर्दी के मौसम में जब खाने की कमी होती है तो वो गायों की जगह भैसों को मारना शुरू करते हैं और गायों को अपनी आबादी बढ़ाने देते हैं। ये मौसम के हिसाब से अपना खाना चुनते हैं जिसकी वजह से जंगल में शाकाहारी जीवों की आबादी का संतुलन बना रहता है। येलोस्टोन में जब भेड़िये आये तो उनकी वजह से बारहसिंघे नदी के किनारों को छोड़कर जंगल के बीच भाग गए। अन्य शाकाहारी भी सुदूर जंगलों में भाग गए। 

उससे हुआ ये कि नदी के किनारों पर जो वनस्पति और पेड़ शाकाहारियों द्वारा पूरी तरह से ख़त्म कर दिए गए थे वो उग कर बड़े होने लगे। पेड़ बड़े हुए तो तमाम चिड़ियाँ वापस आयीं। नदी किनारे के पेड़ बड़े हुए तो ठन्डे वातावरण वाले उदबिलाव वापस आये.. उदबिलाव (Beaver) सर्दियों में शिकारियों से अपने खाने को बचाने के लिए नदी में एक बाँध का निर्माण करते हैं। जिसे Beaver Dam बोला जाता है। उसमें ये नदी किनारे लगे वृक्षों से टहनियां तोड़ तोड़ कर लाते हैं और पेड़ के लट्ठों का पूरा जाल बना कर ऊपर से कीचड़ लगा कर नदी का बहता पानी रोककर एक तालाब जैसा बना देते हैं। इस तालाब में ये उदबिलाव सर्दियों के लिए अपना खाना सुरक्षित रखते हैं। 

उदबिलाव जो बाँध बनाते हैं उस से तमाम तरह की मछलियों के प्रजनन में आसानी होती है। जिन मछलियों के अंडे नदी की तेज़ धारा में बह जाते थे वो उदबिलाव के बाँध से रुक गए और नदियों में मछलियों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई। जब मछलियाँ बढीं तो भालू वापस आ गए। ऐसे तमाम वो जीव जो वापस दूसरी जगह चले गए थे सब वापस आ गए क्यूंकि नदी के किनारों के क्षेत्र हरे भरे हो गए। 

उन 31 भेड़ियों की वजह से येलो स्टोन नेशनल पार्क का एको सिस्टम जो पूरी तरह तबाह होने की कगार पर था.. वापस लौट आया। और ये सब सिर्फ 25 साल के भीतर हो गया। अब वहां भेड़ियों की तादात 500 के आसपास हो चुकी है और बारहसिंघे, गाय, भैंस और बाक़ी सारे शाकाहारियों की जनसंख्या नियंत्रण में है, जिसकी वजह से वो पार्क अब पूरी तरह से फल फूल रहा है। 

हमारा पारिस्थितिकी तंत्र ऐसे काम करता है..

खूंखार माँसाहारी जानवर जिस भी क्षेत्र से गायब हो जाते हैं, वहां का पर्यावरण संतुलन पूरी तरह से बिगड़ जाता है। क्यूंकि ये जानवर ही पारिस्थितिकी तंत्र के शिखर पर बैठकर वनस्पतियों और नदियों की रक्षा करके दूसरे अन्य जीवों को पनपने का अवसर प्रदान करते हैं। कितनी अजूबी है हमारी प्रकृति..मगर इसे हम अपनी मानव भावनाओं के द्वारा कभी समझ नहीं सकते हैं।  पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए हमें प्रकृति के हिसाब से सोचना होगा..जो जैसा है उसे हमें वैसा देखने की समझ विकसित करनी पड़ेगी। 

भारत के तमाम इलाके इस समय भयंकर रूप से अपने ख़राब और दम तोड़ते एको सिस्टम से जूझ रहे हैं। हमारी बस यही दुवा होनी चाहिए कि ये प्रकृति हमारे बुद्धिहीन नेताओं और जनता को समझ दे ताकि ये लोग इस देश के जंगल, खेत और एको सिस्टम को बचा सकें। 

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Friday, September 30, 2022

सहजन की पत्ती के रस से बढ़ जाती है नेत्र ज्योति

  •  इस चमत्कारिक पौधे का हर हिस्सा औषधीय गुणों से परिपूर्ण
  •  पत्तियों के रस का प्रयोग करने से उतर जाता है आँखों का चश्मा

औषधीय गुणों से परिपूर्ण सहजन का पेड़।

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। घर, खेत, आँगन यहां तक कि बड़े गमलों में भी सहजता से उगाये जा सकने वाले सर्व सुलभ सहजन का पेड़ औषधीय गुणों की खान है। यह एक ऐसा पेड़ है जिसका हर हिस्सा उपयोगी तथा औषधीय गुणों से परिपूर्ण है। सहजन की ताजी पत्ती का रस निकालकर यदि एक-दो बूँद आँख में डाली जाये तो तमाम तरह के नेत्र रोगों से जहां निजात मिल जाती है, वहीं कुछ ही दिनों के प्रयोग से आँखों का चश्मा तक उतर जाता है। उद्यान विभाग पन्ना के सहायक संचालक रहे महेन्द्र मोहन भट्ट का कहना है कि सहजन की पत्तियों के रस का उपयोग करने से न सिर्फ नेत्र ज्योति बढ़ती है अपितु मोतियाबिन्द के जाले तक छँट जाते हैं तथा आँख पूर्व की तरह निर्मल और तरो ताजा हो जाती है।

उल्लेखनीय है कि कुपोषण के कलंक को मिटाने के लिये सहजन के पौधे को जिसे स्थानीय भाषा में मुनगा भी कहा जाता है, उसे जिले के प्रत्येक आँगनबाड़ी केन्द्र व घरों में रोपित किये जाने का अभियान भी चलाया जा रहा है। जिसमें उद्यान विभाग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उद्यान विभाग की  नर्सरियों में सहजन के पौधे तैयार कर रोपण के लिये उपलब्ध कराये जाते हैं। आपने बताया कि यह बहुत ही तेज गति से बढऩे वाला पौधा है और किसी भी तरह की मिट्टी व वातावरण में लग जाता है। 

श्री भट्ट ने सहजन को इस सदी का संजीवनी पेड़ बताया और कहा कि इसकी पत्तियों में प्रचुर मात्रा में खनिज लवण और विटामिन पाया जाता है इसीलिये इसे एनर्जी ब्लास्टर भी कहा जाता है। सहजन के पौधे में जड़ से लेकर फूल,पत्तियों व फलियों में सेहत के गुण भरे हुये हैं। आपने बताया कि सहजन की पत्तियों का ताजा रस सीधे आँख में डालने के बजाय उसे बराबर मात्रा में शहद व पानी मिलाकर डायलूट किया जा सकता है। क्योंकि अकेली पत्तियों का रस उपयोग करने से कुछ देर तक जलन महसूस होती है, लेकिन १०-१५ मिनट बाद ही आँखें तरोताजा हो जाती हैं तथा शीतलता का अहसास होता है।

हाई ब्लड प्रेशर होता है नियंत्रित

सहजन की पत्तियों के रस का काढ़ा बनाकर हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को देने से लाभ मिलता है। इसका काढ़ा पीने से घबराहट, चक्कर आना तथा उल्टी जैसी तकलीफों से भी राहत मिलती है। सहजन की पत्तियां नेत्र रोग के अलावा मोच व गठिया जैसी बीमारियों के लिये भी फायदेमंद है। सहजन की फली में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है, जो बच्चों के लिये बहुत फायदेमंद होता है। इससे हड्डियां और दांत दोनों ही मजबूत बनते हैं। मोटापा और शरीर की बढ़ी हुई चर्बी को दूर करने के लिये भी सहजन को एक लाभदायक औषधि माना गया है।

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Thursday, September 29, 2022

हीरों की तलाश में जुटे पांच लोगों की फिर चमकी किस्मत

  • पन्ना जिले की उथली खदानों में ५ लोगों को मिले बेशकीमती हीरे
  • एक ही दिन में मिले कुल १८.८२ कैरेट वजन के हीरे, कीमत लाखों में


 ।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। बेशकीमती हीरों के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की रत्नगर्भा धरती इन दिनों हीरों की तलाश करने वाले लोगों पर मेहरबान है। यहाँ भिन्न - भिन्न इलाकों में कई जगह उथली हीरा खदानें लगाई जाती हैं जहाँ यदा कदा लोगों को हीरे मिलते रहते हैं। लेकिन ऐसा संयोग कम ही होता है कि एक ही दिन में पांच लोगों को बेशकीमती हीरे मिले हों। बुद्धवार २८ सितम्बर को यह चमत्कार घटित हुआ जब एक - एक करके शाम तक पटी व जरुआपुर की उथली हीरा खदानों में पांच लोगों को हीरा मिले। इन भाग्यशाली लोगों में एक महिला भी शामिल है।


डायमण्ड ऑफिसर पन्ना रवि पटेल ने जानकारी देते हुए बताया कि कलेक्ट्रेट स्थित हीरा कार्यालय में बुद्धवार को  पांच अलग-अलग लोगों के द्वारा उथली खदानों से प्राप्त हीरे जमा किए गए हैं। आपने बताया कि बारिश के दिनों में अमूमन हीरे अधिक लोगों को मिलते हैं। इसकी वजह हीरा धारित चाल (मिट्टी युक्त ककरू) धुलने के लिए पानी की पर्याप्त उपलब्धता होती है। लेकिन एक ही दिन में पांच लोगों को अच्छे किस्म के हीरे मिलना दुर्लभ संयोग है। आपने बताया कि उथली खदानों में पूरे वर्ष हीरे मिलते रहते हैं लेकिन  इस वर्ष मिलने वाले हीरों की संख्या गत वर्षो की तुलना में अधिक है।

हीरा कार्यालय पन्ना में पदस्थ हीरा पारखी अनुपम सिंह ने बताया कि कल्लू सोनकर निवासी पन्ना को कृष्णा कल्याणपुर पटी हीरा खदान में ६.८१ कैरेट का बेशकीमती हीरा मिला है। जेम क्वालिटी का यह हीरा बुद्धवार को मिले हीरों में सबसे बड़ा व कीमती है। इसी प्रकार राजा बाई निवासी छतरपुर को पटी खदान में १.७७ कैरेट, राजेश जैन निवासी पन्ना को पटी खदान में २.२८ कैरेट प्रकाश मजूमदार निवासी ग्राम जरुआपुर को जरुआपुर खदान में ३.६४ कैरेट एवं राहुल अग्रवाल निवासी जनकपुर पन्ना को पटी खदान में ४.३२ कैरेट वजन का हीरा प्राप्त हुआ है। इन सभी हीरा धारकों ने प्राप्त हुए हीरों को नियमानुसार हीरा कार्यालय में जमा किया है। हीरा पारखी ने बताया कि यह सभी हीरे उज्जवल किस्म के हैं, जिनका कुल वजन १८.८२ कैरेट है। जानकारों के मुताबिक उथली खदानों से प्राप्त हुए इन हीरों की कीमत लाखों में है, जो आगामी १८ अक्टूबर से होने वाली नीलामी में बिक्री के लिए रखे जाएंगे।



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Wednesday, September 28, 2022

पोषण वाटिका को हर घर मे होना जरूरी है – रविकान्त

  • दस्तक किशोरी समूहों के प्रतिनिधियों की जिला स्तरीय कार्यशाला आयोजित 
  • कार्यशाला में पोषण, स्वास्थ्य, आजीविका एवं नेतृत्व पर किया गया संवाद 


पन्ना। विकास संवाद समिति पन्ना द्वारा संचालित दस्तक परियोजना के अंतर्गत गठित किशोरी समूहों के प्रतिनिधियों का दो दिवसीय जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन होटल- संकल्प गार्डन पन्ना में किया गया।  इस कार्यशाला में किशोरियों को पोषण, स्वास्थ्य, आजीविका एवं संगठनात्मक (नेतृत्व) विकास हेतु संवाद किया गया। आयोजन में २५ गांव से ५० किशोरियों के द्वारा सभागिता की गई।

कार्यशाला में सहजकर्ता की भूमिका- सतना से मंजू चटर्जी एवं विकास संवाद भोपाल से अंजली आचार्य तथा पन्ना टीम के साथियों द्वारा निभाई गई। सबसे पहले कार्यशाला के उद्देश्य के बारे में विस्तार से चर्चा की गई और दो दिन की कार्यशाला को बिषय बार बताया गया जिसमे कुपोषण को ख़त्म करने हेतु सामुदायिक साझा पहल, आजीविका के नए स्रोतों का सृजन, पुरे साल हेतु घर में सब्जियों का उत्पादन, जैविक खेती को बढ़ावा देना, जल संरक्षण, लैंगिक भेदभाव, किशोरी स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, छुआ छूत पर संवाद और आगामी छः माह की कार्ययोजना आदि बिषय कार्यशाला में शामिल रहे।

विकास संवाद समिति के जिला समन्वयक रविकांत पाठक  द्वारा बताया गया की हम प्रतिबर्ष २५ गांव से किशोरी समूहों के दो-दो साथियों को कार्यशाला में शामिल करते हैं। कार्यशाला में किशोरी स्वास्थ्य, पोषण, आजीविका, सामुदायिक संगठनों को मजबूती हेतु दो दिन की कार्यशाला में संवाद स्थापित करते हैं। यदि हमे गाँव से कुपोषण, एनीमिया का अंत करना है, तो समुदाय, शासकीय एवं अशासकीय संस्थाओं को साथ मिल कर काम करना होगा। हमें यह तय    करना होगा कि गांव के प्रत्येक घर में पोषण वाटिका लगाने की जरूरत है, तभी हम कुपोषण और एनीमिया का अंत कर सकेंगे। 

विकास संवाद से अंजली जी द्वारा किशोरी स्वास्थ्य में मेंसट्रुअल कप के बारे में विस्तार से जानकारी दी तथा उपयोग करने हेतु बताया गया और कम खर्च तथा सुरक्षा कि दृष्टी से बहुत ही महत्त्व पूर्ण है। कार्यशाला में पृथ्वी संस्था से समीना युसूफ ने कार्यशाला में शामिल किशोरियों को सेनेटरी नेपकिन हेतु जानकारी देते हुए बताया कि आप स्वयं और परिवार में महिलाओ को पेड के उपयोग करने हेतु प्रेरित करें, जिससे संक्रमण का ख़तरा कम हो। रोजगार हेतु मशरुम उत्पादन सम्बन्धी जानकारी दी और बताया की आप लोग अपने घर में मशरूम उगा सकते हैं। मशरूम में बहुत पोषण होता है आप स्वयं परिवार में उपयोग करें और बच्चों को खिलाये साथ ही ज्यादा मात्रा में लगाते हैं तो बाजार में बेच सकते हैं, जिससे परिवार में आजीविका का स्रोत भी हो सकता है। 

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