Monday, November 5, 2018

मूर्तरूप ले रही जन समर्थन से बाघ संरक्षण की सोच

  •  पन्ना टाईगर रिजर्व में अब तक आयोजित हो चुके 157 नेचर कैम्प
  •   स्कूली बच्चे इन कैम्पों के जरिये जंगल की निराली दुनिया से हो रहे रूबरू
  •   प्रकृति की पाठशाला में जाकर अब तक 4847 बच्चे बन चुके हैं पर्यावरण प्रेमी


संवाद सम्मेलन में पन्ना नेचर कैम्पस पर प्रकाशित पुस्तक का विमोचन करते अतिथिगण।  फोटो - अरुण सिंह 


अरुण सिंह,पन्ना। अपने अभिनव प्रयोगों और अनूठी गतिविधियों के लिये देश और दुनिया में ख्याति अॢजत कर चुके म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में जन समर्थन से बाघ संरक्षण की सोच अब धीरे-धीरे मूर्त रूप ले रही है। विगत 8 वर्ष पूर्व तक जो लोग पन्ना टाईगर रिजर्व व बाघों सहित वन्य जीवों के संरक्षण का मुखर विरोध करते हुये टाईगर रिजर्व को विकास में सबसे बड़ी बाधा मान रहे थे, वे भी अब पन्ना टाईगर रिजर्व को एक अनमोल धरोहर के रूप में मान्यता देने लगे हैं। पन्नावासियों विशेषकर युवा पीढ़ी की सोच में आ रहे इस सकारात्मक बदलाव के पीछे बाघ पुनस्र्थापना योजना को मिली चमत्कारिक सफलता व बीते 8 वर्षों के दौरान लगातार आयोजित किये गये नेचर कैम्प हैं, जिनमें भाग लेकर हजारों स्कूली बच्चों तथा नागरिकों ने जंगल की निराली दुनिया से रूबरू होकर मानव जीवन में प्रकृति और पर्यावरण की महत्ता का पाठ पढ़ा। प्रकृति के बीच जाकर बच्चों ने यह जाना कि सह अस्तित्व में ही सबकी भलाई है, प्रकृति से लड़कर हम अपने वजूद को भी सुरक्षित नहीं रख पायेंगे।
जन समर्थन से बाघ संरक्षण की सोच को गति प्रदान करने वाली गतिविधि पन्ना नेचर कैम्प के सफलतम 8 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में रविवार 4 नवम्बर को डाईट सभागार में संवाद कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अनूठे कार्यक्रम में उन सभी प्रतिभागी बच्चों को आमंत्रित किया गया था, जिन्होंने नेचर कैम्प में भाग लिया है। इस मौके पर पन्ना टाईगर रिजर्व के पूर्व क्षेत्र संचालक जिनकी अथक मेहनत, टीम वर्क व जुनून के बलबूते बाघ पुनस्र्थापना योजना को कामयाबी मिली, वे भी मौजूद रहे। टाईगर मैन के रूप में चॢचत हो चुके आर. श्रीनिवास मूर्ति सदस्य सचिव म.प्र. जैव विविधता बोर्ड भोपाल ने नेचर कैम्प के अनुभवों को बच्चों के साथ साझा किया। कार्यक्रम में श्रीमती संगीता सक्सेना राज्य निर्देशक विश्व प्रकृति निधि भारत, क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया, उप संचालक वासु कनौजिया तथा हमारे बाघों की वापसी पुस्तक के लेख पियूष शेखसरिया की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

नेचर कैम्प की 8 वर्ष पूर्व हुई थी शुरूआत


 कार्यक्रम में मौजूद नेचर कैम्प के प्रतिभागी बच्चे व नागरिक।

प्रकृति और पर्यावरण तथा जैव विविधता के संबंध में आम जन मानस में जागरूकता पैदा हो, इस मंशा को लेकर पन्ना टाईगर रिजर्व में म.प्र. स्थापना दिवस 1 नवम्बर 2010 को नेचर कैम्प की शुरूआत हुई थी। पहले नेचर कैम्प में वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह के विजेता प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। शुरूआती सभी नेचर कैम्पों में तत्कालीन क्षेत्र संचालक आर. श्रीनिवास मूर्ति स्वयं शामिल होकर प्रतिभागी बच्चों को अपने रोचक व निराले अंदाज में जंगल की निराली और रोमांचक दुनिया से रूबरू कराया। आपकी ही पहल पर नेचर कैम्प से दो बुजुर्ग शिक्षक अम्बिका प्रसाद खरे व देवीदत्त चतुर्वेदी भी जुड़े। इनकी विशेष अभिरूचि व सक्रियता से नेचर कैम्प बच्चों में बेहद लोकप्रिय हुआ और उसकी निरन्तरता बनी रही। अब तक कुल 157 कैम्प आयोजित हो चुके हैं, जिनमें विभिन्न स्कूलों के 4847 बच्चों ने भाग लिया है।

समारोह में पुस्तक का हुआ विमोचन


पन्ना टाईगर रिजर्व व विश्व प्रकृति निधि भारत के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित संवाद सम्मेलन में पन्ना नेचर कैम्प के 8 वर्ष पुस्तक का विमोचन भी हुआ। पन्ना नेचर कैम्प की शुरूआत व सफलतम 8 वर्ष पूरे होने की गाथा को समेटे यह लघु पुस्तिका काफी रोचक व आकर्षक है, जिसका विमोचन संवाद सम्मेलन में मौजूद दो बच्चों से कराया गया। इस मौके पर बच्चों से संवाद करते हुये श्री मूर्ति ने कहा कि जब तक हम किसी चीज को देखते व समझते नहीं तब तक उससे लगाव व नफरत नहीं हो सकता। आपने कहा कि हवा, पानी व भोजन यह सब हमें जंगल से मिलता है, इसकी समझ नई पीढ़ी में आनी चाहिये ताकि वे जंगल को धरोहर की तरह संरक्षित करने के लिये प्रेरित हो सकें। आपने बताया कि जैव विविधता के लिये पूरे प्रदेश में रणनीति बन रही है, इस दिशा में पन्ना का नेचर कैम्प एक बहुत बड़ा आयाम है।
00000

Saturday, November 3, 2018

नदी जो पत्थरों में करती है रंगीन चित्रकारी

  • सात पहाडों का सीना चीरकर बहती है केन नदी 
  • पन्ना टाइगर रिजर्व की जीवन रेखा है केन 


पन्ना टाइगर रिज़र्व से होकर गुजरने वाली केन नदी का मनोरम द्रश्य। 


अरुण सिंह, पन्ना। सात पहाडों का सीना चीरकर प्रवाहित होने वाली केन नदी को पन्ना टाइगर रिजर्व की जीवन रेखा कहा जाता है. तमाम तरह की विशिष्टताओं व रहस्यों से परिपूर्ण केन नदी म.प्र. की एक मात्र ऐसी नदी है जो प्रदूषण से मुक्त है. यह अनूठी नदी अपने प्रवाह क्षेत्र में पत्थरों पर चित्रकारी करते हुए बहती है, चित्रकारी वाले इन पत्थरों को बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोग शजर कहते हैं.
उल्लेखनीय है कि शजर एक अनोखा पत्थर होता है, ऊपर से बदरंग दिखने वाले इस पत्थर को जब मशीन में तराशते हैं तो इसमें झाडिय़ों, पेड़ - पौधों, पशु - पक्षियों, मानव और जलधारा के विभिन्न रंगीन चित्र देखने को मिलते हैं. आकर्षक चित्रकारी वाला यह पन्ना जिले के अजयगढ़ कस्बे से लेकर उ.प्र. में बांदा जिले के कनवारा गांव तक पाया जाता है. पन्ना जिले में पण्डवन नामक स्थान में केन नदी का अद्भुत नजारा देखते ही बनता है. इस जगह पर पतने, व्यारमा व मिढ़ासन सहित पांच नदियां केन में मिलती हैं. नदियों के इस संगम में पत्थरों की विस्मय बिमुग्ध कर देने वाली आकृतियां नजर आती हैं. पण्डवन से होते हुए केन पन्ना टाइगर रिजर्व के बीच से तकरीबन 55 किमी. तक प्रवाहित होती है, इस नदी को पन्ना टाइगर रिजर्व की जीवन रेखा भी कहा जाता है. केन नदी के कंचन जल में मगर व घडियाल जैसे सरीसृप व विभिन्न प्रजाति की मछलियां पाई जाती हैं, वहीं जंगल में विचरण करने वाले शाकाहारी व मांसाहारी वन्य प्रांणियों की जिन्दगी का भी यह नदी आधार है.

केन नदी की धार से रेत निकालती पोकलेन मशीन। 

केन नदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह घने जंगलों व पहाडों से होकर प्रवाहित होती है, फलस्वरूप यह नदी प्रदूषण से मुक्त है. इसकी वजह यह है कि केन नदी का प्रवाह क्षेत्र मानव आबादी से दूर है. लेकिन अब बढ़ती आबादी के साथ - साथ इस नदी पर भी खतरा मंडराने लगा है. बालू के अवैध व अनियंत्रित उत्खनन से भी नदी के नैसर्गिक स्वभाव में बदलाव आना शुरू हो गया है. बालू की अत्यधिक निकासी से जल स्तर तेजी से जेहां गिर रहा है वहीं नदी किनारे के ग्रामों में भी जल संकट की आहट सुनाई देने लगी है. पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि केन नदी से बड़े पैमाने पर हो रहे रेत के उत्खनन से घडियालों का वजूद जहां संकट में पड़ सकता है, वहीं केन नदी की खूबी भी तिरोहित हो सकती है. इसलिए समय रहते अवैध उत्खनन व पर्यावरण के साथ होने वाले खिलवाड़ पर प्रभावी रोक लगाया जाना चाहिए ताकि केन  अपने प्राकृतिक स्वरूप में प्रवाहित होती रहे.

Friday, October 26, 2018

ध्वनि प्रदूषण से परिंदों की जिंदगी में पड़ रहा खलल




अरुण सिंह, पन्ना। बढ़ते ध्वनि प्रदूषण व शोरगुल के माहौल से परेशानी सिर्फ मनुष्यों को ही नहीं बल्कि परिंदों को भी होती है. ध्वनि प्रदूषण के कारण चिडिय़ों में संवाद करने की क्षमता पर असर पड़ा है। शोरगुल की वजह से नर पक्षी की पुकार मादा तक नहीं पहुंच पाती, ऐसे में विभिन्न प्रजाति के रंग विरंगे पंछियों की आबादी घटने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
उल्लेखनीय है कि पन्ना शहर के आसपास स्थित वनाच्छादित पहाडिय़ों में कुछ वर्षों पूर्व तक सैकड़ों प्रजाति के पंछियों के दर्शन सहजता से हो जाते थे। सुबह के समय पंछियों के कलरव व सुरीले गीतों को सुन मन प्रफुल्लित हो जाता था, लेकिन वाहनों के प्रेसर हार्न, जंगलों की बेतहासा कटाई व मानव दखलंदाजी बढऩे से पंछियों का प्राकृतिक रहवास तेजी से नष्ट हो रहा है जिससे उनके दर्शन दुर्लभ हो गये हैं। सुबह की सैर में जाने वाले लोगों को शहर के निकट ही राष्ट्रीय पक्षी मोर नृत्य करते हुए नजर आ जाते थे, कोयल की सुरीले गीत हर तरफ सुनाई देते थे लेकिन अब सुबह की सैर में न तो मोर नजर आते हैं और न ही पंक्षियों के गीत सुनाई देते हैं। इसकी जगह मोबाइल पर बजने वाले फिल्मी गीत कर्कश आवाज में सुनने को मिलता है, जिससे ताजगी व स्फूर्ति मिलने के बजाय मन और खिन्न हो जाता है। 
पंछियों की गतिविधियों पर नजर रखने वाले शोध कर्ताओं का कहना है कि नर पंक्षी की आवाज को पूरी तरह से सुन पाने में नाकाम होने वाली मादाएं अपने नर साथियों को बीमार समझकर खारिज कर सकती हैं। उनका मानना है कि मादा पक्षी निम्न आवृत्ति वाले किसी गीत को सुन पाने में खुद को जब असमर्थ पाती है तो वे नर पक्षी की आवाज को असमान्य महसूस करने लगती हैं। इस व्यवधान के चलते अगर नर पक्षियों को मादा जोड़े न मिलें तो उनकी नस्लें कम होने लगेंगी और इसका असर उनकी आबादी पर दिखेगा। मानव आबादी के आसपास घरों में सहजता से नजर आने वाली गौरैया चिडिय़ों की तादाद भी तेजी से घट रही है, इसकी वजह तथाकथित विकास व पर्यावरण के साथ होने वाला खिलवाड़ प्रमुख है।

00000


Monday, October 15, 2018

बांस उद्योग से खुल सकते हैं रोजगार के नये अवसर

  •   पन्ना के जंगल में प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में होता है  बांस,
  •   कल्दा पठार के श्यामगिरी का सालिड बैम्बू पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध


 पर्यटकों के ठहरने हेतु बांस से निर्मित की गई झोपड़ी। फोटो - अरुण सिंह 

।। अरुण सिंह ।। 

पन्ना। प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण पन्ना जिले के जंगलों में प्रचुर मात्रा में बांस का उत्पादन होता है, यदि वन क्षेत्र से लगे ग्रामों में निजी कृषि भूमि पर भी बांस का रोपण किया जाय तो किसानों की जिन्दगी में भी खुशहाली आ सकती है। बांस उद्योग को बढ़ावा मिलने पर पन्ना जिले में विकास व रोजगार के नये अवसरों का सृजन हो सकता है। लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई ठोस और प्रभावी पहल नहीं की गई है। 

इसके विपरीत पन्ना जिले के समृद्ध वन क्षेत्र को बड़े ही  सुनियोजित तरीके से उजाडऩे का कार्य किया जा रहा  है । बड़े पैमाने पर प्रतिदिन जहाँ  जंगल में बेशकीमती वृक्षों की कटाई हो  रही  है , वहीँ  वन क्षेत्रों के आस-पास होने वाले अवैध उत्खनन से भी पर्यावरण व जंगल को भारी क्षति पहुँच रही  है । पन्ना जिले के कल्दा पठार का जंगल जो वहाँ  के आदिवासियों की जिन्दगी का आधार है  उसे भी उजाडऩे के प्रयास तेजी से हो  रहे  हैं। यदि कल्दा पठार के समृद्ध वन क्षेत्र की सुरक्षा व संरक्षण के  लिए आवश्यक कदम न उठाए गये तो यहाँ  के आदिवासियों की जिन्दगी मुश्किल में पड़ जाएगी।

उल्लेखनीय है कि अनगिनत खूबियों व विकास की विपुल संभावनाओं के बावजूद पन्ना जिला विकास के मामले में आज भी अन्य दूसरे जिलों की तुलना में काफी पीछे है। यहां का सम्यक विकास कैसे हो, इसके लिए इस जिले की खूबियों और विशिष्टताओं पर गौर करना होगा तथा उसी के अनुरूप कार्य योजना बनानी होगी। दूसरे जिलों की नकल करके विकास की अंधी दौड़ में सहभागी होना, इस जिले की प्रकृति के अनुकूल नहीं होगा। यहां के जंगलों में नैसर्गिक रूप से पाई जाने वाली वन संपदा का जिले के विकास व रोजगार के सृजन में उपयोग हो, यह जरूरी है। प्रकृति ने हमें जो सौगात उपहार में प्रदान की है उसी से हम विकास व समृद्धि के नये आयाम छू सकते हैं। अकेले बांस उद्योग को बढ़ावा दिये जाने से इस जिले का कायाकल्प हो सकता है। गरीबों की इमारती लकड़ी कहा जाने वाला बांस आज महत्वपूर्ण उद्योग के रूप में उभरा है, स्थिति यह है कि मांग के अनुरूप बांस की आपूर्ति नहीं हो पा रही है।

शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में हर कहीं बांस की उपयोगिता कम होने के बजाय और बढ़ी है। ग्रामीण अंचलों में एक समुदाय विशेष के लोग बांस के बर्तन व अन्य आकर्षक उपयोगी वस्तुएं बनाकर ही अपना जीवन यापन करते हैं। यदि इस समुदाय के लोगों को बांस शिल्प व उद्यम के लिए प्रशिक्षण दिया जाय तो बांस बर्तनों के निर्माण में इन्हें दक्षता हासिल करने में कठिनाई नहीं होगी। बांस पन्ना जिले में कुटीर उद्योग का रूप ले, इस दिशा में यदि सार्थक और कारगर पहल हो तो रोजगार के नये अवसरों का सृजन होने के साथ - साथ लोगों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा।

बांस से निर्मित झोपड़ी व कुर्सियां पर्यटकों की पसंद 



पन्ना जिले में चूंकि पर्यटन विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है, इसलिए यहां प्राकृतिक माहौल व आबोहवा प्रदान करने वाले रिसॉर्ट भी बन रहे हैं। यहां बांस से निर्मित झोपडिय़ों व बांस की कुर्सियों का प्रचलन अधिक है, पर्यटक भी यह पसंद करते हैं। इसके अलावा भी बांस के अनगिनत उपयोग हैं, जिनके बारे में यहां के लोगों को सही जानकारी व प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। किसानों को भी अपनी निजी भूमि में बांस रोपण के लिए प्रेरित करने से उन्हें अतिरिक्त आय होगी साथ ही जिले में खुलने वाले बांस आधारित कुटीर उद्योगों को सहजता से बांस उपलब्ध हो सकेगा।

श्यामगिरी में होता है सालिड बैम्बू

पन्ना जिले में दक्षिण वन मण्डल अन्तर्गत कल्दा पठार के श्यामगिरी क्षेत्र में विशिष्ट प्रजाति का बांस होता है जो पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। दक्षिण वन मण्डलाधिकारी अनुपम सहïाय ने बताया कि श्यामगिरी के सालिड बैम्बू को कागज इन्डस्ट्री बहुत पसंद करती हैं। ओरियन्ट पेपर मिल अमलई में सप्लाई होने के चलते यहां का बांस खत्म होने की कगार में पहुंच गया था। लेकिन बीते दो सालों में इस प्रजाति के बांस को पुर्नजीवित करने के प्रयास हुए जिसके अच्छे परिणाम सामने आये हैं।

बांस के होते  हैं अनगिनत उपयोग

बांस बहुउपयोगी होता है, यही वजह है कि इसकी मांग निरन्तर बढ़ रही है। बांस से खूबसूरत और आकर्षक तरह - तरह के बर्तन तो बनते ही हैं, इसके रेशों से बना कपड़ा हवादार व सुखदायक होता है। बांस पर्यावरण की दृष्टि से भी अच्छा है तथा इससे निर्मित वस्तुंए शत प्रतिशत नष्ट होने योग्य होती हैं। यह प्राकृतिक रूप से एन्टी बैक्टीरियल व एन्टी फंगल होता है। 

बांस निर्मित भवन भूकंप अवरोधी होते हैं इतना ही नहीं बांस की कोंपलें पशुओं के लिए बेहतर चारा होता है। पन्ना जिला जहाँ  के जंगलों में प्राकृतिक रूप से बांस का उत्पादन होता है  वहां  बांस के बिगड़े वनों में सुधार करके तथा बांस से संबंधित कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर पन्ना जिले में रोजगार के नये अवसरों का सृजन किया जा सकता है । इस दिशा में जिले के  कलेक्टर  व क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों का ध्यान अपेेक्षित है।

000000

Wednesday, October 3, 2018

अनोखे अंदाज में मना नन्हे हांथी बापू का जन्म दिवस

  • पन्ना टाईगर रिजर्व के हिनौता कैम्प में आयोजित हुआ रंगारंग कार्यक्रम
  • बुजुर्ग हथिनी वत्सला सहित सज धजकर शामिल हुआ हांथियों का पूरा कुनबा
  • जश्न के माहौल में कटा केक, स्कूली बच्चों ने दी शानदार प्रस्तुति 




पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में मंगलवार 2 अक्टूबर का दिन बेहद खास रहा। यहां पहली बार एक नन्हे हांथी का जन्म दिवस अनोखे अंदाज में बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया। न भुलाये जा सकने वाले इस अनूठे उत्सव को मनाने की खास वजह है। विगत एक वर्ष पूर्व पन्ना टाईगर रिजर्व की हंथिनी अनारकली ने 2 अक्टूबर को नन्हे मेहमान को जन्म दिया था। खास दिन जन्मे इस मेहमान का नामकरण पार्क प्रबन्धन द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को याद करते हुये बापू किया गया। नन्हे हांथी बापू का आज पहला जन्म दिवस था, जिसे पार्क प्रबन्धन ने अनूठे अंदाज में मनाकर अविस्मरणीय बना दिया है। अब हांथी बापू का जन्म दिवस हर वर्ष 2 अक्टूबर को इसी तरह धूमधाम से मनाया जायेगा। मालुम हो कि राष्ट्रीय पशु बाघ का
जन्म दिवस भी कुछ इसी अंदाज में प्रतिवर्ष यहां 16 अप्रैल को मनाया जाता है। इस तरह से हांथी व बाघ का जन्म दिवस मनाने की परम्परा अन्यत्र कहीं नहीं है। आज के इस कार्यक्रम में जहां स्कूली बच्चे बड़े ही उत्साह के साथ शामिल हुये वहीं बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारी, न्यायधीशगण,जनप्रतिनिधि, पत्रकारगण, आमजन सहित पन्ना टाईगर रिजर्व का पूरा अमला उपस्थित रहा।


विशेष रूप से सुसज्जित हांथियों का जोड़ा।

हांथी बापू के जन्म दिवस का यह अनूठा कार्यक्रम पूर्व निर्धारित समय अनुसार सुबह 11 बजे से शुरू हुआ जो दो बजे तक चलता रहा। बापू के जन्मदिवस पर मेवायुक्त गुड का विशेष रूप से केक बनवाया गया था। जिसे पन्ना टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक के.एस. भदौरिया व उप संचालक वासु कन्नौजिया ने संयुक्त रूप से काटकर बापू को खिलाया। इसके पूर्व सभी अतिथियों ने मिलकर बापू के माथे पर हल्दी व चावल का मिश्रित टीका लगाया। इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूल के बच्चों ने अपनी रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। जिसमें विभिन्न वन्य प्राणियों के रूप में किरदार निभा रहे छात्र-छात्राओं ने अपनी प्रस्तुति देते हुये उपस्थित जनसमुदाय को यह संदेश भी दिया कि वन हैं तो वन्य प्राणी हैं और वन्य प्राणी है तो हम और आप हैं। कार्यक्रम में पद्मावती व लिस्यू आनंद विद्यालय के बच्चों जिनमें मानसी रिछारिया, अनन्या जैन ने कत्थक नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी। वहीं कुछ बच्चों द्वारा वन्य जीवों पर आधारित कवितायें भी प्रस्तुत की गईं। भव्यतापूर्वक मने इस जन्मोत्सव में निश्चित रूप से आम लोगों व छात्र-छात्राओं में यह संदेश गया कि वन्य प्राणी भी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।जिनके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं हैं।

कार्यक्रम में प्रस्तुति देते हुये स्कूली छात्र-छात्रायें।

आकर्षक ढंग से सजा था हांथियों का कुनबा 

जन्मोत्सव समारोह के विशेष अवसर पर पन्ना टाईगर रिजर्व के सभी हांथियों को आकर्षक ढंग से सजाया और संवारा गया था। सजे संवरे हांथियों के इस भरे पूरे कुनबे को एक साथ देखना निश्चित ही रोमांचकारी था। मालुम हो कि पन्ना टाईगर रिजर्व में हांथियों के इस कुनबे को जहां 100 वर्ष की उम्र पार कर चुकी दुनिया की सबसे बुजुर्ग हंथिनी वत्सला गौरवान्वित करती है वहीं इस कुनबे में सबसे छोटा सदस्य हांथी बापू भी शामिल है। चंचल स्वभाव वाला यह नन्हा हांथी हर किसी को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। हांथियों का यह कुनबा बेहद प्रसन्न और उत्साहित दिख रहा था। नाना प्रकार के फल व पकवान हांथियों के लिये रखे गये थे। बापू को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों यह सब देखकर वह खुशी से उछल रहा हो। समारोह में पहुंचे छात्र-छात्राओं व
अतिथियों ने हांथियों के साथ सेल्फी लेकर उत्सवी माहौल को कैमरे में कैद किया।

जन्मोत्सव समारोह में शामिल हांथियों का पूरा कुनबा

टाईगर रिवर्ज के अभिन्न अंग हैं हांथी: भदौरिया 

पन्ना टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक के.एस. भदौरिया ने इस मौके पर कहा कि हांथी पार्क के अभिन्न अंग हैं। क्योंकि हांथी ही एक ऐसा वन्य प्राणी है जो हमें बाघों के पास तक ले जाता है जिससे बाघों की स्थिति व उनका
स्वास्थ्य परीक्षण करना आसान होता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर के ही दिन इस नन्हे हांथी का जन्म हुआ था। इसीलिये इसका नाम बापू रखा गया है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह 1 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक मनाया जाता है और यह उसी के बीच कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन मीना मिश्रा द्वारा किया गया व अतिथियों का आभार प्रदर्शन नरेश सिंह यादव डीएफओ उत्तर वनमण्डल द्वारा किया गया। जन्मोत्सव कार्यक्रम में न्यायाधीशगण, डीएफओ उत्तर वनमण्डल नरेश सिंह यादव, पन्ना टाईगर रिजर्व के संस्थापक सदस्य लोकेन्द्र सिंह, पन्ना टाईगर रिजर्व की उप संचालक वासु कन्नौजिया, दक्षिण वनमण्डल की डीएफओ मीना मिश्रा, डॉ. विजय परमार, बिन्नी राजा सहित पन्ना फ्रें ड्स क्लब के सदस्य, गणमान्य नागरिक, विभिन्न स्कूलों के छात्र-छात्राओं सहित वन अधिकारी व कर्मचारीगण उपस्थित रहे।


हांथी बापू समारोह स्थल पर चहल कदमी करते हुये।

@@@@

Saturday, September 22, 2018

साहब मुझे भी दिलवा दो पीएम आवास

  •   झोपड़ी में रहती है अहिरगुवांं पंचायत की 80 वर्षीय विधवा
  •   जिनके पहले से घर हैं उनके बन गये आवास, गरीब वंचित


।।  अरुण सिंह ।।


गरीब वृद्धा पीएम आवास की माँग करते हुये।

पन्ना। केन्द्र सरकार की बहुप्रचारित महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना का अपेक्षित लाभ गरीबों और जरूरतमंद हितग्राहियों को नहीं मिल पा रहा है। आर्थिक रूप से सक्षम व राजनीतिक पहुँच वाले लोग जिनके पूर्व से ही मकान हैं, वे इस योजना का लाभ धड़ल्ले से उठा रहे हैं। 

जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 16 किमी दूर स्थित ग्राम पंचायत अहिरगुवां की 80 वर्षीय फूलमाला सरकार अपनी विधवा बेटी के साथ छोटे से झोपड़े में रहती है। इसके जीवनयापन का एकमात्र सहारा वृद्धावस्था पेंशन है। पीएम आवास के लिये यह वृद्धा पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों तक से विनती कर चुकी है लेकिन अभी तक इस गरीब बेसहारा को योजना का लाभ नहीं मिल सका है। जिससे साफ जाहिर होता है कि पात्र हितग्राही इस योजना से जहां वंचित हैं, वहीं अपात्रों को आवास स्वीकृत हो रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को आज समाजसेवी संस्था समर्थन के प्रतिनिधि जब इस ग्राम पंचायत में पहुँचे तो अहिरगुवां कैम्प में झोपड़े में निवास करने वाली इस वृद्धा ने इन प्रतिनिधियों को बड़ा अफसर समझकर हांथ जोड़कर कहा कि साहब मुझे भी पीएम आवास दिलवा दो, भगवान आपका भला करेगा। इस 80 वर्षीय वृद्धा ने बताया कि वह अपनी विधवा बेटी के साथ झोपड़े में रहती है, बारिश का मौसम बड़ी मुसीबत भरा होता है। जीवनयापन के लिये सिर्फ वृद्धावस्था पेंशन जो 5 सौ रूपया मिलता है, उसी का सहारा है। इसी पैसे से किसी तरह गुजर-बसर हो रहा है। यदि पीएम आवास मिल जाये तो हमारी मुसीबत कम हो जायेगी। 

मालुम हो कि ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा सबके लिये आवास 2022 का लक्ष्य पाने के लिये प्रधानमंत्री आवास योजना- ग्रामीण प्रारंभ की गई है। इस योजना की शुरूआत 20 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री जी द्वारा की गई है। इस योजना के शुरू होने पर अवासहीन गरीबों के चेहरों पर मुस्कान फैल गई थी, उन्हें उम्मीद जागी थी कि अब उनके पास भी एक अदद पक्का घर होगा। लेकिन फूलमाला सरकार जैसे अनेकों ऐसे गरीब हैं, जिन्हें पीएम आवास अभी तक नसीब नहीं हो सका है।

आदिवासी मजरा में कुपोषण बड़ी समस्या


 माँ की गोद में बैठा कुपोषण से ग्रसित बच्चा।


ग्राम पंचायत अहिरगुवां के आदिवासी मजरा रामपुर क्वाटरन में गरीबी और कुपोषण सबसे बड़ी समस्या है। इस मजरे में सिर्फ आदिवासी परिवार रहते हैं जिनका भरण-पोषण हीरा खदानों में मजदूरी करके होता है। भीषण गरीबी और अशिक्षा के चलते इस मजरे के ज्यादातर बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। स्वयंसेवी संस्था के प्रतिनिधि जब इस मजरे में पहुँचे तो एक आदिवासी महिला अपने 4 वर्ष के बच्चे को गोदी में लिये बैठी थी, उससे बड़ा बच्चा पास ही खड़ा था। गोदी में बैठा बच्चा सम्पतराम गंभीर कुपोषण का शिकार है। पिता श्री आदिवासी हीरा खदान में मजदूरी करता है। ऐसी स्थिति में परिवार का भरण-पोषण बमुश्किल हो पाता है। पिछले साल ही दो बच्चों की मौत हो चुकी है तथा चार बच्चे अभी भी हैं, जो भीषण गरीबी और अभावों के बीच जीने को मजबूर हैं।


प्राथमिक शाला में शौचालय है लेकिन टैंक नहीं


आदिवासी बस्ती रामपुर क्वाटरन के गरीब आदिवासी बच्चों के पढऩे हेतु शासन द्वारा प्राथमिक शाला का संचालन किया जा रहा है। जहां पढऩे के लिये गिनती के ही कुछ बच्चे मध्याह्न भोजन की लालच में शाला पहुँचते हैं। खाना मिलते ही बच्चे शाला से निकल लेते हैं। इस प्राथमिक शाला में छात्र व छात्राओं के लिये पृथक-पृथक शौचालय का निर्माण तो कराया गया है लेकन आश्चर्य इस बात का है कि टैंक नहीं बनवाया गया। जाहिर है कि निॢमत शौचालय सिर्फ देखने के लिये है, इसका उपयोग नहीं किया जाता।

पेयजल की भी समस्या गंभीर


गरीब आदिवासियों की इस बस्ती में पेयजल की समस्या भी गंभीर है। स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध न होने के कारण मजरा के आदिवासी कुंये का दूषित और गन्दा पानी पीते हैं। मालुम हो कि कुछ ही दिनों पूर्व इस मजरे में उल्टी-दस्त का प्रकोप भी हो चुका है जो कुंये का दूषित पानी पीने के कारण हुआ था। बीमारी फैलने पर पीडि़तों का उपचार हुआ तथा कुंआ के पानी का भी ट्रीटमेन्ट कराया गया लेकिन अब हालात फिर जस के तस हैं।
00000

Thursday, September 20, 2018

औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों का पन्ना में अकूत भण्डार

  • हर्बल उद्योगों से रोजगार के नये अवसरों का हो सकता है सृजन
  • ऑवला उत्पादन के मामले में पन्ना जिला प्रदेश में अग्रणी



।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले को प्रकृति ने अनगिनत सौगातों से नवाजा है। यहां की रत्नगर्भा धरती में बेशकीमती रत्न हीरा ही नही अपितु दुर्लभ जड़ी बूटियों का भी अकूत भण्डार है। लेकिन प्रकृति प्रदत्त इन सौगातों का इस क्षेत्र के विकास व रोजगार के नये अवसरों को सृजित करने की दिशा में सार्थक उपयोग नहीं किया जा सका। जबकि पन्ना जिले में औषधि एवं हïर्बल उद्योगों के विकास की विपुल संभावनायें मौजूद हैं। यहां के समृद्ध वनों में औषधीय गुणों से सम्पन्न वनस्पतियों व वन औषधियों का भण्डार हैं। ऑवला उत्पादन के मामले में तो पन्ना जिला प्रदेश में अग्रणी है। यदि यहां पर वनौषधि उद्योग को बढ़ावा मिले तो इस पिछड़े जिले की भी तस्वीर बदल सकती है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के 50 फीसदी से भी अधिक क्षेत्र में आज भी जंगल है।उत्तर वन मण्डल में सारंगधर की पहाडिय़ों से लेकर कालींजर तक तथा पन्ना शहर के निकट स्थित मनोरम स्थल कउवा सेहा से लेकर देवगांव के पहाड़ों तक चारों तरफ वनौषधियों का अकूत भण्डार मौजूद है। जिले का दक्षिण कल्दा पठार जो पवई और शाहïनगर दो विकासखण्डों की सीमा को घेरता है, यहां के सघन वनों में प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। 

जानकारों का कहना है कि पठार में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों की तासीर हिïमालय में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों से मिलती जुलती हैं। वनौषधियों के मामले में यह वन क्षेत्र प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। बताया जाता है कि देश के 25 आयुर्वेदिक ऋषियों में 19 ऋषि इसी क्षेत्र में रहे हैं। प्राकृतिक ऑवले की उपलब्धता के मामले में तो इस जिले का कोई सानी नहीं है।

पन्ना जिले के ऑवले प्राकृतिक गुणों से भरपूर होते हैं, यही वजह है कि आयुर्वेद की फैक्ट्रियों में पन्ना के ऑवले की बहुत अधिक मांग रहïती है। यहां के ऑवले देश के विभिन्न हिस्सों व प्रान्तों में जाते हैं। जिले में प्राकृतिक रूप से ऑवले की प्रचुर उपलब्धता को देखते हुए डेढ़ दशक पूर्व प्रदेश के तत्कालीन वन मंत्री ने पन्ना को ऑवला जिला घोषित किया था। उस समय यहï योजना भी बनाई गई थी कि बिगड़े वनों की रिक्त पड़ी भूमि में ऑवला वृक्षों का रोपण किया जायेगा। अजयगढ़ की घाटी को ऑवला घाटी के रूप में विकसित किये जाने की भी बात कही गई थी। लेकिन सारी योजना धरी की धरी रह गई। ऑवला से बनने वाले उत्पादों के लिए यहां पर अभी तक कोई
बड़ा उद्योग स्थापित नहीं हो सका है। 

जंगलों की कटाई से उजड़ रही हैं वनौषधियां 

पन्ना के विकास तथा यहां के लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस व सार्थक प्रयास न होने से जिले के अधिसंख्य लोग उत्खनन और जंगल की अवैध कटाई में लिप्त हैं। तेजी के साथ यहां के जंगलों की अवैध कटाई होने के कारण प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी बूटियों का अद्भुत संसार भी उजड़ रही हैं। 
यदि प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली इन जड़ी-बूटियों के संरक्षण व संवर्धन हेतु प्रभावी पहल की जाये और वन क्षेत्रों के ग्रामों में इनकी वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जाये तो पन्ना जिला बहुमूल्य जड़ी-बूटियों का एक बहुत बड़ा स्त्रोत बन सकता है। ऐसा होने पर उद्योगविहीन इस जिले की बेरोजगारी की समस्या जहां दूर हो सकेगी, वहीं औषधि व हर्बल उद्योगों की स्थापना का भी मार्ग प्रशस्त होगा। 

इन जड़ी-बूटियों की है प्रचुर उपलब्धता 

ऑवले के अलावा पन्ना जिले के जंगलों व पहाड़ों में सफेद मूसली, तुलसी,अश्वगंधा, शतावर, नागरमोथा, अचार गुठली, शहद, महुआ गुठली, हर्र,बहेरा, काली मूसली, मुश्कदाना, लेमन ग्रास, कलिहारी, सर्पगंध, कांगनी,इमली, चिरौंटा, लटजीरा, जामुन, अर्जुन छाल, ब्राह्मी, बिहारीकंद,मुलहटी, गिलोय, गोखरू, शंखपुष्पी, पुनर्नवा, हर सिंगार, भटकटइया और ईसबगोल जैसी वनौषधियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं।

00000


दैनिक जागरण में छपी खबर

Monday, August 20, 2018

जर्जर हो चुकी धरोहरें बदल सकती हैं पन्ना जिले की तकदीर

  •   वास्तुशिल्प की दृष्टि से बेजोड़ है अजयगढ़ का किला
  •   अनगिनत खूबियां फिर भी नहीं  जीत पा रहा  पर्यटकों का मन
  •   सही  ढंग से सुनियोजित विकास हो तो किले बन सकते हैं आकर्षण का केन्द्र



पन्ना जिले के अजयगढ़ दुर्ग में स्थित रंगमहल का दृश्य। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। सदियों पुराने जर्जर और बदहाल हो  चुके किले पन्ना जिले की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकते  हैं। यदि इन प्राचीन धरोहरों का सही  ढंग से कायाकल्प कराकर सुनियोजित विकास किया जाए तो ये देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकते  हैं। इस जिले में भव्य और अनूठे मन्दिरों की पूरी श्रृंखला व प्राकृतिक मनोरम स्थलों की भरमार है , फिर भी पन्ना पर्यटन की दृष्टि से अपनी पहचान बना पाने में कामयाब नहीं हो सका है। पन्ना टाईगर रिजर्व की दम पर खजुराहो  में पर्यटन उद्योग खूब फल फूल रहा है और सब कुछ रहते हुए भी राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में पन्ना आज भी उपेक्षित और दीनहीन बना हुआ है।
किसी समय चन्देल राजाओं के शक्ति का केन्द्र रहा पन्ना जिले का ऐतिहासिक अजयगढ़ दुर्ग स्वाधीनता के बाद प्रशासनिक उपेक्षा के चलते खण्डहर में तब्दील होता जा रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी की दूरी पर विन्ध्यांचल की दुर्गम पर्वत श्रेणियों पर स्थित यह अजेय दुर्ग अपने जेहन में भले ही  वीरता की अनेकों गौरव गाथायें सहेजे है , लेकिन इसके बावजूद यहां  भूले भटके भी पर्यटक दिखाई नहीं  देते। चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित इस दुर्ग की वास्तुकला के अवशेषों का अवलोकन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि खजुराहो और कालींजर के विश्व प्रसिद्ध शिल्प के शिल्पियों के हांथ में इतनी पैनी छैनियां नहीं  थीं, जितनी की अजयगढ़ दुर्ग के वास्तुकारों के पास थीं। वास्तव में अजयगढ़ का किला वास्तु शिल्प की दृष्टि से अधिक कलात्मक, अनूठा और बेजोड़ है।
उल्लेखनीय है कि खजुराहो  शिल्प में यक्ष-यक्षिणी की मैथुन मुद्राओं को पाषाण पर उकेर कर जहाँ जीवंत रूप प्रदान किया गया है, वहीँ अजयगढ़ की शिल्पकला सत्यं शिवम सुन्दरम् की गरिमा से युक्त है। राजाओं और महाराजाओं के उत्थान एवं पतन के इतिहास को अपने जेहन में समेटे अजयगढ़ दुर्ग का प्राकृतिक सौन्दर्य चिरस्थायी है । पर्वत शिखरों से फूटते झरने, नागिन सी बल खाती घाटियां, मनोरम गुफायें, गहरी खाईयां, विशाल सरोवर व श्याम गौर चïट्टानें दर्शकों का मन मोह लेती  हैं। इसके बावजूद इस अनूठे दुर्ग की लगातार घोर उपेक्षा हुई है , जिससे यह अभी तक पर्यटन के मानचित्र से ओझल बना हुआ है । गौरतलब है  कि चन्देल राजाओं द्वारा निर्मित इस भव्य दुर्ग के निर्माण में पत्थरों का तो प्रयोग किया गया है  किन्तु उनको जोडऩे में कहीं  भी मसाले का प्रयोग नहीं  हुआ । जानकारों का कहना है  कि इसके निर्माण में गुरूत्वाकर्षण के सिद्धातों के आधार पर कोणीय संतुलन विधि का प्रयोग किया गया है । प्राकृतिक झंझावातों, प्रकोपों, मानवीय युद्धों के विध्वंशक प्रहारों तथा अभिशापों को झेलने वाला यह दुर्ग अपनी भव्यता, अद्वितीयता और सुदृढ़ता का परिचय दे रहा है , जो निश्चित ही  खजुराहों  तथा अन्य ऐतिहासिक स्थलों से किसी भी दृष्टि से कम नहीं है।

धरमसागर तालाब स्थित किले व मकबरे को जीर्णोद्धार की दरकार


धरमसागर तालाब के किनारे स्थित प्राचीन मकबरा । फोटो - अरुण सिंह 

मन्दिरों के शहर पन्ना में प्राचीन धरमसागर तालाब के किनारे जीर्ण-शीर्ण हालत में मौजूद किले व यहां आसपास स्थित प्राचीन मकबरों  को भी जीर्णोद्धार की दरकार है । इन प्राचीन धरोहरों  का संरक्षण व समुचित देखरेख न हो  पाने के कारण पेड़-पौधों और वनस्पतियों के उगने से यह क्षतिग्रस्त हो  रही हैं। यहाँ स्थित किले के आगे वाले हिस्से को यादवेन्द्र क्लब के नाम से जाना जाता है  जिसका निर्माण तत्कालीन पन्ना नरेशों ने कराया था। यदि जर्जर हो  चुके किला सहित यादवेन्द्र क्लब का जीर्णोद्धार कराकर यहाँ  का सुनियोजित विकास कराया जाए तो धरमसागर तालाब का सौन्दर्य जहां  कई गुना बढ़ जाएगा वहीं  यह स्थल पर्यटकों के पसंदीदा स्थलों में शुमार हो  सकता है। इसी तरह पन्ना जिले के आदर्श ग्राम महोबा में भी प्राचीन दुर्ग है जो उपेक्षा के चलते जीर्ण-शीर्ण और जर्जर हो  चुका है। इस दुर्ग को लेकर भी अनेकों गाथायें प्रचलित  हैं, लेकिन इस प्राचीन धरोहर को भी संरक्षित करने की दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।

धरमसागर तालाब के किनारे स्थित प्राचीन किला। फोटो - अरुण सिंह 

अजयगढ़ दुर्ग का हो विकास : के.पी. सिंह

अजयगढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ एक कला तीर्थ भी है , जिसका संरक्षण किया जाकर सुनियोजित विकास कराया जाना चाहिए। इस दुर्ग के विकास व जीर्णोद्धार के कार्य में विशेष रुचि रखने वाले अजयगढ़ निवासी के.पी. सिंह का कहïना है  कि धरातल से लगभग 600 फिट की ऊँचाई पर पहाड़ के ऊपर स्थित इस दुर्ग में प्रवेश के लिए सात द्वार थे जो अधिकांश अब जर्जर व धराशायी हो  चुके हैं । मौजूदा समय यहां  प्रवेश के लिए सिर्फ दो द्वार बचे हैं । जिनमें एक मुख्य दरवाजा तथा दूसरा तरौनी दरवाजा कहलाता है । अभी इस दुर्ग तक पहुंचने के लिए सीढिय़ों से जाना पड़ता है, यदि कालींजर किले की तर्ज पर यहां  भी सड़क मार्ग का निर्माण हो  जाए तो आवागमन सुगम हो  जाएगा और लोग इस अनूठे दुर्ग को देखने आने लगेंगे।
000000

Sunday, August 12, 2018

पन्ना में पर्यटन से रोजगार के नये अवसरों का होगा सृजन

  • प्रकृति व्याख्यान केन्द्र मड़ला में आयोजित हुई सलाहकार समिति की बैठक
  • पर्यावरण व वन्य प्राणी संरक्षण तथा पर्यटन विकास पर हुई चर्चा



।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। कर्णावती व्याख्यान केन्द्र मड़ला में सागर संभाग के कमिश्नर मनोहर दुबे की अध्यक्षता में शुक्रवार को सलाहकार समिति की बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में पर्यावरण व वन्य प्राणी संरक्षण सहित पर्यटन विकास से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। पर्यटन व्यवसाय का लाभ पन्ना टाईगर रिजर्व से लगे ग्रामों के रहवासियों को भी मिले, इस संबंध में भी विस्तृत विचार विमर्श हुआ तथा सदस्यों द्वारा कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये गये।

बैठक के प्रारंभ में क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया ने समिति के सदस्यों को बैठक के एजेण्डे से अवगत कराया, तदुपरान्त बिन्दुवार एजेण्डे में शामिल सभी विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। सभी सदस्यों ने इस बात पर सहमति जताई कि पन्ना टाईगर रिजर्व विकास का वाहक बने, इस दिशा में सार्थक और प्रभावी पहल की जानी चाहिये। 
टाईगर रिजर्व से लगे ग्रामों के लोगों को पर्यटन व्यवसाय का अधिक से अधिक लाभ मिले, इस बात पर विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है, ताकि ग्रामवासी पर्यावरण व वन्य प्राणियों के संरक्षण में रूचि लेने के लिये प्रेरित हो सकें। बिना जन भागीदारी के संरक्षण संभव नहीं है, ऐसी स्थिति में टाईगर रिजर्व से जब ग्रामवासियों को रोजी-रोजगार व आर्थिक लाभ होगा तो वे स्मवेव संरक्षण के लिये आगे आयेंगे।
स्थानीय सलाहकार समिति के सदस्य श्यामेन्द्र सिंह बिन्नी राजा ने पर्यटन को बढ़ावा देकर रोजगार के नये अवसरों के सृजन बावत महत्वपूर्ण सुझाव दिये, जिन पर गहन विचार विमर्श हुआ। बैठक में यह सुझाव भी दिया गया कि पन्ना टाईगर रिजर्व से लगे वे गाँव जो अत्यधिक पिछड़े और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिये चिह्नित किया जाये तथा पर्यटन व्यवसाय से होने वाली आय का उपयोग इन ग्रामों के विकास में किया जाये। पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर एरिया से कितनी दूरी पर व्यवसायिक व अन्य गतिविधि होनी चाहिये, इस संबंध में भी चर्चा हुई और सहमति बनी कि न्यूनतम 250 मीटर दूरी होनी चाहिये।

सलाहकार समिति की बैठक में सदस्यों ने पन्ना टाईगर रिजर्व में पर्यटन को बढ़ावा देने तथा देशी व विदेशी पर्यटकों को पार्क भ्रमण हेतु आकृष्ट करने के लिये उपयोगी सुझाव दिये गये। जिस पर कमिश्नर श्री दुबे व क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व श्री भदौरिया ने सहमति जताई और कहा कि खजुराहो के प्रमुख स्थलों पर होॄडग लगवाई जायेंगी। समिति के अध्यक्ष एवं कमिश्नर सागर संभाग मनोहर दुबे ने कहा कि पन्ना के प्राचीन भव्य मन्दिरों का भी प्रभावी ढंग से प्रचार-प्रसार होना चाहिये, इससे पर्यटकों का आकर्षण बढ़ेगा। आपने कहा कि पन्ना के आस-पास स्थिति ऐतिहासिक व प्राकृतिक महत्व के स्थलों का भी योजनाबद्ध तरीके से विकास होना चाहिये। 

पर्यटक वाहनों की संख्या का हुआ निर्धारण 

बैठक में पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर जोन में भ्रमण के लिये पर्यटक वाहनों की संख्या के संबंध में विचार विमर्श के साथ संख्या का निर्धारण हुआ। मालुम हो कि पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र 543 वर्ग किमी है, जिसके 20 प्रतिशत भाग पर पर्यटन की अनुमति है। इसके लिय दो प्रवेश द्वार मड़ला व हिनौता संचालित है। 
गत वर्ष पन्ना टाईगर रिजर्व में पर्यटकों के भ्रमण हेतु प्रतिदिन 70 वाहन धारण क्षमता निर्धारित थी। लेकिन अब राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण नई दिल्ली की गाइड लाइन के अनुसार पर्यटन वर्ष 2018-19 हेतु कुल 85 वाहन निर्धारित किया गया है। जिसमें प्रवेश द्वार मड़ला से प्रात:कालीन सफारी हेतु 35 वाहन तथा सायंकालीन सफारी हेतु 25 वाहन तथा हिनौता प्रवेश द्वार से प्रात: 15 वाहन एवं सायं 10 हवानों के प्रवेश की अनुमति प्रदान की गई।
  
बफर क्षेत्र में भ्रमण हेतु खुलेगा अकोला गेट 


पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में पर्यटकों के भ्रमण हेतु पर्यटन वर्ष 2018-19 से अकोला प्रवेश द्वार का शुभारंभ किया जायेगा। सलाहकार समिति की बैठक में चर्चा उपरान्त इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की गई। इस नवीन प्रवेश द्वार से प्रतिदिन 15 पर्यटक वाहन भ्रमण हेतु प्रवेश कर सकेगे, जिसमें सुबह 10 वाहन तथा सायंकालीन सफारी के लिये 5 वाहन निर्धारित किये गये हैं। बैठक में कमिश्नर सागर मनोहर दुबे, क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया, कलेक्टर मनोज खत्री, उप संचालक वासु कनौजिया, सहायक संचालक पन्ना व मड़ला सहित सलाहकार समिति के सदस्यगण मौजूद रहे।

00000

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर 



दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी बनेगी पन्ना की वत्सला

  •  केरल के नीलांबुर फारेस्ट डिवीजन से मंगाया जायेगा जन्म का  रिकॉर्ड
  •  गिनीज बुक ऑफ  वर्ल्ड  रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने होगी पहल


पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन चुकी उम्रदराज हथिनी वत्सला। फोटो - अरुण सिंह 

अरुण सिंह,पन्ना।  म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व की धरोहर बन चुकी दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला का नाम गिनीज बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने के प्रयास शुरू हो गये हैं।हथिनी वत्सला के जन्म का पूरा  रिकॉर्ड केरल प्रान्त के नीलांबुर फारेस्ट डिवीजन से मगाया जायेगा। यह बात तीन दिवसीय दौरे पर पन्ना आये प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी शहवाज अहमद ने शनिवार को सायं चर्चा के दौरान कही। मालुम  हो कि केरल के नीलांबुर फारेस्ट डिवीजन में जन्मी व पली - बढ़ी यह हथिनी 1972 में वहाँ  से होशंगाबाद  के बोरी अभ्यारण्य में लाई गई थी। इसके बाद वहाँ से यह हथिनी वर्ष 1992 में पन्ना टाइगर रिजर्व पहुंची। तभी से यह यहाँ की शोभा बढ़ा रही है।
उल्लेखनीय है कि लगभग सौ वर्ष की उम्र पार कर चुकी हथिनी वत्सला का  उपयोग पन्ना टाइगर रिजर्व में पूरे डेढ़ दशक तक यहाँ आने वाले पर्यटकों को बाघों का दीदार कराने के लिये किया जाता रहा है। लेकिन अत्यधिक उम्रदराज होने के कारण इसे  आराम की जिंदगी गुजारने के लिये रिटायर कर दिया गया। रिटायरमेंट के बाद से हथिनी वत्सला की पूरी देखरेख की जा रही है। उम्र को देखते हुये वत्सला को जहाँ सुगमता से पचने वाला आहार दिया जाता है,वहीं नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण भी होता है। पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. एस.के. गुप्ता ने बताया कि टाइगर रिजर्व के ही एक नर हांथी ने वर्ष 2003 और 2008 में दो मर्तवे प्राण घातक हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। मदमस्त नर हांथी ने दांतों से प्रहार कर वत्सला का  पेट चीर दिया  था।लेकिन बेहतर उपचार और सेवा से इस बुजुर्ग हथिनी को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया गया। मौजूदा समय यह हथिनी देशी व विदेशी पर्यटकों  लिये जहाँ आकर्षण का केंद्र है,वहीं पन्ना टाइगर रिजर्व के लिये भी किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं है। पीसीसीएफ  श्री अहमद ने बताया कि वत्सला का जन्म रिकॉर्ड नीलांबुर से मंगाने के निर्देश उन्होंने दिये हैं। यदि जरूरत पड़ी तो पन्ना टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ संजीव गुप्ता को रिकॉर्ड लाने के लिये नीलांबुर भेजा जायेगा ताकि वत्सला की उम्र कितनी है,इसकी प्रामाणिक रूप से पुष्टि हो सके।वत्सला के शतायु होने का पन्ना में उत्सव मनाने के साथ ही गिनीज बुक ऑफ  वल्र्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने की भी पहल की जायेगी ताकि वत्सला को दुनिया की सबसे बुजुर्ग हथिनी का गौरव हासिल हो सके।

हांथी की 50 से 70 वर्ष होती है औसत उम्र

पन्ना टाईगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव गुप्ता  जो वत्सला की बीते 18 वर्षो से चिकित्सकीय देखरेख कर रहे हैं, उन्होंने बताया कि हांथी की औसत उम्र 50 से 70 वर्ष होती है। 70 वर्ष की उम्र तक हांथी के दांत गिर जाते हैं।आपके मुताबिक वर्ष 2000 में जब उन्होंने देखा था तो वत्सला के एक भी दांत नहीं थे। जबकि महावत का कहना था कि 1995 के बाद वत्सला दांतविहीन हो चुकी थी। दुनिया का सबसे अधिक उम्र का लिन वांग नाम का हांथी ताइवान के चिडिय़ाघर में था जिसकी 86 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो चुकी है। इस तरह से वत्सला जो 95 वर्ष से भी अधिक उम्र की है उसे सबसे उम्रदराज हथिनी कहा जा रहा है।
00000