Monday, July 15, 2019

फादर ऑफ़ दि पन्ना टाइगर रिज़र्व टी - 3 घायल

  •  बाघों से विहीन पन्ना टाईगर रिजर्व को इसी वनराज ने किया है आबाद
  • पेंच  टाईगर रिजर्व से 7 नवम्बर 2009 को लाया गया था पन्ना
  •            मौजूदा समय बाघ टी-3  आयु हो चुकी है 17 वर्ष 


पन्ना टाईगर रिजर्व का बुजुर्ग बाघ टी-3।  (फाइल फोटो)

अरुण सिंह,पन्ना। बाघ पुनर्स्थापना  योजना को चमत्कारिक सफलता दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाला पन्ना टाईगर रिजर्व का सबसे बुजुर्ग बाघ टी-3 आपसी जंग में घायल हो गया है। अत्यधिक उम्रदराज हो जाने के कारण यह बाघ कोर क्षेत्र के बाहर विगत कई महीनों से विचरण कर रहा था। पिछले कुछ समय से बाघ टी-3 बलैया सेहा के आस-पास वाले इलाके में अपना ठिकाना बनाये था, जहां पन्ना में ही जन्मे नर बाघ पी-213(31) से टी-3 का आमना-सामना हो गया। इलाके को लेकर इन दोनों के बीच हुई लड़ाई में युवा बाघ पी-213(31) ने टी-3 को बुरी तरह जख्मी कर दिया है। टी-3 के पैर में जख्म हैं, घायल होने पर यह बाघ बलैया सेहा वाला इलाका छोड़कर रमपुरा के जंगल में पहुँच गया है।
क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया ने घटना की पुष्टि करते हुये बताया कि टी-3 के पैरों में जख्म है, फिर भी वह चल फिर रहा है। मालुम हो कि वर्ष 2009 में पन्ना टाईगर रिजर्व बाघ विहीन हो गया था, उस समय बाघ पुनर्स्थापना योजना के तहत पेंच टाईगर रिजर्व से 7 नवम्बर 2009 को इसे पन्ना लाया गया था। उस समय बाघ टी-3 की उम्र तकरीबन 7 वर्ष की थी। बीते 10 वर्षों में इस बाघ ने पन्ना में एक नया इतिहास रचते हुये बाघ विहीन पन्ना टाईगर रिजर्व को आबाद कर यहां पर बाघों की नई दुनिया बसा दी। मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व में जितने भी बाघ हैं वे सब टी-3 की ही संतान हैं। यही वजह है कि इस बुजुर्ग बाघ को फादर ऑफ दि पन्ना टाईगर रिजर्व भी कहा जाता है।

जंगल में बाघ की औसत उम्र होती है 12 से 14 वर्ष

खुले जंगल में आमतौर पर बाघ की औसत उम्र अधिकतम 12 से 14 वर्ष होती है, जिसे पन्ना क यह बाघ 3 वर्ष पूर्व ही पूरी कर चुका है। खुले जंगल में चुनौतियों के बीच स्वच्छन्द रूप से विचरण करते हुये इतने उम्रदराज बाघ को देखना किसी अजूबा से कम नहीं है। वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता ने बाघ टी-3 के संबंध में जानकारी देते हुये बताया कि इसके दांत गिर गये हैं तथा यह अब कोर क्षेत्र से बाहर पेरीफेरी में रह रहा है। अधिक उम्र हो जाने की वजह से टी-3 वन्यजीवों का शिकार कर पाने में अब सक्षम नहीं है, यही वजह है कि वह कोर क्षेत्र से बाहर पेरीफेरी में रहकर मवेशियों का शिकार करके जीवित है।

लड़ाई में जख्मी हुये बाघ की हो रही है निगरानी

आपसी लड़ाई में घायल हो चुके बुजुर्ग बाघ टी-3 की हर गतिविधि पर वन अमले द्वारा नजदीक से नजर रखी जा रही है। क्षेत्र संचालक श्री भदौरिया ने बताया कि पैरों में जख्म हैं, फिर भी यह चल फिर रहा है। बाघ के जख्म जल्दी भर सकें, इसके जो भी संभव उपाय हैं, वह पार्क प्रबंधन द्वारा किया जा रहा है। चूंकि टी-3 की उम्र बहुत अधिक हो चुकी है, इसलिये उसे टन्क्यूलाइज कर मलहम पट्टी नहीं की जा सकती। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से ही जख्म ठीक होने का इंतजार किया जा रहा है। इस बीच फिर किसी बाघ से टी-3 की भिड़ण्त न होने पाये, इसके लिये निगरानी टीम हर समय इस पर नजर रखेगी।
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Saturday, July 13, 2019

पन्ना में बाघों का ही नहीं दुर्लभ चौसिंगा का भी बढ़ रहा कुनबा

  •   पन्ना टाईगर रिजर्व के जंगल में इस शाकाहारी वन्य जीव की अच्छी तादाद
  •   विलुप्त होने की कगार में पहुँचा यह वन्य प्राणी पन्ना के जंगलों में सुरक्षित




। अरुण सिंह 

पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में सिर्फ बाघों का ही कुनबा नहीं बढ़ा अपितु यहां के सुरक्षित वन क्षेत्र में शर्मीले स्वभाव वाले नाजुक व खूबसूरत वन्य प्राणी चौसिंगा  की भी अच्छी खासी तादाद है। मालुम हो कि चौसिंगा प्रजाति का हिरण भारत के अलावा दुनिया के अन्य किसी भी देश में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता है। सिर्फ नेपाल में बहुत ही कम संख्या में छिटपुट रूप से चौसिंगा मिलता है। तेजी के साथ विलुप्त हो रहे इस प्रजाति की सबसे अच्छी संख्या म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व के जंगल में है। आश्चर्य की बात यह है कि इस लुप्त प्राय प्रजाति के बारे में बहुत ही कम लोगों को यह पता है कि एक नाजुक और खूबसूरत वन्य प्राणी लुप्त होने की कगार पर है।

उल्लेखनीय है कि लुप्त हो रहे चौसिंगा के आचार-व्यवहार, आदतों व संख्या के संबंध में पहली बार यहां कौस्तुभ शर्मा ने गहन अध्ययन व शोध किया था, तब इस अनूठे वन्य जीवन के बारे में लोगों को जानकारी हुई। शोधार्थी कौस्तुभ शर्मा के मुताबिक चौसिंगा का महत्व टाईगर से कम नहीं है। चूँकि यह प्रजाति अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती, इसलिये वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के अन्तर्गत बाघ व चौसिंगा को एक ही श्रेणी में रखा गया है। 

यह खुशी और गौरव की बात है कि दुनिया से लुप्त हो चुके वन्य प्राणी की यह दुर्लभ प्रजाति पन्ना टाईगर रिजर्व के जंगल में अभी भी अच्छी खासी संख्या में है। गौरतलब है कि वर्ष 2009 में पन्ना का जंगल बाघ विहीन हो गया था, फलस्वरूप यहां उजड़ चुके बाघों के संसार को फिर से आबाद करने के लिये बाघ पुनर्स्थापना  योजना शुरू की गई थी, जिसे चमत्कारिक सफलता मिली। 

मौजूदा समय पन्ना का जंगल बाघों से आबाद हो चुका है और यहां पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र सहित बफर व आस-पास के जंगल में लगभग 55 बाघ स्वच्छन्द रूप से विचरण कर रहे हैं। प्रकृति व वन्य जीव प्रेमियों का यह मानना है कि चौसिंगा की उपलब्धता के कारण आने वाले समय में पन्ना टाईगर रिजर्व की ख्याति पूरी दुनिया में फैलेगी और पर्यावरण प्रेमियों व पर्यटकों का आकर्षण इस पार्क की ओर बढ़ेगा। 

कौस्तुभ शर्मा की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में (543 वर्ग किमी.) उस समय 600 से भी अधिक चौसिंगा पाये गये थे। मौजूदा समय इनकी संख्या कितनी है, इस संबंध में अधिकृत रूप से गणना के कोई आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन वन अधिकारियों के बताये अनुसार चौसिंगा की संख्या में इजाफा हुआ है।

जानकारी के मुताबिक यह सबसे प्राचीन प्रजातियों में से एक है, ऐसा कहा जाता है कि नीलगाय व चौसिंगा दोनों ही प्राचीन प्रजाति के वन्य प्राणी हैं। पन्ना टाईगर रिजर्व में नीलगाय, चिंकारा  व चौसिंगा का एक ही जगह पर प्रचुर संख्या में पाया जाना आश्चर्यजनक और दुर्लभ घटना है। कोमल व नाजुक सा दिखने वाला यह वन्य प्राणी इतना अहिंसक  होता है कि अभी तक इन्हें लड़ते हुये नहीं देखा गया। प्राय: मनुष्य की आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रहने वाला यह वन्य प्राणी खुले शुष्क पतझड़ी वनों के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाके अधिक पसंद करता है। 

पौधों की कोमल पत्तियां, आँवला तथा महुआ का फूल इसका पसंदीदा भोजन है। हिंसक  पशुओं से बचने का मुख्य हथियार इनका छिपने की कला में पारंगत होना है। लम्बी दूरी का धावक न होने के कारण चौसिंगा अपना बचाव छिपकर करता है। यह 30 से 40 मीटर की दूरी तक ही आमतौर पर दौड़ता है और फिर रुककर छिप जाता है। इस तरह से हिंसक  जानवरों को चकमा देकर चौसिंगा अपने प्राणों की रक्षा करता है।

नर चौसिंगा में होते हैं चार सींग


इस अनूठे वन्य जीव की एक विशेषता यह भी है कि यह एकाकी प्राणी है और यदा कदा ही दो-चार के समूह में दिखता है। यह अपने इलाके में ही रहना पसंद करता है तथा ज्यादा विचरण नहीं करता। प्रजनन काल (मई से जुलाई) के दौरान नर चौसिंगा अन्य नरों के प्रति आक्रामक भी हो जाता है। 

यहां यह जानना जरूरी है कि सिर्फ नर चौसिंगा में ही सींग होता है। जिस चौसिंगा के आगे के सींग बड़े होते हैं, उसमें प्रजनन की क्षमता अधिक होती है। नर चौसिंगा में 15 माह के बाद ही सींग बढऩा शुरू होता है तथा मादा चौसिंगा आमतौर पर दो शावकों को जन्म देती है। बच्चे जब तक बड़े नहीं हो जाते तब तक सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें पृथक-पृथक कुछ दूरी पर रखकर पालती है। चौसिंगा के बच्चे अपनी माँ के साथ लगभग एक साल तक रहते हैं।

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Thursday, July 11, 2019

पन्ना की रूंज व मझगांय सिंचाई परियोजनायें पवई स्थानांतरित

  •   दो मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का कार्य छिनने से पन्ना संभाग में खलबली
  •   धीमी प्रगति को देखते हुये प्रमुख अभियन्ता ने जारी किया आदेश
  •   निर्णय से कार्यपालन यंत्री जे.के. ठाकुर की कार्यक्षमता को लेकर उठे सवाल  


कार्यालय कार्यपालन यंत्री जल संसाधन संभाग पन्ना।

अरुण सिंह,पन्ना। जल संसाधन संभाग पन्ना के अन्तर्गत निर्माणाधीन जिले की दो बड़ी मध्यम सिंचाई परियोजनायें रूंज  व मझगांय का कार्य अब जल संसाधन संभाग पवई के कार्यपालन यंत्री बी.एल. दादौरिया की देखरेख में होगा। दोनों ही बड़ी परियोजनाओं को जल संसाधन संभाग पन्ना से जल संसाधन संभाग पवई स्थानांतरित कर दिया गया है। इस आशय के आदेश प्रमुख अभियन्ता जल संसाधन विभाग भोपाल मदन सिंह  डाबर ने 10 जुलाई 2019 को जारी किये हैं। जारी किये गये इस आदेश में लेख किया गया है कि कार्यपालन यंत्री जल संसाधन संभाग पन्ना के अधीन वर्तमान में रूंज व मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना का सम्पादन किया जा रहा है। उक्त परियोजनाओं को त्वरित गति प्रदान करने की दृष्टि से प्रशासकीय हित में अस्थाई रूप से आगामी आदेश तक पुनर्विनियोजन फलस्वरूप कार्यपालन यंत्री जल संसाधन संभाग पवई जिला पन्ना में स्थानांतरित किया जाता है। प्रमुख अभियन्ता के इस अप्रत्याशित आदेश से जल संसाधन संभाग पन्ना में जहां खलबली मची हुई है, वहीं कार्यपालन यंत्री जे.के. ठाकुर की योग्यता और कार्यक्षमता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
उल्लेखनीय है कि जिला मुख्यालय पन्ना के निकट रूंज नदी के प्रवाह क्षेत्र में 269.79 करोड़ रू. की लागत वाली रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना का कार्य विवादों के चलते अधर में लटका हुआ है। भू-अर्जन का कार्य भी पूरा नहीं हो पाया है तथा मुआवजा राशि को लेकर भी डूब क्षेत्र में आने वाले प्रभावित किसानों में असंतोष है। इन्हीं कारणों के चलते इस महत्वाकांक्षी सिंचाई परियोजना का कार्य लटका हुआ है। कमोवेश यही स्थिति 35899.00 लाख रू. की लागत वाली मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना की भी है। अजयगढ़ विकासखण्ड के ग्राम कुँवरपुर के पास निर्माणाधीन इस परियोजना के पूर्ण होने पर 12 हजार 600 हेक्टेयर कृषि भूमि की जहां सिंचाई होगी, वहीं इस इलाके के 118 ग्रामों के 1 लाख 68 हजार 441 लोगों की बड़ी आबादी को ग्रामीण समूत जल प्रदाय योजना के तहत शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जायेगा। अब तक इस परियोजना में 21 हजार 898.83 लाख रू. व्यय किये जा चुके हैं। लेकिन परियोजना का कार्य जिस गति से चलना चाहिये, वह नहीं चल रहा जिसे दृष्टिगत रखते हुये रूंज के साथ-साथ मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना को भी पन्ना संभाग से स्थानांतरित कर जल संसाधन संभाग पवई के हवाले कर दिया गया है।

निर्माणाधीन रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना का कार्य स्थल 

इन दो बड़ी परियोजनाओं के निकल जाने से अब जल संसाधन संभाग पन्ना में कोई भी बड़ा कार्य नहीं बचा है। इस संभाग के अन्तर्गत पूर्व में जितने भी कार्य हुये हैं उनमें से अधिकांश विवादों में घिरे रहे हैं। विगत 5 वर्ष पूर्व फूटा भितरी मुटमुरू बांध आज भी जस की तस अधूरा पड़ा हुआ है। इसके अलावा छोटे-छोटे जिन बांधों का निर्माण कार्य पूरा किया जा चुका है, उनसे रूपांकित ङ्क्षसचाई क्षमता के अनुरूप सिंचाई भी नहीं हो रही। सूत्रों के मुताबिक जल संसाधन संभाग पन्ना में अनुभवहीन, निष्क्रिय और अक्षम अधिकारी व कर्मचारी भरे हैं, जिसका असर सिंचाई परियोजनाओं की कार्य प्रगति पर पड़ रहा है। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुये संभवत: प्रमुख अभियन्ता जल संसाधन भोपाल द्वारा यह महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला परिवर्तन किया है। अब जल संसाधन संभाग पन्ना के अन्तर्गत सिर्फ छोटी परियोजनाओं की देखरेख और मेंटेनेन्स का ही कार्य रह गया है।
जानकारों के मुताबिक जल संसाधन संभाग पवई के कार्यपालन यंत्री बी.एल. दादौरिया बहुत ही अनुभवी और सुलझे हुये इंजीनियर हैं। अपनी कार्यक्षमता और काबिलियत के चलते भोपाल तक इनकी अच्छी इमेज है। इतना ही नहीं पवई मध्यम सिंचाई परियोजना का कार्य जिस तरह से इनकी देखरेख में पूर्णता की ओर अग्रसर है, वह भी एक बड़ी वजह है कि रूंज व मझगांय सिंचाई परियोजनाओं की जवाबदारी भी इन्हें सौंपी गई है ताकि इनका कार्य भी तेज गति से चल सके। जल संसाधन विभाग से जुड़े ठेकेदारों का भी यह कहना है कि दादौरिया जी की देखरेख में रूंज व मझगांय का कार्य बेहतर ढंग से हो सकेगा, इन्होंने प्रमुख अभियन्ता के निर्णय को विभाग व जिले के हित में बताया है।
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Wednesday, July 10, 2019

झमाझम हो रही बारिश से उफनाने लगे नदी और नाले

  •   जंगली नदी व नालों में नहीं  हैं  सुरक्षा के इंतजाम
  •   तेज बारिश होने पर हो जाते हैं  बेहद खतरनाक
  •   जान जोखिम में डालकर लोग नालों को करते हैं पार




अरुण सिंह,पन्ना। पिछले दो दिनों से रुक-रुककर हो रही झमाझम बारिश के चलते नदियां और नाले उफनाने लगे हैं। बारिश के मौसम में जंगल और पहाड़ों से होकर गुजरने वाले नाले व छोटी नदियां बेहद खतरनाक हो जाती हैं।     इसके बावजूद इन नदी व नालों में सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं  हैं । ऐसी स्थिति में तेज बारिश होने पर जब पहाड़ी नाले उफनाते हुये बहते हैं  उस समय भी लोग अपनी जान जोखिम में डालते हुये नाला पार करते हैं । इतना ही  नहीं  इन बरसाती नालों का पानी उतरने का इंतजार करने के बजाय यात्रियों से भरे वाहन भी निकलते हैं , जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है ।
उल्लेखनीय है  कि पन्ना जिले में ऐसे पहाड़ी नालों व छोटी नदियों की संख्या दर्जनों में है  जिनसे होकर सड़क मार्ग गुजरते हैं । इन नदी व नालों में सुरक्षित पुलों की जगह रपटा बने हैं  जो सूखे मौसम में आवागमन के लिये उपयोगी हैं  लेकिन तेज बारिश होने की स्थिति में नालों का पानी रपटे के ऊपर से बहने लगता है । इन पहाड़ी नालों के पानी का प्रवाह इतना तेज रहता है  कि जरा सी लापरवाही  व असावधानी होने पर बड़े वाहन भी इस प्रवाह की चपेट में आ सकते हैं । फिर भी तेज प्रवाह वाले  रपटों के ऊपर से बारिश के दौरान भी आवागमन जारी रहता है , जो किसी भी दृष्टि से सुरक्षित नहीं  कहा  जा सकता।

निर्माणाधीन पुल का डायवर्सन मार्ग बहा, कई ग्रामों का टूटा संपर्क





जिले के बडग़ड़ी-सिरस्वाहा मार्ग पर निर्माणाधीन पुल का अस्थाई डायवर्सन बीती रात हुई तेज बारिश में बह गया। जिससे उक्त मार्ग पर आवागमन ठप्प हो गया। करीब एक दर्जन गाँवों का आपस में सड़क संपर्क टूट गया है। आठ माह से निर्माणाधीन पुल के डायवर्सन में लगाये गये सीमेण्ट के पाईप नदी के पानी का तेज बहाव नहीं सह सके और बारिश के पानी के साथ बह गये। आवागमन बाधित होने से करीब एक दर्जन गाँव के लोगों के सामने समस्या उत्पन्न हो गई है। आवागमन बाधित होने से स्कूल और कॉलिज जाने वाले बच्चे नहीं जा पा रहे हैं। बीमारी की हालत में वाहनों का आवागमन भी उक्त मार्ग पर संभव नहीं हो पा रहा। जानकारी के अनुसार बडग़ड़ी-सिरस्वाहा मार्ग पर छोटी नदी में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनाये जा रहे मार्ग में एक पुल का निर्माण कराया जा रहा है। निर्माण कार्य की कछुआ चाल के कारण कार्य पूरा नहीं हो पाया और ग्रामीणों के लिये मुसीबत बन गया है। बताया गया है कि तेज बारिश के चलते नदी में पानी ज्यादा आ गया और बहाव तेज होने से मिट्टी कटने से डायवर्सन में लगे तीनों पाईप बह गये। जिससे डायवर्सन मार्ग का कटाव ज्यादा हो गया और मार्ग अवरूद्ध हो गया। इससे पानी रूकने और बहाव कम होने तक इसे दोबारा बना पाना संभव नहीं हैं। इसके अलावा पानी के बहाव के चलते मिट्टी का कटाव बढ़ता जा रहा है और बीस फिट से भी अधिक की खाई बन गई है। डायवर्सन मार्ग से आवागमन करने वाले करीब एक दर्जन गाँवों का सड़क मार्ग से सम्पर्क टूट गया है। इन गाँवों के लोगों को अब करीब 40 किमी का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में भी यदि बारिश का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो लोगों की मुसीबत और भी बढ़ सकती है।

कीचड़ युक्त मार्ग से स्कूल जाने को मजबूर हैं छात्रायें




 बारिश के इस मौसम में आवागमन हेतु मार्ग का निर्माण न होने से छात्र-छात्राओं को कीचड़ से होकर स्कूल जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। पन्ना जनपद की ग्राम पंचायत गढ़ीपड़रिया के वार्ड 20 के रहवासियों ने पंचायत स्तर पर आयोजित होने वाली जनसुनवाई में कलेक्टर पन्ना के नाम मार्ग बनवाने हेतु आवेदन दिया। जानकारी के अनुसार गढ़ीपड़रिया से ककरहटी को जोडऩे के लिये लगभग 7 वर्ष पहले 5 किमी की प्रधानमंत्री सड़क स्वीकृत थी जिसे 3 कि मी ककरहटी से रानीपुरा तक ही बनाया गया, शेष 2 किमी कच्चा ढर्रा होने से बरसात के समय आवागमन अवरुद्ध हो जाता है। इस हेतु कलेक्टर के नाम आवेदन दिया गया। बताया जाता है कि इस मार्ग से ग्रामीणों सहित स्कूल में पढऩे वाले छात्र-छात्राओं को प्रतिदिन निकलना पड़ता है लेकिन कीचडय़ुक्त रोड होने के कारण इन्हें आने-जाने में काफी  दिक्कत होती है। कीचडय़ुक्त मार्ग  से निकलते समय अगर कोई वाहन तेज गति से निकल जाता है तो स्कूल जाने वाले छात्र-छात्राओं की यूनिफार्म खराब हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोगों की मांग है कि शीघ्र ही मार्ग की मरम्मत कर पक्का सड़क मार्ग बनाया जाये।
ग्राम पंचायत गढ़ीपड़रिया के वार्ड 20 बगीचा मोहल्ला के रहवासियों ने अपनी व्यथा सुनाते हुये बताया कि हमारे मोहल्ले से गाँव के लिये जो मार्ग है वह बारिश के दिनों में कीचड़ से सराबोर हो जाता है जिससे आवागमन करना बहुत मुश्किल हो जाता है। ग्रामवासियों द्वारा जानकारी देते हुये बताया गया कि इस गंभीर समस्या को लेकर सरपंच सचिव से अनेकों बार कहा गया लेकिन इस समस्या को लेकर किसी भी जवाबदेह ने सुध नहीं ली। इस संबंध में जनसुनवाई में कलेक्टर पन्ना के नाम आवेदन देकर गुजारिश की गई है कि ग्राम पंचायत को आदेशित कर मार्ग दुरुस्त कराने की तत्कालिक व्यवस्था की जाये ताकि बच्चों को स्कूल जाने तथा बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाने में असुविधा न हो।
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चांदा घाटी में सड़क पर चहल कदमी करते दिखा तेंदुआ



पन्ना। म.प्र. के पन्ना जिले में मुख्य सड़क मार्गों पर अभी तक लोगों को चहल कदमी करते हुये वनराज के ही दर्शन होते रहे हैं लेकिन अब जंगल का राजकुमार कहा जाने वाला तेंदुआ भी सड़क मार्ग पर दिखने लगा है। पवई के निकट चांदा घाटी में सिल्वर फॉल के निकट आज सड़क को पार करते हुये राहगीरों को जब तेंदुआ नजर आया तो लोग ठिठक गये। जंगल का यह राजकुमार कुछ मिनिट तक मुख्य सड़क मार्ग पर चहल-कदमी करता नजर आया तब तक सड़क मार्ग के दोनों तरफ यातायात थम गया। मिली जानकारी के अनुसार नागपुर से खजुराहो की ओर जा रही यात्री बस में सवार यात्रियों ने इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद किया और वीडियो भी बनाया। चांदा घाटी में तेंदुये की मौजूदगी होने की खबर मिलने पर वन विभाग की टीम तुरन्त मौके पर पहुँच गई लेकिन तब तक तेंदुआ सड़क पारकर पास के ही घने जंगल में चला गया। मालुम हो कि चांदा घाटी स्थित सिल्वर फॉल बारिश के मौसम में लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। यहां के मंत्रमुग्ध कर देने वाले जल प्रपात को देखने के लिये प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुँचते हैं। इसके अलावा इस जल प्रपात के निकट ही बाबा झूलनशाह की मजार भी है जहां श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस घाटी में तेंदुये की मौजूदगी व मुख्य सड़क मार्ग पर चहल-कदमी करने की खबर मिलने पर अब लोग सिल्वर फॉल के अदभुत  नजारे का आनन्द उठाने के लिये यहां जाने से कतराने लगे हैं।
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Monday, July 8, 2019

पर्यावरण इस देश मे मुद्दा नहीं


@ विक्रम सिंह चौहान। मुम्बई अहमदाबाद बुलेट ट्रेन के लिए महाराष्ट्र के समुद्री इलाकों के 54 हज़ार मैंग्रोव के पेड़ काटे जाएंगे।यह बस शुरुआत है उस कथित विकास का जिसकी कीमत बस कुछ वर्षों बाद पूरा मुम्बई और महाराष्ट्र चुकाने वाला है।एक रिपोर्ट में तो स्वीकार भी किया गया है इससे नवी मुंबई में बाढ़ आ सकता है।मैंग्रोव समुद्र के तटीय इलाकों में खारे पानी में उगने वाले पेड़.पौधे होते हैं। मैंग्रोव धरती और समुद्र के बीच एक बफर की तरह काम करते हैं। मैंग्रोव की तकरीबन 80 प्रजातियां है। ये पौधे दलदल में उगने वाले होते हैं। जहां ऑक्सीजन की भारी कमी होती है। मैंग्रोव से बाढ़ का बचाव होता है। पर्यावरण के लिए समुद्र के किनारे मैंग्रोव बहुत जरूरी है। सरकार तर्क दे रही है जो प्रत्येक पेड़ काटे जाएंगे उसके एवज़ में हम 5 पौधे लगाएंगे।लेकिन यह झूठ हैएप्राकृतिक तौर पर उगे पौधों का विकल्प ही नहीं होता।वह पर्यावास ही नहीं मिलेगा।लेकिन हमारे देश में इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही है।इसके उलट ऑस्ट्रेलिया में कोल परियोजना के लिए अडानी का भारी विरोध हुआ।दुर्लभ वृक्षों और सरीसृपों को बचाने के लिए जनमत सर्वेक्षण तक किया गया।
भारत ग्लोबल वार्मिंग से सबसे ज्यादा प्रभावित है।वैश्विक स्तर पर इससे निपटने वैज्ञानिकों ने 1000 अरब पेड़ पूरे विश्व में लगाने की सलाह दी है।मतलब लगभग अमेरिका जितना क्षेत्रफल में अगर पौधे लगे तो आशिंक तौर पर जलवायु परिवर्तन से बचा जा सकता है।लेकिन हम इसका उल्टा कर रहे हैं।इस वर्ष भारत के कई शहर गर्मियों में अधिक तपे।इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज  के आंकड़ों के अनुसार भारत उन देशों में है जिनपर जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव पड़ने की आशा है मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑन टेक्नोलॉजी     ( MIT ) के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दुनिया कार्बन उत्सर्जन को सुझाए गए स्तर तक घटाने में सफल भी हो जाती है तो भी भारत के कुछ हिस्सों में गर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि यह इंसानों के इतनी गर्मी में जिंदा रहने की परीक्षा लेगीण्लेकिन इन रिपोर्ट्स से वर्तमान सरकार को कोई लेना देना नहीं हैएक्योंकि वे तो जंगलों को कटाई के लिए अडानी को देने का मास्टरप्लान बनाया हुआ है।मसलन छत्तीसगढ़ का सुदूर सरगुजा क्षेत्र जहाँ वनों की कटाई शुरू कर दी गई है।एमआईटी का ही एक और रिसर्च कहता है कि भारत के 25 शहर अगले 50 सालों में नष्ट हो जाएंगे।चेन्नई के लिए ये मियाद 20 वर्ष का ही है।
पर्यावरण किसी के लिए मायने नहीं रखता।न मेरे न आपके।अगर होता तो हम सड़क के लिए 100 साल पुराने बरगदएपीपल के कटने का विरोध करते।हमने विकास का मतलब पेड़ो का कटना समझ लिया है।हरियाली का मतलब अब हरी रंगीन पेंट हो गया है।डिवाइडर पर विदेशी पौधेए ज़हरीले कनेरएनकली अशोक के वृक्षएदमा अस्थमा को बढ़ाने वाला छातिम अब शहरों की शोभा बढ़ा रहा है।नीम पीपल बरगद हमारे दुश्मन थे ही अब इसमें मैंग्रोव भी जुड़ गया है।
(आशीष सागर आशीष की फेसबुक वाल से)

हल्की बारिश में कलेक्ट्रेट परिसर बन जाता है डबरा

  •   कीचड़ में तब्दील मार्ग पर वाहन चलाना मुश्किल
  •   फिसलनभरी मिट्टी में गिर चुके हैं कई बाइक चालक


पन्ना का नवीन कलेक्ट्रेट भवन तथा हल्की बारिश में ही मुख्य द्वार के सामने भरे पानी का नजारा। 
अरुण सिंह,पन्ना। हल्की बारिश होने पर जिला मुख्यालय पन्ना स्थित नवीन कलेक्ट्रेट भवन तक पहुँच पाना आसान नहीं रहता। जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने तथा कलेक्ट्रेट भवन के सामने वाले मैदान में जलभराव हो जाने के चलते पहुँच मार्ग फिसलनभरा और कीचड़ में तब्दील हो जाता है। ऐसी स्थिति में चार पहिया वाहन तो किसी तरह नवीन कलेक्टे्रट भवन तक पहुँच जाते हैं, लेकिन पैदल व दुपहिया वाहन से जाने वाले लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। परिसर में धरमसागर तालाब की चिकनी मिट्टी डलवाई गई थी, जो हल्की बारिश में ही चिपचिपी और फिसलनभरी हो जाती है। ऐसी स्थिति में दुपहिया वाहन से यहां जाने वाले लोग जरा सी असावधानी होने पर फिसलकर गिर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में शहर के मध्य स्थित राजाशाही जमाने की प्राचीन इमारत(पैलेस) महेन्द्र भवन में कलेक्ट्रेट संचालित होता रहा है। नवीन कलेक्ट्रेट भवन का निर्माण होने के उपरान्त प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान द्वारा जल्दबाजी में आनन-फानन इस नवीन भवन का उद्घाटन कर दिया गया था, जबकि इस भवन तक पहुँचने के लिये अभी डामरीकृत पक्के मार्ग का निर्माण नहीं हुआ। मुख्य सड़क मार्ग से नवीन कलेक्ट्रेट भवन तक पहुँचने के लिये लोगों को होमगार्ड मैदान को पारकर कलेक्ट्रेट परिसर में पहुँचना होता है जो हल्की बारिश में ही तलैया नजर आने लगता है। चार पहिया वाहन यहां तक पहुँच सकें, इसके लिये अभी हाल ही में गिट्टी व ककरू मार्ग में डलवाई गई है लेकिन जल निकासी की माकूल व्यवस्था अभी भी नहीं हो सकी, जिससे बारिश होने पर जलभराव की समस्या यथावत बनी हुई है।
लगभग 7 करोड़ से भी अधिक लागत से निर्मित  नवीन कलेक्ट्रेट में ज्यादातर शासकीय कार्यालय महेन्द्र भवन से यहां शिफ्ट हो गये हैं। लेकिन भवन के अनुरूप साज-सज्जा व फर्नीचरों की व्यवस्था नहीं हुई। अधिकांश कार्यालयों में पुराने फर्नीचर और अलमारियां उपयोग में लाई जा रही हैं। महेन्द्र भवन स्थित कार्यालयों से आम जनता अच्छी तरह वाकिफ थी कि कौन कार्यालय कहां संचालित होता है। लेकिन इस नवीन कलेक्ट्रेट भवन की विशालकाय बिल्डिंग में लोगों को कार्यालय ढूँढऩे के लिये भटकना पड़ता है। इस दो मंजिले कलेक्ट्रेट भवन में कौन कार्यालय किस ब्लाक में और कहां स्थित है, यह पता करने के लिये ग्रामीणों को भारी मशक्कत करनी पड़ती है। बिल्डिंग में लाइन से कार्यालयों के लिये कमरे आबंटित किये गये हैं, जहां अभी बोर्ड तक नहीं लगे। ऐसी स्थिति में आबंटित कमरा नम्बर से कार्यालयों को ढूँढऩा पड़ता है।

नवीन भवन की नहीं होती नियमित सफाई


नवीन कलेक्ट्रेट भवन में साफ-सफाई की माकूल व्यवस्था न होने से यह भव्य बिल्डिंग  अभी से ही बदरंग होने लगी है। सीढिय़ों व फर्श में जहां-तहां पान व गुटखे के दाग जहां नजर आने लगे हैं, वहीं गन्दगी और कचरा भी फैला रहता है। सबसे बुरी स्थिति दूसरी मंजिल में जाने वाली सीढिय़ों की है, जहां शायद कई दिनों तक झाड़ू भी नहीं लगती। बारिश के इस मौसम में शाम के समय पंखियों व कीड़ों के यहां ढेर लग जाते हैं। सुबह सफाई न होने से इन बरसाती कीड़ों के पंख हवा में जहां-तहां उड़ते और बिखरते रहते हैं। कलेक्टर कार्यालय सहित अन्य आला प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तर प्रथम तल पर ही नीचे हैं, यहां तो साफ-सफाई दिखती है, लेकिन दूसरे मंजिल में स्थित कार्यालयों की हालत बेहद दयनीय है। नवीन कलेक्ट्रेट भवन के सार्वजनिक टॉयलेट भी गन्दगी और अव्यवस्था की गिरफ्त में आ चुके हैं, इनकी नियमित साफ-सफाई न होने पर ये उपयोग के लायक भी नहीं बचेंगे। आला अधिकारियों को चाहिये कि नवीन कलेक्ट्रेट भवन में साफ-सफाई की माकूल व्यवस्था के लिये जरूरी पहल करें ताकि इस भव्य इमारत की उपयोगिता व आकर्षण बना रहे।
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Friday, July 5, 2019

पन्ना जिले में सुरक्षित प्रसव के दावे साबित हो रहे खोखले

  •   मातृ एवं शिशु मृत्यु का जिले में नहीं थम रहा सिलसिला
  •   प्रसव के दौरान जिला अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत


प्रसूता की मौत के बाद विलाप करते हुये पीएम के लिये जाते परिजन।  
 
अरुण सिंह,पन्ना। शिशु और मातृ मृत्युदर के मामले में वर्षों से प्रदेश व देश में अग्रणी रहा पन्ना जिला अब प्रसव के दौरान होने वाली मौतों के मामले में नया रिकार्ड बनाने की ओर अग्रसर प्रतीत होता है। स्वास्थ्य महकमे द्वारा किये जाने वाले सुरक्षित प्रसव के दावे खोखले साबित हो रहे हैं । क्योंकि जिले में मातृ एवं शिशु मृत्यु का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। विगत 4 जुलाई को जिला चिकित्सालय पन्ना में प्रसव के लिये भर्ती एक महिला एवं उसके गर्भस्थ शिशु की अचानक संदेहजनक परिस्थितियों में मौत होने की खबर जिस तरह से सामने आई है, उससे यहां की व्यवस्थायें एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं।
मामले के संबंध में मिली जानकारी के अनुसार बृजपुर निवासी प्रसूता रेनू लखेरा पति रूपेश लखेरा को प्रसव पीड़ा होने के चलते जिला चिकित्सालय में भर्ती किया गया था। जब उसे भर्ती किया गया था तब उसकी हालत सामान्य थी और सभी जाँच रिपोर्ट भी सामान्य आई थीं। जिसके चलते डॉक्टरों का कहना था कि डिलेवरी सामान्य होगी। लेकिन समय बीतने के साथ और दवाई देने के बाद भी देर रात तक सामान्य रूप से प्रसव न होने के कारण डॉक्टरों की टीम ने निर्णय लिया कि डिलेवरी ऑपरेशन के द्वारा होगी। तब रात लगभग 3 बजे ऑपरेशन की सम्पूर्ण तैयारी के साथ निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ. स्मृति गुप्ता ने जैसे ही प्रसूता को बेहोशी का इंजेक्शन लगाया तब उसकी हालत बिगडऩे लगी। तब पूरी टीम द्वारा प्रसूता की स्थिति को नियंत्रण में करने का प्रयास किया गया। बावजूद इसके हालत और भी गंभीर होती गई और अंतत: प्रसूता रेनू के साथ पेट में ही उसके बच्चे की मौत हो गई।

परिजनों ने किया हंगामा, लगाये आरोप

परिजनों को जैसे ही रेनू की मौत की खबर लगी वह सब सदमे में आ गये और अस्पताल में हंगामा करते हुये अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही के आरोप लगाते हुये कहा कि जब हमने रेनू को भर्ती किया था तो वह पूर्णत: स्वस्थ थी और सभी जाँच रिपोर्ट भी सामान्य थीं। डॉक्टरों द्वारा कहा गया था कि सामान्य डिलेवरी होगी फिर ऐसा क्या हो गया कि जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई। परिजनों ने इलाज के दौरान लापरवाही के आरोप लगाये हैं। परिजनों का कहना है कि दो साल पूर्व शादी हुई थी और अब हमारे घर में खुशियां आनी थीं जो अब गम में बदल गईं। परिजन सहित काफ ी संख्या में एकत्रित लोगों ने हंगामा करते हुये जाँच की माँग की तथा दोषियों के विरूद्ध सख्त से सख्त कार्यवाही की बात कही।

जेठ ने लगाये गुमराह करने के आरोप

रेनू लखेरा के जेठ रत्नेश लखेरा ने बताया कि मैं बहू को लेकर आया था जिस समय उसे भर्ती किया गया था उस समय वह बिल्कुल सामान्य थी। रात करीब 11 बजे हमें डॉक्टरों ने बताया कि ऑपरेशन से डिलेवरी होगी। जिस पर हमारे द्वारा हां कह दिया गया। डॉक्टरों द्वारा हमें दवाईयों का पर्चा थमा दिया गया जिस पर हम बाहर मेडिकल स्टोर से दवाईयां लेकर आये। जैसे ही हमने दवाई लाकर दीं तो डॉक्टर बोले कि ऑपरेशन में रक्त की आवश्यकता पड़ेगी उसकी व्यवस्था करें, तब हम ब्लड बैंक गये वहां बताया गया कि आपको जितना ब्डल चाहिये उसके बदले उतना ब्लड देना पड़ेगा। जिस पर मैं तैयार हो गया और वापस लौटकर डॉक्टरों के पास आया तब तक रात काफ ी हो चुकी थी। जैसे ही मैं ऑपरेशन थियेटर के पास पहुँचा तब डॉक्टरों ने हमसे बात ही नहीं की। लगभग दो घण्टे तक हम लोग परेशान रहे। रात 3 बजे मेरी बहू को ऑक्सीजन व बॉटल लगाकर बाहर परिजनों के पास लिटा दिया और मुझे दूर ले जाकर बताया गया कि हार्ट अटैक आ जाने से रेनू की मौत हो गई है अब कुछ नहीं हो सकता। घटना को लेकर जिला अस्पताल में हंगामा कर रहे परिजन व अन्य लोगों को मौके पर पहुँची पुलिस द्वारा जाँच कर कार्यवाही करने का आश्वासन दिया गया। साथ ही उन्हें समझाईश दी गई तब कहीं जाकर परिजन शांत हुये और शव को पीएम के लिये भेजा गया।

इनका कहना है...

0  प्रसूता बुधवार दोपहर को भर्ती की गई थी सामान्य प्रसव की संभावना थी दवाई के बाद भी बच्चेदानी का मुँह नहीं खुलने पर रात को ऑपरेशन की तैयारी की गई। पूरी टीम की उपस्थिति में जैसे ही बेहोशी का इंजेक्शन लगाने लगे उसी समय प्रसूता की हालत बिगडऩे लगी। डॉक्टरों द्वारा आधे घण्टे तक प्रयास किया गया लेकिन हालत बिगड़ती गई और उसकी मौत हो गई। शव का पीएम कराया गया है रिपोर्ट आने के बाद अगर कोई दोषी पाया जाता है तो उस पर कार्यवाही की जायेगी।
डॉ. एस.एस. त्रिपाठी, सिविल सर्जन जिला चिकित्सालय पन्ना

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर 




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जुड़वा बच्चों को जन्म देने के बाद प्रसूता की हुई मौत

 जिला चिकित्सालय पन्ना में ऑपरेशन थियेटर के बाहर विलाप करते परिजन।    
 
 जिला चिकित्सालय पन्ना में प्रसव के दौरान जच्चा बच्चा की मौत को अभी  चौबीस घण्टे भी  नहीं बीते थे कि चिकित्स्कीय  लापरवाही और व्यवस्थाओं  कमी के चलते एक और महिला  की मौत हो गई।  महिला  मौत का यह मामला  पवई सामुदायिक  स्वास्थ्य केन्द्र से सामने आया। जहां एक गर्भवती महिला सविता सोनी पति केदार नाथ सोनी निवासी पवई ने दो मासूम बच्चों को जन्म दिया। उसके बाद उसकी अचानक तबीयत बिगड़ गई। वहां के डॉक्टरों ने उसे तत्काल पन्ना जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया जहां आते ही उसकी मौत हो गई।

इनका कहना है...

 जब हम पवई स्वास्थ्य केन्द्र गये तो वहां के डॉक्टर ने सारी रिपोर्ट देखकर सविता को स्वस्थ बताया था और डिलेवरी करा दी। जिसके बाद ही महिला की तबीयत अचानक बिगडऩे लगी और मुझे लगता है कि उसकी मौत हो गई थी। लेकिन डॉक्टरों ने ऑक्सीजन लगाकर पन्ना के लिये रेफर कर दिया और यहां के डॉक्टर ने महिला को मृत घोषित कर दिया है।
  • केदार नाथ सोनी, मृतिका के पति, निवासी पवई 
 प्रसूता को खून की कमी थी दो दिन पहले ही मैंने पन्ना जिला चिकित्सालय जाने के लिये कहा था लेकिन वह नहीं गये और उन्होंने सलाह न मनाते हुये यहीं डिलेवरी कराई। महिला को अत्यधिक ब्लीडिंग होने से हालत गंभीर होती चली जा रही थी जिस कारण उसे जिला चिकित्सालय पन्ना के लिये रेफ र कर दिया गया था।
  • डॉ. एम.एल. चौधरी, बीएमओ उपस्वास्थ्य केन्द्र पवई 

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हल्की बारिश में ही जीवंत हो उठी किलकिला नदी

  •  कुछ ही दिन पूर्व तक नजर आ रही थी रूखी - सूखी और बेजान
  •  नदी किनारे खड़े अर्जुन के पेड़ जलधार के साथ करने लगे नृत्य


चौपड़ा मंदिर के निकट से प्रवाहित हो रही किलकिला नदी का दृश्य। फोटो -  अरुण सिंह

अरुण सिंह,पन्ना। चार दिन पूर्व तक रूखी - सूखी और बेजान सी दिखने वाली किलकिला नदी हल्की बारिश होने के साथ ही जीवंत हो उठी है। जिस नदी के प्रवाह क्षेत्र में सन्नाटा पसरा रहता था वहां अब उत्सवी माहौल है। नदी के प्रवाह क्षेत्र में खड़े विशालकाय अर्जुन के वृक्षों की उदासी भी अब दूर हो गई है और वे नदी की जलधार के साथ झूम - झूम कर नृत्य करने लगे हैं। पन्ना शहर के निकट से गुजरी यह छोटी सी नदी बड़ी देवी मंदिर के पास से गुजरती हुई चोपड़ा मंदिर से होते हुए लगभग ढाई - तीन किलोमीटर लंबा सफर तय कर कौवा सेहा की गहराई में समा जाती है। प्रणामी धर्मावलंबियों की धार्मिक आस्था से जुड़ी किलकिला नदी को प्रणामी संप्रदाय की गंगा कहा जाता है लेकिन सतत उपेक्षा और गंदगी के कारण धार्मिक महत्व वाली यह नदी बारिश के अलावा शेष महीनों में गंदा नाला बन जाती है। बताया जाता है कि प्रणामी धर्म के प्रणेता महामति प्राणनाथ जी जब अपने 5000 अनुयायियों के साथ किलकिला नदी के किनारे रुके थे उस समय भी इस नदी का पानी दूषित और विषाक्त था। लेकिन महामति के इस स्थल पर प्रवास करने का असर यह हुआ कि विषाक्त और दूषित किलकिला नदी का पानी स्वच्छ और निर्मल हो गया। महामति की अलौकिक देशना और उपदेश आज भी यहां की आबोहवा में महसूस की जा रही है, लेकिन उनके अशरीरी होने के बाद इस नदी के दुर्दिन फिर शुरू हो गए जो अभी तक नहीं सुधरे। नदी के निकट ही प्रणामी धर्मावलंबियों की आस्था का केंद्र चोपड़ा मंदिर है जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। महामति के अनुयायियों की संख्या हजारों से लाखों में पहुंच गई है लेकिन किलकिला नदी को अपने पुनरुद्धार के लिए एक बार फिर महामति प्राणनाथ जैसे किसी अलौकिक पुरुष का इंतजार है जो उसे स्वच्छ और निर्मल बना सके।
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दैनिक  जागरण में प्रकाशित खबर 


दूल्हा बने भगवान जगन्नाथ स्वामी, हजारों श्रद्धालु बने बाराती

  •   पन्ना में धूमधाम के साथ निकली भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा
  •   राजपरिवार के सदस्यों सहित जनप्रतिनिधि और अधिकारी रहे मौजूद
  •   जगन्नाथपुरी की तर्ज पर निकलती है पन्ना की ऐतिहासिक रथयात्रा


पन्ना के श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर के सामने खड़े रथ में सवार जगत के नाथ 

अरुण सिंह,पन्ना। मन्दिरों के शहर पन्ना में भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा परम्परानुसार बड़े ही धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ गुरूवार शाम 6 बजे बड़ा दिवाला मन्दिर से निकली। 166 वर्ष पुराने बुन्देलखण्ड अंचल के इस सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में हजारों धर्मप्रेमी बाराती बनकर शामिल हुये। दूल्हा बने भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन पाकर और इतनी बड़ी संख्या में धर्मप्रेमियों के जुटने से मन्दिरों की पवित्र नगरी पन्ना का कण-कण पुलकित हो उठा। धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार गुरूवार की शाम शहर के जगदीश स्वामी मन्दिर से जब भगवान बलभद्र, शक्तिस्वरूपा देवी सुभद्रा और दूल्हा बने भगवान जगन्नाथ स्वामी की प्रतिमाओं को मन्दिर के गर्भगृह से निकालकर उन्हें शाही रथों पर आसीन किया गया, तो वहां भगवान की एक झलक पाने उपस्थित श्रद्धालु धर्मप्रेमी भाव-विभोर हो उठे और पूरा प्रांगण भगवान जगन्नाथ स्वामी के जयघोषों से गुंजायमान हो उठा। भगवान की मनमोहक छवि की एक झलक पाने भक्तों में होड़ मच गई। मन्दिरों की नगरी पन्ना में डेढ़ सौ वर्ष से भी अधिक समय से आयोजित हो रहे ऐतिहासिक रथयात्रा महोत्सव की बात ही कुछ निराली है। तभी तो वर्षों से रथयात्रा महोत्सव में शामिल होकर धर्मलाभ उठाने यहां प्रतिवर्ष बुन्देलखण्ड अंचल के अन्य जिलों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। परम्परानुसार भगवान के बड़े भाई बलभद्र, बहन देवी सुभद्रा व भगवान जगन्नाथ स्वामी की प्रतिमाओं को पन्ना राज परिवार के सदस्यों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान के साथ रथारूढ़ कराया गया।

दर्शन के लिए मंदिर परिसर में उमड़े श्रद्धालुओं का द्रश्य। 

भगवान के रथों में सवार होने के साथ जैसे ही रथयात्रा शुरू हुई, उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं ने गगनभेदी जयकारों के साथ जगत के नाथ के दर्शन किये साथ ही रथयात्रा में शामिल भक्तों के बीच रथों को खींचने की होड़ मच गई। भगवान जगन्नाथ स्वामी जी का कीर्तन करते हुये भक्तों ने रथों को खींचकर धर्मलाभ उठाया। ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति पूरे श्रद्धाभाव के साथ कीर्तन करते हुये भगवान के रथों को खींचता है। वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। धर्माचार्यों का मानना है कि यह एक ऐसा अद्वितीय पर्व है जब भगवान जगन्नाथ चलकर जनता के बीच आते हैं, भगवान दसों अवतार का रूप धारण करते हैं और सभी भक्तों को दर्शन देकर समान रूप से तृप्त करते हैं। पन्ना नगर में ऐतिहासिक रथयात्रा महोत्सव का आयोजन जगन्नाथपुरी की तर्ज पर होता है। भगवान के रथों के आगे तुरही एवं शंख तथा घण्टों व घरियाल के सुमधुर स्वरों ने पूरे नगर को भक्ति के सागर में सराबोर कर दिया। इस अवसर पर पन्ना राजपरिवार के महाराज राघवेन्द्र सिंह, पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह, नपा अध्यक्ष मोहनलाल कुशवाहा, पूर्व विधायक श्रीकांत दुबे, बबलू पाठक, कलेक्टर कर्मवीर शर्मा, पुलिस अधीक्षक मयंक अवस्थी, सहित जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक, जिला प्रशासन व पुलिस के अधिकारी तथा हजारों की तादाद में दूर - दूर से आये श्रद्धालु उपस्थित रहे।
शहर में मार्ग से गुजरती रथयात्रा 

श्रद्धालुओं ने जगह-जगह उतारी आरती

जगदीश स्वामी जी मन्दिर से प्रथम पड़ाव लखूरन बाग के लिये ऐतिहासिक रथयात्रा के मार्ग में पडऩे वाले मन्दिरों में तथा जगह-जगह धर्मप्रेमी जनता द्वारा पूरे श्रद्धाभाव के साथ भगवान की आरती उतारी और अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिये जगत के नाथ से प्रार्थना की। जगन्नाथ स्वामी मंदिर जहाँ से  रथयात्रा शुरू हुई  वहां  लेकर प्रथम पड़ाव लखूरन बाग तक भगवान की एक झलक पाने श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही।   

रथयात्रा के दौरान सुरक्षा के रहे पुख्ता इंतजाम


जिला प्रशासन ने रथयात्रा के भव्य आयोजन को लेकर जहां सड़क, बिजली, पानी आदि की बेहतर व्यवस्था की वहीं पुलिस प्रशासन द्वारा आयोजन में बड़ी संख्या में भक्तों की भागीदारी को देखते हुये सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये। रथयात्रा में बड़ी संख्या में महिलाओं के शामिल होने पर पुलिस द्वारा महिला पुलिसकर्मियों की भी पर्याप्त संख्या में तैनाती की गई। रथयात्रा में बड़ी संख्या में पुलिस बल शामिल रहा और इसके अतिरिक्त रथयात्रा के मार्ग में पडऩे वाले प्रमुख चौराहों पर भी पुलिस और नगरसेना के जवान मुस्तैदी से तैनात रहे।
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