Saturday, May 15, 2021

पन्ना टाइगर रिजर्व में युवा बाघिन की संदिग्ध मौत

  •  बाघिन के आगे वाले बाएं पैर में थी सूजन, चल रहा था इलाज 
  •  6 वर्ष की इस युवा बाघिन के चार नन्हे शावक अब हुए अनाथ 

पन्ना टाइगर रिज़र्व की युवा बाघिन पी-213 (32) जिसकी मौत हुई।   

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बाघों के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व की युवा बाघिन पी-213 (32) की आज संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इस बाघिन के 6-8 माह के चार नन्हें शावक भी हैं, जो मां की असमय मौत होने से अनाथ हो गए हैं। बाघिन के आगे वाले बाएं पैर में सूजन थी, जिससे वह लंगड़ा कर चल रही थी। पता चलने पर इस बाघिन का इलाज भी किया जा रहा था। लेकिन आज सुबह यह बाघिन गहरीघाट परिक्षेत्र के कोनी बीट में मृत पाई गई। कोरोना संक्रमण के इस दौर में जब पर्यटकों के पार्क भ्रमण पर रोक लगी हुई है, ऐसे समय रेडियो कॉलर युक्त इस युवा बाघिन की असमय मौत से पन्ना टाइगर रिज़र्व में हड़कंप मच गया है।  

 क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि बाघिन के पैर में सूजन होने की जानकारी उन्हें 12 मई को मिली थी। जानकारी मिलने पर दूसरे ही दिन से उसका इलाज शुरू करा दिया गया था। आपने बताया कि 13 व 14 मई को उसे (एंटीबायोटिक दवा) 2 इंजेक्शन भी दिए गए। जिससे सूजन कम हुई तथा लंगड़ाना भी बंद कर दिया। लेकिन अप्रत्याशित रूप से अज्ञात कारणों के चलते आज उसकी मौत हो गई। आपने बताया कि बाघिन की मौत कैसे और किस बीमारी के कारण हुई इस संबंध में अभी कुछ भी बता पाना संभव नहीं है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह आशंका भी जाहिर की जा रही है कि कहीं यह बाघिन किसी विषाणु (वायरस) के संक्रमण का शिकार तो नहीं हुई ? जांच रिपोर्ट आने पर ही मौत के असल कारणों का पता चल सकेगा।

 श्री शर्मा ने बताया कि वन्य प्राणी चिकित्सक डॉक्टर संजीव कुमार गुप्ता द्वारा बाघिन के शव का पोस्टमार्टम किया गया है। जिसमें ऐसे कोई भी प्रमाण नहीं मिले जिन्हें मौत की वजह माना जा सके। बाघिन के शरीर में कहीं किसी भी प्रकार की चोट के निशान भी नहीं पाए गए। मौके का निरीक्षण करने पर वहां अवैध गतिविधि के कोई चिन्ह नहीं मिले। इन परिस्थितियों में यही संभावना जताई जा सकती है कि बाघिन की मौत या तो किसी बीमारी के कारण या फिर जहरीले सांप आदि के काटने से भी हो सकती है। क्षेत्र संचालक श्री शर्मा कहते हैं कि प्रथम द्रष्टया बाघिन की मौत का कारण प्राकृतिक प्रतीत होता है। वास्तविकता क्या है यह जांच रिपोर्ट से ही पता चलेगा।


जंगल में ही बाघिन का हुआ दाह संस्कार 

 बाघिन पी-213 (32) की असमय मौत से निश्चित ही पन्ना टाइगर रिजर्व को अपूरणीय क्षति हुई है। इस बाघिन ने अपने पहले लिटर में 4 शावकों को जन्म दिया था। दूसरे लिटर में भी इसने चार शावक जन्मे हैं, जो 6 से 8 माह के हैं और मां के साथ ही रहते थे। बाघिन की मौत होने पर अब इन नन्हे शावकों की जिंदगी असुरक्षित हो गई है। क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद बाघिन के शव का  नियमानुसार दाह संस्कार किया गया है। इस मौके पर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रतिनिधि सहित पन्ना टाइगर रिज़र्व के अधिकारी व कर्मचारी मौजूद रहे। 

जांच के लिए भेजा जाएगा सैंपल 

वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ संजीव कुमार गुप्ता ने बताया कि जांच के लिए सैंपल विशेष वाहक से भेजा जाएगा। ताकि जांच रिपोर्ट यथाशीघ्र मिल सके। आपने बताया कि सभी प्रकार की जांच कराई जाएगी, जिससे मौत के कारणों की असल वजह का खुलासा हो सके। जांच रिपोर्ट जल्दी मिले, इसके लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। क्योंकि यदि किसी बीमारी से मौत हुई होगी तो उसे दृष्टिगत रखते हुए जरूरी कदम उठाना होगा। आपने बताया कि इलाज के दौरान यह बाघिन सुस्त सी दिखती थी।

 अब शावकों की सुरक्षा बड़ी चुनौती

 असमय काल कवलित हो चुकी इस बाघिन के नन्हे चार शावकों की सुरक्षा तथा उनका पालन पोषण अब पार्क प्रबंधन के सामने बड़ी चुनौती है। क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा ने भी यह स्वीकार किया और कहा कि शावकों की सघन निगरानी शुरू कर दी गई है। शावकों की मॉनिटरिंग के लिए टीम के साथ हाथियों को भी लगाया गया है। कैमरों से भी इन शावकों पर नजर रखी जाएगी। इस संबंध में ऊपर से भी मार्गदर्शन लिया जा रहा है ताकि शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा सकें।

एक वर्ष पूर्व इसी बाघिन के शावक की हुई थी मौत 



बाघिन पी- 213 (32) के शावक का क्षत - विक्षत शव।  (फाइल फोटो) 

असमय काल कवलित हुई बाघिन पी- 213 (32) के शावक की एक वर्ष पूर्व संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी। शावक की उम्र उस समय लगभग 15 माह थी। वन कर्मियों को गश्ती के दौरान 3 मई 2020 रविवार को कोनी नाला में शावक का शव क्षत-विक्षत हालत में मिला था। मृत शावक का शव  तक़रीबन  7- 8 दिन पुराना प्रतीत हो रहा था। जवानी की दहलीज में पहुँच चुके इस बाघ की मौत कैसे व किन परिस्थितियों में हुई इसकी वजह व कारणों का खुलासा अभी तक नहीं हो सका है। कोनी नाला जहां शावक का शव सड़ी - गली हालत में मिला था, वह गहरीघाट वन परिक्षेत्र के बीट कोनी का ही इलाका है। पूर्व में भी इस इलाके में दो रेडियो कॉलर वाली बाघिनों की मौत हो चुकी है। फिर इसी इलाके में एक प्रजनन क्षमता वाली युवा बाघिन की मौत होने से तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं, जिनके जवाब मिलना जरुरी है।  

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Friday, May 14, 2021

खेजड़ी के वृक्ष को राजस्थान में क्यों कहते हैं कल्पवृक्ष ?

  • इस वृक्ष को बचाने विश्नोई समाज के 363 लोगों ने कटा दिए थे सिर
  • इतिहास के पन्नों पर अंकित है बलिदान की यह प्रेरणादायी दास्तान 

राजस्थान का राज्य वृक्ष खेजड़ी या शमी। (फोटो इंटरनेट से साभार) 

।। अरुण सिंह ।।

खेजड़ी या शमी के वृक्ष को राजस्थान में कल्पवृक्ष कहा जाता है। अनूठे गुणों से भरपूर तथा मरुस्थल की भीषण तपिश में इसकी उपयोगिता को देखते हुए खेजड़ी को 1983 में राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया था। तत्कालीन शासकों द्वारा खेजड़ी के वृक्षों को कटवाये जाने पर विश्नोई समाज ने न सिर्फ पुरजोर विरोध किया था अपितु वृक्षों को कटने से बचाने के लिए समाज के 363 लोगों ने अपने सिर कटा दिए थे। खेजड़ी के पेड़ को कटते देख सबसे पहले अमृता देवी पेड़ से लिपट गई थीं, फलस्वरूप सैनिकों ने खेजड़ी के पेड़ के साथ अमृता देवी का सिर भी काट दिया था। पर्यावरण संरक्षण के लिए बलिदान की यह कहानी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। राजस्थान में यह कहावत प्रचलित है कि "सर साठे रूख रहे, तो भी सस्तों जांण" अगर सिर कटने से वृक्ष बच रहा हो तो ये सस्ता सौदा है।

उल्लेखनीय है कि खेजड़ी का यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है, जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है। खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता, तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है। इसका फूल मींझर कहलाता है तथा इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है।

 यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है। अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन 1899 में जब दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे। बताया जाता है कि इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।

इस अनूठे वृक्ष का सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व भी है। दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा है। रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है, जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है। पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है। 

शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। खेजरी पेड़ की लम्बाई थार में आमतौर पर लगभग 24 फीट होती है और इसकी जड़ें जमीन में लगभग 90 फीट की गहराई तक चली जाती हैं। औषधीय रूप से भी खेजड़ी वृक्ष बहुत उपयोगी है।

क्या आप इस फली को जानते है?


यह राजस्थान के मसहूर पौधा " खेजड़ी" की फली है। 

 जैव विविधता के संरक्षण तथा जैविक खेती को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय योगदान देने वाले "बाबूलाल दाहिया जी" ने इस वृक्ष व इसमें लगने वाली फली के बारे में रोचक जानकारी साझा की है। जो यहाँ यथावत प्रस्तुत है -      

 जी हां, आप लोगों में से बहुत से लोग इसे नहीं जानते होंगे। पर यह राजस्थान के मसहूर पौधा " खेजड़ी" की फली है। आज जिस तरह आक्सीजन के कारण हजारों लोग अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं, तो हर पौधे की उपयोगिता और अन्य जीवों से उनके अंतर सम्बन्धो को जानना आवश्यक है। खेजड़ी की वहाँ हर मांगलिक अवसरों में पूजा होती है और उसे खेजड़ी माता नाम से जाना जाता है, जिस पर बहुत से लोकगीत भी हैं।

 हम लोग जब 4 दिवसीय थार के रेगिस्तान प्रवास में थे, तो बाजरा की रोटी और खिचरा के साथ प्रति दिन इसी फली की सब्जी ही खाते थे। आपने अमृता देवी विश्नोई का नाम अवश्य सुना होगा, जिनने खेजड़ी को बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी। वे इस उपयोगी पेड़ में लिपट गई और उसे तभी कटने दिया जब राजा के सिपाहियों ने पहले उन्हें अपने कुल्हाड़े से काट डाला।

यू भी  खेजड़ी की विचित्र कहानी है। अगर रेगिस्तान में खेजड़ी न हो तो ऊँट भूखों मर जाए और अगर ऊँट न हो तो खेजड़ी का बीज अंकुरित ही न हो। इस तरह यह दोनों के जीवन संघर्ष की जुगलबन्दी भी कम रोचक नही? दरअसल खेजड़ी के बीज को अंकुरण के लिए 27 दिन की नमी की आवश्यकता होती है । पर जिस थार के रेगिस्तान में मात्र 58 मि. मी. ही वर्षा होती हो वहां भला 27 दिन की नमी उसे कहां से मिले? किन्तु ऊँट और खेजड़ी ने तरीका खोज रखा है।

वह यह कि खेजड़ी के पौधे के फल ठीक उस समय पकते हैं जब पकने के 5- 6 दिन बाद मानसून की बारिश शुरू हो जाय। इस तरह उसके पके फल को ऊट खाता है, जिसका बीज दो दिन की नमी उसके पेट में लेता है। किन्तु उसके पश्चात आंवले के फल के बराबर जब वह मेंगनी करता है, तो 5 दिन की नमी उसे उस लेडी से मिलती रहती है और फिर 20 दिन की नमी मानसूनी बारिश से मिल जाती है। इस तरह उस रेगिस्तानी रेत में खेजड़ी का पौधा उग आता,जिसकी अवस्था एक हजार वर्ष की होती है। और फिर ऊँट बारहों मास उसकी पत्तियां खाता रहता है। थार के रेगिस्तान में लोग इसके फली की हरी सब्जी भी खाते हैं  और बाद में सुखाकर बारहो माह सूखे फलों की सब्जी भी खाते रहते हैं।

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Wednesday, May 12, 2021

रुंज नदी में आधा दर्जन शव मिलने की बात निकली अफवाह

  •  कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक मौके पर जाकर स्थिति का लिया जायजा 
  •  नदी में मिले सिर्फ दो शव, कैंसर व कुष्ट रोग से मौत होने की हुई पुष्टि  

कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक गांव में जाकर वहां के हालातों का जायजा लेते हुए ।

 ।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में धर्मपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत नंदनपुर गांव के निकट रुंज नदी में दो शवों के मिलने की पुष्टि हुई है। यहाँ की रुंज नदी में आधा दर्जन शव मिलने की बात अफवाह साबित हुई। मालूम हो कि मंगलवार 11 मई को नदी में 5-6 शव उतराते हुए दिखने की अफवाह उड़ा दी गई थी। जिससे इलाके में भय और दहशत का माहौल बन गया था।

 मामले को प्रशासन ने गंभीरता से लिया तथा कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा व पुलिस अधीक्षक धर्मराज मीणा आज मौके पर पहुंचकर स्थिति स्पष्ट की है। कलेक्टर ने बताया कि रुंज नदी में पूरी तहकीकात के बाद सिर्फ दो शव मिले हैं। जिनमें एक व्यक्ति की मौत कैंसर से व दूसरे मृतक को सफेद दाग थे। फल स्वरुप क्षेत्रीय मान्यता के मुताबिक इन शवों का अग्नि संस्कार करने के बजाय उन्हें ग्रामीणों द्वारा जल समाधि दी गई थी।

 पुलिस अधीक्षक धर्मराज मीणा ने बताया कि ग्रामीणों की मौजूदगी में पुलिस द्वारा रुंज नदी में सर्च ऑपरेशन चलाया गया। आपने बताया कि नंदनपुर गांव के पास रुंज नदी के कालीबराह घाट में जहां कई शवों के तैरने की अफवाह उड़ी थी, वहां दो शव मिले हैं। ग्राम वासियों ने भी बताया कि ग्राम बीहर सरवरिया के अहिरवार समाज द्वारा दो शवों का जल प्रवाह कर अंतिम संस्कार किया गया था। इस गांव के लोगों को मौके पर बुलाकर शवों की पहचान भी कराई गई।


 परिजनों द्वारा यह बताया गया कि दोनों लोगों की मौत कोरोना संक्रमण से नहीं अपितु कैंसर व कुष्ठ रोग से ग्रसित होने के चलते हुई है। पुलिस अधीक्षक ने कहा  कोरोना महामारी के समय इस तरह के बेहद संवेदनशील मामलों को लेकर अफवाह फैलाना ठीक नहीं है। इससे आम जनमानस में गलत संदेश जाता है तथा दहशत फैलती है। उन्होंने मीडिया से भी अनुरोध किया कि बिना तथ्यों की छानबीन किए जल्दबाजी में सनसनी फैलाना जनहित में नहीं है। पुलिस अधीक्षक श्री मीणा ने कहा कि झूठी अफवाह फ़ैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी। 

 मामले की हुई मजिस्ट्रियल जांच 


नंदनपुर गांव के निकट प्रवाहित रुन्ज नदी जहाँ तैरते हुए दो शव मिले। 

रुंज नदी में कई शवों के तैरने की अफवाह के इस बेहद संवेदनशील मामले की मजिस्ट्रियल जांच भी कराई गई है। अनुविभागीय अधिकारी अजयगढ़ व तहसीलदार आजयगढ़ ने जो प्रतिवेदन सौंपा है, उसके मुताबिक एक शव कल्लू अहिरवार उम्र 75 वर्ष निवासी बीहर सरवरिया नहराई के पुरवा का है तथा दूसरा शव शिवराम पिता टिडिया अहिरवार 90 वर्ष निवासी बाबूपुर थाना नरैनी हाल निवास बीहर सरवरिया थाना अजयगढ़ का है। नदी में छह शवों के मिलने की अफवाह भ्रामक और असत्य है। उक्त दोनों शवों को उनके परिवार जनों व समाज वालों के द्वारा रुंज नदी से निकालकर नदी के किनारे दफना दिया गया है।

सरपंचों द्वारा गांव में करवाई गई मुनादी

कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों, सरपंच व सचिव को दी गई समझाईस का अच्छा असर देखा जा रहा है। ग्राम पंचायत बीहर सरवरिया के सरपंच लक्ष्मी अहिरवार एवं ग्राम पंचायत नंदनपुर की सरपंच बंदना गर्ग द्वारा अपने ग्राम पंचायत क्षेत्र में मुनादी करवाकर नदी में शव फेंकने के बजाय  ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित करवाए गए शांतिधाम में अंतिम संस्कार करने का आग्रह किया गया है। सूचना बोर्ड बनवा कर नदी के घाट में लगवाने के निर्देश भी दिए गए हैं। किसी गंभीर बीमारी या अन्य किसी कारण से दाह संस्कार मुमकिन नहीं होने पर मिट्टी में दफन किए जाने की बात कही गई है ताकि नदी का पानी स्वच्छ रहकर ग्रामीणों एवं पशु पक्षियों के उपयोग के लिए सुरक्षित रह सके। 

कोरोना के प्रति सावधान रहने की सलाह

कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा  द्वारा समस्त ग्रामीणों, पंचायत कर्मियों को कोरोना कोविड-19 के प्रति सावधान रहने, स्वयं सुरक्षित रहते हुए दूसरे की सुरक्षा का भी ध्यान रखने, मास्क लगाने, शारीरिक दूरी का ध्यान रखने और हाथों को बार-बार धोने व सैनिटाइज करने की सलाह दी गई। सरपंच और सचिव को मास्क वितरण करवाने एवं क्षेत्र में सामाजिक कार्यक्रमों के प्रतिबंध एवं बाहरी लोगों का गांव में प्रवेश प्रतिबंध का कड़ाई से पालन करवाने के निर्देश दिए गए हैं। 

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प्राचीन ग्रामीण भारत की जुगाढ़ तकनीक

  •  काश! एक दिवस गाँव के इन तकनीसियों का भी होता ?                            

 आज हम विज्ञान के युग मे रह रहे  हैं, जहां तरह-तरह के यंत्र हैं। यंत्र की परिभाषा शायद यही होगी कि " मनुष्य द्वारा निर्मित वह जुगाड़ जो उसके इसारे पर गतिमान हो जाय?" पर वह इसी से सम्भव हुआ कि उसमे मनुष्य के दो अदद फुर्सत के हाँथ और एक अदद विलक्षण बुद्धि का भी योगदान था। बुद्धि ने जहां कल्पना की, वहीं हाथों ने उसको मूर्त रूप दिया।

 मनुष्य के इस विद्या का पहला गुरु शायद  गोबरौरा कीट रहा होगा। क्योंकि वह जब जमीन में गढ्ढे खोद कर अंडे देता है, तो  भविष्य में उनसे निकलने वाले बच्चों के खाने के लिए ढेर सारा जानवरों और मनुष्यों का मल वहां एकत्र कर देता है। पर उसे वह सीधे उठाकर ले जाने के बजाय गोले बना लेता है और फिर लुढ़काता हुआ ले जाता है। लेकिन उससे उसे लाभ यह होता है कि वह अपने वजन का 3--4 गुना अधिक गोला एक बार में ही लुढ़काकर ले जाता है।

 फिर क्या था ? मनुष्य को उसकी यह करतूत देख न सिर्फ एक अच्छा सा गुरु मिल गया बल्कि उसके गुरुज्ञान की एक तकनीक भी। और फिर वही तकनीक बनी पहिए की खोज। जिसके बूते आज रेल ,बस, वायुयान सब कुछ उसी के ऊपर ही चलते हैं। हमारे गाँव इस तरह के तमाम इंजीनियरों और उनकी  जुगाड़ तकनीकों से भरे पड़े थे जिनमें कुछ के तकनीशियन तो विषम परिस्थिति के चलते भी आज तक मौजूद हैं। 

प्राचीन समय से ही कुम्हार के चाक, बुनकर के तकली, करघे से लेकर तेली के कोल्हू तक किसी न किसी रूरल इंजीनियर की तकनीक ही थी, जो गाँव को आत्म निर्भर इकाई बनाए हुए थी। तेली के इस कोल्हू को ही देख लीजिए कि लोहे की कहीं एक कील भी नहीं। बस लकड़ी, रस्सी कपड़े के टुकड़े और पत्थर के बूते ही चल रहा है। किन्तु बैलेंस का पूरा-पूरा ध्यान। जब दुबला पतला तेली बैठ जाए तो दूसरे छोर में पत्थर भी रख ले। पर यदि उसके स्थान पर कोई मोटा ब्यक्ति बैठ जाय, तो पत्थर हटा दे। लेकिन उनका भार बैल के कंधे में जरा भी नही? क्योंकि कोल्हू की लाठ घूम भी रही है, किन्तु पूरा वजन उठाकर।

@बाबूलाल दाहिया




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Saturday, May 8, 2021

पन्ना को मिली एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से लैस एक एंबुलेंस

  •  प्रदेश शासन के मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह की सराहनीय पहल 
  •  बहुप्रतीक्षित सीटी स्कैन मशीन लगाने के हुए आदेश जारी 

मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा विधायक निधि से प्रदान की गई अत्याधुनिक एंबुलेंस। 

।। अरुण सिंह ।।    

पन्ना। प्रदेश शासन के कैबिनेट मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह की पहल से जिला चिकित्सालय पन्ना को एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से लैस एक एंबुलेंस आज मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ आर एस पांडे एवं सिविल  सर्जन डॉक्टर विद्यासागर उपाध्याय को प्रदान की गई। आपदा के समय जब कोविड-19 का संक्रमण शहरी क्षेत्रों के साथ ही ग्रामीण इलाकों में भी तेजी से हो रहा है, उस समय आधुनिक सुबिधाओं से सुसज्जित एंबुलेंस के मिलने से कोरोना से लड़ने में मदद मिलेगी। यह बहुत ही हौसला बढ़ाने वाली बात है कि पन्ना जिला चिकित्सालय में सीटी स्कैन मशीन लगाने के भी आदेश जारी हो चुके हैं। 

उल्लेखनीय है कि विगत लम्बे समय से पन्नावासियों द्वारा सीटी स्कैन मशीन की मांग की जा रही थी। कोरोना महामारी को देखते हुए यह सुविधा बेहद जरुरी थी, जिसे द्रष्टिगत रखते हुए क्षेत्रीय सांसद बी. डी. शर्मा व स्थानीय विधायक और मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह ने इस दिशा में कारगर प्रयास किये। परिणाम स्वरुप पन्ना में सीटी स्कैन मशीन लगने का मार्ग प्रशस्त हुआ। दोनों ही जनप्रतिनिधियों का कोरोना की इस लड़ाई में जिस तरह का सक्रिय सहयोग पन्ना जिले को मिल रहा है उससे पीड़ितों व उनके परिजनों का भी हौसला बढ़ा है। कोरोना के खिलाफ जारी इस जंग को जीतने के लिए इसी हौसले की जरुरत थी। 

होनहार चिकित्सक डॉ.रिचा सिंह ने किया ज्वॉइन


डॉ.रिचा सिंह

जिला चिकित्सालय पन्ना को मिलीं बड़ी सौगातों के बीच एक सुकून देने वाली खबर और है। पन्ना में एक होनहार महिला चिकित्सक की पदस्थापना भी हुई है, जिन्होंने अपना कार्यभार भी ग्रहण कर लिया है। ख़ुशी की बात यह है कि चिकित्सक पन्ना की ही बेटी है, जिसमें चिकित्स्कीय कौशल के साथ - साथ सेवा भावना भी है। मिली जानकारी के मुताबिक स्व. गजेंद्र सिंह परिहार जी की भतीजी डॉ.रिचा सिंह (MBBS) ने प्रमुख लोगों के आग्रह पर जिला चिकित्सालय, पन्ना के कोविड सेंटर में अपनी सेवाएं देने के लिए आज ही ज्वॉइन कर लिया है। मालुम हो कि इसके पूर्व डॉ.रिचा AIIMS भोपाल एवम् हमीदिया अस्पताल में भी पदस्थ रही हैं। 

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गांवों में झोलाछाप डॉक्टरों से लोग करा रहे इलाज

  • गांव - गांव तेजी से फैल रही कोरोना के कहर की बेल 
  • वैक्सीन को लेकर भी ग्रामीणों के मन में भय व भ्रांति 

पन्ना जिले के सिंहपुर गांव में झोलाछाप डॉक्टर से इलाज कराते संदिग्ध मरीज। (फोटो - संजय सिंह)

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना । कोरोना के कहर की बेल अब महानगरों से निकलकर छोटे शहरों और गांवों में भी तेजी से फैलने लगी है। सर्दी, खांसी और बुखार से पीड़ित गांव के मरीज सरकारी अस्पतालों में जाने के बजाय गांव में ही झोलाछाप डॉक्टरों से अपना इलाज करा रहे हैं। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे ग्रामों में पत्थर की चीपों वाली बेन्च व जमीन पर लेटकर बोतल चढ़वाते मरीजों के दृश्य अब आम हैं। जिन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां ग्रामीण इलाकों में कैसे हालात हैं।

 जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 20 किलोमीटर दूर पन्ना-बांदा मार्ग पर स्थित सिंहपुर गांव में झोलाछाप बंगाली डॉक्टर के क्लीनिक में इन दिनों मरीजों की भरमार है। कोरोना के लक्षण वाले संदिग्ध मरीज बड़ी संख्या में आ रहे हैं, जिनका यहां इलाज चल रहा है। सिंहपुर गांव के अलावा इस अंचल के धर्मपुर, खोरा, हरदी, टिकुरहा व रामनगर आदि ग्रामों के भी यही हाल हैं। यहां भी ग्रामीण झोलाछाप डॉक्टरों से ही अपना इलाज करा रहे हैं।

 इस क्षेत्र के समाजसेवी संजय सिंह राजपूत ने इसकी वजह का खुलासा करते हुए बताया कि कोरोना को लेकर ग्रामीणों में भारी दहशत है। वे इलाज कराने के लिए सरकारी अस्पतालों में इसलिए नहीं जाते क्योंकि उन्हें डर है कि वहां उनकी कोरोना जांच कराई जाएगी। यदि उनको कोरोना निकल आया तो न कोई उनके पास आएगा और न ही छुएगा। इसके अलावा कोरोना को लेकर तरह-तरह की अफवाहें भी फैली हुई हैं, जिसके चलते गांव के लोग सरकारी अस्पतालों की तरफ रुख करने से कतरा रहे हैं। 

हालांकि  प्रशासन द्वारा शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना की जांच करवाने तथा वैक्सीन लगवाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन इसका खास असर गांवों में नहीं दिख रहा। पन्ना जिले के ज्यादातर गांवों में लोग कोरोना वैक्सीन को संदेह की नजर से देख रहे हैं। ग्रामीणों से वैक्सीन लगवाने बाबत कहने पर उनका जवाब होता है "जब हमें कछु नइयां तो हम काय लगवाइये"। धर्मपुर गांव के एक बुजुर्ग ने बिना लाग लपेट के बताया कि "कोरोना वाली सुई लगवाने के बाद पहले बुखार आउत, फिर आदमी हलाकान हो जात। एक ने लगवाओ, तो चार दिन खटिया में डरो रहो"।

गांव के लोग वैक्सीन नहीं लगवा रहे, उनके मन में भ्रांति और भय ने इस कदर पैठ जमा लिया है कि वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। पंचायत सचिव पुष्पेंद्र सिंह बताते हैं कि सबके पास वैक्सीन को लेकर कोई न कोई किस्सा है। कोई कह रहा है कि फला जगह इस इंजेक्शन के लगने से इतने लोग मर गए, जिन्हें बरसाती में लपेट कर जला दिया गया। कहीं इस महामारी को ही सिरे से नकारा जा रहा है। कुल मिलाकर स्थिति गंभीर हो रही है। गांव-गांव फैली इस तरह की भ्रांतियों और अफवाहों को दूर करना प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती है।

 क्षेत्रीय सांसद ने निकाला जागरूकता रथ 


वैक्सीनेशन के लिए जागरूकता लाने क्षेत्रीय सांसद द्वारा निकाला गया जागरूकता रथ। (फोटो - आशीष तिवारी)

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व क्षेत्रीय सांसद विष्णु दत्त शर्मा द्वारा पन्ना जिले के ग्रामीण अंचलों में वैक्सीनेशन के लिए लोगों को जागरूक करने 7 मई से जागरूकता रथ निकाला गया है। भाजपा के मीडिया प्रभारी आशीष तिवारी ने बताया कि यह रथ गांव में घूमकर ग्रामीणों को वैक्सीनेशन कराने के फायदे की जानकारी देगा। जागरूकता रथ के माध्यम से ग्रामीणों को कोरोना के लक्षणों तथा इलाज के संबंध में भी आवश्यक जानकारी प्रदान की जाएगी।

 कोरोना के इलाज हेतु नई योजना लागू 

मध्यप्रदेश में कोरोना मरीजों के निशुल्क इलाज हेतु नई योजना लागू की गई है। जिसके अंतर्गत प्रदेश के गरीब एवं आम आदमी को कोविड-19 का नि:शुल्क इलाज अनुबंधित निजी अस्पतालों में मिल सकेगा। इस संबंध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि योजना के क्रियान्वयन हेतु आयुष्मान भारत योजना पर निजी अस्पतालों को राज्य सरकार द्वारा विशेष पैकेज दिया जाएगा। सरकार निजी अस्पतालों को इलाज के लिए अनुबंधित करेगी।

वीडियो - कोरोना मरीजों को नि:शुल्क इलाज की सुविधा प्रदान करने के सम्बन्ध में अधिकारियों को दिशा निर्देश देते प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान -



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Thursday, May 6, 2021

ब्रम्हाण्ड की गतिविधियों से जुड़े हैं महामारियों के तार!

 


कोरोना की दूसरी वेव ने भारत समेत पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। यहां तक कि जिन्हें वैक्सीन लग गई हैं, उनमें से भी कुछ लोगों को यह वायरस संक्रमित कर दे रहा है। सब स्तब्ध हैं। सच तो यह है कि कोरोना को अभी तक डॉक्टर्स समझ ही नहीं पाए हैं कि वास्तव में इस वायरस का मूल चरित्र कैसा है। ऐसे में, जब पूरी दुनिया के वैज्ञानिक व डॉक्टर्स परेशान हों, तब यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम महामारियों के इतिहास पर नज़र डालें। और महामारियों को समझने का प्रयास करें। चूंकि अपने अध्ययन के दौरान मैंने जो निष्कर्ष निकाला उसे समझने के लिए सबसे ज़रूरी है कि पहले हम अपने ब्रम्हांड की संरचना को भौतिकी नज़रिये से समझ लें। उसके बाद चीज़ें समझने में आसान हो जाएंगी। इसलिए सबसे पहले हम संक्षेप में अपने ब्रम्हांड की संरचना को समझते हैं।

दरअसल हमारे ब्रम्हांड में कई गैलेक्सीज़ हैं। अभी तक 10^11 (यानी 100000000000) गैलेक्सीज की ही खोज हो पाई है। उसमें हमारी गैलेक्सी भी एक है। इसका नाम 'मिल्की वे' है। हिंदी में इसे "आकाश गंगा" कहते हैं। हमारी इस गैलेक्सी (आकाश गंगा) में भी अभी तक 10^11 तारों की ही खोज हो सकी है। यानी, अभी भी अनगिनत तारे खोजे जाने बाकी हैं। हमारा सूर्य भी एक तारा ही है। सूर्य हमारी पृथ्वी से लगभग 13 लाख गुना बड़ा है। इसे ऐसे समझें कि सूर्य को अगर हम एक फुटबॉल मान लें तो, सूर्य में पृथ्वी जैसी 13 लाख छोटी गोलियां भरी जा सकती हैं। सूर्य से भी लाखों-करोड़ों गुने बड़े तारे हमारी गैलेक्सी में ही हैं। ब्रम्हांड में तो और भी न जाने कितने बड़े-बड़े तारे होंगे। ब्रम्हांड की तो बात ही छोड़ दीजिए।

इसी तरह से हमारा 'सोलर सिस्टम' (सौरमंडल) सूर्य के चारों ओर चक्कर काट रहा है। इसमें नौ ग्रह (8 ग्रह और एक छूद्र ग्रह) शामिल हैं। ये सभी ग्रह सूर्य के चारों और चक्कर काट रहे हैं। सभी ग्रह अलग-अलग त्रिज्या के वृत्त में थ्री-डायमेंशनल स्पेस में चक्कर काट रहे हैं। इसीलिए ये कभी आपस में टकराते नहीं हैं। इसी तरह से, हमारा सूर्य भी किसी बड़े सिस्टम के चारों ओर (अपने सभी नौ पिंडों को लेकर) चक्कर काट रहा है। इसी तरह से वह बड़ा निकाय भी किसी दूसरे बड़े पिंड के चारो ओर चक्कर काट रहा है।

ब्रम्हांड में इस तरह के कई सूर्य हैं। लाखों-करोड़ों-अरबों सूर्य हैं। वो सब भी इसी प्रक्रिया में गतिमान हैं। यानी पहला, दूसरे के चारों और चक्कर काट रहा है। फिर दूसरा, पहले को साथ लेकर किसी तीसरे के चारों और चक्कर काट रहा है। फिर तीसरा, पहले और दूसरे को साथ लेकर किसी चौथे के चारों और चक्कर काट रहा है। इस तरह से यह क्रम चलता ही जा रहा है, चलता ही जा रहा है, चलता ही जा रहा हैज्। फिजिक्स की भाषा में, इसके पीछे गुरुत्वाकर्षण बल की ताक़त है। इस तरह से हमारा पूरा ब्रम्हांड भी एक अन्य ब्रम्हांड के चारों ओर चक्कर काट रहा है। यहीं से मल्टीवर्स या बहुब्रम्हांड यानी एक से अधिक ब्रम्हांडों की परिकल्पना का अंकुरण होता है। और एक-दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाने के पीछे जो ऊर्जा है, वह दो पिंडों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल की वज़ह से है।

दरअसल, हर एक कण, दूसरे कण को प्रभावित करता है। भौतिकी की भाषा में, हर दो पदार्थों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बकीय बल, विद्युतचुम्बकीय तरंगों समेत तमाम बल कार्य करते हैं। जिसकी वज़ह से हर कण, दूसरे कण को प्रभावित करता है। यहां तक कि धरती पर गिरा हुआ एक सूखा तिनका भी सूर्य और ब्रम्हांड के कण-कण को प्रभावित कर रहा है। वो अलग बात है कि उसका प्रभाव बेहद कम है। इतना कम कि हम नग्न आखों से उसका असर देख नहीं पाते। यानी, इस ब्रम्हांड में सब ऊर्जा का खेल है। सब ऊर्जा संतुलन का खेल है। यहां कुछ भी मुक्त नहीं है। सब एक-दूसरे बंधे हैं। सूर्य को हटा दीजिए, सारे ग्रहों का संतुलन तत्क्षण बिगड़ जाएगा। पृथ्वी का वज़ूद समाप्त हो जाएगा। पृथ्वी को हटा दीजिए, चांद का वज़ूद समाप्त हो जाएगा। इसी तरह से ब्रम्हांड, गैलेक्सी, सौरमंडल, सूर्य, पृथ्वी, हम, आप, वृक्ष, पशु, पक्षी और हर वो चीज जिसे आप सोच सकते हैं, कुछ भी यहां मुक्त नहीं है। सब किसी मशीन के पुर्ज़ों की तरह अपने-अपने फंक्शन में लगे हैं। पूरा ब्रम्हांड संतुलन के सिद्धांत पर टिका है। यहां तक कि सूर्य को पिता, धरती को माता और बाकी सबको धरती की संतान कहे जाने के पीछे भी अपना तर्क है। उसकी भी वज़ह सक्षेप में जान लेते हैं। जैसा की हम जानते हैं, सूर्य की वज़ह से धूप होता है। धूप की वज़ह से गर्मी बढ़ती है। गर्मी की वज़ह से वाष्पीकरण की प्रक्रिया होती है। वाष्पीकरण की प्रक्रिया की वज़ह से बादल बनते हैं। बादलों की वज़ह से बारिश होती है। बारिश की वज़ह से धरती पर जलचक्र संतुलन बना है। और इसी वज़ह से धरती हरी-भरी है। धरती पर प्रजनन की प्रक्रिया सतत चल रही है। अगर सूर्य धीरे-धीरे बुझ जाए (जो होना तय है), तो धरती सूख जाएगी। धरती मृत हो जाएगी।

कहते हैं, ब्रम्हांड में अभी भी लाखों-करोड़ों सूर्य हैं। ब्रम्हांड में इससे पहले भी लाखों-करोड़ों सूर्य थे। वो धीरे-धीरे बुझ गये। वो पृथ्वियां भी मर गईं। सूख गईं। उनपर जीवन समाप्त हो गये। आज वो सभी लाखों-करोड़ों अज्ञात पृथ्वियां सूखी मिट्टी और खनिज का बड़ा सा गोला मात्र बनकर ब्रम्हांड में तैर रही हैं। उनका कोई इतिहास भी नहीं है। जब उनपर कुछ बचा ही नहीं तो इतिहास बताएगा कौन! इतिहास लिखेगा कौन। यही गति इस धरती का भी होना तय है। लेकिन अभी नहीं, कुछ लाख वर्षों बाद। इस तरह से इस ब्रम्हांड में कुछ भी फ्री नहीं है। कुछ भी निरपेक्ष नहीं है। कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं। यहां तक कि हमारे-आपके विचार तक निरपेक्ष नहीं हैं। आप अपने विचारों का विश्लेषण करके देखिए। आप पाएंगे, आपके विचारों तक पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है। आप कब, कहां, किस जगह, क्या सोचेंगे, वो वाह्य व आंतरिक तमाम परिस्थितियों पर निर्भर करता है। आप अपना जीवन पथ ही मुड़कर देख लीजिए। आप पाएंगे, आज आप जो कुछ भी हैं, वहां आपको पहुंचाने में समय के बहाव और घटनाओं की स्टेयरिंग ने आपको वहां तक पहुंचाया है। आप तो बस किसी लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट के अभिनेता मात्र बनकर रह गये।

कुल मिलाकर, इस ब्रम्हांड में कुछ भी मुक्त नहीं है। कुछ भी। एक तिनका भी सूर्य को प्रभावित करता है। सूर्य भी तिनके-तिनके को प्रभावित करता है। यहां तक कि सूर्य दिन में दो-दो बार समुंदर को उठा-उठाकर पटक देता है, जिसे हम ज्वार व भाटा कहते हैं। हम देखते ही रह जाते हैं। सोचिए, इतने अथाह समुंदर तक को जो सूरज प्रतिदिन दो बार उठाकर पटक देता है, आपको क्या लगता है, वह हमें-आपको प्रभावित नहीं करता है!

अब आते हैं, कुछ रोचक तथ्यों पर...

सूर्य पर हर ग्यारह वर्षों पर सोलर तूफान आते हैं। धब्बे बनते हैं। यह घटना जब-जब होती है, तब-तब धरती पर उथल-पुथल मचती है। इसी तरह से सूर्य पर हर 90 वर्षों के अंतराल पर बड़े-बड़े विस्फोटक गुबार बनते हैं। धब्बे बनते हैं। गैसों के गुब्बारे बनते हैं। फिर फटते हैं। महाविस्फोट होते हैं। सूर्य के अणुओं और ऊर्जा का पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) होता है। उपर्युक्त दोनों ही स्थितियों में हमारे सौर मंडल में ऊर्जा संतुलन बिगड़ता है। उथल-पुथल मचता है। पूरी धरती पर भौतिक परिस्थितियों के अलावा व्यक्ति विशेष की मानसिक स्थिति तक पर गहरा असर पड़ता है।

इन दोनों में से सबसे ख़तरनाक असर सूर्य पर 90 वर्षों में होने वाली घटनाएं डालती हैं। इस 90 वर्ष के पूरे होने के वर्षों में धरती पर महामारियां फैल सकती हैं। अकाल पड़ सकते हैं। एक के बाद एक दुर्घटनाएं हो सकती हैं। धरती भूकंपों से भर जाती है। विश्वयुद्ध हो सकते हैं। धरती पर आत्महत्याएं बढ़ती हैं। लोगों की मति मारी जाती है। धरती पर ना-ना प्रकार से त्रासदियां ही त्रासदियां आती हैं। अगर आप देश-दुनिया से अपडेट रहते हैं, तो आप इस समय उपर्युक्त घटनाओं के उदाहरणों से भरे पड़े होंगे। पिछले एक वर्ष से धरती पर कोरोना, निसर्ग, बेमौसम ओलावृष्टि, बर्फबारी, गैस लीक़, ऑयल प्लांट में आग, यूरोप के एक वित्तमंत्री का आत्महत्या कर लेना, एक के बाद लगातार भूकंप, टिड्डी दलों का हमला, कई देशों में जलवायु आपातकाल इत्यादि सब अकारण ही नहीं हो रहे हैं। इसके पीछे वज़ह है। आख़िर, इससे पहले आपने एकसाथ इतनी त्रासदियों को कभी देखा??? नहीं ना???

आज से 100 साल के आसपास पीछे जाने पर पता चलता है कि 1918 तक धरती दूसरे विश्वयुद्ध से जूझ रही थी। विश्वयुद्ध के बाद शीतयुद्ध का दौर शुरू हो गया। पूरी दुनिया की सांसे अटकी थी। अब थोड़ा और पीछे चलते हैं। आज से क्रमश: 200 व 300 साल पहले (1818 व 1718 में) भी भयावह महामारियां फैली थीं। ओशो तो यहां तक कहते हैं कि इन वर्षों में पैदा होने वाले बच्चे (चाहे वो किसी भी जीव के हों) औसत रूप से कम प्रतिभाशाली होंगे। क्योंकि ये एक तरह से सूर्य के बूढ़ा होने का वर्ष है। इन वर्षों में धरती पर ऊर्जा कम होती है। धरती अलसायी हुई, सुस्त होती है। सूरज थका हुआ सा होता है। इसके बाद सूरज फिर उभरना शुरू करता है। 45 वर्षों बाद सूरज अपनी फिर अपनी जवानी पर होता है। उस समय पूरी धरती (पूरा सौर मंडल) ऊर्जा से लबरेज़ होती है। उस समय धरती पर महापुरुषों के जन्म की संभावनाएं अधिकतम होती हैं।

इसलिए पृथ्वी पर जो त्राहिमाम का दौर चल रहा है, यह भी अकारण नहीं है। बस ज़रूरत है इनपर शोध किये जाने की। सच तो यह है कि इस विषय पर आधुनिक विज्ञान द्वारा अभी तक उतना शोध किया ही नहीं गया, जितनी इसे ज़रूरत थी। अगर हम पिछले हजारों वर्षों में अकाल, युद्ध, विश्वयुद्ध, महामारियों समेत पृथ्वी पर होने वाले उथल-पुथल का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करें, उन्हें समझें, अस्तित्व के नियमों व प्रकृति के स्वभावों को पढ़ें और उसका पूर्वानुमान लगाकर समय पर सावधान हो जाएं, व्यावसायिक हितों में अंधे होकर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं, तो धरती पर होने वाले जान-माल के भीषण व तकलीफ़देह नुकसान से बचा जा सकता है।

@अजय सिंह 

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वह सिर्फ धूप खाती है और पानी पीती है

 


हिमाचल प्रदेश की सांगला घाटी जाने के लिए रिकांगपिओ  पहुंचा तो पता नहीं क्यों सांस फूलने लगी। यह अनहोनी बात थी क्योंकि मुझे सांस फूलने या फेफड़ों की कोई बीमारी नहीं है।

अगले दिन मुझे सांगला घाटी जाने के लिए रिकांगपिओ के बस अड्डे से बस पकडऩी थी। बस अड्डे तक पहुंचने के लिए कुछ चढ़ाई चढऩा पड़ती थी।

पीठ पर भारी थैला लादकर होटल के बाहर आया तो लगा कि शायद चढ़ाई न चढऩे पाऊंगा । सामने दो तीन पहाड़ी मजदूर मौजूद थे।

वे  मुझे देखते ही समझ गए कि मुझे क्या चाहिए । मेरा बैग लेने के लिए दो मजदूरों मैं थोड़ी छीना झपटी हो गई । आखिरकार एक  ने बैग ले लिया मैं बस अड्डे की तरफ जाने वाली चढ़ाई चढ़ने लगा ।

थोड़ी देर में मैंने देखा कि वह मजदूर भी पीछे-पीछे चला रहा है जिसको बैग  नहीं  मिल पाया था। मेरी समझ में कुछ देर बाद आया कि वह मेरे पीछे-पीछे क्यों आ रहा था। उसे लग रहा था कि मैं चढ़ाई नहीं चढ़ पाऊंगा और जब पस्त पड़ जाऊंगा तो वह मुझे अपनी पीठ पर उठा लेगा। उसे भी भाड़ा मिल जाएगा।

चढ़ाई चढ़ते हुए जब मेरी सांस ज्यादा फूलने लगती थी तब वह इशारा करता था कि मैं उसकी पीठ  पर बैठ सकता हूं और मैं उसे इशारे से मना कर देता था। कुछ देर बाद हम दोनों में यह प्रतियोगिता - सी शुरू हो गई। वह चाहता था कि मैं इतना थक जाऊंगा कि उसकी पीठ पर बैठने के लिए मजबूर हो जाऊं और मैं चाहता था कि इसकी नौबत न आए । 

मैं कोशिश करके किसी तरह बस अड्डे पहुंच गया। जिस मजदूर ने मेरा बैग उठाया था उसे तो मैंने पैसे दिए ही इस मजदूर को भी कुछ पैसे दिए जो मेरे साथ इमरजेंसी सेवा के लिए आया था। उसके चेहरे पर आशा के विपरीत कुछ मिल जाने की खुशी थी जिसे देखना मुझे इतना अच्छा लगा और मैं इतना खुश हुआ कि उतनी खुशी पाने के लिए पता नहीं कितने पापड़ बेलने पड़ते।

सांगला घाटी में  छुटकुल नाम का एक  बहुत सुंदर 'हेरीटेज' गांव है। उसके आगे दो तीन और छोटे गांव हैं। अंतिम गांव में एक  ढाबा है जिस पर लिखा है "हिंदुस्तान का अखरी ढाबा"।

इन्हीं गांवों में मुझे एक बूढ़ी औरत दिखाई दी थी जो मंदिर के सामने धूप खाने के लिए अकेली बैठी थी। उस औरत की उम्र का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल था । मैंने आसपास के लोगों से उसके बारे में पूछा तो बताया गया कि उसकी उम्र 100 साल से ज्यादा है और वह सिर्फ  धूप खाती है और पानी पीती है।

@असगर वजाहत 

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Tuesday, May 4, 2021

हैदराबाद के चिडय़िाघर में 8 शेर मिले कोरोना संक्रमित !

  •  सतर्कता हेतु केंद्रीय वन मंत्रालय ने जारी की थी एडवाइजरी 
  •  संक्रमित शेरों में पाये गए हैं कोविड-19 के सभी मुख्य लक्षण  

सांकेतिक फोटो इंटरनेट से साभार। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। भारत सहित समूची दुनिया में कोहराम मचाने वाला कोरोना वायरस आदमियों से जानवरों में भी ट्रान्सफर हो सकता है। हैदराबाद के चिडय़िाघर में 8 शेरों के कोरोना पॉजिटिव होने से इस बात की पुष्टि हुई है। मालुम हो कि अभी हाल ही में 30 अप्रैल 21 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इसको लेकर सभी राज्यों को एडवाइजरी जारी की गई है। जिसमें कोरोना वायरस के संक्रमण से वन्य प्राणियों को बचाने के लिए जरुरी एहतियाती कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। 

आठ शेरों के कोरोना संक्रमित होने के मामले की जानकारी देते हुए पन्ना टाइगर रिज़र्व के क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि भारत में शायद यह  पहला मामला है, जिसमें आठ शेरों (चार नर और चार मादा) के कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी प्रकाश में आई है। आपने बताया कि वन्य प्राणियों में कोविड-19 से संक्रमित होने का यह मामला  हैदराबाद स्थित चिडय़िाघर का है। पता चला है कि इस चिड़ियाघर के तक़रीबन दो दर्जन कर्मचारी कोरोना संक्रमित पाये गए हैं। ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि इन्ही संक्रमित कर्मचारियों के संपर्क में आने से कोरोना वायरस शेरों तक पहुंचा होगा। 

क्षेत्र संचालक श्री शर्मा ने बताया कि चिड़ियाघर और खुले जंगल की परिस्थितियां भिन्न होती हैं। चिड़ियाघर में वन्यप्राणियों से मनुष्य का संपर्क संभव है जबकि खुले जंगल में ऐसा नहीं है। इसके बावजूद केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मिले दिशा निर्देशों के परिपालन में कदम उठाये गए हैं। आपने बताया कि 16 अप्रैल से पन्ना टाइगर रिजर्व में पर्यटकों के भ्रमण पर पूरी तरह रोक लगाई हुई है। कोरोना पॉजिटिव किसी भी वनकर्मी की जंगल में ड्यूटी नहीं रहती, उन्हें क्वारंटाइन में रहने के निर्देश दिए गए हैं। आपने बताया कि खुले जंगल में स्वच्छंद रूप से विचरण करने वाले किसी वन्य प्राणी के कोरोना संक्रमित होने का कोई भी मामला अभी तक प्रकाश में नहीं आया है। श्री शर्मा ने कहा कि इस सम्बन्ध में गहन अध्ययन और रिसर्च की जरुरत है ताकि स्थितियां स्पष्ट हो सकें। 

उल्लेखनीय है कि सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी ने नेहरू जूलॉजिकल पार्क (NZP) को बताया कि कोविड-19 के लिए आठ शेरों का RT-PCR टेस्ट पॉजिटिव आया था। एनजेडपी के क्यूरेटर और निदेशक डॉ. सिद्धानंद कुकरेती ने आधिकारिक तौर पर इस खबर की पुष्टि नहीं की। हालांकि, उन्होंने मीडिया को बताया, "यह सच है कि शेरों में  कोविड-19 के लक्षण दिखे हैं, लेकिन मुझे अभी तक CCMB की RT-PCR रिपोर्ट नहीं मिली है और इसलिए कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने बताया कि फ़िलहाल शेर अच्छा बर्ताव कर रहे हैं। "

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पन्ना में दिखने लगा सख्ती का असर !

  • ड्रोन कैमरे से चप्पे - चप्पे पर रखी जा रही है नजर 
  • पुलिस बेवजह घूम रहे लोगों पर कर रही कार्यवाही

शहर के गाँधी चौक पर तैनात पुलिस तथा ऊपर मंडराता ड्रोन। 

।। अरुण सिंह ।।   

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में कोरोना कर्फ्यू को अब सख्ती से लागू किया जा रहा है। शहर के प्रमुख मार्गों, चौराहों व बाजार में जहाँ चहल - पहल बनी रहती थी, वहां बीते दो दिनों से सन्नाटा है। सड़कों पर बेवजह घूमने वालों के खिलाफ पुलिस द्वारा कार्यवाही की जा रही है। ड्रोन कैमरे से भी शहर के चप्पे - चप्पे पर नजर रखी जा रही है। कोरोना लॉकडाउन और प्रशासन की इस सख्ती का अब सड़कों पर जहाँ असर दिखने लगा है वहीँ यह उम्मीद भी की जाने लगी है कि इससे संक्रमण की दर में भी गिरावट आयेगी।    

उल्लेखनीय है कि पन्ना कलेक्टर संजय कुमार मिश्र द्वारा जिले में कोरोना संक्रमण पर प्रभावी रोक लगाने के लिए धारा 144 लागू की गई है। बिना मास्क   और बिना किसी आवश्यक कार्य के घर से बाहर निकलने पर पूर्ण पाबंदी की गई है। इसके बावजूद अकारण घूमने वाले लोग अपने वाहनों से घर से निकल रहे थे तथा बिना मास्क के सड़कों पर घूम रहे थे। इससे कोरोना संक्रमण की चैन टूटने के बजाय संक्रमण तेजी से फैलने लगा, यहाँ तक कि ग्रामीण अंचलों में भी कोरोना संक्रमित मरीज निकलने लगे। संक्रमण की भयावह स्थिति तथा समय पर समुचित उपचार न मिलने से मौतें भी होने लगीं। मामले की गंभीरता को देखते हुए हालात सुधारने के लिए प्रशासन सख्त हुआ जिससे आवाजाही पर प्रभावी अंकुश लगा है। 

 सोमवार 3 मई को पुलिस अधीक्षक धर्मराज मीणा, रक्षित निरीक्षक देविका सिंह बघेल, कोतवाली नगर निरीक्षक अरुण कुमार सोनी भारी पुलिस बल के साथ पन्ना शहर के विभिन्न चौराहों पर वाहन चेकिंग कार्यवाही की गयी। इतना ही नहीं आवारा घूमने वाले असामाजिक तत्वों पर चालानी कार्यवाही की गयी। पन्ना शहर में 12 वाहन चालकों पर चालानी कार्यवाही के साथ ही 11 व्यक्ति जो बिना मास्क  के शहर में घूमते पाए गए उनके खिलाफ भी पन्ना कोतवाली पुलिस द्वारा कार्यवाही की गयी है। इसके साथ ही शहर की 4 दुकानों को बिना प्रशासनिक परमिशन के खोले पाए जाने का सील करने की कार्यवाही की गई है।

पुलिस प्रशासन के द्वारा सीसीटीवी कंट्रोल रूम  व ड्रोन के माध्यम से निगरानी रखी जा रही है तथा लगातार फ्लैग मार्च करके करोना कर्फ्यू को सख्त बना बनाया जा रहा है। ऐसे संकेत दिए गए हैं कि कोरोना कर्फ्यू का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ पन्ना पुलिस के द्वारा सख्त कार्यवाही की जावेगी। पुलिस अधीक्षक पन्ना धर्मराज मीणा ने आम जनता से अपील की है कि घर पर रहें, सुरक्षित रहें। मास्क व सैनिटाइजर का उपयोग करते रहें तथा कोरोना के नियंत्रण हेतु किये जा रहे प्रयासों में प्रशासन को पूर्ण सहयोग करें।

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