Thursday, April 19, 2018

सदानीरा केन नदी का बिगड़ रहा है स्वास्थ्य

  •   स्वच्छ नदियों में शुमार केन बुन्देलखण्ड की है जीवन रेखा  

  •   427 किलोमीटर लम्बी केन नदी की दो युवकों ने की पदयात्रा


केन नदी की पदयात्रा करने वाले युवक अपना अनुभव साझा करते हुये।

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की जीवन रेखा कही जाने वाली देश की स्वच्छ नदियों में शुमार सदानीरा केन नदी का स्वास्थ्य अब बिगड़ रहा है। कुछ दशक पूर्व तक जिस नदी में अविरल जल प्रवाह देखने को मिलता था वह अप्रैल के महीने में ही जगह-जगह सूखी और बेजान नजर आ रही है। केन नदी को सदानीरा बनाने वाली उसकी अधिकांश सहायक नदियां मृतप्राय हो चुकी हैं। मानवीय दखल बढऩे, जलागम क्षेत्रों में बांधों का निर्माण होने, भारी भरकम मशीनों से अनियंत्रित उत्खनन, वनों की कटाई, शहरीकरण और बदलते भू-उपयोग के चलते ऐसे हालात निर्मित हुये हैं। यह बात 427 किमी लम्बी केन नदी की पदयात्रा पूरी करने के उपरान्त सिद्धार्थ अग्रवाल व भीम सिंह रावत ने अपने अनुभव साझा करते हुये पन्ना में पत्रकारों को बताई।

केन नदी की भौगोलिक संरचना और अनूठेपन से अत्यधिक प्रभावित सिद्धार्थ अग्रवाल आईआईटी खडग़पुर से उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, जबकि भीम सिंह रावत उत्तरांचल पोड़ी गढ़वाल के निवासी हैं। प्रकृति, पर्यावरण और नदियों के संबंध में इन दोनों ही युवकों में गहरी समझ है। आप लोगों ने पत्रकारों को बताया कि कठिन भौगोलिक क्षेत्र होने के चलते इस पदयात्रा को तीन चरणों में पूरा किया, जिसमें पूरे 33 दिन लगे। लगभग 600 किमी पैदल यात्रा के दौरान बांदा व पन्ना जिले में केन नदी के तटों पर स्थित सौ से अधिक ग्रामों से होकर गुजरे। इनमें 60 से भी अधिक ग्रामों में रुककर ग्रामवासियों से केन नदी के अतीत एवं वर्तमान स्थिति पर रूबरू चर्चा की। 

यात्रा के दौरान यह एहसास हुआ कि केन नदी का इतिहास अत्यधिक समृद्ध रहा है। नदी के किनारे जहां सैकड़ों छोटे-बड़े धार्मिक स्थल देखने को मिले वहीं पौराणिक एवं प्राचीन कालीन स्मारकों के अवशेष भी जहां-तहां बिखरे पड़े नजर आये। आप लोगों ने बताया कि वास्तव में प्राचीन संस्कृति, इतिहास और नदी का संबंध शोध का बड़ा विषय है। पदयात्रा से पता चला कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना, अजयगढ़, छतरपुर और बांदा जिले में केन नदी पेयजल और सिंचाई का मुख्य श्रोत है।

अविरल से बरसाती बन रही है केन नदी


दस्तावेजों के अनुसार केन नदी बारामासी है। परंतु 33 दिवसीय पदयात्रा के दौरान केन नदी में सतत प्रवाह का अभाव देखा गया। गैरमानसूनी महीनों में नदी अनेक स्थानों पर पूरी तरह सूखी दिखी। इस वर्ष अप्रैल में पण्डवन पुल, अमानगंज के पास नदी में पानी पूरी तरह सूख चुका है। पण्डवन पुल से ऊपर नदी की लम्बाई लगभग 150 किमी है जिसमें से नदी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सूखा देखने को मिला। सहायक नदियों के संगम पर जिसे दुनाव अथाव दोनाव बोलते हैं, पर नदी में ठहरे हुये पानी के तालाब समान बड़े जलकुण्ड पाये गये। 

केन-सोनार नदी दोनाव से नीचे और ऊपर नदी अमूमन सूखी मिली और पदयात्रा नदी के बीचोंबीच चलकर तय की। साथ में नदी तल अनेक स्थानों पर बहुत गहरा है जिसमें पानी भरा हुआ मिला। परंतु नदी अविरलता से निरंतर नहीं बह रही है जिसके लिये ग्रामीण बढ़ती ङ्क्षसचाई की माँग, घटते जंगल और वर्षा अभाव को वजह मानते हैं। गाँववालों ने बताया कि एक दशक पहले नदी में जल प्रवाह की बेहतर स्थिति थी, उनके अनुसार कुछ दशक पूर्व तो नदी पूरी तरह से सदानीरा थी।

अनोखी है केन की भौगोलिक संरचना


पन्ना नेशनल पार्क के भीतर प्रवाहित केन का दृश्य।

केन नदी की भौगोलिक संरचना बहुत अनोखी है। केन घडिय़ाल प्राणी उद्यान में स्थित प्रसिद्ध स्नेह झरना, अमेरिका के ग्राण्ड केनयन घाटी का प्रतिबिम्ब है। उसी तरह पण्डवन झरना भी मनोहारी है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के अन्दर स्थित गहरी घाटी झरना और खड़ी पहाडिय़ां भी अद्भुत हैं। इसके अलावा नदी के मध्यम भाग में ग्रेनाइट, डालोमाइट, क्वार्टजाइट, काग्लोमरेट पत्थरों से बनी चट्टानें और पत्थरों के टुकड़े देखने को मिले। नदी के अन्दर सहजर नामक  कीमती पत्थर भी देखा गया। केन नदी तल में अनेक स्थानों पर गहरे, लम्बे कुण्ड बने हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में डबरा, दहार, दौं आदि नामों से जाना जाता है। 

इन कुण्डों में सालभर पानी भरा रहता है जिससे ग्रामीणें के पीने, खेती, पशुपालन, नौकाचालन, मछली पकडऩे की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इसके अलावा झीरना, झीना केन नदी का विशेष गुण है। भू-जल के रिसरिसकर नदी तट अथवा तल पर आकर नदी में मिलने को ग्रामीण झीरना बोलते हैं। नदी के झीरने के गुण के कारण ही गहरे नदी तलों खासतौर पर दहार में वर्षभर ताजा पानी देखने को मिलता है। गाँववालों के अनुसार बढ़ते भू-जल दोहन से जलागम क्षेत्र में केन नदी का झिरना कम होता जा रहा है जिससे नदी जल्दी सूख जाती है।

तटवर्ती ग्रामों के सूख चुके 95 फीसदी कुँये


केन नदी के तटवर्ती 95 फीसदी गाँवों में कुँये सूख चुके हैं। गर्मियों के समय हैण्डपम्प भी बेकार होते जा रहे हैं। साथ में अनेकों स्थानों पर कुँओं, हैण्डपम्पों में समरसिबल लगाने का चलन बढ़ता देखा गया है। गाँवों में तालाब भी उपेक्षा का शिकार हैं। गाँववालों के अनुसार केन नदी में कालांतर में जल प्रवाह लगातार घटता जा रहा है। जिसकी वजह से गाँव के जल श्रोतों कुँये, तालाबों, हैण्डपम्पों पर बहुत बुरा असर हुआ है। केन नदी में पानी की मात्रा कम होने से सैकड़ों मछवारों, मल्लाहों, नदी तट-तल पर बारीतरी की खेती करने वाले किसानों पर बहुत बुरा असर हुआ है।

प्रदूषण से नष्ट हो रहा प्राकृतिक गुण



केन नदी के किनारे बेरहमी के साथ काटे गये वृक्ष का द्रश्य। 


केन नदी को म.प्र. की स्वच्छ नदियों में गिना जाता है। अनेक स्थानों पर ग्रामीण नदी का पानी पीते हैं। जिसका बहुत बड़ा श्रेय गहरे दहार और झीरने के प्राकृतिक गुण को जाता है। परंतु नदी तट पर बसे बांदा शहर उ.प्र., पन्ना शहर (किलकिला धारा के जरिये), अमानगंज तहसील (मिढ़ासन नदी के माध्यम से) और शाहनगर तहसील का गंदा पानी बिना उपचारित किये केन नदी में मिल रहा है। इन शहरों से बायोमेडिकल वेस्ट और विषैले अपशिष्ट केन नदी में बहाये जा रहे हैं जिससे नदी जल की गुणवत्ता के साथ-साथ नदी जैव विविधता पर भी विपरीत असर हो रहा है। जिस पर संबंधित विभागों और सरकार का ध्यान नहीं गया है।

संकट में है केन नदी की जैव विविधता


जैव विविधता की दृष्टि से केन नदी समृद्ध है। नदी के तटों पर यात्रा के दौरान 50 से अधिक पेड़ों, 30 से अधिक वनस्पतियों, 30 से अधिक स्तनधारी, सरीसृप, कीट पतंगों की प्रजातियां देखी गईं। नदी जल और तट पर 60 से अधिक प्रजाति के पक्षी देखने को मिले। साथ में 12 से अधिक प्रकार की मछलियों के नाम सुनने को मिले। इसके अलावा केन नदी में कई प्रकार और आकार की सीपियां भी देखने को मिलीं। 

कई स्थानों पर बिलकुत्ता (नदी झीगुर), केकड़ा और जुगनू भी देखने को मिले। पदयात्रा के दौरान नदी तटों पर अवांछित खरपतवार और पेड़ जैसे विलायती कीकर, लैन्टाना, गाजर घास आदि भी बहुत बड़े भू-भाग पर फैली हुई मिली। मछवारों के अनुसार नदी में महाशीर मछली की संख्या बहुत कम हो गई है। ग्रामीणों ने बताया कि केन नदी पर बनी बांधों, बैराजों की योजनाओं और अनियंत्रित शिकार से जलीय जीवों मछलियों, कछुओं, मगर, घडिय़ाल की संख्या भी बहुत कम होती जा रही है।

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अवैध हीरा खदानों में प्रशासनिक अधिकारियों का छापा


  •   रमखिरिया हीरा खदान क्षेत्र से 10 एलएनटी मशीनें हुईं जब्त
  •   छापामार कार्यवाही से हीरा खदान संचालकों में मचा हड़कम्प



हीरा खदानों में छापामार कार्यवाही के दौरान मौके पर मौजूद अधिकारी।

। अरुण सिंह 

पन्ना। बेशकीमती रत्न हीरों की उपलब्धता के लिये शहूर पन्ना जिले के बृजपुर क्षेत्र में अवैध रूप से चलने वाली उथली हीरा खदानों में दबिश देकर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बुधवार को सुबह छापामार कार्यवाही की गई। अचानक हुई इस कार्यवाही से हीरा खदान संचालकों में हड़कम्प मचा हुआ है। कलेक्टर पन्ना मनोज खत्री के निर्देशन में एसडीएम विनय द्विवेदी, थाना प्रभारी बृजपुर अवधेश प्रताप ङ्क्षसह बघेल व हीरा इन्स्पेक्टर द्वारा पुलिस बल की मौजूदगी में मौके से 10 एलएनटी मशीनें जब्त की गई हैं। इन भारी भरकम मशीनों द्वारा अवैध रूप से चलाई जा रही हीरा की खदानों में उत्खनन का कार्य किया जा रहा था।
मामले के संबंध में जानकारी देते हुये एसडीएम पन्ना विनय द्विवेदी ने चर्चा करते हुये बताया कि कलेक्टर के निर्देश पर आज सुबह 8 बजे से कार्यवाही शुरू की गई। बृजपुर से लगभग 1 किमी दूर रमखिरिया हीरा खदान क्षेत्र में बाघिन नदी के किनारे अमला स्थित खदानों से एलएनटी मशीनें जब्त की गई हैं। श्री द्विवेदी ने बताया कि यहां संचालित होने वाली अधिकांश खदानें निजी भूमि पर चल रही हैं, जिनके लिये हीरा कार्यालय से कोई पट्टा जारी नहीं हुआ। जाहिर है कि खदानें अवैध रूप से चलाई जा रही थीं। 
सूत्रों के मुताबिक इस क्षेत्र में उत्खनन के जितने पट्टे हीरा कार्यालय से जारी हुये हैं, उससे चार गुना से भी अधिक खदानें मौके पर चल रही हैं। इन सभी खदानों में उत्खनन के लिये जेसीबी व एलएनटी मशीनों का उपयोग किया जाता है। जिसके चलते स्थानीय मजदूरों को हीरा खदानों में कोई काम नहीं मिल पाता। चूंकि इलाके में चलने वाली अधिकांश खदानें बिना पट्टे के अवैध रूप से चलाई जा रही हैं, इसलिये यहां से जो भी हीरे निकलते हैं, उन्हीं हीरा कार्यालय में जमा कराने के बजाय चोरी छिपे विक्रय कर दिया जाता है। जिससे शासन को प्रति माह लाखों रू. के राजस्व की हानि भी होती है।

70 किमी. क्षेत्र में फैली है हीरा धारित पट्टी


 हीरा धारित क्षेत्र में चलने वाली उथली खदान का दृश्य।

पन्ना जिले में हीरा धारित पट्टी का विस्तार लगभग 70 किमी है, जो पहाड़ीखेरा से लेकर मझगवां तक फैली है। इस हीरा धारित पट्टी की चौड़ाई 30 किमी है। हीरे के प्राथमिक श्रोतों में मझगवां किम्बर लाइट पाईप एवं हिनौता किम्बर लाइट पाईप पन्ना जिले में ही स्थित है। यह हीरा उत्पादन का प्राथमिक श्रोत है, जो पन्ना शहर के दक्षिण-पश्चिम में 20 किमी की दूरी पर है। यहां अत्याधुनिक संयंत्र के माध्यम से हीरों के उत्खनन का कार्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) द्वारा संचालित किया जा रहा है। एनएमडीसी के अलावा पन्ना के आस-पास हीरा धारित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों द्वारा उथली हीरा खदानें चलाई जाती हैं।

सैकड़ों की संख्या में चल रहीं अवैध खदानें


खदान से निकली चाल में हीरों की तलाश करते मजदूर।

वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद से अधिकांश हीरा धारित क्षेत्र वन सीमा के भीतर आ जाने के कारण वहां पर वैधानिक रूप से हीरों का उत्खनन बन्द हो गया है। शासकीय राजस्व भूमि बहुत ही कम है जहां हीरों की उपलब्धता है। ऐसी स्थिति में निजी पट्टे की भूमि व वन क्षेत्र में ही अधिकांश खदानें संचालित हो रही हैं जिनमें ज्यादातर अवैध हैं। हीरा की उपलब्धता वाले प्रमुख क्षेत्रों में सकरिया, नरेन्द्रपुर, जनकपुर, खिन्नीघाट, पटी, राधापुर, महुआ टोला, पुखरी, हर्रा चौकी, इमला डाबर, रानीपुर, गोंदी करमटिया, विजयपुर, बाबूपुर, हजारा, मडफ़ा, मरका, रमखिरिया, सेहा सालिकपुर, सिरसा, द्वारी, थाड़ी पाथर, पतालिया, चांदा, जमुनहाई, डाबरी, व गऊघाट आदि हैं। इन इलाकों में सदियों से हीरों का उत्खनन हो रहा है, लेकिन हीरों की उपलब्धता के बावजूद यहां भीषण गरीबी है।

व्यापारी व तस्कर हो रहे मालामाल


 खदानों से प्राप्त अनगढ़ हीरे।
पन्ना की धरती से निकलने वाला हीरा विश्व में श्रेष्ठतम गुणवत्ता का माना जाता है, यही वजह है कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पन्ना की खदानों से निकलने वाले हीरों की सर्वाधिक माँग रहती है। लेकिन इस दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि बेशकीमती रत्न हीरा की उपलब्धता के बावजूद इसकी चमक यहां के गाँवों में कहीं दिखाई नहीं देती। अंचल के गरीब हरिजन आदिवासियों और ग्रामीणों से तस्कर व हीरों के व्यापारी बेशकीमती हीरे अत्यधिक कम कीमत पर हथिया लेते हैं, फलस्वरूप व्यापारी व तस्कर मालामाल हो रहे हैं और हीरों के मालिक आज भी फटेहाल और गरीब हैं। कुछ दशक पूर्व तक हीरा खदानों में मजदूरों को काम भी मिल जाता था लेकिन अब मजदूरों की जगह मशीनों ने ले ली है, जिससे हीरा खदानों के द्वारा मिलने वाला रोजगार भी ठप्प हो गया है।

चोरी छिपे होती है हीरों की बिक्री

जिले में चलने वाली उथली हीरा खदानों से निकलने वाले 90 फीसदी से भी अधिक हीरे चोरी छिपे विक्रय कर दिये जाते हैं। हीरा कार्यालय में सिर्फ नाम मात्र के ही हीरे जमा होते हैं। इन जमा होने वाले हीरों से शासन को इतना राजस्व भी नहीं मिल पाता कि हीरा कार्यालय का स्थापना व्यय निकल सके। मशीनों के उपयोग का चलन होने से अब उथली खदानें गहरी खदानों में तब्दील हो गई हैं, जिनकी लागत अधिक होने के चलते अब खदानों पर प्रभावशाली लोगों और दबंगों का ही बर्चस्व है। 
आर्थिक रूप से कमजोर गरीबों की पहुँच से हीरा खदानें दूर हो गई हैं। उनकी पट्टे की जमीनों पर भी दबंगों द्वारा ही खदानें चलाई जा रही हैं। जानकार बताते हैं कि मजदूरों की जगह मशीनों का उपयोग इसलिये किया जाता है क्योंकि मशीनों से कम समय में अधिक काम होता है तथा मजदूरों की तुलना में लागत भी कम आती है। यही वजह है कि हीरा धारित क्षेत्रों में हर तरफ जेसीबी व एलएनटी मशीनें धुंआधार उत्खनन करते नजर आती हैं।

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Wednesday, April 11, 2018

शातिर शिकारी को चीतल के बच्चे ने दे दी मात

  •   नदी में पानी पीने आये चीतलों के झुण्ड पर तेंदुआ ने किया था हमला
  •   माँ से पीछे छूट चुके बच्चे ने चकमा देकर बचाई अपनी जान



जंगल में चौकन्ना होकर खड़ा चीतलों का झुण्ड 

अरुण सिंह,पन्ना। जंगल की निराली दुनिया में नित नये और अचंभित कर देने वाले नजारे देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक हैरतअंगेज नजारा म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में 10 अप्रैल मंगलवार की सुबह डेढ़ दर्जन से भी अधिक पर्यटकों ने साँसें रोके हुये दिल थामकर देखा। जंगल के सबसे शातिर और चालाक शिकारी तेंदुआ ने केन नदी से पानी पीकर लौट रहे चीतलों के झुण्ड पर अचानक हमला बोल दिया। इस हमले में चीतल तो कुलांचे भरते हुये भाग निकले लेकिन तकरीबन डेढ़ माह का एक छोटा बच्चा माँ से पीछे रह गया। जैसे ही तेंदुये की नजर इस बच्चे पर पड़ी, तो वह उसे दबोचने के लिये दौड़ा, लेकिन इस बच्चे ने फुर्ती दिखाते हुये तेंदुये को ऐसा चकमा दिया कि शातिर शिकारी भी थककर हार मान बैठा।
उल्लेखनीय है कि बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व में प्रतिदिन भ्रमण के लिये बड़ी संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक आते हैं। मौजूदा समय यहां पर तीन दर्जन से भी अधिक बाघ जहां स्वच्छन्द रूप से विचरण करते हैं वहीं जंगल का राजकुमार कहे जाने वाले तेंदुओं की भी अच्छी खासी तादाद है। रोज की तरह मंगलवार की सुबह जिप्सियों में सवार पर्यटक मड़ला प्रवेश द्वार से टाईगर रिजर्व के भ्रमण हेतु निकले। चार जिप्सियां आगे-पीछे एक ही मार्ग पर चल रही थीं। मड़ला प्रवेश द्वार से लगभग 9 किमी दूर मड़ला वन परिक्षेत्र के मगर डबरी में केन नदी से पानी पीकर लौट रहे चीतलों के झुण्ड को जब पर्यटकों ने देखा तो जिप्सियों की रफ्तार थम गई। इस अद्भुत दृश्य को पर्यटक अपने कैमरों पर कैद करने लगे। उस समय किसी को भी यह आभास नहीं था कि कोई शातिर शिकारी पीछे पहाड़ी में छिपकर घात लगाये बैठा है।

तेंदुआ ने किया अचानक हमला


शातिर शिकारी तेंदुआ जिसका हमला नाकाम हुआ।

पन्ना टाईगर रिजर्व के टूरिस्ट गाईड पुनीत कुमार शर्मा ने बताया कि सुबह लगभग 7.20 बजे चीतलों के इस झुण्ड को जिप्सियों में सवार पर्यटक जब अपलक निहार रहे थे। उसी समय पीछे की पहाड़ी पर घात लगाये बैठा तेंदुआ आहिस्ता-आहिस्ता उतरा और जिप्सियों के ठीक बगल से निकलकर चीतलों के झुण्ड पर धावा बोल दिया। अचानक घटित इस वाकये को इतने निकट से देख कई पर्यटकों की तो चीख निकल गई। बेहद चौंकन्ने और सजग होकर चल रहे चीतलों के झुण्ड को जैसे ही खतरे का आभास हुआ वे कुलाचें भरते हुये अदृश्य हो गये, लेकिन एक छोटा बच्चा पीछे छूट गया।

नन्हे चीतल ने दिखाई गजब की फुर्ती


तकरीबन डेढ़ माह के नन्हे चीतल को अकेला देख शातिर शिकारी तेंदुआ उसकी ओर लपका, तब ऐसा लगा कि कुछ ही क्षणों में चीतल का यह बच्चा तेंदुये के जबड़े में होगा। लेकिन यह क्या इस नन्हे से चीतल ने संकट की इस घड़ी में गजब की फुर्ती दिखाई और इधर से उधर कुलाचें भरते हुये तेंदुये को ऐसा चकमा दिया कि तेंदुये ने भी हार मान ली और चीतल का बच्चा कुलाचें भरते हुये अपने कुनबे के बीच सुरक्षित जा पहुँचा। इस पूरे घटनाक्रम को देख रोमांच से भरे पर्यटक अत्यधिक प्रसन्न नजर आये। उन्होंने इस भ्रमण को अविस्मिरणीय बताते हुये कहा कि वनराज के दर्शन भले नहीं हुये लेकिन जंगल के राजकुमार व चीतलों ने रोमांचित कर आज के भ्रमण को सार्थक और यादगार बना दिया है।
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Monday, April 9, 2018

महुआ फूलों की गंध से महक रहा पन्ना का जंगल

  • ग्रामीण अंचलों में महुआ सीजन किसी उत्सव से कम नहीं
  • सुबह 5 बजे से ही महुआ बीनने निकल पड़ते हैंं ग्रामीण


 पेड़ के नीचे महुआ लिये प्रसन्न मुद्रा में खड़ी महिला।

। अरुण सिंह 

पन्ना। गर्मी के इस मौसम में पन्ना जिले का जंगल महुआ फूलों की गंध से महक रहा है। सुबह 5 बजे से ग्रामीण महुआ बीनने के लिये जंगल की ओर कूच कर जाते हैं। वन क्षेत्र के आस-पास रहने वाले आदिवासियों के लिये तो महुआ का सीजन किसी उत्सव से कम नहीं होता। सुबह के समय यहां शीतल हवाओं व सफेद रसभरे महुआ फूलों की महक से वातावरण में मादकता इस कदर घुल जाती है कि गहरी सांस लेने भर से मन प्रफुल्लित और मदहोश हो जाता है। कल्दा पठार में आदिवासी समाज के लिये महुआ के फूल रोजी-रोटी का जरिया है, इस मौसम में आदिवासियों का पूरा कुनबा महुआ फूल चुनने में लगा रहता है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के दक्षिण वन मण्डल के अन्तर्गत आने वाले कल्दा पठार के जंगल में महुआ वृक्षों की भरमार है। महुआ के अलावा भी यहां के जंगल में हर्र, बहेरा, आंवला, चिरौंजी का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है। गर्मी का यह मौसम मार्च से लेकर मई तक कल्दा पठार के आदिवासियों के लिये बहुत अहम होता है, क्यों कि इसी सीजन में महुआ के वृक्षों से सफेद रसभरे फूल टपकते हैं। इन महुआ फूलों को एकत्र कर आदिवासी सुखाते हैं, जिससे उन्हें इतनी आय हो जाती है कि पूरे वर्ष भर उनका गुजारा हो जाता है। 

जैव विविधता से परिपूर्ण कल्दा के जंगल में महुआ के वृक्ष बहुतायत से पाये जाते हैं, नतीजतन यह इलाका महुआ फूल व गोही के उत्पादन में अग्रणी है। इन दिनों सुबह 5 बजे से ही आदिवासी बांस की टोकरियां लेकर कुनबा सहित महुआ फूल चुनने के लिये जंगल में निकल जाते हैं और दिन ढलने तक वृक्षों से टपकने वाले महुआ फूलों का संग्रहण करते हैं। इस सीजन में पठार के आदिवासियों की यह दिनचर्या बन जाती है।

वनोपज है आदिवासियों के जीवन का आधार


महुआ फूल बीनते हुये महिला व बच्चे।
श्यामगिरी में महुआ फूल का संग्रहण कर रहे कुसुआ आदिवासी व तुलसी बाई ने बताया कि कल्दा पठार के श्यामगिरी सहित रामपुर, मैनहा, पिपरिया, जैतुपुरा, टोकुलपोंडी, भोपार, कुसमी, झिरिया व डोडी आदि में 50 ट्रक से भी अधिक महुआ फूल का संग्रहण हो जाता है। आदिवासियों ने बताया कि पेडों से इस कदर महुआ फूल टपकते हैं कि पूरे दिन चुनने के बाद भी पूरे फूल हम नहीं चुन पाते। इस सीजन की सबसे बड़ी खूबी और विशेषता यह भी होती है कि महुआ फूल आने पर बिछुड़े परिजनों का भी मिलन हो जाता है।

पठार के जो लोग रोजी रोटी की तलाश व अन्य कारणों से बाहर चले जाते हैं वे भी इस सीजन में वापस घर लौट आते हैं। पूरा कुनबा साथ मिलकर महुआ फूलों के संग्रहण में जुटता है ताकि पूरे साल के खर्च की व्यवस्था हो सके। कुसुआ आदिवासी ने बताया कि अमदरा, मैहर, पवई व सलेहा के व्यापारी यहां आकर आदिवासियों से महुआ खरीदकर ले जाते हैं। सीजन में यहां एक व्यक्ति 5 से 6 क्विंटल महुआ एकत्र कर लेता है जो 15 से 20 रू. प्रति किग्रा. की दर से बिकता है। हर्र, बहेरा, आंवला, चिरौंजी व शहद से भी पठार के आदिवासियों को आय हो जाती है। यहां के लोग खेती किसानी से कहीं ज्यादा वनोपज पर ही आश्रित रहते हैं, जंगल यहां के आदिवासियों के जीवन का आधार है।

भालुओं का हर समय रहता है खतरा


 महुआ लेकर जाती महिलायें।
पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र व कल्दा पठार के जंगल में जहां महुआ के पेड़ बहुतायत में हैं, वहां भालुओं का खतरा भी हर समय बना रहता है। महुआ फूल चूंकि भालुओं का प्रिय भोजन है, इसलिये महुआ फूल बीनने के लिये जंगल जाने वालों का आमना-सामना भालुओं से यदा-कदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी भालू हमला भी कर देते हैं। इस खतरे से बचने के लिये वन क्षेत्र के लोग आमतौर पर महुआ बीनने के लिये समूह में जंगल जाते हैं, वहीं हर समय सजग और चौकन्ने भी रहते हैं ताकि भालुओं द्वारा यकायक हमला करने की स्थिति में बचाव कर सकें। महुआ सीजन में भालुओं के हमले की सबसे ज्यादा घटनायें होती हैं। जानकारों के मुताबिक छोटे बच्चों वाली मादा भालू ज्यादा आक्रामक और हमलावर होती है। यदि धोखे से भी किसी ने उसके बच्चों की तरफ रुख किया तो मादा भालू बच्चों को असुरक्षित जान हमला बोल देती है।

पत्ते जलाने से भड़क जाती है आग

महुआ सीजन गर्मी के मौसम में आता है। तेज धूप और गर्मी पडऩे पर ही महुआ फूल नीचे टपकते हैं। चूंकि गर्मी में पतझड़ भी होता है जिससे महुआ वृक्ष के नीचे बड़ी मात्रा में पत्ते जमा हो जाते हैं जिसके चलते महुआ फूल इन पत्तों के बीच से बीनने पर काफी असुविधा होती है। इसे दूर करने के लिये लापरवाहीवश ग्रामीण पेड़ के नीचे सफाई करने के लिये पत्तों में आग लगा देते हैं, यह आग फैलकर कभी-कभी जंगल को ही अपनी चपेट में ले लेती है जिससे वन व वन्य प्राणियों को नुकसान होता है। महुआ फूल बीनने वालों को चाहिये कि वे पत्तों पर आग लगाने के बजाय पत्तों को वहां से हटाकर पेड़ के नीचे की सफाई करें ताकि जंगल की आग से सुरक्षा हो सके।

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Tuesday, March 20, 2018

चिरौंजी के उत्पादन में पन्ना जिला अग्रणी

  • विनाशकारी विदोहन से घट रही वृक्षों की संख्या 
  • औषधीय महत्व के चिरौंजी वृक्षों का संरक्षण जरूरी 

 

 
। अरुण सिंह 

पन्ना। प्रदेश के बुन्देलखण्ड अंचल में चिरौंजी का सर्वाधिक उत्पादन होता है. यहां के खूबसूरत और सघन वनों में चिरौंजी के वृक्ष प्राकृतिक रूप से प्रचुरता में पाये जाते हैं. चिरौंजी की बढ़ती उत्तरोत्तर मांग के कारण इसका विनाशकारी विदोहन होने से औषधीय महत्व वाले चिरौंजी के वृक्षों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. परिणाम स्वरूप इसका उत्पादन भी उसी अनुपात में घट रहा है. जंगल में आबादी के बढ़ते दबाव व वनों की हो रही अधाधुंध कटाई से भी इस बहुमूल्य वृक्ष की उपलब्धता कम हुई है.

उल्लेखनीय है कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना व छतरपुर जिले के जंगलों में चिरौंजी के वृक्ष बड़ी तादाद में प्रचुरता से मिलते हैं. लगभग 20 मीटर ऊंचाई तक बढऩे वाले चिरौंजी के वृक्ष को स्थानीय लोग अचार का वृक्ष भी कहते हैं, इसका लेटिन नाम बुकेनेनिया लेटिफोलिया है. चिरौंजी के पत्ते छोटे - छोटे नोंकदार और खुरदरे होते हैं. इसके फल करौंदे के समान नीले रंग के होते हैं, इन फलों को तोडऩे पर उनके भीतर जो मगज निकलती है, उसे चिरौंजी कहते हैं. चिरौंजी का मेवों में जहां महत्वपूर्ण स्थान है वहीं यह पित्त और वात रोगों, कुष्ठ रोग, वीर्य दुर्बलता, श्वांस रोग, उदर रोग, चर्म रोग तथा मूत्र विकार हेतु उत्तम औषधि है. 

चिरौंजी को तेल के साथ पीसकर मालिश करने से मकड़ी का विष दूर होता है तथा इसे खाने से कलेजे, फेफड़े और मस्तक की शर्दी मिटती है. चिरांैजी को गुलाब जल में पीसकर मालिश करने से चेहरे पर होने वाली फुंसियां और दूसरी खुजली मिट जाती है. वैद्यों का यह कहना है कि एक छटांक भर चिरौंजी खा जाने से शरीर में उछलती हुई पित्ती शांत हो जाती है. अगर पित्ती किसी दवा से न जाय तो इससे जरूर चली जाती है. चिरौंजी की जड़ कसैली, कफ पित्त नाशक और रूधिर विकार को दूर करने वाली होती है.
वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश के पन्ना, छतरपुर व छिन्दवाड़ा जिले में चिरौंजी फल का सर्वाधिक उत्पादन होता है. पन्ना जिले के जंगलों से लगभग 8 सौ कुन्टल चिरौंजी फल का संग्रहण वनवासियों व स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता है. औषधीय महत्व वाले इस मेवे का उत्पादन प्रदेश के जिन अन्य जिलों में होता है, उनमें बालाघाट, बैतूल, भोपाल, बुरहानपुर, दमोह, गुना, जबलपुर, नरसिंहपुर, रायसेन, सागर, सीहोर, सिवनी, शहडोल व सीधी हैं. लेकिन प्रदेश में चिरौंजी के कुल उत्पादन का लगभग 60 फीसदी हिस्सा बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना और छतरपुर जिले में उत्पादित होता है.

कल्दा पठार में चिरौंजी के सर्वाधिक वृक्ष 

औषधीय वनस्पतियों के लिए अनुकूल पन्ना जिले के कल्दा पठार में चिरौंजी के सर्वाधिक वृक्ष पाये जाते हैं. कल्दा के अलावा पन्ना नेशनल पार्क के रिजर्व वन क्षेत्र सहित उत्तर व दक्षिण वन मण्डल के जंगल में चिरौंजी के वृक्ष प्राकृतिक रूप से प्रचुरता में मिलते हैं. इस फल की उपयोगिता व कीमत को देखते हुए ग्रामीण फलों को परिपक्व होने से पहले ही तोड़ लेते हैं. जिससे अच्छी गुणवत्ता वाली चिरौंजी प्राप्त नहीं हो पाती. वन अधिकारियों का कहना है कि चिरौंजी  (अचार) के पके हुए फलों को ही तोड़कर संग्रहित किया जाना चाहिए ताकि बेहतर गुणवत्ता वाली चिरौंजी प्राप्त हो सके. जंगल में लगभग 10 प्रतिशत फलों को बीजों द्वारा प्राकृतिक प्रवर्धन हेतु छोड़ दिया जाना चाहिए, ताकि जंगल में चिरौंजी के वृक्षों का पुन: उत्पादन हो सके.

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Wednesday, March 14, 2018

पलाश का फूल आजीविका का बन सकता है साधन



  • पन्ना में वनोपज की कोई कमी नहीं, वन आधारित उद्योगों की कमी है। ग्रामीणों ने बताया कि यदि वन आधारित गतिविधियॉं जिले मे हो और उसका लाभ मिले तो हम लोगों की गरीबी दूर हो सकती है।



। अरुण सिंह 

पन्ना। प्रकृति ने मानव को कई उपहार दिये हैं। समय-समय पर इसका अहसास अपने आप होने लगता है। मौसम के हिसाब से देखे तो बसंत के बाद अब चैत्र आ गया। पेड़ो से पत्ते गिरना नई कोपले निकलना, महुआ की पीगे फूटना, फसलों में चना,मसूर,गेहूॅं सभी पकने के बाद इठला रहे हैं। मौसम की मार के बावजूद वनों ने अपने उपहार स्वरूप मानव को महुआ, चिरौजी की आवक का आगाज कर दिया है। इसके अलावा छिवला,पलाश जो औषधीय गुणों से भरा पड़ा है, चारो तरफ  वन क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दिया है।

जहां एक ओर नये-नये उद्योग लग रहे हैं, जो मानव को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। उसकी जगह पन्ना जिले में कई ऐसे वनोपज जड़ी बूटी उपलब्ध हैं जहां हजारो युवाओ को रोजगार के साधन मिल सकते हैं। यहां की बात करे तो कई लाख रूपये का नागरमाथा अर्थात गुदिला ही यहां के लोगो को मिलता है।  कई आदिवासी परिवार साल भर के लिये इसी से अपना गुजारा करते हैं। 

महुआ, अचार, तेदुपत्ता, डोरी, आंवला यहां के वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी एवं गरीब परिवार के लिये रोजी रोटी का सहारा है। यहां के आदिवासी वर्ष भर के लिये इसी से अपना काम चलाते हैं।  आज कल छिवला पलाश पूरे जंगल में है इसके औषधीय गुण के बारे में बगौहा सहित आसपास के गांवों में कई ग्रामीणों से चर्चा की। ग्रामीणों ने बताया कि यदि वन आधारित गतिविधियॉं जिले में हो और उसका लाभ मिले तो हम लोगों की गरीबी दूर हो सकती है।

छिवला अर्थात पलाश के औषधीय गुण


पलाश का पेड़ जहाँ औषधीय गुणों से भरपूर होता है वहीँ इसके पत्तों का भी ग्रामीण इलाकों में आज भी उपयोग होता है। जानकारों के मुताबिक शरीर में घाव होने पर इसके छिलके को कुचलकर लगाने से घाव भर जाता है, फूल के गुदे के रंग उतार कर पीने से दस्त मिट जाता है, बकले के अन्दर के गुदे को उबाल कर पीने से छाले मिट जाते हैं।  दॉंत का दर्द भी ठीक हो जाता है तथा मुंह का सूजन मिट जाता है। 

पलाश के पेड़ में  गोद भी निकलती है, जिसका उपयोग डाढ़ में लगाने से दर्द ठीक हो जाता है। फूल की वौड़ खाने से उल्टी नही होती, फूल के रंग को पानी में डाल कर नहाने से लू नही लगती है। सफेद कपड़े को फूल के रंग से रंग  कर पहनते है, इसके पेड़ से बेहतरीन रस्सी एवं कूची बनती है। पलाश के पत्ते से दोना एवं पत्तल बनाये जाते हैं। 

मवेशियों को बाधने वाली जगह पर फूल डालने से जानवरों के कीड़े नही पड़ते, पिस्सू आदि कीड़े मर जाते हैं। फूल से गनगौर की पूजा होती है, लकड़ी हवन के लिये उपयोग होती है। गोद से लााख की कडे बनते हैं, जो महिलाये पहनती हैं।  सूखा रोग में पलाश की गाठ बांधने से लाभ पहुंचता है, डायविटीज में पलास के फूल को पानी में भिगोकर रंग को पीने से डायविटीज कम होती है।

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Sunday, March 11, 2018

पन्ना के जंगलों में गरीबों के फल तेंदू की बहार

  •   आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर होता है पका हुआ तेंदू फल
  •   मीठा और पौष्टिक होने के साथ कब्जियत भी करता है दूर


जंगल में फलों  से लदी तेंदू वृक्ष  की डाल। फोटो - अरुण सिंह 

। अरुण सिंह 

पन्ना। वन संपदा के मामले में अत्यधिक समृद्ध बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पन्ना जिले में इन दिनों तेंदू फल की बहार है। यहां के जंगलों में प्रचुरता से पाये जाने वाले तेंदू वृक्ष इस समय गोल आकार वाले पीले रंग के तेंदू फलों से लदे हुये हैं। गुणों से भरपूर तेंदू को आमतौर पर गरीबों का फल कहा जाता है। आदिवासी गर्मी के दिनों में घर से निकलने के पहले तेंदू के पके हुये फल जरूर खाते हैं ताकि गर्मी के प्रकोप से उनका बचाव हो सके। आयुर्वेद चिकित्सकों का भी कहना है कि तेंदू का फल पौष्टिक होने के साथ-साथ पाचन के लिये भी बेहद उपयोगी है। तेंदू फल के सेवन से पेट साफ होता है तथा कब्जियत भी दूर होती है।

उल्लेखनीय है कि अमूमन तेंदू का पेड़ जंगलों में ही पाया जाता है। विन्ध्यांचल की पहाडिय़ों में यह पेड़ बहुलता में मिलता है। वन व खनिज संपदा से समृद्ध पन्ना जिले के जंगलों में भी तेंदू के वृक्ष प्रचुरता में मिलते हैं। जिले के उत्तर व दक्षिण वन मण्डलों के अलावा पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर व बफर क्षेत्र के जंगल में भी बड़ी संख्या में तेंदू के पेड़ हैं जो गरीबों विशेषकर आदिवासियों की आय का प्रमुख श्रोत हैं। होली के बाद मार्च के महीने से लेकर मई तक आदिवासी जंगल से तेंदू फल का संग्रह कर बाजार में बेंचते हैं, जिससे उन्हें नियमित आय होती है। 

तेंदू फल खत्म होने के बाद इस वृक्ष में नई कोपलें निकल आती हैं, इन पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में होता है। आमतौर पर 15 मई से 15 जून तक तेंदूपत्ता की तुड़ाई का कार्य चलता है, जिसका संग्रहण वन विभाग द्वारा कराया जाता है। तेंदूपत्ता तुड़ाई के कार्य से वनों के आस-पास रहने वाले आदिवासियों को इससे अच्छी खासी आय हो जाती है।

जंगल में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले तेंदू के पेड़ भी अब वनों की हो रही अधाधुंध कटाई के चलते तेजी से कम होते जा रहे हैं। जंगलों के सिकुडऩे और उजडऩे से प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले देशी और मौसमी फल भी गायब होते जा रहे हैं। आम जनमानस की स्मृतियों से जुड़े पारम्परिक फलों के लुप्त होने की अनेकों वजहें हैं, जिनमें तेजी से बढ़ती आबादी प्रमुख है। चौतरफा आबादी क्षेत्र का विस्तार होने के कारण बचे-खुले जंगलों पर जबरदस्त दबाव है, जलाऊ और इमारती लकड़ी के लिये लोग बेरहमी के साथ जंगल में कुल्हाड़ी चला रहे हैं जिससे पारम्परिक फलों के वृक्ष भी गायब हो रहे हैं। 

पन्ना जिले के वे इलाके जहां वनों की सुरक्षा को अहमियत मिल रही है, वहां अभी भी तेंदू, चिरौंजी, आँवला और महुआ के वृक्ष बड़ी तादाद में हैं। कल्दा पठार का जंगल वनोपज के मामले में अभी भी अपनी अहमियत बनाये हुय है। लेकिन खनन माफियाओं की धमाचौकड़ी बढऩे तथा दर्जनों की संख्या में वैध व अवैध पत्थर खदानों के चलने से यहां की वन संपदा को खतरा उत्पन्न हो गया है।

पन्ना के आस-पास भी हैं तेंदू वृक्ष



पन्ना शहर के निकट स्थित प्रणामी धर्मावलम्बियों के तीर्थ स्थल चौपड़ा मन्दिर के आस-पास तेंदू फल से लदे वृक्ष नजर आ रहे हैं। चूंकि यहां पर मन्दिर के पुजारी सहित अनेकों श्रद्धालु बने रहते हैं, इसलिये मन्दिर परिसर के आस-पास का जंगल अभी भी सुरक्षित है। किलकिला नदी के किनारे प्रकृति के बीच स्थित धार्मिक महत्व का यह मनोरम स्थल प्रणामी धर्मावलम्बियों की आस्था का केन्द्र तो है ही, सुबह बड़ी संख्या में लोग यहां सैर के लिये भी पहुँचते हैं। यहां चौपड़ा मन्दिर के ठीक पीछे तेंदू के कई वृक्ष मौजूद हैं जो इस समय तेंदू फल से लदे हुये हैं। पीले सुन्दर फलों से लदे इन वृक्षों को देखना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। क्योंकि ऐसा दृश्य जंगल में ही देखने को मिलता है, शहर के निकट आबादी क्षेत्र में ऐसा दृश्य दिखाई देना दुर्लभ है।

उपहार और दण्ड दोनों उपलब्ध

जंगल में पाया जाने वाला तेंदू वृक्ष कई दृष्टि से अनूठा है। इस वृक्ष में जहां आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर मीठा, स्वादिष्ट, पौष्टिक और पाचक फल मिलता है, वहीं इस वृक्ष की पत्तियों का उपयोग बीड़ी बनाने के लिये किया जाता है। बीड़ी मानव निर्मित है जबकि तेंदू फल प्रकृति का अनमोल उपहार है, जिससे तमाम तरह की व्याधियों और रोगों से निजात मिलती है। 

जबकि मानव निर्मित बड़ी पीने से फेफड़े खराब होते हैं और लोग असमय काल कवलित हो जाते हैं। इस तरह से देखा जाये तो तेंदू के वृक्ष में उपहार और दण्ड दोनों ही उपलब्ध होते हैं, अब निर्णय हमारा है कि हम किसका चुनाव करते हैं। स्वादिष्ट फल खाते हैं कि फेफड़ों को जलाने वाली बीड़ी पीते हैं।

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Monday, March 5, 2018

घाघरा चोली पहन भगवान ने धारण किया सखी वेष

  •   बुन्देलखण्ड क्षेत्र के वृन्दावन पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में कायम है अनूठी परम्परा
  •   वर्ष में सिर्फ एक बार चैत्र माह की तृतीया को होते हैं इस स्वरूप के दर्शन


भगवान श्री जुगुल किशोर जी के सखी वेष का दृश्य।
अरुण सिंह,पन्ना। मुरली मुकुट छीन पहनाय दियो घाघरा चोली, यशोदा के लाल को दुलैया सो सजायो है। कृष्ण की भक्ति में लीन महिलायें जब ढोलक की थाप पर इस तरह के होली गीत गाते हुये गुलाल उड़ाकर नृत्य करती हैं तो म.प्र. के पन्ना शहर में स्थित सुप्रसिद्ध श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में वृन्दावन जीवंत हो उठता है। चैत्र माह की तृतीया को यहां भगवान श्री जुगुल किशोर जी सखी वेष धारण करते हैं। भगवान के इस नयनाभिराम अलौकिक स्वरूप के दर्शन वर्ष में सिर्फ एक बार ही होते हैं। यही वजह है कि सखी वेष के दर्शन करने पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
उल्लेखनीय है कि मन्दिरों के शहर पन्ना में स्थित श्री जुगुल किशोर जी का मन्दिर जन आस्था का केन्द्र है। इस भव्य और अनूठे मन्दिर में रंगों का पर्व होली वृन्दावन की तर्ज पर मनाया जाता है। तृतीया के दिन आज रविवार को इस मन्दिर की रंगत देखते ही बन रही थी। सुबह 5 बजे से ही महिला श्रद्धालुओं का सैलाब भगवान के सखी वेष को निहारने और उनके सानिद्ध में गुलाल की होली खेलने के लिये उमड़ पड़ा। ढोलक की थाप और मजीरों की सुमधुर ध्वनि के बीच महिला श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य की भक्ति और प्रेम में लीन होकर जब होली गीत और फाग गाया तो सभी के पाँव स्मवेव थिरकने लगे। फाग, नृत्य और गुलाल उड़ाने का यह सिलसिला सुबह 5 बजे से 11 बजे तक अनवरत चला। यह अनूठी परम्परा श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में साढ़े तीन सौ वर्ष से भी अधिक समय से चली आ रही है जो आज भी कायम है। इस मन्दिर के प्रथम महन्त बाबा गोविन्ददास दीक्षित जी के वंशज देवी दीक्षित ने जानकारी देते हुये बताया कि सखी वेष के दर्शन की परम्परा प्रथम महन्त जी के समय ही शुरू हुई थी। ऐसी मान्यता है कि चार धामों की यात्रा श्री जुगुल किशोर जी के दर्शन बिना अधूरी है।

गुलाल का ही मिलता है प्रसाद


परम्परा के अनुसार पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर में चैत्र मास की तृतीया को गुलाल का ही प्रसाद श्रद्धालुओं को मिलता है। सखी वेष में भगवान जुगुल किशोर व मुरली मुकुट धारण किये राधिका जी के अलौकिक स्वरूप को निहारने जब महिला श्रद्धालु मन्दिर पहुँचती हैं तो उनका सत्कार गुलाल से ही होता है। आज के दिन सुबह 5 बजे से 11 बजे तक मन्दिर के भीतर सिर्फ महिला श्रद्धालुओं को प्रवेश मिलता है, जहां महिलायें एक-दूसरे को गुलाल लगाकर पूरे भक्ति भाव के साथ फाग और होली गीत गाती हैं। पूरा मन्दिर आज गुलाल के रंग में सराबोर नजर आता है।

वृन्दावन की मिलती है झलक


पन्ना के श्री जुगुल किशोर जी मन्दिर को वृन्दावन की संज्ञा प्रदान की गई है, यहां आकर श्रद्धालुओं को वही अनुभूति होती है जैसी अनुभूति वृन्दावन में मिलती है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी से लेकर सभी पर्व व त्यौहार यहां पर वृन्दावन की तर्ज पर ही मनाये जाते हैं, यही वजह है कि पन्ना को बुन्देलखण्ड क्षेत्र का वृन्दावन कहा जाता है। यहां पर रंगों के पर्व होली की पूरे पाँच दिनों तक धूम रहती है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुु यह गीत गुनगुनाते हुये पन्ना के जुगुल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े हैं होली का उत्सव मनाते हैं।

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Friday, February 16, 2018

बाघिन को देख नर व मादा तेंदुआ पेड़ में चढ़े

  •   इस दुर्लभ और अद्भुत नजारे को देख रोमांचित हो उठे पर्यटक
  •   कुछ ही दूरी के फासले पर मौजूद थी बाघिन पी-141


वृक्ष की डाल पर बैठा तेंदुआ का जोड़ा। फोटो - पुनीत शर्मा 
अरुण सिंह,पन्ना। बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व में जंगल का राजकुमार कहे जाने वाले तेंदुओं की संख्या में भी इजाफा हुआ है। टाईगर रिजर्व के भ्रमण में आने वाले देशी व विदेशी पर्यटकों को अब आये दिन जहां वनराज के दर्शन होते हैं, वहीं तेंदुआ भी अक्सर देखने को मिल जाते हैं। लेकिन पर्यटकों ने गुरूवार को आज जो नजारा देखा है वह उनके लिये अविस्मरणीय रहेगा। गुंजा के ऊँचे पेड़ की डाल में नर व मादा तेंदुआ एक साथ जहां बैठे हुये थे, वहीं निकट ही पन्ना टाईगर रिजर्व की बाघिन पी-141 राजशी अंदाज में टहलते हुये आस-पास के माहौल का जायजा ले रही थी।
उल्लेखनीय है कि आज सुबह लगभग 6:30 बजे आधा दर्जन जिप्सियों में सवार होकर पर्यटकों का दल जब टाईगर रिजर्व के भ्रमण हेतु मड़ला प्रवेश द्वार से आगे बढ़ा तो किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी, कि उन्हें ऐसा दुर्लभ और रोमांचकारी दृश्य देखने को मिलेगा। पर्यटकों के साथ भ्रमण में गये गाइड पुनीत शर्मा ने बताया कि मड़ला प्रवेश द्वार से लगभग 8 किमी दूर मगर डबरी के पास टू इन नाका में स्थित गुंजा के विशालकाय वृक्ष की डाल में नर-मादा तेंदुओं का जोड़ा बैठा हुआ था। जबकि निकट ही रोड के दूसरी तरफ बाघिन पी-141 चहल कदमी करते हुये नजर आ रही थी। यह दुर्लभ नजारा जब पर्यटकों ने देखा तो अवाक रह गये।

बाघिन के डर से पेड़ में चढ़े


पन्ना टाईगर रिजर्व के टूरिस्ट गाइड पुनीत शर्मा ने बताया कि मेटिंग सीजन के चलते नर व मादा तेंदुआ जंगल में एक साथ थे, लेकिन अचानक वहां पर बाघिन-141 का आगमन हो गया। ऐसी स्थिति में बाघिन से भयभीत होकर तेंदुओं का यह जोड़ा देखते ही देखते गुंजा के पेड़ में चढ़ गया। सुरक्षित ऊँचाई में पहुँचने पर दोनों एक मोटी डाल में बैठकर आराम फरमाने लगे। आधा दर्जन वाहन व पर्यटकों के पहुँचने पर तकरीबन 15 मिनट बाद तेंदुआ का यह जोड़ा पेड़ से उतरकर हिनौता रेन्ज के पहाड़ पर चढ़ गया। जबकि बाघिन वहीं निकट ही जंगल में आधा घण्टे तक चहल कदमी करती रही।

टाईगर रिजर्व का बढ़ा है आकर्षण


पार्क भ्रमण में आने वाले पर्यटकों को टाईगर दिखने से अब पन्ना टाईगर रिजर्व का आकर्षण दिनों दिन बढ़ रहा है। विगत वर्षों की तुलना में पर्यटकों की संख्या के साथ-साथ राजस्व में भी इजाफा हुआ है। मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में 30 से भी अधिक बाघ हैं, जबकि तेंदुओं की संख्या 70 से 75 बताई जा रही है। इनके अलावा यहां के जंगल में भालू, सांभर, चीतल, चिंकारा व चौसिंगा प्रचुरता से देखने को मिलते हैं। पार्क के मध्य से प्रवाहित होने वाली केन नदी की बलुई चट्टानों में धूप सेंकते मगर को देखकर पर्यटक रोमांच से भर जाते हैं। पन्ना टाईगर रिजर्व के जंगल में पक्षियों की भी 2 सौ से भी अधिक प्रजातियां मौजूद हैं, यहीं वजह है कि पक्षी दर्शन के शौकीन पर्यटक भी बड़ी संख्या में आ रहे हैं।
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Monday, February 5, 2018

केन नदी में रेत के अवैध उत्खनन पर नहीं लग रहा अंकुश



  •   खनिज एवं पर्यावरण संबंधी नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां
  •   स्वीकृत क्षेत्र के बाहर मशीनों से हो रहा रेत का अवैध उत्खनन



अरुण सिंह,पन्ना। रेत के अवैध उत्खनन को लेकर पन्ना जिले का अजयगढ़ क्षेत्र इस समय सुर्खियों में है। केन नदी में हर तरफ भारी वाहन दैत्याकार मशीनों से बड़े पैमाने पर रेत का उत्खनन किया जा रहा है, जिससे खनिज एवं पर्यावरण संबंधी नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं। कलेक्टर पन्ना मनोज खत्री के आदेश पर बीते माह अवैध उत्खनन के खिलाफ चलाये गये अभियान के बावजूद रेत माफियाओं के हौसले बढ़े हुये हैं। केन नदी में स्वीकृत रेत खदानों के अलावा उन क्षेत्रों में भी व्यापक  पैमाने पर अवैध उत्खनन चल रहा है जहां कोई खदान मंजूर नहीं है। रेत की इस लूट में लिप्त माफियाओं द्वारा पुलिस की अपहरणकाण्ड में व्यस्तता का भी भरपूर फायदा उठाया गया है। विगत एक सप्ताह से अजयगढ़ क्षेत्र में रेत का अवैध कारोबार कई गुना अधिक हो गया है।
उल्लेखनीय है कि स्वीकृत खदानों के ठेकेदार जहां निर्धारित क्षेत्र के बाहर बेखौफ होकर खुलेआम रेत का अवैध उत्खनन करा रहे हैं, वहीं केन नदी में एक दर्जन से भी अधिक स्थलों पर माफियाओं द्वारा पूर्णरूपेण अवैध रेत खदानें चलाई जा रही हैं। भारी भरकम मशीनों से हो रहे व्यापक उत्खनन के चलते पर्यावरण को जहां भारी नुकसान हो रहा है वहीं केन नदी का वजूद भी संकट में पड़ गया है। नियम व कानून को तांक में रखकर अनियन्त्रित उत्खनन से जलीय जीव-जन्तु व वनस्पतियां खत्म हो रही हैं, जिसका दूरगामी प्रभाव पर्यावरण पर पडऩे की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। मालुम हो कि विगत एक सप्ताह से जिले की पुलिस डायल 100 अपहरणकाण्ड में व्यस्त रही है। पुलिस अधिकारियों की इस व्यस्तता का रेत माफियाओं ने भरपूर फायदा उठाया है, दिन ढलने के साथ ही दैत्याकार मशीनें रेत निकालने में जुट जाती हैं। केन नदी की रेत खदानों में पूरी रात ट्रकों व डम्फरों की लाइन लगने से यहां पूरी रात गहमा-गहमी मची रहती है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार केन नदी के जिगनी घाट में फिर से अवैध उत्खनन शुरू हो गया है। यहां शाम होते ही जेसीबी व पोकलैन मशीनों को उतार दिया जाता है जो पूरी रात केन नदी का सीना छलनी करते हुये रेत निकालती हैं। यहां से निकलने वाली रेत को परिवहन कराने में पड़ोसी खदानों के ठेकेदार अहम भूमिका निभाते हैं। जिन स्वीकृत खदानों में पर्याप्त रेत नहीं है, वहां के ठेकेदार पिटपास की बिक्री के धन्धे में लिप्त हैं। जिसके चलते अस्वीकृत खदानों की रेत का परिवहन भी वैध तरीके से हो रहा है। डिजियाना कम्पनी द्वारा बीरा में संचालित रेत खदान में भी यह गोरखधन्धा चल रहा है। केन नदी की भीना चांदीपाठी रेत खदान का संचालन भी स्वीकृत क्षेत्र से बाहर बड़े क्षेत्र में हो रहा है। मझगांय खदान में रेत नहीं है जिसके पिटपासों की बिक्री होती है, फलस्वरूप मझगांय व मोहाना क्षेत्र से बड़े पैमाने पर रेत की निकासी हो रही है।

प्रतिबन्ध के बावजूद मशीनों से उत्खनन


नदी के प्रवाह क्षेत्र में भारी भरकम मशीनों का उपयोग कर रेत के उत्खनन पर कानूनी तौर पर प्रतिबन्ध के बावजूद केन नदी की रेत खदानों में दैत्याकार मशीनों का खुलेआम उपयोग किया जा रहा है। इतना ही नहीं केन नदी में पानी के भीतर से भी रेत निकाली जा रही है। यदा कदा पुलिस व राजस्व अमले द्वारा कार्यवाही किये जाने के बावजूद रेत के उत्खनन में मशीनों का उपयोग बन्द होने के बजाय मशीनों की तादाद और बढ़ गई है। इससे पता चलता है कि रेत की लूट में लिप्त माफिया कितने बेखौफ और ताकतवर हैं जिन्हें नियम और कानून का भी कोई भय नहीं है।

अवैध उत्खनन पर 1.67 करोड़ का जुर्माना

रेत के अवैध उत्खनन को रोकने के लिये प्रशासन द्वारा पूर्व में दर्जनों जेसीबी मशीनों को जब्त कर अस्थाई पुलों व मार्गों को ध्वस्त किया गया था। अवैध उत्खनन करने वाले माफियाओं पर 1 करोड़ 67 लाख रू. का जुर्माना भी लगाया गया। यह कार्यवाही मोहाना, जिगनी, चंदौरा, बरौली व रामनई खदान क्षेत्रों पर की गई, इसके बावजूद रेत का अवैध उत्खनन थमने का नाम नहीं ले रहा। केन नदी की सहायक रून्ज व बागैं नदी में भी बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन होने की जानकारी मिली है। धरमपुर थानान्तर्गत इन नदियों के आस-पास स्थित ग्रामों में बिना किसी मंजूरी के बालू के डम्प नजर आते हैं, जिससे पता चलता है कि जिले में रेत का कारोबार कितने बृहद रूप में चल रहा है।
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