Sunday, September 15, 2019

बरबीरा बांध के पानी से खेती बनेगा लाभ का धन्धा

  •   बराछ गाँव के पास बरबीरा नाले में बनकर तैयार हुआ बांध
  •   7 करोड़ रू. की लागत वाले इस डेम से 11सौ एकड़ में होगी सिंचाई
  •   बराछ सहित नजदीकी पाँच गाँव के किसानों को मिलेगा लाभ


बराछ गांव के  पास बरबीरा नाले में नवनिर्मित सिंचाई बांध। 

 अरुण सिंह,पन्ना। सिंचाई सुविधाओं के बिना खेती से अच्छा उत्पादन लेने तथा खेती को लाभ का धन्धा बनाने की कल्पना नहीं की जा सकती। कृषि योग्य भूमि तेजी से बढ़ती आबादी के अनुपात में बहुत कम है, ऐसी स्थिति में उन्नत कृषि तकनीक का उपयोग व सिंचाई सुविधाओं का विस्तार कर उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि अन्नदाता किसान खुशहाल जिन्दगी जी सके। म.प्र. के पन्ना जिले में वन क्षेत्र अधिक होने के कारण कृषि भूमि सीमित है। इस कृषि भूमि को सिंचित बनाने के लिये जिले में सिंचाई जलाशयों व बांधों का योजनाबद्ध तरीके से इस तरह निर्माण कराया जा रहा है कि अधिक से अधिक कृषि भूमि सिंचित हो सके और किसान आराम से दो फसल ले सकें। जिले में केन नदी के तेन्दूघाट पर बनकर तैयार हुई पवई मध्यम सिंचाई परियोजना के साथ ही रून्ज व मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण का कार्य अब तेजी से शुरू किया गया है। इन बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के अलावा जिले में छोटे किन्तु बेहद उपयोगी तालाबों का भी निर्माण कराया गया है, जिनमें बराछ गाँव के पास बनकर तैयार हुआ बरबीरा बांध है।

बांध बनने से होने वाले लाभ की जानकारी देते किसान।

जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 20 किमी दूर बराछ गाँव के निकट बरबीरा नाला पर बना यह बांध बराछ सहित इटवांकला, गौरा, शिवराजपुर व पिपरी गाँव के किसानों के लिये वरदान साबित होगा। अंग्रेजी अक्षर यू के आकार में बने इस बेहतरीन बांध की लोकेसन इतनी अच्छी है कि अल्प बारिश में ही यह पानी से लबालब भर जायेगा। इसकी वजह बरबीरा नाला है जिसके प्रवाह क्षेत्र में इस बांध का निर्माण कराया गया है। मालुम हो कि बरबीरा नाला पन्ना टाईगर रिजर्व के जंगल से निकला है, इसकी विशेषता यह है कि थोड़ी बारिश होने पर ही जंगल व पहाड़ों का पानी सिमटकर इस नाले से बहने लगता है। बरबीरा नाले में पानी की आवक इतनी अधिक है कि तेज बारिश होने पर 24 घण्टे में ही यह बांध भर जायेगा। जाहिर है कि इस बांध के बन जाने से बराछ सहित पाँच गाँव के किसानों को अल्प वर्षा होने की स्थिति में भी सिंचाई के लिये पर्याप्त पानी मिल सकेगा। बरबीरा गांध का निर्माण कराने वाले कान्ट्रेक्टर रामबाबू सिंह ने जानकारी देते हुये बताया कि 7 करोड़ रू. की लागत वाले इस बांध की सिंचाई क्षमता 11सौ एकड़ है। बांध से साढ़े पाँच किमी लम्बी नहर का निर्माण भी कराया जा चुका है, जिससे खेतों तक पानी पहुँचेगा।

इस वर्ष भरेंगे सिर्फ 33 फीसदी पानी


 बरबीरा बांध से निकली नहर का दृश्य।
बरबीरा बांध चूंकि इसी वर्ष बनकर पूरा हुआ है, इसलिये प्रथम वर्ष बांध में क्षमता का 33 फीसदी पानी ही भरा जायेगा। अगले साल से क्षमता के अनुरूप बांध में लबालब पानी रहेगा। मालुम हो कि पन्ना जिले में इस वर्ष अभी तक औसल से भी कम 829 मिमी वर्षा हुई है जबकि पन्ना जिले की औसत वर्षा 1176.4 मिमी है। अल्प वर्षा के चलते पन्ना शहर के आस-पास स्थित जलाशय अभी तक नहीं भर पाये हैं। लेकिन बरबीरा जलाशय के गेट पूरे खुले हैं। फलस्वरूप नहर से लगातार पानी बह रहा है। इसके बावजूद बांध में पानी भरा हुआ है। तकनीकी अधिकारियों के मुताबिक बारिश का सिलसिला खत्म होने के बाद बांध का स्लूश गेट बन्द कर दिया जायेगा, फलस्वरूप पर्याप्त पानी बांध में भर जायेगा।

किसान खेतों में ले सकेंगे दो फसल


सिंचाई की सुविधा मिलने से इस क्षेत्र के किसान अपने खेतों में अब दो फसल ले सकेंगे। बराछ गाँव के जयमंगल सिंह , द्वारका पटेल व भोपाल सिंह  ने बताया कि बहुत अच्छा और मजबूत बांध बना है, इस बांध के बन जाने से इस पूरे इलाके में खुशहाली आयेगी। जिन खेतों में सिर्फ मूँग, उड़द और तिली की ही फसल ले पाते थे, वहां भी अब गेंहूँ की अच्छी पैदावार होगी। इन किसानों ने बतााय कि बरबीरा नाला जंगली नाला है, जिसका पानी बारिश में बहकर बर्वाद हो जाता था। अब यह पानी बांध में भरेगा जिसे सिंचाई के लिये उपयोग किया जा सकेगा। किसानों ने बताया कि बांध के बनने से कृषि भूमि की कीमत भी बढ़ गई है।

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Saturday, September 14, 2019

दुर्लभ वन्यजीव पैंगोलिन के अंगों सहित चिकित्सक गिरफ्तार

  •   एसटीएफ जबलपुर की टीम ने सूचना मिलने पर की कार्यवाही
  •   पैंगोलिन के शिकार व तस्करी से जुड़े हैं चिकित्सक के तार


 दुर्लभ वन्य जीव पैंगोलिन। (फाइल फोटो)

अरुण सिंह,पन्ना। घने जंगल व विभिन्न प्रजातियों के दुर्लभ वन्यजीवों के लिये प्रसिद्ध म.प्र. के पन्ना जिले में हर समय शिकारियों व तस्कारों की नजरें गड़ी रहती हैं। यहां के जंगलों में पाये जाने वाले संकटग्रस्त दुर्लभ वन्य प्राणी पैंगोलिन के अवैध शिकार व उसके अंगों की तस्करी के मामले में एसटीएफ जबलपुर की टीम ने जिला मुख्यालय पन्ना से एक झोलाछाप चिकित्सक को गिरफ्तार किया है। एसटीएफ की टीम ने इस कथित चिकित्सक के कब्जे से पैंगोलिन के  12 नग शल्क बरामद किये हैं।

गिरफ्तार आरोपी के साथ एसटीएफ जबलपुर की टीम।

मामले के संबंध में जानकारी देते हुये उत्तर वन मण्डल पन्ना के डीएफओं नरेश सिंह यादव ने आज बताया कि मुखबिर की सूचना मिलने पर जबलपुर एसटीएफ की टीम व वन अमले द्वारा संयुक्त रूप से कार्यवाही की गई है। विदित हो कि शुक्रवार 13 सितम्बर की रात एसटीएफ जबलपुर की टीम अचानक पन्ना पहुँची और डायमण्ड चौराहा जगात चौकी के पास दबिश देकर आरोपी चिकित्सक तपश राय को दबोच लिया। एसटीएफ की टीम आरोपी को लेकर सीधे डीएफओ उत्तर वन मण्डल पन्ना के कार्यालय में पहुँची और देर रात तक पूछताछ करती रही। ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि आरोपी से सघन पूछताछ करने पर पैंगोलिन के शिकार व तस्करी में लिप्त अन्य आरोपियों का भी खुलासा हो सकता है।

पैंगोलिन की 12 नग शल्क बरामद


 आरोपी से बरामद पैंगोलिन के 12 नग शल्क।
आरोपी झोलाछाप चिकित्सक तपश राय तनय गुरूपत राय के सब्जे से एसटीएफ की टीम ने संकटग्रस्त वन्यजीव पैंगोलिन के 12 स्केल(शल्क) सहित मोबाइल व एक मोटरसाइकिल बरामद की है। आरोपी चिकित्सक के खिलाफ वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 9, 39, 49 एवं 51 के तहत मामला दर्ज किया गया है। डीएफओ उत्तर नरेश सिंह यादव ने बताया कि एसटीएफ जबलपुर की टीम में शैलेन्द्र कुमार (एएसआई), मनीष तिवारी, नीतेश दुबे, हर्षवर्धन तिवारी, दिलावर सिंह तथा निर्मल सिंह सभी आरक्षक शामिल थे। एसटीएफ टीम व वन अमले द्वारा पैंगोलिन के शिकार व तस्करी के इस सनसनीखेज मामले की गहराई के साथ  छानबीन की जा रही है।

संरक्षण अधिनियम की अनुसूची प्रथम में आता है पैंगोलिन

दुर्लभ वन्य प्राणी पैंगोलिन के शरीर शरीर पर बालों के गुच्छे(कैरेटाइन) सख्त होकर सेल में रूपांतरित हो जाते हैं और रक्षा कवच बनाते हैं। भारत में यह प्रजाति संरक्षित है, इसे वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची प्रथम में रखा गया है। यह बंगलादेश, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल, ताइवान, थाईलैण्ड और वियतनाम में राष्ट्रीय और उपराष्ट्रीय कानूनों से संरक्षित है। लगभग 100 सेमी. की लम्बाई वाला यह प्राणी खतरे का आभास होते ही अपने शरीर को गेंद की तरह गोल बनाकर निर्जीव की तरह पड़ा रहता है। इस शक्ल में पेंगोलिन ऐसा प्रतीत होता है मानो जमीन में भूरे या पीले रंग का कोई गोल पत्थर पड़ा है। वन अधिकारियों के मुताबिक पेंगोलिन का पूरा शरीर एक-दूसरे पर चढ़े हुये पीले भूरे रंग के शल्कों से ढँका रहता है। अत्यधिक कठोर ये शल्क पेंगोलिन के लिये रक्षा कवच साबित होते हैं। लभग 5 से 9 किग्रा. वजन वाले इस दुर्लभ प्राणी का शरीर सिर, गर्दन, धड़ व पूँछ में विभक्त रहता है। अत्यधिक चौकन्ना होकर धीमी चाल से जब पेंगोलिन चलता है तो उसकी पीठ ऊपर उठी रहती है। इस अनूठे वन्यजीव का उपयोग सेक्सुअल पावर बढ़ाने की दवाईयां बनाने में उपयोग होने के चलते तस्करों की नजर इस पर बनी रहती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक पेंगोलिन के अंगों की कीमत लाखों में होती है, अत्यधिक माँग के चलते यह वन्यजीवन विलुप्ति की कगार पर जा पहुँचा है।

अनोखा है भोजन करने का तरीका


पेंगोलिन एक रात्रिचर प्राणी है जिसका मुख्य आहार चीटियां, दीमक व उनके अण्डे हैं। इस विचित्र जीव का भोजन करने का तरीका भी अनोखा है। यह अपनी लगभग 30 सेमी. लम्बी चिपचिपी जीभ को चीटियों व दीमक के घरों में डालकर चुपचाप पड़ा रहता है। जब चीटियां व दीमक इसकी जीभ में चिपक जाते हैं तो यह जीभ को मुँह के भीतर खींचकर उन्हें चट कर जाता है। जानकार यह बताते हैं कि गठिया बात, बबासीर व भगंदर जैसे असाध्य रोगों के लिये भी पेंगोलिन के अंगों का उपयोग किया जाता है। भूत-प्रेत की छाया से बचने के लिये भी इसकी हड्डियों की अंगूठी पहनने का रिवाज है। ऐसी अवैज्ञानिक धारणाओं और अंधविश्वास के चलते ही यह अद्भुत प्राणी अब दुर्लभ हो गया है।

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पन्ना के बृजेश उपाध्याय को मिला 29 कैरेट 46 सेंट का नायाब हीरा

  •  गरीब मजदूर मोतीलाल को 8 माह पूर्व मिल चुका है 42. 59 कैरेट का बेशकीमती हीरा 
  •   44 कैरेट वजन का सबसे बड़ा हीरा 58 वर्ष पूर्व 1961 में रसूल मोहम्मद को मिला था 
  •  रत्नगर्भा पन्ना की धरती ने अब तक अनेकों लोगों बनाया है रंक  राजा 


उथली खदान से मिला नायाब हीरा तथा हीरा धारक बृजेश उपाध्याय को जमा करने  रशीद प्रदान करते हुए कलेक्टर कर्मवीर शर्मा  

 अरुण सिंह,पन्ना। मध्यप्रदेश के  पन्ना जिले की रत्नगर्भा धरती में  फिर एक 29.46 कैरेट वजन का बेशकीमती हीरा पन्ना शहर के बड़ा बाजार निवासी बृजेश उपाध्याय को मिला है।  इसके पूर्व 8 माह पहले पन्ना के ही गरीब मजदूर  मोती लाल को 42 कैरेट 59 सेंट वजन का बेशकीमती नायाब हीरा मिला था। यह 42.59 कैरेट वजन वाला नायाब हीरा खुली नीलामी में  6 लाख रू. प्रति कैरेट की दर से 2 करोड़ 55 लाख रू. में बिका था, जिसे झांसी उ.प्र. के निवासी राहुल अग्रवाल ने खरीदा था। शुक्रवार 13 सितम्बर को जमा हुये  नायाब हीरे की अनुमानित कीमत अधिकृत रूप से अभी नहीं बताई गई लेकिन जानकार इसकी कीमत करोड़ों रू. बता रहे हैं। मालुम हो कि इस माह बीते 15 दिनों में जिला मुख्यालय स्थित हीरा कार्यालय में उज्जवल किस्म के चार  हीरे जमा हो चुके हैं लेकिन बीते 8 माह के दौरान उथली
 खदानों से दो बड़े और नायाब हीरे मिले हैं, जिससे उथली हीरा खदानों के प्रति तुआदारों का जबरजस्त आकर्षण बढ़ा है। मालूम हो कि  जिले की उथली हीरा खदानों से हीरा मिलने का सिलसिला लगातार जारी है जिससे हीरों की तलाश करने वाले लोगों में जहां भारी उत्साह है वहीं हीरा कार्यालय में भी खुशी का माहौल है।
 हीरा अधिकारी कार्यालय द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार पन्ना  कलेक्टर कर्मवीर शर्मा के मार्गदर्शन में अवैध खनिज उत्खनन एवं परिवहन पर कडाई से निगरानी रखी जा रही है। जिससे जिले की उथली खदानों से लगातार प्राप्त होने वाले हीरे कार्यालय में जमा हो रहे हैं। जिले के कृष्णाकल्याणपुर (पटी) क्षेत्र में  बृजेश कुमार उपाध्याय निवासी बडा बाजार पन्ना को हीरा कार्यालय द्वारा उत्खनन पट्टा जारी किया गया था। फलस्वरूप उसे यहाँ  29.46 कैरेट का उज्जवल हीरा प्राप्त हुआ है। प्राप्त हीरे को कलेक्टर कर्मवीर शर्मा की उपस्थिति में हीरा कार्यालय में जमा कराने की कार्यवाही की गयी। कलेक्टर द्वारा हीरा प्राप्त करने वाले व्यक्ति को हीरा कार्यालय में पावती रसीद दी गयी। जिले की उथली खदानों से प्राप्त होने वाले हीरे पिछले कुछ समय से बड़ी संख्या में जमा हो रहे हैं जिससे शासन की राजस्व आय में इजाफा हो रहा है।  उथली खदानों से लगातार मिल रहे बेशकीमती हीरों को देखते हुये हीरों की तलाश में जुटे लोग उत्साहित हैं, उन्हें उम्मीद है कि किसी दिन उनका भाग्य भी चमकेगा।

गौरतलब है कि पलक झपकते ही रंक से राजा बनने का चमत्कार यदि कहीं घटित होता है तो वह रत्नगर्भा पन्ना जिले की धरती है। इस धरती की यह खूबी है कि अचानक ही यहां पर कब किसकी किस्मत चमक जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसा ही कुछ 13 सितम्बर शुक्रवार की सुबह पन्ना शहर के बड़ा बाजार   निवासी बृजेश उपाध्याय की जिन्दगी में घटित हुआ। बृजेश उपाध्याय को 29  कैरेट 46 सेंट वजन का बेशकीमती नायाब हीरा मिला है, जेम क्वालिटी(उज्जवल)  वाले इस हीरे की कीमत करोड़ों रू. बताई जा रही है। हीरा कार्यालय पन्ना के अधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इसके पूर्व 15 अक्टूबर 1961 में पन्ना के ही रसूल मोहम्मद को महुआटोला की उथली खदान में 44 कैरेट 55 सेंट का सबसे बड़ा हीरा मिला था। कृष्णा कल्याणपुर की पटी उथली हीरा खदान से बीते 9 माह के दौरान 42 कैरेट 59 सेंट एवं 29  कैरेट 46 सेंट वजन के दो बड़े व बेशकीमती हीरे मिल चुके हैं जिससे उथली हीरा खदान क्षेत्र के प्रति हीरों की तलाश करने वाले तुआदारों का आकर्षण बढ़ा है।

 नीलामी में रखा जायेगा यह नायाब हीरा


जिला मुख्यालय पन्ना स्थित हीरा कार्यालय के हीरा पारखी अनुपम सिंह  के अनुसार बृजेश उपाध्याय को मिला हीरा वजन और क्वालिटी के लिहाज से  बहुमूल्य हीरा है, जिसे सरकारी खजाने में जमा कर लिया गया  है।  हीरा पारखी  ने बताया कि प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात आगामी माह में आयोजित होने वाली हीरों की शासकीय नीलामी में  इस हीरे को भी बिक्री के लिये रखा जायेगा। बहुमूल्य हीरा मिलने की खबर फैलने के बाद से बृजेश उपाध्याय के घर पर उत्सव जैसा माहौल है। उनके घर पर परिचितों और रिश्तेदारों का आना-जाना लगा है।
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Wednesday, September 11, 2019

कांग्रेस ने गिनाई उपलब्धियां तो भाजपा ने किया घण्टानाद

  • जिला मुख्यालय में  पूरे दिन रही राजनीतिक गहमा - गहमी
  •  दोनों ही  दलों के नेताओं ने एक दूसरे पर साधा निशाना 


सरकिट हाउस पन्ना में आयोजित प्रेस वार्ता में उपलब्धियां गिनाते  हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति दिव्यारानी। 

अरुण सिंह,पन्ना। जिला मुख्यालय पन्ना में बुधवार को आज पूरे दिन राजनीतिक गहमा - गहमी बनी रही। कांग्रेस ने जहाँ दोपहर 12 बजे सरकिट हाउस में प्रेस वार्ता आयोजित करके प्रदेश सरकार की उपलब्धियों का बखान किया, वहीँ भाजपा ने भी ठीक इसी समय घण्टानाद आंदोलन के जरिये कांग्रेस सरकार की नाकामियों पर प्रकाश डालते हुए आक्रामक तेवर दिखाये।
उल्लेखनीय है कि  प्रदेश सरकार के 8 माह पूरे होने के उपलक्ष्य में जिला कांग्रेस कमेटी पन्ना की अध्यक्ष श्रीमति दिव्यारानी सिंह  ने प्रेसवार्ता आयोजित कर सरकार की उपलब्धियों और जन कल्याण की योजनाओं के संबंध में जानकारी दी। पन्ना जिले के संदर्भ में आपने कहा कि बीते 8 माह के दौरान जिले के विकास तथा यहां के शिक्षित बेरोजगार युवकों को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिये अनेकों कदम उठाये गये हैं। जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने बताया कि शहर के प्राचीन जलाशयों को अतिक्रमण से मुक्त करने तथा बारिश के मौसम में वे भर सकें, इस दिशा में किलकिला फीडर को भी पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त करने की पहल शुरू कर दी गई है। ऐसा होने पर प्राचीन धरमसागर तालाब सहित लोकपाल सागर तालाब पानी से लबालब भर सकेंगे, फलस्वरूप नगरवासियों को जल संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार अपने वायदों को पूरा करने के लिये वचनबद्ध है और इस दिशा में ठोस पहल व प्रयास शुरू हो गये हैं। आपने बताया कि राम वन पथ गमन मार्ग के विकास हेतु सरकार ने बजट का प्रावधान कर दिया है। राम वन पथ गमन मार्ग में पन्ना जिले के भी दो प्रमुख स्थल सुतीक्षण मुनि आश्रम सारंगधर व अगस्त्य मुनि आश्रम आते हैं, इन धार्मिक  महत्व के प्राचीन स्थलों का अब विकास हो सकेगा। इस मौके पर उन्होंने भाजपा सरकार की आलोचना करते हुये कहा कि उन्होंने सिर्फ घोषणायें की थीं, जबकि कांग्रेस सरकार जो कहा उसे करने में यकीन करती है। जिले के शिक्षित युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिये भी सरकार कटिबद्ध है, इसके लिये 1500 करोड़ रू. की लागत वाली सीमेण्ट फैक्ट्री सिमरिया के पास लग रही है, जहां 70 फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। आपने बताया कि शहर के गन्दे नालों विशेषकर किलकिला नदी को साफ स्वच्छ रखने के लिये ट्रीटमेन्ट प्लांट लगाने की दिशा में भी पहल की जा रही है। मौजूदा समय किलकिला नदी में पूरे शहर का गन्दा नालियों का पानी जाता है। इस पानी का उपयोग सब्जी उगाने वाले किसान सिंचाई के लिये करते हैं, जिससे सब्जियां दूषित व स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद हो जाती हैं। ट्रीटमेन्ट प्लांट लगने से इस समस्या का निराकरण हो जायेगा। जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी बताया कि प्रदेश सरकार नई डायमण्ड पॉलिसी भी लाने जा रही है, जिसका लाभ हीरा धारकों को मिलेगा। प्रेसवार्ता में जिला कांग्रेस अध्यक्ष के अलावा पूर्व गृहमंत्री कैप्टन जयपाल सिंह  , जिला पंचायत सदस्य केशव प्रताप सिंह, मनीष शर्मा, दीपचन्द्र अग्रवाल सहित कांग्रेसजन व पत्रकार मौजूद रहे।

भाजपा ने घण्टानाद आन्दोलन कर कलेक्ट्रेट का किया घेराव


इंद्रपुरी कॉलोनी स्थित पार्क के सामने आयोजित सभा को सम्बोधित करते भाजपा  नेता। 

 भारतीय जनता पार्टी ने अपने पूर्व घोषित घण्टानाद आन्दोलन को आज इन्द्रपुरी कालोनी स्थिति चन्द्र शेखर पार्क से प्रारंभ किया और घण्टा, शंख, बर्तन व सीटी बजाते हुये जिला कलेक्टर कार्यालय पहुँचे और कार्यालय का घेराव किया। सर्वप्रथम भाजपाईयों ने मंचीय सभा की और भाजपा के नेताओं ने कांग्रेस सरकार की नाकामियों का जमकर बखान किया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुये भाजपा के प्रदेश मंत्री व पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह  ने कहा कि मध्यप्रदेश में पिछले 9 माह से कांग्रेस की सरकार चल रही है निश्चित ही कांग्रेस के पास सरकार चलाने के लिये अपना स्वयं का बहुमत नहीं है इसलिये वह अन्य दलों व निर्दलीय विधायकों की मान मनुहार पर टिकी हुई है। भारतीय जनता पार्टी ने निरंतर एक सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाई लेकिन सरकार ने इस सद्भावना को विपक्ष की और मध्यप्रदेश की जनता की कमजोरी समझने की भूल की है। यही कारण है कि सरकार निरंतर निरंकुशता की ओर बढ़ते हुये प्रदेश को बदनाम और बर्बाद करने के रास्ते पर निकल पड़ी है, मध्यप्रदेश की ऐसी बुरी स्थिति कर दी है जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने कहा कि एक ओर जहां जनहित के सारे काम ठप्प पड़े हैं वहीं दूसरी ओर उन सभी जन कल्याणकारी योजनाओं को बन्द कर दिया गया है जो योजनायें भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने शुरू की थीं। उन्होंने कहा की मध्यप्रदेश का किसान दोहरे और तेहरे धोखे का शिकार हुआ है पहला कर्ज माफी  के झूठ ने उसे डिफाल्टर बना दिया और वह आगामी फसल के लिये खाद बीज तक नहीं खरीद पा रहा है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में ट्रांसफर उद्योग चला बिजली गुल होने लगी और सरकार अपना वादा नहीं निभा पाई।
इस अवसर पर पार्टी जिला अध्यक्ष सतानांद गौतम ने कहा कि युवा किसी भी समाज और देश का भविष्य होता है और उसी युवा को प्रारंभिक काल में कांग्रेस सरकार से धोखाधड़ी का शिकार होना पड़े तो सोचिये व्यवस्था से उसका विश्वास किस कदर उठ जायेगा। कांग्रेस की सरकार ने मध्यप्रदेश के युवाओं को रोजगार और बेरोजगारी भत्ता देने के वादे के साथ जो छलावा किया है वह एक गंभीरतम अपराध है। सभा को सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष संजय नगायच, पूर्व जिला अध्यक्ष जय प्रकाश चतुर्वेदी, वरिष्ठ नेता सुधीर अग्रवाल,  राजेश वर्मा, आशुतोष महदेले, बाबू लाल यादव, जिला पंचायत अध्यक्ष रविराज यादव, उपाध्यक्ष मानवेन्द्र सिंह , सुशील त्रिपाठी, संजीत सरकार, श्रीकान्त त्रिपाठी, बृजेन्द्र गर्ग, तरूण पाठक व आशा गुप्ता ने भी संबोधित किया।
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बीज के भीतर छिपी होती हैं जीवन की असीम संभावनायें

  • अनुकूल वातावरण मिलने पर अन्तर्निहित सम्भावनायें होती हैं साकार                                      
  • एक छोटा सा बीज पूरी पृथ्वी को बना सकता है हरा - भरा                                                                                                                      



अंडे दुनिया की सबसे पवित्र चीजों में शामिल हैं। उनमें जीवन की संभावना छिपी होती है। आने वाला जीवन उनमें दुबक कर बैठा होता है। चुपचाप बैठे-बैठे वह जनम लेने की तैयारी करता है। पड़े-पड़े वह अचानक ही सांस लेने लगता है। सोते-सोते जाग जाता है। जब तक वह अंदर है। बाहर की दुनिया को कुछ भी जाहिर नहीं है। बाहर की दुनिया बस उस खोल को देखती है, जिसके अंदर कुछ हलचल हो रही है। लेकिन, अंदर क्या हो रहा है, किसी को क्या पता।
अंदर जो जीवन है, वह आगे बढ़ भी रहा है या उसमें जो जीवन पनप सकता था उसकी संभावना ही क्षीण हो गई। समाप्त हो गई। ऐसे ही बीज भी पवित्र हैं। बीज पेड़ों के अंडे होते हैं। उनके अंदर भी अपने मां-बाप के जैसा ही पेड़ बनने की संभावना छिपी होती है। बीज बहुत छोटे होते हैं। बरगद, पीपल के विशाल दरख्तों के बीज कैसे सुई की नोंक के बराबर छोटे-छोटे से दाने जैसे होते हैं। इतने छोटे और तुच्छ कि किसी चिड़िया की एक बीट में हजारों बीज समा जाते हैं। इन बीजों में भी जीवन सोता रहता है। अंडों में जीवन की नींद उतनी गहरी नहीं है। अंडे लंबे वक्त तक नहीं सोते। उनमें या तो जीवन पनपेगा या नष्ट हो जाएगा। उसके पनपने की संभावना ही समाप्त हो जाएगी। उसकी समयावधि तय है। उससे आगे जाने की उसकी संभावना नहीं है। लेकिन, बीज बहुत दिनों तक सोते रहते हैं। कई बार पचासियों सालों तक। कई बार सैकड़ों सालों तक। वे चुपचाप पड़े रहते हैं। इंतजार करते हैं। अनुकूल परिस्थितों के आने का। उनके धैर्य का क्या कोई जवाब है। जैसे ही मौसम उनके अनुकूल होता है, वे तुरंत पैदा हो जाते हैं।
चने के बीज सूखे हुए चुपचाप पड़े रहते है। पता नहीं वे आपस में कुछ बात भी कर पाते होंगे कि नहीं। एक दूसरे से सटे हुए वे एक ही डिब्बे में बंद पड़े रहते हैं। किसी बोरे में भरे हुए। एक-दूसरे को छूने से उन्हें कुछ आश्वस्ति मिलती भी होगी कि नहीं। लेकिन वे चुपचाप पड़े रहते हैं। उनके अंदर जीवन भी है, ऐसा जाहिर नहीं है। वे जताते भी नहीं। पर हैं तो वे भी अपने मां-बाप के बच्चे। जीवन जाहिर नहीं, प्रगट नहीं है। पर जीवन मौजूद है। ऐसा जरूरी नहीं है कि जीवन मौजूद हो तो प्रगट ही हो। जीवन बिना प्रगट हुए भी मौजूद हो सकता है। वह अवसर का, अपने मौके का इंतजार करता है। पानी में भिगोने पर चने के यही दाने कुछ ही घंटों में फूल जाते हैं। एक-दो दिन में ही उनके अंदर मौजूद जीवन जाहिर होने लगता है। जीवन का अंकुर फूट पड़ता है। वे जनम लेने लगते हैं। अपनी लंबी नींद से वे जाग उठते हैं। हां, मैं भी हूं इसी दुनिया में। इसी जीवन में। ऐसा हूं मैं। इस दुनिया में मेरी भी एक भूमिका है। मैं भी सांस लूंगा। पानी लूंगा। खाना खाऊंगा। रहूंगा इसी दुनिया में और फिर इस दुनिया में रहने का हक अदा कर जाऊंगा। लेकर नहीं, कुछ देकर ही जाऊंगा इस दुनिया को।
बरसात का मौसम आता नहीं है कि मिट्टी में दबे हुए न जाने कितने अनजान बीज मुस्कुराकर जाग उठते हैं। सोकर उठने के बाद वे अपनी प्यारी सी अंगड़ाइयां तोड़ते हैं। कुछ तो सीधे जमीन के अंदर से अपने हाथ को सिर के ऊपर करके, जोड़े हुए निकल आते हैं। बाहर आकर उनके दोनों हाथ खुल जाते हैं। वे सफेद-सफेद, नर्म, नाजुक से धागे। उनके ऊपर दो जुड़ी हुई हथेलियां, खुल जाती हैं। वे हरी पड़ने लगती हैं। सूरज उन्हें प्यार करता है। धूप उनको खाना देती है। जीवन किलकारियां भरने लगता है।
बीज के अंदर मौजूद जीवन कितने दिन तक जीवित रह सकता है। क्या हजारों साल पहले किसी पेड़ पर उगे बीज आज भी जीवित हो सकेंगे। मुझे लगता है कि बीजों की भी समयावधि तय होती है। कुछ बीज शायद एक हजार साल बाद भी अनुकूल परिस्थियां होने पर जी उठें। पर कुछ बीज हो सकता है कि कुछ ही सालों में नष्ट हो जाएं। अपने अनुकूल समय आने का उनका इंतजार पूरा न हो। वे अंदर बैठे-बैठे इंतजार करते रहें कि समय बदलेगा, उनका वक्त भी आएगा। अच्छे दिन आएंगे। ऐसा भी होगा कि जब वे खुली हवा में सांस ले सकेंगे। जब उनके भी बच्चे होंगे। जब वे भी अपने बीज इस धरती को दे जाएंगे। जब वे भी अपने बीज इन हवाओं, पक्षियों, इंसानों और न जाने किन-किन माध्यमों से धरती के अलग-अलग कोने में बिखेर देंगे। उन्हें पता है कि यह सबकुछ परमार्थ नहीं है। वे सब उसके बीजों को खा जाएंगे। फिर भी कुछ बीज बचे रहेंगे। वे फिर से जनम लेंगे और संतति को आगे बढ़ाएंगे। पर जाहिर है कि हमेशा ऐसा नहीं होता। समय बीतने के साथ ही कुछ बीज बांझ हो जाते हैं। उनके अंदर बैठे जीवन के जनम लेने की संभावना नष्ट हो जाती है। अंदर ही अंदर वे मर चुके होते हैं। न वे जनम लेते हैं और न ही उनकी संततियां ही आगे बढ़ती हैं। उनका अनुकूल समय कभी नहीं आता। अच्छे दिन नहीं आते। उनका इंतजार खत्म नहीं होता।
आपने कभी लंग फिश का नाम सुना है। अफ्रीका के कुछ हिस्सों में लंग फिश पाई जाती है। यह मछली अफ्रीका के कई ऐसे तालाबों में रहती है जो गर्मियों की मार नहीं झेल पाते। लंबी गर्मियों के मौसम में ये सूख जाते हैं। इनका पानी सूखता जाता है। तालाब की पहले गहराई कम होती है। फिर उसकी तली दिखने लगती है। उसमें जमा कीचड़ दिखने लगती है। फिर वह कीचड़ भी सूखने लगती है। उनमें दरारें पड़ जाती हैं। तालाब में रहने वाले बहुत सारे जीव-जंतु मर जाते हैं। या फिर वे भाग जाते हैं। वे ऐसी जगहों पर चले जाते है, जहां पर उन्हें जीवन की ज्यादा अच्छी संभावना मिल सकती है। पर लंगफिश कहीं नहीं जाती। वो उसी कीचड़ में पड़ी रहती है। वो अपने शरीर से एक खास किस्म का स्राव करती है। उससे उसके पूरे शरीर के इर्द-गिर्द एक खोल तैयार होता है। वो उसी खोल में चुपचाप सो जाती है। यह मौत की नींद होती है। चुपचाप सारी चीजें बंद। जैसे वह मर गई हो।
अक्सर ही लोग उस तालाब की मिट्टी को खोद लाते हैं। उसके बड़े-बड़े से डले बनाकर उससे अपने कच्चे घरों की दीवार बना लेते हैं। घर की दीवार खड़ी रहती है। महीनों बीत जाते हैं। गर्मियां बीतती हैं। बरसात का मौसम अच्छा नहीं रहा। बहुत जोर की बारिश नहीं हुई। फिर जाड़ा आ गया। फिर गर्मियां आईं। फिर बरसात का मौसम अच्छा नहीं रहा। बादलों की गड़-गड़ाहट तो बहुत हुई। लेकिन पानी ऐसा नहीं बरसा। ऐसे ही एक-दो-तीन-चार साल बीत गए। फिर बारिश के किसी मौसम में लंगफिश का इंतजार पूरा होता है। हवाएं अपने साथ बादलों का पूरा जत्था खींच लाती हैं। वे जोर-जोर से हांका लगाते हुए बरसने लगते हैं। उनका पानी धरती को तर-बतर कर देता है। सबकुछ भीगने लगता है। मिट्टी की दीवार भी गीली हो जाती है। पानी की नमी उसके अंदर भी जाने लगती है। लंग फिश को अहसास हो जाता है कि बाहर चारों तरफ पानी की बौछार पड़ रही है। अच्छे दिन आ चुके हैं। हर तरफ पानी भरा होगा। गीला होने पर, पानी से भीगने पर मिट्टी की दीवार भी ढीली पड़ जाती है। लंगफिश चुपचाप अपने खोल से निकलती है। वो रेंगते हुए बाहर आती है। वो दीवार से नीचे गिर जाती है। फिर बरसात के पानी के साथ बहते हुए चुपचाप उसी तालाब में पहुंच जाती है, जहां पर वो पैदा हुई थी। यहां पर दोबारा उसे ढेर सारा पानी मिलता है। हां, यही तो वो जीवन है, जिसका वो इंतजार कर रही थी। उसके अंदर के जीवन की संभावना दोबारा पूरी तरह से जाग उठती है। अब फिर से जियेगी, सांस लेगी, अपनी संततियां पैदा करेगी।अपने खोल में सिमटा, सिकुड़ा मैं सोच रहा हूं, मेरा इंतजार कब पूरा होगा।

@ कबीर संजय की फेसबुक वॉल से साभार  
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Tuesday, September 10, 2019

महिला को मिला 5.68 कैरेट का बेशकीमती हीरा

  •   सरकोहा स्थित निजी क्षेत्र की भूमि में लिया था पट्टा
  •   तीन दिन पूर्व इसी क्षेत्र में गरीब युवक को मिला था हीरा



अरुण सिंह, पन्ना। म.प्र. के पन्ना जिले की रत्नगर्भा धरती कब किसको रंक से राजा बना दे, कुछ कहा नहीं जा सकता। बारिश के इस मौसम में जिले की उथली हीरा खदानों से आये दिन हीरा निकल रहे हैं। मंगलवार की सुबह आज सरकोहा स्थित हीरा खदान से धाम मुहल्ला पन्ना निवासी महिला श्रीमति अमरीन सुमेरा को 5.68 कैरेट वजन का बेशकीमती हीरा मिला है। जैम क्वालिटी के इस हीरे का वैलुएशन अभी नहीं हुआ, लेकिन हीरे की उत्तर क्वालिटी को देखते जानकार इसे बेशकीमती बता रहे हैं।
हीरा कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह हीरा पन्ना जिले के सरकोहा स्थित निजी क्षेत्र की भूमि में मिला है। महिला द्वारा निजी क्षेत्र की इस भूमि में 838 मी. का पट्टा नियमानुसार हीरा कार्यालय से मार्च 19 में बनवाया गया था। मंगलवार की सुबह खदान से निकली हीरा धारित चाल की जब धुलाई कराई जा रही थी, उसी समय छोटा सा चमकदार पत्थर नजर आया। जब उसे धोया गया तो पता चला कि यह मामूली पत्थर नहीं बल्कि बेशकीमती हीरा है। पन्ना की रत्नगर्भा धरती से निकले इस हीरे को पाकर अमरीन सुमेरा बेहद खुश है। महिला के पति अब्दुल सलीम ने खुशी व्यक्त करते हुये इस हीरे को ले जाकर आज महेन्द्र भवन स्थित हीरा कार्यालय में जमा करा दिया है। जैम क्वालिटी के इस हीरे को आगामी होने वाली हीरों की नीलामी में बिक्री के लिये रखा जायेगा।

चार दिनों में दो लोगों की चमकी किस्मत

बीते चार दिनों में सरकोहा हीरा खदान क्षेत्र में दो लोगों की किस्मत चमकी है। इस महिला को हीरा मिलने से पूर्व इसी क्षेत्र में एक गरीब युवक को भी लगभग इतने ही वजन का हीरा मिल चुका है। हीरा अधिकारी पन्ना ने बताया कि युवक किशोर कुशवाहा को सरकोहा स्थित खदान से 7 सितम्बर को 5.69 कैरेट वजन का हीरा मिला था, जिसे युवक ने हीरा कार्यालय में जमा करा दिया है। नीलामी में इन हीरों के बिक्री होने पर शासन की रॉयल्टी काटने के बाद शेष पूरी राशि हीरा धारक को प्रदान की जायेगी।
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Monday, September 9, 2019

सीईसी की रिपोर्ट से केन-बेतवा लिंक परियोजना पर लगा गृहण

  •   सर्वोच्च न्यायालय को सेन्ट्रल इम्पावर्ड कमेटी ने सौंपी विस्तृत रिपोर्ट
  •   पर्यावरणीय क्षति को देखते हुये परियोजना के औचित्य पर उठाये सवाल
  •   लिंक परियोजना से बाघों के रहवास व पारिस्थितिकी तंत्र की होगी अपूर्णीय क्षति


 नदी के ईको सिस्टम का जायजा लेती सीईसी टीम। (फाइल फोटो)

 अरुण सिंह,पन्ना। केन्द्र सरकार की बहुप्रतीक्षित महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। शुरूआती दौर से ही विवादों के घेरे में रही इस परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेन्ट्रल इम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) ने अभी हाल ही में जो रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी है, उससे इस परियोजना के भविष्य पर प्रश्र चिह्न खड़ा हो गया है। मालुम हो कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से बाघों के रहवास, पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र की होने वाली अपूर्णीय क्षति की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुये मनोज मिश्रा द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई गई थी। जिसमें यह उल्लेख किया गया था कि पर्यावरणीय अध्ययन में क्षति का सही आँकलन नहीं किया गया है। इस याचिका में उठाये गये सवालों तथा परियोजना की जमीनी हकीकत जानने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने उच्च स्तरीय कमेटी गठित कर उसे मौके पर जाकर जाँचने और सत्यापन के आदेश दिये थे। यह कमेटी 27 मार्च से 30 मार्च 19 तक मौके का जायजा लेने के साथ ही पन्ना टाईगर रिजर्व के अधिकारियों, याचिकाकर्ता सहित अन्य लोगों से चर्चा कर हकीकत जानने का प्रयास किया। पूरे पाँच माह बाद सीईसी ने 93 पृष्ठ की विस्तृत रिपोर्ट 30 अगस्त को सौंपी है, जिसमें कमेटी ने यह माना है कि बेतवा बेसिन में पानी की कमी है लेकिन वहां के  लिये केन नदी और उसके पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह नहीं किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि केन नदी म.प्र. स्थित कैमूर की पहाड़ी से निकलती है और 427 किमी की दूरी तय करने के बाद उ.प्र. के बांदा में यमुना नदी से मिल जाती है। वहीं बेतवा म.प्र. के रायसेन जिले से निकलती है और 590 किमी की दूरी तय करने के बाद उ.प्र. के हमीरपुर जिले में यमुना से मिल जाती है। दोनों नदियों की यदि तुलना की जाये तो बेतवा नदी की लम्बाई केन नदी से 2.19 गुना अधिक है। दोनों नदियों के कछार के क्षेत्रफल में भी काफी अन्तर है। केन का 28,058 वर्ग किमी है जबकि बेतवा का कछार 46,580  वर्ग किमी है जो केन की तुलना में 1.66 गुना बड़ा है। यहां पर यह मौलिक प्रश्र उठता है कि क्या छोटी नदी से बड़ी नदी में पानी को ले जाना तकनीकी रूप से सही है? केन-बेतवा लिंक परियोजना के संबंध में प्रस्तुत की गई पर्यावरणीय अध्ययन रिपोर्ट भी भ्रामक और तथ्यों से परे है। जिसको लेकर पन्ना टाईगर रिजर्व के तत्कालीन क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति  ने विरोध दर्ज कराते हुये वास्तविक तथ्यों से अवगत कराया था। मालुम हो कि पर्यावरणीय अध्ययन में डूब क्षेत्र में आने वाले पीटीआर के 41 वर्ग किमी में 32,900 पेड़ों की गिनती हुई थी, जो कि एक हेक्टेयर में लगभग 8 पेड़ के बराबर है। जब क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिज़र्व श्री मूर्ति के संज्ञान में यह बात आई तो पेड़ों की दुबारा गिनती कराई गई, फलस्वरूप पेड़ों की संख्या बढ़कर 14 लाख पहुँच गई जो पर्यावरणीय अध्ययन रिपोर्ट की संख्या से 43 गुना अधिक है।

केन नदी के किनारे विश्राम करता बाघ परिवार।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र के शुष्क वनों में बाघों का एक मात्र शोर्स पापुलेशन पन्ना टाईगर रिजर्व है, जिसका क्षेत्रफल महज 542 वर्ग किमी है। यह सर्व विदित है कि वर्ष 2009 में यह वन क्षेत्र बाघ विहीन हो गया था, फलस्वरूप यहां पर बाघ पुनर्स्थापना योजना शुरू की गई। इस योजना को चमत्कारिक सफलता मिली और पन्ना टाईगर रिजर्व का जंगल बाघों से फिर आबाद हो गया। पन्ना का गौरव वापस लौटाने से म.प्र. का खोया हुआ गौरव भी हासिल हो गया है। म.प्र. को टाईगर स्टेट का दर्जा दिलाने में पन्ना की अहम भूमिका रही है। अब बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व के भरे-पूरे संसार को फिर से उजाड़े जाने की कोई भी गतिविधि किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती। केन-बेतवा गठजोड़ से डाउन स्ट्रीम के केन घडिय़ाल अभ्यारण्य का जहां वजूद मिट जायेगा वहीं दर्जनों प्रजाति के वन्य प्राणियों व हजारों हेक्टेयर में फैला जंगल भी नष्ट हो जायेगा। पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र की होने वाली इस क्षति की भरपाई कर पाना संभव नहीं है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह के साथ छेड़छाड़ करने का मतलब पारिस्थितिकीय आपदा को बुलाना है।

सेन्ट्रल इम्पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट के मुख्य बिन्दु


पन्ना टाईगर रिजर्व के मध्य से प्रवाहित केन नदी का दृश्य।

0  केन-बेतवा लिंक परियोजना के अन्तर्गत डूब में आने वाला पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र का जंगल पारिस्थितिकी तंत्र और संरचना की दृष्टि से अनूठा है। जैव विविधता के मामले में भी यह क्षेत्र अत्यधिक समृद्ध है। इस तरह के पारिस्थितिकी तंत्र को पुन: विकसित नहीं किया जा सकता।
0  सीईसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि परियोजना के लिये 6017 हेक्टेयर वन भूमि जो अधिगृहित की जा रही है, वह पन्ना टाईगर रिजर्व का न सिर्फ कोर क्षेत्र है अपितु बाघों का प्रिय रहवास भी है। इस वन क्षेत्र के डूब में आने से 10,500 हेक्टेयर वन क्षेत्र और प्रभावित होगा। यह वन क्षेत्र पन्ना टाईगर रिजर्व से पृथक होकर दो टुकड़ों में बँट जायेगा, जिससे वन्य प्राणियों का आवागमन बाधित होगा।
0  परियोजना पर जितना पैसा खर्च होगा उससे प्रति हेक्टेयर सिंचाई  में 44.983 लाख रू. व्यय आयेगा। यदि स्थानीय स्तर पर गाँव के पानी को गाँव में ही रोकने के लिये छोटी परियोजनाओं व जल संरचनाओं पर ध्यान दिया जाये तो कम खर्च में न सिर्फ कृषि भूमि सिंचित हो सकती है अपितु जंगल, बाघ व वन्य प्राणियों के रहवास को भी बचाया जा सकता है।
0  सीईसी ने नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ द्वारा केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के लिये सहमति प्रदान करने के निर्णय पर प्रश्र चिह्न लगाते हुये कहा है कि वन्य प्राणियों के रहवास, अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र व जैव विविधता को अनदेखा किया गया है। डूब क्षेत्र पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर एरिया है, इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया।
0 सेन्ट्रल इम्पावर्ड कमेटी ने रिपोर्ट में  द्रढता के साथ यह बात कही है कि किसी भी विकास परियोजना को देश  में बचे इस तरह के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और बाघों के अति महत्वपूर्ण रहवासों को नष्ट करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिये। बेहतर यह होगा कि इस तरह की परियोजनाओं को  संरक्षित वन क्षेत्रों से प्रथक रखा जाय। संरक्षित वन क्षेत्रों में इस तरह की विकास परियोजनायें न तो वन्य प्राणियों  के हित में हैं और न ही लम्बे समय तक समाज के हित में है।
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Saturday, September 7, 2019

उजड़ चुके वन का सात माह में ही हुआ कायाकल्प

  •   पर्यटन गतिविधियां शुरू होने पर अवैध कटाई सहित शिकार पर भी लगा अंकुश
  •   पर्यटकों के आने से रोजगार के बढ़े अवसर, ग्रामवासियों में उत्साह



पन्ना बफर क्षेत्र में भ्रमण हेतु अकोला प्रवेश द्वार।


अरुण सिंह,पन्ना। पर्यटन गतिविधियां शुरू होने पर सात माह में ही उजड़ा हुआ वन क्षेत्र हरा-भरा और मनोरम दिखने लगेगा, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन जिला मुख्यालय से लगे पन्ना बफर क्षेत्र के जंगल में यह चमत्कार घटित हुआ है। विगत सात माह पूर्व तक यहां सब कुछ अव्यवस्थित और उजड़ा हुआ था। बड़े पैमाने पर अवैध कटाई होने तथा हजारों की संख्या में मवेशियों की हर समय धमाचौकड़ी मची रहने के चलते यह पूरा वन क्षेत्र उजड़ चुका था, दूर-दूर तक हरियाली के दर्शन नहीं होते थे। जहां-तहां बांस के लगे भिर्रे व बड़े वृक्ष ही यह इंगित करने का प्रयास करते थे कि यह वन क्षेत्र है। इस बिगड़े हुये और उजड़ चुके वन को फिर से हरा-भरा बनाने तथा वन्य प्राणियों के अनुकूल वातावरण निर्मित  करने के लिये एक अभिनव पहल के तहत पन्ना टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक के.एस. भदौरिया द्वारा 30 जनवरी 19 को पन्ना बफर क्षेत्र के अकोला गेट से पर्यटन गतिविधियां शुरू की गईं। नतीजतन अवैध कटाई पर जहां रोक लगी है, वहीं शिकार की घटनाओं पर भी अंकुश लगा है। बीते सात माह में इस जंगल का कायाकल्प होने के साथ ही यहां पर बाघ और तेंदुआ सहित दूसरे वन्य प्राणी भी बहुतायत से नजर आने लगे हैं।


बफर क्षेत्र के जंगल में स्थित अस्थाई सुरक्षा कैम्प।

उल्लेखनीय है कि बारिश के पूरे तीन माह तक पन्ना टाईगर रिजर्व का कोर क्षेत्र पर्यटन गतिविधियों के लिये बन्द रहता है। फलस्वरूप प्रकृति व वन्य जीव प्रेमी पर्यटक बारिश के तीन माह तक जंगल के रोमांचक नजारों को देखने से वंचित रहते थे। इस कमी को दूर करने तथा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुये क्षेत्र संचालक श्री भदौरिया ने तमाम आपत्तियों व विरोधों के बावजूद इस अभिनव गतिविधि को शुरू कराया। अवैध कटाई व शिकार की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिये चिह्नित किये गये संवेदनशील स्थलों पर अस्थाई सुरक्षा कैम्प बनाकर वहां वन कर्मियों  की तैनाती की गई। इस नवाचार और अभिनव प्रयोग का असर जल्दी ही दिखने लगा तथा बारिश का मौसम शुरू होते ही इस उजड़े हुये जंगल की रंगत ही बदल गई। तकरीबन 40 वर्ग किमी के इस वन क्षेत्र में झाडिय़ों की तेजी के साथ हुई ग्रोथ ने इलाके को हरा-भरा और वनाच्छादित कर दिया है। सागौन के पुराने कटे ठूँठों से भी पौधे निकलकर तेजी से बढऩे लगे हैं, यहां करधई के जंगल की रौनक अब देखते ही बनती है।

बिड़वानी नाला बना आकर्षण का केन्द्र


पर्यटकों को आकर्षित  वाले बिड़वानी नाले का  द्रश्य। 

पन्ना बफर क्षेत्र के इस जंगल में कई ऐसे प्राकृतिक मनोरम स्थल हैं, जो यहां आने वाले पर्यटकों को न सिर्फ आकर्षित  करते हैं अपितु उन्हें मंत्रमुग्ध कर देते हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य और खूबियों से भरपूर बिड़वानी नाले को बारिश के इस मौसम में निहारना अपने आप में अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है। चट्टानों से होकर बहते पानी का संगीत और नाले के किनारे वृक्षों पर सैकड़ो पक्षियों का कलरव पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। इस नाले की सबसे बड़ी खूबी यह है कि गर्मी के मौसम में भी यह नहीं सूखता, नाले में कई जगह प्राकृतिक जल श्रोत हैं, जहां से गर्मी में भी पानी निरन्तर निकलता है। इस नाले के किनारे वृक्षों में बया पक्षियों ने अपने हुनर और कलाकारी का प्रदर्शन करते हुये बड़ी संख्या में घोंसले बनाये हैं, जो इस नाले के सौन्दर्य को कई गुना बढ़ा देते हैं। पर्यटकों के लिये यह स्थल सेल्फी लेने व फोटोग्राफी का शौक पूरा करने का महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुका है। इस अनूठे स्थल के पास ही भारी भरकम चट्टान की शेल्टर है जहां पर हजारों वर्ष पुराने शैल चित्रों के भी दर्शन होते हैं।

पर्यटकों को अक्सर दिख जाते हैं वनराज



 शाकाहारी वन्य प्राणियों का पसंदीदा करधई का जंगल।

पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण बफर क्षेत्र के इस जंगल में अब अक्सर ही वनराज के दर्शन होने लगे हैं। वन भूमि के झाडिय़ों से आच्छादित हो जाने के चलते बाघ सहित वन्य प्राणियों को छिपने में कोई असुविधा नहीं होती। वन परिक्षेत्राधिकारी लालबाबू तिवारी ने बताया कि दो नर बाघों के अलावा एक बाघिन भी शावकों के साथ यहां कई बार नजर आई है। करधई का जंगल शाकाहारी वन्य प्राणियों विशेषकर चीतल और सांभर के लिये किसी जन्नत से कम नहीं है। इस पेड़ की पत्तियों को ये शाकाहारी वन्य प्राणी बड़े रूचि से खाते हैं। रेन्जर श्री तिवारी बताते हैं कि अवैध कटाई व शिकार पर प्रभावी रोक लगा है, लेकिन मवेशियों की समस्या अभी भी बनी हुई है। जिस पर अंकुश लगाने के लिये वन क्षेत्र से लगे ग्रामों के लोगों को जागरूक करने तथा संरक्षण के कार्य में उनका सहयोग लेने का प्रयास किया जा रहा है।

बीते अगस्त माह में 131 पर्यटकों ने किया भ्रमण 


ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के बावजूद पन्ना बफर क्षेत्र में देशी व विदेशी पर्यटकों के आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। क्षेत्र संचालक के.एस. भदौरिया ने बताया कि बीते अगस्त महीने में 47 देशी व 84 विदेशी पर्यटक यहां भ्रमण के लिये पहुँचे हैं, जिनसे 38 हजार 400 रू. राजस्व मिला है। आपने बताया कि सुबह व दोपहर के अलावा पन्ना बफर क्षेत्र के अकोला गेट से नाईट सफारी की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। शाम 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक पर्यटक नाईट सफारी का भी लुत्फ ले रहे हैं। प्रत्येक पर्यटक गाड़ी के साथ एक गाईड भी जाता है जिसे प्रति चक्कर 200 रू. मिलते हैं। स्थानीय युवकों को गाईड बनाया जा रहा है जिससे ग्रामीणों का रुझान पर्यावरण व वन्य प्राणी संरक्षण में बढ़ा है। श्री भदौरिया ने बताया कि आगामी दो-तीन वर्षों में ही बफर क्षेत्र का यह जंगल कोर की ही तरह घना और समृद्ध हो जायेगा, फलस्वरूप वन्य प्राणियों की संख्या भी बढ़ेगी जिससे यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जायेगा।
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वसुधा कैसे बने कुटुंब....




पूरी पृथ्वी एक शरीर है। इस शरीर में चोट किसी एक जगह लगती है तो दर्द पूरे शरीर में होता है। बीमारी कहीं होती है तो दवा किसी को खानी पड़ती है। परहेज भी किसी को करना पड़ता है।
हमारी पूरी कायनात इसी तरह से बनी है। समुद्र धरती को ठंडा करते हैं। जंगल सांस लेते हैं। हिमनद उन नदियों को जनम देते हैं जो मैदानों तक पानी पहुंचाती हैं। समुद्रों के ऊपर से बादल बनते हैं और न जाने कहां जाकर बरस जाते हैं। रेतीले तूफान किसी रेगिस्तान से जाकर उठते हैं और कहीं और जाकर लोगों को दम घोंटने लगते हैं। यह पूरा एक सिस्टम है जो हजारों-करोड़ों सालों में प्रकृति के अलग-अलग तत्वों के घात-प्रतिघात से तैयार हुआ है।
इस सिस्टम में हर किसी की अपनी जगह महत्वपूर्ण है। हर किसी को अपना रोल अदा करना है। जैसे किसी नाटक में अगर पहले वाला पात्र अपने संवाद भूल जाए तो दूसरे वाले के सामने भी अपना संवाद बोलने की समस्या पैदा हो जाती है। वह क्या बोले। जब पहले वाला ही नहीं बोल रहा है। कहने का मतलब यह कि पृथ्वी के एक सिस्टम के काम करने के लिए जरूरी है कि दूसरा भी काम करता रहे। अगर हिमनदों पर हर साल इतनी बर्फबारी नहीं होगी, जितनी हर साल पिघलकर नदियों के जरिए समुद्र में पहुंच जाती है, तो कुछ ही दिनों में हिमनद गायब हो जाएंगे। अगर जमीन के नीचे से हम जितना पानी हर साल निकालते हैं अगर उतना पानी हर साल अंदर नहीं जाएगा तो कुछ ही दिनों में मिट्टी की नमी समाप्त होने लगेगी और जमीन की उर्वरता नष्ट होगी और रेगिस्तानीकरण बढ़ने लगेगा।
पूरी पृथ्वी एक शरीर है। लेकिन, उस पर कोई एक परिवार नहीं, बल्कि पूंजीवाद राज कर रहा है। यही हमारी धरा का शायद सबसे बड़ा विरोधाभास है। सवाल यह है कि यह पूरी वसुधा एक कुटंब बने कैसे। परिवार वह होता है जिसमें हर कोई अपनी सामर्थ्य भर काम करता है और आवश्यकता भर प्राप्त करता है। यहां पर बीमार, कमजोर और बुजुर्ग लोगों को मरने के लिए छोड़ नहीं दिया जाता। उन्हें उनकी आवश्यकता भर मिलता है। वे भी समाज में अपनी सामाजिक भूमिका अदा करते हैं। इस पूरी धरती को एक परिवार की तरह काम करना चाहिए था। लेकिन, यहां पर कुछ लोगों के धनसंग्रह की हवस पूरी दुनिया की भलाई पर भारी पड़ रही है।
यह दुनिया मानवता की भलाई के लिए संचालित नहीं हो रही है। इसके संचालन के केन्द्र में मुनाफा है। यह पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए संचालित हो रही है। दुनिया की आबादी सात अरब के लगभग है। इस पर 195 देश बसे हुए हैं। लेकिन, इस पूरी दुनिया को संचालित मुश्किल से एक करोड़ लोग कर रहे हैं। मुश्किल से दस करोड़ लोग इस सिस्टम के संचालन से फायदा उठाने वालों में शामिल है। बाकी लोग किसी तरह से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। हर रोज उनकी कोशिश यही रहती है कि जो जीवन वो जी रहे हैं, कहीं उससे भी नीचे न गिर जाए।
विरोधाभास यही है। पृथ्वी अब जहां पहुंच गई है, वहां अगर मुनाफे का यह तिलिस्म तोड़ा नहीं गया तो पूंजीवाद का यह भस्मासुर पूरी पृथ्वी को ही भस्म करने पर उतारू हो गया है। पृथ्वी को भस्म करने के साथ ही वह खुद को भी भस्म कर लेगा। लेकिन, उतारू वह इसी पर है। शायद उसे उम्मीद है कि जब तक पृथ्वी नष्ट होगी वह किसी और ग्रह को खोजने में सफल हो जाएगा। चांद पर बस्तियां बसाने में सफल हो जाएगा। पृथ्वी को तबाह करने के बाद क्या करना है, शायद उसने प्लान बी तैयार कर रखा होगा।
लेकिन, हम लोग, जो इस दुनिया की बहुतायत है, पूंजीवाद के मुनाफे की हवस से पैदा हुए कैंसर से मरेंगे। क्या हमारा भविष्य प्रदूषण के धुएं से खांसते हुए मरने का है।
या फिर पृथ्वी को बचाने के लिए हम अपनी आवाज बुलंद करेंगे। यह पूरी पृथ्वी एक शरीर है और इस पर रहने वालों का एक परिवार होना चाहिए। परिवार यानी जिसमें हर कोई अपनी शक्ति और सामर्थ्य भर काम कर रहे और अपनी जरूरत भर प्राप्त करे। जरूरत से ज्यादा लेने या संग्रह करने का यहां पर सवाल ही पैदा नहीं होता।

- कबीर संजय की फेसबुक वॉल से साभार 

Monday, September 2, 2019

ईको फ्रेण्डली गणेश प्रतिमाओं का बढ़ रहा प्रचलन

  •   बच्चों और युवाओं ने बनाये मिट्टी से निर्मित  बीज गणेश
  •   प्रदर्शनी लगाकर पर्यावरण के प्रति लोगों को किया गया जागरूक




अरुण सिंह,पन्ना। पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन की गतिविधियों में अब लोग बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाने लगे हैं। बच्चों और युवाओं में पर्यावरण के प्रति अभिरूचि पैदा हुई है, जिसका सकारात्मक प्रभाव पर्व और त्यौहारों में भी दिखने लगा है। मौजूदा समय पूरे 10 दिनों तक चलने वाले गणोशोत्सव पर्व की हर तरफ धूम है। मन्दिरों, प्रमुख स्थलों व घरों में पूरे भक्ति भाव और श्रद्धा के साथ सोमवार गणेश चतुर्थी से गणेश जी की प्रतिमाओं की स्थापना का सिलसिला शुरू हो गया है। श्री गणेश की आकर्षक नयनाभिराम झांकियां भी सजाई जा रही हैं। इस सबके बीच विशेष और गौरतलब बात यह है कि पर्यावरण व पानी को दूषित होने से बचाने के लिये मिट्टी से निर्मित गणेश जी की प्रतिमाओं को स्थापित करने में लोग रूचि ले रहे हैं।


आयोजित प्रदर्शनी में मिट्टी से निर्मित गणेश जी की  मूर्तियों का अवलोकन करते गणमान्यजन। 

उल्लेखनीय है कि मिट्टी से निर्मित बीज गणेश की प्रतिमाओं को अपने घरों में स्थापित करने हेतु लोगों को प्रोत्साहित करने के लिये रविवार को शहर के मोहन राजविलास होटल में एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में बच्चों और युवाओं द्वारा बनाई गई श्री गणेश जी की ईको फ्रेण्डली प्रतिमाओं को भी प्रदर्शित  किया गया। अपनी तरह की इस अनूठी प्रदर्शनी में दो दर्जन से भी अधिक छोटी-बड़ी प्रतिमाओं को रखा गया था। यह प्रदर्शनी पूरे दिन आकर्षण का केन्द्र रही, बड़ी संख्या में लोगों ने पहुँचकर इसका अवलोकन किया तथा बच्चों और युवाओं की सृजनात्मकता को सराहा। मालुम हो कि प्रदर्शनी में रखी गई मिट्टी से निर्मित गणेश प्रतिमाओं को स्कूल के बच्चों व पन्ना शहर के युवाओं ने बनाया था। इस प्रदर्शनी के माध्यम से नगरवासियों से यह अपील भी की गई कि वे अपने घरों में मिट्टी से निर्मित बीज गणेश की प्रतिमा स्थापित कर पर्यावरण संरक्षण के कार्य में सहभागी बनें। इस प्रदर्शनी का अवलोकन करने वालों में मुख्य रूप से केशव प्रताप सिंह , मनोज गुप्ता, मनीष शर्मा, श्रीराम गोस्वामी, मनीष अमरदीप गोस्वामी, अंजली गोस्वामी, आशुतोष कुमार, नीतू सिंह , अनीशा जैन, सुरभि जैन, अनुभा श्रीवास, शुभम रैकवार, आदित्य गोस्वामी, अलौकिक शर्मा, शौर्य सिंह  सहित बड़ी संख्या में नगरवासी शामिल रहे।

पीओपी से निर्मित मूर्तियां हानिकारक


स्वस्थ पर्यावरण के लिये जरूरी है कि हमारे जल श्रोत निर्मल बने रहें। पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) से निर्मित  प्रतिमाओं को जब नदियों, तालाबों व अन्य जल श्रोतों में विसर्जित  किया जाता है, तो इससे प्रदूषण बढ़ता है तथा पानी उपयोग के लायक नहीं बचता। पीओपी तली में सीमेण्ट की तरह जम जाता है और पानी के रिसाव को रोक देता है। म.प्र. में एनजीटी ने पीओपी से बनी प्रतिमाओं की बिक्री पर पाबन्दी लगा दी है। जानकारों का कहना है कि पीओपी की मूर्तियां पानी में घुलती नहीं हैं, इनमें रसायनिक रंगों का भी प्रयोग किया जाता है जो पानी में घुलकर नुकसान पहुँचाते हैं।

मिट्टी के गणेश से जन्मेगा नया पौधा


मिट्टी से निर्मित गणेश जी की मूर्तियां  पर्यावरण को किसी भी तरह से कोई नुकसान नहीं पहुँचातीं। अब तो मिट्टी से बनी गणेश जी की मूर्तियों को बनाते समय मिट्टी के साथ विभिन्न प्रजाति के पौधों के बीज भी रखे जा रहे हैं, बीज गणेश वाली मूर्तियां विसर्जित  होने पर एक नये पौधे को भी जन्म दे देती है जिससे पर्यावरण समृद्ध होता है। बीज युक्त गणेश प्रतिमाओं को घर में ही विसर्जित  किये जाने पर उसके अन्दर रखा बीज कुछ ही दिनों में अंकुरित होकर पौधा बन जाता है। मिट्टी से निर्मित  बीज गणेश अब लोगों को पसंद आ रहे हैं।

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