Friday, January 10, 2020

2 करोड़ 42 लाख रूपये में नीलाम हुये 150 नग हीरे

  •   1.16 करोड़ में बिका 29.46 कैरेट का बड़ा हीरा
  •   18.13 कैरट का दूसरा बड़ा हीरा 72.61 लाख रूपये में बिका


पन्ना में आयोजित हुई हीरों की नीलामी में हीरों की परख करते व्यापारी। 

अरुण सिंह,पन्ना। बेशकीमती हीरों के लिये प्रसिद्ध म.प्र. के पन्ना जिला मुख्यालय में आयोजित हुई हीरों की नीलामी इस बार कामयाब रही। जिले की उथली हीरा खदानों से निकले हीरों की नीलामी के तीसरे और अन्तिम दिन नीलामी में रखे गये अधिकांश बड़े हीरे बिक गये। नीलामी का आकर्षण रहा 29.46 कैरेट का सबसे बड़ा हीरा 1.16 करोड़ रू. में बिका। नंद किशोर जडिय़ा रोमूक जेम्स कम्पनी ने इस नायाब हीरे को खरीदा है। जबकि नीलामी का दूसरा बड़ा हीरा 18.13 कैरेट का था, जिसे भूपेन्द्र ङ्क्षसह ने 72.61 लाख रू. में खरीदा। नीलामी के अन्तिम दिन कुल 2 करोड़ 17 लाख रू. के हीरे नीलाम हुये। इस नीलामी में कुल 187.10 कैरेट वजन के 150 हीरे 2 करोड़ 42 लाख 99 हजार रू. में बिके हैं।
हीरा अधिकारी आर.के. पाण्डेय ने जानकारी देते हुये बताया कि नीलामी का सबसे बड़ा हीरा 29.46 कैरेट का था इसे 3.95 लाख रू. प्रति कैरेट के हिसाब से 1 करोड़ 16 लाख 51 हजार रू. में बेंचा गया है। इसी प्रकार से नीलामी का दूसरा बड़ा हीरा 18.13 कैरेट का 4 लाख 500 रू. प्रति कैरेट के हिसाब से 72 लाख 61 हजार रू. में बिका। इस प्रकार से तीसरे दिन की नीलामी तक कुल 187.10 कैरेट वजन के 150 हीरे 2 करोड़ 42 लाख 99 हजार रू. में बेंचे गये हैं। जिले की उथली हीरा खदानों से प्राप्त हुये इन हीरों की नीलामी में देश के कई राज्यों से आधा सैकड़ा से भी अधिक हीरा व्यापारियों ने भाग लिया था।
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अनुभूति कार्यक्रम में स्कूली बच्चों ने सीखा प्रकृति का पाठ

  •  जंगल के रहस्यमय संसार को निकट से देख रोमांचित हुये बच्चे
  •   पेड़-पौधों और वन्य प्राणियों के बारे में हासिल की रोचक जानकारी


अनुभूति कार्यक्रम के तहत जंगल भ्रमण के लिए निकले स्कूली बच्चे। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। वन एवं वन्य प्राणियों तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति स्कूली बच्चों में अभिरूचि पैदा करने तथा उनमें जागरूकता लाने के लिये म.प्र. ईको पर्यटन विकास बोर्ड द्वारा आयोजित होने वाला अनुभूति कार्यक्रम अत्यधिक लोकप्रिय हो रहा है। इस अनूठे कार्यक्रम के माध्यम से स्कूलों के बच्चे जंगल की निराली दुनिया से जहां रूबरू हो रहे हैं, वहीं प्रकृति की पाठशाला में उसके विविध रूपों से भी परिचित हो रहे हैं। 

अनुभूति कार्यक्रम के तहत गत बुधवार को पन्ना टाईगर रिजर्व के अकोला बफर क्षेत्र का स्कूली बच्चों ने भ्रमण कर भरपूर लुत्फ उठाया। इस वन क्षेत्र से लगे ग्रामों के तकरीबन 120 स्कूली बच्चों को दो यात्री बसों से यहां लाया गया था। इन बच्चों ने अभी तक अपने बड़े बुजुर्गों से ही जंगल की निराली दुनिया के बारे में सुना था, लेकिन जब उन्हें खुद जंगल में भ्रमण करने का अवसर मिला तो उनकी खुशी और रोमांच देखते ही बन रहा था। बच्चों ने प्रकृति की इस पाठशाला में पेड़-पौधों व वनस्पतियों के साथ विभिन्न प्रजाति के वन्यजीवों के संबंध में न सिर्फ जानकारी हासिल की अपितु उनका दीदार भी किया।

चट्टानों में प्राचीन शैल चित्रों को निहारते बच्चे। 

सुबह कड़ाके की ठण्ड और घने कोहरे के बावजूद उत्साही बच्चे बसों में सवार होकर जब बच्चे अकोला पर्यटन क्षेत्र के जंगल में प्रवेश किया तो रिमझिम बारिश ने इन बच्चों का स्वागत किया। इस कार्यक्रम को सफलतापूर्वक आयोजित कराने की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे वन परिक्षेत्राधिकारी लाल बाबू तिवारी मौसम के बदले तेवरों को देख ङ्क्षचतित हुये। लेकिन मौसम ने मासूम बच्चों को निराश नहीं किया, रिमझिम बारिश का सिलसिला जल्दी ही थम गया और मौसम अत्यधिक सुहाना नजर आने लगा। जंगल के बीच बने निगरानी टावर परिसर में बच्चों ने गर्म जलेबी और पोहा का नाश्ता करने के बाद भ्रमण पर निकले। 

अनुभूति कार्यक्रम के मास्ट ट्रेनर मनीष कुमार रावत व भवानीदीन पटेल ने बच्चों को इस जंगल के अतीत व वर्तमान से अवगत कराया। बच्चों को बताया गया कि एक समय यहां घना और समृद्ध वन था और यहां के जंगल में बाघ सहित विविध प्रजाति के वन्य प्राणी भी विचरण करते थे। लेकिन मानव आबादी बढऩे के साथ ही वनों पर भी दबाव बढ़ा फलस्वरूप अनियंत्रित कटाई व चराई से यह वन क्षेत्र उजड़ गया। इस उजड़ चुके वन क्षेत्र को पुन: हरा-भरा करने की पहल एक वर्ष पूर्व मौजूदा क्षेत्र संचालक के.एस. भदौरिया ने की और यहां पर पर्यटन गतिविधियां भी शुरू की। इसका चमत्कारिक असर हुआ, बिगड़ा वन फिर तेजी से न सिर्फ हरा-भरा हो गया अपितु अब इस वन क्षेत्र में वनराज सहित अन्य दूसरे वन्य प्राणी भी दिखने लगे हैं। लगभग 40 वर्ग किमी का यह वन क्षेत्र अब पर्यटकों को भी आकॢषत करने लगा है।

प्रकति की पाठशाला बना बिड़वानी नाला



जंगल के बिड़वानी नाला में चल रही प्रकृति की पाठशाला का द्रश्य। 

जंगल का भ्रमण करते स्कूली बच्चों का यह दल जब बिड़वानी नाले के निकट पहुँचा तो यहां के मनोरम दृश्य को देख रोमांचित हो उठा। किसी समय यह इलाका वनराज सहित आदिमानवों का प्रिय रहवास रहा है, जिसके प्रमाण नाले के आस-पास चट्टानों में बने प्राचीन शैल चित्रों के रूप में आज भी मौजूद हैं। नाले के किनारे खड़े वृक्षों में बया पक्षी के लटकते घोंसले बरबस ही सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं। यहां पर बया पक्षियों ने अपने हुनर और कलाकारी का प्रदर्शन करते हुये बड़ी संख्या में घोंसले बनाये हैं, जिन्हें बच्चों ने बड़ी उत्सुकता के साथ देखा। 

इस नाले के प्रवाह क्षेत्र में फैली चट्टानों पर सभी बच्चे विश्राम की मुद्रा में जब बैठ गये तब यहां प्रकृति की पाठशाला शुरू हुई। यहां पर बच्चों के मन में उठे सवालों का समाधान किया गया तथा उन्हें बड़े ही रोचक ढंग से वन, वन्य प्राणियों तथा पर्यावरण की महत्ता के बारे में बताया गया। सभी बच्चों ने प्रकृति की इस अनूठी पाठशाला में दी गई जानकारी को ध्यान से रूचि के साथ न सिर्फ सुना बल्कि उसे आत्मसात भी किया।

निगरानी टावर में हुआ कार्यक्रम का समापन


पूरे दिन जंगल के विविध रूपों का दीदार करने के बाद अनुभूति कार्यक्रम का समापन निगरानी टावर परिसर में सुस्वादु भोजन का लुत्फ उठाने के उपरान्त हुआ। इस मौके पर यहां क्विज प्रतियोगिता का भी आयोजन हुआ। जिसमें विजेता बच्चों को शील्ड प्रदान कर सम्मानित किया गया तथा सभी प्रतिभागी बच्चों को प्रमाण पत्र दिये गये। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कांग्रेस नेता शिवजीत सिंह ने उपस्थित ग्रामवासियों व बच्चों को संबोधित किया। उन्होंने ग्रामीणों से अनुरोध किया कि वे वन व वन्य प्राणियों की सुरक्षा में सहभागी बनें। कार्यक्रम को पन्ना टाईगर रिजर्व के उप संचालक जराण्डे ईश्वर रामहरि व सहायक संचालक गौरव शर्मा ने भी संबोधित किया और पर्यावरण संरक्षण के प्रति बच्चों की अभिरूचि देख प्रसन्नता व्यक्त की। इस मौके पर मास्टर ट्रेनर्स मनीष कुमार रावत, भवानीदीन पटेल, स्टेनो प्रदीप द्विवेदी, पत्रकार अरूण सिंह सहित वन सुरक्षा समिति के सदस्य, ग्रामीण जन व वनकर्मी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन व आभार प्रदर्शन वन परिक्षेत्राधिकारी लाल बाबू तिवारी ने किया।


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Thursday, January 9, 2020

राहुल और प्रियंका निभा रहे जिन्ना की भूमिका: उमा भारती

  •   पन्ना में आयोजित हुई नागरिका संशोधन अधिनियम के समर्थन में संगोष्ठी
  •   कांग्रेस पर सुश्री भारती ने बोला हमला, कहा अफवाह फैलाकर बना रहे भय का माहौल


 संगोष्ठी को संबोधित करते हुये पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती।

अरुण सिंह,पन्ना। देश में अफवाह फैलाकर भय और भावनात्मक विभाजन का माहौल बनाने के लिये राहुल और प्रियंका जिन्ना की भूमिका निभा रहे हैं। इन लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि हमें सच्चाई बताने के लिये जनता के बीच जाना पड़ रहा है। यह बात भाजपा की वरिष्ठ नेत्री व पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती ने गुरूवार 9 जनवरी को म.प्र. के पन्ना जिला मुख्यालय में नागरिकता संशोधन विधेयक के समर्थन में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुये कही। उन्होंने कांग्रेस पर जोरदार हमला करते हुये कहा कि वोट के लिये ये लोग अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण निॢमत कर रहे हैं। सुश्री भारती ने कहा कि कांग्रेसी भय पैदा कर वोट लेना चाहते हैं, इसलिये इन डराने वाले लोगों की जमानत जब्त करायें।
पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री भारती ने नागरिकता संशोधन विधेयक की सराहना करते हुये कहा कि इससे देश के किसी भी नागरिक को डरने की जरूरत नहीं है। इस विधेयक से देश की एकता को कोई नुकसान नहीं होगा। आपने कहा कि अल्पसंख्यकों को हम वोट की नजर से नहीं देखते, हमारे मन में लालच नहीं है। देश को यदि स्वस्थ रखना है तो एक जन, एक मन रखना होगा। सुश्री भारती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिक्र करते हुये कहा कि दुनिया के मुस्लिम देशों में सबसे ज्यादा पापुलर नेता यदि कोई है तो वे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। सुश्री भारती ने कहा कि भारत अखण्ड रहेगा क्योंकि जो खण्ड-खण्ड हुआ है उसे भी लाने की हमारी तैयारी है। आपने यह भी कहा कि भारत को हम हिन्दू राष्ट्र नहीं बनाना चाहते, क्योंकि भारत हिन्दू राष्ट्र है। यहां की सांस्कृतिक विरासत को खत्म नहीं किया जा सकता। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हम सर्व धर्म समभाव पर विश्वास करने वाले लोग हैं।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुये उमा भारती ने कहा कि भाजपा मिस्डकाल और एसएमएस से बनी पार्टी नहीं अपितु संघर्ष, मेहनत और समॢपत कार्यकर्ताओं के पसीने से बनी है। इसलिये देश विरोधी कार्य करने वाले उपद्रवियों के खिलाफ जहां कड़ी कार्यवाही होगी, वहीं देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले लोगों से नुकसानी की वसूली की जायेगी। उ.प्र. में इसकी  शुरूआत की जा चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि 1947 में जब देश का धर्म के आधार पर विभाजन हुआ उस समय मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान क्यों नहीं गये, क्योंकि वे जानते थे कि हिन्दुओं से अच्छा पड़ोसी और हिन्दुस्तान से अच्छा देश उन्हें कहीं नहीं मिलेगा। हम धर्म के मामले में उदार रहेंगे लेकिन राष्ट्र की एकता और अखण्डता के मामले में आक्रामक होंगे और राष्ट्र विरोधी लोगों को उखाड़कर फेकेंगे। सुश्री भारती ने कहा कि हम घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं करेंगे।

उमा भारती ने कहा 2024 का लडूँगी चुनाव

भाजपा नेत्री सुश्री उमा भारती ने संगोष्ठी में इस बात का ऐलान भी किया कि वे आगामी 2024 का लोकसभा चुनाव अवश्य लडेंग़ी। आपने बताया कि गंगा जी की पदयात्रा इतनी महत्वपूर्ण थी कि मैं चुनाव नहीं लड़ी। मौजूदा समय एक साथ मैं दो परेशानियों से जूझ रही हूँ। गंगाजी की यात्रा के दौरान 280 किमी चलने के बाद एक जगह फिसल गई जिससे पाँव के पंजे में दो फे्रक्चर हो गये। इसलिये आप लोगों के बीच व्हील चेयर में बैठकर आना पड़ा। अब अप्रैल तक चलने लायक हो सकूँगी लेकिन तब गर्मी में गंगा की पदयात्रा करना संभव नहीं होगा। इसलिये अक्टूबर के महीने से फिर यात्रा शुरू करूँगी। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि नागरिकता संशोधन विधेयक से किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है, कांग्रेसियों और बामपंथियों द्वारा अफवाहें फैलाई जा रही हैं। इसीलिये जनता के बीच जाकर हम यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि यह साँप नहीं रस्सी है। इस तरह के कार्यक्रम टॉर्च डालकर सच्चाई दिखाने का प्रयास है ताकि लोग वास्तविकता जान सकें। संगोष्ठी को क्षेत्रीय सांसद वी.डी. शर्मा ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह, पवई विधायक प्रहलाद लोधी, भाजपा जिलाध्यक्ष रामबिहारी चौरसिया भी मंचासीन रहे। संगोष्ठी का संचालन भाजपा नेता जयप्रकाश चतुर्वेदी ने किया।
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Wednesday, January 8, 2020

कुपोषण को मिटाने समाज का प्रत्येक व्यक्ति आगे आये: कलेक्टर

  •   जिले के लगभग 3 हजार अतिकुपोषित बच्चों को लिया गया गोद
  •   बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ एवं संजीवनी अभियान की कार्यशाला सम्पन्न



अरुण सिंह,पन्ना। जिले से कुपोषण के कलंक को मिटाने के लिये कलेक्टर कर्मवीर शर्मा द्वारा पोषण संजीवनी अभियान चलाया गया। इस अभियान में उन्होंने शासकीय अमले के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को जोडऩे का प्रयास किया। जिससे यह कार्यक्रम जन आन्दोलन का रूप ले सके। जुलाई माह से प्रारंभ किये गये इस अभियान के दौरान जिले के लगभग 3 हजार अतिकुपोषित बच्चों को संजीवनी अभिभावकों को गोद दिलाया गया। इन कुपोषित बच्चों की पहचान कर इन्हें पोषण पुनर्वास केन्द्रों में भर्ती कराकर उपचार उपलब्ध कराने के साथ-साथ रक्त कमी वाले बच्चों को जन सहयोग से रक्तदान कराकर रक्त दिलवाया गया। जिससे बच्चों के स्वास्थ्य में निरंतर सुधार आया है। वर्तमान में जिले में 5 हजार बच्चे चिन्हित किये गये हैं जिन्हें गोद दिलाकर कुपोषण से मुक्ति दिलाना है।
जिले में संजीवनी अभियान को प्रभावी रूप से संचालित करने एवं आगामी आने वाले समय में निरंतर चलता रहे इसके लिये इस अभियान को जन आन्दोलन का रूप देने के प्रभावी प्रयास के तहत कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला के माध्यम से कुपोषण की शुरूआत को खत्म करने के लिये बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना के तहत बेटियों को सही ढंग से पोषण आहार उपलब्ध कराने, पढ़ाने लिखाने, किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान देने, बाल विवाह रोकने के साथ गर्भवती माताओं के स्वास्थ्य पर ध्यान रखने के संबंध में लोगों को जानकारी दी गई। जिले में मातृ एवं शिशु मृत्युदर को कम करने के लिये उठाये जाने वाले कदमों के संबंध में कार्यशाला में उपस्थित लोगों को बताया गया।

साफ-सफाई व स्वास्थ्य संबंधी जानकारी आवश्यक

कार्यशाला को सम्बोधित करते हुये मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एल.के. तिवारी द्वारा बताया गया कि किशोरी बालिकाओं का स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें आवश्यक औषधियां उपलब्ध कराई जाती हैं लेकिन उन्हें आवश्यक पोषण आहार मिलना भी बहुत आवश्यक है। इसके अलावा उनको साफ-सफाई और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दिया जाना आवश्यक है। उन्होंने बाल विवाह से होने वाले दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुये कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिये प्रशासन का सहयोग करें। उन्होंने गर्भवती माताओं के संबंध में कहा कि प्रत्येक गर्भवती माता का गर्भ धारण होने के साथ ही पंजीयन होने पर उसे आवश्यकतानुसार टीकाकरण एवं उपचार उपलब्ध हो जाने से कुपोषित बच्चे जन्म नही लेते। उन्होंने कहा कि जिस परिवार में गर्भवती मातायें होती हैं उस परिवार की जिम्मेदारी है कि वह उसके पोषण पर विशेष ध्यान दें। मातृ एवं शिशु मृत्युदर रोकने के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक गर्भवती माता का प्रसव संस्थागत ही होना चाहिये।

कुपोषण के कलंक को मिटाने जागरूकता जरूरी

इस अवसर पर कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास परियोजना उदल सिंह ने कार्यशाला के संबंध में प्रकाश डालते हुये कहा कि जिले को कुपोषण तथा मातृ एवं शिशु मृत्युदर को समाप्त करने के लिये हम सभी को आवश्यक प्रयास करने होंगे। इसके लिये प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने की आवश्यकता है कि प्रत्येक परिवार की किशोरी बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं एवं जन्म लेने वाले शिशुओं के पोषण आहार पर ध्यान दें। पोषण आहार के अलावा स्वच्छता, शुद्ध पेयजल, संक्रमित बीमारियों से बचाने के लिये टीकाकरण आदि पर ध्यान दिया जाये। इसके लिये जरूरी है कि समाज की आर्थिक विपन्नता, अंधविश्वास, अशिक्षा, स्वच्छता का अभाव, लिंग आधारित भेदभाव, बाल विवाह एवं कम उम्र में गर्भ धारण जैसे समस्याओं का निदान किया जाये। उन्होंने की वर्तमान में जिले में 6 माह से 6 वर्ष की आयु के कुल 1393 अति कम वजन के बच्चे मध्यम वजन के 10307 बच्चे हैं। सामान्य वजन के 96797 बच्चे आँगनबाड़ी केन्द्रों में दर्ज हैं। इनमें अति कम वजन एवं मध्यम वजन के बच्चों को पोषण आहार एवं समझाईश देकर सामान्य श्रेणी में लाने की आवश्यक है।

दलगत राजनीति से ऊपर उठकर करें कार्य

कार्यशाला में पूर्व पन्ना विधायक श्रीकांत दुबे ने अपने उद्बोधन में कहा कि जिले को कुपोषण मुक्त करने के लिये हम सभी को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करना होगा। किशोरी बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं को कुपोषण से मुक्ति एवं उनके स्वास्थ्य के लिये समाज के लोगों की मानसिक दशा में बदलाव लाना पड़ेगा। जिला पंचायत के अध्यक्ष रविराज ङ्क्षसह यादव ने जिला प्रशासन द्वारा चलाये जा रहे अभ्युदय कार्यक्रम एवं पोषण संजीवनी अभियान की सराहना करते हुये कहा कि जिला प्रशासन द्वारा यह सराहनीय कदम उठाया गया है। इसमें समाज के लोगों को मिलकर कार्य करना चाहिये। जिससे समाज की बेटी खुशहाल हो। समाज से रूढिय़ा खत्म हो, शिक्षा का प्रचार प्रसार हो। इस अवसर पर श्रीमती दिव्यारानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि हमें अपने समाज से अंधविश्वास और कुरीतियों को मिटाना होगा। तभी हम किशोरियों, माताओं एवं बच्चों के साथ न्याय कर सकेंगे। पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष श्रीमती शारदा पाठक ने प्रजनन एवं स्वास्थ्य विषय पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अन्य जनप्रतिनिधियों में शिवजीत सिंह , श्रीमती मीना यादव आदि ने सुझाव दिये। इसके अलावा जगदीश नामदेव, मंगला भाले, आशा गुप्ता, बालकृष्ण शर्मा, आशिब खान, सुश्री बादल, राजेन्द्र विश्वकर्मा, रामकिशोर मिश्रा, श्रीमती स्नेहलता पारासर, नीलम चौबे आदि ने सुझाव देने के साथ-साथ कुपोषित बच्चों को गोद लेने की घोषणा की।

प्रतिभाशाली 13 बालिकाओं का हुआ सम्मान




इस अवसर पर स्वयं सेवी संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने सुझाव और किये जा रहे कार्यो पर प्रकाश डाला। इनमें पृथ्वी ट्रस्ट से युसूफ बेग, धरती संस्था से राहुल निगम, दर्शना महिला मण्डल से जीतू, आधार से महरून सिद्दिकी आदि ने सम्बोधित करने के साथ कुपोषित बच्चों को गोद लेने की घोषणा की। इस अवसर पर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना अन्तर्गत जिले की कक्षा 12वीं एवं 10वीं की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने वाली 13 बालिकाओं को सम्मानित किया गया। वहीं कक्षा 10वीं में शत प्रतिशत परीक्षा परिणाम लाने वाले विद्यालयों में शा. हाईस्कूल पिष्टा तहसील अजयगढ़ एवं शासकीय मॉडल उमावि अजयगढ़ को प्रमाण पत्र एवं 10 हजार रूपये से पुरस्कृत किया गया। इसके अलावा संजीवनी अभियान में उत्कृष्ट कार्य करने एवं 2 बच्चियों के उपरांत परिवार नियोजन अपनाने वाले परिवारों को सम्मानित किया गया। इस कार्यशाला में विभिन्न विभागों के अधिकारी, जनप्रतिनिधि, व्यवसायी, समाज सेवी, पत्रकारगण, गणमान्य नागरिक, स्वास्थ्य एवं महिला बाल विकास के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।
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Tuesday, January 7, 2020

फाइलेरिया की बीमारी लोगों को बना रही विकलांग

  •  इस लाइलाज बीमारी के लिये पन्ना हाई रिस्क जिलों में शामिल 
  •  जिले में फाइलेरिया के 1613 मरीज हो चुके हैं पंजीकृत 
  •  अजयगढ़ क्षेत्र के 9 ग्रामों में फाइलेरिया का सर्वाधिक प्रकोप 

मीडिया एडवोकेसी कार्यशाला में पत्रकारों को जानकारी देते मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एल.के. तिवारी । 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। लाइलाज कही जाने वाली फाइलेरिया की बीमारी पन्ना जिले में सैकड़ों लोगों को विकलांग बना रही है। इस बीमारी से पीड़ित मरीज जीते जी मौत से भी बद्तर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। मंगलवार को आईपीडीपी सभाकक्ष में आयोजित मीडिया एडवोकेसी कार्यशाला को सम्बोधित करते हुये मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एल.के. तिवारी ने बताया कि  पन्ना जिले में फायलेरिया के 1613 मरीज पंजीकृत है। जिनमें से 875 मरीज अण्डकोस में सूजन या हाईड्रोसिल और 738 मरीज हॉथी पांव या लिम्फेडिमा के है। 

जिले में 17 हाईरिस्क ग्राम व नगर हैं, जिनमें  सबसे ज्यादा 09 ग्राम अजयगढ़ क्षेत्र में हैं। हाईरिस्क ग्राम व नगरों में इस वर्ष विशेष अधिकारियो की ड्यूटी लगाई जावेगी। सम्पूर्ण जिले में ग्राम अभ्युदय दलों के माध्यम से 100 प्रतिशत दवा सेवन का लक्ष्य रखा गया है। प्रदेश में फायलेरिया बीमारी की दृष्टि से जिले का स्थान छतरपुर के पश्चात दूसरे क्रम पर है।
आपने बताया कि गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी राष्ट्रीय फाइलेरिया दिवस कार्यक्रम 11 जनवरी 2020 से जिले में आयोजित किया जा रहा  है, जिसमें दो वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों को सामूहिक रूप से फाइलेरिया रोधी दवा (डी.ई.सी एवं एलवेन्डाजोल) का सेवन कराया जाना है। केवल गर्भवती माताओं, अतिवृद्ध और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को फायलेरिया रोधी दवा का सेवन नही कराना है। पन्ना जिले में मॉप अप राउंड 12 जनवरी एवं 13 जनवरी 2020 को आयोजित होगा। जिसमें दवा सेवन से छूटे हुये लोगों को पुनः घर-घर जाकर दवा सेवकों द्वारा अपने सामने दवा सेवन कराया जावेगा। 

जिले में दो वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों की अनुमानित संख्या 1072705 है। जिन्हें यह दवा खिलाने के लिये लगभग तीन हजार नौ सौ दवा सेवक एवं तीन सौ नब्बे सुपरवाइजर की ड्यूटी लगाई गयी है। उन्होंने बताया कि फायलेरिया बीमारी गन्दे पानी, नालियो में पनपने वाले संक्रमित मादा क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होती हैं। यदि सात से आठ वर्ष तक सभी लोग फाइलेरिया की दवा का वर्ष में एक बार सेवन करें तो फाइलेरिया बीमारी के नये प्रकरणो को प्रकट होने से रोका जा सकता है। 

यह दवा एक तरह से टीका है जो कि एक वर्ष तक फायलेरिया के कृमि से सुरक्षा देती है। फाइलेरिया की दवा डी.ई.सी. और अल्वेन्डाजोल का उम्र के अनुसार सेवन करने पर कोई भी दुष्प्रभाव नही होते। यह पूर्ण रूप से  सुरक्षित दवा है केवल ऐसे लोग जिनके शरीर मे फायलेरिया के कृमि पहले से ही मौजूद होते है उन्हे इस गोली को खाने से हल्का बुखार आ सकता है,जो बिना किसी उपचार के स्वतः ठीक हो जाता है। कार्यशाला में जिला मलेरिया अधिकारी एच.एम. रावत, नगर पालिका पन्ना के अध्यक्ष मोहनलाल कुशवाहा सहित अन्य अधिकारी व जिले के पत्रकार शामिल रहे।

मच्छरों द्वारा फैलता है फाइलेरिया रोग 



फाइलेरिया मच्छरों द्वारा फैलता है, खासकर परजीवी क्यूलैक्स फैंटीगंस मादा मच्छर के जरिए। जब यह मच्छर किसी फाइलेरिया से ग्रस्त व्यक्ति को काटता है तो वह संक्रमित हो जाता है। फिर जब यह मच्छर किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को काटता है तो फाइलेरिया के विषाणु रक्त के जरिए उसके शरीर में प्रवेश कर उसे भी फाइलेरिया से ग्रसित कर देते हैं। लेकिन ज्यादातर संक्रमण अज्ञात या मौन रहते हैं और लंबे समय बाद इनका पता चल पाता है। इस बीमारी का कारगर इलाज नहीं है। इसकी रोकथाम ही इसका समाधान है।

फाइलेरिया पीड़ितों में दिखते हैं ये लक्षण 

आमतौर पर फाइलेरिया के कोई लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते, लेकिन बुखार, बदन में खुजली और पुरुषों के जननांग और उसके आस-पास दर्द व सूजन की समस्या दिखाई देती है। इसके अलावा पैरों और हाथों में सूजन, हाथी पांव और हाइड्रोसिल (अंडकोषों की सूजन) भी फाइलेरिया के लक्षण हैं। चूंकि इस बीमारी में हाथ और पैर हाथी के पांव जितने सूज जाते हैं इसलिए इस बीमारी को हाथीपांव कहा जाता है। वैसे तो फाइलेरिया का संक्रमण बचपन में ही आ जाता है, लेकिन कई सालों तक इसके लक्षण नजर नहीं आते। फाइलेरिया न सिर्फ व्यक्ति को विकलांग बना देती है बल्कि इससे मरीज की मानसिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

ठंड में बढ़ जाती है मरीजों की परेशानी

ठंड में फाइलेरिया का अटैक बढ़ जाता है। भीषण ठंढ और शीतलहर के के दौरान फाइलेरिया के मरीजों की परेशानी और  बढ़ जाती है। दर्द से परेशान लोग अस्पताल आते हैं लेकिन यहाँ भी उन्हें राहत नहीं मिल पाती। फाइलेरिया की रोकथाम के लिए ऐसे तो हर साल अभियान चलाकर घर-घर निरूशुल्क दवाएं दी जाती हैं, लेकिन जागरुकता के अभाव में लोग दवा लेने में रुचि नहीं दिखाते हैं। जिससे इस खतरनाक और लाइलाज बीमारी से पन्ना जिले को निजात नहीं मिल पा रही है। अधिकृत आंकडों के मुताबिक पन्ना शहर के 20 वार्डों में इस बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या दो सौ के पार है। फाइलेरिया की जांच शाम ढ़लने के बाद ही होती है।

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Sunday, January 5, 2020

सिद्धनाथ पहुँचे थे अधिकारी फिर भी हालात नहीं सुधरे

  • यहाँ पर  है भगवान राम की सबसे प्राचीन प्रतिमा
  •  धार्मिक महत्व का यह प्राचीन स्थल उपेक्षा का शिकार
  •  पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है यह स्थल


सिद्धनाथ स्थित प्राचीन शिव मन्दिर। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बुन्देलखण्ड अंचल के पन्ना जिले में धार्मिक व पुरातात्विक महत्व के ऐसे अनेकों स्थल हैं जिनका समुचित विकास किया जाये तो ये स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकते हैं। ऐसा ही एक अनूठा स्थल सलेहा के निकट सिद्धनाथ है जो ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सिद्धनाथ मन्दिर परिसर में भगवान श्रीराम के वनवासी रूप की दुर्लभ पाषाण प्रतिमा मौजूद है। 

यह स्थान जिला मुख्यालय पन्ना से 60 किमी दूर विन्ध्य पहाडिय़ों के बीच स्थित है। पुराविदों का यह दावा है कि देश में अब तक प्राप्त भगवान श्रीराम की पाषाण प्रतिमाओं में यह सबसे अधिक प्राचीन है। कहा जाता है कि दुर्गम पहाडिय़ों के बीच स्थित इस स्थान पर अगस्त मुनि का आश्रम रहा है।


वनवासी राम की दुर्लभ पाषाण प्रतिमा
उल्लेखनीय है कि इस पूरे परिक्षेत्र में 10वीं और 11वीं शताब्दी की दुर्लभ पाषाण प्रतिमायें व मन्दिरों के अवशेष बिखरे पड़े हैं। राम वन गमन पथ सर्वेक्षण यात्रा में बुद्धिजीवियों व पुराविदों का दल जब इस प्राचीन स्थल पर पहुँचा तो वनवासी राम की दुर्लभ और प्राचीन प्रतिमा को देख आश्चर्यचकित रह गया। जिस छोटी सी कुटिया में वनवासी वेश वाली भगवान श्रीराम की जटाजूटयुक्त पाषाण प्रतिमा रखी है, उसी के निकट सिद्धनाथ मन्दिर है जिसे खजुराहो के मन्दिरों से भी अधिक प्राचीन बताया जाता है। 

दुर्लभ पाषाण प्रतिमा में वनवासी राम धनुष की प्रत्यंचा खींचे हुये वीर भाव में दृष्टिगोचर हो रहे हैं जो लक्ष्य भेदने को तत्पर हैं। अंचल के ग्रामीणों की यह मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम वनवासी वेष में चित्रकूट से चलकर यहां अगस्त मुनि के आश्रम में आये थे। यहीं से होते हुये वनवासी राम पंचवटी पहुँचे। इस प्राचीन दुर्गम स्थान का दौरा कर चुके पुराविदों का कहना है कि इस स्थल का वर्णन बाल्मीक रामायण में है। 

वनवासी राम की पाषाण प्रतिमा को अत्यधिक प्राचीन और दुर्लभ बताया गया है। इस प्रतिमा के यहां मिलने से यह स्पष्ट होता है कि उस काल में यह क्षेत्र राममय रहा होगा। सदियों से उपेक्षित पड़ी इस दुर्लभ पाषाण प्रतिमा में धनुष खण्डित है, लेकिन जटाजूटयुक्त वनवासी राम का वीर भाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। इस दुर्लभ पाषाण प्रतिमा के संबंध में पुराविदों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह कितनी प्राचीन है।

खजुराहो से अधिक प्राचीन है यह मन्दिर


पन्ना के सिद्धनाथ मन्दिर की स्थापत्य कला देखने काबिल है। पुराविदों के मुताबिक सिद्धनाथ मन्दिर खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मन्दिरों से भी अधिक प्राचीन है। समुचित देखरेख के अभाव व संरक्षण हेतु अपेक्षित उपाय न होने के कारण पुरा सम्पदा से समृद्ध यह इलाका उपेक्षित पड़ा है। किसी जमाने में यहां पर खजुराहो की ही तरह मन्दिरों की पूरी श्रृंखला थी लेकिन समय के थपेड़ों में अधिकांश मन्दिरों का वजूद खत्म हो गया है। इन मन्दिरों के अवशेष जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं। यदि इस स्थल का समुचित विकास हो जाये तथा यहां की पुरा सम्पदा व मन्दिर का संरक्षण हो तो यह इलाका पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है।

पैदल सिद्धनाथ मन्दिर जाते कलेक्टर साथ में अन्य अधिकारी। 

भगवान के वनवासी वेश वाली दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन करने दक्षिण भारत से हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु सिद्धनाथ आते हैं। इस धार्मिक महत्व के मनोरम स्थल में पहुँचकर वे अपने आपको धन्य समझते हैं। धार्मिक आस्था का केन्द्र होने के बावजूद इस प्राचीन स्थल तक अभी भी सुगम मार्ग नहीं है। ऐंसी स्थिति में यहां आने वाले श्रद्धालुओं को भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। 

बीते माह कलेक्टर पन्ना कर्मवीर शर्मा व जिला पंचायत सीईओ अन्य अधिकारियों के साथ इस प्राचीन स्थल का जायजा लेने पैदल पहुँचे थे। प्रशासनिक मुखिया के यहां पहुँचने से अंचलवासियों को यह उम्मीद जागी थी कि उपेक्षित पड़े धार्मिक महत्व के इस प्राचीन स्थल का अब शीघ्र ही कायाकल्प होगा। लेकिन प्रशासनिक मुखिया के पहुँचने व उनके आश्वासनों के बावजूद अभी तक उपेक्षित पड़े इस स्थल के विकास हेतु कोई कारगर पहल नहीं हो सकी है जिससे लोगों में निराशा का भाव है।
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विस्फोटक दुनिया में हम, हर तरफ संघर्ष और गुस्सा


दशक का अवसान हो गया है और उम्मीद है कि एक नई सुबह होगी। 2010-2019 के जिस दशक को हम अपने पीछे छोड़ रहे हैं, उसमें नेताओं की छवि धूमिल हुई है, हमारी अर्थव्यवस्था संकट में पड़ी है और हर तरफ संघर्ष व गुस्सा नजर आया । इस दशक में हमने महसूस किया कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की बात नहीं है, बल्कि यह वर्तमान में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में इसकी गंभीरता बढ़ेगी। तापमान में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं के मामले में इस दशक के हर साल ने एक नया रिकॉर्ड बनाया। गुजरा दशक केवल मौसम से संबंधित नहीं रहा। लेकिन, बात सिर्फ मौसम की नहीं है। इस दशक ने यह भी बताया कि दुनियाभर मंे लोग अपने वर्तमान और भविष्य को किस तरह देखते हैं।
हम जानते हैं कि संभवतः पिछले किसी भी दशक के मुकाबले आज युवा ज्यादा बेचौन हैं। अमीर मुल्कों में युवा वर्ग चौकन्ना और अनिश्चितताओं से घिरा है, क्योंकि उसे नहीं पता है कि इस गर्म होती दुनिया में वे कैसे खुद को बचाए रखेंगे। इसके साथ ही युवा अपनी नौकरियों को लेकर भी चिंतित हैं क्योंकि उनके देश की समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं भी अब कुशल मजदूरों को हटाने लगी हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई यानी कृत्रिम बौद्धिकता) सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि यह भविष्य के गर्भ में है।
एआई जब आएगा, तो दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लेगा। समस्या यह है कि जब ऐसा होगा तो यह इतनी तेजी से होगा कि नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। तब कोई भी इसे नियंत्रित या नियमन करने में सक्षम नहीं होगा। ये एआई म्यूटेंट की तरह है, जिसका अपना जीवन होता है। यह पीढ़ी इंटरनेट और सोशल मीडिया द्वारा सृजित है। लेकिन उसे भी पता है कि यह टूल कितना भी शानदार हो लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष भी है। फेक न्यूज से लेकर लोकतंत्र को कमजोर करने तक में इसकी भूिमका होगी। आज इंटरनेट कारोबार का मक्का कहे जाने वाले अमरीका के बहुत सारे युवा नई कंपनियों अमेजन, गूगल और फेसबुक के प्रभाव से खुद को मुक्त करने की पुकार में शामिल हो रहे हैं। मगर, मुझे लगता है कि युवाओं की चिंता यह है कि उन्हें लग रहा है कि बदलाव लाने की शक्ति उनमें नहीं है। यानी जो इन युवाओं के लिए बुनियादी और आवश्यक है, उसे ही समस्या बताया जा रहा है। वे इसे कैसे बदलेंगे? युवा इसको लेकर चिंतित हैं और ऐसा ही होना भी चाहिए।
गरीब मुल्कों में युवाओं को अवसर चाहिए, लेकिन जहां वे रह रहे हैं वहां उनका भविष्य अंधकारमय दिखता है। इसलिए वे वहां से पलायन करना चाहते हैं। गांवों के युवा शहरों में आना चाहते हैं और शहरों से फिर दूसरे देशों में जाना चाहते हैं। वे अपने परिवार की दयनीय हालत से संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि, यह भी सही है कि उनके पास औपचारिक शिक्षा नहीं है (क्योंकि सरकार उन्हें शिक्षा मुहैया नहीं करा पाई) फिर भी वे मोबाइल के माध्यम से वर्तमान से ताल मिला रहे हैं। वे सुनहरे अवसर के बारे में जानते हैं और ये भी जानते हैं कि दुनिया उनका इंतजार कर रही है। वे इन अवसरों को भुनाना चाहते हैं और ऐसा उन्हें करना भी चाहिए। वे अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं को लेकर दब्बू नहीं बल्कि आक्रामक हैं। युवा देख रहे हैं कि उनके आसपास की दुनिया ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है। उनके किसान पिता दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पा रहे हैं। खाद्यान उत्पादन में दाम और मौसम का जोखिम बढ़ रहा है और हर मौसम के साथ उन पर कर्ज का बोझ भी बढ़ रहा है। अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि दुनिया के कमोबेश हर हिस्से में चीजें बहुत जल्दी नियंत्रण से बाहर चली जा रही हैं। ईंधन की कीमत में मामूली इजाफा या यूनिवर्सिटी में फीस बढ़ोतरी किसी सरकार को अस्थिर कर सकती है। सेना सड़कों पर आ सकती हैं, गोलीबारी, आगजनी व लूटपाट हो सकती है। दुनिया विस्फोटकों से भरा एक डिब्बा हो गई है, जो आग की भट्टी पर चढ़ी है।
@downtoearth
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Saturday, January 4, 2020

जो कभी वरदान थी अब बन चुकी है अभिशाप

  • केमिकल फार्मिंग देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक
  • 90 की उम्र पार कर चुके किसान की दिलचस्प और प्रेरणादायी कहानी 
  • अपने खेतों में आज तक कभी रसायनों का नहीं किया इस्तेमाल 


किसान इंदर सिंह युवाओं को जैविक खेती के बारे में बताते हुए। 
                                     
आज़ादी के बाद जब देश में हरित क्रांति आई तो पूरे देश के किसानों के खेतों को इसने अपने प्रभाव में ले लिया। उस समय केमिकल फार्मिंग की जो लहर देश के लोगों को एक वरदान लग रही थी, वही आज देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। पर 90 की उम्र पार कर चुके किसान इंदर सिंह सिद्धू के मुताबिक उन्होंने अपने खेतों में आज तक कभी रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया है। उन्होंने हमेशा से ही अपनी ज़मीन को केमिकल मुक्त रखा। चाहे फसल अच्छी हो या फिर न हो, पर उन्होंने कभी भी कोई पेस्टिसाइड इस्तेमाल नहीं किया। उनके बेटे हरजिंदर सिंह बताते हैं कि जब हरित क्रांति का दौर आया था तो उनके गाँव में भी सभी ने इसे हाथों-हाथ लिया। पर इंदर सिंह के मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि अगर केमिकल डालने से खरपतवार या फिर अन्य कीट मर सकते हैं, तो क्या इनकी मदद से उगी यह फसल इंसानों के खाने के लिए सुरक्षित है? उनके मन की इसी उलझन ने उन्हें कभी भी रासायनिक खेती नहीं करने दी। और फिर उनके बेटे-बहु ने भी उनकी इसी विरासत को आगे बढ़ाया।
पंजाब में फज़िल्का जिले के रामपुर गाँव में रहने वाला सिद्धू परिवार एक मिसाल है। वे न सिर्फ जैविक खेती से जुड़े हुए हैं बल्कि उनकी पूरी की पूरी लाइफस्टाइल ही सस्टेनेबल है।  इंदर सिंह कहते हैं, “ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में लोगों ने अंधाधुंध यूरिया खेतों में डाला। जैसे पंजाब के लोगों को नशे की लत लग गयी वैसे ही इन किसानों ने ज़मीन को भी केमिकल की लत लगा दी। और फिर न तो ज़मीन बची और न ही उस पर उगने वाले अनाज में कोई क्वालिटी।”पर इंदर सिंह कभी भी पैसे के पीछे नहीं भागे। उन्होंने जिन प्राकृतिक तरीकों से अपने पूर्वजों को खेती करते देखा, उन्हीं से खुद खेती की।
गेहूँ, चावल और गन्ने जैसी पारंपरिक फसलों से लेकर वे हल्दी, साग-सब्ज़ियां व फल आदि, सभी कुछ जैविक तरीकों से उगाते हैं। वे खेतों में सिर्फ जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं और इसके अलावा, वेस्ट डी-कंपोज़र जैसे प्रोडक्ट जो कि पूरी तरह से इको-फ्रेंडली हैं, इस्तेमाल करते हैं। कीटनाशक के तौर पर वे खेतों में खट्टी छाछ का, या फिर नीम और आक की पत्तियों से बना स्प्रे करते हैं। उनका खेत गेहूँ की बहुत पुरानी देसी किस्म- बंसी गेहूँ के लिए खास तौर पर जाना जाता है। इस गेहूँ में पोषण की मात्रा काफी अधिक होती है और इसकी अच्छी उपज लेने के लिए किसान को काफी मेहनत भी करनी पड़ती है। पर सिद्धू परिवार के फार्म में यह गेहूँ सालों से उगाया जा रहा है और उनके घर में इसी गेहूँ का आटा खाया जाता है। अनाज की फसलों के अलावा, उनका एक बाग़ भी है जिसमें मुख्य रूप से अमरूद के पेड़ हैं और इसके अलावा, चीकू, करौंदा, अनार, एलोवेरा जैसे पेड़ भी यहां मिल जायेंगे। साथ ही, ज़मीन के एक टुकड़े पर मौसमी सब्ज़ियां भी उगाई जाती हैं। इंदर सिंह बताते हैं कि वे अपने खेतों में देसी बीजों का ही इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। चाहे जानवरों का चारा हो या फिर साग-सब्जियों या फलों के बीज।
अपने सालाना टर्नओवर के बारे में पूछने पर वे हसंते हैं और कहते हैं, “पैसे का क्या है, कभी कम मिलता है कभी ज्यादा। पर हाँ, मेरे खेतों में पूरे गाँव से सबसे ज्यादा उपज होती है। पिछली बार, मैंने 3 एकड़ में धान लगाया था और 64 मन की उपज हुई। देसी किस्म थी और जैविक खेती से की। उसकी जो क्वालिटी है और बाकी लोगों की जो क्वालिटी है, उसमे ज़मीन-आसमान का फर्क है। तो मेरे लिए पैसे-वैसे से भी ज्यादा ये मायने रखता है कि मैं अपने घर में और बाकी लोगों को खाने के लिए कितना पौष्टिक अनाज दे रहा हूँ। आज भी सुबह से लेकर शाम तक अपने खेतों में कुछ न कुछ करते रहने वाले इंदर सिंह कहते हैं कि जैविक खेती करके वह कोई महान काम नहीं कर रहे हैं। वह जो कर रहे हैं उनके अपने लिए है। क्योंकि अगर वह केमिकल का इस्तेमाल करते तो शायद आज उनका परिवार इतना हष्ट-पुष्ट नहीं होता और न ही उनकी ज़मीन इतनी उपजाऊ होती। एक किसान की ज़िम्मेदारी है कि वह ज़मीन और प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए, लोगों के लिए पौष्टिक खाना उगायें। इंदर सिंह सिद्धू और उनका पूरा परिवार, आज के इस आधुनिक दौर में सस्टेनेबिलिटी की मिसाल है।
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Friday, January 3, 2020

भीषण ठण्ड और भूख से गौवंशों की हो रही मौत

  •   बाईपास व छात्रावास के आस-पास बिखरे पड़े हैं मृत गायों के शव
  •   भीषण दुर्गन्ध के चलते छात्रों का साँस लेना हो रहा दूभर 



अरुण सिंह,पन्ना। भीषण ठण्ड और भूख से सड़कों में घूमने वाले गौवंश असमय काल कवलित हो रहे हैं। शहर के बाईपास मार्ग व यहां स्थित छात्रावास के आस-पास मृत गायों के शव जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। इन शवों को कोई उठाने वाला तक नहीं है जिससे दुर्गन्ध के कारण छात्रावास में रह रहे छात्रों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। सड़कों पर आवारा घूमने वाले मवेशियों की समुचित व्यवस्था न होने के कारण ये मवेशी पूरे दिन सड़कों में विचरण करते हुये गन्दगी के ढेरों में पॉलीथिन सहित अन्य सामग्री खाते हैं। पॉलीथिन भी मवेशियों के लिये जानलेवा साबित हो रही है।
उल्लेखनीय है कि बाईपास मार्ग में स्थित पोस्ट मैट्रिक छात्रावास के चारों ओर लगभग आधा दर्जन मरी हुई गायों के शव बिखरे पड़े हैं। मृत गायों के शव सड़कर भीषण दुर्गन्ध उत्पन्न कर रहे हैं जिससे छात्रों का साँस लेना भी दूभर हो रहा है। शहर में आवारा घूमने वाले गौवंशों की व्यवस्था करने का दायित्व नगर पालिका प्रशासन व पशुपालन विभाग का है। लेकिन इन आवारा पशुओं की समुचित देखरेख व उनकी व्यवस्था करने के लिये कोई रूचि नहीं ली जा रही है। नतीजतन इस भीषण ठण्ड में भूखे मवेशी मर रहे हैं। नपा की गौशाला में नाम मात्र के गौवंशों को रखा गया है। नगर के बाईपास में संचालित गौशाला में गौवंश के भोजन एवं इलाज का खर्च नगर पालिका परिषद पन्ना द्वारा उठाया जाता है, इसके बावजूद नगर एवं आस-पास घूम रहा आवारा गौवंश  और इतनी संख्या में हो रही मृत्यु से स्पष्ट होता है कि गौशाला में खर्च की जा रही राशि का सही उपयोग नहीं हो रहा है। मरने वाले पशुओं का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया जा रहा, जिससे यह भी स्पष्ट नहीं होता कि पशुओं की मौत का असल कारण क्या है। अधिकतर पशु भूख और बीमारी से मर रहे हैं जो चिंता का विषय है। जिलेभर में पशुओं का आधार टैगिंग चल रहा है इसके बावजूद जिले की किसी भी गौशाला के पशु को आधार टैग नहीं लगाया गया, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि किस गौशाला में कितने पशु हैं, और यह पशु कहां से लाये गये और कहां छोड़े जा रहे हैं। जिला प्रशासन को चाहिये कि सभी गौशालाओं के पशुओं के आधार टैग और समय पर इलाज की व्यवस्था हेतु अधिकारियों को निर्देश देते हुये दोषियों पर कार्यवाही की जाये।

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Thursday, January 2, 2020

उपेक्षित है पन्ना का प्राचीन लोकपाल सागर तालाब

  •   हजारों एकड़ कृषि भूमि की होती रही है सिंचाई
  •   विशालकाय तालाब हो रहा अतिक्रमण का शिकार


पन्ना शहर के निकट स्थित प्राचीन लोकपाल सागर तालाब का द्रश्य। 

अरुण सिंह,पन्ना। राजाशाही जमाने में पन्ना शहर व आसपास तत्कालीन बुन्देला राजाओं ने विशालकाय तालाबों का निर्माण कराया था। इन अनूठी जल संरचनाओं को सहेजने और उनका संरक्षण करने के बजाय हम उनका वजूद ही मिटाये दे रहे हैं। पन्ना का प्राचीन लोकपाल सागर तालाब जो क्षेत्र के किसानों व पन्ना शहरवासियों के जीवन का आधार है, वह अतिक्रमण के चलते निरन्तर सिकुड़ता जा रहा है। तालाब के जीर्णोद्धार व कैचमेन्ट बढ़ाने के कार्य में सिंचाई विभाग द्वारा भी कोई रूचि नहीं ली जा रही, जिससे इस अनमोल धरोहर का वजूद संकट में है।
उल्लेखनीय है कि पन्ना-पहाड़ीखेरा मार्ग पर शहर के निकट 492 एकड़ क्षेत्र में लोकपाल सागर तालाब का निर्माण पन्ना नरेश महाराजा लोकपाल सिंह द्वारा कराया गया था। इस तालाब की निर्माण शैली जहां अद्वितीय है वहीं कैचमेंट एरिया ऐसा है कि सामान्य बारिश होने पर भी तालाब पानी से लबरेज हो जाता था। लेकिन यह अनूठा तालाब विगत कई दशकों से उपेक्षा का शिकार है। तालाब का कैचमेन्ट भी अतिक्रमण के चलते अनुपयोगी हो गया है, जिससे अच्छी बारिश होने पर भी यह तालाब क्षमता के अनुरूप नहीं भर पाता। पूर्व में इस तालाब के पानी से आसपास के कई ग्रामों की हजारों एकड़ कृषि भूमि जहां सिंचित होती रही है, वहीं पन्ना शहर के पेयजल की जरूरत भी इस तालाब के पानी से पूरी होती रही है। लेकिन अब यह विशाल तालाब सिकुड़ता जा रहा है नतीजतन पानी की कमी के कारण किसानों को जरूरत के मुताबिक समय पर पानी नहीं मिल पाता जिससे उनकी फसलें सूख जाती हैं और उत्पादन पर विपरीत असर पड़ता है।
जानकारों के मुताबिक सिंचाई विभाग के आधिपत्य में आ चुके इस तालाब का 25 फीसदी हिस्सा अतिक्रमण की चपेट में आ चुका है। अतिक्रमण करने वाले लोग तालाब की जमीन में खेती करने लगे हैं, कैचमेन्ट बढ़ाने के लिये ङ्क्षसचाई विभाग द्वारा कोई  रूचि न लिये जाने से तालाब में क्षमता के मुताबिक पानी नहीं भर पाता, जिससे आधा हिस्सा खाली रह जाता है और अतिक्रमणकारी बिना किसी बाधा के उस जमीन पर खेती करते हैं। पूर्व में लोकपाल सागर तालाब को भरने के लिये कुडिय़ा नाला व किलकिला फीडर का उपयोग होता रहा है। किलकिला फीडर के जरिये तकरीबन 20 किमी दूर तक का पानी इस तालाब में पहुँचता था, जिससे सामान्य बारिश में भी यह विशाल तालाब न सिर्फ  भर जाता था बल्कि तालाब का मोघा भी चलने लगता था। लोकपाल सागर तालाब को बारिश का पानी फीड करने वाला किलकिला फीडर विगत ढाई दशक से पूरी तरह अनुपयोगी हो गया है तथा इसकी नहर जिससे होकर तालाब तक बारिश का पानी पहुँचता है, उसमें अतिक्रमण हो चुका है। इसका खामियाजा जहां क्षेत्र के किसान भुगत रहे हैं वहीं इस प्राचीन तालाब का अस्तित्व ही संकट में आ गया है।

धरोहर के संरक्षण में सिंचाई विभाग ले रूचि



पन्ना शहर की इस अनमोल जल संरचना के संरक्षण तथा उसे अतिक्रमण से बचाने के लिये सिंचाई विभाग क्यों रूचि नहीं ले रहा, यह आश्चर्य जनक है। मौजूदा समय जिले में अरबों रू. की लागत वाली ङ्क्षसचाई परियोजनाओं पर काम चल रहा है, इन परियोजनाओं के काम पर विभाग के अधिकारी दिन व रात एक किये हैं, क्यों कि इसमें उन्हें लाभ ही लाभ है। लेकिन पन्ना शहर को जीवन प्रदान करने वाले तालाब उपेक्षित पड़े हैं, जबकि बहुत ही कम राशि खर्च किये जाने पर यह तालाब आने वाले कई दशकों के लिये अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंचाई विभाग की रूचि करोड़ों रू. की लागत से निर्मित होने वाले नये बांधों पर है, पुरानी जल संरचनाओं को सहेजने व उनके जीर्णोद्धार पर वे कोई ध्यान नहीं दे रहे जो दुर्भाग्य पूर्ण है।
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