Thursday, July 6, 2023

इंडियन बटर ट्री एक ऐसा वृक्ष जिससे निकलता है घी, आप भी जानें !

 

इंडियन बटर ट्री यानि घी वाला वृक्ष। 

पेड़-पौधों के अद्भुत संसार में ऐसे अनेकों पेड़ हैं जिनके बारे में कम लोगों को जानकारी होती है। अनगिनत खूबियों और औषधीय गुणों से भरपूर ये वृक्ष मानव जीवन के लिए भी अत्यधिक उपयोगी होते हैं। यहाँ हम आपका परिचय एक ऐसे विचित्र वृक्ष से करवाते हैं, जिससे घी निकलता है। यह अनूठा वृक्ष उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है, जो कि घी, गुड़ तथा शहद देता है। इसके अलावा यह वृक्ष फल, औषधि, जानवरों के लिए चारा, इंधन और चूहों को मारने के लिए कीटनाशक भी उपलब्ध कराता है। इस पेड़ों के बीजों से इतना तैलीय पदार्थ निकलता है कि एक अंग्रेज अफसर ने इसका नाम घी वाला वृक्ष अर्थात इंडियन बटर ट्री रख दिया।

स्थानीय लोग इसे च्यूरा कहते हैं, इसका वानस्पतिक नाम डिप्लोनेमा बुटीरैशिया है। यह बहुमूल्य वृक्ष कुमाऊँ और पिथौरागढ़ जनपद तथा भारत नेपाल की सीमा पर काली नदी के किनारे 3 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है, इसके पेड़ 12 से 21 मीटर तक ऊंचे होते हैं। वहां उसे ज्यादा तादाद में उगाने का प्रयास किया जा रहा है। 

यह वृक्ष यहां की जलवायु में ही पनपता है, अतः वहां के लोगों के लिए यह कल्पवृक्ष के समान है । उन लोगों के लिए घी का यही एकमात्र साधन है। जिसके पास फल देने वाले 3-4  वृक्ष होते हैं, उसे साल भर बाजार से वनस्पति घी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। यह एक छायादार वृक्ष होता है, फूल आने का समय अक्टूबर से जनवरी होता है तथा जुलाई-अगस्त में इसके फल पक जाते हैं। पके हुए फल पीले रंग के होते हैं, खाने में काफी स्वादिष्ट और सुगंधित होते हैं । वातावरण में फैली इस फल की मीठी महक से ही मालूम पड़ जाता है कि फल पकने लगा है। गांव के लोग इन फलों को बड़े चाव से खाते हैं।

पहाड़ के घाटी वाले क्षेत्रों में इसके जब फूल खिलते हैं तब शहद का काफी उत्पादन होता है। इसकी पत्तियां चारे व भोजन पत्तल के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग में लाई जाती हैं। च्यूरे की खली मोमबत्ती, वैसलीन और कीटनाशक बनाने के काम आती है। जिन क्षेत्रों में च्यूरे के पेड़ पाये जाते हैं उन क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन भी किया जाता है। च्यूरे के पुष्प मकरंद से भरे रहते हैं जिससे उच्च कोटि का शहद तैयार होता है। इंडियन बटर ट्री के नाम से जाना जाने वाला च्यूरा पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर और चम्पावत जिलों के काली, सरयू, पूर्वी रामगंगा और गोरी गंगा नदी घाटियों में पाया जाता है। इसका फल बेहद मीठा होता है। फल के बीज से घी बनाया जाता है। घी वाला वृक्ष अर्थात इंडियन बटर ट्री के नाम से जाना जाने वाला च्यूरा मैदानी क्षेत्रों में पाये जाने वाले बहुपयोगी वृक्ष महुआ की पहाड़ी प्रजाति भी माना जा सकता है। 

च्यूरा से प्राप्त घी के विभिन्न उपयोग

च्यूरा के बीज से प्राप्त घी का प्रयोग प्रकाश हेतु दिए जलाने में भी किया जा सकता है। अगर इस घी को मोमबत्ती की तरह मोम की जगह उपयोग किया जाता है तो यह अच्छा प्रकाश तो देता ही है साथ ही सामान मात्रा के मोम या घी से दुगुने से भी ज्यादा समय तक प्रकाश देता है। इसे जलाने पर आस-पास के वातावरण में एक मधुर सुगंध भी फ़ैल जाती है। यह घी प्रकाश हेतु तेल के रूप में इस्तेमाल करने पर बहुत कम  धुआं उत्सर्जित करता है अर्थात इसमें से बहुत कम कार्बन उत्सर्जन होता है। जिस कारण इसका उपयोग पंपसेट, जनरेटर आदि में जैव ईंधन के रूप में विशेष रूप से किया जा सकता है। इस घी का प्रयोग प्राकृतिक मोम की तरह जाड़ों में त्वचा को फटने सेरोकने के लिए एंटी क्रैकिंग क्रीम के रूप में भी किया जा सकता है।

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Saturday, June 10, 2023

पन्ना की लकवाग्रस्त बाघिन पी- 234 का वन विहार भोपाल में चल रहा इलाज

  •  बाघिन के दो नन्हे शावक अकोला बफ़र क्षेत्र में अपनी मां का कर रहे इंतजार 
  •  दोनों नन्हे शावकों की देखरेख के लिए वन कर्मचारियों को किया गया तैनात 

बाघिन पी-234 अपने शावकों के साथ अकोला बफ़र क्षेत्र में अठखेलियां करते हुए।   

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व की बाघिन पी- 234 के अचानक लकवाग्रस्त हो जाने से उसके दो नन्हे शावकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बाघिन को इलाज के लिए शुक्रवार 9 जून को दोपहर में पन्ना से वन विहार भोपाल ले जाया गया है, जहाँ बाघिन का इलाज जारी है। मां की गैरमौजूदगी में उसके नन्हे शावकों की देखरेख के लिए पार्क प्रबंधन ने वन कर्मचारियों को तैनात किया है, जो शावकों की निगरानी कर रहे हैं। 

उल्लेखनीय है कि बाघिन पी- 234 बीते माह 29 मई को अपने दो नन्हे शावकों के साथ अकोला बफ़र क्षेत्र में अठखेलियां करते हुए देखी गई थी। यह खुशखबरी पार्क प्रबंधन द्वारा सोशल मीडिया में साझा किया गया था, जिससे वन्य जीव प्रेमी बेहद खुश और उत्साहित थे। लेकिन इस खुशखबरी के कुछ दिन बाद ही यह दुःखद खबर आ गई जो चिंता में डालने वाली है। अकोला बफ़र क्षेत्र में भ्रमण के दौरान पर्यटकों ने बीते रोज जब दोनों पैरों को घसीट कर चलती हुई बाघिन पी- 234 को देखा तो उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में डाल दिया गया जो वायरल हो गया। जानकारी मिलते ही पार्क प्रबंधन भी तुरंत सक्रिय हो गया तथा बाघिन का प्राथमिक उपचार करने के साथ उसे ट्रेंकुलाइज कर इलाज के लिए भोपाल भिजवाया गया। 

 लकवाग्रस्त होने पर पिछले पैरों के सहारे खड़ी होने में असमर्थ बाघिन का पीड़ादायी द्रश्य। 

पन्ना टाइगर रिज़र्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार की रात में ही बाघिन वन विहार भोपाल पहुँच गई है जहाँ विशेशज्ञ चिकित्सकों की टीम द्वारा बाघिन का इलाज किया जा रहा है। डॉ. गुप्ता भी बाघिन के साथ भोपाल गए हैं तथा बाघिन की हालत में सुधार होने तक वहीँ रहेंगे। आपने बताया की बाघिन पीछे के पैरों पर जोर नहीं डाल पा रही है, यह सब यकायक हुआ है। लेकिन बिना देरी के चूँकि इलाज भी तुरंत शुरू हो चुका है इसलिए जल्दी रिकवरी की उम्मीद है। हालात में सुधार होने पर बाघिन पी- 234 को पन्ना लाकर अकोला बफ़र में उसके बच्चों के पास छोड़ा जायेगा।

 बाघिन पी- 234 के कुनबे से आबाद है अकोला बफ़र 



पन्ना टाइगर रिजर्व के अकोला बफर का आकर्षण बाघिन पी- 234 तथा उसका भरा-पूरा कुनबा है। मालूम हो कि पन्ना टाइगर रिजर्व की संस्थापक बाघिन टी-2 जिसे मार्च 2009 में कान्हा से पन्ना लाया गया था, इस बाघिन ने जुलाई 2013 में चार शावकों को जन्म दिया था। इन्हीं शावकों में से एक बाघिन पी-234 है, जिसके कुनबे ने अकोला बफर को गुलजार किया हुआ है। इस बाघिन ने नर बाघ टी-7 के साथ मिलकर अपने कुनबे को बढ़ाया है। इसी बाघिन की बेटी पी-234 (23) ने अकोला बफर क्षेत्र में ही जनवरी 2021 में तीन शावकों को जन्म दिया था।  इस तरह से बाघिन पी- 234 के कारण ही अकोला बफर बाघों से आबाद हुआ जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

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Friday, June 9, 2023

देश व दुनिया में प्रसिद्ध पन्ना के हीरों को मिलेगा जीआई टैग

  • विगत 7 जून 23 को किया गया आवेदन हुआ स्वीकृत 
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में पन्ना के हीरों की बढ़ेगी चमक 


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बेशकमती रत्न हीरा की खदानों के लिए देश और दुनिया में प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की धरती से निकलने वाले हीरों को जीआई टैग मिलेगा। इसके लिए 7 जून 23 को किया गया आवेदन स्वीकृत हो गया है। जल्दी ही पन्ना की रत्नगर्भा धरती से निकलने वाले हीरों को जीआई टैग मिल जाएगा।  

हीरा अधिकारी पन्ना रवि पटेल ने बताया कि जीआई टैग मिलने से पन्ना के हीरो की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैल्यू बढ़ेगी। इसकी खूबी बताते हुए श्री पटेल ने कहा कि जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) यानी भौगोलिक संकेत एक प्रतीक है, जो मुख्य रूप से किसी उत्पाद को उसके मूल क्षेत्र से जोड़ने के लिए दिया जाता है। जिस वस्तु को यह टैग मिलता है वह उसकी विशेषता बताता है।  

पन्ना के हीरों को जीआई टैग मिले इसके लिए ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी लखनऊ द्वारा चेन्नई स्थित संस्था में आवेदन किया गया था। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के तहत काम करने वाली यह संस्था पूरी जांच पड़ताल और छानबीन के बाद जीआई टैग देती है। जीआई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस प्रोडक्ट की कीमत व महत्व बढ़ जाता है।


उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की पहचान सदियों से यहां की धरती से निकलने वाले बेशकीमती हीरों के कारण है, यही वजह है की पन्ना को डायमंड सिटी के नाम से भी जाना जाता है। जी आई टैग मिलने से पन्ना के हीरो की चमक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी, जिसका लाभ निश्चित ही पन्ना के हीरा व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलेगा। 

मालुम हो कि 2003 में जीआई टैग की शुरुआत के बाद भारत में पहला जीआई टैग दार्जिलिंग की चाय को साल 2004 में मिला था। उसके बाद देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्र विशेष की पहचान बन चुके अनेकों उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। इनमें कश्मीर का केसर और पश्मीना शॉल, नागपुर के संतरे, बंगाली रसगुल्ले, बनारसी साड़ी, तिरुपति के लड्डू, रतलाम की सेव, बीकानेरी भुजिया, झाबुआ का कड़कनाथ, चन्देरी साड़ी, महोबा का पान आदि शामिल है। उत्पाद के पंजीकरण और उसके संरक्षण के लिए दिसंबर १९९९ में एक एक्ट पारित किया गया था। इस एक्ट को Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया।

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Tuesday, June 6, 2023

घना जंगल, गहरा सेहा और मौत के मुंह में फंसी गाय !

चारों तरफ घनघोर जंगल, नीचे हजारों फीट गहरा सेहा जहां गिरने का मतलब सीधे मौत। इसी जगह पर लाल रंग की एक प्यारी सी गाय फंसी हुई थी, जहां से निकलने का कहीं कोई भी रास्ता नहीं था। जाहिर है कि गाय की मौत निश्चित थी। लेकिन यहां "जाको राखे साइयां मार सके ना कोय" वाली बात अक्षरसः  चरितार्थ हुई। इसी जगह पर अचानक हम लोग पहुंचे और गाय को मुसीबत में देख पास के गांव से ग्रामीणों को बुलाया। परिणाम स्वरूप गाय मौत के मुंह से सुरक्षित बचा ली गई। 


पल्थरा गांव के पास स्थित वह खतरनाक गहरा सेहा जहाँ गाय फँसी हुई थी। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। जिला मुख्यालय पन्ना से तकरीबन 35 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत रहुनिया के छोटे से गांव पल्थरा में समाजसेवी संस्था समर्थन द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर 5 जून को पौधरोपण सहित अन्य कई गतिविधियों वाला कार्यक्रम रखा गया था। इस कार्यक्रम में समर्थन संस्था के रीजनल कोऑर्डिनेटर ज्ञानेंद्र तिवारी जी के साथ मैं भी पहुंचा। घने जंगलों के बीच एक छोटा सा गांव पल्थरा स्थित है, जहां 35 आदिवासी परिवार रहते हैं। 

इस अनूठे गांव की अपनी कुछ खूबियां और विशेषताएं हैं, जिस पर अलग से कभी चर्चा करूंगा। विश्व पर्यावरण दिवस पर यहां मिडिल क्लास तक पढ़ने वाले ग्रामीण बच्चों के बीच पेंटिंग प्रतियोगिता भी आयोजित हुई, जिसमें बच्चों ने बड़े ही उत्साह के साथ भाग लिया। पल्थरा गांव के आदिवासी बच्चों ने अपने अंदाज में प्रकृति को चित्रित किया जो उनके लिए बेहद सहज और स्वाभाविक था। प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ी अनेकों गतिविधियों व हांथ धुलाई कार्यक्रम के बाद जामुन के एक विशाल वृक्ष की छांव में सभी ने गकड़िया-भर्ता और खीर का आनंद लिया। इस मौके पर ग्रामीण बच्चों की अनोखी खेल गतिविधि भी जारी रही। ग्रामवासियों के बीच दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चला।

शाम को लगभग 5 बजे हम लोग पल्थरा से पन्ना के लिए रवाना हुए। हमारी गाड़ी कुछ दूर ही चली होगी, उसी समय मुझे याद आया कि इस गांव के आसपास कोई बड़ा और गहरा सेहा है जो पन्ना के कौआ सेहा से भी अधिक गहरा तथा यहां का जंगल भी घना है। इस सेहा का जिक्र करने पर मेरे बगल में बैठे ज्ञानेंद्र जी बोले वह सेहा यही कहीं पास में ही है, आप यदि देखना चाहो तो वहां चलते हैं। जाहिर सी बात है मैंने कहा अभी समय है चलो चलते हैं। फिर क्या था गाड़ी पन्ना की तरफ से मुड़कर रहुनिया मार्ग पर चलने लगी। बमुश्किल चार-पांच किलोमीटर चलने पर हम लोग उस सेहा के निकट पहुंच गए जो सड़क मार्ग से साफ नजर आता है।

सेहा का नजारा, चारों तरफ घना जंगल और वनाच्छादित पहाड़ियां। 

बेहद उत्सुकता के साथ चट्टानों को पार करते हुए जब हम इस सेहा के निकट पहुंचे, तो वहां का नजारा देख हैरत में पड़ गए। जहां तक नजर जाए चारों तरफ घना जंगल और वनाच्छादित पहाड़ियां दिख रही थीं, सेहा की गहराई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। इस सेहा के ऊपर दर्जनों की संख्या में गिद्ध मंडरा रहे थे। वहां की सीधी पहाड़ी व चट्टानों पर बिखरी सफेदी को देख प्रतीत हो रहा था कि यह सेहा गिद्धों का भी प्रिय रहवास है। हम लोग प्रकृति के इस अद्भुत नजारे को अपने मोबाइल कैमरे में कैद ही कर रहे थे कि अचानक हमारी नजर लाल रंग की गाय पर पड़ी। हम जहां खड़े थे वहां से तकरीबन 15-20 फीट नीचे एक विशालकाय चट्टान की किनारे यह गाय खड़ी थी। इस चट्टान के बाद नीचे पाताल जैसा दिखने वाला सेहा था, जिसमें गिरने का मतलब मौत तो है ही अस्थि पंजर भी मिल पाना संभव नहीं है।

गाय को किस जतन से ऊपर सुरक्षित लाया जाय, इस पर मशविरा करते समाजसेवी युवक व ग्रामीण।  

हम लोग इस गाय को वहां देख हैरत में पड़ गए कि आखिर यह वहां पहुंची कैसे ? क्योंकि नीचे गहरा सेहा और जहां गाय थी वहां से ऊपर जाने का कोई रास्ता नहीं। ऐसा लग रहा था कि यह गाय जाने अनजाने यहां गिर गई होगी और फिर यहां फसकर रह गई। चट्टान में गाय का गोबर जहां तहां पड़ा था, जो सूखकर कंडी में तब्दील हो चुका था। इससे यह अनुमान लगा कि यह गाय यहां पर कम से कम तीन-चार दिनों से है। एक दिन पूर्व ही बारिश हुई थी, जिससे चट्टान में एक जगह पानी भर गया था। शायद यह पानी ही भीषण गर्मी में भूखी और प्यासी गाय के लिए जीवनदायी साबित हुआ। 

प्रकृति के अद्भुत नजारों से हमारा ध्यान हटकर अब मौत के मुंह पर फंसी इस गाय पर केंद्रित हो गया। इसे ऐसी हालत में छोड़कर जाने को दिल तैयार नहीं था, फलस्वरुप सोचने लगे कि क्या करें, इसे कैसे मुसीबत से बाहर निकालें। हम चार-पांच लोग थे लेकिन हम सब मिलकर भी गाय को 15-20 फिट ऊपर नहीं खींच सकते थे। ऐसी स्थिति में सड़क मार्ग से गुजरने वाले लोगों को आवाज देकर बुलाने का प्रयास किया, लेकिन वहां का परिवेश, गहरा सेहा और घनघोर जंगल होने के कारण कोई भी राहगीर रुकना तो दूर वे और तेजी से निकल भागे। कोई उपाय न देख ज्ञानेन्द्र जी ने अपने समाजसेवी साथी राजकुमार जी को फोन किया जो पल्थरा गांव में ही थे। उन्हें सारी बात बताई और कहा कि इस गाय को बचाना जरूरी है अन्यथा यह सेहा में गिरकर मर जाएगी।  

गाय के कमर व अगले हिस्से में रस्सा बांधकर ऊपर खींचा गया। 

स्वभाव से बेहद संवेदनशील राजकुमार जी ने मामले की गंभीरता को समझा और बिना देरी किए गाय को बचाने की मुहिम में जुट गए। गांव में मोटे रस्से  ढूंढे गए तथा गांव के कुछ युवकों को तैयार कर गाड़ी से तुरंत सेहा के लिए रवाना हुए। इतने सारे लोगों को वहां पर देख गाय की आंखों में भी उम्मीद की किरण जागी कि शायद अब बच जाऊंगी। उसे पेड़ से पत्ते तोड़ कर दिया गया तो वह निश्चिंत भाव से पत्ते खाने लगी। जब कुछ युवक नीचे उतर कर गाय के पास पहुंचे तो उसने भी सहयोग किया और शांत खड़ी रही।  

मौत के मुंह से सुरक्षित निकलकर अपने ठिकाने की तरफ जाती गाय। 

मोटे रस्से से गाय को कमर व आगे के हिस्से में बांधा गया और ऊपर खड़े लोगों ने आहिस्ता-आहिस्ता सावधानी पूर्वक गाय को ऊपर खींचा।  देखते ही देखते गाय सुरक्षित ऊपर पहुंच गई। जब रस्सी खोली गई तो वह उठ कर खड़ी हुई और वहां मौजूद लोगों को प्यार भरी नजर से देखा और फिर चल पड़ी। गाय को इस तरह जाते देख मन आनंदित और प्रफुल्लित हो गया। विश्व पर्यावरण दिवस पर हम लोगों की यह सबसे अच्छी और सुकून प्रदान करने वाली गतिविधि रही जो निश्चित ही अविस्मरणीय रहेगी।

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Saturday, May 27, 2023

क्या आपने भी देखा और जिया है गांव की यह जिंदगी ?


यदि आपने :

बखरी की कोठरी के ताखा में जलती ढेबरी देखी है।

दलान को समझा है।

ओसारा जानते हैं।

दुवारे पर कचहरी (पंचायत) देखी है।

राम राम के बेरा दूसरे के दुवारे पहुंच के चाय पानी किये हैं।

दतुअन किये हैं।

दिन में दाल-भात-तरकारी

खाये हैं।

संझा माई की किरिया का मतलब समझते हैं।

रात में दिया और लालटेम जलाये हैं।

बरहम बाबा का स्थान आपको मालूम है।

डीह बाबा के स्थान पर गोड़ धरे हैं।

तलाव (ताल) के किनारे और बगइचा के बगल वाले पीपर और स्कूल के रस्ता वाले बरगद के भूत का किस्सा (कहानी) सुने हैं।

बसुला समझते हैं।

फरूहा जानते हैं।

कुदार देखे हैं।

दुपहरिया मे घूम-घूम कर आम, जामुन, अमरूद खाये हैं।

बारी बगइचा की जिंदगी जिये हैं।

चिलचिलाती धूप के साथ लूक के थपेड़ों में बारी बगइचा में खेले हैं।

पोखरा-गड़ही किनारे बैठकर लंठई किये हैं।

पोखरा-गड़ही किनारे खेत में बैठकर ५-१० यारों की टोली के साथ कुल्ला मैदान हुए हैं।

गोहूं, अरहर, मटरिया  का मजा लिये हैं

अगर आपने जेठ के महीने की तीजहरिया में तीसौरी भात खाये हैं,

अगर आपने सतुआ का घोरुआ पिआ है,

अगर आपने बचपन में बकइयां घींचा है।

अगर आपने गाय को पगुराते हुए देखा है।

अगर आपने बचपने में आइस-पाइस खेला है।

अगर आपने जानवर को लेहना और सानी खिलाते किसी को देखा  है।

अगर आपने ओक्का बोक्का तीन तलोक्का नामक खेल खेला है।

अगर आपने घर लिपते हुए देखा है।

अगर आपने गुर सतुआ, मटर और गन्ना का रस के अलावा कुदारी से खेत का कोन गोड़ने का मजा लिया  है।

अगर आपने पोतनहर से चूल्हा पोतते हुए देखा है।

अगर आपने कउड़ा/कुंडा/ सिगड़ी/ कंडा  तापा है।

अगर आप ने दीवाली के बाद दलिद्दर खेदते देखा है।

तो समझिये की आपने एक अद्भुत ज़िंदगी जी है, और इस युग में ये अलौकिक ज़िंदगी ना अब आपको मिलेगी ना आने वाली  पीढ़ी को  क्योंकि आज उपरोक्त चीजें विलुप्त प्राय होती जा रही हैं या हो चुकी हैं।

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Tuesday, May 23, 2023

महाकाल लोक की तर्ज पर पन्ना में बनेगा जुगल किशोर सरकार लोक

  •  पन्ना गौरव दिवस पर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चैहान ने की घोषणा 
  •  धरमसागर तालाब में महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा स्थापित होगी

पन्ना गौरव दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को तलवार भेंट करते मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। उज्जैन के महाकाल लोक की तर्ज पर मंदिरों की नगरी पन्ना में जुगल किशोर सरकार लोक बनेगा। इस आशय की घोषणा प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने सोमवार की रात्रि बुन्देल केसरी महाराजा छत्रसाल की जयंती के अवसर पर पन्ना गौरव दिवस के आयोजन में की। पन्ना को पवित्र धार्मिक नगरी बताते हुए उन्होंने कहा कि जुगल किशोर सरकार लोक में चारों मंदिर परिसर सम्मिलित किए जाएंगे। सुझाव और सलाह लेकर बनाया जाएगा जुगल किशोर लोक। स्थानीय छत्रसाल स्टेडियम में आयोजित गौरव दिवस समारोह में केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री  कमल पटेल, खनिज साधन एवं श्रम मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह, सांसद विष्णुदत्त शर्मा सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री श्री चैहान ने लोगों को महाराजा छत्रसाल से प्रेरणा लेने और उनके आदर्शों का अनुसरण करने के उद्देश्य से धर्मसागर तालाब में उनकी प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा भी की। मुख्यमंत्री श्री चैहान ने पन्ना जिले के विकास के लिए 178.51 करोड़ के विभिन्न निर्माण कार्यों का भूमिपूजन एवं लोकार्पण गौरव दिवस समारोह के अवसर पर किया। जनप्रतिनिधियों की मांग पर श्री चैहान ने कहा कि जब 10 लाख तक की आबादी वाले शहरों/जिलों में मेडिकल काॅलेज खोले जाने का फैसला होगा, तब उसमें पन्ना को भी शामिल किया जाएगा। श्री चैहान ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार पन्ना के विकास में कोई कसर शेष नहीं छोड़ेगी। उन्होंने बताया कि पन्ना को आज विकास की कई सौगातें दी गई हैं। वर्ष 2018 में कृषि महाविद्यालय की मांग की गई थी, बाद में उसे तत्कालीन सरकार द्वारा अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया गया था, जिसे अब पन्ना में पुनः वापिस लाया गया है।


महाराजा छत्रसाल की गौरव गाथा का जिक्र करते हुए श्री चैहान ने कहा कि वह महान योद्धा थे जो कभी पराजित नहीं हुए। उनके राज्य की सीमाएं विशाल थीं। पन्ना को अद्भुत शहर बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां के त्यौहार, मेले, लोक कलाएं, व्यंजन, संस्कृति और सभ्यता विशिष्ट है। हीरे की चमक की तरह हमें पन्ना की पहचान यथावत बनाए रखना होगी। राज्य सरकार रोजगार और स्वरोजगार देने के साथ ही सभी विकास कार्य कर रही है साथ ही लोगों का जीवन स्तर भी सुधार रही है। इसके लिए अनेक योजनाएं चल रही हैं। मुख्यमंत्री ने कलेक्टर को निर्देश दिए कि जांच के बाद जुगल किशोर मंदिर के कार्य में गडबड़ी करने वालों को बख्शा नहीं जाए। समारोह में लाड़ली बहनों ने मुख्यमंत्री को 51 मीटर की चुनरी और एक बड़ी राखी भेंट की तथा उन्हें राखी भी बांधी। श्री चैहान ने नगर की अनेक प्रतिभाओं को सम्मानित भी किया।

मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने मुख्यमंत्री का छत्रसाल जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने पर आभार माना तथा धरमसागर तालाब में महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा स्थापित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि महाराजा छत्रसाल का हृदय विशाल था। उन्होंने अनेक युद्ध किए पर कभी हारे नहीं। बुन्देलखण्ड को मुगलों से मुक्त कराया। सांसद विष्णुदत्त शर्मा ने कहा कि कृषि महाविद्यालय की स्थापना होने से अब कृषि के क्षेत्र में अनुसंधान हो सकेगा। रेलवे स्टेशन प्रारंभ होने से पन्ना के विकास के नये आयाम स्थापित होंगे। उन्होंने कहा कि हम सब मिल कर पन्ना का विकास करेंगे। प्रारंभ में मुख्यमंत्री श्री चैहान ने कन्यापूजन एवं महाराजा छत्रसाल के चित्र पर माल्यार्पण कर समारोह का शुभारंभ किया। मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने मुख्यमंत्री व अन्य अतिथियों को साफा बांध एवं तलवार भेंट कर स्वागत किया। कार्यक्रम को श्रीमती मीना पाण्डेय ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध गायिका सुश्री कविता पौडवाल द्वारा सुमधुर गीतों की प्रस्तुति की गई।

178.51 करोड़ के निर्माण कार्यों का हुआ भूमिपूजन और लोकार्पण



मुख्यमंत्री श्री चैहान ने आज पन्ना में कुल 178 करोड़ 51 लाख 48 हजार रुपए के 14 विभिन्न कार्यों का शिलान्यास एवं लोकार्पण किया। उन्होंने 6 करोड़ रुपए की लागत के नवीन कृषि महाविद्यालय एवं 25 करोड़ लागत के नवीन रेलवे स्टेशन के निर्माण कार्य के शिलान्यास के अलावा गौरव दिवस के कार्यक्रम में 2.89  करोड़ के अजयगढ़-कुंवरपुर-राजापुर मार्ग,  डुबकी में 40.81 लाख के करहिया-डुबकी मार्ग, 1 करोड़ 2 लाख 80 हजार  के कल्याणपुर से सरकोहा मार्ग, 33.06 लाख  से वार्ड 11 के मुक्तिधाम में विभिन्न विकास कार्य, 26.04 लाख से वार्ड क्रमांक 3 के मुक्तिधाम में विभिन्न विकास कार्य, 53.96 लाख के वार्ड 18 में सागर तालाब के विकास कार्यों का लोकार्पण किया। मुख्यमंत्री ने 2 करोड़ 27 लाख 55 हजार लागत से ग्राम पंचायत बहिरवारा के ग्राम रतनपुरा से मुख्य मार्ग(3.50 किमी), 50 लाख से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अजय गढ़  में  पब्लिक हेल्थ यूनिट के निर्माण, 20 करोड़ से महेंद्र भवन पैलेस का हेरिटेज होटल के रूप में उन्नयन, 46.42 करोड़ से अमृत 2.0  के अंतर्गत जल प्रदाय एवं वाटर बॉडी रिजुविनेशन के विकास कार्य, 15 करोड़ लागत से सकरिया रोड स्थित हवाई पट्टी का पुनर्निर्माण, 3.86 करोड़ से निर्मित होने वाले जुगल किशोर इंडोर स्टेडियम का शिलान्यास भी किया।

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Sunday, May 21, 2023

पन्ना की पुकार : हीरे, मंदिर और जंगल, अब चाहिए "मंगल" !

भव्य प्राचीन मंदिरों और हीरा की खदानों के लिये प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में प्रकृति ने सृजन के विविध रूपों को जिस तरह से प्रकट किया है वह  मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। पहली बार जो कोई भी यहाँ आता है, इस रत्नगर्भा धरती के अतुलनीय सौन्दर्य को निहारकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। लेकिन प्रकृति के अनुपम सौगातों का पन्ना के विकास की दिशा में रचनात्मक उपयोग नहीं हो सका। पर्यटन विकास की असीम संभावनायें मौजूद होने के बावजूद अभी तक यह जिला पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र नहीं बन सका है। 



।। अरुण सिंह ।।   

पन्ना। यहां प्राचीन भव्य मन्दिरों के अलावा ऐतिहासिक महत्व के स्थलों, खूबसूरत जल प्रपातों व प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण मनोरम स्थलों की भरमार है। इनका समुचित ढंग से प्रचार-प्रसार न होने के कारण देशी व विदेशी पर्यटक इस जिले की खूबियों से अनभिज्ञ हैं। यही वजह है कि पर्यटकों को आकर्षित  करने की खूबियों के बावजूद पन्ना पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं हो सका। लेकिन अब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विशेष रूचि प्रदर्शित करते हुए जिस तरह से बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल की जयंती को गौरव दिवस के रूप में मनाने की अभिनव पहल की है उससे मन्दिरों के शहर पन्ना को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किये जाने की उम्मीद जागी है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिला विन्ध्य की ऊँची-नीची पर्वत श्रंखलाओं पर बसा हुआ हैै। जिले की सीमायें हरी-भरी, मनमोहक वादियों से आच्छादित हैं। सीमा में प्रवेश होते ही कलकल निनाद करती नदियां, झरझर के स्वर बिखेरते प्रपात एवं पक्षियों की चहचहाट सप्तस्वर लहरियां बिखेर देती हैं। तब ऐसा प्रतीत होता है कि मार्गों के दोनों तरफ वृक्षों की टहनियां हवा में लहराकर आगंतुकों का स्वागत कर रही हैं। यहां के मन्दिर लोगों को अनायाश ही अपनी ओर खींच लेते हैं जो भी मन्दिर परिसर में पहुँच जाता है वह इन मन्दिरों की स्थापत्य कला व भव्यता को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। इतना ही नहीं इस जिले मेें अनेकानेक प्राकृतिक स्थल, धार्मिक स्थल, ऐतिहासिक इमारतें और विश्व प्रसिद्ध हीरा की खदानें स्थित हैं। यहां की प्रकृति और इमारतें सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुये हैं। वनवास के दौरान मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम पन्ना जिले से होकर गुजरे थे, जिसके चिह्न यहां आज भी मौजूद हैं। जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 16 किमी दूर सुतीक्षण आश्रम तथा सलेहा के निकट स्थित अगस्त ऋषि आश्रम भगवान राम के वन पथ गमन की यादों को अपने जेहन में आज भी संजोये हुये है। धार्मिक  महत्व के इन प्राचीन स्थलों का यदि योजनाबद्ध तरीके से विकास किया जाये तो ये स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकते हैं। इस पुण्य भूमि में अनेकों ऋषि मुनियों ने भी अपने जीवन का लम्बा समय बिताया है, जिसके चलते इस भूमि को यदि तपोभूमि कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

पन्ना में मानसून पर्यटन के विकास की विपुल संभावनाएं



प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व में पन्ना प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि पन्ना शहर के आस-पास स्थित प्राकृतिक मनोरम स्थलों व जल प्रपातों का विकास कर यहां मानसून पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये प्रयास किये जायेंगे ताकि बारिश के मौसम में जब पन्ना टाईगर रिजर्व के गेट पर्यटकों के भ्रमण हेतु बंद हो जायें, उस समय भी पर्यटक यहां आकर प्रकृति के अद्भुत नजारों का आनन्द ले सकें। इससे यहां पर रोजगार के नये अवसरों का जहां सृजन होगा, वहीं मन्दिरों के शहर पन्ना को एक खूबसूरत पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकेगा। मुख्यमंत्री जी की इस सोच व घोषणा की पन्नावासियों ने सराहना की थी, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई सार्थक पहल व प्रयास नहीं हुये। मालुम हो कि पन्ना शहर के आस-पास 10 किमी के दायरे में प्राकृतिक व ऐतिहासिक महत्व के ऐसे अनेकों स्थल व जल प्रपात हैं, जिनको यदि पर्यटकों की दृष्टि से विकसित कर दिया जाये तो ये स्थल आकर्षण का केन्द्र बन सकते हैं।

जिला मुख्यालय पन्ना से 10 किमी. की दूरी पर सड़क मार्ग के निकट स्थित लखनपुर सेहा का घना जंगल तथा ऊँची मीनार जैसा नजर आने वाला यहां का मशरूम राक देखने जैसा है। गौरतलब है कि पन्ना जिले को प्रकृति ने अनुपम सौगातों से नवाजा है। यहां के हरे-भरे घने जंगल, अनूठे जल प्रपात व गहरे सेहे देखकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि यहां इतना सब है फिर भी यह इलाका उपेक्षित और पिछड़ा क्यों है? पन्ना शहर में जहां प्राचीन भव्य व विशाल मन्दिर हैं वहीं इस जिले में ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भी भरमार है। प्रकृति तो जैसे यहां अपने बेहद सुन्दर रूप में प्रकट हुई है। यदि इन सभी खूबियों का सही ढंग से क्षेत्र के विकास व जन कल्याण में रचनात्मक उपयोग हो तो इस पूरे इलाके का कायाकल्प हो सकता है। 

पन्ना शहर के बेहद निकट स्थित लखनपुर का सेहा एक ऐसा स्थान है जो इस जिले को पर्यटन के क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान दिलाने की क्षमता रखता है। लखनपुर सेहा के अलावा पन्ना शहर के ही निकट गौर का चौपड़ा, खजरी कुड़ार गाँव के पास चरही, कौआ सेहा, बृहस्पति कुण्ड सहित अनेकों स्थल हैं जो उपेक्षित पड़े हैं। यदि इन मनोरम स्थलों को विकसित किया जाकर सही तरीके से प्रस्तुत किया जाये तो पर्यटक यहां खिंचे चले आयेंगे। इन सभी स्थलों को चिह्नित करते हुये वहां तक सुगम मार्ग व बुनियादी सुविधायें यदि उपलब्ध करा दी जायें तो ये स्थल बारिश के मौसम में पर्यटकों से गुलजार हो सकते हैं।

 जर्जर हो चुकी धरोहरें बदल सकती हैं पन्ना जिले की तकदीर



सदियों पुराने जर्जर और बदहाल हो  चुके किले पन्ना जिले की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकते  हैं। यदि इन प्राचीन धरोहरों का सही  ढंग से कायाकल्प कराकर सुनियोजित विकास किया जाए तो ये देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकते  हैं। इस जिले में भव्य और अनूठे मन्दिरों की पूरी श्रृंखला व प्राकृतिक मनोरम स्थलों की भरमार है, फिर भी पन्ना पर्यटन की दृष्टि से अपनी पहचान बना पाने में कामयाब नहीं हो सका है। पन्ना टाईगर रिजर्व की दम पर खजुराहो  में पर्यटन उद्योग खूब फल फूल रहा  है और सब कुछ रहते हुए भी पन्ना आज भी उपेक्षित और दीनहीन बना हुआ है।

किसी समय चन्देल राजाओं के शक्ति का केन्द्र रहा पन्ना जिले का ऐतिहासिक अजयगढ़ दुर्ग स्वाधीनता के बाद प्रशासनिक उपेक्षा के चलते खण्डहर में तब्दील होता जा रहा  है। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी की दूरी पर विन्ध्यांचल की दुर्गम पर्वत श्रेणियों पर स्थित यह अजेय दुर्ग अपने जेहन में भले ही वीरता की अनेकों गौरव गाथायें सहेजे है, लेकिन इसके बावजूद यहां  भूले भटके भी पर्यटक दिखाई नहीं देते। चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित इस दुर्ग की वास्तुकला के अवशेषों का अवलोकन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि खजुराहो और कालींजर के विश्व प्रसिद्ध शिल्प के शिल्पियों के हांथ में इतनी पैनी छैनियां नहीं थीं, जितनी की अजयगढ़ दुर्ग के वास्तुकारों के पास थीं। वास्तव में अजयगढ़ का किला वास्तु शिल्प की दृष्टि से अधिक कलात्मक, अनूठा और बेजोड़ है।

खजुराहो शिल्प में यक्ष-यक्षिणी की मैथुन मुद्राओं को पाषाण पर उकेर कर जहाँ  जीवंत रूप प्रदान किया गया है , वहीँ  अजयगढ़ की शिल्पकला सत्यं शिवम सुन्दरम् की गरिमा से युक्त है । राजाओं और महाराजाओं के उत्थान एवं पतन के इतिहास को अपने जेहन में समेटे अजयगढ़ दुर्ग का प्राकृतिक सौन्दर्य चिरस्थायी है। पर्वत शिखरों से फूटते झरने, नागिन सी बल खाती घाटियां, मनोरम गुफायें, गहरी खाईयां, विशाल सरोवर व श्याम गौर चïट्टानें दर्शकों का मन मोह लेती हैं। इसके बावजूद इस अनूठे दुर्ग की लगातार घोर उपेक्षा हुई है, जिससे यह अभी तक पर्यटन के मानचित्र से ओझल बना हुआ है । 

गौरतलब है  कि चन्देल राजाओं द्वारा निर्मित इस भव्य दुर्ग के निर्माण में पत्थरों का तो प्रयोग किया गया है  किन्तु उनको जोडऩे में कहीं भी मसाले का प्रयोग नहीं  हुआ । जानकारों का कहना है कि इसके निर्माण में गुरूत्वाकर्षण के सिद्धातों के आधार पर कोणीय संतुलन विधि का प्रयोग किया गया है । प्राकृतिक झंझावातों, प्रकोपों, मानवीय युद्धों के विध्वंशक प्रहारों तथा अभिशापों को झेलने वाला यह दुर्ग अपनी भव्यता, अद्वितीयता और सुदृढ़ता का परिचय दे रहा है, जो निश्चित ही खजुराहों तथा अन्य ऐतिहासिक स्थलों से किसी भी दृष्टि से कम नहीं है।

जेमोलॉजी पर केंद्रित शैक्षणिक संस्थान की हो स्थापना




विश्व प्रसिद्ध हीरा खदानों के लिए पन्ना जाना जाता है। यहां पर उत्तम गुणवत्ता वाले हीरे निकलते हैं। सदियों से पन्ना की खदानों से हीरा निकाला जाता रहा है जो आज भी जारी है। लेकिन इसका अपेक्षित लाभ पन्ना को नहीं मिला। मौजूद समय पन्ना में डायमंड म्यूजियम खोले जाने की खासी चर्चा है, म्यूजियम खोलना अच्छी बात है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। पन्ना में ऐसे शिक्षण संस्थान खुलने चाहिए जिससे यहां हीरा व्यवसाय को बढ़ावा मिले तथा रोजी रोजगार के नए अवसर पैदा हों। इसके लिए जेमोलॉजी पर केंद्रित शैक्षणिक संस्थान की स्थापना उपयोगी साबित होगी। क्योंकि यहां पर हीरा निकलता है इसलिए पन्ना इसके लिए उपयुक्त स्थल है। 
उल्लेखनीय है कि रत्नों की पहचान, मूल्यांकन की कला, पेशा और विज्ञान को जेमोलॉजी कहा जाता है। जेमोलॉजी के अंतर्गत रत्नों की पहचान करना तथा रत्नों की कटिंग, सॉर्टिंग (छटाई), ग्रेडिंग, वैल्यूएशन (मूल्य निर्धारण), डिजाइनिंग के बारे में बताया जाता है। देश में जेमोलॉजि विषय के बहुत ही कम से शैक्षणिक संस्थान हैं, जो कि महानगरों में स्थित हैं। लेकिन जहां हीरा निकलता है वहाँ इससे संबंधित कोई शिक्षा संस्थान नहीं है। यदि इसकी स्थापना हो जाए तो देश भर के विद्यार्थी यहाँ पढऩे आएंगे, इसी के साथ यहां पर हीरों की कटिंग, पॉलिसिंग व ज्वेलरी निर्माण का काम भी होगा। जिससे हीरा व्यवसाय को पंख लग जाएंगे और इसका लाभ निश्चित ही स्वाभाविक तौर पर पन्ना को मिलेगा।

बाघ पुनर्स्थापना रिसर्च व ट्रेनिंग सेंटर जरूरी




पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर से आबाद करने के लिए वर्ष 2009 में शुरू की गई बाघ पुनर्स्थापना योजना को चमत्कारी सफलता मिली है। मौजूदा समय यहाँ पर 70 से भी अधिक बाघ स्वच्छंद रूप से विचरण कर रहे हैं। पन्ना के बाघों ने आसपास के इलाकों में भी अपना आशियाना बनाया है, जिससे वहां भी बाघों की आबादी फल फूल रही है। पन्ना की इस अनूठी कामयाबी को वैश्विक ख्याति मिली है तथा अनेकों देश पन्ना में हुए इस सफलतम प्रयोग से सीख लेकर बाघों के कुनबे को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस बात को द्रष्टिगत रखते हुए पन्ना में बाघ पुनर्स्थापना सेंटर के साथ-साथ वन अधिकारियों के प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना होनी चाहिए। ऐसा होने से पन्ना की जहां एक नई पहचान बनेगी वहीं रोजी रोजगार के अवसरों का भी सृजन होगा। इसके लिए हिनौता अनुकूल व उपयुक्त जगह है। इसको मूर्त रूप देने में एनएमडीसी हीरा खनन परियोजना की भी मदद ली जा सकती है।
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धूमधाम से मनाएं गौरव दिवस एवं छत्रसाल जयंती महोत्सव : बृजेंद्र प्रताप सिंह

पन्ना। 22 मई 2023 का दिन पन्ना जिले के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है। पन्ना नगर के गौरव दिवस एवं बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल जी की जयंती का भव्य आयोजन प्रदेश के मुखिया माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी, केंद्रीय मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर जी, प्रदेश अध्यक्ष खजुराहो सांसद श्री बी.डी. शर्मा जी, कृषि मंत्री श्री कमल पटेल जी, जिले के प्रभारी मंत्री श्री रामकशोर नानो कावरे जी के मुख्य आतिथ्य में संपन्न होने जा रहा है।  

मेरी सभी जिलेवासियों से अपील है कि इस गौरव दिवस के अवसर पर सभी अपने घरों के बाहर दीपक जलाकर एवं रोशनी करके अपनी सहभागिता निभाएं।  हम सभी के लिए यह गौरव का पल है। माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा पूर्व में जिले को कई सौगातें दी हैं। कृषि महाविद्यालय की स्थापना, जिला चिकित्सालय का 300 बिस्तर में उन्नयन, 220 केवीए पावर स्टेशन, रूंझ-मंझगाय परियोजनाओं के लिए 1100 करोड़ रुपए की स्वीकृति, डायमंड पार्क, इनडोर स्टेडियम, पन्ना नेशनल पार्क का अकोला गेट और भी कई ऐसे कार्य हैं जिनका क्रियान्वयन भी प्रारंभ हो चुका है।  और मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस ऐतिहासिक दिन पर पधार रहे हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर जी जिले को ऐसी सौगातें देंगे जो न सिर्फ पन्ना जिले के विकास के पहिए को और गति प्रदान करेंगे बल्कि पन्ना जिला भी प्रदेश के अव्वल जिलों में शामिल होगा।  

सभी जिले वासियों को गौरव दिवस एवं महाराज छत्रसाल जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं



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पन्ना गौरव दिवस के रूप में मनाई जा रही छत्रसाल जयन्ती, 22 मई को आयेंगे मुख्यमंत्री

 


पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में बुन्देल केशरी महाराजा छत्रसाल जयन्ती को पन्ना गौरव दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान छत्रसाल जयंती पर 22 मई को स्थानीय छत्रसाल स्टेडियम, नगरबाग ग्राउण्ड पन्ना में शाम 6 बजे से आयोजित मुख्य कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होंगे। सांसद विष्णुदत्त शर्मा कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। खनिज साधन एवं श्रम मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस मौके पर मुम्बई की प्लेबैक सिंगर कविता पौडवाल द्वारा आकर्षक प्रस्तुति भी दी जाएगी।

उल्लेखनीय है कि इतिहास में ऐसे कई नाम हैं जिनकी गौरव गाथा को वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं। ऐसे नामों में सबसे प्रमुख एक नाम बुंदेलखंड के रियल हीरो बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल का भी है। भारतीय इतिहासकारों ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस अप्रतिम योद्धा के व्यक्तित्व को जनमानस के सामने लाने में कोताही की है, न्याय नहीं किया। यही वजह है कि जीवन पर्यंत मुगलों से संघर्ष करते हुए विजय पताका फहराने वाले महा पराक्रमी योद्धा को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिये। मुगलों के अन्याय व अत्याचार के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंकने वाले बुंदेलखंड के इस योद्धा की शौर्य गाथा को जनमानस के सामने लाने की अभिनव पहल प्रदेश सरकार ने की है, जिसकी सराहना हो रही है।

कार्यक्रम के सम्बन्ध में मिली अधिकृत जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान सोमवार 22 मई को पन्ना प्रवास के दौरान छत्रसाल जयंती के मुख्य कार्यक्रम में शिरकत करने के साथ आयोजित होने वाले अन्य कई कार्यक्रमों में भी शामिल होंगे। छत्रसाल जयंती सोमवार 22 मई को महेन्द्र भवन से छत्रसाल पार्क तक सुबह 7 बजे गौरव मैराथन आयोजित की जाएगी। शाम 5 बजे प्राणनाथ मंदिर से छत्रसाल पार्क तक छत्रसाल गौरव यात्रा भी निकाली जाएगी। छत्रसाल स्टेडियम में शाम 6 बजे मुख्य कार्यक्रम होगा और नगर में घर-घर दीपक जलाकर दीपोत्सव का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रमों की जोर शोर के साथ तैयारियां की जा रही हैं, इसके लिए अधिकारियों को कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के रूप में कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए ड्यूटी निर्धारित की गई है।

मुख्यमंत्री कृषि विज्ञान मेला में होंगे शामिल

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के मुख्य आतिथ्य में 22 मई को लक्ष्मीपुर पैलेस, कृषि महाविद्यालय प्रांगण में जिला स्तरीय कृषि विज्ञान मेला आयोजित किया जाएगा। इसके साथ विभागीय विकास कार्यों की प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। जिला कलेक्टर द्वारा संबंधित विभाग के अधिकारियों को प्रदर्शनी मेला प्रांगण में विभागीय विकास कार्यों की प्रदर्शनी लगवाने की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया गया है। साथ ही मेला में हितग्राही व कृषकों की सहभागिता और विभागीय योजनाओं के लाभांवित हितग्राहियों के अनुदान राशि के चेक व सामग्री का वितरण कराने के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं के संबंध में निर्देश दिए गए हैं।

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Tuesday, May 16, 2023

पन्ना स्थित देश का इकलौता हीरा कार्यालय बंद होने की दहलीज पर !

 बेशकीमती हीरों के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में स्थित देश के इकलौते हीरा कार्यालय पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। शासन की अनदेखी और उपेक्षा के चलते पन्ना स्थित हीरा कार्यालय मौजूदा समय महज एक कमरे में संचालित हो रहा है। इटवांखास व पहाड़ीखेरा में संचालित होने वाले उप कार्यालय भी बंद हो चुके हैं। पिछले कई वर्षों से इस कार्यालय में कर्मचारियों के रिटायर होने पर उनकी जगह किसी की पदस्थापना नहीं हुई, फलस्वरूप इस कार्यालय के ज्यादातर पद खाली पड़े हैं। आलम यह है कि देश के इस इकलौते हीरा कार्यालय का वजूद सिर्फ नाम के लिए रह गया है। 



।। अरुण सिंह ।।   

पन्ना। हर इलाके की अपनी खूबियां और पहचान होती है। बुंदेलखंड क्षेत्र के पन्ना जिले की पहचान हीरा की खदानों, खूबसूरत हरे-भरे जंगलों तथा यहां विचरण करने वाले वन्य प्राणियों विशेषकर बाघ, जंगल के बीच से प्रवाहित होने वाली जीवनदायी केन नदी एवं यहां स्थित प्राचीन भव्य मंदिरों से है। लेकिन इन अनगिनत खूबियों का अपेक्षित लाभ पन्ना जिलावासियों को नहीं मिल सका है। अब तो हालात ऐसे बन रहे हैं कि इस जिले की पहचान पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हीरा खदानें, नदी, जंगल व बाघ सभी पर संकट मंडरा रहा है। एशिया महाद्वीप की इकलौती मैकेनाइज्ड एनएमडीसी खदान विगत 1 जनवरी 2021 से जहाँ बंद है, वहीं जिला मुख्यालय पन्ना स्थित हीरा कार्यालय भी बंद होने की कगार पर है। 

उल्लेखनीय है कि पूर्व में पन्ना स्थित हीरा कार्यालय में जहाँ हीरा अधिकारी की पदस्थापना होती थी वहीं अब खनिज अधिकारी के पास हीरा कार्यालय का प्रभार है। नवीन कलेक्ट्रेट भवन में हीरा अधिकारी का चेंबर तक नहीं है, हीरा कार्यालय एक छोटे से कमरे में संचालित हो रहा है। हीरा पारखी अनुपम सिंह ने बताया कि पहले पन्ना जिला मुख्यालय के साथ-साथ इटवांखास व पहाड़ीखेरा में उप कार्यालय हुआ करते थे जो अब बंद हो चुके हैं। उस समय उथली हीरा खदानों की निगरानी व खदानों से प्राप्त होने वाले हीरों को जमा कराने के लिए तीन दर्जन से भी अधिक सिपाही और हीरा इंस्पेक्टर पदस्थ थे। लेकिन अब सिर्फ दो सिपाही बचे हैं जो अपने रिटायरमेंट की राह देख रहे हैं। हीरा कार्यालय की एकमात्र हीरा इंस्पेक्टर नूतन जैन वर्षों से अपनी सेवाएं खनिज विभाग में दे रही हैं।

 

जिला मुख्यालय पन्ना स्थित हीरा कार्यालय जो महज एक छोटे से कमरे में संचालित है। 

गौरतलब है कि पन्ना स्थित देश के इकलौते हीरा कार्यालय में हीरा अधिकारी सहित हीरा पारखी एक सीनियर व तीन जूनियर, इंस्पेक्टर के तीन पद, ऑफिस सुपरिटेंडेंट एक पद, लिपिक चार पद, हवलदार तीन पद, सिपाही तीस पद, मेठ तीन पद, क्षेत्रीय सहायक एक पद, ड्राइवर एक पद, चौकीदार दो पद तथा भृत्य के दो पद स्वीकृत हैं। लेकिन मौजूदा समय इस ऑफिस में हीरा पारखी सहित कुल पांच कर्मचारी बचे हैं जो किसी तरह एक कमरे में सिमट चुके हीरा कार्यालय को चला रहे हैं। पूर्व में हीरा कार्यालय महेन्द्र भवन में संचालित होता था जहाँ हीरा अधिकारी का पृथक से चेंबर था वहीं ऑफिस के लिए भी पर्याप्त जगह थी। लेकिन नवीन कलेक्ट्रेट भवन में हीरा कार्यालय के लिए महज एक छोटा सा कमरा आवंटित हुआ है जिसमें बैठने तक को जगह नहीं है। हालात ये हैं कि हीरा कार्यालय का आधे से भी अधिक सामान महेन्द्र भवन स्थित पुराने ऑफिस में पड़ा हुआ है।         

लगभग 70 किमी. क्षेत्र में है हीरा धारित पट्टी का विस्तार

पन्ना जिले में हीरा धारित पट्टी का विस्तार लगभग 70 किलोमीटर क्षेत्र में है, जो मझगवां से लेकर पहाड़ीखेरा तक फैली हुई है। हीरे के प्राथमिक स्रोतों में मझगवां किंबरलाइट पाइप एवं हिनौता किंबरलाइट पाइप पन्ना जिले में ही स्थित है। यह हीरा उत्पादन का प्राथमिक स्रोत है जो पन्ना शहर के दक्षिण-पश्चिम में 20 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां अत्याधुनिक संयंत्र के माध्यम से हीरों के उत्खनन का कार्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) द्वारा संचालित किया जाता रहा है। मौजूदा समय उत्खनन हेतु पर्यावरण की अनुमति अवधि समाप्त हो जाने के कारण यह खदान 1 जनवरी 21 से बंद है। एनएमडीसी हीरा खदान बंद होने से हीरों के उत्पादन का ग्राफ जहाँ नीचे जा पहुंचा है वहीं शासन को मिलने वाली रायल्टी में भी कमी आई है। यदि निकट भविष्य में एनएमडीसी हीरा खदान चालू नहीं हुई और हीरा कार्यालय की हालत नहीं सुधरी तो हीरों से जो पन्ना की पहचान थी वह भी ख़त्म हो सकती है। एनएमडीसी खदान में वर्ष 1968 से लेकर अब तक लगभग 13  लाख कैरेट हीरों का उत्पादन किया जा चुका है। इस खदान में अभी भी 8.5 लाख कैरेट हीरों का उत्पादन होना शेष है। ऐसी स्थिति में खदान संचालन की अनुमति यदि नहीं मिलती तो अरबों रुपए कीमत के हीरे जमीन के भीतर ही दफन रह जाएंगे।

पन्ना जिले की मझगंवा स्थित एनएमडीसी हीरा खदान जो विगत 28 माह से बंद है।    

परियोजना के बंद होने से यहां सैकड़ों कर्मचारी जहां चिंतित हैं, वहीं इस परियोजना के आसपास स्थित ग्रामों के निवासी जिन्हें परियोजना से शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल सहित अन्य बुनियादी सुविधाएं मिलती हैं, वे भी परेशान हैं। गौरतलब है कि जंगल व खनिज संपदा से समृद्ध पन्ना जिले में ऐसी कोई बड़ी परियोजना व उद्योग स्थापित नहीं हुए जिनसे इस पिछड़े जिले के विकास को गति मिलती। यहां पर सिर्फ एनएमडीसी हीरा खनन परियोजना है, जिससे पन्ना की पहचान है।  इस परियोजना के कारण ही पन्ना शहर को देश व  दुनिया में डायमंड सिटी के रूप में जाना जाता है। यदि परियोजना को पर्यावरण महकमे से उत्खनन की अनुमति नहीं मिली और परियोजना स्थाई रूप से बंद हो जाती है तो हीरों की रायल्टी के रूप में शासन को प्रतिवर्ष मिलने वाले करोड़ों रुपए के राजस्व की जहां हानि होगी, वहीं डायमंड सिटी के रूप में पन्ना की जो पहचान है उस पर भी ग्रहण लग जाएगा।

सिर्फ दो क्षेत्र में दिए जा रहे हीरा खदानों के पट्टे


पटी खदान क्षेत्र में हीरा धारित चाल की धुलाई करते ग्रामीण। 

पन्ना स्थित हीरा कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक वर्तमान में सिर्फ दो राजस्व क्षेत्र हैं जहाँ हीरा खदानों के पट्टे जारी किये जा रहे हैं  इनमें पटी (कल्याणपुर) व सकरिया चौपरा हीरा खदान क्षेत्र हैं। हीरा कार्यालय से सेवा निवृत्त हो चुके लिपिक सूरजदीन सिंह ने बताया कि वर्ष 1981 में जब वे सेवा पर आये उस समय सभी पद भरे थे, लेकिन अब गिनती के चार-पांच लोग ही बचे हैं। सूरजदीन बताते हैं हैं कि पहले जिन क्षेत्रों में हीरा की खदाने संचालित होती थी उनमें पन्ना सर्किल, इटवा सर्किल तथा पहाड़ीखेरा सर्किल की खदानें हैं। पन्ना सर्किल के अंतर्गत महुआटोला, मनौर, महलाने का सेहा, सकरिया, खिन्नी घाट, कमलाबाई, भुतियाऊ, नरेंद्रपुर, पुखरी, हर्रा चौकी, बरम की कुईयां, दहलान चौकी, पटी, जनकपुर, सरकोहा, मोहार, रानीपुर, रानीपुर नाला तथा राधापुर खदान क्षेत्र हैं। जबकि इटवा सर्किल में बाबूपुर, किटहा, पाली, बगीचा, हजारा, हजारा मुढ्ढा, मडफा, भरका, रमखिरिया व गोंदी खदान क्षेत्र हैं। पहाड़ीखेरा सर्किल में बरहों कुदकपुर, सेहा सालीकपुर,  महतेन तथा सिरसा द्वारा क्षेत्र में खदानों के पट्टे जारी किए जाते थे। प्रभारी हीरा अधिकारी रवि पटेल के मुताबिक अब तक तकरीबन आधा सैकड़ा हीरा खदानों के पट्टे जारी हुए हैं।

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