Tuesday, August 22, 2023

पन्ना में डायमंड पार्क सहित हीरा कार्यालय भवन का होगा निर्माण

  • स्थापना व निर्माण के लिए राशि आवंटित
  • खनिज मंत्री के प्रयास से मिली बड़ी सौगात 
  • उम्मीद है वर्षों से रिक्त पड़े पद भी भरेंगें 




पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में डायमण्ड पार्क की स्थापना के साथ ही खनिज कार्यालय पन्ना के सामने स्थित शासकीय भूमि पर हीरा कार्यालय भवन निर्माण का कार्य होगा, इसके लिए राशि स्वीकृत हुई है। खनिज साधन एवं श्रम मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह के विशेष प्रयास से जिले को छः विकास कार्यों की सौगात मिली है, जिसमें डायमण्ड पार्क की स्थापना व हीरा कार्यालय भवन का निर्माण कार्य शामिल है। खनिज साधन विभाग के डीएमएफ मद से सभी कार्य स्वीकृत किए गए हैं। 

मिली अधिकृत जानकारी के मुताबिक पन्ना नगर में पानी की सुलभ उपलब्धता के लिए कटरा डैम से लोकपाल सागर तक 6 किलोमीटर और निरपत सागर से पहाड़कोठी तक पाइपलाइन बिछाने का कार्य शीघ्र शुरू होगा। इसके लिए तीन करोड़ रूपए की राशि स्वीकृत की गई है। इसी तरह पन्ना विधानसभा अंतर्गत विभिन्न मजरा टोलों में 12 करोड़ 73 लाख की राशि से विद्युतीकरण का कार्य किया जाएगा। शासकीय उत्कृष्ट उ.मा.विद्यालय के खेल मैदान को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए बाउण्ड्रीवाल निर्माण के लिए 8 लाख रूपए राशि की स्वीकृति भी प्रदान की गई है। इसके अलावा अजयपाल पर्यटन स्थल के पहुंचमार्ग की सड़क चौड़ीकरण निर्माण कार्य के लिए 6 करोड़ रूपए तथा खनिज कार्यालय पन्ना के सामने स्थित शासकीय भूमि पर हीरा कार्यालय भवन निर्माण के लिए 1 करोड़ 41 लाख की स्वीकृति भी प्रदान की गई है। पन्ना जिले में डायमण्ड पार्क स्थापना के लिए 3 करोड़ 98 लाख रूपए राशि का आवंटन भी किया गया है। उम्मीद की जाती है कि नवीन हीरा कार्यालय भवन का निर्माण होने के साथ ही इस कार्यालय में वर्षों से रिक्त पड़े पदों को भी भरा जायेगा ताकि हीरा कार्यालय का कार्य ठीक ढंग से संपादित हो सके। 

उल्लेखनीय है कि पन्ना स्थित देश के इकलौते हीरा कार्यालय में हीरा अधिकारी सहित हीरा पारखी एक सीनियर व तीन जूनियर, इंस्पेक्टर के तीन पद, ऑफिस सुपरिटेंडेंट एक पद, लिपिक चार पद, हवलदार तीन पद, सिपाही तीस पद, मेठ तीन पद, क्षेत्रीय सहायक एक पद, ड्राइवर एक पद, चौकीदार दो पद तथा भृत्य के दो पद स्वीकृत हैं। लेकिन मौजूदा समय इस ऑफिस में हीरा पारखी सहित कुल पांच कर्मचारी बचे हैं जो किसी तरह एक कमरे में सिमट चुके हीरा कार्यालय को चला रहे हैं। मौजूदा समय नवीन कलेक्ट्रेट भवन में हीरा कार्यालय महज एक छोटे से कमरे में संचालित है, जिसमें बैठने तक को जगह नहीं है। हालात ये हैं कि हीरा कार्यालय का आधे से भी अधिक सामान महेन्द्र भवन स्थित पुराने ऑफिस में पड़ा हुआ है। 

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Monday, August 21, 2023

पन्ना के बृहस्पति कुण्ड में प्रदेश का पहला ग्लास ब्रिज बनेगा

  • रत्नगर्भा धरती में पर्यटन विकास की असीम संभावनायें मौजूद
  • प्रकृति के अनुपम सौगातों का विकास की दिशा में हो उपयोग



पन्ना। भव्य प्राचीन मंदिरों और हीरा की खदानों के लिये प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में प्रकृति ने सृजन के विविध रूपों को जिस तरह से प्रकट किया है वह  मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। पहली बार जो कोई भी यहाँ आता है, इस रत्नगर्भा धरती के अतुलनीय सौन्दर्य को निहारकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। लेकिन प्रकृति के अनुपम सौगातों का पन्ना के विकास की दिशा में रचनात्मक उपयोग नहीं हो सका। पर्यटन विकास की असीम संभावनायें मौजूद होने के बावजूद अभी तक यह जिला पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र नहीं बन सका है। 

यहां प्राचीन भव्य मन्दिरों के अलावा ऐतिहासिक महत्व के स्थलों, खूबसूरत जल प्रपातों व प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण मनोरम स्थलों की भरमार है। इनका समुचित ढंग से प्रचार-प्रसार न होने के कारण देशी व विदेशी पर्यटक इस जिले की खूबियों से अनभिज्ञ हैं। यही वजह है कि पर्यटकों को आकर्षित  करने की खूबियों के बावजूद पन्ना पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं हो सका। देर से ही सही लेकिन अब पन्ना के नवागत कलेक्टर हरजिंदर सिंह ने विशेष रूचि प्रदर्शित करते हुए जिस तरह से आते ही सकारात्मक पहल शुरू की है, उससे मन्दिरों के शहर पन्ना को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किये जाने की उम्मीद जागी है।

उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड का नियाग्रा कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में स्थित बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात की खूबसूरती निहारने के लिए ग्लास ब्रिज का निर्माण किया जाएगा। पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के अधिकारियों द्वारा पन्ना के सर्किट हाउस में पर्यटन निगम की टीम के साथ बैठक कर बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात और आसपास के क्षेत्र का पर्यटन बढ़ाने के उद्देश्य से बनाये प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की गई। जिला पुरातत्व, पर्यटन और संस्कृति परिषद पन्ना के सदस्य के रूप में शामिल आबकारी उप निरीक्षक मुकेश पाण्डेय द्वारा भी बैठक में आवश्यक सुझाव दिए गए।

मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम की तकनीकी टीम द्वारा बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात पहुँचकर वास्तविक स्थिति और लोकेशन का अध्ययन और सर्वे किया गया। वास्तुविद सतीश कालान्तरे ने बताया कि बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात के आसपास फिलहाल सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना हमेशा बनी रहती है। इसलिए बृहस्पति कुण्ड जलप्रपात के चारों तरफ सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाई जाएगी। रेलिंग भी इस तरीके से लगाई जाएगी कि स्थान की खूबसूरती भी बनी रहे और सुरक्षा भी। बृहस्पति कुण्ड आश्रम की तरफ एक मजबूत ग्लास ब्रिज बनाया जाएगा, जिस पर चढ़कर पर्यटक जलप्रपात के ठीक सामने खड़े होकर जलप्रपात की खूबसूरती को निहार सकेंगे। यह देश का दूसरा और मध्यप्रदेश का पहला ग्लास ब्रिज होगा। 

कार्यपालन यंत्री श्री चौरसिया ने बताया कि जलप्रपात के आसपास लोगो को धूप-बारिश से बचने के लिए पैगोडा डिजाइन के विश्राम स्थल भी बनाये जाएंगे। दिनों-दिन पर्यटकों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए समुचित संख्या में प्रसाधन गृह और एक बड़ी पार्किंग की भी व्यवस्था होगी। जलप्रपात के पास खाली पड़े चट्टानी मैदान में खूबसूरत लैंडस्केप और उद्यान विकसित किया जाएगा। इस क्षेत्र के महत्व और जानकारी को दर्शाते हुए कई सूचना पट्ट लगाए जाएंगे। बृहस्पति कुण्ड क्षेत्र को विकसित करने का कार्य कई चरणों मे पूर्ण होगा। पहले चरण में जलप्रपात के चारों तरफ सुरक्षा रेलिंग, ग्लास ब्रिज, विश्राम स्थल, पार्किंग, प्रसाधन गृह, कैफेटेरिया आदि का निर्माण होगा। दूसरे चरण में जलप्रपात के नीचे की तरफ स्टॉप डैम बनाकर नौकायन और एडवेंचर गतिविधियों की व्यवस्था भी की जाएगी।

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Tuesday, August 15, 2023

पन्ना में स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया, खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने किया ध्वजारोहण

  • स्कूलों के बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की दी आकर्षक प्रस्तुति
  • मुख्य अतिथि ने जनता के नाम मुख्यमंत्री के संदेश का किया वाचन 

मुख्य अतिथि बृजेन्द्र प्रताप सिंह प्रदेश की जनता के नाम मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन करते हुए। 

पन्ना। देश का 77वां स्वतंत्रता दिवस समारोह पन्ना जिले में हर्षोल्लास एवं गरिमामय ढंग से मनाया गया। जिला स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन स्थानीय पुलिस परेड ग्राउण्ड में हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि खनिज साधन एवं श्रम मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने सुबह 9 बजे ध्वजारोहण कर परेड की सलामी ली। इस दौरान राष्ट्रगान की धुन बजाई गई।

ध्वजारोहण के पश्चात कैबिनेट मंत्री श्री सिंह ने खुली जिप्सी में कलेक्टर हरजिंदर सिंह, पुलिस अधीक्षक र्साइं कृष्ण एस थोटा और रक्षित निरीक्षक के साथ परेड का निरीक्षण किया। मुख्य अतिथि ने प्रदेश की जनता के नाम संबोधित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संदेश का वाचन किया और आकाश में गुब्बारे छोड़े। समारोह में आकर्षक मार्च पास्ट का प्रदर्शन किया गया। इस अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और प्रजातंत्र रक्षकों का सम्मान भी हुआ। मुख्य अतिथि ने परेड कमाण्डरों से परिचय प्राप्त किया।

स्वतंत्रता दिवस के मुख्य कार्यक्रम में सशस्त्र और गैर शस्त्र परेड सहित विभिन्न स्कूलों के बच्चों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक पीटी प्रदर्शन आकर्षण का केन्द्र रहे। सीनियर और जूनियर वर्ग में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां हुईं। सीनियर वर्ग में सीएम राइज स्कूल को प्रथम, लिश्यू आनंद उ.मा. विद्यालय को द्वितीय और शासकीय आर.पी. उत्कृष्ट उ.मा. विद्यालय को तृतीय स्थान मिला। इसी तरह जूनियर वर्ग में डायमंड पब्लिक स्कूल को प्रथम, जवाहर नवोदय विद्यालय रमखिरिया को द्वितीय और महर्षि विद्या मंदिर उ.मा. विद्यालय को तृतीय स्थान मिला।


मुख्य अतिथि द्वारा बेहतर परेड प्रदर्शन के लिए भी पुरस्कार वितरित किए गए। सशस्त्र बल परेड वर्ग में जिला पुलिस बल को प्रथम, विशेष सशस्त्र बल की 10वीं वाहिनी सागर को द्वितीय और होमगार्ड की टुकड़ी को तृतीय स्थान मिला। इसी तरह कनिष्ठ वर्ग में शासकीय छत्रसाल महाविद्यालय की एनसीसी टुकड़ी को प्रथम, एनएसएस टुकड़ी को द्वितीय और स्काउट-गाइड टुकड़ी को संयुक्त रूप से तीसरा स्थान मिला। इसके अतिरिक्त विभिन्न शासकीय दायित्वों के निर्वहन में बेहतर कार्य के लिए भी अधिकारी-कर्मचारियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में नपाध्यक्ष मीना पाण्डेय, नपा उपाध्यक्ष आशा गुप्ता, जिला पंचायत अध्यक्ष मीना राजे, जिला पंचायत उपाध्यक्ष संतोष सिंह यादव सहित अन्य जनप्रतिनिधि, शासकीय सेवक, गणमान्य नागरिक और पत्रकारगण उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विनय श्रीवास्तव एवं प्रमोद अवस्थी द्वारा किया गया।

कलेक्टर ने संयुक्त कलेक्ट्रेट भवन में किया ध्वजारोहण

स्वतंत्रता दिवस पर कलेक्टर हरजिंदर सिंह ने संयुक्त कलेक्ट्रेट भवन में सुबह 8 बजे ध्वजारोहण किया। इस अवसर पर राष्ट्रगान का सामूहिक गायन किया गया। जिला कलेक्टर ने अधिकारी-कर्मचारियों को आजादी के पर्व की शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर अपर कलेक्टर नीलाम्बर मिश्र, एसडीएम अशोक अवस्थी सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे। सभी शासकीय कार्यालयों में कार्यालय प्रमुखों द्वारा सुबह 7.30 बजे राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।

खनिज मंत्री ने दिव्यांग बच्चों के साथ किया विशेष भोज

खनिज साधन एवं श्रम मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह स्थानीय पुलिस परेड ग्राउण्ड में ध्वजारोहण के पश्चात बायपास रोड स्थित सीडब्ल्यूएसएन बालक छात्रावास पहुंचे और दिव्यांग बच्चों के साथ विशेष भोज किया। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों द्वारा दिव्यांग छात्रों से भेंट कर उनका सम्मान किया गया। छात्रावास में अतिथियों द्वारा आंवला और अशोक के पौधों का रोपण भी किया गया। 

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Monday, August 14, 2023

पन्ना जिले के इचोलिया गांव में घर के भीतर घुसा तेंदुआ

  • वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, किया जायेगा रेस्क्यू 
  • तेंदुओं और इंसानों के बीच बढ़ता टकराव चिंता का विषय 



।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में उत्तर वन मंडल अंतर्गत वन परिक्षेत्र धरमपुर के ग्राम इचोलिया में रात के समय एक तेंदुआ घर के भीतर घुस गया, जिससे गांव में हड़कंप और दहशत का माहौल है। सोमवार की सुबह खबर मिलते ही वन विभाग के अधिकारी व कर्मचारी मौके पर पहुँच गए हैं तथा तेंदुए को सुरक्षित पकड़ने के लिए सतना से रेस्क्यू टीम को बुलाया गया है। जिस घर में तेंदुआ घुसा है उसके आसपास लोगों की भारी भीड़ जमा है।  

वन परिक्षेत्राधिकारी धरमपुर नरेश ककोड़िया ने जानकारी देते हुए बताया कि इचोलिया गांव उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है। आज सुबह तक़रीबन 4 बजे जैसे ही हमें जानकारी मिली, हम मौके पर पहुँच गए हैं, रेस्क्यू टीम का इंतजार किया जा रहा है। आपने बताया कि जिस कच्चे घर में तेंदुआ घुसा हुआ है वहां बकरियां एक कमरे में बंधी हुई थीं, इनकी गंध से तेंदुआ यहाँ पर आया होगा। रेस्क्यू टीम के आने पर तेंदुए को ट्रंक्यूलाइज कर उसे सुरक्षित जंगल में छोड़ दिया जायेगा। आपने यह भी बताया कि यह तेंदुआ विगत कई दिनों से इस इलाके में घूम रहा है। एक सप्ताह पूर्व इसने तेंदुए ने एक बकरी भी खाई थी जिसका मुआवजा दिया जा रहा है। ग्रामवासियों के मुताबिक यह तेंदुआ 15-20 दिनों से यहीं आसपास घूम रहा है, कई बार मवेशियों के ऊपर हमला भी कर चुका है जिससे गांव के लोग दहशत में हैं। 

उल्लेखनीय है कि बीते कुछ सालों में मध्यप्रदेश में जहाँ बाघों की संख्या में इजाफा हुआ है, वहीं तेंदुओं की संख्या भी बढ़ी है। जबकि वन क्षेत्र तेजी से घट रहा है, यही वजह है कि वन्य प्राणी आबादी क्षेत्र के निकट पहुंचने लगे हैं। मालूम हो कि मध्य प्रदेश में देश के 26 फीसदी से भी अधिक तेंदुए रहते हैं और यहां इनकी आबादी में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। इसी के साथ प्रदेश में तेंदुए और इंसानों के बीच टकराव भी बढ़ रहा है जो चिंता की बात है। मध्यप्रदेश तेंदुए की आबादी के मामले में पहले स्थान पर है। तेंदुए जंगल के साथ-साथ इंसानी आबादी के करीब भी रहने में सहज हैं। इसलिए इंसान और तेंदुओं के बीच टकराव की आशंका अधिक है। 

जानकारों का कहना है कि पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र व उत्तर वन मंडल के जंगल से लगे डेढ़ सैकड़ा से भी अधिक गांव हैं, जहां हिंसक वन्य प्राणियों का खतरा बना रहता है। मौजूदा समय पन्ना टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, ऐसी स्थिति में यहाँ के बाघ अपने लिए इलाके की तलाश में बाहर निकल रहे है। बाघों के साथ तेंदुओं की तादाद भी बढ़ी है लेकिन इनके रहने के लिए जंगल सुरक्षित नहीं बचा। इन हालातों को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि इनके रहने के स्थान को सुरक्षित रखा जाय। पन्ना सहित मध्य प्रदेश में जंगलों का जिस तरह तेजी से ह्रास हो रहा है, उससे इंसानों और जंगली जीवों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। 

 घर में घुसे तेंदुए को सतना की रेस्क्यू टीम ने ट्रैंक्युलाइज कर पकड़ा

पन्ना जिले के इचोलिया गांव में बीती रात से जो भय और दहशत का माहौल था उससे गांव के लोगों को निजात मिल गई है। सतना से पहुंची रेस्क्यू टीम ने घर में घुसे तेंदुए को ट्रैंक्युलाइज करने के बाद पिंजड़े में कैद कर लिया, जिसका स्वास्थ्य परीक्षण के उपरांत जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ दिया जायेगा।  

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के उत्तर वन मंडल अंतर्गत वन परिक्षेत्र धरमपुर के ग्राम इचोलिया में महेंद्र सिंह के कच्चे मकान में बीती रात एक तेंदुआ घुस गया था। ग्रामीणों को जब इस बात की भनक लगी तो उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया, जिससे डरकर तेंदुआ घर के अंदर लकड़ियों के ढेर में छुप गया। वन परिक्षेत्राधिकारी धरमपुर ने बताया कि एक हफ्ते पूर्व इस तेंदुए ने बकरी का शिकार किया था। बीती रात तेंदुआ बकरियों की गंध से ही इस घर में घुसा लेकिन बकरियों वाले कमरे का दरवाजा बंद था। ग्रामीणों के शोर मचने पर यह लकड़ियों के ढेर में छिपकर बैठ गया।  सतना से आई रेस्क्यू टीम ने उत्तर वन मंडल पन्ना के सहयोग से सोमवार 14 अगस्त दोपहर करीब 1 बजे रेस्क्यू करके पकड़ा।  तेंदुए को देखने के लिए  इचोलिया गांव में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए थे। तेंदुए का सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू हो जाने के बाद ग्रामवासियों ने राहत की साँस ली है। बताया जा रहा है कि यह तेंदुआ पिछले 15 दिनों से गांव के आसपास घूम रहा है, जिसके चलते क्षेत्र के लोग दहशत में थे।



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Saturday, July 8, 2023

लघू धान्न ले आइए खाने हित निज गेह, भगे मोटापा छोड़ घर रक्तचाप मघुमेह

  • पहले हमारे भोजन में 10-12 प्रकार के अनाज शामिल थे, अब गायब 
  • इन मोटे अनाजों की खूबियां बता रहे हैं पद्मश्री बाबूलाल जी दाहिया                 

     



               

मित्रो ! पहले हमारे भोजन में दश- बारह प्रकार के अनाज शामिल थे और वह इसलिए कि हम खेतो में उस अनाज का बीज बोते थे, जो हमारा खेत मांगता था।  क्योकि हमारी समूची खेती ही वर्षा आधारित हुआ करती थी, जिसमे औसतन 4 वर्ष में एक वर्ष सूखे का होता था। पर आज सिंचाई के साधनों के कारण वह अनाज उगाते हैं, जो बाजार मांगता है। 

अब सपोज करिए कि बाजार ने अगर सोयाबीन की मांग कर दी तो किसान अपने उन बड़े- बड़े बांधों  तक को फोड़ कर सोयाबीन बो देता है, जो कभी तालाब की तरह कार्तिक तक भरे रहते और बाद में या तो उनमे गेहूं चना बोया जाता या अगर सूखे का साल हुआ तो समूचे बांध में कोदो बो दिया जाता था।

पहले अनाज का ऐसा विभाजन नही था, जैसा मोटे अनाज आदि में आज है। विभाजन था तो सिर्फ यह कि कुछ खाने में कोमल थे जिनमे दाल सब्जी की मात्रा कम लगती थी, उन्हें गेहू, चावल कहा जाता था। और कुछ ज्यादा खुरदरे थे, जिन्हें दो हिस्सा दाल सब्जी या दूध मठ्ठा के बिना हलक के नीचे नहीं उतारा जा सकता था। ऐसे अनाजों को वे कोदो, कुटकी, सांवा ,काकुन, ज्वार, बाजरा के नाम से जानते थे।

वर्षा आधारित खेती में सूखा के  बाद किसान को तुरन्त राहत देने वाले अनाज की आवश्यकता महसूस होती थी। ऐसी स्थिति में डेढ़ माह में पकने वाले कुटकी, सांवा और काकुन महत्वपूर्ण अनाज थे। शायद इसीलिए इन्हें संस्कृत के विद्वानों द्वारा लघु धान्न कहा गया होगा। पर जब वह उन्हें खेत मे उगाते तो खाते भी। अस्तु उस समय इन अनाजों को गरीबों का भोजन ही कहा जाता था।

इनके गुण धर्मो को नई पीढ़ी जाने अस्तु हमारी मौखिक परम्परा के अपढ़ किसान जो अक्सर पढ़ने वालों को तिरस्कृत करते हुए कहा करते थे कि -

 जउन तोहरे पोथी म , व हमारे मुँहे मा

यानी कि जो चीज तुम्हारे पुस्तकों में है वह मौखिक परम्परा में हमारे मुँह में है। अस्तु वे अपने उस अनुभव जनित ज्ञान को सूत्रबध्य भी कर देते थे। यथा -

तीन पाख दो पानी। पक आईं कुटकी रानी।।

      या  

सांवा जेठा अन्न कहावय, सब अनाज से आगे आबय ।

परन्तु कोदो का अपना अलग ही मिजाज था। क्योंकि वह पकने में तो ३ से ४ माह लेता था । फिर भी सूखा सहने की अद्भुत क्षमता कि चाह बड़े- बड़े बांध को फोड़ कर बो दीजिए या ऊंचे खेतों में लेकिन हर जगह पक कर तैयार। और फिर अस्सी वर्ष तक खराब न हो शायद इसीलिए उसे अनाजों का राना (राजा) भी कहा जाता था कि-

  सगमन सरई दहिमन राना, आसी बारिश ना होंय पुराना ।

यही कारण हैं कि इन दो हिस्सा दाल- सब्जी या दूध- मट्ठे से  कंठ के नीचे उतारे जाने वाले अनाजों पर अनेक कहावतें, लोकगीत पहेलियां और लोक कथाएं थीं।


एक परोक्ष लाभ यह भी था कि इन मोटे अनाजों को खाने वाले हमारे ग्रामीण कृषि आश्रिति समाज को कभी, मोटापा,रक्तचाप, सुगर जैसी बीमारी नहीं होती थी। वंशानुगत कारणों से यदि किसी को हुई भी तो उतनी असर कारक नही होती थी। क्योकि इनमें स्वाभाविक उनके समन के औषधीय गुण मौजूद थे। पर आज जब से हमारा भोजन मात्र गेहूं चावल में सिमट गया है, तो अमूमन हर तीसरा ब्यक्ति इन बीमारियों से ग्रसित है। तो आइए इन लघु धान्न समझे जाने वाले अपने अनाजों के गुण धर्मो पर ही क्यों न कुछ कहावतें सूत्र बध्य कर दें ?

 लघू धान्न ले आइए, खाने हित निज गेह।  

 भगे मोटापा छोड़ घर, रक्तचाप मघुमेह।।

 सांवा कुटकी लोक में, ऐसे रहे अनाज।

 तुरत पके राहत दिए, खाया मनुज समाज।।

कोदो काकुन जो जन खाते, रक्तचाप मधुमेह न आते।

अच्छी सेहत अच्छा मन, यदि हम खाबें मोटे अन्न।।

तिगुने पोषक तत्व के, मोटे सभी अनाज।

 कुदरत ने उनको रचा, खाए मनुज समाज।।

 जब तक मोटे अन्न यह, खाते थे सब लोग।

 रक्तचाप मोटा पना, आए कभी न रोग।।

रक्तचाप मधुमेह से, चाहें अगर निजात।

मोटा अन्न खरीद कर, रहे हमेशा खात।।

कोदो कुटकी सँवा अरु,  काकुन मोटे अन्न।

राखें स्वस्थ शरीर को, मन निश्चिंत प्रशन्न।।

भोजन में शामिल करें, मोटे आप अनाज।

स्वस्थ तभी रह पायेंगे, वक्त कह रहा आज।।

इस वर्ष इन अनाजों पर सरकार भी खूब ध्यान दे रही है। लेकिन पहले यह भी सोचना पड़ेगा कि आखिर यह समाप्त क्यों हो गए ? पहले इन्हें बोना और खाना हमारी मजबूरी थी पर आज वह स्थित नही है। किसान कोई विष पान करने वाला भोले नाथ नही है कि वह जोखिम और घाटा ही उठाता रहे। इनका उत्पादन इतना कम है कि वर्तमान भाव में इनकी खेती नहीं हो सकती। सरकार के पास बड़े-बड़े कृषि प्रक्षेत्र हैं। पहले वहां कृषि विभाग उगाकर आय ब्यय का अध्ययन कर ले और उसके अनुसार मूल्य रखे तभी उनकी खेती सम्भव है।

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Thursday, July 6, 2023

बारिश से बेफिक्र जरा इन कन्दों को तो देखिए ?

 


 ।। बाबूलाल दाहिया ।।

हमारे यहां पानी की बारिश चार पांच दिनों से नहीं हुई है। किसान खेतों की जुताई कर हाथ में हाथ रख कर घर मे बैठे हैं और आकाश में घुमड़ रहे बादलों को देख रहे हैं। किन्तु बाड़ में उगे सारे कन्द पानी की ओर से बेपरवाह अपनी-अपनी बेल बढाने में होड़ सी लगाए हुए हैं। क्योंकि कि उन्हें बढ़ने की शक्ति पानी से नहीं जमीन में एक वित्ता गहरे पैठ बनाए अपनी गाँठ से मिलती है, जिसे कन्द कहा जाता है। 

यहां क्रमशः रखे हुए चारो पत्ते वैचादी कन्द, भालू कन्द, रायकन्द और  हँसिया ढापिन कन्द के हैं। यू तो इनमें देखने में अधिक अन्तर नही है ? फिर भी नशों के उभार एवं पत्ते के आकार के कटाव से जानकार लोगो के पहचान में आ रहे हैं। यह हमारे बनाए नियम में नही बल्कि कुदरत के नियम पर जबाब देह हैं। क्यो कि कार्तिक अगहन तक अपनी कुछ नई गाँठ तैयार कर उन्हें सूख जाना है। तभी तो वह सुअर , सेही एवं भालू के नैसर्गिक भोजन बनेंगे ?

मनुष्य तो आग के खोज के पश्चात बहुत बाद में इन्हें उबाल कर खाना शुरू किया, जो एक तरह से दूसरे के भोजन में डाका ही कहा जा सकता है। पर यह कई जंगली जन्तुओ के करोड़ों वर्षों से प्राणदाता रहे हैं। परन्तु अब जंगल में बहुत ही कम दिखते हैं। यह अलग बात है कि हमारे साथी राम लोटन जी अभी भी ऐसे 10-12 प्रकार के कन्दों को अपनी बाटिका में बचाए हुए है। तभी तो उनपर एक कहावत ही बन गई है कि जो कहीं न मिले वह राम लोटन की बगिया में जरूर मिल जायेगी। 

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इंडियन बटर ट्री एक ऐसा वृक्ष जिससे निकलता है घी, आप भी जानें !

 

इंडियन बटर ट्री यानि घी वाला वृक्ष। 

पेड़-पौधों के अद्भुत संसार में ऐसे अनेकों पेड़ हैं जिनके बारे में कम लोगों को जानकारी होती है। अनगिनत खूबियों और औषधीय गुणों से भरपूर ये वृक्ष मानव जीवन के लिए भी अत्यधिक उपयोगी होते हैं। यहाँ हम आपका परिचय एक ऐसे विचित्र वृक्ष से करवाते हैं, जिससे घी निकलता है। यह अनूठा वृक्ष उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है, जो कि घी, गुड़ तथा शहद देता है। इसके अलावा यह वृक्ष फल, औषधि, जानवरों के लिए चारा, इंधन और चूहों को मारने के लिए कीटनाशक भी उपलब्ध कराता है। इस पेड़ों के बीजों से इतना तैलीय पदार्थ निकलता है कि एक अंग्रेज अफसर ने इसका नाम घी वाला वृक्ष अर्थात इंडियन बटर ट्री रख दिया।

स्थानीय लोग इसे च्यूरा कहते हैं, इसका वानस्पतिक नाम डिप्लोनेमा बुटीरैशिया है। यह बहुमूल्य वृक्ष कुमाऊँ और पिथौरागढ़ जनपद तथा भारत नेपाल की सीमा पर काली नदी के किनारे 3 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है, इसके पेड़ 12 से 21 मीटर तक ऊंचे होते हैं। वहां उसे ज्यादा तादाद में उगाने का प्रयास किया जा रहा है। 

यह वृक्ष यहां की जलवायु में ही पनपता है, अतः वहां के लोगों के लिए यह कल्पवृक्ष के समान है । उन लोगों के लिए घी का यही एकमात्र साधन है। जिसके पास फल देने वाले 3-4  वृक्ष होते हैं, उसे साल भर बाजार से वनस्पति घी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। यह एक छायादार वृक्ष होता है, फूल आने का समय अक्टूबर से जनवरी होता है तथा जुलाई-अगस्त में इसके फल पक जाते हैं। पके हुए फल पीले रंग के होते हैं, खाने में काफी स्वादिष्ट और सुगंधित होते हैं । वातावरण में फैली इस फल की मीठी महक से ही मालूम पड़ जाता है कि फल पकने लगा है। गांव के लोग इन फलों को बड़े चाव से खाते हैं।

पहाड़ के घाटी वाले क्षेत्रों में इसके जब फूल खिलते हैं तब शहद का काफी उत्पादन होता है। इसकी पत्तियां चारे व भोजन पत्तल के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग में लाई जाती हैं। च्यूरे की खली मोमबत्ती, वैसलीन और कीटनाशक बनाने के काम आती है। जिन क्षेत्रों में च्यूरे के पेड़ पाये जाते हैं उन क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन भी किया जाता है। च्यूरे के पुष्प मकरंद से भरे रहते हैं जिससे उच्च कोटि का शहद तैयार होता है। इंडियन बटर ट्री के नाम से जाना जाने वाला च्यूरा पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर और चम्पावत जिलों के काली, सरयू, पूर्वी रामगंगा और गोरी गंगा नदी घाटियों में पाया जाता है। इसका फल बेहद मीठा होता है। फल के बीज से घी बनाया जाता है। घी वाला वृक्ष अर्थात इंडियन बटर ट्री के नाम से जाना जाने वाला च्यूरा मैदानी क्षेत्रों में पाये जाने वाले बहुपयोगी वृक्ष महुआ की पहाड़ी प्रजाति भी माना जा सकता है। 

च्यूरा से प्राप्त घी के विभिन्न उपयोग

च्यूरा के बीज से प्राप्त घी का प्रयोग प्रकाश हेतु दिए जलाने में भी किया जा सकता है। अगर इस घी को मोमबत्ती की तरह मोम की जगह उपयोग किया जाता है तो यह अच्छा प्रकाश तो देता ही है साथ ही सामान मात्रा के मोम या घी से दुगुने से भी ज्यादा समय तक प्रकाश देता है। इसे जलाने पर आस-पास के वातावरण में एक मधुर सुगंध भी फ़ैल जाती है। यह घी प्रकाश हेतु तेल के रूप में इस्तेमाल करने पर बहुत कम  धुआं उत्सर्जित करता है अर्थात इसमें से बहुत कम कार्बन उत्सर्जन होता है। जिस कारण इसका उपयोग पंपसेट, जनरेटर आदि में जैव ईंधन के रूप में विशेष रूप से किया जा सकता है। इस घी का प्रयोग प्राकृतिक मोम की तरह जाड़ों में त्वचा को फटने सेरोकने के लिए एंटी क्रैकिंग क्रीम के रूप में भी किया जा सकता है।

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Saturday, June 10, 2023

पन्ना की लकवाग्रस्त बाघिन पी- 234 का वन विहार भोपाल में चल रहा इलाज

  •  बाघिन के दो नन्हे शावक अकोला बफ़र क्षेत्र में अपनी मां का कर रहे इंतजार 
  •  दोनों नन्हे शावकों की देखरेख के लिए वन कर्मचारियों को किया गया तैनात 

बाघिन पी-234 अपने शावकों के साथ अकोला बफ़र क्षेत्र में अठखेलियां करते हुए।   

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व की बाघिन पी- 234 के अचानक लकवाग्रस्त हो जाने से उसके दो नन्हे शावकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बाघिन को इलाज के लिए शुक्रवार 9 जून को दोपहर में पन्ना से वन विहार भोपाल ले जाया गया है, जहाँ बाघिन का इलाज जारी है। मां की गैरमौजूदगी में उसके नन्हे शावकों की देखरेख के लिए पार्क प्रबंधन ने वन कर्मचारियों को तैनात किया है, जो शावकों की निगरानी कर रहे हैं। 

उल्लेखनीय है कि बाघिन पी- 234 बीते माह 29 मई को अपने दो नन्हे शावकों के साथ अकोला बफ़र क्षेत्र में अठखेलियां करते हुए देखी गई थी। यह खुशखबरी पार्क प्रबंधन द्वारा सोशल मीडिया में साझा किया गया था, जिससे वन्य जीव प्रेमी बेहद खुश और उत्साहित थे। लेकिन इस खुशखबरी के कुछ दिन बाद ही यह दुःखद खबर आ गई जो चिंता में डालने वाली है। अकोला बफ़र क्षेत्र में भ्रमण के दौरान पर्यटकों ने बीते रोज जब दोनों पैरों को घसीट कर चलती हुई बाघिन पी- 234 को देखा तो उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में डाल दिया गया जो वायरल हो गया। जानकारी मिलते ही पार्क प्रबंधन भी तुरंत सक्रिय हो गया तथा बाघिन का प्राथमिक उपचार करने के साथ उसे ट्रेंकुलाइज कर इलाज के लिए भोपाल भिजवाया गया। 

 लकवाग्रस्त होने पर पिछले पैरों के सहारे खड़ी होने में असमर्थ बाघिन का पीड़ादायी द्रश्य। 

पन्ना टाइगर रिज़र्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार की रात में ही बाघिन वन विहार भोपाल पहुँच गई है जहाँ विशेशज्ञ चिकित्सकों की टीम द्वारा बाघिन का इलाज किया जा रहा है। डॉ. गुप्ता भी बाघिन के साथ भोपाल गए हैं तथा बाघिन की हालत में सुधार होने तक वहीँ रहेंगे। आपने बताया की बाघिन पीछे के पैरों पर जोर नहीं डाल पा रही है, यह सब यकायक हुआ है। लेकिन बिना देरी के चूँकि इलाज भी तुरंत शुरू हो चुका है इसलिए जल्दी रिकवरी की उम्मीद है। हालात में सुधार होने पर बाघिन पी- 234 को पन्ना लाकर अकोला बफ़र में उसके बच्चों के पास छोड़ा जायेगा।

 बाघिन पी- 234 के कुनबे से आबाद है अकोला बफ़र 



पन्ना टाइगर रिजर्व के अकोला बफर का आकर्षण बाघिन पी- 234 तथा उसका भरा-पूरा कुनबा है। मालूम हो कि पन्ना टाइगर रिजर्व की संस्थापक बाघिन टी-2 जिसे मार्च 2009 में कान्हा से पन्ना लाया गया था, इस बाघिन ने जुलाई 2013 में चार शावकों को जन्म दिया था। इन्हीं शावकों में से एक बाघिन पी-234 है, जिसके कुनबे ने अकोला बफर को गुलजार किया हुआ है। इस बाघिन ने नर बाघ टी-7 के साथ मिलकर अपने कुनबे को बढ़ाया है। इसी बाघिन की बेटी पी-234 (23) ने अकोला बफर क्षेत्र में ही जनवरी 2021 में तीन शावकों को जन्म दिया था।  इस तरह से बाघिन पी- 234 के कारण ही अकोला बफर बाघों से आबाद हुआ जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

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Friday, June 9, 2023

देश व दुनिया में प्रसिद्ध पन्ना के हीरों को मिलेगा जीआई टैग

  • विगत 7 जून 23 को किया गया आवेदन हुआ स्वीकृत 
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में पन्ना के हीरों की बढ़ेगी चमक 


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। बेशकमती रत्न हीरा की खदानों के लिए देश और दुनिया में प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की धरती से निकलने वाले हीरों को जीआई टैग मिलेगा। इसके लिए 7 जून 23 को किया गया आवेदन स्वीकृत हो गया है। जल्दी ही पन्ना की रत्नगर्भा धरती से निकलने वाले हीरों को जीआई टैग मिल जाएगा।  

हीरा अधिकारी पन्ना रवि पटेल ने बताया कि जीआई टैग मिलने से पन्ना के हीरो की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैल्यू बढ़ेगी। इसकी खूबी बताते हुए श्री पटेल ने कहा कि जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) यानी भौगोलिक संकेत एक प्रतीक है, जो मुख्य रूप से किसी उत्पाद को उसके मूल क्षेत्र से जोड़ने के लिए दिया जाता है। जिस वस्तु को यह टैग मिलता है वह उसकी विशेषता बताता है।  

पन्ना के हीरों को जीआई टैग मिले इसके लिए ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी लखनऊ द्वारा चेन्नई स्थित संस्था में आवेदन किया गया था। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के तहत काम करने वाली यह संस्था पूरी जांच पड़ताल और छानबीन के बाद जीआई टैग देती है। जीआई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस प्रोडक्ट की कीमत व महत्व बढ़ जाता है।


उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की पहचान सदियों से यहां की धरती से निकलने वाले बेशकीमती हीरों के कारण है, यही वजह है की पन्ना को डायमंड सिटी के नाम से भी जाना जाता है। जी आई टैग मिलने से पन्ना के हीरो की चमक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी, जिसका लाभ निश्चित ही पन्ना के हीरा व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलेगा। 

मालुम हो कि 2003 में जीआई टैग की शुरुआत के बाद भारत में पहला जीआई टैग दार्जिलिंग की चाय को साल 2004 में मिला था। उसके बाद देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्र विशेष की पहचान बन चुके अनेकों उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। इनमें कश्मीर का केसर और पश्मीना शॉल, नागपुर के संतरे, बंगाली रसगुल्ले, बनारसी साड़ी, तिरुपति के लड्डू, रतलाम की सेव, बीकानेरी भुजिया, झाबुआ का कड़कनाथ, चन्देरी साड़ी, महोबा का पान आदि शामिल है। उत्पाद के पंजीकरण और उसके संरक्षण के लिए दिसंबर १९९९ में एक एक्ट पारित किया गया था। इस एक्ट को Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया।

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Tuesday, June 6, 2023

घना जंगल, गहरा सेहा और मौत के मुंह में फंसी गाय !

चारों तरफ घनघोर जंगल, नीचे हजारों फीट गहरा सेहा जहां गिरने का मतलब सीधे मौत। इसी जगह पर लाल रंग की एक प्यारी सी गाय फंसी हुई थी, जहां से निकलने का कहीं कोई भी रास्ता नहीं था। जाहिर है कि गाय की मौत निश्चित थी। लेकिन यहां "जाको राखे साइयां मार सके ना कोय" वाली बात अक्षरसः  चरितार्थ हुई। इसी जगह पर अचानक हम लोग पहुंचे और गाय को मुसीबत में देख पास के गांव से ग्रामीणों को बुलाया। परिणाम स्वरूप गाय मौत के मुंह से सुरक्षित बचा ली गई। 


पल्थरा गांव के पास स्थित वह खतरनाक गहरा सेहा जहाँ गाय फँसी हुई थी। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। जिला मुख्यालय पन्ना से तकरीबन 35 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत रहुनिया के छोटे से गांव पल्थरा में समाजसेवी संस्था समर्थन द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर 5 जून को पौधरोपण सहित अन्य कई गतिविधियों वाला कार्यक्रम रखा गया था। इस कार्यक्रम में समर्थन संस्था के रीजनल कोऑर्डिनेटर ज्ञानेंद्र तिवारी जी के साथ मैं भी पहुंचा। घने जंगलों के बीच एक छोटा सा गांव पल्थरा स्थित है, जहां 35 आदिवासी परिवार रहते हैं। 

इस अनूठे गांव की अपनी कुछ खूबियां और विशेषताएं हैं, जिस पर अलग से कभी चर्चा करूंगा। विश्व पर्यावरण दिवस पर यहां मिडिल क्लास तक पढ़ने वाले ग्रामीण बच्चों के बीच पेंटिंग प्रतियोगिता भी आयोजित हुई, जिसमें बच्चों ने बड़े ही उत्साह के साथ भाग लिया। पल्थरा गांव के आदिवासी बच्चों ने अपने अंदाज में प्रकृति को चित्रित किया जो उनके लिए बेहद सहज और स्वाभाविक था। प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ी अनेकों गतिविधियों व हांथ धुलाई कार्यक्रम के बाद जामुन के एक विशाल वृक्ष की छांव में सभी ने गकड़िया-भर्ता और खीर का आनंद लिया। इस मौके पर ग्रामीण बच्चों की अनोखी खेल गतिविधि भी जारी रही। ग्रामवासियों के बीच दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चला।

शाम को लगभग 5 बजे हम लोग पल्थरा से पन्ना के लिए रवाना हुए। हमारी गाड़ी कुछ दूर ही चली होगी, उसी समय मुझे याद आया कि इस गांव के आसपास कोई बड़ा और गहरा सेहा है जो पन्ना के कौआ सेहा से भी अधिक गहरा तथा यहां का जंगल भी घना है। इस सेहा का जिक्र करने पर मेरे बगल में बैठे ज्ञानेंद्र जी बोले वह सेहा यही कहीं पास में ही है, आप यदि देखना चाहो तो वहां चलते हैं। जाहिर सी बात है मैंने कहा अभी समय है चलो चलते हैं। फिर क्या था गाड़ी पन्ना की तरफ से मुड़कर रहुनिया मार्ग पर चलने लगी। बमुश्किल चार-पांच किलोमीटर चलने पर हम लोग उस सेहा के निकट पहुंच गए जो सड़क मार्ग से साफ नजर आता है।

सेहा का नजारा, चारों तरफ घना जंगल और वनाच्छादित पहाड़ियां। 

बेहद उत्सुकता के साथ चट्टानों को पार करते हुए जब हम इस सेहा के निकट पहुंचे, तो वहां का नजारा देख हैरत में पड़ गए। जहां तक नजर जाए चारों तरफ घना जंगल और वनाच्छादित पहाड़ियां दिख रही थीं, सेहा की गहराई का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। इस सेहा के ऊपर दर्जनों की संख्या में गिद्ध मंडरा रहे थे। वहां की सीधी पहाड़ी व चट्टानों पर बिखरी सफेदी को देख प्रतीत हो रहा था कि यह सेहा गिद्धों का भी प्रिय रहवास है। हम लोग प्रकृति के इस अद्भुत नजारे को अपने मोबाइल कैमरे में कैद ही कर रहे थे कि अचानक हमारी नजर लाल रंग की गाय पर पड़ी। हम जहां खड़े थे वहां से तकरीबन 15-20 फीट नीचे एक विशालकाय चट्टान की किनारे यह गाय खड़ी थी। इस चट्टान के बाद नीचे पाताल जैसा दिखने वाला सेहा था, जिसमें गिरने का मतलब मौत तो है ही अस्थि पंजर भी मिल पाना संभव नहीं है।

गाय को किस जतन से ऊपर सुरक्षित लाया जाय, इस पर मशविरा करते समाजसेवी युवक व ग्रामीण।  

हम लोग इस गाय को वहां देख हैरत में पड़ गए कि आखिर यह वहां पहुंची कैसे ? क्योंकि नीचे गहरा सेहा और जहां गाय थी वहां से ऊपर जाने का कोई रास्ता नहीं। ऐसा लग रहा था कि यह गाय जाने अनजाने यहां गिर गई होगी और फिर यहां फसकर रह गई। चट्टान में गाय का गोबर जहां तहां पड़ा था, जो सूखकर कंडी में तब्दील हो चुका था। इससे यह अनुमान लगा कि यह गाय यहां पर कम से कम तीन-चार दिनों से है। एक दिन पूर्व ही बारिश हुई थी, जिससे चट्टान में एक जगह पानी भर गया था। शायद यह पानी ही भीषण गर्मी में भूखी और प्यासी गाय के लिए जीवनदायी साबित हुआ। 

प्रकृति के अद्भुत नजारों से हमारा ध्यान हटकर अब मौत के मुंह पर फंसी इस गाय पर केंद्रित हो गया। इसे ऐसी हालत में छोड़कर जाने को दिल तैयार नहीं था, फलस्वरुप सोचने लगे कि क्या करें, इसे कैसे मुसीबत से बाहर निकालें। हम चार-पांच लोग थे लेकिन हम सब मिलकर भी गाय को 15-20 फिट ऊपर नहीं खींच सकते थे। ऐसी स्थिति में सड़क मार्ग से गुजरने वाले लोगों को आवाज देकर बुलाने का प्रयास किया, लेकिन वहां का परिवेश, गहरा सेहा और घनघोर जंगल होने के कारण कोई भी राहगीर रुकना तो दूर वे और तेजी से निकल भागे। कोई उपाय न देख ज्ञानेन्द्र जी ने अपने समाजसेवी साथी राजकुमार जी को फोन किया जो पल्थरा गांव में ही थे। उन्हें सारी बात बताई और कहा कि इस गाय को बचाना जरूरी है अन्यथा यह सेहा में गिरकर मर जाएगी।  

गाय के कमर व अगले हिस्से में रस्सा बांधकर ऊपर खींचा गया। 

स्वभाव से बेहद संवेदनशील राजकुमार जी ने मामले की गंभीरता को समझा और बिना देरी किए गाय को बचाने की मुहिम में जुट गए। गांव में मोटे रस्से  ढूंढे गए तथा गांव के कुछ युवकों को तैयार कर गाड़ी से तुरंत सेहा के लिए रवाना हुए। इतने सारे लोगों को वहां पर देख गाय की आंखों में भी उम्मीद की किरण जागी कि शायद अब बच जाऊंगी। उसे पेड़ से पत्ते तोड़ कर दिया गया तो वह निश्चिंत भाव से पत्ते खाने लगी। जब कुछ युवक नीचे उतर कर गाय के पास पहुंचे तो उसने भी सहयोग किया और शांत खड़ी रही।  

मौत के मुंह से सुरक्षित निकलकर अपने ठिकाने की तरफ जाती गाय। 

मोटे रस्से से गाय को कमर व आगे के हिस्से में बांधा गया और ऊपर खड़े लोगों ने आहिस्ता-आहिस्ता सावधानी पूर्वक गाय को ऊपर खींचा।  देखते ही देखते गाय सुरक्षित ऊपर पहुंच गई। जब रस्सी खोली गई तो वह उठ कर खड़ी हुई और वहां मौजूद लोगों को प्यार भरी नजर से देखा और फिर चल पड़ी। गाय को इस तरह जाते देख मन आनंदित और प्रफुल्लित हो गया। विश्व पर्यावरण दिवस पर हम लोगों की यह सबसे अच्छी और सुकून प्रदान करने वाली गतिविधि रही जो निश्चित ही अविस्मरणीय रहेगी।

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