Thursday, May 11, 2023

ऐसी खेती मत करो प्यारे चतुर किसान, धन धरती अरु स्वास्थ का जिसमें है नुकशान



।। बाबूलाल दाहिया ।।           

प्रकृति का एक नियम था वह था हर वस्तु के उत्पादन के साथ संतुलन। हमने देखा है कि अगर हमारी धान में कीट दिखे तो मकड़ियां समस्त खेत मे जाल बुन सैकड़ो बच्चे पैदा कर देती हैं, जो उन्हें पकड़- पकड़ कर खा जाते हैं। जंगल मे यदि सुअर बढ़े तो अपने आप वहां तेंदुआ पहुच जाते हैं। यहां तक कि मौसम में भी संतुलन। 

अभी लगातार दो माह से बादल बूदी का मौसम था, अस्तु गर्मी कम थी पर मई जून में हर वर्ष अधिकतम 40-45 डिग्री सेल्सियस तक ताप क्रम बढ़ जाता है।  सपोज करिए कि अगर वह 50-55 तक हो जाय तो क्या कोई जीव जन्तु य बनस्पति बच पाएगी? इस तरह प्रकृति हर जगह अपना संतुलन बनाकर रखती है।

प्रकृति की जो भी नैसर्गिक ढंग से उत्पादित बनस्पति है, वह बीज सम्बर्धन के लिए है न कि ब्यापार सांस्कृति के लिए? अब उसी में थोड़ा श्रम लगा लोग कुछ अधिक उपज ले लेते तो उनके उपयोग के लिए भी होजाता। पर अगर उत्पादन चित्र वाले खीरा य टमाटर की तरह जरूरत से अधिक हो जाय तो क्या किसान को उससे लाभ होगा य बाजार में मारा मारा फिरेगा?

हमने लड़कपन में देखा है कि हमारे गाँव की गोधनिया फूफू और बोटा काका कुशवाहा अपने आधा-आधा बिगहा की कोलिया (बाड़ी) में सब्जी लगा अपनी जिंदगी काट लिए। उन्हें कही किसी के यहां काम के तलास में नही जाना पड़ा था। क्योकि भाव का संतुलन था तो उन्हें उतनी ही भूमि में अपने श्रम का पूरा - पूरा मूल्य मिल जाता था।

पर अब नई खेती और इस प्रकार की भरपूर पैदावार देने वाली सब्जियों ने ऐसे हजारों 5-7 एकड़ बाले किसानों तक को गाँव निकाला की सजा देदी है। जबकि उसी भूमि में उन किसानों के पिता और पितामह खेती किसानी य सब्जी के बूते ही अपने बेटे बेटियों का विवाह भी कर लेते थे और कुछ लोग तो चारोधाम तीर्थाटन कर यज्ञ भंडारा भी कर लेते । साथ ही ग्रहस्ती भी चलती रहती थी।

लेकिन 50 वर्ष में ही इस खेती ने देश की क्या हालत करदी? ऐसी खेती में यदि लाभ है तो मात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को जिनका टर्न ओभर भारत के वार्षिक बजट से भी अधिक है। बाकी इस असंतुलित ह्रदय हीन खेती ने गाय, बैल, श्रमिक, कृषि उद्द्मियों, कृषक पुत्रो सभी को गाँव से निकाल बाहर कर दिया है।

क्योकि अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि ( उत्पादन बढ़ेगा तो मूल्य घटेगा)  और जब मांग से अधिक पूर्ति हो जाएगी यो वस्तु फेंकी- फेंकी फिरेगी ही। पर अब वह भाव 10 गुना तो घट ही चुका है आगे न जाने और कितना घटता जायगा? पहले किसानों के बीच एक मान्यता थी कि "जिस साल आम में बौर अधिक आती है उस साल प्याज सस्ती बिकती है। और जिस वर्ष कम आम में फल आये उस साल महंगी।"  इसी के आधार पर प्याज उत्पादक खेती करते थे।

लेकिन अब तो हर वर्ष ही किसान महंगा बीज, खाद, कीटनाशक ,नीदा नाशक डाल कर ऐसा उत्पादन लेता है कि बाद में समूची ट्रेक्टर ट्राली की प्याज ही सड़क में डाल कर घर लौट आना पड़ता हैं। ७० के दशक में कृषि विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों को एक मंत्र पढ़ाया गया था अधिक उत्पादन जाप का। अब नया मंत्र गुणवत्ता पूर्ण संतुलित उत्पादन में बदल जाना चाहिए। पर वे हैं कि आज भी उसी का जाप करते जा रहे हैं।

जो कृषि और उद्यानिकी कर्मचारी अधिकारी इन तमाम चीजों के अभी प्रचारक बने हुए हैं तो क्या इस तरह उत्पादन असंतुलन के पश्चात उनके अनुसंधान की आगे कुछ गुंजाइश भी बचेगी? क्योकि चीज घटिया किस्म की आकर बाजार में पट जाती है जिससे न उत्पादक को लाभ होता न उपभोक्ता को गुणवत्ता पूर्ण वस्तु मिलती। इसलिए अब तो यह प्रश्न ही विचारणीय हो गया है कि--

ऐसी खेती मत करो, प्यारे चतुर किसान।

धन धरती अरु स्वास्थ का, जिसमें है नुकशान।।

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Monday, May 1, 2023

हमारी जैव विविधता वाटिका : बाबूलाल दाहिया

 


आज हम लोग अपनी जैव विविधता वाटिका घूमने गए, जहाँ पेड़ पौधों की सौ से अधिक प्रजातियां लगी हुई हैं। वहां अगर एक-एक पौधा आम,जामुन, महुआ, अमरूद, आंवला जैसे बाग वाले पौधों के हैं, तो एक-एक पौधा हर्र, बहेरा, कोशम, कैमा, दहिमन,खमार, कुल्लू के जंगल वाले भी हैं। 

कचनार,कैथा,करंज,मरोड़ फल में जहां नए पत्ते आ गये हैं, वही कुल्लू,ओदार,चिल्ला अभी पात विहीन हैं। कुछ पौधे तो ऊंचाई में मुझसे भी बड़े हो गए हैं। पर कैथा, कहुआ, केवड़ा, इमली, बेल और महुआ अभी एक हाथ के भी नहीं हुए। सिंदूरी मरोड़ फल शहतूत, दो वर्ष में ही युवा हो जहां फल फूल देने लगे हैं, वहीं अन्य पेड़ो का अभी बहुत दिन इंतजार करना पड़ेगा।

फल फूल आते रहेंगे जब आना होगा ? क्यो वह सभी अलग-अलग कुदरत के नियम में बंधे हैं । यू भी बाग वाटिका  एक पीढ़ी लगाती है लेकिन उससे अगली पीढियां ही लाभान्वित होती हैं। आगे हम रहें न रहें पर अभी हमें इसका फख्र जरूर है कि हम लोगों ने जो वाटिका तैयार कर दी है, वह अपने जैव विविधता प्रबंधन समिति की अवधारणा के अनुरूप ही है।

आज जब हम जैव विविधता प्रवंधन समिति के सदस्य गण अपनी इस बाटिका में  घूमने आते हैं, तो यह अवश्य लगता है कि हमने जीवन मे एक बेहतर काम किया है। क्योकि हमने इनके सिचाई के लिए सब मर्सिवल पम्प लगाए। चारों ओर सुरक्षा के लिए खम्भे और जालियां तथा गेट लगवाया, दो वर्ष तक निराई गुड़ाई तथा सिचाई की ब्यवस्था की। अब आगामी जुलाई से यह समस्त पौधे दो वर्ष के हो जाएंगे। तब हम इन्हें ग्राम पंचायत को हस्तगत कर समाज को सौप अपनी जिम्मेदारी से अलग हो जायेंगे। 

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Sunday, April 30, 2023

आखिर क्यों होती हैं गंभीर बीमारियाँ, क्या इनसे बचाव संभव है ?

  • कार्डियक हेल्थ, मेन्टल हेल्थ एवं स्पिरिचुअल हेल्थ पर आयोजित हुई कार्यशाला 
  • सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. अरूण जैन ने गंभीर बीमारियों से बचाव के बताये उपाय 

कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. अरूण जैन साथ में पुलिस अधीक्षक पन्ना धर्मराज मीना। 

पन्ना। कार्डियक हेल्थ, मेन्टल हेल्थ, सोशल हेल्थ एवं स्पिरिचुअल हेल्थ विषय पर पुलिस कान्फ्रेंस हाँल पन्ना में शनिवार 29 अप्रैल को एक कार्यशाला आयोजित हुई। जिसमें सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. अरूण जैन ने प्रमुख वक्ता के रूप में उपस्थित होकर पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों को गंभीर किस्म की जानलेवा बीमारियों से बचाव बावत उपयोगी जानकारी प्रदान की। 

उन्होंने बड़े ही प्रभावी ढंग से कार्डियक हेल्थ, मेन्टल हेल्थ, सोशल हेल्थ एवं स्पिरिचुअल हेल्थ के बारे में समझाया। डॉ. अरूण जैन ने बेहद सरल भाषा में यह बताया कि हमारा हार्ट किस प्रकार काम करता है। आपने बताया कि कार्डियक अरेस्ट, हार्ट अटैक, हार्ट फेलियर, हार्ट ब्लॉक, आदि में क्या अन्तर है तथा  ब्लड प्रेशर, बी.पी. जैसी गंभीर बीमारियाँ किन कारणों से होती हैं। इन गंभीर किस्म की  बीमारियों से अपना बचाव हम किस तरह की जीवनचर्या व खानपान को अपनाकर करें।   

उन्होने बताया कि बी.पी., शुगर, हार्ट अटैक आदि बीमारियों का प्रमुख कारण हमारी वर्तमान अव्यवस्थित लाईफ स्टाईल है। जंकफूड, नियमित नींद ना लेना , व्यायाम ना करना तथा  मादक पदार्थों और शराब का अधिक सेवन करना इन बीमारियों का प्रमुख कारण है। इसके साथ ही उन्होने बताया कि हम किस प्रकार इन बीमारियों से बच सकते हैं।  कार्डियक हेल्थ के लिए क्या-क्या करना होगा। उन्होने लाँफ थैरेपी का महत्व बताते हुए प्रतिदिन इसे करने हेतु बताया । जंकफूड के स्थान पर मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी, कोदो खाने की सलाह दी, साथ ही संतुलिंत आहार लेने की बात पर जोर दिया। 

पुलिस अधीक्षक पन्ना धर्मराज मीना ने भी समस्त अधिकारियों व कर्मचारियों को संतुलिंत दिनचर्या अपनाने हेतु प्रेरित किया। उन्होने कहा कि संतुलित दिनचर्या निश्चित ही हमें स्वास्थ्य रखती है और विविध बीमारियों से भी बचाती है। पुलिस अधीक्षक द्वारा बताया गया कि  समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी अपने स्वास्थ्य को लेकर हमेशा सजग और सचेत रहें। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम करें एवं समस्त प्रकार के व्यसनो से दूर रहें। साथ ही साल में एक बार अपना एवं अपने परिवार का स्वास्थ्य परीक्षण अवश्य कराऐं। ताकि किसी भी बीमारी को प्रारम्भिक स्तर पर ही डिटेक्ट कर उसका ईलाज प्रारम्भ किया जा सके। कार्यक्रम में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पन्ना श्रीमति आरती सिहं, रक्षित निरीक्षक श्रीमति देविका सिहं बघेल तथा पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। 

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Thursday, April 13, 2023

डॉ. अम्बेडकर कांग्रेस के पूरक हैं : राजा पटेरिया



डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारत में दलित चेतना, दलित उत्थान और दलित समाज को राष्ट्रीय मुख्य धारा से जोड़ने वाले अग्रणी महापुरुष हैं और भारत की संविधानसभा में संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देश के सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और समान अवसर की गारन्टी देने का जो महान और अभिनव कार्य किया है, उसके लिये हम सदा उनके आभारी रहेंगे ।

लेकिन आज अम्बेडकर जयंती के अवसर पर डॉ. अम्बेडकर को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कुछ तथ्यपरक जानकारी आपके समक्ष रखना जरूरी समझता हूँ क्योंकि लोकतंत्र में "वोट बैंक की राजनीति के जोर पकड़ने के साथ ही हमने महापुरुषों का बंटवारा कर लिया । यह तो एक अच्छी बात है और एक हद तक राजनैतिक मजबूरी है कि राष्ट्रपिता गांधी को आज देश के सभी राजनैतिक दल आदरपूर्वक मानते हैं जबकि भाजपा और संघ परिवार को हमेशा गांधी को राष्ट्रपिता मानने में आपत्ति रही है, लेकिन आज वे भी बढ़चढ़कर गांधी का स्तुतिगान कर रहे हैं। डॉ. अम्बेडकर के मामले में भी भाजपा और संघ परिवार का दृष्टिकोण अभी-अभी बदला है वरना हिन्दूवादी संगठनों और नेताओं ने कभी भी उन्हें महापुरुष नहीं माना ।

दूसरी ओर कुछ जनाधारहीन दलित नेता अम्बेडकर पर अपना एकाधिकार जमाते हुए उन्हें कांग्रेस खिलाफ और कांग्रेस नेताओं के विरोधी के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते रहे हैं और कई अधकचरे अपढ़ कांग्रेसजन भी अम्बेडकर के प्रति पूर्वाग्रह रखते रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद के दौर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर वास्तव में कांग्रेस के पूरक तत्व के रूप में देश हित में और देश के नव निर्माण में काम करते रहे कुछ हल्के नीतिगत और कार्यक्रमगत मतभेदों के कारण अम्बेडकर कांग्रेस से अलग "रिपब्लिकन पार्टी" बनाकर काम करते रहे । लेकिन मूल रूप से वे कांग्रेस को दिशा और मार्गदर्शन देने का काम ही करते रहे । 

डॉ. अम्बेडकर के भारतीय राष्ट्रीय परिदृश्य पर उमरने से बहुत पहले ही देश में स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना जागृत हो चुकी थी और इससे भी पहले देश के नव निर्माण के लिये और नये समाज के निर्माण के लिये समाज सुधार के कार्य होने लगे थे । राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा उन्मूलन और स्त्रियों को नागरिक अधिकार देने के लिये जनचेतना जगाई अंग्रेजी शासन के जरिये सती प्रथा उन्मूलन का कानून बनवाने में सफलता पाई, तो गोपालकृष्ण गोखले और महादेव रानाडे ने विधवा विवाह को मान्यता देने और विवाह की न्यूनतम आयु तय कराने के कानून बनवाये । 

ज्योतिबा फुले ने स्त्री शिक्षा, अछूतोद्धार और मानव मात्र में समानता और भाईचारे के लिये रचनात्मक कार्य किये । दक्षिण भारत में अछूतों के मंदिर प्रवेश के आंदोलन हुये और इसके बाद जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे तो उन्होंने आजादी से पहले समूचे भारतीय समाज में एकता, समानता और समान अधिकार के लिये आवाज बुलंद की। गांधी जी ने साफ सफाई और पाखाना साफ करने जैसे काम स्वयं किये और इन कामों में लगे दलितों को समझाया कि मेहनत और श्रम किसी स्थिति में हैय या कमतर नहीं है । इसी तरह ऊंची जाति के लोगों को भी समझाया कि काम करने के कारण किसी को अछूत या कमतर नहीं माना जा सकता। गांधी जी ने भी अछूतों के मंदिर प्रवेश के आंदोलनों का संचालन किया । 

राजस्थान के प्रसिद्ध नाथद्वारा मंदिर में गांधी जी ने जो आंदोलन किया उसके बाद राजस्थान के कई मंदिरों में दलितों के लिये मंदिर प्रवेश की सुविधा दी गई। इसी तरह केरल और महाराष्ट्र में भी गांधी जी ने मंदिर प्रवेश आंदोलन संचालित किये। दलितो को शिक्षा और स्वदेशी उद्योग में तरक्की करने के अवसर देने के लिये भी गांधी जी ने अभिनव कार्य किये। इसी दौर में इंग्लैण्ड से शिक्षा प्राप्त कर लौटे और मुम्बई में बैरिस्टर के रूप में कार्य कर रहे डॉ. अम्बेडकर ने दलित बस्तियों और दलितों की दुर्दशा देख उनके हित और उनके हक में आवाज उठाई। दलितों ने अपने बीच के ही एक उच्च शिक्षित व्यक्ति को पाकर उसे अपना नेता और मुक्तिदाता माना, जिससे भारतीय समाज में एकीकरण की प्रक्रिया को बल मिला। यह अम्बेडकर के प्रयासों की ही देन कहा जाएगा कि कांग्रेस के आंदोलनों में, 7 विशेषकर मुम्बई के मजदूर आंदोलन और दीगर आंदोलनों में दलितों की भागीदारी अच्छी खासी रहा करती थी। 

बाद में विदर्भ और देश के दूसरे क्षेत्रों में भी दलित समाज कांग्रेस से जुड़ा बिहार, उत्तरप्रदेश और पंजाब के शिक्षित युवक कांग्रेस संगठन में जिले से लेकर राष्ट्र स्तर तक महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी संभालने लगे । बाबू जगजीवनराम ने इसी दौर में बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में दलित चेतना जगाने और दलितों की समस्या को लेकर आंदोलन चलाए । भोला पासवान शास्त्री, बाबू दयाल राम, संकटाप्रसाद भी इसी दौर के दलित नेता हैं । कांग्रेस या गांधी जी से अम्बेडकर के मतभेदों को अनावश्यक और गलत तरीके से प्रचारित किया जाता है। पूना पैक्ट और उस पर हुई बहस एक सोची समझी रणनीति के तहत की गई, ताकि विदेशी सरकार और देश के सवर्ण समाज की भावना उजागर कर दलितों के हित में फैसले कराये जा सकें ।

आजादी के बाद संविधान निर्माण में डॉ. अम्बेडकर की भूमिका, कांग्रेस के सहयोग के बिना असंभव थी। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि सन 1946 में जो संविधानसभा बनी, उसके लिये अम्बेडकर तत्कालीन मुम्बई प्रांत या सीपीएण्ड बरार से चुने नहीं गये थे । आप सब 1946 की संविधानसभा के सदस्यों की सूची देख सकते हैं। डॉ. अम्बेडकर को उनके कानून के ज्ञान के कारण गांधी-नेहरु ने बंगाल से जिताया था। डॉ. अम्बेडकर के लिये पण्डित नेहरु के आग्रह पर नेताजी सुभाष बोस के छोटे भाई शरद बोस ने सीट खाली की और उनके रिक्त स्थान पर डॉ. अम्बेडकर को संविधानसभा में चुना गया। देश विभाजन के कारण जब अगस्त 1947 में बंगाल का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान में चला गया, तब फिर से चुनाव हुए और तब डॉ. अम्बेडकर को सीपीएण्ड बरार से चुने जाने के लिये सरदार पटेल ने रविशंकर शुक्ल और तत्कालीन मुख्यमंत्री खेर साहब को जवाबदारी सौंपी थी और ये चुने भी गए। 

इसके बाद जहां तक संविधानसभा में प्रारूप समिति में अध्यक्ष पद का सवाल है, पहले अल्लादी कृष्णन अध्यक्ष थे लेकिन वृद्धावस्था के कारण वे इस पद की जिम्मेदारी नहीं संभाल सकते थे, इसीलिये उनकी सिफारिश पर अम्बेडकर को अध्यक्ष बनाया गया था। डॉ. अम्बेडकर ने भी संविधान प्रारूप सभा को सौंपते हुए अपने भाषण में कांग्रेस की सदाशयता और अनुशासन की जो तारीफ की है और कांग्रेस नेतृत्व की तारीफ की है. उससे लगता है कि कांग्रेस और अम्बेडकर में कोई मूल मतभेद नहीं रहे बल्कि सहयोगी भाव ही रहे हैं।

( इस आलेख के लेखक राजा पटेरिया मध्यप्रदेश शासन के पूर्व मंत्री व  म.प्र. कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष हैं। ) 

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Monday, April 10, 2023

यह चेरी टमाटर कहीं अग्रेजों के आने के पहले का तो नहीं ?

  • देखने में बेहद आकर्षक हाईब्रीड टमाटर सब्जी बाजार में 5 से 10 रुपये किलो बिक रहा है, जबकि देशी चेरी टमाटर 40 रुपये किलो बिकता है। इसकी वजह चेरी टमाटर का स्वाद है जो हाईब्रीड टमाटर में नहीं मिलता। कहा जाता है कि टमाटर और आलू हमारे देश की सब्जी नहीं है लेकिन चेरी टमाटर प्राकृतिक रूप से इस देश की मिट्टी व आबोहवा में ही पनपा है। 

 

।। बाबूलाल दाहिया ।।

प्रायः यह सुनिश्चित है कि टमाटर और आलू हमारे देश की सब्जी नहीं है। यह दोनों अग्रेजो के आने के बाद ही भारत में आये और यहां की प्रमुख सब्जी का स्थान ले लिया। शायद यही कारण है कि आयुर्वेद ग्रन्थों में इनका कहीं उल्लेख नहीं पाया जाता। सब से बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण तो (आईने अकबरी) है। कहते हैं 1555 में जब बादशाह हुमायु दोबारा बादशाह बने और अपने सरदारों एवं रिआया को भोज दिया उसमें सभी तरह की तरकारियां लौकी, भिंडी, करेला, परवल, गिलकी, कद्दू, घुइयां, बरवटी आदि  राधी गई। किन्तु यह (टोमैटो-पोटैटो) उन सब्जियों मे शामिल नहीं है। इससे सिद्ध है कि तम्बाकू की तरह इन्हें भी अंग्रेज अपने साथ लाए जो बाद में समूचे देश की लोकप्रिय सब्जी बन गए। 

किन्तु यह समूचे उत्तर और मध्य भारत में  नैसर्गिक ढंग से उगने वाला जंगली टमाटर चेरी जिसे कहीं मारू कहीं भेजरा तो कहीं टमटरी भी कहा जाता है, क्या यह भी अग्रेजों द्वारा लाया गया होगा ? या यह पहले से इसी तरह उगता रहा होगा ? यह विद्वानों के लिए विचारणीय बात है। क्योकि इसका चरित्र उन बड़े टमाटरों से अलग सा लग रहा है। 

व्यावसायिक रूप से लगाये जाने वाले कई तरह के टमाटर हैं। कुछ देश में हरित क्रांति आने के पहले के टमाटर हैं जो खाने में खट्टापन लिए जायकेदार हैं । अस्तु उन्हें देसी टमाटर कहा जाता है, तो कुछ हाईब्रीड भी हैं। यह हाईब्रीड देखने मे तो आकर्षक हैं किन्तु स्वाद में दो कौड़ी के भी नहीं। लेकिन बाजार इन्ही से पटा रहता है। इन दोनों से अलग एक वह चेरी य जंगली टमाटर भी है, जिसमें खाद, बीज, निराई, सिचाई, कीटनाशक आदि किसी में कुछ भी पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं। बस तोड़िए और चटनी य सब्जी में उपयोग कीजिए।

न तो उसमें पत्ती सिकुड़न रोग लगता है, न कोई कीट ब्याधि ? वह अपने आप गाँव, घरों के आस पास बिखरे कूड़े करकट, खेतो की मेड़ो य बगीचे, सार्वजनिक स्थानों में जमेगा और सितम्बर से पकना शुरू होगा तो अप्रैल तक मुफ्त में सब्जियां खिलाएगा, जिसमें किसी का स्वामित्व भी नहीं। चाहे जो तोड़ता खाता रहे ? और पत्ते में ऐसा कषैलापन कि मजाल क्या कि कोई पशु मुँह भी मार सके ? किन्तु यदि इसके दो चार फल भी उस स्वाद रहित हाईब्रीड टमाटर के सब्जी में डाल दिया जाय तो उसे भी इसका खट्टापन स्वादिष्ट बना दे।

लेकिन इसका हम मनुष्यो का मात्र स्वार्थ का ही नाता है। इसके वंश परिवर्धन के लिए बीज फैलाने का काम तो चिड़ियां करती हैं। शायद इसीलिए उनके अनुरूप उसने अपने फल का आकार छोटा रखा है।

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Friday, April 7, 2023

विश्व स्वास्थ्य का दिवस है, कहते हैं सब आज। बीज बैंक में देखिए, विश्व स्वास्थ्य का राज।।

 


।। बाबूलाल दाहिया ।।                

मित्रो! कहते हैं आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है। कोई भी दिवस मनाने का एक मकसद होता है। उसका सीधा सा अर्थ है कि लोग उसके प्रति सजग हों। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय समय-समय पर अनेक दिवसों की याद दिलाता रहता है। मनुष्य का स्वास्थ्य से बहुत प्राचीन रिश्ता है । जब हम छोटे-छोटे थे तभी से सुनते आ रहे हैं कि 

  प्रथम सुख्ख निरोगी काया।

  दूसर सुख हो घर में माया।।

यानी स्वास्थ्य पहले धन बाद में। परन्तु हम देखते हैं कि लोगो की औसत उम्र तो बढ़ी है पर औसत तीन ब्यक्तियों में एक ब्यक्ति रक्तचाप, मोटापा य डायबिटीज का मरीज भी हुआ है। और मैं इस आधार पर कहता हूं कि जितने लोग हमारा मियूजियम य बीज बैंक देखने आते हैं तो हर तीसरा ब्यक्ति कहता है कि  "दाहिया जी बगैर शक्कर की चाय बनवाइयेगा ?"  लेकिन ऐसा क्यो है? वह इसलिए है कि सभी ने परम्परागत अनाजों को खाना छोड़ दिया है। वे परम्परागत अनाज थे ( कोदो, कुटकी, सांवा, काकुन, ज्वार, मक्का, बाजरा, जौ, चना, गेहूं, चावल ) साथ ही कई प्रकार की दालें भी।

पर हरित क्रांति आने के पश्चात हमारा  भोजन अब तीन अनाजों में ही सिमट कर रह  गया है। वे हैं (गेहूं, चावल, दाल) और वह भी सभी रसायन से पके हुए? जब कि पहले हमारे  भोजन में  दश-बारह अनाज शामिल थे, जो पूर्णतः रसायन रहित और उनमे रोगों से लड़ने की क्षमता तो थी ही पर उनसे हमें अनेक तरह के पोषक तत्व भी मिलते थे।


मोटे अनाजो में एक विशेषता यह भी थी कि उनको यदि 100 ग्राम भी खाया जाए यो उनके साथ दो हिस्सा दाल, सब्जी, दूध, मट्ठा कुछ न कुछ अवश्य खाना पड़ता था। अस्तु उनसे भोजन पोष्टिक भी हो जाता था दूसरी ओर उपरोक्त बीमारियां नहीं होती थी। हमने अपने दश-बारह अनाजो में गेंहू चावल भी बताया है। आप कहते होंगे कि" गेहूं चावल ही तो हम खाते हैं ? " पर हाईब्रीड और परम्परागत में अन्तर है। परम्परागत कुदरती है लेकिन हाईब्रीड कृत्रिम। परम्परागत का तना बड़ा होता है अस्तु वह रसायनिक खाद बर्दास्त नहीं करता। साथ ही तना बड़ा होने से उसे तीन स्टेज में जमने वाला नीदा नहीं दबा पाता अस्तु वह स्वाभाविक रसायन रहित होता है। उसके विपरीत आज बाजार से खरीद कर जो अनाज दालें य सब्जियां लोग खाते हैं वे पूर्णतः रसायन स्नान किए हुए ही होते हैं।

इसी तरह यदि कीटों को देखा जाय तो रसायनिक खाद न पड़ने से देसी का पौधा अधिक हरा नही होता अस्तु उसमे उतने ही कीट आते हैं जिन्हें चिड़िया, गिरगिट, मकड़ी, लखाडी एवं अन्य मांसाहारी कीट कंट्रोल कर सके। अस्तु उनमे रसायनिक कीटनाशी डालने की जरूरत नही पड़ती । इसलिए विश्व स्वास्थ्य की असली दवा तो हमारे बीज बैंक में ही 200 प्रकार की परम्परागत धान, 15 प्रकार के देसी गेहूं, कोदो,कुटकी, सांवा काकुन, बाजरा आदि के रूप में  हैं जिन्हें किसान ले जाएँ और खेतों में उगाकर परिवार समेत खाएं तथा दूसरों को भी खिलाएं।

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Thursday, March 23, 2023

गुण ना हेराने गुण ग्राहक हेराने हैं ?

  • लौह उपकरण बेचने वाले लोहगड़िया समुदाय के लोग जो अपना रिश्ता महाराणा प्रताप के सिसौदिया वंश से जोड़ते हैं। इस खानाबदोश समुदाय के लोग लोहे से निर्मित होने वाले औजारों को बनाने में निपुड होते हैं। लेकिन इस तकनीकी युग में इनके बनाये औजारों की मांग न के बराबर रह गई है जिससे यह खानाबदोश समुदाय अब संकट में है। 

खानाबदोश लोहगड़िया समुदाय के लोग इसी तरह बैलगाड़ी से एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा करते हैं। 


।। बाबूलाल दाहिया ।।

मित्रो ! यहां लौह उपकरण बेचने वाले एक लोहगड़िया के दो चित्र हैं। पहला तब का है जब वह बैलगाड़ी में अपने समूचे परिवार और गृहस्थी को लेकर आता था । लेकिन दूसरा  अब का है जब वह खेती के तमाम उपकरण बस में रख कर लाया है और पुराने स्थान में ही दुकान लगा कर बेचता है। पता नहीं समय क्यो इतनी तेजी से बदलता है कि पिछला सब कुछ तहस नहस करता आगे बढ़ जाता है ? लोहगड़िया नामक इस खानाबदोश समुदाय को हम बहुत पहले से देखते चले आ रहे हैं। यह राजस्थानी लोहगड़िया अपना रिश्ता महाराणा प्रताप के सिसौदिया वंश से जोड़ते हैं।

कहते हैं कि जब महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि "जब तक चित्तौड़ दोबारा न जीत लेंगे तब तक खाट में नही पड़ेगे ? सोने चाँदी के बर्तन में नहीं खायेंगे ? महल के बजाय तम्बू में ही रहेंगे।"  तो उस प्रतिज्ञा में यह समुदाय भी शमिल था। क्योकि शस्त्र आपूर्ति करने के कारण यह समुदाय उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ा था।

सम्भवतः 1953-54  में शुरू- शुरू में जब यह लोग यहां अपनी बैल गाड़ी में पहली बार  आए तो इनके सिर में कान के ऊपर अगल बगल दो और चोटी हुआ करती थी। क्योकि इनकी एक प्रतिज्ञा यह भी थी कि "जब तक अपना देश चित्तौड़ आजाद न करा लेगे तब तक इन चोटियों को नही मुड़वायेगे ?" यही कारण था कि तब इन्हें लोग (तिनचुटइहा) यानी कि तीन चोटी वाला कहते थे। पर बाद में इन्हें अहसास कराया गया कि "अब तुम्हारा चित्तौड़गढ़ भर नही सारा देश आजाद हो गया है।" तो फिर बाद में उनने अपनी दो चोटियां मुड़वा दी।


किमदन्तिया चाहे जो रही हों ? पर इतना तो सच है कि राजपूतों के तलवार, बरछी, भाले आदि की आपूर्ति इन्ही के बलिष्ठ भुजाओं पर टिकी थी। और उनकी विजय श्री के यह समान भागीदार भी थे। इस कार्य मे इनके छोटे- छोटे बच्चे, किशोर, किशोरियां और महिलाएं सभी की बराबर की भागीदारी होती थी।     इनकी ताकत और तकनीक से लोहा पानी -पानी होकर वह भाला, बरछी, तलवार, कटार जो आकार देना चाहते उसमें ही तब्दील हो जाता था। यह लोग कई पीढ़ियों बाद आज भी हर लौह की मुकम्मल जानकारी रखते हैं कि "कौन कच्चा, कौन पक्का और कौन गोबरा लौह है ?"

किन्तु जब अग्रेजों का राज्य आया और राजाओं के आपसी युद्ध खत्म हो गए, साथ ही भाला, बरछी, तलवारों का स्थान बंदूकों ने ले लिया तो समय की गति पहचान इनके कुछ कबीले वर्तमान मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में आ गए और खेती के उपकरण बनाने लगे। लेकिन कल्चर आज भी पूर्णतः राजस्थानी ही है ?

इनका अब स्थायी निवास सागर जिले का एक भूभाग है, जहां यह चार चौमासा बिताते हैं और बाद में अपनी बैल गाड़ी में जरूरी ग्रहस्ती का समान लेकर आठ माह की यात्रा में निकल पड़ते थे। क्योकि यह ऐसा समुदाय है जो बैल गाड़ी में ही पैदा होता, उसी में रहते पलता बढ़ता उसकी सगाई व विवाह होता और फिर उसी में शरीर भी त्याग देता। इनकी एक और विशेषता थी कि यह लौह उपकरण के साथ पशुओं का भी ब्यापार करते थे।


लोगों के पास कितने ही गरियार हल में न चलने वाले बैल होते तो उन्हें कम मूल्य में खरीद लेते और बाद में बैल गाड़ी में चला अच्छे दामों में बेच लेते। पर एक ओर तो ट्रेक्टर, हारबेस्टर आदि ने इनके हथियारों को सीमित कर दिया तो दूसरी ओर अब पशुओं का ब्यापार भी चौपट हो गया। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 15-20   साल पहले जो लोहगढ़िया कई  परिवार समूह में हमारे गाँव के मैदान में हप्तों का कैम्प लगाते और लौह उपकरण बनवाने वालों का इनके इर्दगिर्द ताता लगा रहता लेकिन अब बस से मात्र एक परिवार आया है, जिसके उपकरणों की दूकान तो लगी है पर सामान  की कोई पूछ परख नहीं  दिखती। आगे इस समुदाय की जिंदगी कैसे चलेगी? यह सोचनीय है।

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Saturday, March 18, 2023

कहीं आप भी तो नहीं खा रहे केमिकल युक्त जहरीली सब्जी व अनाज ?

  •  जहरीली सब्जियों से पोषण मिलने के बजाय बिगड़ रहा स्वास्थ्य 
  •  ताजी और हरी दिखने वाली सब्जियां हो सकती हैं खतरनाक  



ताजी और हरी सब्जियां सेहत के लिए लाभप्रद होती हैं लेकिन आजकल बाजार में जो सब्जियां आ रही हैं वे सेहतमंद हों यह जरूरी नहीं है। दरअसल अधिक पैदावार व लाभ कमाने की लालच में ज्यादातर लोग रसायन युक्त जहरीली खेती कर रहे हैं। जिससे सब्जियां व अनाज सब कुछ जहरीला हो रहा है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए न सिर्फ हानिकारक है बल्कि अनेकों खतरनाक बीमारियों का कारण भी बन रहा है। 

अगर आप बाजार से यह सोच कर हरी और ताजी सब्जियां खरीदते हैं कि यह आपके स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है तो आप गलत सोच रहे हैं। केमिकल युक्त हरी और चमकीली सब्जियां व भाजी आपके लिए जानलेवा हो सकती हैं। जहरीली सब्जियों का सेवन रोकने के लिए अनेकों किसान अब रसायन मुक्त प्राकृतिक खेती को अपनाने की ओर अग्रसर हुए हैं। इस दिशा में में कई स्वयं सेवी संस्थाएं जहाँ अच्छा काम कर रही हैं वहीं सरकार भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। 

मालूम हो कि जो जमीन हमारा भरण-पोषण करती है, उसमें अच्छी पैदावार के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों के रूप में लम्बे समय से जहर डाला  जा रहा है। इसलिए जो फसल हो रही है उसके दानों में जीवन कम जहर अधिक समा गया है। जो अन्न हम ग्रहण कर रहे हैं वह पोषण न देकर स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है। इसलिए जैविक या प्राकृतिक खेती पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा है। असल में अत्यधिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से आज खाद्य पदार्थ ही जहरीले हो गए हैं। इनके इस्तेमाल से कैंसर जैसी घातक बीमरियां फैल रही हैं। 

प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के हिमायती पद्मश्री बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि इस समय हम अपने खान पान के माबले में बड़े नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। कहां तो हमारा खान पान पहले 10-12 अनाजों का था, जिनसे शरीर को तरह- तरह के पोषक तत्व मिलते थे। कहां अब वही भोजन मात्र तीन अनाजों में ही सिमट कर रह गया है।

वैसे वह 10-12 प्रकार के अनाज हम जानबूझ कर नहीं बोते थे, बल्कि वह स्वतः ही हमारी खेती में शामिल हो जाते थे। क्योकि उस वर्षा आधारित खेती में हम वह अनाज बीज बोते थे जिसे हमारा खेत मांगता था। पर आज वह अनाज बोते हैं जो बाजार मांगता है। खेत द्वारा माँगे अनाज में हमें खाम खा ऊंचे खेतों  में सांवा कुटकी बोना पड़ता था और ऊंचे खेत में ज्वार। पर ज्वार के साथ मिलमा खेती में ही 4-5 अनाज हो जाते थे।

श्री दाहिया बताते हैं कि गेहूं चावल तो दुर्लभ अनाज थे, अस्तु गहरी भरायठ वाली जमीन में ही बोए जाते थे। पर बाकी जमीन में कोदो, मूग ,उड़द ,तिल, जौ ,मक्का, काकुन, अरहर, मसूर ,चना ,अलसी आदि भी बोए जाते थे। जब इतने प्रकार के अनाज बोए जाते तो वह उपयोग में भी लाए जाते। इनमें मोटे अनाज सांवा, काकुट, कुटकी, कोदो, ज्वार, मक्का ऐसे थे जिन्हें बगैर दो हिस्सा सब्जी दाल, दूध, मट्ठा या  दही के खाया ही नही जा सकता था। यही हाल जौ का था। अस्तु इन्हें खाने के लिए दाल, तरकारी को उगाना जरूरी होता था।  इससे हमारा भोजन स्वतः पोष्टिक हो जाता था।

यह सभी अनाज, सब्जी अपने घर के बीज, गोबर की खाद और खुद के श्रम से या फिर गांव के ही सब्जी उत्पादकों के होते थे, जिसमें किसी केमिकल की तो सम्भावना ही नहीं थी। अगर कीट लगकर कुछ भाग खा भी लेते तो हम उनका खाने का अधिकार मानते थे। देसी अनाजों का तना बड़ा होता तो नीदा नाशक की भी कभी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। क्योंकि एक बार की निराई में वह काफी बड़ा हो जाता था। यूँ  भी लोक मान्यता थी कि खुरपी के मुंह में अमृत होता है अस्तु एक निराई आवश्यक है। पर आज जिस प्रकार का घातक केमिकल अनाज, सब्जियों में डाला जाता है, तो देखकर आश्चर्य होता है कि हम अपने भोजन को अब किस प्रकार बना कर रख दिया ?

अनजाने में हम किस तरह की जहरीली सब्जियां खा रहे हैं, इस वीडियो क्लिप से समझें - 



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Monday, March 13, 2023

माधव नेशनल पार्क के लिए रवाना हुई पन्ना की बाघिन

  •  चंद्रनगर रेंज में बाघिन को किया गया ट्रैंक्युलाइज 
  •  रेस्क्यू वाहन से आज शाम 4 बजे बाघिन हुई रवाना 

पन्ना टाइगर रिज़र्व की युवा बाघिन जिसे आज माधव नेशनल पार्क भेजा गया। 

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व की लगभग दो-ढाई वर्ष की एक बाघिन को आज दोपहर में ट्रेंकुलाइज कर उसे रेस्क्यू वाहन से माधव नेशनल पार्क के लिए रवाना कर दिया गया है। पूर्व में जिस बाघिन को यहां भेजने हेतु चयनित किया गया था, उसको जख्म होने की वजह से विगत 10 मार्च को नहीं भेजा जा सका। ऐसी स्थिति में अब दूसरी युवा बाघिन को पूरे तीन दिन बाद भेजा गया है। 

क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिज़र्व ब्रजेन्द्र झा से मिली जानकारी के मुताबिक दो साल की बाघिन पी-141 (12) को आज दोपहर पन्ना टाइगर रिजर्व के चंद्रनगर रेंज के मोटा चौकन में ट्रेंकुलाइज किया गया। बाघिन का स्वास्थ परीक्षण करने के उपरांत पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ संजीव कुमार गुप्ता की निगरानी व देखरेख में बाघिन को रेस्क्यू वाहन से भेजा गया है। बाघिन को लेकर पन्ना टाइगर रिजर्व का रेस्क्यू वाहन शाम को लगभग 4 बजे चंद्रनगर रेंज से रवाना हुआ, जिसके रात्रि 12 बजे तक माधव नेशनल पार्क पहुंचने की संभावना है। रेस्क्यू वाहन के साथ वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता, परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना कोर राहुल पुरोहित के अलावा पन्ना टाइगर रिज़र्व का रेस्क्यू दल भी बाघिन के साथ माधव नेशनल पार्क शिवपुरी के लिए रवाना हुआ है। 

वह रेस्क्यू वाहन जिस पर सवार होकर बाघिन रवाना हुई। 

गौरतलब है कि पन्ना की बाघिन को निर्धारित तिथि के मुताबिक 10 मार्च को माधव नेशनल पार्क शिवपुरी भेजा जाना था, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ।  राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने विगत 10 मार्च को माधव नेशनल पार्क में एक नर व एक मादा बाघ को छोड़ा था। यहाँ पहले चरण में एक साथ तीन बाघ छोड़े जाने थे जिनमें पन्ना की बाघिन भी शामिल थी। लेकिन पन्ना से बाघिन जब नियत दिनांक को नहीं पहुंची तो राज्य के ही बांधवगढ़ और सतपुड़ा नेशनल पार्क से लाए गए एक मादा और एक नर बाघ को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा रिलीज किया गया। अब पूरे तीन दिन बाद पन्ना की युवा बाघिन भी माधव नेशनल पार्क के लिए रवाना हुई है जो वहां पहुंचकर अपने नए आशियाने में रानी बनकर न सिर्फ राज करेगी अपितु वहां बाघों के संसार को आबाद करने में भी अहम् भूमिका निभाएगी। 

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Friday, March 10, 2023

पकड़ में नहीं आ सकी पन्ना की बाघिन, आज पहुंचना था माधव नेशनल पार्क

  • बांधवगढ़, सतपुड़ा और पन्ना टाइगर रिजर्व से छोड़े जाने हैं तीन टाइगर
  • पूरे 27 साल बाद शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में गूंजेगी बाघों की दहाड़


।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिज़र्व की युवा बाघिन को शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में ले जाने का मुहूर्त अभी नहीं बन सका है। यहाँ से ले जाने के लिए जिस बाघिन का चयन किया गया है उसकी उम्र दो-सवा दो साल के लगभग है। इस बाघिन को ट्रैंक्युलाइज करने का हरसंभव प्रयास किया गया लेकिन चंचल स्वभाव की यह बाघिन हांथी को देखकर दूर निकल जाती है जिससे उसको ट्रैंक्युलाइज नहीं किया जा सका। नतीजतन नियत समय पर इस बाघिन की पन्ना से माधव नेशनल पार्क के लिए रवानगी नहीं हो सकी। आज प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा 3 बाघों को माधव नेशनल पार्क में रिलीज करना था। लेकिन अब बांधवगढ़ से पहुंची बाघिन व सतपुड़ा के नर बाघ को ही आज छोड़ा जा सकेगा। पन्ना टाइगर रिजर्व से जिस बाघिन को शिफ्ट किया जाना है उसे पकड़ने के प्रयास जारी हैं।

उल्लेखनीय है कि शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में पूरे 27 साल बाद एक बार फिर से टाइगर की दहाड़ सुनाई देगी। माधव नेशनल पार्क में 1990-91 तक  काफी संख्या में टाइगर हुआ करते थे, लेकिन अंतिम बार1996 में यहां टाइगर देखा गया था। अब माधव नेशनल पार्क एक बार फिर से बाघों से आबाद होने जा रहा है। टाइगर प्रोजेक्ट के तहत यहां कुल पांच बाघों को बसाए जाने की योजना है। पहले चरण में यहां तीन बाघों को शिफ्ट किया जाना है। इसमें पन्ना, बांधवगढ़ से एक-एक मादा टाइगर और सतपुड़ा से एक नर टाइगर को माधव नेशनल पार्क भेजा जा रहा है। पन्ना टाइगर रिज़र्व से जिस बाघिन का चयन माधव नेशनल पार्क के लिए किया गया है वह बाघिन टी-6  की बेटी है। हर बार चार शावकों को जन्म देने वाली इस बाघिन की बेटी माधव नेशनल पार्क में बाघों की वंश वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी ऐसी संभावना जताई जा रही है। यदि यह बाघिन किन्ही कारणों से पकड़ में नहीं आई तो इसी उम्र वाली दूसरी बाघिन को माधव नेशनल पार्क भेजा जा सकता है। 



पन्ना टाइगर रिज़र्व के क्षेत्र संचालक ब्रजेन्द्र झा ने बताया कि बाघिन को ढूंढने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए हाथियों की मदद ली जा रही है। फिर भी अगर बाघिन नहीं मिली तो यहां से कोई दूसरी बाघिन को भेजेंगे। चूँकि पन्ना टाइगर रिजर्व से बाघिन को नहीं पकड़ा जा सका है इसलिए सीएम शिवराज और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आज सिर्फ एक नर और एक मादा बाघ को ही पहली खेप में रिलीज कर सकेंगे। कुल मिलाकर अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि माधव नेशनल पार्क में 10 मार्च की दोपहर सीएम शिवराज दो मादा और एक नर बाघ को छोड़ेंगे या फिर एक नर और एक मादा को ही बाड़े में छोड़ेंगे। माधव नेशनल पार्क के सीसीएफ उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि पार्क के बीच बलारपुर के कक्ष क्रमांक 112 में बाघों के लिए 4 हजार हेक्टेयर का बड़ा एनक्लोजर (बाड़ा) बनाया गया है। इस एनक्लोजर को तीन हिस्सों में बांटा गया है। बाड़े की ऊंचाई करीब 16 फीट है। तीनों बाघों के लिए अलग-अलग बाड़े बनाए गए हैं। बाड़ों के अंदर बाघों के लिए 6-6   हजार लीटर पानी की क्षमता वाले सोसर बनाए गए हैं। करीब एक महीने तक इनमें पानी भरकर टेस्टिंग की गई है। इनमें पानी भरने के लिए बाहर से ही पाइप का कनेक्शन दिया गया है।

बाघों की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम

सीसीएफ शर्मा ने बताया कि बाघों की सुरक्षा के लिए माधव नेशनल पार्क में पुख्ता इंतजाम हैं। तीनों बाघों को सैटेलाइट कॉलर बीएचपी सुविधा के साथ लाया जा रहा है। नेशनल पार्क में वायरलेस सिस्टम लगाया गया है। वायरलेस के 6 फिक्स्ड स्टेशन, 11 माउंटेन वाहन और 90 हैंडसेट के जरिए निगरानी की जाएगी। बाघों के बनाए गए एनक्लोजर के इर्द-गिर्द लगभग 6 मचान भी बनाए गए हैं। जिनके जरिए बाघों की निगरानी की जाएगी। विशेष रूप से तीन वाहनों व 18 स्टाफ को टाइगर ट्रेनिंग और मॉनिटरिंग का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इमरजेंसी में एक रेस्क्यू वाहन, एक डॉग स्क्वायड, उड़नदस्ता भी तैनात किया गया है। इसके लिए कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। तीनों बाघों को 10 से 15 दिनों तक निगरानी में रखा जाएगा। इसके बाद स्थिति सामान्य रही, तो उन्हें पार्क में खुला छोड़ दिया जाएगा।  

मुगल सम्राटों और महाराजाओं का रहा है शिकारगाह

माधव नेशनल पार्क शिवपुरी शहर के पास स्थित है और ऊपरी विंध्यन पहाड़ियों का एक हिस्सा है। यह मुगल सम्राटों और महाराजाओं का प्रसिद्ध शिकारगाह था। इसे 1958 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला। पार्क के लिए दो प्रवेश बिंदु हैं; एक एन. एच-25 (पुराना झाँसी रोड) पर स्थित है, जो शिवपुरी शहर से लगभग 5 किमी दूर है, जबकि दूसरा एन. एच.-3  (आगरा-मुंबई रोड) पर शिवपुरी से ग्वालियर की ओर 7  किमी की दूरी पर है। पार्क झीलों, जंगलों और घास के मैदानों से युक्त एक विविध पारिस्थितिकी तंत्र के साथ उपहार में है। जंगल में नीलगाय, चिंकारा और चौसिंगा और हिरण जैसे चीतल, सांभर और बार्किंग हिरण जैसे मृग रहते हैं। तेंदुए, भेड़िया, सियार, लोमड़ी, जंगली कुत्ता, जंगली सुअर, साही, अजगर आदि जानवर भी पार्क में देखे जाते हैं।

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