Friday, February 16, 2018

बाघिन को देख नर व मादा तेंदुआ पेड़ में चढ़े

  •   इस दुर्लभ और अद्भुत नजारे को देख रोमांचित हो उठे पर्यटक
  •   कुछ ही दूरी के फासले पर मौजूद थी बाघिन पी-141


वृक्ष की डाल पर बैठा तेंदुआ का जोड़ा। फोटो - पुनीत शर्मा 
अरुण सिंह,पन्ना। बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व में जंगल का राजकुमार कहे जाने वाले तेंदुओं की संख्या में भी इजाफा हुआ है। टाईगर रिजर्व के भ्रमण में आने वाले देशी व विदेशी पर्यटकों को अब आये दिन जहां वनराज के दर्शन होते हैं, वहीं तेंदुआ भी अक्सर देखने को मिल जाते हैं। लेकिन पर्यटकों ने गुरूवार को आज जो नजारा देखा है वह उनके लिये अविस्मरणीय रहेगा। गुंजा के ऊँचे पेड़ की डाल में नर व मादा तेंदुआ एक साथ जहां बैठे हुये थे, वहीं निकट ही पन्ना टाईगर रिजर्व की बाघिन पी-141 राजशी अंदाज में टहलते हुये आस-पास के माहौल का जायजा ले रही थी।
उल्लेखनीय है कि आज सुबह लगभग 6:30 बजे आधा दर्जन जिप्सियों में सवार होकर पर्यटकों का दल जब टाईगर रिजर्व के भ्रमण हेतु मड़ला प्रवेश द्वार से आगे बढ़ा तो किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी, कि उन्हें ऐसा दुर्लभ और रोमांचकारी दृश्य देखने को मिलेगा। पर्यटकों के साथ भ्रमण में गये गाइड पुनीत शर्मा ने बताया कि मड़ला प्रवेश द्वार से लगभग 8 किमी दूर मगर डबरी के पास टू इन नाका में स्थित गुंजा के विशालकाय वृक्ष की डाल में नर-मादा तेंदुओं का जोड़ा बैठा हुआ था। जबकि निकट ही रोड के दूसरी तरफ बाघिन पी-141 चहल कदमी करते हुये नजर आ रही थी। यह दुर्लभ नजारा जब पर्यटकों ने देखा तो अवाक रह गये।

बाघिन के डर से पेड़ में चढ़े


पन्ना टाईगर रिजर्व के टूरिस्ट गाइड पुनीत शर्मा ने बताया कि मेटिंग सीजन के चलते नर व मादा तेंदुआ जंगल में एक साथ थे, लेकिन अचानक वहां पर बाघिन-141 का आगमन हो गया। ऐसी स्थिति में बाघिन से भयभीत होकर तेंदुओं का यह जोड़ा देखते ही देखते गुंजा के पेड़ में चढ़ गया। सुरक्षित ऊँचाई में पहुँचने पर दोनों एक मोटी डाल में बैठकर आराम फरमाने लगे। आधा दर्जन वाहन व पर्यटकों के पहुँचने पर तकरीबन 15 मिनट बाद तेंदुआ का यह जोड़ा पेड़ से उतरकर हिनौता रेन्ज के पहाड़ पर चढ़ गया। जबकि बाघिन वहीं निकट ही जंगल में आधा घण्टे तक चहल कदमी करती रही।

टाईगर रिजर्व का बढ़ा है आकर्षण


पार्क भ्रमण में आने वाले पर्यटकों को टाईगर दिखने से अब पन्ना टाईगर रिजर्व का आकर्षण दिनों दिन बढ़ रहा है। विगत वर्षों की तुलना में पर्यटकों की संख्या के साथ-साथ राजस्व में भी इजाफा हुआ है। मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में 30 से भी अधिक बाघ हैं, जबकि तेंदुओं की संख्या 70 से 75 बताई जा रही है। इनके अलावा यहां के जंगल में भालू, सांभर, चीतल, चिंकारा व चौसिंगा प्रचुरता से देखने को मिलते हैं। पार्क के मध्य से प्रवाहित होने वाली केन नदी की बलुई चट्टानों में धूप सेंकते मगर को देखकर पर्यटक रोमांच से भर जाते हैं। पन्ना टाईगर रिजर्व के जंगल में पक्षियों की भी 2 सौ से भी अधिक प्रजातियां मौजूद हैं, यहीं वजह है कि पक्षी दर्शन के शौकीन पर्यटक भी बड़ी संख्या में आ रहे हैं।
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Monday, February 5, 2018

केन नदी में रेत के अवैध उत्खनन पर नहीं लग रहा अंकुश



  •   खनिज एवं पर्यावरण संबंधी नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां
  •   स्वीकृत क्षेत्र के बाहर मशीनों से हो रहा रेत का अवैध उत्खनन



अरुण सिंह,पन्ना। रेत के अवैध उत्खनन को लेकर पन्ना जिले का अजयगढ़ क्षेत्र इस समय सुर्खियों में है। केन नदी में हर तरफ भारी वाहन दैत्याकार मशीनों से बड़े पैमाने पर रेत का उत्खनन किया जा रहा है, जिससे खनिज एवं पर्यावरण संबंधी नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं। कलेक्टर पन्ना मनोज खत्री के आदेश पर बीते माह अवैध उत्खनन के खिलाफ चलाये गये अभियान के बावजूद रेत माफियाओं के हौसले बढ़े हुये हैं। केन नदी में स्वीकृत रेत खदानों के अलावा उन क्षेत्रों में भी व्यापक  पैमाने पर अवैध उत्खनन चल रहा है जहां कोई खदान मंजूर नहीं है। रेत की इस लूट में लिप्त माफियाओं द्वारा पुलिस की अपहरणकाण्ड में व्यस्तता का भी भरपूर फायदा उठाया गया है। विगत एक सप्ताह से अजयगढ़ क्षेत्र में रेत का अवैध कारोबार कई गुना अधिक हो गया है।
उल्लेखनीय है कि स्वीकृत खदानों के ठेकेदार जहां निर्धारित क्षेत्र के बाहर बेखौफ होकर खुलेआम रेत का अवैध उत्खनन करा रहे हैं, वहीं केन नदी में एक दर्जन से भी अधिक स्थलों पर माफियाओं द्वारा पूर्णरूपेण अवैध रेत खदानें चलाई जा रही हैं। भारी भरकम मशीनों से हो रहे व्यापक उत्खनन के चलते पर्यावरण को जहां भारी नुकसान हो रहा है वहीं केन नदी का वजूद भी संकट में पड़ गया है। नियम व कानून को तांक में रखकर अनियन्त्रित उत्खनन से जलीय जीव-जन्तु व वनस्पतियां खत्म हो रही हैं, जिसका दूरगामी प्रभाव पर्यावरण पर पडऩे की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। मालुम हो कि विगत एक सप्ताह से जिले की पुलिस डायल 100 अपहरणकाण्ड में व्यस्त रही है। पुलिस अधिकारियों की इस व्यस्तता का रेत माफियाओं ने भरपूर फायदा उठाया है, दिन ढलने के साथ ही दैत्याकार मशीनें रेत निकालने में जुट जाती हैं। केन नदी की रेत खदानों में पूरी रात ट्रकों व डम्फरों की लाइन लगने से यहां पूरी रात गहमा-गहमी मची रहती है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार केन नदी के जिगनी घाट में फिर से अवैध उत्खनन शुरू हो गया है। यहां शाम होते ही जेसीबी व पोकलैन मशीनों को उतार दिया जाता है जो पूरी रात केन नदी का सीना छलनी करते हुये रेत निकालती हैं। यहां से निकलने वाली रेत को परिवहन कराने में पड़ोसी खदानों के ठेकेदार अहम भूमिका निभाते हैं। जिन स्वीकृत खदानों में पर्याप्त रेत नहीं है, वहां के ठेकेदार पिटपास की बिक्री के धन्धे में लिप्त हैं। जिसके चलते अस्वीकृत खदानों की रेत का परिवहन भी वैध तरीके से हो रहा है। डिजियाना कम्पनी द्वारा बीरा में संचालित रेत खदान में भी यह गोरखधन्धा चल रहा है। केन नदी की भीना चांदीपाठी रेत खदान का संचालन भी स्वीकृत क्षेत्र से बाहर बड़े क्षेत्र में हो रहा है। मझगांय खदान में रेत नहीं है जिसके पिटपासों की बिक्री होती है, फलस्वरूप मझगांय व मोहाना क्षेत्र से बड़े पैमाने पर रेत की निकासी हो रही है।

प्रतिबन्ध के बावजूद मशीनों से उत्खनन


नदी के प्रवाह क्षेत्र में भारी भरकम मशीनों का उपयोग कर रेत के उत्खनन पर कानूनी तौर पर प्रतिबन्ध के बावजूद केन नदी की रेत खदानों में दैत्याकार मशीनों का खुलेआम उपयोग किया जा रहा है। इतना ही नहीं केन नदी में पानी के भीतर से भी रेत निकाली जा रही है। यदा कदा पुलिस व राजस्व अमले द्वारा कार्यवाही किये जाने के बावजूद रेत के उत्खनन में मशीनों का उपयोग बन्द होने के बजाय मशीनों की तादाद और बढ़ गई है। इससे पता चलता है कि रेत की लूट में लिप्त माफिया कितने बेखौफ और ताकतवर हैं जिन्हें नियम और कानून का भी कोई भय नहीं है।

अवैध उत्खनन पर 1.67 करोड़ का जुर्माना

रेत के अवैध उत्खनन को रोकने के लिये प्रशासन द्वारा पूर्व में दर्जनों जेसीबी मशीनों को जब्त कर अस्थाई पुलों व मार्गों को ध्वस्त किया गया था। अवैध उत्खनन करने वाले माफियाओं पर 1 करोड़ 67 लाख रू. का जुर्माना भी लगाया गया। यह कार्यवाही मोहाना, जिगनी, चंदौरा, बरौली व रामनई खदान क्षेत्रों पर की गई, इसके बावजूद रेत का अवैध उत्खनन थमने का नाम नहीं ले रहा। केन नदी की सहायक रून्ज व बागैं नदी में भी बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन होने की जानकारी मिली है। धरमपुर थानान्तर्गत इन नदियों के आस-पास स्थित ग्रामों में बिना किसी मंजूरी के बालू के डम्प नजर आते हैं, जिससे पता चलता है कि जिले में रेत का कारोबार कितने बृहद रूप में चल रहा है।
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Friday, January 12, 2018

आबादी क्षेत्र में जाने वाली बाघिन हुई रेडियो कॉलर

  •   बाघिन को ट्रन्कुलाइज कर पार्क के कोर क्षेत्र में छोड़ा गया
  •   आबादी क्षेत्र में विचरण से उत्पन्न हो रही थी द्वन्द की स्थिति



अरुण सिंह,पन्ना। आबादी क्षेत्र में निरन्तर विचरण करने वाली म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व की बाघिन पी-213(33) को ट्रन्कुलाइज करके रेडियो कॉलर पहना दिया गया है। इस बाघिन को पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में रिक्त व सुरक्षित स्थान में विचरण के लिये छोड़ा गया है ताकि यह अपने इलाके का निर्धारण कर सके। लगभग ढाई वर्ष की यह युवा बाघिन पन्ना में ही जन्मी बाघिन पी-213 के तीसरे लिटर की तीसरी संतान है।

क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने जानकारी देते हुये आज बताया कि विगत कुछ माहों से बाघिन पी-213(33) अमानगंज बफर परिक्षेत्र से लगे ग्राम विक्रमपुर के आबादी क्षेत्र में विचरण कर रही थी। इस बाघिन द्वारा मवेशियों का शिकार किये जाने की भी लगातार सूचनायें प्राप्त हो रही थीं। इस बाघिन व ग्रामीणों के बीच द्वन्द की स्थिति निर्मित होने की जहां संभावनायें निर्मित हो रही थीं, वहीं बाघिन की सुरक्षा को लेकर भी खतरा उत्पन्न हो गया था। आबादी क्षेत्र में बाघिन की मौजूदगी के चलते ग्रामवासी भी दहशत में थे। इस बात को दृष्टिगत रखते हुये ढाई वर्ष की इस बाघिन को रेडियो कॉलर पहनाकर कोर क्षेत्र में छोडऩे का निर्णय लिया गया। क्षेत्र संचालक श्री जैन ने बताया कि बाघिन का लोकेशन पन्ना बफर परिक्षेत्र के बीट बांधी दक्षिण कक्ष क्र. पी-408 में राजा तालाब के पास ट्रन्कुलाइज कर रेडियो कॉलर पहनाया गया है। रेडियो कॉलरिंग की समस्त कार्यवाही को क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन के नेतृत्व में डॉ. संजीव कुमार गुप्ता वन्य प्राणी चिकित्सक के तकनीकी मार्गदर्शन में सम्पन्न किया गया।

रेस्क्यू वाहन से लाकर कोर क्षेत्र में किया रिलीज

बफर क्षेत्र से लगे आबादी वाले इलाकों में विचरण की आदी हो चुकी इस बाघिन को बेहोश करने के बाद रेस्क्यू वाहन द्वारा ले जाकर पन्ना टाईगर रिजर्व के हिनौता वन परिक्षेत्र अन्तर्गत सुरक्षित स्थान पर रिलीज कर दिया गया है। रेडियो कॉलर हो जाने से अब इस बाघिन की चौबीसों घण्टे निगरानी हो सकेगी, फलस्वरूप इसके आबादी क्षेत्र में जाने की संभावनाओं पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। बाघिन को बफर क्षेत्र से रेस्क्यू वाहन द्वारा कोर क्षेत्र में ले जाने की कार्यवाही में सहायक संचालक व परिक्षेत्र अधिकारी हिनौता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मौजूदा समय बाघिन हिनौता परिक्षेत्र में स्वस्थ है तथा स्वच्छंद रूप से विचरण कर रही है।

अमानगंज रोड में अक्सर दिखती थी बाघिन

बाघिन पी-213(33) पन्ना-अमानगंज रोड में अक्सर विचरण करते हुये दिखाई देती थी। बाघिन के सड़क मार्ग पर निकलने से कभी-कभी मार्ग के दोनों ओर वाहनों की कतारें लग जाती थीं। यह स्थिति पार्क प्रबन्धन के लिये चिन्ता का विषय बन चुकी थी, क्योंकि बाघिन के रोड में निकलने से यहां से गुजरने वाले यात्रियों को भी खतरा बना रहता था। कोर क्षेत्र के बाहर आबादी वाले इलाके में बाघिन को सहजता से मवेशियों का शिकार करने को मिल जाता था, यही वजह थी कि यह बाघिन निरन्तर आबादी वाले क्षेत्र के आस-पास ही बनी रहती थी जिससे बाघिन व ग्रामीणों के बीच द्वन्द की संभावनायें निर्मित हो रही थीं। ऐसी स्थिति में बाघिन को पार्क के कोर क्षेत्र में ले जाना जरूरी हो गया था।

पार्क के कोर क्षेत्र में 30 से अधिक बाघ

पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में मौजूदा समय नर-मादा व शावकों को मिलाकर 30 से अधिक बाघ स्वच्छन्द रूप से विचरण कर रहे हैं। क्षेत्र संचालक श्री जैन ने बताया कि कोर क्षेत्र में रेडियो कॉलर वाले बाघों की संख्या 11 है, इनमें नर व मादा बाघ दोनों हैं, जिनकी चौबीसों घण्टे मॉनीटरिंग होती है। पन्ना टाईगर रिजर्व के कई नर बाघ पार्क के बफर क्षेत्र में भी विचरण कर रहे हैं। इन बाघों की संख्या के बारे में पूछे जाने पर आपने बताया कि बफर क्षेत्र के बाघों की प्रमाणिक संख्या बता पाना संभव नहीं है। क्योंकि कई बाघों की मौजूदगी टेरीटोरियल में भी पाई गई है। आपने बताया कि जनवरी माह में ही बाघों की गणना का कार्य शुरू होगा जो 25 दिन तक चलेगा। इसके लिये पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में 562 कैमरा ट्रेप लगाये जा रहे हैं। कोर क्षेत्र के बाद बफर तथा टेरीटोरियल के बाघ संभावित इलाकों में भी कैमरा ट्रेप लगाकर बाघों की गणना की जायेगी।
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Monday, January 8, 2018

लीकेज से बर्वाद हो रहा सिंचाई तालाब का पानी

  •   रबी फसलों की सिंचाई  के लिये चिंतित  हो रहे किसान
  •   रगौली तालाब का लीकेज न सुधरने से नाले में बह जाता है पानी


 रगौली सिंचाई जलाशय तथा इसके डूब क्षेत्र में हो रही खेती का दृश्य। फोटो - अरुण सिंह 

 अरुण सिंह,पन्ना। जिले के शाहनगर जनपद क्षेत्र के रगौली गाँव के निकट स्थित रगौली सिंचाई जलाशय की उपयोगिता खत्म हो रही है। इस शानदार तालाब का स्थल चयन व जल भराव बेहतरीन होने के बावजूद क्षेत्र के किसानों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। तालाब में विगत कई वर्षों से लीकेज की समस्या बनी हुई है, फलस्वरूप बारिश में लबालब भरने के बावजूद भी रबी सीजन तक यह विशाल तालाब 75 फीसदी से भी ज्यादा खाली हो जाता है। तालाब की पार में नीचे से चार जगह लीकेज है, जहां से चौबीसों घण्टे पानी तेज गति से बहकर बर्वाद होता है, नतीजतन जब फसलों को पानी देने का समय आता है तब तक यह सिंचाई तालाब खाली हो चुका होता है। इस विकट समस्या से क्षेत्र के किसान विगत कई वर्षों से जूझते आ रहे हैं, लेकिन अभी तक लीकेज नहीं सुधारा जा सका है।

 सिंचाई तालाब की पार के नीचे से हो रहे लीकेज के कारण बह रहा पानी।  

मानसून पर खेती की निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से प्रदेश में हर खेत में पानी पहुंचाने के लिये प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना चलाई जा रही है। इस योजना के तहत् हर खेत को पानी उपलब्ध कराते हुये प्रत्येक बूंद पर अधिक से अधिक फसल उत्पादन सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके लिये केन्द्र और प्रदेश सरकार ने पर ड्रॉप-मोर क्रॉप का नारा भी दिया है। धरातल पर सरकार की मंशा के विपरीत फसलों की सिंचाई के लिये सुरक्षित पानी की बर्वादी लगातार जारी है। पन्ना जिले के बात करें तो यहां के शाहनगर विकासखण्ड अन्तर्गत आने वाले रगौली सिंचाई तालाब का आधा पानी पिछले कई सालों से लीकेज से बेकार बह जाता है। इस तालाब में एक-दो नहीं बल्कि चार-चार लीकेज हैं । जिनसे अलग-अलग बहते पानी की धार किसी नाले से कम नहीं है। इस साल अल्प वर्षा के चलते सूखाग्रस्त धाोषित पन्ना जिले में पानी की बर्वादी को लेकर जिम्मेदारों को उदासीनता किसी अपराध से कम नहीं है। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि एक तरफ  सूखा के चलते रगौली गांव की दलित और आदिवासी बस्ती के लोग कड़ाके की सर्दी में पेयजल संकट से जूझ रहे हैं  वहीं गाँव से लगभग आधा किमी की दूरी पर स्थित रगौली के सिंचाई जलाशय के लीकेज से इसका पानी बेकार बह रहा है। हर दिन हजारों लीटर पानी की बर्वादी देख रहे सूखा प्रभावित किसान खासे चिंतित और नाराज हैं। इस तालाब में चार-चार लीकेज से पानी के फिजूल बहने के कारण क्षेत्र के आधे से अधिक खेतों में पानी नहीं पहुँच  पा रहा है। मौके की स्थिति यह है कि चालू रबी सीजन में तालाब से जितनी कृषि भूमि में सिंचाई होनी चाहिये वह नहीं हो पा रही है। बड़े क्षेत्र में तालाब की नहर सूखी पड़ी है।

उपयंत्री व सहायक यंत्री कर रहे अनदेखी


जल संसाधन संभाग पवई की जल उपभोक्ता संस्था सलैया फेरन सिंह के अन्तर्गत आने वाले रगौली तालाब के लीकेज को लेकर संस्था के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह भी पिछले दो साल से काफी परेशान हैं। तालाब के सुधार कार्य हेतु उनके द्वारा प्रभारी उपयंत्री तथा सहायक यंत्री को कई बार अवगत कराया गया लेकिन किसी ने भी पानी की बर्वादी को रोकने की तरफ ध्यान नहीं दिया। तकनीकी अधिकारियों के इस रवैये से निराश जल उपभोक्ता संस्था अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह का कहना है कि पानी की बर्वादी को रोकने और किसानों के हित में जितनी बातें होती है उस पर ईमानदारी से काम नहीं होता है। रगौली तालाब की उपेक्षा इस बात का प्रमाण है। वे हैरानी जताते हुये बताते हैं कि रगौली तालाब में होने वाले कुल भराव का आधा पानी हर साल बेकार बह जाता है लेकिन इससे जिम्मेदारों की सेहत पर कोई फर्क पडऩा तो दूर उन्हें इसकी परवाह तक नहीं है। दरअसल जबाबदेही का आभाव होने से यह अराजकतापूर्ण स्थिति बनी है, जिसका खामियाजा क्षेत्र के उन निर्दोष किसानों को उठना पड़ रहा है जिनके खेतों से नहर तो निकली है लेकिन वह सूखी पड़ी है।

नहर को मरम्मत की दरकार


रगौली तालाब के लीकेज भरने के साथ-साथ इसकी क्षतिग्रस्त हो चुकी नहर का सुधार होना भी बेहद जरूरी है, ताकि इस तालाब से निर्धारित रूपांकित क्षमता तक अथवा अधिकतम सिंचाई संभव हो सके। रगौली तालाब से निकली मुख्य नहर कचरा, खरपतवार और मिट्टी से भर चुकी है। जगह-जगह से इसमें भी कटाव होने से कई खेतों में नहर का पानी भर जाता है। नहर की बदहाली के चलते होने वाले जल भराव से कई किसान खेती नहीं कर पा रहे हैं। जल उपभोक्ता संस्था के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह ने बताया कि नहर का निर्माण करीब डेढ़ दशक पूर्व हुआ था जोकि अब काफी  जर्जर स्थिति में पहुंच चुकी है। उन्होंने ने बताया कि संस्था के अन्तर्गत 5 सिंचाई तालाब आते हैं, उन्हें इतना बजट भी नहीं मिलता कि उससे नहर का सुधार कार्य संभव हो सके। श्री सिंह का मानना है कि रगौली तालाब की ध्वस्त होती नहर का सुधार कार्य के साथ लाईनिंग कराने की आवश्यकता है। इसका लाभ यह होगा कि तालाब से नहर में छोड़ा जाने वाला पूरा पानी दूर-दूर तक खेतों में सुगमता से पहुंच सकेगा।

तालाब के डूब क्षेत्र में हो रही खेती


रगौली सिंचाई तालाब का बड़ा भाग लीकेज के चलते अक्टूबर-नवम्बर माह में ही खाली हो जाता है। परिणामस्वरूप तालाब के डूब क्षेत्र जहां इस समय पानी भरा होना चाहिये, वहां विगत 3-4 सालों से खेती की जाने लगी है। जिन किसानों की भूमि डूब में आई थी, वे पानी खाली होने पर गेंहू की फसल बो देते हैं और पम्प से सिंचाई करके अच्छी पैदावार भी लेते हैं। लेकिन दूसरे किसानों को सिंचाई के लिये पानी नहीं मिल पाता जिससे उनकी खेती प्रभावित होती है। किसानों का कहना है कि यह बहुत अच्छा तालाब है, कम बारिश में भी यह भर जाता है क्योंकि पूरे पहाड़ों का पानी गुरगुटा नाला के जरिये इसी तालाब में आता है। यदि लीकेज सुधर जाये और बहकर पानी बर्वाद न हो तो इस पूरे क्षेत्र की खेती सिंचाई हो सकती है।

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Tuesday, January 2, 2018

ग्रामीणों की सोच बदली तो जल संकट से मिली निजात

  •   पन्ना जिले के आदिवासी बहुल पल्थरा गाँव की बदली तस्वीर
  •   जल का संरक्षण करने से गरीब आदिवासी हुये खुशहाल




।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। पर्यावरण और जल संरक्षण के प्रति सोच में सकारात्मक बदलाव आने पर किसी गाँव की तस्वीर कैसे बदल सकती है, इसका जीता जागता उदाहरण पन्ना जिले का छोटा सा गाँव पल्थरा है। इस गाँव के गरीब आदिवासियों ने पानी के महत्व को समझा और बारिश के पानी को बहकर बर्वाद होने से बचाने के लिये सामूहिक प्रयास किया, परिणामस्वरूप उनकी जिन्दगी खुशहाल हो गई। जल स्तर में सुधार होने से गाँव के कुँओं में भी बारहों महीने पानी बना रहता है, जिससे ग्रामीणों को जल संकट की समस्या से भी निजात मिल गई है।

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है आदिवासी बाहुल्य छोटा सा गांव पल्थरा जहां लगभग 22 परिवार निवास करते हैं। गांव के लोगों की जीविका का मुख्य साधन खेती एवं मजदूरी है। खेती मुख्य व्यवसाय होने के बाद भी गांव में खेतों की सिंचाई के साधन न के बराबर थे। बड़ी बात ये है कि गांव के खेतों में मेढ़बंधान भी न के बराबर है जिससे गांव का पूरा पानी बहकर नाले के द्वारा गांव से कई मील दूर बह जाता था। 

मनरेगा योजना के अंतर्गत कुछ कपिलधारा कूप बने हैं  लेकिन ये कूप काफी कम गहरे होने के कारण सिंचाई करने में सक्षम नहींं थे, बरसात में भरे पानी के कारण बहुत कम पानी फ सलों को मिल पाता था। गांव के किनारे से एक नाला निकला है जिसमें कुछ पानी रहता है जिसकारण से नाले के किनारे के परिवार अपने खेतों की कुछ सिचाई कर पाते थे। इसी नाले में कुछ वर्ष पूर्व स्टापडेम बना था लेकिन उसके टूट जाने के कारण उसके अस्तित्व को पूरी तरह से खत्म कर चुका था, जिससे उसका लाभ भी लोगों को नहीं मिल पा रहा था। गांव में एक छोटा तालाब भी है लेकिन वह बनने के कुछ वर्ष बाद ही फू ट चुका था जिससे पानी नहीं रूकता था।




वित्तीय वर्ष 2016-17 में समर्थन-सेंटर फार डेवलपमेंट सपोर्ट, भोपाल का सकारात्मक हस्तक्षेप इस गांव के साथ आस-पास के ऐसे ही जरूरतमंद गांवों में प्रारंभ हुआ। संस्था के द्वारा लोगों को गांव की सामूहिकता और सामूहिक ताकत को अहसास कराने के साथ प्राकृतिक संसाधनों की महत्वा और उसे संरक्षित करने की चर्चा प्रारंभ की। जनसमुदाय के साथ लगातार बैठकर प्राकृतिक संसाधनों के महत्व एवं उसका जीवन पर प्रभाव आदि को चर्चा का विषय बनाया। गांव के छोटे-छोटे उदाहरणों से पानी रोकने एवं पौधों को बचाने के साथ खेतों के सुधार आदि पर लगातार चर्चायें हुई। 

गांव के लोगों को कुछ-कुछ समझ में आने लगा कि कहीं न कहीं हमारी ही कमजोरी है जिससे हमारे गांव का पानी हमारे गांव के बाहर चला जाता है और बाद में हम सब उसी पानी के लिये तड़पते हंै। लोगों को वनों के महत्व की भी समझ बढ़ी और लोग ये महसूस करने लगे कि दिन प्रतिदिन कम होते वन हम सबके पतन और विनाश का कारण बनेंगे जो कि सामने दिख भी रहा है। लोगों में अपने गांव के विकास की आशा जगी और विष्वास बढ़ा कि अगर हम लोग चाहें तो कई ऐसे विकास के कार्य कर सकते है जो हमारे गांव की बदहाली को खत्म कर खुशहाली की ओर ले जा सकते  हैं। 

लोगों ने सर्वसहमति से अपने गांव की समस्याओं को चिन्हित किया और समस्याओं को दूर करने के लिये गतिविधियों का चयन कर अपने गांव के विकास की योजना तैयार की। लोगों ने यह भी माना कि योजना निर्माण सतत् कार्य है अगर कोई कमी दिखेगी तो लगातार इसमें कार्यों को जोड़ा जायेगा। योजना निर्माण कर उसे गांव के द्वारा सर्वसहमति से स्वीकृति दी गई।

गांव की योजना में चिन्हित किये गये कार्यों मे गांव के इकलौते एवं फू टे हुये तालाब एवं टूटे हुये स्टापडेम की मरम्मत करने का कार्य प्राथमिकता में लिया गया। गांव के लोग यह भी कहते थे कि हम इस तालाब एवं स्टापडेम की मरम्मत कर इसे पुन: उपयोगी बनायेंगे ताकि पानी को रोका जा सके। गांव के लोगों का उत्साह देखकर समर्थन-सेंटर फ ार डेवलपमेंट सपोर्ट के द्वारा थोड़ी राशि गांव के लोगों को उपलब्ध कराई गई। इस थोड़ी सी राशि के सहारे गांव के लोगों ने श्रमदान देकर अपने फूटे हुये तालाब एवं वर्षों से टूटे पड़े स्टापडेम की पूरी मरम्मत कर डाली और वर्षों के बाद बारिश से तालाब एवं स्टापडेम दोबारा पानी से लबालब हुये।

लबालब भरने के बाद कई दिनों तक बारिश नहीं होने से तालाब का पानी कम गया जिसे जमीन ने सोख लिया। एकदिन गांव के लोगों के साथ पुन: संस्था के साथी तालाब देखने गये जिसमें जल स्तर कम हुआ देख लोगों ने कहा कि हमारे गांव की जमीन के अंदर का पानी बढ़ गया है। सवाल किया गया कि कैसे कह सकते है तो लोगों ने कहा कि यह तालाब कुछ दिन पूर्व तक लबालव भरा हुआ था लेकिन आज काफी खाली हो चुका है। यह खाली नहींं हुआ बल्कि तालाब का पानी अंदर ही अंदर हमारे गांव की जमीन के अंदर सुरक्षित हो गया है। 

गांव के लोग इतनें में ही नहीं रूके बल्कि बोले कि तालाब का यह कम हुआ पानी हमारे गांव के कूपों एवं जल के अन्य स्त्रोतों को भर रहा है अगर ये तालाब नहीं होता तो यह पानी कैसे जमीन और हमारे कूपों में जाता, यह तो बहकर पूरा गांव के बाहर निकल जाता। गांव के लोगों की ये भाषा, ये चर्चा यह साबित करती है कि अब उन्हें पानी के संरक्षण के महत्व की समझ विकसित हो रही है जो कि गांव को खुशहाली की ओर ले जाने में सहायक सिद्ध होगी।
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Thursday, December 21, 2017

पन्ना टाईगर रिजर्व में युवा बाघिन की मौत

  •  तार के मोटे फन्दे में फंसा मिला बाघिन का शव
  •   वन परिक्षेत्र गहरीघाट के बीट कोनी की घटना


 पन्ना टाईगर रिजर्व की मृत बाघिन पी-521   ( फाइल फोटो )

अरुण सिंह,पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व से पौने तीन वर्ष की युवा बाघिन पी-521 के मौत की खबर मिली है। इस बाघिन का शव वन परिक्षेत्र गहरीघाट के बीट कोनी में तार के मोटे फन्दे से फंसा मिला है। जाहिर है कि बाघिन की मौत प्राकृतिक नहीं अपितु उसका शिकार हुआ है जो पन्ना टाईगर रिजर्व के लिये शुभ संकेत नहीं है। रिजर्व वन परिक्षेत्र में शिकार की इस सनसनीखेज वारदात के होने से यहां के बाघों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ खड़े हुये हैं। मृत बाघिन का पोस्टमार्टम कराने के बाद आज उसके शव को जला दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में बाघविहीन होने के बाद यहां पर बाघ पुनस्र्थापना योजना शुरू की गई थी। इस योजना को मिली उल्लेखनीय सफलता के चलते पन्ना टाईगर रिजर्व को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जहां ख्याति मिली वहीं अनेकों पुरूस्कार भी प्राप्त हुये। कई देशों ने पन्ना में हुये अभिनव प्रयोग से प्रभावित होकर अपने यहां भी बाघों की वंशवृद्धि के लिये पन्ना मॉडल को अपनाने हेतु आगे आये हैं। लेकिन बाघिन पी-521 की जिस तरह से असमय मौत हुई है, उससे पन्ना टाईगर रिजर्व में बाघों की सुरक्षा, मॉनीटरिंग व प्रबन्धन पर प्रश्र चिह्न खड़ा हो गया है। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में शिकारियों की इंट्री हो चुकी है। ऐसी स्थिति में पन्ना टाईगर रिजर्व के 542 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले कोर क्षेत्र में विचरण कर रहे बाघ अब शातिर शिकारियों के निशाने पर हैं, जो निश्चित ही वन्यजीव प्रेमियों के लिये चिन्ता की बात है।

बाघिन को लगा था रेडियो कॉलर

शिकारियों द्वारा लगाये गये तार के फन्दे में फंसकर असमय काल कवलित हुई बाघिन पी-521 रेडियो कॉलर पहने हुये थी, जिसकी चौबीसों घण्टे वन अमले द्वारा मॉनीटरिंग की जा रही थी। ऐसी स्थिति में बाघिन कैसे शिकारियों के फन्दे में फंस गई, यह एक बड़ा सवाल है। सूत्रों के मुताबिक बाघिन की मौत 18 दिसम्बर को हुई और टाईगर रिजर्व के अधिकारियों व मैदानी अमले को इसकी जानकारी 19 दिसम्बर को यानी दूसरे दिन मिल पाई। इससे पता चलता है कि बाघों की सुरक्षा व मॉनीटरिंग में लगा अमला कितना सजग और चौकन्ना है।

अर्धजंगली बाघिन टी-5 की थी संतान

पन्ना टाईगर रिजर्व में बाघ पुनस्र्थापना योजना के तहत दो अर्ध जंगली पालतू बाघिनों को जंगली बनाने का अभिनव प्रयोग हुआ था, जो दुनिया में इसके पहले कहीं नहीं हुआ। यह प्रयोग न सिर्फ कामयाब रहा अपितु दोनों पालतू बाघिनों ने पूर्णरूपेण जंगली होकर वंश वृद्धि में भी अपना योगदान दिया। शिकार हुई बाघिन पी-521 पालतू से जंगली बनी बाघिन टी-5 की संतान थी। बाघिन टी-5 की मौत बीते वर्ष 10 जून 2016 को आपसी लड़ाई में हो गई थी। लेकिन बाघिन पी-521 का शिकार हो जाने के बाद अब बाघिन टी-5 का वंश ही खत्म हो गया, क्योंकि बाघिन पी-521 इकलौती जीवित संतान थी।

शिकारियों की हो रही है खोजबीन

बाघिन के शिकार की घटना के बाद से पन्ना टाईगर रिजर्व में हड़कम्प मचा हुआ है। क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने जानकारी देते हुये बताया कि टाईगर रिजर्व में उपलब्ध डॉग स्क्वाड को बुलाकर अपराधियों की खोजबीन की जा रही है। आपने बताया कि अंधेरा होने के कारण 19 दिसम्बर को मृत बाघिन का पोस्टमार्टम नहीं हो सका। बुधवार 20 दिसम्बर को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के नामांकित प्रतिनिधि राजेश दीक्षित की मौजूदगी में वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव गुप्ता द्वारा बाघिन का पोस्टमार्टम किया गया। इस मौके पर क्षेत्र संचालक विवेक जैन भी मौजूद रहे।

सेम्पल की होगी फोरेंसिक जाँच

क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने बताया कि मृत बाघिन के अवयवों के सेम्पल फोरेंसिक जाँच हेतु एकत्रित किये गये हैं। पोस्टमार्टम के उपरान्त बाघिन के शव को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रतिनिधि की मौजूदगी में जलाकर नष्ट कर दिया गया है। अपराधियों को पकडऩे हेतु डाग स्क्वाड एवं विशेष टीम गठित की जाकर कार्यवाही की जा रही है।

पवई क्षेत्र में फन्दे से हुआ तेंदुये का शिकार

  •   एक महीने के अंदर तेदुये के असमय मौत की दूसरी घटना
  •   घटना के चार दिन बाद तक वन अमले को नहीं लगी भनक




अरुण सिंह,पन्ना। बीते एक महीने के अतंराल में दक्षिण वन मण्डल के अंतर्गत दो तेंदुओं की मौत हो चुकी है।  पहला मामला रैपुरा परिक्षेत्र के अंतर्गत मादा तेदुआ की भूख की बजह से मौत हुई थी। जबकि दूसरा तेंदुआ आज पवई से सटे महादेव धार के जंगल में मृत पाया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी उम्र 7-8 वर्ष बताई जा रही है। मृत तेंदुआ का शरीर देखकर ऐसा माना जा रहा है कि 3-4 दिन पूर्व ही उसकी मौत हो गई थी। नगर के नजदीक पवई बीट में पिछले 4 दिनों से तेंदुआ मृत पड़ा रहा और उससे दुर्गन्ध भी उठने लगी इसके बावजूद वन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। जैसे ही मृत तेंदुआ की सूचना वन विभाग को मिली वैसे ही विभाग हरकत में आया तथा सीसीएफ छतरपुर,डीएफओ पन्ना,एसडीओ वन व परिक्षेत्र अधिकारी पवई सहित दर्जनो वन अधिकारी आज सुबह से ही घटना स्थल पर पहुँच गये तथा स्थल का पंचनामा तैयार किया गया।
उल्लेखनीय है कि संकटग्रस्त वन्यजीवों की सुरक्षा में दक्षिण वन मण्डल पन्ना के अमले की एक बार फि र बड़ी लापरवाही उजागर हुई है। महज एक माह के अंदर यहां दो तेंदुओं की अस्वाभाविक मौत होने से वन्यप्राणियों की सुरक्षा और मैदानी अमले सहित वन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगा है। विकासखण्ड मुख्यालय पवई के समीप तेंदुआ का शिकार होने की सूचना के तकरीबन 24 घंटे बाद दक्षिण वन मण्डल पन्ना की डीएफओ तथा मुख्य वन संरक्षक वृत्त छतरपुर के.एस. अलावा के मौके पर पहुंचने से वन्यप्राणियों की सुरक्षा और शिकार की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों की संवदेनशीलता का पता चलता है। तेंदुआ का शिकार पवई से महज 2 किमी दूर पतने नदी किनारे वन परिक्षेत्र पवई अन्तर्गत बीट सुरकहाई हार में अज्ञात व्यक्तियों द्वारा फं दा लगाकर किया गया। सतना से बुलाये गये प्रशिक्षित डॉग से बुधवार को घटना स्थल की सर्चिंग कराई गई। इस दौरान डॉग समीप स्थित जिस किसान की झोपड़ी में गया उसे तथा 3 अन्य व्यक्तियों को वनकर्मियों ने संदेह के आधार पर हिरासत में लेकर पूछतांछ शुरू कर दी है। हिरासत में लिये गये संदेहियों में टीकाराम अहिरवार पुत्र हरछठिया अहिरवार, पन्नूलाल सेन पुत्र रामगोपाल सेन, बाबूलाल आदिवासी पुत्र परसू आदिवासी और मनसुख पिता बाबूलाल आदिवासी शामिल हंै।

इनका कहना है...

0  एक माह पूर्व रैपुरा वन परिक्षेत्र में तेंदुये की मौत हुई थी।जिसका मुख्य कारण यह रहा है कि उसको एक डेढ़ महीने से शिकार नहीं मिला था तथा भूख के कारण वह गॉव के इर्द-गिर्द भ्रमण करता रहा। हमारे रैस्क्यू में वह कॅुये में कूद गया था इस कारण उसकी मौत हुई। दूसरा मामला पवई परिक्षेत्र में जो प्रकाश में आया है ऐसा समझ में आ रहा है कि खेती किसानी करने वाले लोगो ने जानवरो से सुरक्षा हेतु क्लिच वायर का उपयोग किया गया है जिसके निशान व घाव जानवर के गले में पाये गये।
के.एस. अलावा, सीसीएफ छतरपुर
0  कल 19 तारीख को हमें सूचना मिली थी कि एक मृत तेंदुआ पवई हार में देखा गया है चूंकि मृत तेंदुआ ख्ेातो एवं जंगल के बीचो बीच पाया गया ऐसी आशंका है कि खेती करने वाले लोगो द्वारा जानवरो से सुरक्षा हेतु तार के फ न्दे लगाये हंै जानवर के गले के घाव देखकर ऐसा प्रतीत हेाता है। फिलहाल संदिग्धतता के आधार पर कुछ लोगो को गिरफ्तार किया गया है जिनसे पूछतांछ जारी है।
आर.एन. द्विवेदी, उपवन मण्डल अधिकारी पवई

Monday, November 6, 2017

अब खुले में शौच जाने से कतराने लगे ग्रामीण

  •   जो काम सरकार व प्रशासन सालों से नहीं कर सकी बाघ ने एक ही दिन में कर दिया
  •   पन्ना जिले के तारा व विक्रमपुर गाँव में बाघ की दहशत




अरुण सिंह,पन्ना। सरकार और प्रशासन के अथक प्रयासों और करोड़ों रू. खर्च करने के बाद भी जो काम सालों से नहीं हो पाया उसे पन्ना टाईगर रिजर्व के बाघ ने एक ही दिन में कर दिखाया है। पन्ना जिले के तारा व विक्रमपुर गाँव में बीते रोज बाघ की मौजूदगी के चिह्न मिलने पर ग्रामीणों ने बाघ के डर से खुले में शौच जाना बन्द कर दिया है। आलम यह है कि खेतों पककर तैयार खड़ी धान की फसल को काटने से भी ग्रामीण कतरा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पन्ना टाईगर रिजर्व में बाघों के कुनवे का विस्तार होने से यहां के बाघ अब कोर क्षेत्र से निकलकर आस-पास के जंगलों में भी विचरण करने लगे हैं। पन्ना-अमानगंज सड़क मार्ग पर तो आये दिन यात्रियों को बाघ देखने को मिल रहा है। टाईगर रिजर्व के बाघ कोर क्षेत्र की सीमा में बनी पत्थर की खखरी को लांघकर सड़क पार करते हुये सामान्य वन क्षेत्र में भी विचरण के लिये निकल जाते हैं। यहां मवेशियों का शिकार करके दावत उड़ाते हैं और फिर वापस कोर क्षेत्र के जंगल में लौट आते हैं। यह सिलसिला विगत कई वर्षों से चल रहा है। कई बार तो सड़क मार्ग के दोनों तरफ वाहनों की लम्बी कतार लग जाती है क्योंकि बाघ परिवार मुख्य सड़क मार्ग पर चहल कदमी करते नजर आ जाते हैं। क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने बताया कि तारा गाँव के पास पगमार्क मिले थे। इस इलाके से अक्सर ही बाघों का आवागमन होता है क्योंकि यह बफर क्षेत्र से लगा हुआ है। गाँव की ओर बाघों का प्रवेश रोकने के लिये फेंसिंग लगाने का कार्य शुरू किया जा रहा है। फेंसिंग लगने के बाद इस तरह की समस्याओं से काफी हद तक निजात मिलेगी।
विक्रमपुर गाँव के विशाल सिंह भदौरिया ने बताया कि गाँव के निकट धान के खेत में बाघ के पगमार्क मिले हैं, जिससे ग्रामीणों में दहशत है। गाँव के आस-पास बाघ की मौजूदगी की आशंका के चलते खुले में शौच के लिये जाने वाले लोग अब घरों में बने शौचालय का उपयोग करने लगे हैं। दिन ढलने के बाद गाँव में सन्नाटा पसर जाता है, कोई भी घर से बाहर नहीं निकलता। बाघ की दहशत ग्रामीणों में इस कदर है कि खेतों में पककर तैयार खड़ी धान की फसल को काटने के लिये गाँव में मजदूर भी नहीं मिल रहे। मालुम हो कि इसके पूर्व भी विक्रमपुर गाँव में बाघ ने दस्तक दी थी और कई दिनों तक अरहर के खेत में डेरा डाले रहा। पन्ना टाईगर रिजर्व के अधिकारियों ने प्रशिक्षित हांथियों की मदद से बमुश्किल उस बाघ को गाँव से खदेड़ कर पार्क की सीमा के भीतर ले जाने में सफल हुये थे। अब फिर बाघ ने गाँव में दस्तक दे दी है जिससे भय और दहशत का माहौल है।
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Thursday, November 2, 2017

टाईगर मैन जिसने बढ़ाया पन्ना का गौरव

  •   उत्कृष्ट कार्य करने के लिये आर.श्रीनिवास मूर्ति को मिल चुके हैं कई  पुरूस्कार
  •   दुनिया में अब तक जो कहीं नहीं हुआ उसे इन्होंने पन्ना में किया है साकार

              

 आर. श्रीनिवास मूर्ति

।। अरुण सिंह ।।

पन्ना। टाईगर मैन के रूप में प्रसिद्ध हो चुके आर.श्रीनिवास मूर्ति को आज म.प्र. स्थापना दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री उत्कृष्टता पुरूस्कार से सम्मानित किया गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस जुनूनी और कर्तव्यनिष्ठ वन अधिकारी को पन्ना बाघ पुनर्स्थापना  योजना की चमत्कारिक सफलता में अहम भूमिका निभाने के लिये यह पुरूस्कार प्रदान किया है, जिसमें प्रशस्ति पत्र के साथ 1 लाख रू. नगद राशि शामिल है। मौजूदा समय पन्ना बाघ पुनर्स्थापना के मामले में समूची दुनिया के लिये एक मिशाल बन चुका है। अब तक जो कहीं नहीं हुआ वह पन्ना में साकार हुआ है। पन्ना में घटित सफलता की इस कहानी को देखने, समझने और सीखने के लिये दुनियाभर से लोग यहां आ रहे हैं। वन्यजीव प्रेमियों के लिये तो पन्ना टाईगर रिजर्व एक विश्व विद्यालय बन चुका है।

उल्लेखनीय है कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र का यह इलाका प्रकृति के अनगिनत सौगातों से समृद्ध रहा है। आजादी से पूर्व राजाशाही जमाने में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के घने जंगलों में 5 सौ से भी अधिक बाघ स्वच्छन्द रूप से विचरण करते रहे हैं, यही वजह है कि इस इलाके को बाघों की धरती भी कहा जाता रहा है। लेकिन आजादी के बाद तेजी के साथ मानव आबादी बढ़ी और जंगल सिकुड़ते चले गये। नतीजतन बाघों के प्राकृतिक रहवास उजडऩे लगे और इस शानदार वन्यजीव की संख्या भी घटने लगी। हमेशा बाघों से आबाद रहे बुन्देलखण्ड क्षेत्र के इस इलाके को वर्ष 2009 में तब गहरा झटका लगा जब इस तथ्य का खुलासा हुआ कि पन्ना बाघ अभ्यारण्य में अब एक भी बाघ नहीं बचा। 

इस खुलासे के बाद पूरे देश में हड़कम्प मच गया। तब आनन-फानन सरकार द्वारा पन्ना में बाघ पुनस्र्थापना योजना शुरू करने का निर्णय लिया गया। इसी के साथ ऐसे वन अधिकारी की खोजबीन भी शुरू हुई जिसमें वह काबिलियत और क्षमता हो जो पन्ना की खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस ला सके। ऐसी विपरीत और विकट परिस्थितियों में आर. श्रीनिवास मूर्ति को पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना को मूर्त रूप देने की जवाबदारी सौंपी गई।

किसी को नहीं थी सफलता की उम्मीद

बाघ पुनर्स्थापना योजना के शुरू होने पर किसी को भी इस बात की उम्मीद नहीं थी कि बाहर से बाघों को यहां लाकर उनके कुनवे को बढ़ाने में सफलता मिलेगी। हर तरफ आक्रोश और विरोध का माहौल था, ऐसे विपरीत माहौल में कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच से बाघों को पन्ना लाया गया। बेहद साधारण से दिखने वाले आर. श्रीनिवास मूर्ति ने बाघों को पन्ना में फिर से बसाने के लिये खुद भी जंगल को अपना बसेरा बना लिया और जुनून की हद तक बाघों को आबाद करने के काम में जुट गये। 

बाघों के लिये अनुकूल और सुरक्षित वातावरण बनाने के लिये उन्होंने कड़े कदम भी उठाये और कई प्रभावशाली लोगों को जेल तक पहुँचा दिया। बाघों के प्रति उनका सम्मान तथा लगन और मेहनत को देख कुछ लोग मूर्ति जी से प्रभावित हुये तथा उनके कार्य में सहभागी भी बने। धीरे-धीरे समर्थन और सहयोग करने वालों का कारवां बढऩे लगा नतीजतन पन्ना में यह नारा दिया गया जन समर्थन से बाघ संरक्षण, जिसका चमत्कारिक असर हुआ।

मूर्ति को मिलने लगा जनता का समर्थन

जन समर्थन से बाघ संरक्षण का नारा इतना प्रभावी और कारगर हुआ कि छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी बाघ संरक्षण की मुहिम से जुडऩे लगे। इस बीच कान्हा और बान्धवगढ़ से आई बाघिनों ने नन्हे शावकों को जन्म देकर वीरान से पड़े पन्ना टाईगर रिजर्व को फिर से गुलजार कर दिया। फिर तो सफलता की नित नई ऊँचाईयों को बाघ पुनर्स्थापना योजना छूने लगी। इस योजना के तहत यहां पर अनाथ और पालतू बाघिनों को जंगली बनाने का करिश्मा भी घटित हुआ, जिससे पन्ना पार्क विश्व स्तर पर चर्चित हो गया। 

बीते 7 वर्षों में पन्ना टाईगर रिजर्व में 55 से भी अधिक बाघ शावकों का जन्म हो चुका है। पन्ना में जन्मे बाघ अब बुन्देलखण्ड और बघेलखण्ड के अलावा अन्य इलाकों में भी विचरण कर रहे हैं। पन्ना का गौरव पुन: वापस लौटाने में चमत्कारिक भूमिका निभाने वाले वन अधिकारी आर. श्रीनिवास मूर्ति ने जो विलक्षण और अविस्मरणीय कार्य किया है, उसे आगे बढ़ाने तथा बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अब वर्तमान प्रबन्धन व पन्नावासियों की है। पन्ना के बाघ अब सिर्फ पन्ना के नहीं अपितु समूचे बुन्देलखण्ड व म.प्र. के गौरव बन चुके हैं। मुख्यमंत्री उत्कृष्टता पुरूस्कार मिलने के उपरान्त आर. श्रीनिवास मूर्ति ने यह पुरूस्कार पन्ना की जनता व बाघों को समर्पित किया है।
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Saturday, October 28, 2017

बाघों को आबाद करने कम्बोडिया अपनायेगा पन्ना मॉडल

  •   पन्ना में मिली  सफलता का अध्ययन करने कम्बोडिया का उच्च स्तरीय दल पहुँचा 
  •   पन्ना  आकर दल ने बाघों को फिर से आबाद करने की सीखी तकनीक
  •   पन्ना के जंगल में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते बाघ परिवार का भी किया दीदार


कम्बोडिया के उच्च स्तरीय दल को पन्ना के बाघ पुनर्स्थापना  योजना की जानकारी देते हुये क्षेत्र संचालक विवेक जैन।

अरुण सिंह,पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व की तर्ज पर कम्बोडिया में भी बाघों के उजड़ चुके संसार को फिर से आबाद किया जायेगा। पन्ना में बाघ पुनस्र्थापना योजना को मिली चमत्कारिक सफलता का अध्ययन करने कम्बोडिया का उच्च स्तरीय दल 25 अक्टूबर को यहां पहुँचा है। इस 17 सदस्यीय दल में वन एवं पर्यावरण तथा पर्यटन विभाग के आला अधिकारी शामिल हैं। कम्बोडिया के इस उच्च स्तरीय दल ने पन्ना टाईगर रिजर्व का भ्रमण कर यहां पर बाघों की दुनिया को फिर से आबाद करने की तकनीक को न सिर्फ सीखा अपितु अपने यहां पन्ना मॉडल को अपनाने की इच्छा जताई है। पन्ना के जंगल में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते हुये बाघ परिवार को देख यह दल अभिभूत हो गया।

उल्लेखनीय है कि पन्ना का जंगल हमेशा बाघों से आबाद रहा है। लेकिन बीते कुछ दशकों से मानवीय हस्तक्षेप बढऩे व शिकार की घटनाओं के चलते पन्ना के बाघों का भरा पूरा संसार उजड़ गया और वर्ष 2009 में अधिकृत रूप से पन्ना टाईगर रिजर्व को बाघ विहीन घोषित कर दिया गया। बाघों की उजड़ चुकी इस दुनिया को फिर से आबाद करने के लिये पन्ना में बाघ पुनस्र्थापना योजना का बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य शुरू हुआ, जिसके तहत प्रथम चरण में यहां कान्हा और बान्धवगढ़ से 4 बाघिनें तथा पेंच टाईगर रिजर्व से एक नर बाघ पन्ना लाया गया। बेहजर प्रबन्धन और जनभागीदारी से बाघ पुनस्र्थापना योजना को यहां शानदार सफलता मिली, जो पूरी दुनिया के लिये एक मिशाल बन गई। सबसे ज्यादा चमत्कृत करने वाली बात यहां जो घटित हुई वह पालतू बाघिनों को जंगली बनाना है। पन्ना टाईगर रिजर्व में दो अनाथ पालतू बाघिनों को न सिर्फ जंगली बनाया गया अपितु इन दोनों ही बाघिनों ने बाघों की वंश वृद्धि में भी अपना योगदान दिया। इस अनूठी कामयाबी की ख्याति देश की सीमाओं को पार करते हुये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैली और अनेकों देशों के लोग पन्ना की सफलता को देखने, समझने तथा अध्ययन करने के लिये यहां आने लगे। पन्ना के बाघ पुनस्र्थापना की कामयाबी से कम्बोडिया इस कदर प्रभावित हुआ है कि वह अब अपने यहां पन्ना की ही तर्ज पर बाघों को फिर से आबाद करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। मालुम हो कि कम्बोडिया के जंगल में नवम्बर 2007 के पूर्व तक बाघ थे, लेकिन इसके बाद यह देश बाघों से विहीन हो गया। अब कम्बोडिया में उजड़ चुके बाघों के संसार को पुन: आबाद करने के प्रयास हो रहे हैं, जिसके लिये पन्ना मॉडल का अनुकरण किया जा रहा है। इसी परिपेक्ष्य में कम्बोडिया के उच्च स्तरीय दल ने पन्ना टाईगर रिजर्व का दो दिवसीय दौरा किया है।


 ड्रोन के द्वारा मॉनीटरिंग सिस्टम को समझते हुये दल के सदस्य।

क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व विवेक जैन ने जानकारी देते हुये आज बताया कि कम्बोडियन डेलीगेट्स में शामिल उच्च स्तरीय दल ने यहां पार्क भ्रमण करने के साथ बाघ संरक्षण के संबंध में जानकारी हासिल की है। दल में शामिल लोगों के संबंध में जानकारी देते हुये श्री जैन ने बताया कि पर्यावरण मंत्रालय कम्बोडिया के प्रमुख सचिव, विशेष सचिव, वन एवं वन्यप्राणी विभाग के महानिदेशक, सहायक महानिदेशक, क्षेत्र संचालक, पर्यटन विभाग कम्बोडिया के प्रमुख सचिव, महानिदेशक, अन्तर्राष्ट्रीय कॉपरेशन विभाग के निदेशक, टूरिस्ट इन्वेस्ट विभाग के निदेशक एवं उप निदेशक, प्रोविन्सियल गवर्नमेंट रिप्रजेन्टेटिव माननीय स्वे सम ईंग प्रोविन्सियल गर्वनर, मुख्य प्रशासक मोन्डुलकिरी प्रोविन्स एवं उप मुख्य मोण्डुलकिरी तथा विश्व प्रकृति निधि कम्बोडिया के कण्ट्री डायरेक्टर, रिजनल इनीसियेटिव लीड, लैण्ड स्केप मैनेजर एवं टूरिज्म मैनेजर शामिल रहे।

दल ने सीखा मॉनीटरिंग की माडर्न तकनीक


कम्बोडिया के उच्च स्तरीय दल ने पन्ना की बाघ पुनस्र्थापना योजना की सफलता को प्रजेन्टेशन के माध्यम से समझा और पार्क का भ्रमण कर अपनी आँखों से देखा। क्षेत्र संचालक पन्ना टाइगर रिवर्ज ने बताया कि कम्बोडियन डेलीगेट्स के द्वारा पन्ना टाइगर रिजर्व की सफल बाघ पुनस्र्थापना के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त की गई। पन्ना की सफलतम बाघ पुनस्र्थापना का अध्ययन कर कम्बोडिया में भी बाघ पुनस्र्थापना का कार्य प्रस्तावित किया जा रहा है। कम्बोडिया डेलीगेट्स को मानीटरिंग की माडर्न तकनीक जैसे ड्रोन एवं टेलीमेट्री तथा क्षेत्रीय कर्मचारियों के योगदान से अवगत कराया गया। क्षेत्र संचालक द्वारा 26 अक्टूबर को कर्णावती में प्रस्तुतिकरण के माध्यम से बाघ पुनस्र्थापना के महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर आवश्यक जानकारी भी उपलब्ध कराई गई। पार्क प्रबन्धन द्वारा हैबीटेट विकास, शाकाहारी वन्यप्राणियों के प्रबन्धन एवं स्थानीय
समुदायों से समन्वय के सन्दर्भ में वर्तमान स्थिति की प्रगति की चर्चा भी कम्बोडियन डेलीगेट्स से  की गई।


कम्बोडियन दल के साथ फोटो सेशन  का द्रश्य 

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