Sunday, June 16, 2019

क्षेत्र संचालक की रिपोर्ट से वन सुरक्षा को लेकर उठे गंभीर सवाल

  •   कई महीनों से खाली पड़ी थी टपकनिया वन सुरक्षा चौकी
  •   सागौन वृक्षों की कटाई के लिये वन अपराधियों को मिला भरपूर अवसर
  •   डिप्टी रेंजर व वन रक्षक के बाद अब अधिकारियों पर भी हो सकती है कार्यवाही




क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व कार्यालय पन्ना।

अरुण सिंह,पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में वन्य प्राणियों व जंगल की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुई सागौन वृक्षों की अवैध कटाई का मामला उजागर होने के बाद ड्यूटी से नदारद रहने वाले डिप्टी रेंजर व वन रक्षक को निलंबित किया जा चुका है, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुये पीटीआर के आला अधिकारियों पर भी कार्यवाही की गाज गिर सकती है। अवैध कटाई के इस सनसनीखेज मामले पर पीटीआर के क्षेत्र संचालक के.एस. भदौरिया द्वारा 14 जून को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) को सौंपी गई रिपोर्ट से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में जंगल व वन्य प्राणियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है।
क्षेत्र संचालक श्री भदौरिया ने भेजी गई अपनी रिपोर्ट में यह लेख किया है कि पन्ना बफर परिक्षेत्र के टपकनिया जंगल में सागौन वृक्षों की कटाई होने की सूचना उन्हें मुखबिर द्वारा 4 जून 2019 को मिली थी यह सूचना मिलने पर क्षेत्र संचालक द्वारा उडऩदस्ता दल क्र. 2 को अवैध कटाई की जाँच करने के लिये निर्देश दिये। तदुपरान्त उडऩदस्ता दल द्वारा 5 जून को हर्षा बीट के टपकनिया जंगल का जायजा लिया और यहां पर बड़े पैमाने पर सागौन के पेड़ कटने की पुष्टि की। उडऩदस्ता दल द्वारा 5 जून से 10 जून तक टपकनिया के जंगल में हुई अवैध कटाई के ठूँठों की गणना की गई, जिसमें 619 नग ताजे ठूँठ पाये गये। सबसे आश्चर्यजनक और चिन्ता की बात यह है कि इतने व्यापक स्तर पर सागौन वृक्षों की बेरहमी से लम्बे समय तक कटाई होती रही लेकिन इसकी भनक न तो रेंजर कौरव नामदेव को लगी और न ही पीटीआर के आला वन अधिकारियों को जंगल में चल रही विनाशलीला की खबर मिली। इससे साफ जाहिर होता है कि पीटीआर के बफर क्षेत्र में जितना भी जंगल बचा है वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। क्षेत्र संचालक श्री भदौरिया ने अपनी रिपोर्ट में यह स्वीकार किया है कि 8 जून को उप संचालक के साथ जब उन्होंने स्थाई कैम्प टपकनिया का निरीक्षण किया तो वहां एक भी वनकर्मी नहीं मिला, स्थाई कैम्प खाली पाया गया। श्री भदौरिया ने रिपोर्ट में यह भी लेख किया है कि निरीक्षण के दौरान यह ज्ञात हुआ कि कैम्प पर विगत कई माहों से वन कर्मचारी व श्रमिकों ने निवास नहीं किया। वन सुरक्षा कैम्प के लम्बे समय तक खाली पड़े रहने का जंगल की सुरक्षा पर विपरीत असर पड़ा और वन अपराधियों द्वारा इसका फायदा उठाते हुये बेखौफ होकर सागौन वृक्षों का सफाया कराया गया।
गौरतलब है कि पन्ना बफर के हर्षा बीट का टपकनिया जंगल उत्तर वन मण्डल पन्ना की सीमा से लगा हुआ है। यह पूरा क्षेत्र अवैध कटाई को लेकर विगत कई वर्षों से संवेदनशील बना हुआ है। वर्ष 2016 में हर्षा बीट से लगे उत्तर वन मण्डल पन्ना के जंगल में सागौन वृक्षों के बड़े पैमाने पर हुई अवैध कटाई का मामला प्रकाश में आया था। इसके बाद 2018 में भी इस क्षेत्र में अवैध कटाई हुई, जिसको दृष्टिगत रखते हुये स्थाई कैम्प टपकनिया की स्थापना की गई थी, ताकि अवैध कटाई पर प्रभावी अंकुश लग सके। लेकिन जिन वन कर्मचारियों व अधिकारियों पर जंगल को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन करना तो दूर महीनों जंगल की तरफ रुख भी नहीं किया। हमेशा सजग और चौकन्ने रहने वाले वन अपराधियों को इसकी जानकारी थी, नतीजतन सुरक्षा विहीन इस जंगल को उन्होंने तबियत से तहस-नहस किया।

क्षेत्र संचालक की रिपोर्ट के प्रमुख तथ्य


 के.एस. भदौरिया क्षेत्र संचालक पन्ना  टाइगर रिज़र्व ।


  •   स्थाई कैम्प टपकनिया विगत कई माहों से बन्द पड़ा रहा एवं कर्मचारियों व श्रमिकों द्वारा कैम्प पर निवास कर सुरक्षा नहीं की गई। फलस्वरूप क्षेत्र में अवैध कटाई हुई। स्थाई कैम्प टपकनिया पर कर्मचारियों व श्रमिकों के निवास न करने के संबंध में परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना बफर एवं सहायक संचालक मड़ला द्वारा उक्त तथ्य की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को नहीं दी गई। 
  •   स्थाई कैम्प टपकनिया पर कर्मचारी, श्रमिकों का निवास कर वन सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई।
  •   परिक्षेत्र सहायक झिन्ना विगत 3 माह से अनुपस्थित हैं एवं बीट प्रभारी वन रक्षक द्वारा टपकनिया कैम्प पर निवास नहीं किया गया। परिक्षेत्र अधिकारी द्वारा उक्त वन क्षेत्र की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया।
  •   पन्ना टाईगर रिजर्व में वन कर्मचारियों द्वारा वायरलेस से प्रतिदिन खैरियत रिपोर्ट वायरलेस कन्ट्रोल रूम पन्ना को प्रदान की जाती है। लेकिन परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना बफर एवं अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा प्रतिदिन खैरियत दी गई। उक्त वन क्षेत्र में अवैध कटाई की सूचना नहीं दी गई। इस प्रकार कर्मचारियों एवं अधिकारियों द्वारा कर्तव्य में लापरवाही बरती गई।
  •   प्रभारी परिक्षेत्र सहायक झिन्ना, परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना बफर एवं सहायक संचालक मड़ला द्वारा क्षेत्र में अवैध कटाई पर कोई कार्यवाही नहीं की गई और न ही अवैध कटाई की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई। 
  •   परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना बफर द्वारा माह मई 2019 में रोस्टर के अनुसार बीट निरीक्षण करना सुनिश्चित था किन्तु उनके द्वारा निर्धारित बीट का निरीक्षण नहीं किया गया। परिक्षेत्र सहायक झिन्ना द्वारा मई 2019 में बीट हर्षा का निरीक्षण किया गया किन्तु उनके द्वारा बीट में कोई बृहद स्तर पर कटाई संज्ञान में नहीं ली गई और न ही बीट क्षेत्र में अवैध कटाई की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई।

वन्य प्राणियों पर भी मंडरा रहा खतरा

पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र सहित बफर व उत्तर तथा दक्षिण वन मण्डल पन्ना के जंगलों में विचरण करने वाले वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। मालुम हो कि वर्ष 2009 में पन्ना टाईगर रिजर्व सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही और अधिकारियों की अनदेखी के चलते बाघ विहीन हो गया था। लेकिन उस समय आर.श्रीनिवास मूर्ति  व विक्रम सिंह परिहार  जैसे वन अधिकारियों ने यहां के सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाते हुये अनुकूल वातावरण बनाया, फलस्वरूप बाघ विहीन हो चुका पन्ना टाईगर रिजर्व एक बार फिर न सिर्फ बाघों से आबाद हो गया अपितु यहां जन्मे बाघ आस-पास के जंगलों में पहुँचकर वहां अपना ठिकाना बना रहे हैं। मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व में 40 से अधिक बाघ हैं, उसके अनुरूप यहां सुरक्षा व्यवस्था नाकाफी है। वर्तमान में पन्ना टाईगर रिजर्व में वन क्षेत्रपाल के 8 पद, उप वन क्षेत्रपाल के 5 पद, वनपाल के 36 पद तथा वन रक्षक के 35 पद रिक्त हैं। कर्मचारियों व अधिकारियों की कमी के कारण 6 परिक्षेत्र, 9 परिक्षेत्र सहायक वृत्त एवं 24 बीटें रिक्त हैं। जाहिर है कि ऐसी विकट परिस्थितियों में बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाईगर रिजर्व में एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
00000

दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट 

अभ्युदय प्रोजेक्ट से होगी विकास कार्यों व योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी


  •   जिले के नवागत कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने पत्रकारों से विभिन्न मुद्दों पर की रूबरू चर्चा
  •   प्रशासनिक कसावट लाने ग्राम, जनपद व जिला स्तर पर बनाये जायेंगे अभ्युदय दल


पन्ना के नवागत कलेक्टर कर्मवीर शर्मा। 

। अरुण सिंह 

पन्ना। विकास के मामले में अत्यधिक पिछड़े पन्ना जिले के लोगों को शासन की जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिले तथा विकास के कार्यों का बेहतर ढंग से क्रियान्वयन हो, इसके लिये अभिनव पहल के तहत जिले में अभ्युदय प्रोजेक्ट शुरू किया जायेगा। इस प्रोजेक्ट के शुरू होने पर जिला से लेकर ग्राम स्तर तक शासकीय योजनाओं व विकास कार्यों की बेहतर ढंग से निगरानी हो सकेगी। 
यह बात जिले के नवागत कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने आज नवीन कलेक्ट्रेट भवन के सभागार में आयोजित पहली प्रेसवार्ता में पत्रकारों से रूबरू चर्चा करते हुये कही। उन्होंने कहा कि शासन की प्राथमिकतायें कलेक्टर की प्राथमिकता होती हैं, लेकिन हर जिले की अपनी अलग समस्यायें व प्राथमिकतायें होती हैं, जिन्हें जानने और समझने के लिये पत्रकारों से चर्चा कर जिले की प्राथमिकतायें तय करेंगे। इसी के अनुरूप कार्य योजना बनाई जायेगी।
कार्यभार गृहण करने के बाद आयोजित हुई इस पहली प्रेसवार्ता में कलेक्टर श्री शर्मा ने बड़ी सहजता के साथ सभी से परिचय प्राप्त किया, तदुपरान्त वार्ता में मौजूद सभी पत्रकारों से उनके विचार व सुझावों को सुना। अपनी तरह की इस अनूठी परिचर्चा व संवाद में कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आये, जिन्हें कलेक्टर ने अपने संज्ञान में लिया। पत्रकारों ने मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पर्यटन विकास और अवैध उत्खनन से पर्यावरण को होने वाली अपूर्णीय क्षति पर चर्चा करते हुये अहम सुझाव दिये। 
कलेक्टर को बताया गया कि पन्ना की पहचान यहां के समृद्ध पर्यावरण, खनिज संपदा और प्राचीन भव्य मन्दिरों से है। यहां नैसर्गिक  संपदा का संरक्षण करते हुये विकास की योजनायें बननी चाहिये। पत्रकारों ने कलेक्टर का ध्यान जिले की बदहाल हो चुकी शैक्षणिक व्यवस्था और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की ओर आकृष्ट करते हुये उन्हें जमीनी हकीकत से न सिर्फ अवगत कराया अपितु समस्या के निदान हेतु सुझाव भी दिये।


कलेक्टर से रूबरू चर्चा करते हुए पन्ना के पत्रकार। 

कलेक्टर श्री शर्मा को पन्ना जिले के प्राचीन जलाशयों की हो रही दुर्दशा की ओर भी ध्यान आकृष्ट कराया गया। उन्हें बताया गया कि जिला मुख्यालय में स्थिति राजाशाही जमाने के प्राचीन जलाशय आज भी यहां के जीवन के आधार हैं। इन्हीं जलाशयों का पानी शहर में पेयजल के लिये प्रदाय किया जाता है। लेकिन समुचित देखरेख के अभाव और उपेक्षा के कारण शहर के ज्यादातर तालाब अतिक्रमण से ग्रसित हैं जिससे उनका वजूद नष्ट हो रहा है। इन जीवनदायी तालाबों को बचाने और संरक्षित करने के लिये ठोस और कारगर पहल जरूरी है। 
इस अहम मुद्दे पर कलेक्टर ने गंभीरता से चर्चा की और तालाबों को पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त कराकर उन्हें संरक्षित करने पर सहमति जताई। पत्रकारों ने यह सुझाव भी दिया कि पन्ना जिले में ईको फ्रेण्डली गतिविधियों को बढ़ावा मिलना चाहिये जिनसे युवाओं को रोजगार के भी अवसर उपलब्ध हो सकें। चूँकि पन्ना की प्राकृतिक आबोहवा आज भी अन्य दूसरे जिलों की तुलना में बेहतर है, जिसे दृष्टिगत रखते हुये पन्ना को शिक्षा के हब के रूप में विकसित करने की दिशा में पहल अपेक्षित है। शिक्षा के लिये यहां का शान्तिपूर्ण वातावरण व पर्यावरण दोनों ही अनुकूल है।

केन नदी का पानी लाया जाये पन्ना



पन्ना शहर की पेयजल समस्या के स्थाई निदान हेतु केन नदी का पानी पन्ना लाने का सुझाव भी दिया गया। प्राचीन तालाबों के अतिक्रमण का शिकार होने तथा उनका पानी दूषित और गन्दा हो जाने के चलते विगत कई वर्षों से गर्मी के मौसम में पन्ना नगरवासियों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। हर मुहल्ले में जगह-जगह बोरवेल खुदवाकर पेयजल की व्यवस्था करना समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि हर साल पानी तेजी से नीचे खिसक रहा है और भू-जल की स्थिति गंभीर है। इन हालातें में यदि केन नदी के पानी को पन्ना लाने के प्रभावी प्रयास हों तो यहां की पेयजल समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है।

रेत का अवैध उत्खनन गंभीर समस्या





जिले में केन सहित उसकी सहायक नदियों में व्यापक पैमाने पर भारी भरकम मशीनों से जिस तरह नियमों को तांक में रखकर रेत का अवैध उत्खनन हो रहा है, उससे नदियों का वजूद संकट में पड़ गया है। अजयगढ़ क्षेत्र में रेत माफियाओं ने बीते 5 सालों में केन नदी को छलनी कर दिया है, जिससे जलीय जन्तुओं व वनस्पतियों का अस्तित्व जहां खत्म होने की कगार पर है, वहीं केन किनारे के ग्रामों का जल स्तर भी तेजी से नीचे खिसक रहा है। गर्मी के दिनों में इन ग्रामों को भी जल संकट से जूझना पड़ता है। रेत के अवैध उत्खनन से अराजकता तथा ङ्क्षहसा को जहां बढ़ावा मिलता है वहीं इलाके की शान्ति व्यवस्था भी भंग होती है। रेत से शासन को जितना राजस्व मिलता है, उससे कई गुना अधिक लागत वाली सड़कें भारी भरकम रेत से भरे डम्फरों की धमाचौकड़ी से ध्वस्त हो जाती हैं। इस लिहाज से रेत के अवैध उत्खनन, परिवहन और भण्डारण पर सख्ती से रोक लगनी चाहिये।

निगरानी तंत्र को बनाया जायेगा सशक्त: कलेक्टर


अभ्युदय प्रोजेक्ट के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुये कलेक्टर ने बताया कि इसके माध्यम से निगरानी तंत्र को सशक्त बनाया जायेगा। जिले के अधिकारियों को गाँव डिवाइड करेंगे, कौन अधिकारी किस गाँव में जा रहा है, किसी को इसकी जानकारी नहीं रहेगी, सिर्फ कन्ट्रोल रूम में जानकारी होगी। इसके बेहतर क्रियान्वयन हेतु ग्राम, जनपद व जिला स्तर पर अभ्युदय दल बनाये जायेंगे। 
कलेक्टर श्री शर्मा ने कहा कि पत्रकारों के साथ हुई चर्चा में दीर्घ कालिक महत्व के अनेकों विषय और मुद्दे सामने आये हैं। इनका विश्लेषण करके प्राथमिकतायें तय की जायेंगी। आपने बताया कि विश्लेषण करने के बाद सामने आये मुद्दों को शॉर्ट टर्म, मीडियम टर्म व लाँग टर्म में विभाजित कर उसी के अनुरूप कार्य योजना बनाई जायेगी। इसमें जनप्रतिनिधियों और मीडिया की भूमिका भी अहम रहेगी।
00000

Saturday, June 15, 2019

सागौन कटाई मामले में डिप्टी रेंजर व वनरक्षक निलंबित

  •   उप संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व ने की निलंबन की कार्यवाही
  •   वन विभाग की एसटीएफ टीम ने जंगल में हुई क्षति का लिया जायजा



टपकनिया जंगल के निकट स्थित वन विभाग का पेट्रोलिंग कैम्प।

अरुण सिंह, पन्ना। सागौन वृक्षों की बड़े पैमाने पर हुई अवैध कटाई को लेकर इन दिनों पन्ना टाईगर रिजर्व सुॢखयों में बना हुआ है। बीते तकरीबन एक माह के दौरान पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र अन्तर्गत हर्षा बीट के टपकनिया जंगल में 6सौ से भी अधिक सागौन के हरे-भरे वृक्षों को बेरहमी के साथ काटा गया है। मामले का खुलासा होने पर उप संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व द्वारा तत्काल प्रभाव से हर्षा बीट के वन रक्षक अनिल कुमार प्रजापति व डिप्टी रेंजर गोविन्द दास सौर को निलंबित कर दिया है। इधर प्रदेश के वन मंत्री उमंग ङ्क्षसघार के निर्देश पर वन विभाग की एसटीएफ टीम ने भोपाल से पन्ना पहुँचकर अवैध कटाई से जंगल को हुये नुकसान का जायजा लिया है। प्रदेश स्तरीय यह जाँच टीम अपनी रिपोर्ट आला वन अधिकारियों को सौंपेगी, तदुपरान्त अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्यवाही हो सकती है।

जंगल जहां पर सागौन वृक्षों की बेरहमी से कटाई हुई।

उल्लेखनीय है कि पन्ना बफर क्षेत्र के टपकनिया जंगल में जहां सागौन वृक्षों की अवैध कटाई हुई है, वहां से बमुश्किल 2सौ मीटर की दूरी पर वन विभाग का पेट्रोङ्क्षलग कैम्प स्थित है। जाहिर सी बात है कि इस कैम्प में यदि वन कॢमयों की मौजूदगी होती तो इतने बड़े पैमाने पर सागौन वृक्षों की कटाई संभव नहीं थी। जिस तरह से वन माफियाओं ने टपकनिया जंगल के 2-3 किमी के दायरे में जंगल का विनाश किया है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि बीते एक माह के दौरान वनरक्षक व डिप्टी रेंजर सहित अन्य कोई भी वन अधिकारी यहां नहीं पहुँचे। तकरीबन एक माह तक वन माफिया जंगल में छाँट-छाँट कर मोटे और कीमती सागौन वृक्षों को कटवाते रहे और पन्ना बफर वन परिक्षेत्र के रेंजर कौरव नामदेव सहित अन्य अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इसी से पता चलता है कि वन संरक्षण व सुरक्षा के नाम पर जिम्मेदार लोग किस तरह से अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं।

जंगल में बिखरी पड़ी हैं वृक्षों की शाखायें


जहां-तहां बिखरी पड़ीं सागौन वृक्षों की शाखायें।

पन्ना बफर क्षेत्र के टपकनिया जंगल में मौजूदा समय न सिर्फ हर तरफ सागौन के ताजे ठूँठ नजर आ रहे हैं अपितु पूरे जंगल में सागौन वृक्षों की मोटी-मोटी शाखायें बिखरी पड़ी हैं। सागौन तस्करों ने पूरे बेफिक्री के साथ न सिर्फ पेड़ काटे अपितु वहीं जंगल में ही शाखाओं की काट-छाँट कर बोगियां बनाकर ले गये। सागौन वृक्षों की छीलन व फैली पड़ी शाखाओं को देखकर सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से कटाई के कार्य को अंजाम दिया गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कटाई में लिप्त ज्यादातर लोग पन्ना से कौटासेहा के रास्ते वहां पहुँचते रहे हैं। जबकि कुछ लोगों के केन नदी पारकर यहां आने के संकेत मिले हैं। सागौन की बोगियां भी इसी मार्ग से ले जाई जाती रही हैं।

वन परिक्षेत्र के अन्य बीटों में भी हुई है कटाई

अवैध सागौन कटाई को लेकर मौजूदा समय पन्ना बफर क्षेत्र की हर्षा बीट पर ही सभी का ध्यान केन्द्रित है, जबकि वन परिक्षेत्र की अन्य दूसरी बीटों की हालत बेहतर नहीं कही जा सकती। सूत्रों के मुताबिक यदि समूचे बफर क्षेत्र के जंगल का सही तरीके से जायजा लिया जाये तो पेड़ कटाई के बेहद चौंकाने वाले और अविश्वसनीय आँकड़े सामने आ सकते हैं। बफर क्षेत्र के अलावा सामान्य वन क्षेत्र में तो सागौन का जंगल खत्म होने की कगार में जा पहुँचा है। पन्ना शहर के निकट कौआसेहा का जंगल पूरी तरह से साफ हो चुका है, यहां अन्य दूसरी प्रजाति के पेड़ों के अलावा सिर्फ गुलचिटार की झाडिय़ां बची हैं, सागौन का पेड़ यहां ढूँढऩे पर भी नहीं मिलेगा। यहीं से होकर लकड़ी तस्कर बफर क्षेत्र के जंगल में पहुँचते हैं और सागौन काटकर बोगियां ठिकाने पर पहुँचा देते हैं। यह सिलसिला अनवरत् रूप से कभी कम तो कभी ज्यादा लेकिन जारी रहता है।

00000

Friday, June 14, 2019

पन्ना टाईगर रिजर्व के हर्षा बीट में कट गये सागौन के सैकड़ों वृक्ष

  •   बड़े पैमाने पर सुनियोजित ढंग से होती रही कटाई और वन अमले को नहीं लगी भनक
  •   सागौन वृक्षों की अवैध कटाई का खुलासा होने पर मचा हड़कम्प
  •   क्षेत्र संचालक सहित वन अधिकारियों ने जंगल का दौरा कर लिया जायजा
  •   वन परिक्षेत्र पन्ना बफर के टपकनिया जंगल में हर तरफ नजर आ रहे ताजे ठूँठ



पन्ना टाईगर रिजर्व में बफर परिक्षेत्र के हर्षा बीट का प्रवेश द्वार।

अरुण सिंह,पन्ना। म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व अन्तर्गत वन परिक्षेत्र पन्ना बफर के हर्षा बीट में बड़े ही सुनियोजित तरीके से बड़े पैमाने पर सागौन वृक्षों की कटाई का बेहद चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। मामले का खुलासा होने पर वन महकमे में हड़कम्प मचा हुआ है। पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में जहां बेरहमी के साथ हरे-भरे सैकड़ों सागौन वृक्षों को काटा गया है, वह इलाका टपकनिया जंगल के नाम से जाना जाता है। टपकनिया के इस जंगल में जिधर भी नजर दौड़ाये, हर तरफ सागौन के ताजे ठूँठ नजर आ रहे हैं। क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया ने बताया कि जानकारी मिलते ही उन्होंने मौके पर पहुँचकर स्थिति का जायजा लिया है। बफर क्षेत्र के इस जंगल में सागौन के कितने वृक्ष कटे हैं, इसका आँकलन कराया जा रहा है।
 उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के उत्तर वन मण्डल अन्तर्ग उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के उत्तर वन मण्डल अन्तर्गत विश्रामगंज, देवेन्द्रनगर व धरमपुर वन परिक्षेत्र के जंगल में सागौन वृक्षों की कटाई का सिलसिला वर्षों से चल रहा है, जिस पर प्रभावी अंकुश लगाने में वन अमला नाकाम साबित हुआ है। सुनियोजित तरीके से सागौन वृक्षों की कटाई में लिप्त वन माफियाओं की गिद्ध दृष्टि अब पन्ना टाईगर रिजर्व के सुरक्षित कहे जाने वाले समृद्ध बफर क्षेत्र के जंगल में गई है, जहां उन्होंने बीते एक माह के दौरान बेखौफ होकर जंगल को तहस-नहस किया है और जंगल की सुरक्षा में तैनात अमले को इस विनाश लीला की भनक तक नहीं लगी। सागौन वृक्षों की व्यापक पैमाने पर हुई कटाई के इस खौफनाक नजारे को देखकर वन विभाग के आला अधिकारी भी हैरान हैं। क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस. भदौरिया ने प्रभावित वन क्षेत्र का दौरा करने के बाद यह स्वीकार किया है कि जिम्मेदार वन अधिकारियों व सुरक्षा में तैनात रहने वाले वन अमले ने अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया। इसी लापरवाही और अनदेखी के कारण ही इतने बड़े पैमाने पर अवैध कटाई संभव हो सकी जो निश्चित ही चिन्ताजनक है। श्री भदौरिया ने बताया कि हर्षा बीट के टपकनिया जंगल के पास ही वन सुरक्षा चौकी है, लेकिन वहां वन कर्मी रहते ही नहीं थे। सबसे ज्यादा चिन्ताजनक बात यह है कि वन परिक्षेत्र अधिकारी व अन्य वन अधिकारियों ने भी इस इलाके का जायजा नहीं लिया। नतीजतन जंगल की कटाई का सिलसिला पिछले कई दिनों से बेरोकटोक अनवरत जारी रहा और किसी को इसकी भनक नहीं लगी। श्री भदौरिया ने कहा कि बफर क्षेत्र के जंगल में सागौन वृक्षों की अवैध कटाई का मामला बेहद गंभीर अपराध है और इसके लिये जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जायेगी। उन्होंने बताया कि अवैध कटाई से जंगल को कितनी क्षति हुई है, इसका आँकलन कराया जा रहा है।

बफर क्षेत्र में विचरण कर रहे बाघों पर मंडराया खतरा





पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बाघों की संख्या बढऩे से कई बाघ कोर क्षेत्र से बाहर निकलकर बफर क्षेत्र के जंगल में विचरण कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर बाघों को रेडियो कॉलर नहीं है, जिससे उनके विचरण क्षेत्र व लोकेशन की जानकारी भी वन अमले को नहीं रहती। ऐसी स्थिति में बफर क्षेत्र के जंगल जहां इतने व्यापक पैमाने पर अवैध कटाई हो रही है, वहां विचरण करने वाले बाघों पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। पार्क सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पन्ना बफर क्षेत्र के जिस इलाके में सागौन वृक्षों की कटाई हुई है वह पूरा इलाका मौजूदा समय पन्ना टाईगर रिजर्व के बाघ पुनर्स्थापना  योजना के तहत वर्ष 2009 में पेंच से लाये गये संस्थापक नर बाघ टी-3 का रहवास है। पन्ना बाघ पुनर्स्थापना योजना को कामयाबी दिलाने वाले इस नर बाघ को फादर आफ दि पन्ना टाईगर के खिताब से भी नवाजा गया है, क्योंकि पन्ना में जितने भी बाघ हैं सब इसी की संतान हैं। इस लिहाज से टी-3 बाघ पन्ना टाईगर रिजर्व की धरोहर है, लेकिन मौजूदा समय इस बाघ की सुरक्षा भी खतरे में है।

00000

दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट 


Thursday, June 13, 2019

पन्ना के प्रसिद्ध पाण्डव जल प्रपात में बाघ परिवार का डेरा

  • बाघों की मौजूदगी से पर्यटकों के भ्रमण पर लगी रोक
  •  भीषण गर्मी में भी यहां पर होता है शीतलता का अहसास



अरुण सिंह,पन्ना, 12 जून 19। भीषण तपिश भरी गर्मी से म.प्र. के पन्ना टाईगर रिजर्व में विचरण करने वाले बाघ भी बेहाल हैं। गर्मी के प्रकोप से बचने के लिये शीतलता प्रदान करने वाले स्थलों की तलाश कर वहां आराम फरमा रहे हैं। पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में स्थित सुप्रसिद्ध पर्यटल स्थल पाण्डव जल प्रपात में भी पिछले 15 दिनों से बाघ परिवार डेरा डाले हुये हैं। यहां पर बाघों की मौजूदगी को देखते हुये पार्क प्रबन्धन ने पर्यटकों के भ्रमण पर रोक लगा दिया है। प्रतिबन्ध लगने के कारण पर्यटक पिछले 15 दिनों से इस सुन्दर जल प्रपात व शीतलता का अहसास कराने वाली प्राचीन गुफाओं का लुत्फ उठाने से वंचित हो रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पन्ना शहर से लगभग 12 किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट स्थित पाण्डव जल प्रपात पूरे वर्ष पर्यटकों के भ्रमण हेतु खुला रहता है। बारिश के दौरान जब पन्ना टाईगर रिजर्व के प्रवेश द्वार पर्यटकों के लिये बन्द हो जाते हैं, उस समय भी पाण्डव जल प्रपात का देशी व विदेशी पर्यटक भरपूर लुत्फ उठाते हैं। लेकिन इस वर्ष पड़ रही प्रचण्ड गर्मी के मौसम में जब पन्ना शहर में तापमान का पारा पिछले रिकार्ड ध्वस्त करते हुये 48 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया है, ऐसे समय पर पाण्डव जल प्रपात के आस-पास व प्राकृतिक गुफाओं में बाघों ने डेरा जमा लिया है। गर्मी में भी शीतलता प्रदान करने वाले इस पर्यटन स्थल में आराम फरमा रहे बाघ परिवार की जिन्दगी में किसी तरह का कोई खलल पैदा न हो तथा उनकी नाराजगी से अप्रिय स्थिति न बने इस बात को दृष्टिगत रखते हुये पर्यटकों के भ्रमण पर रोक लगाया गया है।


                                

क्षेत्र संचालक पन्ना टाईगर रिजर्व के.एस.भदौरिया ने बताया कि संस्थापक बाघ टी-3 व बाघिन टी-1 पिछले 15 दिनों से इसी इलाके पर डेरा डाले हैं, जबकि बिना कॉलर का एक नर बाघ भी इसी जल प्रपात के आस-पास मौजूद है। पर्यटक इस बाघ को कन्हैया के नाम से जानते हैं। वन परिक्षेत्राधिकारी मड़ला डी.के. नायक ने बताया कि नर बाघ कन्हैया अत्यधिक निडर है और यदा-कदा वह मुख्य सड़क मार्ग पर भी विचरण करते हुये आ जाता है। पाण्डव जल प्रपात की विशेषता यह है कि यहां कुण्ड में हर समय पानी भरा रहता है तथा भीषण गर्मी के मौसम में भी पहाडिय़ों से पानी झरता है। जिसके कारण भीषण तपिश भरी गर्मी में भी यहां शीतलता का अनुभव होता है। पाण्डव जल प्रपात की प्राचीन गुफाओं के भीतर तो गर्मी का पता ही नहीं चलता। बताया जाता है कि पाण्डवों ने अपने निर्वासन के दौरान यहां काफी वक्त गुजारा था, यही वजह है कि इन गुफाओं को पाण्डव गुफायें कहते हैं। बाघ परिवार दोपहर के समय इन्हीं गुफाओं में प्रचण्ड गर्मी और तपिश से दूर शीतल आबोहवा के बीच आराम फरमाता है।
00000

Tuesday, June 11, 2019

आदिवासियों के लिए कल्प वृक्ष से कम नहीं है महुआ का पेड़

  •   महुआ फूल व फलों से आदिवासियों को होती है आय
  •   वनोपज संग्रहण व जल संरक्षण पर ग्रामीणों से हुई चर्चा




  अरुण सिंह   

पन्ना। जल, जंगल और जमीन का संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है। बिगड़ते पर्यावरण और तापमान में लगातार हो रही वृद्धि से आम जन जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। जल संकट के चलते मौजूदा समय हर तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है। इन हालातों में जंगल और पानी की महत्ता का अहसास लोगों को होने लगा है। 

जिले के आदिवासी बहुल जंगल से लगे ग्रामों में वनोपज संग्रहण आज भी जीवन का एक मात्र सहारा हैं। आदिवासी समुदाय के लिये महुआ का वृक्ष किसी वरदान से कम नहीं है। इस वृक्ष को आदिवासी समाज कल्प वृक्ष की संज्ञा देता है क्योंकि यह वृक्ष उनकी आय का प्रमुख जरिया है।

उल्लेखनीय है कि महुये का फूल ही नहीं इसके फल और बीज भी बेहद उपयोगी और औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। आदिवासी परिवार मार्च से अप्रैल तक महुये का फूल बीनते हैं और जून में इन्हीं गुच्छों में फल लटकने लगते हैं। महुआ के इन फलों से तेल निकाला जाता है। 

औषधीय गुणों से भरपूर महुआ के एक वृक्ष से हर सीजन में औसतन 5 हजार रू. तक की आय हो जाती है। कल्दा पठार के आदिवासियों का यह वृक्ष जीवन का प्रमुख आधार है। पठार के जंगल में महुआ के वृक्ष बहुतायत से पाये जाते हैं। यहां के आदिवासी मार्च से लेकर अप्रैल तक महुआ फूल का संग्रहण करते हैं और जून के महीने में जब महुआ के फल पक जाते हैं तो महुआ बीज (गोही) भी एकत्रित करते हैं। अकेले महुआ फूल और गुली  से ही आदिवासियों का पूरे सालभर गुजारा होता है। 


कल्दा पठार की ही तरह जिले के अन्य दूसरे वन क्षेत्र के ग्रामों में रहने वाले लोगों के लिये भी महुआ के पेड़ आय के प्रमुख साधन हैं। ग्राम पंचायत रहुनिया के ग्राम पाठा में जल व पर्यावरण संरक्षण के संबंध में जब ग्रामीणों से चर्चा की गई तो ग्रामीणों ने जंगल की हो रही बेतहाशा कटाई पर चिन्ता जताते हुये कहा कि पानी का संकट जंगल की कटाई का ही नतीजा है। महुआ के महत्व पर चर्चा करते हुये ग्रामीणो ने अपने अनुभव बताये। 

ग्रामीणों ने बताया कि महुआ के पेड़ में इन दिनों डोरी (गुली) भरपूर लगी हुई है। महुआ के फू ल की खुशबू अभी गई नही कि डोरी की खुशबू आने लगी। इसके फल को खाया भी जा सकता है। डोरी का तेल खाने के काम आता है। इसके अलावा मुहआ की डोरी बेंच कर प्रत्येक परिवार 4 से 5 हजार रू. कमा लेता है। 

पाठा निवासी कल्याण ङ्क्षसह आदिवासी ने बताया कि हमारे खेत में 20 महुआ के पेड़ हैं जिससे हमें सालाना 40 से 50 हजार रू. मिल जाते हैं। इस कृषक ने बताया कि आगे हमें और महुआ एवं फलदार पौधे लगाने हंै। ग्रामीणों ने गाँव में 150 पौधे लगाने एवं उनकी सुरक्षा करने की बात कही। पानी से जूझ रहे ग्रामीणो ने तलैया गहरी करण पर विचार किया और आगे काम करने की बात कही है।

00000

स्टार समाचार सतना में प्रकाशित आलेख 

Monday, June 10, 2019

धरम सागर तालाब में निकले हैं खतरनाक लोहे के सरिया

  •   जान को खतरा का बोर्ड लगाकर नगर पालिका ने पल्ला झाड़ा 
  •   वर्ष 2016 में गहरीकरण के दौरान हुआ था अधूरा निर्माण कार्य
  •   जानलेवा सरिया बरसात शुरू होते ही फिर डूब जायेंगी पानी में
  •   गत शनिवार को तालाब में डूबने से हुई है 2 बच्चों की मौत


पन्ना का धर्मसागर तालाब मेँ पानी के भीतर नजर आतीं खतरनाक लोहे की सरिया। 

अरुण सिंह,पन्ना। पन्ना शहर के जीवन का आधार ऐतिहासिक धरम सागर तालाब अब जानलेवा साबित हो रहा है। मदारटुंगा पहाड़ी की तराई में निॢमत झीलनुमा यह प्राचीन जलाशय राजाशाही जमाने से पन्ना शहर की प्यास बुझाता आ रहा है। लेकिन समुचित देखरेख के अभाव व प्रशासनिक उदासीनता के चलते यह जीवनदायी तालाब खतरनाक हो गया है। गर्मी से राहत पाने के लिये इस तालाब में तैरना व नहाना जान जोखिम में डालने जैसा है। गत शनिवार को इसी तालाब में दो मासूम बालकों की डूबने से मौत हुई है। मालुम हो कि धरम सागर के गहरीकरण का कार्य जन सहयोग से 2016 में किया गया था। गहरीकरण के दौरान खुदाई में तालाब से हजारों डम्फर मिट्टी निकाली गई। तालाब के जीर्ण-शीर्ण हो चुके घाटों के जीर्णोद्धार और रखरखाव का कार्य भी शुरू किया गया। इसी क्रम में धरम सागर तालाब के बाबा घाट में रिटॄनग वॉल के निर्माण का कार्य चल रहा था, दरक रहे घाटों को टूटने से बचाने और तालाब की मेड़ को मजबूत करने के लिये पानी में आरसीसी कंकरीट की वाल बनाई जा रही थी। इसी बीच तेज बारिश शुरू हो गई और 4-5 फिट की निकली जानलेवा खतरनाक लोहे की सरिया काम अधूरा रह जाने के कारण बाहर ही निकली रह गईं जो बारिश होने पर पानी में डूब गईं। लोहे की ये खतरनाक सरिया अब जानलेवा साबित हो रही हैं।
उल्लेखनीय है कि धरमसागर तालाब के गहरीकरण व जीर्णोद्धार का कार्य 3 वर्ष पूर्व कराया गया था उस समय पन्ना नगर के लोगों से लाखों रू. सहयोग राशि भी प्राप्त हुई थी। बताया जाता है कि आम जनता के सहयोग से एकत्रित हुई यह धनराशि जो गहरीकरण के उपरान्त शेष बची थी वह अभी भी पन्ना नगर पालिका के पास जमा है लेकिन इस जमा धनराशि का उपयोग अधूरे पड़े तालाब के निर्माण कार्य को पूरा कराने में नहीं किया गया। नतीजतन तालाब में पानी के अंदर निकली हुई लोहे की सरिया अत्यधिक खतरनाक और जानलेवा हो गई हैं। मौजूदा समय तालाब का बहुत बड़ा हिस्सा सूख चुका है तथा पानी में डूबी रहने वाली लोहे की सरिया भी बाहर निकल आई हैं। यही वह मौका है जब अधूरे पड़े निर्माण कार्य को पूरा कराकर खतरनाक सरियों को ठिकाने लगाया जा सकता है। इसके लिये नगर पालिका प्रशासन को समय रहते ध्यान देना चाहिये। धरमसागर तालाब के जिस घाट में सरिया निकली हैं वहां बड़ी संख्या में लोग स्नान करते हैं जिससे हरसमय खतरा बना रहता है।  बरसात शुरू होने के पूर्व तत्काल निर्माण कार्य पूरा कराकर इन सरियों  को खत्म करना जरूरी है, यदि ऐसा नहीं किया गया तो हमेशा खतरा बना रहेगा और कभी भी किसी की जान जा सकती है।

नवागत कलेक्टर को देना होगा ध्यान



जिले के नवागत कलेक्टर कर्मवीर शर्मा को पन्ना के जीवनदायी धरमसागर तालाब के रखरखाव व समुचित देखरेख पर विशेष ध्यान देना होगा। कलेक्टर श्री शर्मा पदभार गृहण करने के बाद जनहित से जुड़े कार्यों में जिस तरह से रुचि दिखाई है तथा प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिये प्रयास किये हैं उससे लोगों में उम्मीद जागी है कि इनके कार्यकाल में यहां अच्छे कार्य होंगे। नगरवासियों ने नवागत कलेक्टर श्री शर्मा का ध्यान धरमसागर तालाब के अधूरे पड़े कार्य की ओर आकृष्ट कराते हुये यह अपेक्षा की है कि वे नगरपालिका या संबंधित एजेंसी को कार्य पूरा करने के निर्देश देंगे। अन्यथा बारिश शुरू होते ही तालाब में निकली सरिया फि र डूब जायेंगी और पन्ना नगर के लोगों की जान पर खतरा बना रहेगा।

बच्चों की मौत को सांसद ने बताया दुखद

खजुराहो लोकसभा क्षेत्र के नवनिर्वाचित सांसद विष्णु दत्त शर्मा ने तालाब में डूबने से हुई दो बच्चों की असमय मौत पर दुख जताते हुये कहा है कि मेरी संवेदनायें पीडि़त परिवार के साथ हैं। उन्होंने कहा कि पन्ना के धरमसागर तालाब में घाट से कुछ ही दूरी पर पानी के अंदर निकली लोहे की सरिया अत्यधिक खतरनाक है। इन सरियों के कारण कभी भी और कोई बड़ा हादसा हो सकता है इसलिये कलेक्टर और प्रशासन से मैं तत्काल बात करूंगा कि बरसात शुरू होने से पूर्व ही यह कार्य कराया जाये। सांसद वी.डी. शर्मा ने कहा कि यह निकली हुई सरिया किसी बड़ी घटना को आमंत्रण दे रहे हैं जो चिन्ता का विषय है।
00000

Wednesday, June 5, 2019

जल संकट के चलते वीरान हुआ पन्ना का छापर गाँव

  • गाँव से पलायन कर 250 लोगों ने 20 किमी दूर ककरहटी में ली शरण
  •  एक सैकड़ा से अधिक ग्रामों में पानी के लिए मची है त्राहि - त्राहि 




अरुण सिंह,पन्ना। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में भीषण पेयजल संकट के चलते एक सैकड़ा से भी अधिक ग्रामों में पानी के लिये त्राहि-त्राहि मची हुई है। ग्रामीण अंचलों की अधिकांश नल जल योजनायें ठप पड़ी हैं जिससे हालात और बिगड़ रहे हैं। जल स्तर नीचे खिसकने से कुये जहां सूख चुके हैं वही हैण्डपम्पों से पानी की जगह गर्म हवा निकल रही है। हालात इतने खराब हैं कि पेयजल संकट के कारण लोग पलायन करने को विवश हो रहे हैं। जिला मुख्यालय पन्ना से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित छापर गाँव से ढाई सौ लोग अपना गाँव छोड़कर पलायन कर चुके हैं ग्रामीणों के पलायन का एकमात्र कारण भीषण जल संकट है इस गाँव में पानी की विकराल समस्या के चलते पिछले 3 माह से अधिकांश घरों में ताले लटक रहे गाँव से बड़ी तादाद में लोगों का महानगरों के लिये पलायन करना तो आम बात है लेकिन पानी के लिये पलायन नया आग उगलती गर्मी के बीच पन्ना जिले में जल संकट से उत्पन्न त्रासदी का हाल यह है कि यहां के छात्र ग्राम के लोग जल संकट के कारण 3 माह पहले ही अपना गाँव छोड़कर 20 किमी दूर ककरहटी गाँव में शरण लेने को मजबूर हुये हैं। लगभग वीरान हो चुके इस गाँव में सिर्फ तीन बुजुर्ग और कुछ मवेशी ही अब शेष बचे हैं जो कि जिंदा रहने की जद्दोजहद करते हुये इस चिलचिलाती धूप में 4 किमी दूर से पीने का पानी लाकर किसी तरह गुजारा कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पन्ना जिला मुख्यालय के निकट नेशनल हाईवे क्रमांक 39 के किनारे स्थित छापर गाँव से ग्रामीणों के पानी के अभाव में पलायन करने को लेकर समूचा प्रशासन अब तक बेखबर है। आदिवासी बहुल छापर गाँव में पेयजल का इतना विकराल संकट पहली बार निर्मित हुआ है। गाँव के बुजुर्ग बंदी चौधरी का कहना है कि उन्होंने जब से होश संभाला है तब से पहली बार पानी का इतना भीषण संकट अपने गाँव में देखा है। बंदी चौधरी ने बताया कि गर्मी बढऩे के साथ ही जल स्तर लगातार पाताल की ओर खिसकने के कारण 3 माह पूर्व उनके गाँव के अधिकांश लोग गाँव छोड़कर 20 किमी दूर ककरहटी के लिये पलायन कर गये हैं। बंदी को छोड़कर उसके परिवार के अन्य सदस्य भी ककरहतटी में रह रहे हैं । बंदी चौधरी के अलावा छापर में बचे दो अन्य ग्रामीण गेंदालाल चौधरी और बुधवा चौधरी ने बताया कि आग उगलती गर्मी में वे 3 से 4 किमी दूर जनवार गाँव या फि र मोहनगढ़ी से पीने का पानी लाते हैं जब पानी लाने की हिम्मत नहीं रहती तो वे जंगल में स्थित प्राचीन झिरिया का गंदा पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं। यह झिरिया भी छापर गाँव की आबादी से लगभग 1 कि मी दूर स्थित है। बंदी चौधरी ने बताया कि छापर गाँव में पेयजल व्यवस्था के लिये 3 हैण्डपम्प और एक प्राचीन कुआं स्थित है लेकिन पिछले तीन-चार माह से जल स्तर नीचे खिसकने के कारण हैण्डपम्प से पानी की जगह गर्म हवा निकल रही है। एकमात्र कुआं का पानी भी समाप्त हो चुका है इसकी तलछट पर कीचड़ बचा है। पानी के अभाव में ग्रामीणों को मजबूर होकर 20 किमी दूर ककरहटी में शरण लेनी पड़ी है। छापर गाँव में भीषण जल संकट व ग्रामीणों के पलायन करने के संबंध में जब लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग पन्ना के कार्यपालन यंत्री एस.के. जैन से चर्चा की गई तो उन्होंने आश्चर्य जताते हुये कहा कि छापर गाँव से ग्रामीणों का 3 माह पूर्व पानी के अभाव में पलायन करना बेहद गंभीर मामला है। मुझे आपके माध्यम से यह जानकारी मिल रही है क्षेत्र के हमारे सब इंजीनियर और हैण्डपम्प तकनीशियन के संज्ञान में यह मामला अब तक क्यों नहीं आया? मैं उनसे चर्चा करता हूँ और समस्या का तत्परता से समाधान कराता हूँ।

पेयजल संकट को लेकर ग्रामीण कर रहे आंदोलन





जिले के शहरी व ग्रामीण अंचलों में पेयजल संकट दिनों दिन विकराल हो रहा है। पानी के लिये भटकते ग्रामवासी अब आंदोलन करने के लिये मजबूर हो रहे हैं। गुनौर सिली में भीषण जल संकट को देखते हुये स्थानीय लोगों द्वारा पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु आंदोलन शुरू किया गया है।
मालुम हो कि विगत 31 मई को आंदोलनकारियों द्वारा स्थानीय प्रशासन को ज्ञापन के माध्यम से आगाह किया गया था कि यदि 2 दिवस के अंदर पानी की समस्या से निजात नहीं दिलाया गया तो स्थानीय लोग आंदोलन करने को बाध्य होंगे। ग्रामीणों द्वारा आगाह किये जाने के बावजूद प्रशासन द्वारा स्थानीय लोगों की मांग को गंभीरता से नहीं लिया गया जिस कारण ग्रामवासी आज पानी के लिये आंदोलित हो गये।
आंदोलनकारियों ने क्षेत्रीय विधायक सहित प्रदेश सरकार पर आरोप लगाते हुये कहा कि पानी की समस्या पर न तो स्थानीय विधायक का ध्यान है न ही प्रदेश सरकार का सब केवल तबादला उद्योग में व्यस्त हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस भीषण गर्मी में लोग पानी के लिये हैरान और परेशान हैं फिर भी प्रशासन का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा, प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। आंदोलनकारियों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन पर आरोप लगाते हुये कहा कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को जनता की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। जनता एक-एक बूँद पानी को तरस रही है और स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी एसी में बैठकर मौज कर रहे हंै। आंदोलनकारियों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुये कहा कि यदि हमारी समस्याओं का त्वरित निराकरण नहीं हुआ तो हम उग्र आंदोलन के लिये मजबूर होंगे जिसकी सम्पूर्ण जवाबदारी प्रशासन की होगी। आंदोलन में प्रमुख रूप से मलखान ङ्क्षसह बैस,राजेंद्र चौबे, बृजेश प्रताप ङ्क्षसह,ब्रजेन्द्र खम्परिया,विजय चौबे, चंदन सपेरा, डॉ. अजीत पाठक, बृजेश तिवारी, धर्मेंद्र अवधिया, सोनू पाठक, नीलेश द्विवेदी, पंकज दुबे, पुष्पेंद्र पटेल, बिटानू पटेल, संकुल गुप्ता, मंजू विश्वकर्मा, सत्येंद्र द्विवेदी, डॉ. टी.के. मालिक, नारी शक्ति उर्मिला नामदेव, कुमुदनी खरे, उर्मिला लखेरा, अनीता नामदेव, प्रेमा गुप्ता सहित बड़ी संख्या में ग्रामवासी उपस्थित रहे।
00000

Tuesday, June 4, 2019

विवादों के चलते अधर में लटका पन्ना का रूंज बांध

  •   270 करोड़ रू. की लागत वाले इस बांध से 39 ग्रामों को मिलना है लाभ
  •   डूब में आ रही कृषि भूमि का मुआवजा न मिलने से ग्रामीण कर रहे विरोध
  •   प्रभावित हो रहे ग्रामीणों के विरोध से बांध का निर्माण कार्य रुका




अरुण सिंह,पन्ना। जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 15 किमी दूर पन्ना-अजयगढ़ मार्ग पर रूंज नदी के प्रवाह
क्षेत्र में 269.79 करोड़ रू. की लागत वाली रूंज मध्यम ङ्क्षसचाई परियोजना का कार्य विवादों के चलते अधर में लटग गया है। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की लापरवाही तथा मनमर्जीपूर्ण तरीके से कराये गये सर्वे तथा राजस्व विभाग के साथ बेहतर तालमेल व समन्वय के अभाव में डूब क्षेत्र में आने वाली कृषि भूमि का मुआवजा सभी प्रभावित किसानों को अभी तक प्रदान नहीं किया जा सका है। मुआवजा वितरण से पहले ही बांध के निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिये जाने का ग्रामीणों द्वारा पुरजोर विरोध करने से अप्रिय स्थिति निॢमत हुई है, जिससे बांध के निर्माण का कार्य रोकना पड़ा है। इस बांध के निर्माण में अब तक 6762.90 लाख रू. खर्च किये जा चुके हैं। रूंज बांध के निर्माण का कार्य अधर में लटकने से जिम्मेदार अधिकारियों की नियत व मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि जल संसाधन विभाग पन्ना द्वारा जिले में अब तक जितने भी बांधों का निर्माण कराया गया है, सभी किन्हीं न किन्हीं कारणों से विवादों के घेरे में आ रहे हैं। कहीं वन भूमि तो कहीं मुआवजा वितरण को लेकर विवाद है, कई जगह गुुणवत्ता विहीन कार्य को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। बीते 10 वर्षों के दौरान जल संसाधन विभाग द्वारा पन्ना जिले में आधा सैकड़ा से भी अधिक ङ्क्षसचाई जलाशयों व बांधों का निर्माण कराया गया है। पन्ना को पंजाब बनाने का नारा देकर यहां अरबों रू. की लागत से निर्मित सिंचाई परियोजनाओं में अधिकांश अनुपयोगी बनी हुई हैं। अपनी खामियों को छिपाने के लिये अनुपयोगी सिंचाई परियोजनाओं से कागजों पर सैकड़ों हेक्टेयर कृषि भूमि में फर्जी सिंचाई  दर्शाई जा रही है। मनमानी और लापरवाही का यह आलम है कि विगत 5 वर्ष पूर्व पहली बारिश में ही फूटा भितरी मुटमुरू बांध अभी तक नहीं सुधारा जा सका है। जिससे प्रभावित किसानों को ङ्क्षसचाई सुविधा मिलना तो दूर उनकी उपजाऊ कृषि भूमि डूब क्षेत्र में आने से खुशहाली बदहाली में तब्दील हो गई है। सिरस्वाहा, भिलसांय, पहाड़ीखेरा, सकरिया व जनकपुर सहित ऐसे अनेकों ङ्क्षसचाई जलाशय हैं, जिनसे अपेक्षित लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा।

शुरू से विवादों में घिरा था रूंज बांध





जिले के पन्ना विधानसभा क्षेत्र में अजयगढ़ विकासखण्ड अन्तर्गत विश्रामगंज में निर्माणाधीन रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना शुरूआती चरण से ही विवादों में घिरी रही है। इस योजना की प्रशासकीय स्वीकृति म.प्र. शासन जल संसाधन विभाग भोपाल के आदेश क्र. आर-993/2011/मध्यम/31/649/भोपाल दिनांक 22-7-2011 के द्वारा 269.79 करोड़ रू. एवं रूपांकित ङ्क्षसचाई क्षमता खरीफ 2750 तथा रबी 9800 हेक्टेयर कुल 12550 हेक्टेयर की विभागीय मद में प्रदान की गई है। इस परियोजना के पूर्ण होने पर 39 ग्रामों को सिंचाई सुविधा का लाभ प्राप्त होना है। कार्यपालन यंत्री जल संसाधन विभाग पन्ना जे.के. ठाकुर ने बताया कि परियोजना के अन्तर्गत भू-अर्जन की राशि कलेक्टर पन्ना को 2974.00 लाख रू. जमा किया जा चुका है। श्री ठाकुर के मुताबिक राजस्व विभाग का मुआवजा वितरण सहित अन्य कार्यों में अपेक्षित सहयोग न मिलने से विवाद की स्थिति बनी हुई है, परिणाम स्वरूप बांध के निर्माण का कार्य बाधित हुआ है।

डूब क्षेत्र के आधे किसानों को नहीं मिला मुआवजा


रूंज बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले 7 ग्रामों के कुल 807 किसानों में लगभग 4 सौ किसानों को अभी तक मुआवजा की राशि नहीं मिली। डूब क्षेत्र में विश्रामगंज, पाण्डेपुरवा, मझपुरवा, बंगलन, लौकहापुरवा, बलरामपुर व छिरयाई गाँव आ रहे हैं। पाण्डेपुरवा निवासी सत्येन्द्र पाण्डे ने बताया कि चेन्नई की कम्पनी मे. एल. एण्ड टी. द्वारा बांध का निर्माण कार्य कराया जा रहा था। पाण्डेपुरवा के चारों तरफ बांध का मलबा डाल दिया गया है तथा कैम्प बनाया गया है जिससे ग्रामीणों का जहां आवागमन बाधित हुआ है वहीं ब्लास्टिंग होने से धूल के गुबार उठने व घरों में पत्थर के टुकड़े गिरने से ग्रामीणों का जीना दूभर हो गया था। आपने बताया कि ग्राम को विस्थापित होना है अभी तक पैसा मिल नहीं। विस्थापन किये बिना ही बांध का काम शुरू कर दिया गया जो अनुचित है।

अब विस्थापन होने पर ही शुरू होगा काम


ग्रामवासियों का कहना है कि पूरा मुआवजा वितरित होने तथा विस्थापन के बाद ही अब बांध के निर्माण का कार्य शुरू हो पायेगा। कार्य स्थल में लगातार होने वाली ब्लास्टिंग  और डस्ट उडऩे से ग्रामीणों को भारी परेशानी हो रही थी, जिसका पुरजोर विरोध होने पर निर्माता कम्पनी को काम रोकना पड़ा है। राजाराम कौंदर, हरिलाल कौंदर, दशरथ गौंड़ तथा लखनपाल ने जानकारी देते हुये बताया कि कम्पनी द्वारा बांध के निर्माण में गुणवत्ता को अनदेखा किया जा रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक निर्माण कार्य में नदी की ही बलुई चट्टानों की गिट्टी उपयोग में लाई जा रही है, जबकि बांध में ग्रेनाइट की गिट्टी उपयोग में लानी चाहिये। ग्रामवासियों ने बताया कि निर्माता कम्पनी द्वारा नदी किनारे क्रेशर लगा दिया गया है, जहां नदी की ही बलुई चट्टानों से गिट्टी तैयार की जाती है। यह गिट्टी गुणवत्ता की दृष्टि से ग्रेनाइट के मुकाबले ठीक नहीं है। जल संसाधन विभाग के तकनीकी अधिकारी गुणवत्ता के निर्धारित मापदण्डों को क्यों अनदेखा कर रहे हैं, यह आश्चर्यजनक है।

इनका कहना है...

0  डूब क्षेत्र में आने वाले किसानों को मुआवजा वितरित करने के लिये भू-अर्जन की राशि कलेक्टर पन्ना को 2974 लाख रू. जमा किया जा चुका है। मुआवजा वितरण में राजस्व विभाग का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा, जिससे विवाद की स्थिति बनी और बांध के निर्माण का कार्य बाधित हुआ।
जे.के. ठाकुर, कार्यपालन यंत्री जल संसाधन संभाग पन्ना

Monday, June 3, 2019

बुन्देलखण्ड में पर्यटन विकास की संभावनाओं को लगेंगे पंख

  •   अंचल से प्रहलाद पटेल के केन्द्रीय मंत्री बनने से बढ़ीं उम्मीदें
  •   मन्दिरों के शहर पन्ना में पर्यटन विकास की बेहतर संभावनायें
  •   प्राकृतिक सौन्दर्य व जैव विविधता से परिपूर्ण है पन्ना का जंगल



पन्ना स्थित प्राचीन श्री बल्देव जी का मन्दिर।

अरुण सिंह,पन्ना। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पर्यटन विकास की विपुल संभावनाओं के बावजूद प्रभावी और ठोस पहल न होने से उम्मीदों के अनुरूप यहां कार्य नहीं हुआ। लेकिन अब इस क्षेत्र के लोगों की उम्मीदें एक बार फिर जागृत हुई हैं। लगातार दूसरी बार भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्री मण्डल में बुन्देलखण्ड क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देते हुये सांसद प्रहलाद पटेल को कैबिनेट में जगह देकर पर्यटन मंत्री बनाया है। श्री पटेल के मंत्री बनने से बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पर्यटन विकास की संभावनाओं को पंख लगेंगे ऐसी उम्मीदें की जा रही हैं। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो लोकसभा सीट से सांसद चुने गये विष्णुदत्त शर्मा ने अभी हाल ही में केन्द्रीय मंत्री बने श्री पटेल से मुलाकात कर क्षेत्र में पर्यटन विकास के संबंध में विस्तृत चर्चा की है जिससे यह उम्मीदें जागृत हुई हैं कि इस क्षेत्र में पर्यटन विकास की संभावनायें आने वाले समय में हकीकत बन सकेंगी।
केन्द्रीय पर्यटन मंत्री से भेंट करते खजुराहो सांसद। 

उल्लेखनीय है कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 4 वर्ष पूर्व पन्ना प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि पन्ना शहर के आस-पास स्थित प्राकृतिक मनोरम स्थलों व जल प्रपातों का विकास कर यहां मानसून पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये प्रयास किये जायेंगे ताकि बारिश के मौसम में जब पन्ना टाईगर रिजर्व के गेट पर्यटकों के भ्रमण हेतु बंद हो जायें, उस समय भी पर्यटक यहां आकर प्रकृति के अद्भुत नजारों का आनन्द ले सकें। इससे यहां पर रोजगार के नये अवसरों का जहां सृजन होगा, वहीं मन्दिरों के शहर पन्ना को एक खूबसूरत पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकेगा। मुख्यमंत्री जी की इस सोच व घोषणा की पन्नावासियों ने सराहना की थी, लेकिन 4 वर्ष गुजर जाने के बाद भी इस दिशा में कोई सार्थक पहल व प्रयास नहीं हुये। मालुम हो कि पन्ना शहर के आस-पास 10 किमी के दायरे में प्राकृतिक व ऐतिहासिक महत्व के ऐसे अनेकों स्थल व जल प्रपात हैं, जिनको यदि पर्यटकों की दृष्टि से विकसित कर दिया जाये तो ये स्थल आकर्षण का केन्द्र बन सकते हैं। जिला मुख्यालय पन्ना से 10 किमी. की दूरी पर सड़क मार्ग के निकट स्थित लखनपुर सेहा का घना जंगल तथा ऊँची मीनार जैसा नजर आने वाला यहां का मशरूम राक देखने जैसा है। जैव विविधता से परिपूर्ण इस मनोरम स्थल में पर्यटन विकास की असीम संभावनायें मौजूद हैं। फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक प्रकृति की इस अनूठी और विस्मय विमुग्ध कर देने वाली इस कृति की ओर शासन व प्रशासन का ध्यान नहीं गया। यदि इस स्थल का समुचित विकास हो जाये तो यह देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है।
गौरतलब है कि पन्ना जिले को प्रकृति ने अनुपम सौगातों से नवाजा है। यहां के हरे-भरे घने जंगल, अनूठे जल प्रपात व गहरे सेहे देखकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि यहां इतना सब है फिर भी यह इलाका उपेक्षित और पिछड़ा क्यों है? पन्ना शहर में जहां प्राचीन भव्य व विशाल मन्दिर हैं, वहीं इस जिले में ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भी भरमार है। प्रकृति तो जैसे यहां अपने बेहद सुन्दर रूप में प्रकट हुई है। यदि इन सभी खूबियों का सही ढंग से क्षेत्र के विकास व जन कल्याण में रचनात्मक उपयोग हो तो इस पूरे इलाके का कायाकल्प हो सकता है। पन्ना शहर के बेहद निकट स्थित लखनपुर का सेहा एक ऐसा स्थान है जो इस जिले को पर्यटन के क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान दिलाने की क्षमता रखता है। लखनपुर सेहा के अलावा पन्ना शहर के ही निकट गौर का चौपड़ा, खजरी कुड़ार गाँव के पास चरही, कौआ सेहा सहित अनेकों स्थल हैं जो उपेक्षित पड़े हैं। यदि इन मनोरम स्थलों को विकसित किया जाकर सही तरीके से प्रस्तुत किया जाये तो पर्यटक यहां खिंचे चले आयेंगे।

पूरे चार माह बन्द रहता है नेशनल पार्क



मानसूनी बारिश के शुरू होते ही पन्ना टाईगर रिजर्व का प्रवेश द्वार चार महीने के लिये पर्यटकों के भ्रमण हेतु बन्द हो जाता है। सिर्फ पाण्डव जल प्रपात बारिश के मौसम में खुला रहता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुये मानसून पर्यटन को बढ़ावा देने की बात यहां उठी थी, क्योंकि पन्ना शहर के आस-पास दर्जनों छोटे-बड़े जल प्रपात व अनूठे स्थल हैं जहां बारिश के मौसम में भी पहुँचा जा सकता है। इन सभी स्थलों को चिह्नित करते हुये वहां तक सुगम मार्ग व बुनियादी सुविधायें यदि उपलब्ध करा दी जायें तो ये स्थल बारिश के मौसम में पर्यटकों से गुलजार हो सकते हैं। लेकिन इस अनूठी योजना को मुख्यमंत्री जी की घोषणा के बावजूद अभी तक मूर्तरूप नहीं दिया जा सका है, फलस्वरूप पन्ना टाईगर रिजर्व के गेट बन्द होते ही यहां का पर्यटन व्यवसाय पूरी तरह से ठप्प हो जाता है। अब बुन्देलखण्ड क्षेत्र से प्रहलाद पटेल जी के पर्यटन मंत्री बनने से यह उम्मीद की जा रही है कि मानसून पर्यटन को मूर्तरूप देने के लिये वे सार्थक पहल करेंगे।
00000